Monday, 13 Apr 2026 | 04:32 PM

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धार भोजशाला विवाद- इंदौर हाईकोर्ट में लगातार तीसरे दिन सुनवाई:हिंदू पक्ष ने रखे तर्क, कहा- मस्जिद पक्ष के शपथ पत्र में ही मंदिर होने के प्रमाण

धार भोजशाला विवाद- इंदौर हाईकोर्ट में लगातार तीसरे दिन सुनवाई:हिंदू पक्ष ने रखे तर्क, कहा- मस्जिद पक्ष के शपथ पत्र में ही मंदिर होने के प्रमाण

धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला मामले में याचिकाकर्ता हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के वकील विष्णु शंकर जैन ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के समक्ष बुधवार को लगातार तीसरे दिन अपने तर्क रखे। उन्होंने कहा कि मौला कमालुद्दीन सोसायटी की ओर से प्रस्तुत मस्जिद पक्ष के शपथ पत्र में खुद ही भोजशाला के मंदिर होने के प्रमाण हैं। समिति ने शपथ पत्र में जिन पुस्तकों का उल्लेख किया है, वे बता रही हैं कि 14वीं शताब्दी से पहले मस्जिद का कोई अस्तित्व नहीं था, जबकि भोजशाला का निर्माण 1034 में ही हो चुका था। मस्जिद निर्माण में मंदिर से निकली सामग्री का उपयोग किया गया था, जबकि इस्लामिक कानून के अनुसार ऐसा नहीं किया जा सकता। मंदिर होना वैज्ञानिक सर्वे और तथ्यों पर आधारित एडवोकेट जैन ने तर्क दिया कि इस्लाम में मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाना या टूटे हुए मंदिर की सामग्री का उपयोग करना वर्जित है। भोजशाला के मंदिर होने की बात आस्था या विश्वास के आधार पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सर्वे और तथ्यों के आधार पर कही जा रही है। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने याचिका के साथ जो फोटोग्राफ प्रस्तुत किए हैं, वे स्पष्ट बता रहे हैं कि भोजशाला मंदिर ही है। मौला कमालुद्दीन सोसायटी ने अपने शपथ पत्र में इन फोटोग्राफ को लेकर कोई आपत्ति भी दर्ज नहीं कराई है। मंदिर का अस्तित्व बहुत पहले से है एडवोकेट जैन ने अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि पूजा स्थल अधिनियम के प्रविधानों के अनुसार एक धर्म के धार्मिक स्थल को किसी दूसरे धर्म के धार्मिक स्थल में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। चूंकि भोजशाला मंदिर है और इसका अस्तित्व मस्जिद से बहुत पहले से है, इसलिए अधिनियम के प्रविधानों के अंतर्गत इसके धार्मिक स्वरूप को बदलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। मूल स्वरूप में तोड़फोड़ से धार्मिक स्थल के वैधानिक अधिकार में कोई फर्क नहीं पड़ता। इस मामले में गुरुवार को भी सुनवाई जारी रहेगी। एडवोकेट जैन ने कहा कि मंदिर में मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद देवता प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से हमेशा वहां उपस्थित रहते हैं। आक्रांता भले ही उन्हें हटा दें, लेकिन इससे उनकी स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे घटनाक्रमों से कुछ समय के लिए ग्रहण जरूर लग सकता है, लेकिन अधिकार खत्म नहीं हो जाते। मौला कमालुद्दीन सोसायटी के शपथ पत्र से स्पष्ट है कि धार में आक्रांताओं का हमला हुआ था।

असम विधानसभा चुनाव 2026: विधानसभा चुनाव की तैयारी जोरों पर; मतदान प्रमाण पत्र की वोटिंग

असम विधानसभा चुनाव 2026: विधानसभा चुनाव की तैयारी जोरों पर; मतदान प्रमाण पत्र की वोटिंग

