Sunday, 12 Jul 2026 | 08:00 AM

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अमेरिका ने ईरान पर एयरस्ट्राइक की:न्यूक्लियर सिटी बुशहर को निशाना बनाया; ईरान की जवाबी कार्रवाई की धमकी, होर्मुज बंद का ऐलान

अमेरिका ने ईरान पर एयरस्ट्राइक की:न्यूक्लियर सिटी बुशहर को निशाना बनाया; ईरान की जवाबी कार्रवाई की धमकी, होर्मुज बंद का ऐलान

अमेरिका ने शनिवार देर रात ईरान पर एयरस्ट्राइक की। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, न्यूक्लियर सिटी बुशहर समेत असालुयेह, बंदर-ए-देयर, जास्क और चाबहार के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। ईरानी मीडिया ने इन इलाकों में धमाकों की पुष्टि की है। अमेरिका का कहना है कि यह कार्रवाई होर्मुज स्ट्रेट में साइप्रस के झंडे वाले कंटेनर जहाज पर हमले के जवाब में की गई। CENTCOM के मुताबिक, हमले में जहाज में आग लग गई, इंजन क्षतिग्रस्त हुआ और चालक दल का एक सदस्य लापता है। वहीं, ईरान ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। विदेश मंत्रालय के सलाहकार अली सफारी ने कहा कि अमेरिकी हमलों का जवाब दिया जाएगा। साथ ही ईरान ने ऐलान किया कि अमेरिकी दखल खत्म होने तक होर्मुज स्ट्रेट बंद रहेगा। मिडिल ईस्ट के हालात से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लाग से गुजर जाइए…

बंगाल में 20 साल बाद टाटा की वापसी संभव:सीएम सुवेंदु खुद मामले को देख रहे; ममता के आंदोलन से बंद हुआ था प्लांट

बंगाल में 20 साल बाद टाटा की वापसी संभव:सीएम सुवेंदु खुद मामले को देख रहे; ममता के आंदोलन से बंद हुआ था प्लांट

