एक ‘किस’ और 3 गुना बढ़ता दिमागी बीमारी का खतरा! आखिर क्या है ये एपस्टीन-बार वायरस, जिससे सतर्क कर रहे डॉक्टर?

क्या आप जानते हैं कि एक छोटा सा ‘किस’ (Kiss) आपको उम्र भर के लिए दिमागी बीमारी दे सकता है? सुनने में यह बेकार सी बात लगे, लेकिन हाल ही में आई एक मेडिकल रिसर्च ने ऐसा ही पाया है. डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि ‘किसिंग डिजीज’ (Kissing Disease) के नाम से मशहूर एक मामूली सा दिखने वाला वायरस, दरअसल, भविष्य में आपकी नसों और दिमाग को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है. आखिर क्या है ये पूरा मामला और आपको किन लक्षणों से सावधान रहने की जरूरत है, जानते हैं. क्या है ये ‘किसिंग डिजीज’ और कैसे फैलती है?टीओटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मेडिकल भाषा में इसे ‘इन्फेक्शियस मोनोन्यूक्लिओसिस’ (Infectious Mononucleosis) कहा जाता है. यह बीमारी ‘एपस्टीन-बार वायरस’ (EBV) की वजह से होती है, जो दुनिया के सबसे आम संक्रमणों में से एक है. दिलचस्प बात यह है कि इसे ‘किसिंग डिजीज’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह मुख्य रूप से लार (Saliva) के जरिए फैलती है. हालांकि, यह सिर्फ किस करने से ही नहीं, बल्कि झूठा खाने, एक ही गिलास से पानी पीने या रोजमर्रा के करीबी संपर्क से भी फैल सकती है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. MS से जुड़ा है गहरा नाताअमेरिका में लगभग 19,000 लोगों पर की गई एक स्टडी (Mayo Clinic-led study) में यह पाया गया कि जिन लोगों को कभी ‘मोनो’ यानी किसिंग डिजीज हुई थी, उनमें भविष्य में मल्टीपल स्केलेरोसिस (MS) होने का खतरा उन लोगों के मुकाबले तीन गुना अधिक था जिन्हें यह संक्रमण कभी नहीं हुआ. रिसर्च यह भी बताती है कि संक्रमित लोगों में यह दिमागी बीमारी सामान्य से काफी पहले भी दिखाई देने लगती है. आखिर क्या है ये मल्टीपल स्केलेरोसिस (MS)?MS एक ऐसी क्रोनिक स्थिति है जिसमें हमारे शरीर का इम्यून सिस्टम ही अपनी नसों की सुरक्षात्मक परत (Myelin Sheath) पर हमला कर देता है. इससे दिमाग और शरीर के बाकी हिस्सों के बीच संकेतों का तालमेल बिगड़ जाता है. इसकी शुरुआत थकान, नजर धुंधली होने, सुन्नपन और शरीर का संतुलन बिगड़ने जैसे लक्षणों से होती है, जो वक्त के साथ बढ़ते चले जाते हैं. एक्सपर्ट्स की क्या है राय?अपोलो हॉस्पिटल (हैदराबाद) के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुधीर कुमार का कहना है कि EBV वायरस और MS के बीच लिंक तो मजबूत है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह वायरस ही इकलौता कारण है. उनके अनुसार, “EBV उन लोगों में एक ‘ट्रिगर’ की तरह काम कर सकता है जो आनुवंशिक रूप से इसके प्रति संवेदनशील हैं.” वहीं, एम्स दिल्ली की न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख प्रो. मंजरी त्रिपाठी का मानना है कि भारत में बच्चों और किशोरों में यह वायरस बहुत आम है, लेकिन हर किसी को इससे घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि संक्रमण होने के बावजूद बीमारी होने का वास्तविक खतरा अभी भी बहुत कम है. इन लक्षणों को बिल्कुल न करें नजरअंदाजडॉक्टरों का कहना है कि रूटीन मॉनिटरिंग की जरूरत नहीं है, लेकिन जागरूकता सबसे बड़ा हथियार है. यदि आपको नीचे दिए गए लक्षण 24 घंटे से अधिक समय तक महसूस हों, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें: -आँखों में दर्द या धुंधला दिखाई देना.-हाथ-पैरों में झनझनाहट या सुन्नपन महसूस होना.-बिना किसी कारण के बहुत ज्यादा थकान रहना.-रीढ़ की हड्डी में बिजली जैसा झटका महसूस होना.-अचानक आई कमजोरी या शरीर का संतुलन बिगड़ना. बचाव ही सबसे बड़ा समाधान-इस दिशा में वैज्ञानिक काम कर रहे हैं और यह चर्चा कर रहे हैं कि क्या एपस्टीन-बार वायरस (EBV) के खिलाफ कोई वैक्सीन तैयार की जा सकती है या नहीं. फिलहाल, स्वच्छता बनाए रखना, किसी का झूठा खाना पानी न पीना और अपने इम्यून सिस्टम को मजबूत रखना ही इससे बचने के सबसे आसान तरीके हैं. रिसर्च के नतीजे निश्चित रूप से चिंताजनक हैं, लेकिन घबराने के बजाय अपनी सेहत को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है. याद रखें, जानकारी ही बचाव का पहला कदम है!
