LNJP में संसाधनों की भरमार, फिर भी बंद होने की कगार पर न्यूरो एनेस्थेसिया के सुपर स्पेशियलिटी कोर्स

नई दिल्ली. देश की राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों में शुमार लोकनायक जय प्रकाश (LNJP) अस्पताल से एक चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है. दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मॉडल और मेडिकल शिक्षा के दावों के विपरीत, यहां के प्रतिष्ठित न्यूरो सर्जरी और डीएम न्यूरो एनेस्थीसिया जैसे सुपर स्पेशलिटी कोर्सेज को बंद करने और उन्हें अन्यत्र स्थानांतरित करने की तैयारी की जा रही है. हैरानी की बात यह है कि एलएनजेपी अस्पताल में न्यूरो सर्जरी डिपार्टमेंट में 86 बेड और 2 ओटी फैसिलिटी है. वहीं इस विभाग में सक्षम फैकल्टी है. इसके बावजूद यहां न्यूरो सर्जरी और न्यूरो एनेस्थेसिया के सुपर स्पेशिएलिटी कोर्स पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. क्या है पूरा विवाद?दरअसल, मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज (MAMC) से संबद्ध लोकनायक अस्पताल देश को बेहतरीन न्यूरो सर्जन देने के लिए विख्यात रहा है. यहां का न्यूरो सर्जरी डिपार्टमेंट भी उत्कृष्ट है. अब तक न्यूरो सर्जरी के एमसीएच कोर्स के लिए अब तक तीन सत्र के लिए एडमिशन हो चुका है. इनमें से 1 बैच तीन साल का कोर्स कर निकल गया है. दूसरा इस साल नवंबर में कोर्स पूरा कर लेगा. 2024-25 सत्र के तीसरे बैच में 2 स्टूडेंट्स का एडमिशन हुआ लेकिन वे दोनों इंफ्रास्ट्रक्चर और फैकल्टी की कमी का हवाला देते हुए कोर्ट चले गए. इस बीच सरकार ने बिना कोर्ट का आदेश पारित हुए दोनों छात्र को जीबी पंत में ट्रांसफर कर दिया. एलएनजेपी में इंफ्रास्ट्रक्चर की कोई कमी नहीं है और एक सक्षम फैकल्टी की और जरूरत है. ऐसे में एक गंभीर सवाल खड़ा होता है क्या एलएनजेपी अस्पताल के साथ साजिश की जा रही है. जानकारों का कहना है कि यह निर्णय न केवल विश्वविद्यालय के नियमों के खिलाफ है, बल्कि एलएनजेपी अस्पताल की साख को भी बट्टा लगा रहा है. संसाधनों की भरमार, फिर भी बहानेबाजीआंकड़ों पर गौर करें तो लोकनायक अस्पताल में संसाधनों की कोई कमी नहीं दिखती. नियमों के अनुसार, न्यूरो सर्जरी जैसे सुपर स्पेशलिटी कोर्स के लिए एक समर्पित वार्ड की आवश्यकता होती है. एलएनजेपी में वर्तमान में 86 बेड का एक विशाल न्यूरो सर्जरी वार्ड मौजूद है और यहां दो ऑपरेशन थिएटर (OT) टेबल लगातार संचालित होती हैं. डीएम न्यूरो एनेस्थीसिया, जो पूरी तरह से न्यूरो सर्जरी विभाग पर निर्भर रहने वाला कोर्स है, उसे भी यहां से शिफ्ट किया गया है जबकि लोक नायक अस्पताल समुचित इंफ्रास्ट्रक्चर और फैकल्टी उपलब्ध है. सवाल यह उठता है कि जब अस्पताल के पास 86 बेड और 2 ओटी टेबल की क्षमता है, तो फिर इन कोर्सेज को चलाने में प्रशासन को क्या आपत्ति है? क्या दिल्ली सरकार पिछले दो सालों में एक फैकल्टी की नियुक्ति करने में भी असमर्थ रही है, या इसके पीछे कोई गहरी प्रशासनिक साजिश है? छात्रों का भविष्य और मरीजों की जान दांव परभारत में पहले ही न्यूरो सर्जनों की भारी किल्लत है. 