पश्चिम बंगाल के सिंगूर में करीब दो दशक पहले टाटा की नैनो परियोजना को लेकर शुरू हुआ विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद टाटा समूह की सिंगूर में वापसी को लेकर चर्चा तेज हो रही है। राज्य के उद्योग मंत्री तापस रॉय ने कहा कि टाटा के साथ शुरुआती स्तर पर बातचीत चल रही है। अगर टाटा ग्रुप लौटने को तैयार होता है तो सरकार वहां किसी दूसरी कंपनी को नहीं लाएगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी खुद मामले की निगरानी कर रहे हैं। हालांकि, जिन किसानों ने 2006 में नैनो के लिए अपनी जमीन दी थी, उनके लिए यह अधूरा सपना है। टाटा के सिंगूर छोड़ने के बाद हजारों परिवार आर्थिक और मानसिक संकट से गुजरते रहे। करीब 3,600 ऐसे परिवारों को आज भी सरकार हर महीने दो हजार रुपये और 16 किलो चावल देती है, लेकिन कई परिवार अब भी उस सदमे से उबर नहीं पाए हैं। टाटा को जमीन देने के लिए तैयार हैं लोग 75 साल की अंगूर दास बताती हैं कि उनके पति ने छह बीघा जमीन परियोजना के लिए दी थी। टाटा के जाने के बाद वे गहरे सदमे में चले गए और वर्ष 2019 में उनका निधन हो गया। अंगूर दास कहती हैं कि यदि टाटा दोबारा लौटती है तो वे अपनी बची हुई जमीन भी देने को तैयार हैं। जब सिंगूर आंदोलन चल रहा था तब अनिद्य दास महज 12 साल के थे। आज 32 साल के अनिद्य को रोजगार के लिए कोलकाता जाना पड़ता है। उनका कहना है कि यदि फैक्ट्री लग गई होती तो उन्हें रोज शहर जाकर नौकरी नहीं करनी पड़ती। उनके पिता ने भी जमीन दी थी, लेकिन आज वह जमीन भी खेती के योग्य नहीं बची है। खासेरभेड़ी गांव के स्वरूप दास ने भी दो बीघा जमीन परियोजना के लिए दी थी। वे बताते हैं कि मुआवजा मिलने के बाद वे दुबई चले गए थे, जबकि उनके दोनों भाइयों का चयन टाटा ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग प्रशिक्षण के लिए किया था। उत्तराखंड में ट्रेनिंग शुरू हो चुकी थी और नौकरी की उम्मीद भी थी, लेकिन परियोजना बंद होने के साथ सारे सपने टूट गए। उनका कहना है कि यदि आज टाटा या कोई दूसरी बड़ी कंपनी आती है तो वे फिर जमीन देने के लिए तैयार हैं। 20 साल में 15 गुना बढ़ी जमीन की कीमत भूमि अधिग्रहण के समर्थन में बनी सिंगूर शिल्प विकास समिति के अध्यक्ष डॉ. उदयन दास का कहना है कि वर्ष 2006 के बाद से जमीन की कीमतों में लगभग 15 गुना वृद्धि हो चुकी है। उनके मुताबिक सड़क किनारे की जमीन, जिसकी कीमत उस समय करीब तीन लाख रुपये प्रति बीघा थी, अब एक करोड़ रुपये प्रति बीघा तक पहुंच गई है। ऐसे में यदि टाटा दोबारा लौटती है तो केवल मुआवजे पर ही 1,300 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करना पड़ सकता है। यही वजह है कि उनकी नजर में टाटा की वापसी आसान नहीं होगी। 997 एकड़ जमीन बेकार हो रही वर्तमान में सिंगूर की वह 997 एकड़ जमीन, जहां कभी नैनो परियोजना शुरू हुई थी, बड़े हिस्से में झाड़ियों से ढकी पड़ी है। कभी यह इलाका पश्चिम बंगाल की सबसे उपजाऊ कृषि भूमि माना जाता था, जहां धान, आलू और अन्य फसलें होती थीं। लेकिन परियोजना रुकने के बाद खेती भी प्रभावित हुई और बड़ी संख्या में किसान रोजगार की तलाश में दूसरे क्षेत्रों में चले गए। हालांकि, सिंगूर में सभी लोग टाटा की वापसी के पक्ष में नहीं हैं। सिंगूर कृषि रक्षा समिति के प्रमुख सदस्य प्रबीर पात्रा का कहना है कि उनका विरोध उद्योगों से नहीं था और न ही आज है। उनका कहना है कि उनका संघर्ष केवल तीन फसली उपजाऊ जमीन को बचाने के लिए था और यदि फिर से ऐसी स्थिति बनती है तो वे दोबारा आंदोलन करेंगे। ———————————— ये खबर भी पढ़ें… ममता TMC के बैंक खातों से सीमित लेनदेन कर सकेंगी:हाईकोर्ट ने निगरानी के लिए विशेष अधिकारी तैनात किया, बड़े खर्च पर रोक कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस (TMC) के ममता बनर्जी गुट को पार्टी के फ्रीज किए गए तीन बैंक खातों से सीमित लेनदेन की इजाजत दे दी। हालांकि खातों से सिर्फ रोजमर्रा और कानूनी मामलों से जुड़े खर्च ही किए जा सकेंगे। पूरी खबर पढ़ें…

