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दिखने में साधारण…. लेकिन असर चौंकाने वाला, क्या है बनमारा पौधे का सच? वैज्ञानिक भी कर रहे हैं रिसर्च

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Last Updated:April 17, 2026, 18:06 IST हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला बनमारा, जिसे स्थानीय भाषा में काला बांसा कहा जाता है, एक ऐसा जंगली पौधा है जो तेजी से फैलता है. यह जहां एक ओर पारंपरिक चिकित्सा में उपयोगी माना जाता है, वहीं दूसरी ओर इसके आक्रामक स्वभाव के कारण यह पर्यावरण के लिए चुनौती भी बन जाता है. बागेश्वर: बनमारा जिसे स्थानीय भाषा में काला बांसा भी कहा जाता है, पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से फैलने वाला एक जंगली पौधा है. यह मुख्य रूप से उत्तराखंड, दार्जिलिंग और हिमालयी इलाकों में पाया जाता है. इसका वैज्ञानिक नाम एगेराटिना एडेनोफोरा है. यह पौधा देखने में साधारण झाड़ी जैसा होता है, जिसमें छोटे सफेद फूल खिलते हैं. यह तेजी से फैलता है, कई बार खेती योग्य जमीन और जंगलों पर कब्जा कर लेता है. हालांकि, इसके औषधीय गुणों के कारण ग्रामीण इलाकों में इसका उपयोग लंबे समय से किया जाता रहा है. पारंपरिक ज्ञान में इसे एक उपयोगी जड़ी-बूटी माना जाता है, लेकिन इसकी सही पहचान और उपयोग की जानकारी होना बेहद जरूरी है. बनमारा के पत्तों और तने का रस पारंपरिक रूप से घाव भरने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. ग्रामीण लोग इसे छोटे कट, खरोंच या जख्म पर लगाते हैं, जिससे खून बहना कम होता है, घाव जल्दी भरने में मदद मिलती है. इसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व त्वचा को सुरक्षित रखने और संक्रमण से बचाने में सहायक माने जाते हैं. कई लोग इसे एंटीसेप्टिक की तरह इस्तेमाल करते हैं, खासकर तब जब आसपास कोई दवा उपलब्ध नहीं होती है. हालांकि, इसका उपयोग केवल बाहरी रूप से ही करना सुरक्षित माना जाता है. डॉ. ऐजल पटेल ने लोकल 18 को बताया कि इस पौधे में सूजन कम करने वाले गुण पाए जाते हैं, जिसके कारण इसे दर्द और सूजन में राहत के लिए भी उपयोग किया जाता है. बनमारा के पत्तों को पीसकर प्रभावित जगह पर लगाने से सूजन में कमी आ सकती है. इसके प्राकृतिक तत्व शरीर की सूजन प्रतिक्रिया को कम करने में मदद करते हैं. हालांकि, हर व्यक्ति की त्वचा अलग होती है, इसलिए इसे लगाने से पहले थोड़ी मात्रा में परीक्षण करना जरूरी है, ताकि किसी प्रकार की एलर्जी या जलन की समस्या न हो. Add News18 as Preferred Source on Google बनमारा का उपयोग कुछ त्वचा संबंधी समस्याओं जैसे खुजली, दाद या हल्के संक्रमण में भी किया जाता है. इसमें मौजूद एंटी-माइक्रोबियल गुण त्वचा पर बैक्टीरिया और फंगस के प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसके पत्तों का लेप बनाकर त्वचा पर लगाते हैं. इससे त्वचा को ठंडक मिलती है, जलन में राहत मिल सकती है. हालांकि, यह कोई प्रमाणित चिकित्सा उपचार नहीं है, इसलिए गंभीर त्वचा रोगों में डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है. गलत उपयोग से समस्या बढ़ भी सकती है. कुछ शोधों में पाया गया है कि बनमारा पौधे में एंटी-ऑक्सीडेंट तत्व मौजूद होते हैं. ये तत्व शरीर को फ्री-रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद करते हैं. एंटी-ऑक्सीडेंट शरीर की कोशिकाओं को स्वस्थ रखने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं. इस पौधे के इन गुणों पर अभी और वैज्ञानिक शोध की जरूरत है. पारंपरिक उपयोग के आधार पर इसे लाभकारी माना जाता है, लेकिन इसे औषधि के रूप में अपनाने से पहले विशेषज्ञ सलाह लेना जरूरी है. दार्जिलिंग और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में बनमारा का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में सांप के काटने और मानसिक समस्याओं के इलाज में भी किया जाता रहा है. इन दावों के पीछे ठोस वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं. यह अधिकतर लोक मान्यताओं और पुराने अनुभवों पर आधारित है. कई ग्रामीण आज भी इन परंपराओं का पालन करते हैं, लेकिन आधुनिक चिकित्सा के अनुसार ऐसे मामलों में डॉक्टर की सहायता लेना बेहद जरूरी है. केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहना खतरनाक हो सकता है, खासकर जब मामला गंभीर हो. बनमारा पौधा जहां इंसानों के लिए सीमित उपयोग में लाभकारी माना जाता है, वहीं यह पशुओं के लिए हानिकारक हो सकता है. खासकर घोड़े और अन्य पालतू जानवर अगर इसे खा लें तो उनके लिए यह विषैला साबित हो सकता है. इससे उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है. इसलिए जिन क्षेत्रों में यह पौधा अधिक मात्रा में उगता है, वहां पशुपालकों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. जानवरों को इससे दूर रखना जरूरी है, ताकि किसी प्रकार की बीमारी या नुकसान से बचा जा सके. बनमारा एक आक्रामक खरपतवार है, जो बहुत तेजी से फैलता है, स्थानीय पौधों को नुकसान पहुंचाता है. यह जमीन की उर्वरता को प्रभावित करता है और जैव विविधता के लिए खतरा बन सकता है. जंगलों और खेती की जमीन में फैलकर यह अन्य उपयोगी पौधों की वृद्धि को रोक देता है. इसलिए कई क्षेत्रों में इसे नियंत्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इसके नियंत्रण के लिए सामूहिक प्रयास और जागरूकता जरूरी है. First Published : April 17, 2026, 18:06 IST

डायबिटीज से छुटकारा पाने का ये है देसी जुगाड़! वैज्ञानिकों ने खोज निकाला चमत्कारिक औषधि, सिर्फ रात में फुलाकर सुबह पीना है पानी

