भागवत बोले- विज्ञान और धर्म दोनों से नहीं मिली शांति:राजा से विज्ञान तक सब मॉडल फेल; दुनिया अब भारत के ज्ञान से उम्मीद लगा रही

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि 2000 साल तक शासन, धर्म और विज्ञान के अलग-अलग प्रयोगों के बाद अब दुनिया भटक गई है और भारत के ज्ञान की ओर देख रही है। उन्होंने यह बात त्रिपुरा के मोहनपुर में धार्मिक कार्यक्रम में कही। भागवत मां सौंदर्य चिन्मयी मंदिर के प्रतिष्ठा और कुंभाभिषेक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। विकास जितना बढ़ रहा है, पर्यावरण उतना ही नष्ट हो रहा भागवत ने कहा कि पहले सत्ता राजा को दी गई, लेकिन बाद में राजा ही जनता का शोषण करने लगा। इसके बाद लोगों ने भगवान को सर्वोच्च मानकर धर्म बनाए, लेकिन इससे भी खून-खराबा नहीं रुका। कार्यक्रम में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा और अन्य गणमान्य लोग भी मौजूद थे। —————————— ये खबर भी पढ़ें: भागवत बोले- संघ कहे तो पद छोड़ दूंगा:कोई भी हिंदू RSS प्रमुख बन सकता है; सावरकर को भारत रत्न देने से पुरस्कार की गरिमा बढ़ेगी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि यदि संघ उनसे पद छोड़ने को कहेगा, तो वे तुरंत ऐसा करेंगे। आमतौर पर 75 साल की उम्र के बाद किसी पद पर नहीं रहने की परंपरा की बात कही जाती है। पढ़ें पूरी खबर…
फरमान से शादी करने वाली मोना लिसा की उम्र की होगी जांच, पर कैसे होता है यह टेस्ट, विज्ञान के हिसाब से जानिए

Last Updated:April 09, 2026, 17:03 IST Mona Lisa Age Test: सोशल मीडिया सेंसेशन मोना लिसा ने जब से केरल के एक्टर फरमान से शादी की है तब से वह विवादों में है. कहा जा रहा है मोना लिसा नाबालिग है. इसलिए फरमान के साथ यह शादी अवैध है. ऐसे में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसे गंभीरता से लिया है और केरल और मध्य प्रदेश पुलिस को 7 दिनों के अंदर जांच करने के आदेश दिए हैं. इस बीच पुलिस ने मोना लिसा की उम्र का पता लगाने के लिए ऑसिफिकेशन टेस्ट करने का फैसला किया है. अब सवाल यह है कि किसी व्यक्ति की उम्र का पता कैसे लगाया जाता है. इसका वैज्ञानिक तरीका क्या है. आइए जानते हैं. mona_lisa_0007 इंस्टाग्राम पेज से ली गई मोना लिसा और फरमान खान की फोटो. कुंभ मेले से सोशल मीडिया में रातों-रात सनसनी बनीं मोना लिसा की उम्र की वैज्ञानिक जांच की जाएगी. दरअसल, उनकी उम्र को लेकर विवाद गहरा गया है. केरल के फरमान से शादी के बाद हिन्दू पक्षों ने कई जगहें शिकायतें पहुंचाई हैं. शिकायत में कहा गया है कि कुंभ के दौरान एक वीडियो में मोना लिसा ने अपनी उम्र 16 साल बताई थी. इस हिसाब से अभी उसकी उम्र 17 साल ही होगी लेकिन उम्र से संबंधित दस्तावेजों में हेरफेर कर गलत जानकारी दी गई है. ऐसे में मोना लिसा नाबालिग है और इस हिसाब से फरमान ने नाबालिग से शादी की है. इस तरह फरमान पर पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया जाए. इसी शिकायत को संज्ञान में लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने पुलिस को जांच करने का आदेश दिया है. अब सवाल है कि उम्र का पता कैसे लगाया जाता है. इसका वैज्ञानिक तरीका क्या है. क्या विज्ञान इस गुत्थी को सुलझा पाएगा कि मोना लिसा शादी के वक्त नाबालिग थी या बालिग? विज्ञान के हिसाब से उम्र का पता विज्ञान में उम्र का पता लगाने के लिए कई तरह के टेस्ट किए जाते हैं. यह केवल एक सामान्य चेकअप नहीं बल्कि फॉरेंसिक विज्ञान की एक जटिल प्रक्रिया है जिसे ऑसिफिकेशन टेस्ट कहा जाता है. इसमें हड्डियों के जुड़ाव