Nepal Youth Protest | PM Balen Shah Resignation Demand; 3 Suicides in 3 Days

Nepal Youth Protest | PM Balen Shah Resignation Demand; 3 Suicides in 3 Days

काठमांडू9 मिनट पहले कॉपी लिंक नेपाल में युवाओं की बढ़ती नाराजगी फिर से सड़कों पर दिखाई देने लगी है। पिछले तीन दिनों में तीन युवाओं ने अपने ऊपर पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह का प्रयास किया। इनमें से दो की इलाज के दौरान मौत हो गई, जबकि एक युवक गंभीर रूप से झुलसा हुआ अस्पताल में भर्ती है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ‘बालेन’ के इस्तीफे की मांग तेज हो गई है। राजधानी काठमांडू में युवा प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने सरकार पर युवाओं में उम्मीद और भरोसा जगाने में विफल रहने का आरोप लगाया है। जेन-जी नेपाल संगठन ने प्रधानमंत्री बालेन शाह पर जनविरोधी और निरंकुश तरीके से शासन चलाने का आरोप लगाया है। संगठन का कहना है कि बजट व नीतियों में युवाओं के रोजगार और आय बढ़ाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। 2023 में बालेन शाह ने आत्मदाह को सरकार की विफलता कहा था प्रदर्शनकारियों ने 9 सितंबर को संसद भवन पर कब्जे के बाद उत्पात मचाया था। उन्होंने सुरक्षाकर्मियों के हथियार भी लूट लिए थे। 2023 की वह घटना भी चर्चा में है, जब प्रेम आचार्य ने आत्मदाह किया था। उस समय काठमांडू के मेयर रहे बालेन शाह ने इसे राज्य की चरम विफलता बताया था। अब मौजूदा घटनाओं पर उनकी चुप्पी विपक्ष और प्रदर्शनकारियों के निशाने पर है। नेपाल में लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने युवाओं की मानसिक स्थिति, बेरोजगारी और सरकारी नीतियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि यदि सरकार ने जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए तो विरोध और तेज हो सकता है। GenZ प्रोटेस्ट में विरोध का चेहरा बने बालेन 2022 में मेयर बनने के बाद बालेन ने शहर की सफाई, विरासत संरक्षण और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती के कदम उठाए। अवैध निर्माण पर कार्रवाई से ट्रैफिक सुधरा, हालांकि इसका विरोध भी हुआ, खासकर सड़क किनारे दुकानदारों और झुग्गी बस्तियों के लोगों से। बालेन शाह का प्रभाव केवल प्रशासन तक सीमित नहीं रहा। पिछले साल सितंबर में हुए प्रदर्शनों के दौरान उनके गाने युवाओं के बीच गूंजते रहे। इन प्रदर्शनों में 77 लोगों की मौत हुई थी और इसके पीछे सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और धीमी अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों का गुस्सा था। प्रदर्शनकारियों ने उनके गाने ‘नेपाल हंसेको’ को एक तरह का प्रतीक बना लिया। 5 मार्च को हुए आम चुनाव में उनकी पार्टी ने बड़ी जीत हासिल की, जिससे नेपाल की पारंपरिक राजनीति को बड़ा झटका लगा। बालेन शाह ने झापा-5 सीट से पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को हराकर अपनी राजनीतिक ताकत साबित की। 35 साल की उम्र में प्रधानमंत्री पद संभालते ही वह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बन गए हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

बंगाल में 20 साल बाद टाटा की वापसी संभव:सीएम सुवेंदु खुद मामले को देख रहे; ममता के आंदोलन से बंद हुआ था प्लांट

बंगाल में 20 साल बाद टाटा की वापसी संभव:सीएम सुवेंदु खुद मामले को देख रहे; ममता के आंदोलन से बंद हुआ था प्लांट