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Last Updated:April 15, 2026, 07:56 IST Paneer Doda Diabetes Benefits: रांची के बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पनीर डोटा पर रिसर्च किया है. जहां इसमें पाया गया कि इसका पानी पीने से टाइप टू डायबिटीज और सूजन में राहत मिल सकती है. आइये जानते हैं इसके लाभ के बारे में. ख़बरें फटाफट रांची: झारखंड की राजधानी रांची के बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के कृषि वैज्ञानिक खासतौर पर पनीर डोटा पर रिसर्च कर रहे हैं. रिसर्च में उन्होंने पाया की खासतौर पर इसको रात में फुला कर इसका पानी पीने से टाइप टू डायबिटीज में काफी राहत मिलती है. इसमें इंसुलिन की मात्रा कम होती है. इस वजह से इससे शरीर में सूजन से और थकान से काफी राहत मिलती है. आइये जानते हैं इसके बारे में. फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के कृषि वैज्ञानिक प्रशांत ने बताया कि यह शरीर के पेनक्रियाज के सेल को प्राकृतिक रूप से रिपेयर करता है. क्योंकि पेनक्रियाज से ही इंसुलिन जो है. वह बैलेंस होता है. ऐसे में खासतौर पर पेनक्रियाज में अगर कोई समस्या आती है तो इंसुलिन की मात्रा ऊपर नीचे होने लगती है. ये खासतौर पर पेनक्रियाज के हेल्थ के लिए काफी बेस्ट माना जाता है. इस तरीके से करना है सेवन उन्होंने बताया कि पनीर डोटा आपको रांची के जंगलों में तो खूब मिलता है. साथ ही आपको यहां के बाजार में भी मिल जाएगा, लेकिन अभी तक शुगर के मरीज इसका उतना सेवन उनता नहीं करते हैं. क्योंकि इसके बारे में इतना पता नहीं है. लोगों को ऐसे आपको एक मुट्ठी पर ही डोडा को लेना है. यह बिल्कुल चने की तरह होता है और रात भर पानी में फुला लेना है. उन्होंने बताया कि सुबह में आप देखेंगे कि इसका जो पानी है. वह पूरी तरह ब्राउन हो गया है. आपको पनीर डोटा को नहीं खाना है. बल्कि, उसका पानी जो है. उसको पी लेना है. इसमें आपके शरीर में जो इन्फ्लेशन होता है. उसको ठीक करता है. इसमें एंटी इन्फ्लेमेटरी गुण है और ये सिर्फ पेनक्रियाज को ही नहीं बल्कि आपके चेहरे के स्किन को भी रिपेयर करता है. बुझे चेहरे में भी आ जाएगी चमक वह आगे बताते हैं कि ऐसे में डायबिटीज की वजह से चेहरा अगर एकदम बुझा हुआ है तो भी यह काफी फायदेमंद है. कई बार डायबिटीज की वजह से चेहरे में थोड़ा कालापन आ जाता है या स्किन ढीला हो जाता है. ऐसे में जब आपका पैंक्रियाज का सेल सही होगा, तब आप देखेंगे आपके चेहरे पर भी ग्लो आना शुरू हो जाएगा. उन्होंने कहा कि शुगर के मरीज इसका सेवन कर सकते हैं. About the Author Brijendra Pratap Singh बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में (2021) लगभग 5 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत डेस्क, दैनिक भास्कर डिजिटल डेस्क के अनुभव के साथ 14 मई 2024 से News.in में सीनियर कंटें…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Ranchi,Jharkhand First Published : April 15, 2026, 07:56 IST

बूढ़े फिर से हो जाएंगे जवान ! वैज्ञानिकों ने शुरू किया अनोखा ट्रायल, क्या बदल जाएगा प्रकृति का नियम?