पूरे असम में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव की पूरी तैयारी है. जिला प्रशासन ने सभी आवश्यक जरूरतमंदों के लिए स्वतंत्र, सिविल और प्लास्टिक वोटिंग प्रमाण पत्र जारी कर दिए हैं। अंतिम चरण के इंटरकॉलेज के तहत, मतदान और प्रेसीडिंग अधिकारियों ने ज़ोरहाट नेशनल बॉयज़ स्कूल से अपने निर्धारित मतदान नामांकन के लिए प्रस्थान किया। इस अधिकारी को विभिन्न मतदान सामग्री के साथ मतदान प्रक्रिया की निगरानी और सभी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करनी होंगी। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जोर हाट जिले में कुल 886 मतदान केंद्र हैं, जो जोर हाट, टिटाबोर, मरियानी और तेओक क्षेत्र में शामिल हैं। जिले में कुल 7,11,747 पात्र अपने फ्रैंचाइज़ का प्रयोग करेंगे। जिला आयुक्त ने क्या दी जानकारी? जिला आयुक्त जय शिवानी ने बताया कि मतदान के लिए सभी यूनिटें पूरी हो चुकी हैं। उन्होंने बताया कि 9 अप्रैल को सुबह 5:30 बजे मॉक पोल शुरू होगा और सुबह 7:00 बजे से मतदान प्रक्रिया शुरू होगी। उन्होंने यह भी बताया कि भारत के चुनाव आयोग द्वारा पिछले कुछ वर्षों से मतदाताओं और बुजुर्गों के लिए घर से मतदान की सुविधा उपलब्ध करायी जा रही है। जोरहाट में लगभग 400 गरीब पहले ही इस सुविधा के तहत अपना वोट डाल चुके हैं। प्रमुख राजनीतिक नामांकन में पवित्र मार्गरीटा और गौरव गोगोई जोर हाट में मतदान करेंगे। इसके अलावा लगभग 15 से 20 पूर्व अल्पसंख्यक, विधायक और अन्य विशिष्ट व्यक्ति भी यहां अपने फ्रैंचाइज़ का प्रयोग करेंगे। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) पर सभी मतदान गश्ती दल के तहत सुरक्षा व्यवस्था की शुरुआत की गई है। जिले के 22 मतदान आयोग को ‘क्रिटिकल’ श्रेणी में रखा गया है, जहां अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की जाएगी। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि जिले में कोई भी ‘असुरक्षित’ मतदान केंद्र नहीं है। मतदान का प्रतिशत बढ़ाने के लिए जिला प्रशासन ने जागरूकता अभियान चलाया मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए जिला प्रशासन के स्वीप (सिस्टे वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्ट्रोरल पार्टिसिपेशन) सेल ने व्यापक जागरूकता अभियान चलाया है। इसमें मैस्कॉट लॉन्च किया गया, बैचलर में जागरूकता कार्यक्रम, सिनेमा हॉल में विशेष जनसंपर्क का प्रसारण, रेडियो पर प्रचार, कलाकार प्रतियोगिताएं और जिले में रैलियां शामिल हैं। साथ ही, विशेष पुनरीक्षण अभियान के तहत घर-घर, स्थान और डुप्लिकेट झील के नाम की सूची जारी की गई है, जिससे मतदान प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद है। इस बीच, चुनावी ड्यूटी में लगे कर्मचारी भी उत्साहित हैं. प्रियंक बोरा ने कहा, “यह मेरा पहला चुनाव कर्तव्य है। मुझे उम्मीद है कि सब कुछ अच्छा होगा और मैं अपनी जिम्मेदारियां पूरी करके निभाऊंगा।” संपूर्ण असम में 126 क्षेत्रफल में कुल 2,49,58,139 कलाकार अपने फ्रैंचाइज़ का अर्थ रखेंगे। प्रशासन ने राज्यभर में प्लास्टिक और रेज़ॉलूशन चुनाव की अपनी पहुंच दोगुनी कर दी है। सभी छात्र-छात्राओं के साथ मिलकर 9 अप्रैल को होने वाले लोकतांत्रिक महापर्व की पूरी तरह से तैयारी है। यह भी पढ़ें: चुनाव 2026: असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव, यहां देखें एक-एक सीट का अपडेट

परमाणु ऊर्जा का शक्तिमानः स्वदेशी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तैयार:400 साल की बिजली गारंटी; ऐसा करने वाला भारत दुनिया का दूसरा देश

परमाणु ऊर्जा का शक्तिमानः स्वदेशी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर तैयार:400 साल की बिजली गारंटी; ऐसा करने वाला भारत दुनिया का दूसरा देश

भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वह कीर्तिमान स्थापित किया है, जिसने दुनिया के विकसित देशों को चौंका दिया है। तमिलनाडु के कलपक्कम में भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (भाविनी-BHAVINI) का 500 मेगावाट का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (पीएफबीआर) अब कमर्शियल उत्पादन लिए तैयार है। इसे बनाने में 200 से अधिक भारतीय एमएसएमई और निजी कंपनियों ने कलपुर्जे बनाए हैं। इस वजह से भारत पर किसी भी तरह के विदेशी प्रतिबंधों का कोई असर नहीं होगा। रूस के बाद भारत दुनिया का दूसरा ऐसा देश बन गया है, जिसने इस जटिल तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर उतारा है। इसे किसी विदेशी मदद के बिना, पूरी तरह स्वदेशी इंजीनियरिंग से तैयार किया गया है। इससे भारत के न्यूक्लियर प्रोग्राम के स्टेज-3 का रास्ता खुलेगा और थोरियम से परमाणु बिजली बनाना संभव होगा। परमाणु विशेषज्ञों के अनुसार, सामान्य रिएक्टरों की तुलना में ‘फास्ट ब्रीडर रिएक्टर’ कहीं अधिक उन्नत होते हैं। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह जितना ईंधन (यूरेनियम) इस्तेमाल करता है, उससे कहीं ज्यादा पैदा करता है। इसीलिए इसे ‘ब्रीडर’ कहा जाता है। भारत के पास यूरेनियम के भंडार सीमित हैं, लेकिन थोरियम का विशाल भंडार है। यह रिएक्टर भारत के ‘तीन चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम’ के दूसरे चरण की शुरुआत है, जो भविष्य में थोरियम के इस्तेमाल का रास्ता खोलेगा। परमाणु विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका, फ्रांस ने परमाणु रिएक्टर के एक ही डिजाइन- पेशराइज्ड वाटर रिएक्टर (पीडब्ल्यूआर) को अपनाया। जर्मनी और ब्रिटेन की कोशिश नाकाम रही। भारत ने इस जटिल इंजीनियरिंग चुनौती को स्वीकार किया। भारत में लगभग 9.63 लाख टन थोरियम का भंडार है। एक बार जब हम तीसरे चरण में पूरी तरह प्रवेश कर जाएंगे, तो ये भंडार भारत को अगले 400 वर्षों तक निर्बाध बिजली प्रदान करने में सक्षम होंगे। परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अनिल काकोदकर के विजन का जिक्र करते हुए विशेषज्ञ बताते हैं कि हालांकि इस परियोजना में समय लगा, जो ‘मेक इन इंडिया’ की बड़ी मिसाल है। यह भारत की ‘ऊर्जा संप्रभुता’ का घोषणा-पत्र जैसा है। कलपक्कम स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर इसलिए खास है ईंधन की बचत – यह रिएक्टर इस्तेमाल किए गए ईंधन को फिर से रिसाइकिल कर ऊर्जा पैदा करता है। सुरक्षा – लिक्विड सोडियम का इस्तेमाल, जो बिजली न होने पर भी रिएक्टर को खुद ही ठंडा रख सकता है। 72 साल पहले होमी भाभा ने यह विजन रखा था। 22 साल लगे रिएक्टर के निर्माण में। 7,700 करोड़ रु. कुल लागत। 100% स्वदेशी तकनीक।