अब जड़ से खत्म होगा शुगर, करोड़ों मरीजों को मिलेगी ‘संजीवनी’! चीन ने खोजा बिना दवा और इंजेक्शन वाला फॉर्मूला

होमदुनियाचीन अब जड़ से खत्म होगा शुगर, करोड़ों मरीजों को मिलेगी ‘संजीवनी’! मिल गया फॉर्मूला Last Updated:March 04, 2026, 16:31 IST दुनिया भर के करोड़ों मधुमेह रोगियों के लिए एक ऐसी खुशखबरी आई है, जिसने मेडिकल जगत में तहलका मचा दिया है. चीन के वैज्ञानिकों ने ‘स्टेम-सेल थेरेपी’ (Stem-Cell Therapy) का इस्तेमाल करते हुए इतिहास में पहली बार टाइप-2 डायबिटीज (Type 2 Diabetes) को पूरी तरह से रिवर्स (ठीक) करने में कामयाबी हासिल की है. इस सफल प्रयोग के बाद मरीज को अब अपना ब्लड शुगर कंट्रोल करने के लिए किसी भी तरह के इंसुलिन के इंजेक्शन या भारी-भरकम दवाइयों की जरूरत नहीं है. यह ऐतिहासिक सफलता ‘रीजेनरेटिव मेडिसिन’ के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है. चीन ने खोजा डायबिटीज के इलाज के लिए संजीवनी. (सांकेतिक फोटो) डायबिटीज (मधुमेह) एक ऐसी बीमारी है जिसके बारे में अब तक यही कहा जाता था कि “यह एक बार हो जाए, तो मरते दम तक साथ नहीं छोड़ती.” दुनिया भर में शुगर की दवाइयां और इंसुलिन बनाने वाली कंपनियों का अरबों का कारोबार इसी बात पर टिका है. लेकिन चीन के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा मेडिकल ‘चमत्कार’ कर दिखाया है, जिसने इस लाइलाज मानी जाने वाली बीमारी के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी है. चीन ने स्टेम-सेल थेरेपी के जरिए टाइप-2 डायबिटीज को पूरी तरह से खत्म करने का दावा किया है. खत्म हुआ इंसुलिन का खेल ऐतिहासिक घटनाक्रम में, चीनी शोधकर्ताओं ने एक मरीज के शरीर में स्वस्थ पैंक्रियाटिक (अग्न्याशय) कोशिकाओं को ट्रांसप्लांट करके टाइप-2 डायबिटीज को पलट दिया है. यह प्रयोग सफल रहा है और सबसे बड़ी बात यह है कि अब उस मरीज को ब्लड शुगर मैनेज करने के लिए दर्दनाक इंसुलिन इंजेक्शन या मुट्ठी भर दवाइयों पर निर्भर नहीं रहना पड़ रहा है. एनडीटीवी (NDTV) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, टाइप-2 डायबिटीज तब होती है जब शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता, जिससे खून में शुगर का स्तर खतरनाक रूप से बढ़ जाता है. ऐसे में मरीजों को बाहर से इंसुलिन लेना पड़ता है. एक बार जब कोई व्यक्ति इंसुलिन पर निर्भर हो जाता है, तो उसके शरीर के प्राकृतिक काम करने के तरीके को वापस लाना लगभग असंभव माना जाता था. लेकिन चीन ने इस असंभव को संभव कर दिखाया है. कैसे हुआ यह चमत्कार? समझें स्टेम सेल थेरेपी के 4 अहम चरण इस पूरी प्रक्रिया को वैज्ञानिकों ने बेहद जटिल और उन्नत तकनीक से अंजाम दिया है. टाइप-2 डायबिटीज को रिवर्स करने के लिए शोधकर्ताओं ने निम्नलिखित कदम उठाए: स्टेम सेल प्राप्त करना: सबसे पहले मरीज या किसी डोनर (दाता) के शरीर से ‘स्टेम सेल’ निकाले जाते हैं. इन कोशिकाओं में एक जादुई खूबी होती है—ये शरीर के किसी भी विशेष अंग की कोशिका का रूप ले सकती हैं. लैब में ‘रीप्रोग्रामिंग’: प्रयोगशाला में इन स्टेम सेल्स को खास रासायनिक और जेनेटिक सिग्नल दिए जाते हैं. इन सिग्नल्स की मदद से स्टेम सेल को ‘पैंक्रियाटिक आइलेट सेल्स’ (विशेष रूप से बीटा सेल्स) में बदल दिया जाता है, जो प्राकृतिक रूप से शरीर में इंसुलिन बनाते हैं. क्लस्टर तैयार करना: जब ये कोशिकाएं अपना रूप बदल लेती