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New Clinical Trials for Anti Aging: हर किसी की उम्र धीरे-धीरे बढ़ती जाती है और इसका असर शरीर के सभी अंगों पर पड़ने लगता है. उम्र के साथ इंसानों के सभी ऑर्गन्स की क्षमता कम होने लगती है. बुढ़ापे में अधिकतर लोगों को किसी न किसी समस्या का सामना करना पड़ता है. एजिंग को रोकने के लिए अब तक तमाम कोशिशें होती रही हैं, लेकिन कोई खास सफलता नहीं मिली है. माना जाता है कि एजिंग एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे रोका नहीं जा सकता है. हालांकि अब एक फिर फिर दुनिया में एंटी-एजिंग रिसर्च को लेकर एक बड़ी चर्चा शुरू हो गई है. वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक पर काम तेज कर दिया है, जिसमें पुरानी और कमजोर हो चुकी कोशिकाओं को फिर से युवा जैसी अवस्था में लाने की कोशिश की जा रही है. यह न केवल उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है, बल्कि इससे आंखों की रोशनी वापस लाने, अंगों की मरम्मत करने और कई उम्र संबंधी बीमारियों के इलाज की संभावना भी जुड़ी हुई है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जितनी यह तकनीक उम्मीद जगाती है, उतने ही इसके जोखिम भी गंभीर हैं. नेचर में छपी रिपोर्ट के मुताबिक जल्द ही एक नया क्लीनिकल ट्रायल शुरू होने जा रहा है, जिसमें पहली बार इंसानों पर पार्शियल सेलुलर रीप्रोग्रामिंग तकनीक का परीक्षण किया जाएगा. इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य यह देखना है कि क्या उम्रदराज कोशिकाओं को सुरक्षित तरीके से फिर से रीफ्रेश किया जा सकता है. इसमें सेल्स की असली पहचान को नुकसान पहुंचाए बिना रिज्यूवेनेट किया जाएगा. इस तकनीक की नींव जापानी वैज्ञानिक शिन्या यामानाका की खोज पर आधारित है. उन्होंने यह साबित किया था कि वयस्क कोशिकाओं को कुछ विशेष प्रोटीन की मदद से स्टेम सेल जैसी शुरुआती अवस्था में बदला जा सकता है. इन प्रोटीन को यामानाका फैक्टर कहा जाता है. अब वैज्ञानिक इसी खोज का सुरक्षित रूप विकसित कर रहे हैं, जिसमें कोशिकाओं को पूरी तरह रीसेट करने की बजाय उन्हें थोड़ी देर के लिए आंशिक रूप से रीप्रोग्राम किया जाता है, ताकि वे फिर से युवा जैसी कार्यक्षमता हासिल कर सकें. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. शोधकर्ताओं के अनुसार इस प्रक्रिया को मोबाइल फोन को रीसेट करने की बजाय रिफ्रेश करने जैसा समझा जा सकता है, जिसमें जरूरी डाटा सुरक्षित रहता है, लेकिन सिस्टम बेहतर तरीके से काम करने लगता है. जानवरों पर किए गए शुरुआती प्रयोगों में इसके काफी सकारात्मक परिणाम मिले हैं. चूहों पर किए गए परीक्षणों में मांसपेशियों और त्वचा की मरम्मत बेहतर हुई, दिल की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं में सुधार देखा गया और यहां तक कि उम्र से जुड़ी आंखों की समस्याओं में भी सुधार पाया गया. कुछ मामलों में याददाश्त और मस्तिष्क की कार्यक्षमता में भी बेहतर प्रदर्शन देखा गया. इन नतीजों के बाद वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक मनुष्यों में भी उम्र से जुड़ी बीमारियों जैसे विजन लॉस, अंगों की कमजोरी और अन्य डीजेनरेटिव डिजीज के इलाज में मददगार हो सकती है. इसी दिशा में अगला कदम मानव परीक्षण है, जिसकी शुरुआत ग्लूकोमा के मरीजों पर की जाएगी. यह एक ऐसी बीमारी है जो आंखों की नसों को नुकसान पहुंचाकर धीरे-धीरे दृष्टि खोने का कारण बनती है. इस ट्रायल में वैज्ञानिक तीन यामानाका फैक्टर को एक विशेष वायरस के जरिए आंखों में पहुंचाएंगे. इस प्रक्रिया को बहुत कंट्रोल्ड तरीके से डिजाइन किया गया है, जिसमें दवा के माध्यम से ही इन फैक्टर्स को एक्टिव किया जाएगा ताकि जोखिम को कम किया जा सके. यह परीक्षण छोटे स्तर पर किया जाएगा और कई वर्षों तक मरीजों की सेहत और असर पर नजर रखी जाएगी, क्योंकि सुरक्षा इस पूरे प्रयोग की सबसे बड़ी प्राथमिकता है. विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि यह तकनीक जितनी शक्तिशाली है, उतनी ही संवेदनशील भी है. अगर कोशिकाओं को जरूरत से ज्यादा रीप्रोग्राम किया गया, तो वे अपनी मूल पहचान खो सकती हैं, सही तरीके से काम करना बंद कर सकती हैं या यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर स्थिति का कारण भी बन सकती हैं. इसलिए वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे इस रीसेट और स्टेबिलिटी के बीच सही संतुलन कैसे बनाए रखें. फिलहाल यह शोध शुरुआती चरण में है, लेकिन यह निश्चित रूप से चिकित्सा विज्ञान में एक नई क्रांति की ओर इशारा करता है.

हाई ब्लड प्रेशर को जड़ से मिटा देगी यह दवा ! वैज्ञानिकों ने खोजा पावरफुल ट्रीटमेंट, तुरंत दिखाएगा असर

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Last Updated:April 06, 2026, 08:16 IST New Hypertension Treatment: वैज्ञानिकों ने हाई ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने की नई दवा बनाई है, जिसका नाम बैक्सड्रोस्टैट है. यह दवा उन मरीजों के लिए उम्मीद बनकर सामने आई है, जिनका ब्लड प्रेशर सामान्य दवाओं से कंट्रोल नहीं होता है. यह दवा एल्डोस्टेरोन हार्मोन को कंट्रोल करके ब्लड प्रेशर को कम करती है. इससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा घट सकता है. क्लीनिकल ट्रायल में बैक्सड्रोस्टैट दवा ने काफी अच्छा रिजल्ट दिया है. ब्लड प्रेशर की नई दवा बैक्सड्रोस्टैट है, जो ट्रायल्स में बेहद असरदार साबित हुई है. Baxdrostat for Resistant Hypertension: हाई ब्लड प्रेशर की समस्या पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है. मेडिकल की भाषा में इसे हाइपरटेंशन कहा जाता है. हाई बीपी के भारत में भी करोड़ों मरीज हैं और उनमें से तमाम लोगों को इस बीमारी का पता ही नहीं है. अगर ब्लड प्रेशर लंबे समय तक ज्यादा रहे, तो इससे हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी डिजीज और समय से पहले मौत का खतरा बढ़ जाता है. हाई बीपी को कंट्रोल करने के लिए लोगों को नियमित रूप से दवा लेनी पड़ती है. सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई मरीजों में दवा लेने के बावजूद ब्लड प्रेशर कंट्रोल नहीं हो पाता है. वैज्ञानिकों ने अब इस परेशानी को दूर करने के लिए नई दवा खोज ली है, जो अन्य दवाएं फेल होने के बाद भी काम करेगी और बीपी पर लगाम लगाएगी. साइंस डेली की रिपोर्ट के मुताबिक अनकंट्रोल ब्लड प्रेशर को काबू में करने के लिए डेवलप की गई नई दवा बैक्सड्रोस्टैट (Baxdrostat) है. यह दवा उन मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है, जिन पर बीपी कंट्रोल करने वाली अन्य दवाएं काम नहीं कर रही हैं और ब्लड प्रेशर बेकाबू रहता है. इस दवा के काम करने का तरीका भी खास है. बैक्सड्रोस्टैट शरीर में बनने वाले एक हार्मोन एल्डोस्टेरोन (Aldosterone) को कंट्रोल करती है. यह हार्मोन शरीर में नमक और पानी के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है, लेकिन जब इसकी मात्रा ज्यादा हो जाती है, तो शरीर में पानी और नमक जमा होने लगता है, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है. बैक्सड्रोस्टैट इस हार्मोन के उत्पादन को रोककर सीधे समस्या की जड़ पर काम करती है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. वैज्ञानिकों के अनुसार यह दवा उन मरीजों के लिए खासतौर पर उपयोगी हो सकती है, जिन्हें रेजिस्टेंट हाइपरटेंशन यानी ऐसा हाई ब्लड प्रेशर होता है, जो कई दवाओं के बावजूद कंट्रोल नहीं होता. यह खोज न सिर्फ इलाज के लिहाज से अहम है, बल्कि इससे यह भी समझने में मदद मिलती है कि एल्डोस्टेरोन का बढ़ा हुआ स्तर इस समस्या में बड़ी भूमिका निभाता है. यह दवा लंबे समय तक सुरक्षित और प्रभावी भी पाई गई है. दुनिया भर में करीब 130 करोड़ लोग हाई ब्लड प्रेशर से प्रभावित हैं, जिनमें से बड़ी संख्या भारत और चीन में है. ऐसे में बैक्सड्रोस्टैट जैसी नई दवा भविष्य में करोड़ों लोगों के लिए राहत साबित हो सकती है. हालांकि अभी इस दवा का फेज 3 क्लीनिकल ट्रायल हुआ है. बाजार में आने से पहले इसे कई ट्रायल्स और मंजूरी की जरूरत होगी. अब तक के रिजल्ट यह संकेत देते हैं कि यह दवा हाई ब्लड प्रेशर के इलाज में एक बड़ा बदलाव ला सकती है. हाल ही में किए गए एक इंटरनेशनल फेज-3 क्लीनिकल ट्रायल में इस दवा की प्रभावशीलता को परखा गया. इस अध्ययन में दुनिया भर के 214 क्लीनिकों से लगभग 800 मरीजों को शामिल किया गया. ये सभी ऐसे मरीज थे, जिनका ब्लड प्रेशर पहले से चल रहे इलाज के बावजूद बहुत ज्यादा था. इस रिसर्च का नेतृत्व यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) के प्रोफेसर ब्रायन विलियम्स ने किया और इसके नतीजे यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कार्डियोलॉजी (ESC) कांग्रेस 2025 में प्रस्तुत किए गए. इस अध्ययन के परिणाम काफी उत्साहजनक रहे. जिन मरीजों को बैक्सड्रोस्टैट दी गई, उनका सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर औसतन 9 से 10 mmHg तक कम हो गया, जो कि एक महत्वपूर्ण गिरावट मानी जाती है. इस स्तर की कमी से हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी से जुड़ी बीमारियों का खतरा काफी हद तक घट सकता है. खास बात यह रही कि लगभग 40% मरीजों का ब्लड प्रेशर सामान्य स्तर तक पहुंच गया, जबकि प्लेसीबो लेने वालों में यह आंकड़ा 20% से भी कम था. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें First Published : April 06, 2026, 08:16 IST