ईरान जंग में ट्रम्प अपने 5 मकसद से कितने दूर:पहले ही दिन खामेनेई की हत्या, मिसाइल इंडस्ट्री तबाह की, लेकिन परमाणु खतरा बरकरार

ईरान जंग में ट्रम्प अपने 5 मकसद से कितने दूर:पहले ही दिन खामेनेई की हत्या, मिसाइल इंडस्ट्री तबाह की, लेकिन परमाणु खतरा बरकरार

अमेरिका और इजराइल ने मिलकर 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया। इसके कुछ ही देर बाद राष्ट्रपति ट्रम्प ने 8 मिनट का वीडियो जारी करके जंग के टारगेट बताए। उन्होंने कहा कि उनका मकसद अमेरिकी लोगों की रक्षा करना और ईरान से आने वाले खतरों को खत्म करना है। अब ट्रम्प के बताए टारगेट्स के मुताबिक समझते हैं कि अमेरिका को जंग में अब तक कितनी कामयाबी मिली है। उसे क्या हासिल हुआ है और क्या अब भी अधूरा है। 1. मिसाइल और हथियार इंडस्ट्री खत्म करना अमेरिका और इजराइल का अहम मकसद था कि ईरान की मिसाइल ताकत को कमजोर कर दिया जाए, ताकि वह दूर तक हमला न कर सके। इसके लिए दोनों देशों ने बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च करने वाले ठिकाने (लॉन्चर), मिसाइल बनाने वाली फैक्ट्रियों, मिसाइल स्टोर करने के गोदाम और कमांड एंड कंट्रोल सेंटर पर हमले किए। इन हमलों से ईरान की मिसाइल क्षमता को काफी नुकसान हुआ है। कई लॉन्चर और फैक्ट्रियां नष्ट हो चुकी हैं। इससे उसकी नई मिसाइल बनाने की रफ्तार धीमी पड़ी है। लेकिन अभी भी ईरान के पास काफी मिसाइलें बची हुई हैं और वह हमले कर रहा है। ईरान ने अपनी मिसाइलें अलग-अलग जगहों पर छिपाकर रखी हैं। कई ठिकाने जमीन के नीचे (अंडरग्राउंड) हैं, जिन्हें पूरी तरह नष्ट करना मुश्किल है। कुछ मोबाइल लॉन्चर होते हैं, जिन्हें जल्दी-जल्दी जगह बदलकर इस्तेमाल किया जा सकता है। ईरान अब सिर्फ मिसाइलों पर निर्भर नहीं है, बल्कि बड़ी संख्या में ड्रोन (मानवरहित विमान) का भी इस्तेमाल कर रहा है। 2. नौसेना को खत्म करना अमेरिका और इजराइल का टारगेट था कि ईरान की नौसेना को कमजोर या लगभग खत्म कर दिया जाए, ताकि वह समुद्र के रास्ते कोई बड़ा हमला या बाधा न डाल सके। इसके लिए युद्धपोत, पनडुब्बियां, नौसैनिक ठिकाने और बंदरगाह और हथियार और मिसाइल ले जाने वाले जहाजों को निशाना बनाया गया। मार्च की शुरुआत में अमेरिकी पनडुब्बी ने टॉरपीडो दागकर श्रीलंका के पास मौजूद ईरानी वॉरशिप IRIS डेना को डुबो दिया। इस जहाज पर करीब 180 लोग सवार थे। रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम 80 लोगों की मौत हुई। यह हमला इसलिए अहम था क्योंकि यह जहाज लंबी दूरी तक ऑपरेशन करने में सक्षम था और हाल ही में भारत के साथ एक नौसैनिक अभ्यास में भी शामिल हुआ था। इन हमलों से ईरान के कई बड़े जहाज और संसाधन नष्ट हो गए। समुद्र में उसकी ताकत पहले से कमजोर हो गई। लंबी दूरी पर ऑपरेशन करने की क्षमता घट गई। हालांकि वह अब भी समुद्र में खतरा पैदा करने की क्षमता रखता है। ईरान के पास छोटी-छोटी तेज नावें (स्पीड बोट्स) हैं, जिनका इस्तेमाल वह अब भी कर सकता है। वह समुद्र में बारूदी सुरंग (माइन) बिछाने जैसी रणनीति अपना सकता है जो होर्मुज जैसे संकरे समुद्री रास्तों में छोटी ताकत भी बड़ा असर डाल सकती है। 