की स्थिति को देखा जाता है. इसके बाद डेंटल एजिंग टेस्ट है. इसमें दांतों और उसकी जड़ों की बनावट को आंका जाता है. वहीं उम्र का पता लगाने के लिए हार्मोनल और सेकेंडरी सेक्सुअल कैरेक्टर को भी आधार बनाया जाता है. फोरेंसिक साइंस में बोन डेंसिटी टेस्ट भी प्रमुख है. इसके बाद टेलोमीयर टेस्टिंग से भी इसका पता लगाया जाता है. ओसिफिकेशन टेस्ट या बोन डेंसिटी टेस्ट-विज्ञान में उम्र का अंदाजा लगाने के लिए बोन डेंसिटी टेस्ट प्रमुख है. कोई व्यक्ति नाबालिग है या बालिग, इसका पता लगाने के लिए इस टेस्ट का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. इसमें एक्स-रे के जरिए हाथ की कलाई की हड्डियों के जुड़ाव की जांच की जाती है. उम्र बढ़ने के साथ हड्डियां आपस में जुड़ती हैं. विज्ञान के हिसाब से, जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमारे शरीर की हड्डियां आपस में जुड़ती हैं और उनके सिरे फ्यूज होने लगते हैं. एक्स-रे और डेंटल स्कैन के जरिए डॉक्टर इन्हीं हड्डियों के घनत्व और दांतों की बनावट का विश्लेषण करते हैं. इस विश्लेषण के आधार पर यह देखा जाता है कि व्यक्ति बालिग है या नाबालिग. हालांकि इसकी सटीकता 80% से 90% तक होती है. पोषण और बीमारियों के कारण इसमें 2-3 साल का अंतर आ सकता है. दांतों का विश्लेषण-जीवित व्यक्तियों और हाल के शवों की उम्र पता करने के लिए यह सबसे सटीक तरीका है. इसमें बच्चों में दांतों के निकलने के क्रम और वयस्कों में दांतों के घिसने या एस्पार्टिक एसिड रेसमीकरण की जांच की जाती है. बच्चों और किशोरों में यह 95% तक सटीक होता है लेकिन वयस्कों में इसमें 5-10 साल का अंतर आ सकता है. टेलोमेयर विश्लेषण-टेलोमेयर टेस्ट जेनेटिक टेस्ट है. यह उम्र पता करने की एक आधुनिक जेनेटिक विधि है. वास्तव में हमारे डीएनए के सिरों पर टेलोमेयर्स होते हैं. हर बार जब कोशिका विभाजित होती है, टेलोमेयर्स छोटे हो जाते हैं. इनकी लंबाई मापकर बायोलॉजिकल एज का पता लगाया जाता है. यह बायोलॉजिकल उम्र बताने में तो सटीक है लेकिन क्रोनोलॉजिकल उम्र (जन्म तिथि के हिसाब से) बताने में इसमें 5-8 साल का अंतर हो सकता है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp,आपके सवालों का हम देंगे जवाब. About the Author Lakshmi Narayan 18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में सबमिट करें First Published : April 09, 2026, 17:03 IST
सेहत का विज्ञान- गर्मियों के लिए समर हेल्थ गाइड:हीट, डिहाइड्रेशन से बचना है तो बदलें खानपान, जानें सही डाइट, न करें 4 गलतियां

गर्मियों में सिर्फ कम खाना ही नहीं, बल्कि सही और समझदारी से खाना ज्यादा जरूरी होता है। तेज गर्मी में शरीर पसीने के जरिए पानी के साथ-साथ जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स जैसे सोडियम और पोटेशियम भी खो देता है। इससे डिहाइड्रेशन, थकान और कमजोरी महसूस हो सकती है। साथ ही भूख कम लगना और पाचन धीमा होना भी आम समस्या है। ‘इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च’ की डाइटरी गाइडलाइंस के अनुसार, इस मौसम में पानी से भरपूर, हल्का और आसानी से पचने वाला खाना शरीर को बेहतर सपोर्ट करता है। गर्मियों ये खाएं, हाइड्रेशन और पाचन सही रहेगा इन्हें कैसे और कब खाना सबसे फायदेमंद? सुबह: पानी, तरबूज, खरबूजा या नींबू पानी। मिड-मॉर्निंग: छाछ या नारियल पानी। गोंद कतीरा: भिगोकर ½–1 चम्मच, दिन में (सुबह या दोपहर)। दोपहर: हल्का खाना- दाल, दही, मौसमी सब्जी और सलाद। शाम: फल, नट्स या भुने चने और छाछ। रात: जल्दी और हल्का खाएं। सूप या दाल-चावल के साथ लौकी/तोरी या दही-चावल। ऐसी 4 गलतियां, जो गर्मियों में नहीं करनी चाहिए गर्मियों में अक्सर हम प्यास बुझाने या पेट भरने के चक्कर में ऐसी गलतियां करते हैं, जो शरीर को ठंडा रखने की बजाय बीमारी और डिहाइड्रेशन का कारण बन जाती हैं। 