क्या मार्च महीने में पीरियड्स आने में होती है देरी? सामने आया चौंकाने वाला वैज्ञानिक कारण

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Last Updated:April 02, 2026, 18:11 IST क्या इस बार मार्च के महीने में आपका पीरियड्स इर्रेगुलर या काफी लेट आया है? हर बार मार्च के महीने में ही मासिक धर्म में देरी होती है? इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं. किसी खास महीने से पीरियड्स के लेट आने का क्या लेना-देना है, अगर मार्च में ही पीरियड्स लेट आते हैं तो इसके पीछे क्या कोई वैज्ञानिक कारण, मौसमी परिवर्तन आदि जिम्मेदार है? यहां जानिए एक्सपर्ट की राय… महिलाओं को हर महीने पीरियड्स आते हैं. कुछ को मासिक धर्म आने में थोड़ा लेट हो जाता है, तो कुछ के पीरियड्स कई बार मिस भी हो जाते हैं. इसके पीछे कई कारण होते हैं, जैसे प्रेग्नेंसी, हॉर्मोनल असंतुलन, स्ट्रेस, थायरॉइड, अचानक वजन बढ़ना या कम होना, बेतरतीब लाइफस्टाइल, अनहेल्दी खानपान, गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन आदि लेट पीरियड्स या इर्रेगुलर पीरियड्स के कारण होते हैं. पीरियड्स लेट होने को लेकर इन दिनों सोशल मीडिया पर भी एक पोस्ट ट्रेंड कर रही है. इस पोस्ट में बताया गया है कि मार्च का महीना अच्छा नहीं होता है, खासकर पीरियड्स को लेकर. इस पोस्ट को काफी लोगों ने पढ़ा और हैरान भी हुए कि आखिर मार्च में क्यों पीरियड्स आने में लेट होगा? हालांकि, बाद में यह चर्चा मीम्स में बदल गई. क्या वाकई मार्च के महीने में इस बार मासिक धर्म में देरी हुई. इस पोस्ट को लेकर डॉक्टर कहते हैं कि इन बदलावों के पीछे स्पष्ट वैज्ञानिक कारण हैं. मार्च का महीना स्ट्रेस फुल होता है, क्योंकि इस महीने में कई एग्जाम होते हैं. 10 और 12 क्लास के बोर्ड एग्जाम का लड़कियों पर प्रेशर होता है. इससे परीक्षा की तैयारी करने में छात्राओं पर प्रेशर बढ़ता है. लड़कों की तुलना में लड़कियां वैसे भी एग्जाम में अपना सौ प्रतिशत लगा देती हैं. साथ ही कामकाजी लोगों के लिए वित्तीय वर्ष के अंत का तनाव लेकर आता है. अत्यधिक तनाव हार्मोनल संतुलन को बिगाड़ सकता है, जिससे पीरियड्स में देरी या अनियमितता हो सकती है. Add News18 as Preferred Source on Google नींद के पैटर्न और डेली रूटीन भी पीरियड्स को प्रभावित कर सकते हैं. काम के दबाव, यात्रा या जीवनशैली में बदलाव के कारण अनियमित नींद शरीर की आंतरिक घड़ी को बाधित कर सकती है, जिससे मासिक चक्र की नियमितता प्रभावित हो सकती है. जर्नल ऑफ वूमेन्स हेल्थ में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, जब कोई महिला बहुत अधिक तनाव ग्रस्त होती है, तो भी पीरियड्स देर से आती है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ के अध्ययनों की मानें तो हार्मोनल चक्र कैलेंडर तिथियों की तुलना में शरीर की सर्कैडियन रिदम से अधिक प्रभावित होते हैं, इसलिए मामूली बदलाव सामान्य हैं. कई बार इसके पीछे मौसमी बदलाव भी कारण हो सकते हैं. फरवरी के बाद मार्च महीने में सीजन में भारी बदलाव आता है. सर्दी खत्म होने के बाद मार्च में गर्मी शुरू होती है. इससे धूप काफी तेज होता है. इस कारण से मेलाटोनिन और कोर्टिसोल जैसे हार्मोन के लेवल पर काफी असर पड़ सकता है. ये बदलाव ओव्यूलेशन को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे मासिक चक्र के समय में मामूली परिवर्तन हो सकते हैं. बेहतर है कि आप किसी भी महीने को इसके लिए दोष न दें. पीरियड्स कई बार शरीर में होने वाले हॉर्मोनल बदलावों, स्ट्रेस, खानपान खराब होना आदि के कारण भी लेट आती है. बेहतर है कि अपनी लाइफस्टाइल, खानपान को बेहतर करें. स्ट्रेस को दूर करें. पर्याप्त नींद लें. बैलेंस डाइट लें. स्वस्थ दिनचर्या का पालन करें. यदि इन सभी चीजों को फॉलो करने के बाद भी आपका पीरियड्स 10 दिनों से अधिक लेट हो गया है तो डॉक्टर से तुरंत मिलें. First Published : April 02, 2026, 18:11 IST