3. ईरान समर्थित मिलिशिया को कमजोर करना अमेरिका और इजराइल चाहते थे कि ईरान जिन हथियारबंद ग्रुप्स को समर्थन देता है, उन्हें कमजोर कर दिया जाए। ये ग्रुप्स अलग-अलग देशों में ईरान के लिए काम करते हैं और जरूरत पड़ने पर हमले भी करते हैं। इसलिए इन्हें ‘प्रॉक्सी’ ताकत कहा जाता है। जंग के दौरान इन्हें निशाना बनाया गया। इजराइल ने खास तौर पर लेबनान में हिजबुल्लाह के ठिकानों पर हमले किए। कई कमांडरों और लड़ाकों को मार गिराया। इससे इनकी ताकत कमजोर हुई, लेकिन उनका असर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अमेरिका के लिए असल चुनौती यह है कि ये मिलिशिया किसी एक देश या एक जगह तक सीमित नहीं हैं। इराक, लेबनान, सीरिया और यमन जैसे देशों के अलग-अलग इलाकों में इनके नेटवर्क फैले हुए हैं। इनके पास स्थानीय सपोर्ट भी होता है और अपनी अलग व्यवस्था भी होती है। ऊपर से ईरान इनकी मदद करता रहता है, जिससे ये जल्दी संभल जाते हैं। इसी वजह से, हमलों के बावजूद ये पूरी तरह खत्म नहीं हुए। इराक में अब भी कुछ गुट अमेरिकी ठिकानों पर रॉकेट से हमले कर रहे हैं। हिज्बुल्लाह पर लगातार हमले हुए हैं, लेकिन वह अब भी एक मजबूत ताकत बना हुआ है और पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 4. ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना अमेरिका का सबसे बड़ा मकसद यह था कि ईरान किसी भी हालत में परमाणु हथियार न बना सके। ट्रम्प बार-बार कह चुके हैं कि ईरान के पास कभी परमाणु बम नहीं होना चाहिए। अमेरिका ने पिछले साल ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर हमले किए थे, जिससे उन्हें भारी नुकसान हुआ। फिर भी अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि कुछ समृद्ध यूरेनियम अब भी मौजूद है। यह यूरेनियम जमीन के नीचे गहरी सुरंगों या बंकर जैसे ठिकानों में छिपा हो सकता है, जहां तक हवाई हमलों का असर पूरी तरह नहीं होता। अगर इन्हें पूरी तरह नष्ट करना हो, तो जमीन पर सेना भेजनी पड़ सकती है, जो बेहद जोखिम भरा कदम होगा और जंग को और बड़ा बना सकता है। 5. ईरान में सत्ता परिवर्तन ट्रम्प ने ईरान की जनता से सरकार के खिलाफ उठने की अपील भी की थी। लेकिन अभी तक ऐसा कोई बड़ा जन आंदोलन नहीं हुआ है। हालांकि ट्रम्प का दावा है कि उन्होंने रेजीम चेंज यानी सत्ता परिवर्तन कर दिया है, क्योंकि हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई बड़े अधिकारी मारे गए। लेकिन जमीन पर अलग स्थिति दिखाई देती है। अब नए सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई बने हैं, जो सख्त रुख वाले माने जाते हैं और सेना के ताकतवर हिस्से के करीब हैं। कुल मिलाकर, ईरान की सरकार अब भी पहले जैसी ही है। ईरान की सरकार अब भी धार्मिक और कड़े नियंत्रण वाली है। अमेरिका के खिलाफ उसका रुख भी पहले जैसा ही है। ——————————— ईरान जंग से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… अमेरिका ने ईरान पर 850 टॉमहॉक मिसाइलें दागीं: 2 साल में बनता है 34 करोड़ का यह हथियार, जंग खिंची तो स्टॉक खत्म होने की आशंका ईरान के साथ युद्ध में अमेरिका ने बड़े पैमाने पर टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का इस्तेमाल किया। इसे अमेरिकी हथियारों के जखीरे का अहम हथियार माना जाता है। वॉशिंगटन पोस्ट के मुताबिक चार हफ्तों में 850 से ज्यादा मिसाइलें दागी गईं। अनुमान है