140 करोड़ की आबादी वाले देश में महज 1900 से 3700 के बीच न्यूरो सर्जन उपलब्ध हैं. ऐसे में एलएनजेपी जैसे संस्थान से इन कोर्सेज का प्रभावित होना राष्ट्रीय क्षति है. डीएम न्यूरो एनेस्थीसिया का पहला बैच (2024-25) पहले ही इस अव्यवस्था के कारण कोर्ट की शरण ले चुका है. सरकार ने फैकल्टी की कमी का हवाला देते हुए उन्हें जीबी पंत भेज दिया, जबकि रिपोर्ट बताती है कि एलएनजेपी में एनेस्थीसिया की पर्याप्त फैकल्टी मौजूद है. आगामी बैच पर तलवारअब 2025-26 के आगामी बैच पर भी तलवार लटक रही है. यदि इन कोर्सेज को एलएनजेपी में वापस सुचारू रूप से शुरू नहीं किया गया, तो आने वाले समय में रेजिडेंट डॉक्टरों की कमी होगी, जिसका सीधा असर गरीब मरीजों के इलाज पर पड़ेगा. प्रशासन का पक्ष और अनसुलझे सवाललोकनायक अस्पताल के चिकित्सा निदेशक डॉ. बी एल चौधरी का कहना है कि छात्रों को शिफ्ट करना एक नीतिगत फैसला है और यह मामला सीधे तौर पर एमएएमसी (MAMC) से जुड़ा है. उन्होंने दावा किया कि भविष्य में ये कोर्स जारी रहेंगे, लेकिन कब और कैसे, इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं है. दूसरी तरफ सरकार के अधिकारी इस मुद्दे पर बात नहीं करना चाहते. हमने कई फोन किए लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. वर्ल्ड क्लास मॉडल पर सवाल सवाल यह भी उठता है कि जीबी पंत अस्पताल, जो लंबे समय तक मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के डीन के सीधे अधिकार क्षेत्र में नहीं था, वहां सारे कोर्स सुचारू रूप से चल रहे हैं, तो एलएनजेपी में ही यह संकट क्यों पैदा किया जा रहा है? क्या यह दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था की चरमराती हालत का प्रमाण है? इस पूरे प्रकरण ने दिल्ली सरकार के उस ‘वर्ल्ड क्लास’ स्वास्थ्य मॉडल पर सवालिया निशान लगा दिया है, जिसका ढिंढोरा देश-दुनिया में पीटा जाता है. अगर एक पद की कमी के कारण सुपर स्पेशलिटी कोर्स बंद होने की कगार पर पहुंच जाते हैं, तो आम जनता को मिलने वाली सुविधाओं की कल्पना आसानी से की जा सकती है.
एनेस्थेसिया ओवरडोज से 17 साल के लड़के की हुई मौत:दो डॉक्टरों पर गैरइरादतन हत्या के आरोप तय; सबूतों के आधार पर चलेगा ट्रायल

इंदौर में सर्जरी के दौरान चिकित्सकीय लापरवाही से 17 साल के किशोर अमित सेन की मौत के मामले में कोर्ट ने सख्त कदम उठाया है। जिला कोर्ट ने दो डॉक्टरों डॉ. कुश बंडी और डॉ. खुशबू चौहान के खिलाफ भादंवि की धारा 304 (भाग-2)/34 के तहत आरोप तय कर दिए हैं। कोर्ट ने दोनों आरोपियों द्वारा आरोपों से मुक्त करने के लिए दायर आवेदन पर सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, खारिज कर दिए। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट से ट्रायल के लिए समय मांगा, जिस पर कोर्ट ने अगली सुनवाई 2 मार्च तय की है। अब दोनों आरोपियों के खिलाफ नियमित ट्रायल चलेगा। यह है मामला पुलिस जांच के अनुसार, एनेस्थेसिया की ओवरडोज दिए जाने और अन्य चिकित्सकीय लापरवाहियों के कारण अमित सेन की मौत हो गई। दरअसल सड़क हादसे में घायल अमित को 29 मई 2023 को लसूडिया थाना क्षेत्र से राजश्री नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। उसके बाएं पैर की सर्जरी होनी थी, इसी दौरान बेहोशी के इंजेक्शन के बाद उसकी हालत बिगड़ी और मृत्यु हो गई। मामले में पहले अस्पताल संचालक डॉ. देवेंद्र भार्गव, हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. कुश बंडी और एनेस्थेटिस्ट डॉ. खुशबू चौहान के खिलाफ गैरइरादतन हत्या का केस दर्ज किया गया था। हालांकि 24 फरवरी 2024 को डॉ. भार्गव के निधन के बाद उनके विरुद्ध कार्रवाई समाप्त कर दी गई। शेष दो डॉक्टरों के खिलाफ चालान पहले ही पेश हो चुका है और अब ट्रायल आगे बढ़ेगा। जांच में सामने आई गंभीर खामियां घटना के बाद तत्कालीन कलेक्टर के निर्देश पर नर्सिंग होम की जांच कराई गई थी, जिसमें कई गंभीर लापरवाहियां सामने आईं। इसके बाद नर्सिंग होम को सील भी किया गया। मृतक अमित अपने पिता रिंकू सेन का इकलौता पुत्र था।