दिखने में महादेव की जटा, गुणों में औषधि, रांची के जंगलों में वैज्ञानिकों ने खोजी नई जड़ी-बूटी

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Last Updated:March 27, 2026, 14:51 IST Ranchi Mahadev ki Jata: झारखंड की राजधानी रांची के बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के कृषि वैज्ञानिक ने खासतौर पर यहां के जंगलों से कुछ जड़ी बूटी खोज निकाला है. जो दिखने में एकदम महादेव की जटा जैसी है. इसलिए इस जड़ी बूटी का नाम भी महादेव का जटा रखा गया है. खासतौर पर यह माइग्रेन की समस्या को ठीक करता है. इसमें कुछ जरूरी पोषक तत्व होते हैं. जो आगे चलकर किडनी की कई सारी बीमारियों को ठीक कर सकती है. रांची फॉरेस्ट डिपार्मेंट के कृषि वैज्ञानिक प्रशांत ने बताया कि ‘हम लोगों ने इसे रांची के आसपास के जंगल जैसे खूंटी के जंगल से खोज निकाला है, जब हमने खोजा तो यह एकदम महादेव की जटा की तरह दिखने में लग रहा था तो हमें लगा क्या नाम रखा जाए तो यही रख दिया. अभी तक जो हमने रिसर्च किया है, उसमें यह पाया गया है कि जिन लोगों को यूरिन की समस्या होती है, किडनी में स्टोन होता है या गाल ब्लैडर की समस्या होती है. उनमें यह रामबाण के तौर पर काम कर सकता है.’ कृषि वैज्ञानिक प्रशांत बताते हैं कि अगर किडनी में इंफेक्शन हो जाए या स्टोन हो जाए तो खासतौर पर यूरिन में परेशानी आती है. कई बार लोगों को पेशाब में जलन जैसी समस्या देखने को मिलती है या फिर गाल ब्लैडर में स्टोन हो जाती है. यह सारी समस्याओं का यह रामबाण सॉल्यूशन है. अभी हम लोग रिसर्च कर ही रहे है. लेकिन अभी तक रिसर्च में पाया है कि एंटीबैक्टीरियल और एंटी इन्फ्लेमेटरी गुण प्रचुर मात्रा में है और किडनी इन्फेक्शन में होने वाले बैक्टीरिया के लिए यह दुश्मन का काम कर रहा है. यूरिन की वजह से जो इन्फेक्शन होता है या कई बार यूटीआई होती है. उसमें जो बैक्टीरिया होते हैं. वह काफी स्ट्रांग होते हैं. Add News18 as Preferred Source on Google इसके लिए आपको डॉक्टर की परामर्श लेने की जरूरत पड़ती है. डॉक्टर की परामर्श तो ठीक है, लेकिन अगर इस जड़ी बूटी को पानी में उबाल के इसका पानी पिया जाए तो आप कुछ ही दिनों में देखेंगे की इन्फेक्शन धीरे-धीरे खत्म हो रहा है और आप काफी रिलैक्स फील कर रहे हैं. दरअसल, यह सीधे किडनी को प्यूरिफाई करने का काम करता है. प्रशांत बताते हैं कि अगर आप इसका पानी पीते हैं तो इसका जो सबसे पहले अटैक होता है. वह किडनी में ही होता है, लेकिन यह सकारात्मक अटैक होता है. यह किडनी को प्यूरिफाई करता है, बैक्टीरिया को हटाता है और कहीं सूजन या इन्फ्लेशन है तो उसको कम करता है. रेगुलर यूरिन लाने में सहायक होता है. यूरिन से जुड़ी हुई कोई भी समस्या है तो उसको ठीक कर सकता है. First Published : March 27, 2026, 14:51 IST

पीएम मोदी ने कहा कि डीएमके ‘वैज्ञानिक भ्रष्टाचार मॉडल’ चला रही है, तमिलनाडु को ‘एक परिवार के लिए एटीएम’ में बदल रही है | राजनीति समाचार