हैं, तो इन्हें एक साथ विकसित करके स्वस्थ पैंक्रियाटिक ऊतकों (Tissue) का एक ‘गुच्छा’ (Cluster) तैयार किया जाता है. ये गुच्छे ब्लड शुगर के स्तर में होने वाले बदलावों को भांप सकते हैं और जरूरत पड़ने पर खुद ही इंसुलिन छोड़ सकते हैं. शरीर में ट्रांसप्लांट: अंतिम चरण में, इंसुलिन बनाने वाले इन गुच्छों को मरीज के पेट (Abdomen) में ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है. शरीर के अंदर जाते ही ये मरीज की ब्लड सप्लाई के साथ जुड़ जाते हैं. सबसे बड़ी चुनौती: शरीर का ‘रिजेक्शन’ इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती यह देखना होता है कि मरीज का शरीर इन नई कोशिकाओं को अपनाता है (Accept) या उन्हें बाहरी दुश्मन समझकर खारिज (Reject) कर देता है. सारा परिणाम इसी बात पर निर्भर करता है. एक बार जब शरीर इन्हें स्वीकार कर लेता है, तो ये नई कोशिकाएं एक स्वस्थ पैंक्रियास की तरह काम करने लगती हैं. वे खुद ही खून में बढ़ती शुगर को डिटेक्ट करती हैं और उसे सामान्य करने के लिए इंसुलिन रिलीज करती हैं. इस सफलता के बाद मरीज को बाहरी इंसुलिन की जरूरत या तो बिल्कुल खत्म हो जाती है या बेहद कम रह जाती है. ‘रीजेनरेटिव मेडिसिन’ का नया युग सर्जरी के बाद अंतिम चरण में, डॉक्टर मरीजों की कड़ी निगरानी करते हैं. वे यह सुनिश्चित करते हैं कि ट्रांसप्लांट की गई कोशिकाएं जीवित रहें, लगातार इंसुलिन बनाती रहें और शरीर में कोई ‘इम्यून रिएक्शन’ (Immune Reaction) या अन्य जटिलताएं पैदा न हों. स्टेम सेल पर आधारित यह इलाज ‘रीजेनरेटिव मेडिसिन’ (पुनर्योजी चिकित्सा) का एक जीता-जागता प्रमाण है. अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो यह दुनिया भर के करोड़ों डायबिटीज मरीजों के लिए एक स्थायी, व्यक्तिगत और दर्द-मुक्त समाधान साबित होगी. About the Author Deep Raj Deepak दीप राज दीपक 2022 में न्यूज़18 से जुड़े. वर्तमान में होम पेज पर कार्यरत. राजनीति और समसामयिक मामलों, सामाजिक, विज्ञान, शोध और वायरल खबरों में रुचि. क्रिकेट और मनोरंजन जगत की खबरों में भी दिलचस्पी. बनारस हिंदू व…और पढ़ें First Published : March 04, 2026, 16:31 IST
How Body Senses Cold | शरीर को ठंड का अहसास कैसे होता है? वैज्ञानिकों ने सुलझाई शरीर की सबसे बड़ी मिस्ट्री, अंदर छिपा है ‘माइक्रोस्कोपिक थर्मामीटर’, वो सेंसर जो दिमाग को भेजता है कूल सिग्नल

नई दिल्ली: जब आप सर्दियों की सुबह घर से बाहर निकलते हैं या मुंह में पुदीने की गोली (Mint) रखते हैं, तो आपके शरीर के भीतर एक छोटा सा मॉलिक्यूलर सेंसर तुरंत एक्टिव हो जाता है. यह सेंसर आपके दिमाग को अलर्ट करता है कि बाहर ठंड है या आपने कुछ ठंडा खाया है. वैज्ञानिकों ने अब इस सेंसर की पहली विस्तृत तस्वीरें कैद करने में सफलता हासिल की है. इस रिसर्च से यह साफ हो गया है कि हमारा शरीर असली ठंड और मेंथॉल (Menthol) से मिलने वाली बनावटी ठंडक के बीच कैसे फर्क करता है या कैसे दोनों को एक ही तरह से महसूस करता है. सैन फ्रांसिस्को में 21-25 फरवरी, 2026 तक चलने वाली ’70वीं बायोफिजिकल सोसाइटी एनुअल मीटिंग’ में इस रिसर्च को पेश किया गया. 