किम जोंग बोले- परमाणु हथियार रखने का फैसला सही था:ईरान पर हमले ने हमें सच साबित किया, ताकत से ही सुरक्षा मिलती है

किम जोंग बोले- परमाणु हथियार रखने का फैसला सही था:ईरान पर हमले ने हमें सच साबित किया, ताकत से ही सुरक्षा मिलती है

नॉर्थ कोरिया के नेता किम जोंग उन ने देश के पास परमाणु हथियार होने को लेकर खुशी जताई है। सरकारी मीडिया के मुताबिक उन्होंने कहा कि अमेरिका और इजराइल के ईरान पर किए गए हमले साबित करते हैं, कि उनके देश का परमाणु हथियार रखने का फैसला सही था। किम ने कहा कि पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध दिखाता है कि आज की दुनिया में सिर्फ मजबूत सैन्य ताकत ही किसी देश को सुरक्षित रख सकती है। उन्होंने यह बयान सोमवार को संसद में लंबे भाषण के दौरान दिया। अपने भाषण में किम ने दक्षिण कोरिया के प्रति सख्त रुख दोहराया और कहा कि वह अपने देश की परमाणु ताकत को और मजबूत करेंगे ताकि अमेरिका को रोका जा सके। किम जोंग बोले- और ज्यादा परमाणु हथियार बनाएंगे किम जोंग उन का यह भाषण मंगलवार को लिखित रूप में जारी हुआ है। इसमें उन्होंने कहा कि 2019 में ट्रम्प के साथ बातचीत टूटने के बाद परमाणु हथियार बढ़ाने का फैसला उनका सबसे सही कदम था। किम ने देश को आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनाने, ज्यादा परमाणु हथियार और उन्हें ले जाने वाली मिसाइलें बनाने पर जोर दिया। किम ने यह भी कहा कि परमाणु हथियारों की वजह से नॉर्थ कोरिया अब ज्यादा सुरक्षित है और इसी वजह से वह अपने संसाधनों का इस्तेमाल आर्थिक विकास के लिए भी कर पा रहा है। किम जोंग उन के भाषण की अहम बातें… साउथ कोरिया को दुश्मन देश का दर्जा देंगे किम साउथ कोरिया को लेकर उन्होंने कहा कि वह उसे सबसे बड़ा दुश्मन मानेंगे और पूरी तरह नजरअंदाज करेंगे। अगर साउथ कोरिया कोई भी कदम उठाता है जो उनके देश को नुकसान पहुंचाता है, तो उसे कड़ी सजा दी जाएगी। कई दशकों से अमेरिका और उसके सहयोगी देश, प्रतिबंध और बातचीत के जरिए नॉर्थ कोरिया को परमाणु कार्यक्रम छोड़ने के लिए मनाने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन अब तक सभी प्रयास असफल रहे हैं। व्हाइट हाउस में दोबारा आने के बाद ट्रम्प ने किम से फिर बातचीत करने की इच्छा जताई है। हालांकि, किम का कहना है कि बातचीत तभी हो सकती है जब अमेरिका आधिकारिक तौर पर नॉर्थ कोरिया को परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता दे। नॉर्थ कोरिया लंबे समय से यह कहता रहा है कि अगर लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी और इराक के सद्दाम हुसैन के पास परमाणु हथियार होते, तो उनका अंत इस तरह नहीं होता। 2019 में अमेरिका-नॉर्थ कोरिया की बातचीत टूटी थी अमेरिका और नॉर्थ कोरिया के बीच परमाणु कार्यक्रम छोड़ने को लेकर साल 2018 में बातचीत शुरू हुई थी। इसे लेकर जून 2018 में सिंगापुर में पहली बार ट्रम्प और किम जोंग उन की ऐतिहासिक मुलाकात हुई थी। इसके बाद फरवरी 2019 में वियतनाम के हनोई में दूसरी बैठक हुई, लेकिन यहीं बातचीत टूट गई क्योंकि दोनों पक्ष शर्तों पर सहमत नहीं हो पाए। इसके बाद नॉर्थ कोरिया ने कहा था कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता और सुरक्षा के लिए उसे अपनी सैन्य ताकत बढ़ानी होगी। इसी सोच के तहत उसने अपने परमाणु हथियार और मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाने का फैसला किया। नॉर्थ कोरिया का मानना है कि मजबूत परमाणु क्षमता ही उसे बाहरी हमलों से बचा सकती है। नॉर्थ कोरिया के पास अमेरिका तक पहुंचने वाली मिसाइलें हैं इसके बाद नॉर्थ कोरिया ने धीरे-धीरे अपनी पुरानी रणनीति पर वापसी कर ली। उसने मिसाइल टेस्टिंग बढ़ा दी और अपने परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने लगा। कई बार लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का भी परीक्षण किया गया। फिलहाल नॉर्थ कोरिया