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आखरी अपडेट:मार्च 11, 2026, 18:59 IST पीएम मोदी ने डीएमके सरकार पर लोगों के जनादेश के साथ विश्वासघात करने का आरोप लगाया और तमिलनाडु को एक परिवार के लिए एटीएम बनाने का आरोप लगाया। पीएम मोदी तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में एक सार्वजनिक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे हैं। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को कहा कि तमिलनाडु ने सत्तारूढ़ द्रमुक सरकार को “उखाड़ फेंकने” का फैसला किया है, और कहा कि लोग एक ऐसी सरकार चाहते हैं जो हर परिवार के लिए काम करे, न कि केवल एक परिवार के लिए। तिरुचिरापल्ली में एक सार्वजनिक कार्यक्रम को अंग्रेजी में संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “पूरे राज्य ने डीएमके को सरकार से बाहर करने का मन बना लिया है. लोग ऐसी सरकार चाहते हैं जो सिर्फ एक परिवार के लिए नहीं बल्कि हर परिवार के लिए काम करे.” उन्होंने तिरुचिरापल्ली को साहस और विश्वास की भूमि बताया और कहा कि जब तमिलनाडु और इसकी संस्कृति का सम्मान करने की बात आती है तो भाजपा सरकार हमेशा सबसे आगे रही है। उन्होंने कहा, “यह गर्व की बात है कि तमिलनाडु के बेटे सीपी राधाकृष्णन हमारे उपराष्ट्रपति हैं।” उन्होंने कहा, “एनडीए सरकार के लिए, तमिलनाडु की प्रगति बेहद महत्वपूर्ण है। 2014 के बाद से, केंद्र सरकार ने अकेले हस्तांतरण के लिए 3 लाख करोड़ रुपये दिए हैं। यह पिछली कांग्रेस-डीएमके सरकार के दौरान की राशि से कई गुना अधिक है।” “एनडीए सरकार ने राज्य में राष्ट्रीय राजमार्गों पर लगभग 57,000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जो 2004-14 तक कांग्रेस-डीएमके सरकार द्वारा खर्च की गई राशि का चार गुना है।” ‘डीएमके ने जनादेश के साथ विश्वासघात किया’ उन्होंने द्रमुक सरकार पर लोगों के जनादेश के साथ विश्वासघात करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने टिप्पणी की, “डीएमके शासन में, सब कुछ एक परिवार के साथ शुरू और समाप्त होता है। मंत्री बदल सकते हैं, विधायक बदल सकते हैं, लेकिन सत्ता केवल एक राजवंश के पास रहती है। डीएमके उनके वैज्ञानिक भ्रष्टाचार मॉडल के पक्ष में है। आज, उसी मॉडल का उपयोग तमिलनाडु को उस परिवार के लिए एटीएम बनाने के लिए किया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि किसान तमिलनाडु की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ हैं और अच्छी सुविधाओं और आधुनिक बुनियादी ढांचे के हकदार हैं। पीएम ने इस बात पर प्रकाश डाला कि डीएमके ने अनाज गोदाम बनाने का वादा किया था, लेकिन किसान अभी भी इन गोदामों की तलाश कर रहे हैं जो कहीं नहीं मिल रहे हैं। उन्होंने कहा, “डीएमके ने धान के लिए एमएसपी में बड़ी वृद्धि का वादा किया था। किसान पूछ रहे हैं – इन वादों का क्या हुआ? अवैध रेत खनन नदियों को नष्ट कर रहा है और पर्यावरण को खतरे में डाल रहा है, फिर भी जिम्मेदार लोग डीएमके के संरक्षण का आनंद ले रहे हैं।” प्रधानमंत्री चुनावी राज्य केरल में लगभग 11,000 करोड़ रुपये की कई विकास पहलों का उद्घाटन करने के बाद आधिकारिक यात्रा के लिए तमिलनाडु पहुंचे। इससे पहले सोमवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने त्रिची में डीएमके सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, “राज्य हमेशा बीजेपी और एनडीए के लिए नो-एंट्री जोन रहेगा। लड़ाई तमिलनाडु के लोगों और एनडीए के बीच है।” यह भी पढ़ें: ‘एनडीए बनाम तमिलनाडु’: पीएम मोदी के दौरे से पहले तमिलनाडु में छिड़ा पोस्टर युद्ध पीएम मोदी की टिप्पणी तब आई जब राज्य विधानसभा चुनाव के करीब पहुंच रहा है। इस बार एनडीए को राज्य में बढ़त बनाने की उम्मीद है. जगह : तिरुचिरापल्ली, भारत, भारत पहले प्रकाशित: मार्च 11, 2026, 18:59 IST समाचार राजनीति पीएम मोदी ने कहा, DMK ‘वैज्ञानिक भ्रष्टाचार मॉडल’ चला रही है, तमिलनाडु को ‘एक परिवार के लिए एटीएम’ में बदल रही है अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)पीएम मोदी तमिलनाडु(टी)डीएमके सरकार(टी)बीजेपी सरकार(टी)तमिलनाडु की राजनीति(टी)एनडीए सरकार(टी)तमिलनाडु विधानसभा चुनाव(टी)डीएमके भ्रष्टाचार(टी)तमिलनाडु विकास

20 साल से ट्रैक्टर चलाने वालों को बहरेपन का खतरा:55 ड्राइवरों पर रिसर्च के बाद सीआईएई भोपाल के वैज्ञानिकों का खुलासा

20 साल से ट्रैक्टर चलाने वालों को बहरेपन का खतरा:55 ड्राइवरों पर रिसर्च के बाद सीआईएई भोपाल के वैज्ञानिकों का खुलासा

खेतों में ट्रैक्टर चलाने वाले किसानों की सुनने की शक्ति कमजोर हो रही है। एक ताजा रिसर्च में खुलासा हुआ है कि जो किसान 20 साल या उससे ज्यादा समय से ट्रैक्टर चला रहे हैं, उनमें से कई को सामान्य बातचीत करने में भी जोर लगाना पड़ता है। ऑफिस वर्कर के मुकाबले देखें तो दफ्तर में यह जोखिम 0.2% है, जबकि ट्रैक्टर चलाने वालो में यह बढ़कर 7.1% तक पहुंच जाता है। जो 35 गुना ज्यादा है। केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान (सीआईएई), भोपाल के वैज्ञानिकों ने 55 ट्रैक्टर ड्राइवरों पर यह रिसर्च की है। जो 5 से 43 सालों से खेत जोत रहे हैं। सामने आया कि यह केवल कानों तक सीमित नहीं, बल्कि ड्राइवरों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी सीधा असर कर रहा है। ड्राइवरों में डिप्रेशन (अवसाद), एंग्जायटी (चिंता) और भारी तनाव जैसी मानसिक बीमारियां घर कर रही हैं। इस अध्ययन में सीआईएई के डॉ. अभिजीत खड़त्कर, सीआर मेहता, विजय कुमार और रतलाम मेडिकल कॉलेज कम्युनिटी मेडिसिन के लोकेंद्रसिंह कोट शामिल रहे। रिसर्च डेटा: कम हाइट वालों को दोगुना नुकसान 55 में से 45 ड्राइवरों के बाएं कान की क्षमता दाएं कान के मुकाबले कम थी। 15-20 ड्राइवर जिन्हें 20 साल से ज्यादा अनुभव है, उनकी स्थिति गंभीर, हर तीसरे ड्राइवर में चिड़चिड़ापन और मानसिक तनाव की शिकायत भी सामने आई है। ट्रैक्टर की डिजाइन : दाएं से ज्यादा बाएं कान को नुकसान दायां कान: दायां कान कम प्रभावित मिला, बढ़ती उम्र, शोर का असर रहा। बायां कान: कम लंबाई वाले ड्राइवर धुआं निकलने वाले पाइप के ज्यादा करीब होते हैं, जिससे बाएं कान पर ज्यादा असर होता है। यह जानना जरूरी है… कानों की सुरक्षा: इयरप्लग या इयरमफ शोर को 20 से 30 डेसिबल तक कम करते हैं। मशीन का रखरखाव: पुराने ट्रैक्टरों के साइलेंसर और मफलर समय पर बदलें। काम का बंटवारा: लगातार घंटों तक अकेले ट्रैक्टर न चलाएं, बीच-बीच में आराम लें। औजारों का शोर: ट्रैक्टर के साथ इस्तेमाल होने वाला ‘डिस्क हैरो’ ज्यादा शोर करता है। नियमित जांच जरूर करवाएं।