1. क्या है TRPM8 और यह कैसे काम करता है? इस पूरी रिसर्च का केंद्र ‘TRPM8’ नामक एक प्रोटीन चैनल है. ड्यूक यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ह्युक-जून ली ने इसे शरीर के भीतर मौजूद एक ‘माइक्रोस्कोपिक थर्मामीटर’ की तरह बताया है. यह प्रोटीन हमारे सेंसरी न्यूरॉन्स की झिल्लियों (Membranes) में स्थित होता है, जो हमारी त्वचा, मुंह और आंखों तक फैले होते हैं. जब तापमान 46°F से 82°F (लगभग 8°C से 28°C) के बीच होता है, तो यह चैनल खुल जाता है. इसके खुलते ही कोशिका के अंदर आयन (Ions) का प्रवाह शुरू होता है, जो दिमाग को ठंडक का इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजता है. 2. मेंथॉल कैसे देता है दिमाग को धोखा? रिसर्च में यह दिलचस्प खुलासा हुआ कि मेंथॉल वास्तव में शरीर को ‘बेवकूफ’ बनाता है. ली के अनुसार, मेंथॉल एक ट्रिक की तरह काम करता है. यह प्रोटीन चैनल के एक खास हिस्से से जुड़ जाता है और उसे बिल्कुल वैसे ही खोल देता है जैसे असली ठंडक खोलती है. हालांकि मेंथॉल किसी चीज को बर्फ की तरह जमाता नहीं है, लेकिन आपका शरीर दिमाग को वही सिग्नल भेजता है जो बर्फ छूने पर मिलता है. यही कारण है कि पुदीना खाने पर या नीलगिरी (Eucalyptus) का तेल लगाने पर हमें तेज ठंडक का एहसास होता है. क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी एक ऐसी तकनीक जो इलेक्ट्रॉन बीम से फ्लैश-फ्रोजन प्रोटीन की इमेज बनाती है. इसका इस्तेमाल करके रिसर्चर्स ने कोल्ड सेंसिंग चैनल, TRPM8 के कई कन्फर्मेशनल स्नैपशॉट कैप्चर किए, जब यह बंद से खुले में बदलता है. (Credit: Hyuk-Joon Lee) 3.क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी से खुला राज? वैज्ञानिकों ने इस सेंसर को काम करते हुए देखने के लिए ‘क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी’ तकनीक का इस्तेमाल किया. इसमें प्रोटीन को अचानक जमा दिया जाता है और फिर इलेक्ट्रॉन बीम के जरिए उसकी इमेज ली जाती है. टीम ने TRPM8 के बंद होने से लेकर खुलने तक की कई तस्वीरें लीं. उन्होंने पाया कि ठंड और मेंथॉल दोनों ही इस चैनल को सक्रिय करते हैं, लेकिन उनके तरीके अलग-अलग हैं. ठंड सीधे उस रास्ते (Pore) को प्रभावित करती है जहां से आयन गुजरते हैं, जबकि मेंथॉल प्रोटीन के दूसरे हिस्से से जुड़कर उसमें बदलाव लाता है, जो अंततः रास्ते को खोल देता है. 4. बीमारियों के इलाज में कैसे मिलेगी मदद? इस खोज के मेडिकल मायने बहुत गहरे हैं. जब TRPM8 सेंसर सही से काम नहीं करता, तो यह क्रोनिक पेन (लगातार होने वाला दर्द), माइग्रेन, आंखों का सूखापन (Dry Eye) और यहां तक कि कुछ प्रकार के कैंसर से जुड़ जाता है. फिलहाल ‘एकोल्ट्रेमोन’ नामक दवा, जो TRPM8 को सक्रिय करती है, ड्राई आई के इलाज के लिए इस्तेमाल की जा रही है. यह दवा मेंथॉल की तरह ही काम करती है और आंखों में ठंडक का अहसास कराकर आंसू बनाने की प्रक्रिया को तेज करती है. AI की मदद से बनाई प्रतीकात्मक तस्वीर. 5. क्या भविष्य में दर्द से मिलेगी पूरी राहत? रिसर्चर्स ने प्रोटीन के अंदर एक ‘कोल्ड स्पॉट’ (Cold Spot) की भी पहचान की है. यह हिस्सा तापमान को भांपने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार होता है. यह खोज वैज्ञानिकों को ऐसी नई दवाएं विकसित करने का आधार प्रदान करती है जो सीधे इस रास्ते को टारगेट कर सकें. इससे न केवल दर्द के इलाज में मदद मिलेगी, बल्कि यह भी समझ में आएगा कि लंबे समय तक ठंड में रहने पर हमारा शरीर उसे सहने के अनुकूल कैसे हो जाता है. दशकों से वैज्ञानिक जिस सवाल का जवाब ढूंढ रहे थे, वह अब हमारे सामने है.