के पास कुल कितनी मिसाइलें हैं, इसका सटीक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं है। लेकिन एक्सपर्ट्स के अनुमान के मुताबिक नॉर्थ कोरिया के पास सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जिनमें शॉर्ट रेंज, मीडियम रेंज और और लंबी दूरी (ICBM) की मिसाइलें शामिल हैं ICBM यानी लंबी दूरी की मिसाइलें ऐसी हैं जो अमेरिका तक पहुंचने की क्षमता रखती हैं। नॉर्थ कोरिया ने ह्वासोंग-15, ह्वासोंग-17 और ह्वासोंग-18 जैसी मिसाइलों की टेस्टिंग की है। इन मिसाइलों की रेंज लगभग 10,000 से 15,000 किलोमीटर तक मानी जाती है। इसका मतलब है कि ये अमेरिका के बड़े हिस्से तक पहुंच सकती हैं। कुछ रिपोर्ट्स यह भी मानती हैं कि नॉर्थ कोरिया के पास करीब 50–100 के आसपास परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम मिसाइलें हो सकती हैं, लेकिन यह पक्का आंकड़ा नहीं है। किम जोंग से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… किम जोंग-उन की साउथ कोरिया को चेतावनी, बोले- खतरा हुआ तो ‘पूरी तरह तबाह’ कर देंगे नॉर्थ कोरिया के शासक किम जोंग-उन ने साउथ कोरिया को कड़ी चेतावनी दी है। किम ने कहा है कि उनके देश की सुरक्षा को खतरा हुआ तो वे साउथ कोरिया को ‘पूरी तरह नष्ट’ कर सकते हैं। प्योंगयांग में सात दिन चली वर्कर्स पार्टी कांग्रेस के समापन पर किम ने अगले पांच वर्षों के लिए परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को तेज करने का खाका पेश किया। पूरी खबर यहां पढ़ें…

इजराइल बोला- ईरान को घुटनों पर लाकर ही रुकेंगे:ईरान बोला- धमकियों का जवाब मैदान में देंगे, परमाणु ठिकानों पर हमला हुआ तो होर्मुज बंद

इजराइल बोला- ईरान को घुटनों पर लाकर ही रुकेंगे:ईरान बोला- धमकियों का जवाब मैदान में देंगे, परमाणु ठिकानों पर हमला हुआ तो होर्मुज बंद

अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध का आज 24वां दिन हैं। अमेरिका में इजराइल के राजदूत येचिएल लीटर ने कहा है कि उनका देश तब तक मिलिट्री ऑपरेशन जारी रखेगा, जब तक ईरान को घुटनों पर नहीं ला दिया जाता। उन्होंने साफ कहा कि इजराइल अब ऐसे देश के साथ नहीं रह सकता, जो लगातार उसे खत्म करने की बात करता है और मिसाइल हमले कर रहा है। दूसरी तरफ ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने कहा है कि किसी भी हमले का जवाब मैदान में दिया जाएगा। अगर ईरान के परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया, तो वह होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर सकता है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई पर बड़ा असर पड़ेगा। रिपोर्ट- ईरान से सीजफायर पर बात करना चाहते हैं ट्रम्प अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की टीम ईरान के साथ सीजफायर पर बात करना चाहती है। इस काम में ट्रम्प के सलाहकार जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ भी लगे हुए हैं। यह जानकारी एक्सियोस न्यूज ने दी है। हालांकि ईरान ने बातचीत के लिए शर्त रखी है कि पहले जंग रोकी जाए और उसे हुए नुकसान का मुआवजा दिया जाए। ईरान का यह भी कहना है कि भविष्य में उस पर फिर से हमला नहीं होगा, इसकी पक्की गारंटी मिले। दूसरी तरफ, ट्रम्प ने साफ कर दिया है कि वे अभी ईरान की सभी शर्तें मानने के लिए तैयार नहीं हैं, खासकर मुआवजे की मांग को। अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत फिलहाल नहीं हो रही है। लेकिन मिस्र, कतर और ब्रिटेन जैसे देश मध्यस्थ का रोल निभा रहे हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना मिसाइल प्रोग्राम कुछ समय के लिए बंद करे, यूरेनियम एनरिचमेंट रोक दे और अपने परमाणु ठिकानों को भी बंद करे। इसके अलावा, ईरान हिजबुल्लाह और हमास को पैसे देना भी बंद करे। ईरान जंग से जुड़ी 4 तस्वीरें… अमेरिका-इजराइल और ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…