1. ज्यादा कैफीन से डिहाइड्रेशन मायो क्लिनिक के अनुसार, 2–3 कप तक कैफीन आमतौर पर सुरक्षित होती है, लेकिन ज्यादा मात्रा लेने पर डिहाइड्रेशन बढ़ सकता है। कैफीन पेशाब के जरिए शरीर से पानी और सोडियम बाहर निकालती है। इसलिए गर्मियों में ज्यादा कैफीन लेने से शरीर में पानी की कमी और इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन हो सकता है। 2. बहुत ठंडा पानी पीने से पाचन धीमा बहुत ठंडा पानी पीने से शरीर में थोड़े समय के लिए ब्लड सर्कुलेशन बदल सकता है। नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट्स यूके के अनुसार, ठंड से ब्लड वेसल्स सिकुड़ती हैं और पाचन थोड़ा धीमा हो सकता है। 4-5°C का पानी पीने पर शरीर उसे सामान्य तापमान तक लाने में ज्यादा ऊर्जा खर्च करता है। कुछ मामलों में ठंडा पानी माइग्रेन, ब्लोटिंग या रिफ्लक्स बढ़ सकता है। 3. ज्यादा शुगर और कोल्ड ड्रिंक्स से सुस्ती गर्मियों में ज्यादा शुगर वाले ड्रिंक्स या मीठा खाना प्यास और डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ाता है। शुगर तुरंत एनर्जी देती है, लेकिन थोड़ी देर बाद थकान और सुस्ती महसूस होने लगती है। ज्यादा शुगर से शरीर का इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बिगड़ सकता है, वजन बढ़ सकता है और हीट एग्जॉशन का खतरा भी बढ़ जाता है। 4. रात को भारी खाना न खाएं गर्मियों में रात को भारी और मसालेदार खाना पाचन पर ज्यादा दबाव डालता है और शरीर का तापमान बढ़ा सकता है। ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन अमेरिका’ की स्टडी के अनुसार, मसालेदार खाना नींद को प्रभावित कर सकता है। इसलिए रात में हल्का और कम मसाले वाला खाना बेहतर रहता है, ताकि पाचन सही रहे और नींद भी अच्छी आए। रेणु रखेजा जानी-मानी न्यूट्रिशनिस्ट एवं हेल्थ कोच हैं। @consciouslivingtips
2 लैब में क्रायोनिक्स तकनीक से शवों का संरक्षण:मौत के बाद जीवन की चाह; 2 करोड़ खर्च कर जमा रहे शरीर, उम्मीद- विज्ञान जिंदा कर देगा

मौत को भौतिक रूप से शरीर का अंत मानते हैं। लेकिन दुनिया के कुछ लोग इसे ‘रुकावट’ मानकर भविष्य में फिर से जीने की तैयारी कर रहे हैं। एमआईटी टेक्नोलॉजी रिव्यू की रिपोर्ट के मुताबिक, क्रायोनिक्स तकनीक के जरिए लोग अपने शरीर या सिर्फ दिमाग को 196 डिग्री सेल्सियस के तरल नाइट्रोजन में संरक्षित करवा रहे हैं, इस उम्मीद में कि भविष्य में विज्ञान इतना आगे बढ़ जाएगा कि उन्हें फिर जीवित कर दिया जाएगा। क्रायोनिक्स कोई नई तकनीक नहीं है। 1967 में जेम्स बेडफोर्ड पहले व्यक्ति बने, जिन्हें इस तरीके से संरक्षित किया गया। यानी यह तकनीक करीब 60 साल पुरानी है। आज भी उनका शरीर संरक्षित है, हालांकि उस समय की तकनीक सीमित थी और कोशिकाओं को नुकसान ज्यादा होता था। इस प्रक्रिया की शरुआत मौत के तुरंत बाद होती है। शरीर को तेजी से ठंडा किया जाता है, फिर खून की जगह खास केमिकल क्रायो-प्रोटेक्टेंट डाले जाते हैं, ताकि कोशिकाओं में बर्फ न जमे। इसके बाद शरीर को धीरे-धीरे 196° डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर कांच जैसी अवस्था (विट्रिफिकेशन) में रखा जाता है। कुछ लोग पूरा शरीर संरक्षित कराते हैं, जबकि कुछ सिर्फ दिमाग, क्योंकि ये यादों और पहचान से जुड़ा है। भविष्य की तकनीक विकसित हो गई तो दिमाग को