Why Laser Is Used in Surgery Medical Science Explained Benefits | सर्जरी में लेजर का इस्तेमाल क्यों होता है जानें वैज्ञानिक कारण

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Last Updated:February 25, 2026, 11:41 IST Laser Surgery Benefits for Surgery: आजकल अधिकतर सर्जरी लेजर के जरिए की जा रही हैं. एक्सपर्ट्स की मानें तो लेजर सर्जरी बेहद सटीक होती है और इसमें कम ब्लीडिंग होती है. इस तकनीक से मरीजों की रिकवरी भी तेजी से होती है. यही वजह है कि सर्जरी में लेजर लाइट का इस्तेमाल होता है. यह तकनीक कई प्रक्रियाओं को ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी बना सकती है. ख़बरें फटाफट लेजर सर्जरी को ज्यादा सुरक्षित माना जाता है. Why Laser Light Good for Surgery: मेडिकल साइंस में लगातार नए बदलाव हो रहे हैं और इलाज के लिए एडवांस टेक्नोलॉजी सामने आ रही हैं. कई दशक पहले जहां अधिकतर सर्जरी सर्जिकल ब्लेड से चीरा लगाकर की जाती थीं, लेकिन अब ज्यादातर सर्जरी लेजर के जरिए की जा रही हैं. आज आंख, स्किन, पेट, किडनी, दांत और कुछ कैंसर संबंधी ऑपरेशन भी लेजर की मदद से किए जा रहे हैं. अक्सर लोगों के मन में सवाल यह उठता है कि आखिर सर्जरी में लेजर लाइट का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है? अगर आप भी इसका जवाब जानना चाहते हैं, तो इस पूरी खबर को पढ़ लीजिए. अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के मुताबिक लेजर का पूरा नाम लाइट एंप्लिफिकेशन बाइ स्टिम्युलेटेड एमिशन ऑफ रेडिएशन (LASER) है. लेजर लाइट फोकस्ड, एक दिशा में जाने वाली और हाई एनर्जी वाली वाली होती है. यही विशेषताएं इसे सर्जरी के लिए उपयुक्त बनाती हैं. लेजर की सबसे बड़ी खासियत उसकी सटीकता (precision) है. पारंपरिक सर्जिकल ब्लेड की तुलना में लेजर लाइट बहुत ही कंट्रोल तरीके से टिश्यूज को काट सकती है. लेजर सर्जरी में आसपास के स्वस्थ टिश्यूज को कम से कम नुकसान पहुंचता है, क्योंकि डॉक्टर बहुत छोटे और सटीक क्षेत्र पर एनर्जी केंद्रित कर सकते हैं. इससे ऑपरेशन के दौरान अनावश्यक कटाव और चोट की संभावना घट जाती है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. US फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट बताती है कि लेजर लाइट जब टिश्यूज को काटती है, तब वह सी समय छोटे ब्लड वेसल्स को सील भी कर देती है. इस प्रोसेस को मेडिकल साइंस में कोएगुलेशन कहा जाता है. इससे खून बहना कम होता है और सर्जरी ज्यादा सुरक्षित बनती है. पारंपरिक सर्जरी में ब्लीडिंग बहुत ज्यादा होती थी, लेकिन लेजर में ब्लीडिंग कम होती है. यही वजह है कि कई कॉस्मेटिक और डर्मेटोलॉजी प्रक्रियाओं में लेजर को प्राथमिकता दी जाती है. आजकल आंखों की अधिकतर सर्जरी लेजर लाइट से की जाती हैं, क्योंकि इससे कई तरह के खतरे कम हो जाते हैं. मेडिकल एक्सपर्ट्स की मानें तो लेजर का उपयोग इंफेक्शन के जोखिम को भी कम कर सकता है. लेजर सर्जरी में ब्लेड की तरह बॉडी से डायरेक्ट संपर्क नहीं होता है. इसलिए बैक्टीरिया के फैलने का खतरा घटता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) के अनुसार सर्जरी के बाद इंफेक्शन दुनियाभर में एक बड़ी चुनौती है. लेजर तकनीक इस इंफेक्शन को कम करती है और मरीज की रिकवरी को बेहतर बना सकती हैं. हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि संक्रमण की रोकथाम केवल लेजर पर निर्भर नहीं करती, बल्कि प्रॉपर प्रोटोकॉल पर आधारित होती है. लेजर सर्जरी का एक बड़ा फायदा फास्ट रिकवरी है. कम कट और कम ब्लीडिंग के कारण सूजन और दर्द भी कम होता है. आई डिजीज जैसे मोतियाबिंद या रेटिना संबंधी प्रक्रियाओं में लेजर का खूब इस्तेमाल किया जाता है. अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के अनुसार आंखों की कई बीमारियों में लेजर ट्रीटमेंट असरदार और अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है. हालांकि इस तरह की सर्जरी हमेशा क्वालिफाइड एक्सपर्ट से ही करानी चाहिए. लेजर हर सर्जरी के लिए उपयुक्त नहीं है. इसकी कुछ लिमिटेशंस भी होती हैं. कुछ जटिल या गहरे आंतरिक ऑपरेशन में पारंपरिक सर्जिकल तकनीक ज्यादा प्रभावी हो सकती है. इसके अलावा लेजर उपकरण महंगे होते हैं और इनके लिए स्पेशल ट्रेनिंग की भी जरूरत होती है. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें First Published : February 25, 2026, 11:41 IST