अमेरिकी उपराष्ट्रपति बोले- ईरान आतंकवाद का सबसे बड़ा गढ़:सनकी और क्रूर शासन को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दे सकते

अमेरिकी उपराष्ट्रपति बोले- ईरान आतंकवाद का सबसे बड़ा गढ़:सनकी और क्रूर शासन को परमाणु हथियार रखने की अनुमति नहीं दे सकते

मिडिल ईस्ट में अमेरिकी वॉरशिप और सैनिकों की तैनाती के बीच उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान को सख्त संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका की कूटनीति को कमजोरी न समझा जाए और जरूरत पड़ी तो सैन्य विकल्प भी इस्तेमाल होगा। वेंस ने कहा कि सैन्य कार्रवाई की धमकियों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। फॉक्स न्यूज से बातचीत में वेंस ने कहा- हमें ऐसी स्थिति में पहुंचना होगा जहां ईरान, जो दुनिया में आतंकवाद का सबसे बड़ा गढ़ है, परमाणु आतंकवाद से दुनिया को धमकी न दे सके। सनकी, क्रूर और दुनिया के सबसे खतरनाक शासन को परमाणु हथियार रखने की इजाजत नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रम्प कूटनीतिक समाधान चाहते हैं, लेकिन उनके पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं और वे उनका इस्तेमाल करने की इच्छा दिखा चुके हैं। ट्रम्प ने बुधवार को संसद में अपने संबोधन के दौरान आरोप लगाया था कि ईरान अमेरिका तक मार करने में सक्षम मिसाइलें विकसित कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान पिछले साल अमेरिकी हमलों के बाद अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। वेंस बोले- बातचीत का अंतिम फैसला ट्रम्प के हाथ में है जब वेंस से पूछा गया कि क्या ईरान के सर्वोच्च नेता को हटाना भी अमेरिका का लक्ष्य है, तो उन्होंने कहा कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए अंतिम फैसला राष्ट्रपति ट्रम्प करेंगे। वेंस ने कहा कि बातचीत कितने समय तक जारी रखनी है, इसका अंतिम फैसला राष्ट्रपति ट्रम्प करेंगे। उन्होंने कहा- हम कोशिश जारी रखेंगे। लेकिन राष्ट्रपति के पास यह अधिकार है कि वे तय करें कि कूटनीति अपनी सीमा तक पहुंच गई है या नहीं। हमें उम्मीद है कि इस बार बातचीत बुरे अंजाम तक नहीं पहुंचेगी, लेकिन अगर पहुंचती है तो फैसला राष्ट्रपति ही करेंगे। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ईरान अगले दो हफ्तों में ज्यादा बड़ा प्रस्ताव देगा, जिससे दोनों पक्षों के बीच मतभेद कम किए जा सकें। ईरान और अमेरिका के बीच तीसरे दौर की बातचीत आज यह बयान ऐसे समय में आया है जब ईरान और अमेरिका के अधिकारी गुरुवार यानी आज जिनेवा में तीसरे दौर की बातचीत करेंगे। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अरागची अपनी टीम के साथ जिनेवा पहुंच चुके हैं। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व मिडिल ईस्ट दूत स्टीव विटकॉफ करेंगे। वॉशिंगटन इस बीच ‘मैक्सिमम प्रेशर’ अभियान के तहत नए प्रतिबंधों की भी तैयारी कर रहा है। ईरान ने जिनेवा वार्ता से पहले अमेरिकी दबाव की रणनीति को खारिज किया। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने ट्रम्प के बयानों को झूठ बताया और उन पर दुष्प्रचार अभियान चलाने का आरोप लगाया। ट्रम्प ने कई बार चेतावनी दी है कि वार्ता विफल होने पर अमेरिका सैन्य कार्रवाई कर सकता है। क्षेत्रीय देशों को आशंका है कि ऐसा कदम संघर्ष को जन्म दे सकता है। ईरान पहले ही चेतावनी दे चुका है कि किसी भी हमले की स्थिति में मिडिल ईस्ट में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य अड्डे उसके निशाने पर होंगे। इससे क्षेत्र में तैनात हजारों अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। अमेरिका के 50 फाइटर जेट मिडिल ईस्ट पहुंचे अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में पिछले हफ्ते 50 से ज्यादा फाइटर जेट भेजे। इंडिपेंडेंट फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा और मिलिट्री एविएशन मॉनिटर्स ने कई F-22, F-35 और F-16 फाइटर जेट को मिडिल ईस्ट की ओर जाते हुए रिकॉर्ड किया गया। इन विमानों में से कुछ मिडिल ईस्ट में उतर चुके हैं। खासकर इजराइल के एयरबेस बेन गुरियन और ओवडा) पर, जहां अमेरिकी F-22 जेट को देखा गया और वहां लैंड करते हुए रिपोर्ट किया गया। यह जानकारी अमेरिका और ईरान के बीच 16 फरवरी को जिनेवा में हुई दूसरी दौर की बातचीत के दौरान सामने आई थी। दोनों देशों के बीच परमाणु समझौते से जुड़े मुद्दों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तय की गई शर्तों को ईरान मानने को तैयार नहीं है। फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में वेंस ने कहा कि बातचीत के कुछ हिस्से सकारात्मक रहे, लेकिन कई अहम मुद्दों पर अब भी सहमति नहीं बनी है। इन बयानों से साफ है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही बातचीत अभी भी नाजुक दौर में है। अमेरिका ने रिफ्यूलिंग टैंकर भी मिडिल ईस्ट भेजे अमेरिकी फाइटर जेट्स के साथ कई एरियल रिफ्यूलिंग टैंकर भी मिडिल ईस्ट की ओर भेजे हैं। इससे संकेत मिलता है कि विमान लंबे समय तक ऑपरेशन की तैयारी में हैं। इस बीच, अमेरिकी अधिकारी ने मीडिया को बताया कि USS जेराल्ड आर. फोर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप कैरिबियन से रवाना होकर मिडिल ईस्ट पहुंच चुका है। न्यूज एजेंसी AP के मुताबिक, सुरक्षा कारणों से नाम न बताने की शर्त पर अधिकारी ने कहा कि फोर्ड के साथ तीन गाइडेड-मिसाइल डेस्ट्रॉयर, USS माहान, USS बैनब्रिज और USS विन्सटन चर्चिल भी हैं। इससे पहले USS अब्राहम लिंकन और अन्य महत्वपूर्ण अमेरिकी एयर और नेवल एसेट्स भी इस साल की शुरुआत में क्षेत्र में तैनात किए जा चुके हैं। इससे अमेरिका की मिडिल ईस्ट में सैन्य मौजूदगी और मजबूत हुई है। F-35 और F-16 फाइटर जेट के बारे में जानिए… ईरान-अमेरिका के बीच बैलिस्टिक मिसाइल पर विवाद अटका ईरान और अमेरिका के बीच चल रही परमाणु समझौते की बातचीत में बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा बन गया है। ईरान इस पर बिल्कुल भी समझौता करने को तैयार नहीं है और इसे अपनी रेड लाइन मानता है। ईरान का कहना है कि यह उसके बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम रक्षा के लिए जरूरी है। ईरान का कहना है कि जून 2025 में इजराइल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु साइटों पर हमला किया, तब ईरान की मिसाइलों ने ही उसकी रक्षा की। इसके साथ ही अमेरिका चाहता है कि ईरान हिजबुल्लाह, हूती जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स को समर्थन देना बंद करे। अमेरिका इस मुद्दे को भी शामिल करना चाहता है, लेकिन ईरान मुख्य रूप से सिर्फ परमाणु मुद्दे पर फोकस रखना चाहता है। ईरानी अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि मिसाइल कार्यक्रम पर कोई बात नहीं होगी। यह ईरान की रक्षात्मक क्षमता है और इसे छोड़ना मतलब खुद को कमजोर करना होगा। ईरान कहता है