नए शरीर या अन्य नेटवर्क में ‘लिंक’ करना संभव होगा। रिसर्चर राल्फ मर्कल का मानना है कि भविष्य में नैनोटेक्नोलॉजी के विकास के साथ यह संभव हो सकता है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि फ्रीजिंग के दौरान कोशिकाएं और टिश्यू डैमेज हो जाते हैं, खासकर दिमाग जैसे जटिल अंग में। हालांकि आज की तकनीक पहले से बेहतर हो चुकी है, फिर भी रिवाइवल अभी विज्ञान की पहुंच से दूर है। हालांकि कई लोगों का मानना है कि भविष्य में मेडिकल साइंस इसे संभव करेगी। पूरा शरीर संरक्षित कराने में 2 करोड़ रुपए का खर्च दुनिया में अल्कोर लाइफ एक्सटेंशन फाउंडेशन (एरिजोना) और क्रायोनिक्स इंस्टिट्यूट (मिशिगन) जैसी संस्थाएं यह सेवा दे रही हैं। 500 से ज्यादा लोग क्रायोनिक्स के तहत संरक्षित किए जा चुके हैं। हजारों लोग भविष्य के लिए रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। पूरे शरीर को संरक्षित कराने में 1.5 से 2 करोड़ रु. तक लगते हैं। सिर्फ दिमाग (न्यूरो-) के लिए 60-70 लाख रु. खर्च आता है। कई लोग बीमा का सहारा लेते हैं।
झाबुआ में कृषि विज्ञान मेले का शुभारंभ:मंत्री निर्मला भूरिया ने जैविक खेती पर जोर दिया

झाबुआ के कृषि विज्ञान केंद्र प्रक्षेत्र में शनिवार को दो दिवसीय जिला स्तरीय कृषि विज्ञान मेले का शुभारंभ हुआ। इसका उद्देश्य कृषक कल्याण वर्ष के संकल्प को साकार करना है। महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया मुख्य अतिथि थीं, जबकि कलेक्टर नेहा मीना ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। मेले का फोकस कृषि, उद्यानिकी तकनीक विस्तारण और तिलहन मिशन पर है, जिसका लक्ष्य किसानों को आधुनिक तकनीक, प्राकृतिक खेती और उन्नत विपणन प्रणालियों से जोड़ना है। अपने संबोधन में मंत्री निर्मला भूरिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के विजन का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2026 को किसान कल्याण के लिए समर्पित किया गया है। मंत्री ने रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से स्वास्थ्य और भूमि पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के प्रति आगाह किया। उन्होंने कृषि सखियों और उपस्थित जनसमूह से मिश्रित खेती व जैविक पद्धतियों को अपनाने का आह्वान किया। कलेक्टर नेहा मीना ने स्पष्ट किया कि प्रशासन की प्राथमिकता केवल मेले का आयोजन नहीं, बल्कि शासन की योजनाओं का लाभ अंतिम छोर के किसान तक पहुंचाना है। उन्होंने जिले की जैविक खेती के क्षेत्र में उपलब्धियों का जिक्र किया। मीना ने वैज्ञानिकों से अपील की कि वे किसानों को उनकी स्थानीय भाषा में तकनीकी प्रशिक्षण दें, ताकि ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग सुनिश्चित हो सके। कार्यक्रम के दौरान ग्राम खेड़ी के विमल भाभोर को बायो रिसोर्स सेंटर के लिए सहायता प्रदान की गई। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और फसल बीमा योजना के तहत कई हितग्राहियों को ड्रिप सिस्टम और बीमा पॉलिसी वितरित की गईं। उद्यानिकी और पशुपालन विभाग द्वारा भी ट्रैक्टर, सब्जी खेती और बकरी पालन के लिए लाखों रुपए की सहायता राशि के चेक प्रदान किए गए। मेले में लगाई गई प्रदर्शनी के माध्यम से किसानों ने सूक्ष्म सिंचाई, नरवाई प्रबंधन और आधुनिक कृषि यंत्रों की बारीकियों को समझा। कार्यक्रम के समापन पर मंत्री भूरिया ने उपस्थित जनसमूह को नशामुक्ति की शपथ दिलाई। उन्होंने एक प्रश्नोत्तरी के माध्यम से कृषि सखी गंगा मेडा को सम्मानित कर उनका उत्साहवर्धन भी किया। मेले की अन्य तस्वीरें…