How Body Senses Cold | शरीर को ठंड का अहसास कैसे होता है? वैज्ञानिकों ने सुलझाई शरीर की सबसे बड़ी मिस्ट्री, अंदर छिपा है ‘माइक्रोस्कोपिक थर्मामीटर’, वो सेंसर जो दिमाग को भेजता है कूल सिग्नल

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नई दिल्ली: जब आप सर्दियों की सुबह घर से बाहर निकलते हैं या मुंह में पुदीने की गोली (Mint) रखते हैं, तो आपके शरीर के भीतर एक छोटा सा मॉलिक्यूलर सेंसर तुरंत एक्टिव हो जाता है. यह सेंसर आपके दिमाग को अलर्ट करता है कि बाहर ठंड है या आपने कुछ ठंडा खाया है. वैज्ञानिकों ने अब इस सेंसर की पहली विस्तृत तस्वीरें कैद करने में सफलता हासिल की है. इस रिसर्च से यह साफ हो गया है कि हमारा शरीर असली ठंड और मेंथॉल (Menthol) से मिलने वाली बनावटी ठंडक के बीच कैसे फर्क करता है या कैसे दोनों को एक ही तरह से महसूस करता है. सैन फ्रांसिस्को में 21-25 फरवरी, 2026 तक चलने वाली ’70वीं बायोफिजिकल सोसाइटी एनुअल मीटिंग’ में इस रिसर्च को पेश किया गया. 1. क्या है TRPM8 और यह कैसे काम करता है? इस पूरी रिसर्च का केंद्र ‘TRPM8’ नामक एक प्रोटीन चैनल है. ड्यूक यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ह्युक-जून ली ने इसे शरीर के भीतर मौजूद एक ‘माइक्रोस्कोपिक थर्मामीटर’ की तरह बताया है. यह प्रोटीन हमारे सेंसरी न्यूरॉन्स की झिल्लियों (Membranes) में स्थित होता है, जो हमारी त्वचा, मुंह और आंखों तक फैले होते हैं. जब तापमान 46°F से 82°F (लगभग 8°C से 28°C) के बीच होता है, तो यह चैनल खुल जाता है. इसके खुलते ही कोशिका के अंदर आयन (Ions) का प्रवाह शुरू होता है, जो दिमाग को ठंडक का इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजता है. 2. मेंथॉल कैसे देता है दिमाग को धोखा? रिसर्च में यह दिलचस्प खुलासा हुआ कि मेंथॉल वास्तव में शरीर को ‘बेवकूफ’ बनाता है. ली के अनुसार, मेंथॉल एक ट्रिक की तरह काम करता है. यह प्रोटीन चैनल के एक खास हिस्से से जुड़ जाता है और उसे बिल्कुल वैसे ही खोल देता है जैसे असली ठंडक खोलती है. हालांकि मेंथॉल किसी चीज को बर्फ की तरह जमाता नहीं है, लेकिन आपका शरीर दिमाग को वही सिग्नल भेजता है जो बर्फ छूने पर मिलता है. यही कारण है कि पुदीना खाने पर या नीलगिरी (Eucalyptus) का तेल लगाने पर हमें तेज ठंडक का एहसास होता है. क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी एक ऐसी तकनीक जो इलेक्ट्रॉन बीम से फ्लैश-फ्रोजन प्रोटीन की इमेज बनाती है. इसका इस्तेमाल करके रिसर्चर्स ने कोल्ड सेंसिंग चैनल, TRPM8 के कई कन्फर्मेशनल स्नैपशॉट कैप्चर किए, जब यह बंद से खुले में बदलता है. (Credit: Hyuk-Joon Lee) 3.क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी से खुला राज? वैज्ञानिकों ने इस सेंसर को काम करते हुए देखने के लिए ‘क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी’ तकनीक का इस्तेमाल किया. इसमें प्रोटीन को अचानक जमा दिया जाता है और फिर इलेक्ट्रॉन बीम के जरिए उसकी इमेज ली जाती है. टीम ने TRPM8 के बंद होने से लेकर खुलने तक की कई तस्वीरें लीं. उन्होंने पाया कि ठंड और मेंथॉल दोनों ही इस चैनल को सक्रिय करते हैं, लेकिन उनके तरीके अलग-अलग हैं. ठंड सीधे उस रास्ते (Pore) को प्रभावित करती है जहां से आयन गुजरते हैं, जबकि मेंथॉल प्रोटीन के दूसरे हिस्से से जुड़कर उसमें बदलाव लाता है, जो अंततः रास्ते को खोल देता है. 4. बीमारियों के इलाज में कैसे मिलेगी मदद? इस खोज के मेडिकल मायने बहुत गहरे हैं. जब TRPM8 सेंसर सही से काम नहीं करता, तो यह क्रोनिक पेन (लगातार होने वाला दर्द), माइग्रेन, आंखों का सूखापन (Dry Eye) और यहां तक कि कुछ प्रकार के कैंसर से जुड़ जाता है. फिलहाल ‘एकोल्ट्रेमोन’ नामक दवा, जो TRPM8 को सक्रिय करती है, ड्राई आई के इलाज के लिए इस्तेमाल की जा रही है. यह दवा मेंथॉल की तरह ही काम करती है और आंखों में ठंडक का अहसास कराकर आंसू बनाने की प्रक्रिया को तेज करती है. AI की मदद से बनाई प्रतीकात्मक तस्वीर. 5. क्या भविष्य में दर्द से मिलेगी पूरी राहत? रिसर्चर्स ने प्रोटीन के अंदर एक ‘कोल्ड स्पॉट’ (Cold Spot) की भी पहचान की है. यह हिस्सा तापमान को भांपने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार होता है. यह खोज वैज्ञानिकों को ऐसी नई दवाएं विकसित करने का आधार प्रदान करती है जो सीधे इस रास्ते को टारगेट कर सकें. इससे न केवल दर्द के इलाज में मदद मिलेगी, बल्कि यह भी समझ में आएगा कि लंबे समय तक ठंड में रहने पर हमारा शरीर उसे सहने के अनुकूल कैसे हो जाता है. दशकों से वैज्ञानिक जिस सवाल का जवाब ढूंढ रहे थे, वह अब हमारे सामने है.