ट्रम्प बोले- ईरान के साथ बातचीत में इनडायरेक्टली शामिल रहूंगा:पिछले साल परमाणु ठिकानों पर बमबारी से इन्हें अक्ल आई; आज स्विट्जरलैंड में बैठक

ट्रम्प बोले- ईरान के साथ बातचीत में इनडायरेक्टली शामिल रहूंगा:पिछले साल परमाणु ठिकानों पर बमबारी से इन्हें अक्ल आई; आज स्विट्जरलैंड में बैठक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को कहा कि वह अमेरिका और ईरान के बीच होने वाली परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत में इनडायरेक्ट रूप से शामिल रहेंगे। उन्होंने एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान यह बात कही। यह बयान ईरान के साथ परमाणु कार्यक्रम को लेकर दूसरे दौर की बातचीत से पहले आया है। अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत आज (17 फरवरी 2026) जिनेवा (स्विट्जरलैंड) में हो रही है। इससे पहले ओमान में 6 फरवरी को पहली बैठक हुई थी। ट्रम्प ने कहा, ‘मैं उन बातचीत पर नजर रहूंगा।’ उन्होंने संकेत दिया कि ईरान इस बार समझौते को लेकर गंभीर है। डील की संभावना पर ट्रम्प ने कहा कि ईरान इसे लेकर सख्त रुख अपनाता रहा है, लेकिन पिछले साल अमेरिका की ईरान के परमाणु ठिकानों पर बमबारी से उसे अक्ल आई। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि वे समझौता न करने के परिणाम भुगतना चाहेंगे।’ ईरान-अमेरिका के बीच किन मुद्दों पर बातचीत होगी ईरान ने ऑपरेशनल क्षमताओं की जांच के लिए नौसैनिक अभ्यास शुरू किया एसोसिएटेड प्रेस (AP) के मुताबिक, ईरान ने सोमवार को कुछ ही हफ्तों में दूसरी बार नौसैनिक अभ्यास शुरू किया। यह अभ्यास स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज, पर्शियन गल्फ और गल्फ ऑफ ओमान में हो रहा है। इसका मकसद खुफिया और ऑपरेशनल क्षमताओं की जांच करना है। समुद्री सुरक्षा कंपनी ईओएस रिस्क ग्रुप ने कहा कि इस इलाके से गुजरने वाले जहाजों को रेडियो पर चेतावनी दी गई कि स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज के उत्तरी मार्ग में मंगलवार को लाइव-फायर ड्रिल हो सकती है। हालांकि ईरानी सरकारी टीवी ने लाइव-फायर अभ्यास का जिक्र नहीं किया। जनवरी के अंत में हुए इसी तरह के अभ्यास के दौरान अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कड़ा बयान जारी किया था। उसने कहा था कि ईरान को अंतरराष्ट्रीय हवाई और समुद्री क्षेत्र में पेशेवर तरीके से काम करने का अधिकार है, लेकिन वह अमेरिकी वॉरशिप या ट्रेड जहाजों को परेशान न करें। ईरान के उप विदेश मंत्री बोले- ट्रम्प प्रतिबंध हटाएं तो डील संभव व्हाइट हाउस का कहना है कि वह ऐसा समझौता चाहता है, जिससे ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके। वहीं, रविवार को ईरान के उप विदेश मंत्री मजीद तख्त-रवांची ने अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर बातचीत करने की इच्छा जताई है। उन्होंने BBC को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर अमेरिका प्रतिबंध हटाने पर बात करने को तैयार है, तो हम अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कई मुद्दों पर समझौता करने के लिए तैयार है। वहीं अमेरिकी अधिकारी बार-बार कहते रहे हैं कि परमाणु वार्ता में प्रगति रुकने की वजह ईरान है, न कि अमेरिका। रवांची बोले- हमने 60% इंरिच्ड यूरेनियम घटाने का प्रस्ताव दिया ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता एक लंबे समय से चल रही विवादास्पद बातचीत है, जिसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करना है। जिससे वह परमाणु हथियार न बना सके। मजीद तख्त-रवांची ने कहा कि ईरान ने 60% तक इंरिच्ड यूरेनियम को कम करने का प्रस्ताव दिया है। ईरान के पास 400 किलो से ज्यादा उच्च स्तर पर इंरिच्ड यूरेनियम का भंडार है। 2015 के परमाणु समझौते के तहत उसने अपना यूरेनियम रूस भेजा था। इस बार क्या वह ऐसा करेगा, इस पर तख्त-रवांची ने कहा कि अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। रूस ने दोबारा यह सामग्री स्वीकार करने की पेशकश की है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान अस्थायी रूप से यूरेनियम इंरिचमेंट रोकने का प्रस्ताव भी दे चुका है। बैलिस्टिक मिसाइल पर विवाद अटका ईरान की एक बड़ी शर्त रही है कि बातचीत सिर्फ परमाणु मुद्दे पर हो। तख्त-रवांची ने कहा कि उनकी समझ है कि अगर समझौता करना है तो फोकस परमाणु मुद्दे पर ही रहेगा। ईरान और अमेरिका के बीच चल रही परमाणु समझौते की बातचीत में बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट सबसे बड़ा विवाद का मुद्दा बन गया है। ईरान इस पर बिल्कुल भी समझौता करने को तैयार नहीं है और इसे अपनी रेड लाइन मानता है। ईरान का कहना है कि यह उसके बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम रक्षा के लिए जरूरी है। जब जून 2025 में इजराइल और अमेरिका ने ईरान के परमाणु साइटों पर हमला किया, तब ईरान की मिसाइलों ने ही उसकी रक्षा की। इसके साथ ही अमेरिका चाहता है कि ईरान हिजबुल्लाह, हूती जैसे प्रॉक्सी ग्रुप्स को समर्थन देना बंद करे। अमेरिका इस मुद्दे को भी शामिल करना चाहता है, लेकिन ईरान मुख्य रूप से सिर्फ परमाणु मुद्दे पर फोकस रखना चाहता है। ईरानी अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि मिसाइल कार्यक्रम पर कोई बात नहीं होगी। यह ईरान की रक्षात्मक क्षमता है और इसे छोड़ना मतलब खुद को कमजोर करना होगा। ईरान कहता है कि बातचीत सिर्फ परमाणु कार्यक्रम तक सीमित रहेगी, मिसाइल या क्षेत्रीय समूहों पर नहीं। रवांची बोले- हमारे अस्तित्व पर खतरा हुआ तो जवाब देंगे ईरान के उप विदेश मंत्री ने ट्रम्प के बयानों पर चिंता जताई। सार्वजनिक रूप से और निजी तौर पर अमेरिका बातचीत में रुचि दिखा रहा है, लेकिन ट्रम्प ने हाल में सत्ता परिवर्तन की बात की। तख्त-रवांची ने कहा कि निजी संदेशों में ऐसा नहीं है। उन्होंने क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य बढ़ोतरी पर चिंता जताई और कहा कि दूसरा युद्ध सबके लिए बुरा होगा। अगर ईरान को अस्तित्व का खतरा लगा, तो ईरान जवाब देगा। ईरान ने क्षेत्रीय देशों से बात की है और सब युद्ध के खिलाफ हैं। ईरान को लगता है कि इजराइल इस वार्ता को तोड़ना चाहता है। समझौते को लेकर तख्त-रवांची ने कहा कि ईरान जेनेवा में उम्मीद के साथ जाएगा और दोनों पक्षों को ईमानदारी दिखानी होगी। क्षेत्र में तैनात किए जा रहे 40,000 से अधिक अमेरिकी सैनिकों के बारे में पूछे जाने पर, तख्त-रावंची ने जवाब दिया, ‘ऐसी स्थिति में खेल अलग होगा।’ ईरान से तनाव के बीच मिडिल ईस्ट में तैनाती बढ़ा रहा अमेरिका अमेरिका मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। अमेरिका अब अपना सबसे बड़ा एयरक्राफ्ट कैरियर USS जेराल्ड आर. फोर्ड वहां भेज रहा है। यह एक न्यूक्लियर-पावर्ड कैरियर एयरक्राफ्ट है। रॉयटर्स को दो अमेरिकी अधिकारियों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ रहा है। अधिकारी के मुताबिक, जेराल्ड