पश्चिम बंगाल के सिंगूर में करीब दो दशक पहले टाटा की नैनो परियोजना को लेकर शुरू हुआ विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। राज्य में भाजपा सरकार बनने के बाद टाटा समूह की सिंगूर में वापसी को लेकर चर्चा तेज हो रही है। राज्य के उद्योग मंत्री तापस रॉय ने कहा कि टाटा के साथ शुरुआती स्तर पर बातचीत चल रही है। अगर टाटा ग्रुप लौटने को तैयार होता है तो सरकार वहां किसी दूसरी कंपनी को नहीं लाएगी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी खुद मामले की निगरानी कर रहे हैं। हालांकि, जिन किसानों ने 2006 में नैनो के लिए अपनी जमीन दी थी, उनके लिए यह अधूरा सपना है। टाटा के सिंगूर छोड़ने के बाद हजारों परिवार आर्थिक और मानसिक संकट से गुजरते रहे। करीब 3,600 ऐसे परिवारों को आज भी सरकार हर महीने दो हजार रुपये और 16 किलो चावल देती है, लेकिन कई परिवार अब भी उस सदमे से उबर नहीं पाए हैं। टाटा को जमीन देने के लिए तैयार हैं लोग 75 साल की अंगूर दास बताती हैं कि उनके पति ने छह बीघा जमीन परियोजना के लिए दी थी। टाटा के जाने के बाद वे गहरे सदमे में चले गए और वर्ष 2019 में उनका निधन हो गया। अंगूर दास कहती हैं कि यदि टाटा दोबारा लौटती है तो वे अपनी बची हुई जमीन भी देने को तैयार हैं। जब सिंगूर आंदोलन चल रहा था तब अनिद्य दास महज 12 साल के थे। आज 32 साल के अनिद्य को रोजगार के लिए कोलकाता जाना पड़ता है। उनका कहना है कि यदि फैक्ट्री लग गई होती तो उन्हें रोज शहर जाकर नौकरी नहीं करनी पड़ती। उनके पिता ने भी जमीन दी थी, लेकिन आज वह जमीन भी खेती के योग्य नहीं बची है। खासेरभेड़ी गांव के स्वरूप दास ने भी दो बीघा जमीन परियोजना के लिए दी थी। वे बताते हैं कि मुआवजा मिलने के बाद वे दुबई चले गए थे, जबकि उनके दोनों भाइयों का चयन टाटा ने मैकेनिकल इंजीनियरिंग प्रशिक्षण के लिए किया था। उत्तराखंड में ट्रेनिंग शुरू हो चुकी थी और नौकरी की उम्मीद भी थी, लेकिन परियोजना बंद होने के साथ सारे सपने टूट गए। उनका कहना है कि यदि आज टाटा या कोई दूसरी बड़ी कंपनी आती है तो वे फिर जमीन देने के लिए तैयार हैं। 20 साल में 15 गुना बढ़ी जमीन की कीमत भूमि अधिग्रहण के समर्थन में बनी सिंगूर शिल्प विकास समिति के अध्यक्ष डॉ. उदयन दास का कहना है कि वर्ष 2006 के बाद से जमीन की कीमतों में लगभग 15 गुना वृद्धि हो चुकी है। उनके मुताबिक सड़क किनारे की जमीन, जिसकी कीमत उस समय करीब तीन लाख रुपये प्रति बीघा थी, अब एक करोड़ रुपये प्रति बीघा तक पहुंच गई है। ऐसे में यदि टाटा दोबारा लौटती है तो केवल मुआवजे पर ही 1,300 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करना पड़ सकता है। यही वजह है कि उनकी नजर में टाटा की वापसी आसान नहीं होगी। 997 एकड़ जमीन बेकार हो रही वर्तमान में सिंगूर की वह 997 एकड़ जमीन, जहां कभी नैनो परियोजना शुरू हुई थी, बड़े हिस्से में झाड़ियों से ढकी पड़ी है। कभी यह इलाका पश्चिम बंगाल की सबसे उपजाऊ कृषि भूमि माना जाता था, जहां धान, आलू और अन्य फसलें होती थीं। लेकिन परियोजना रुकने के बाद खेती भी प्रभावित हुई और बड़ी संख्या में किसान रोजगार की तलाश में दूसरे क्षेत्रों में चले गए। हालांकि, सिंगूर में सभी लोग टाटा की वापसी के पक्ष में नहीं हैं। सिंगूर कृषि रक्षा समिति के प्रमुख सदस्य प्रबीर पात्रा का कहना है कि उनका विरोध उद्योगों से नहीं था और न ही आज है। उनका कहना है कि उनका संघर्ष केवल तीन फसली उपजाऊ जमीन को बचाने के लिए था और यदि फिर से ऐसी स्थिति बनती है तो वे दोबारा आंदोलन करेंगे। ———————————— ये खबर भी पढ़ें… ममता TMC के बैंक खातों से सीमित लेनदेन कर सकेंगी:हाईकोर्ट ने निगरानी के लिए विशेष अधिकारी तैनात किया, बड़े खर्च पर रोक कलकत्ता हाईकोर्ट ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस (TMC) के ममता बनर्जी गुट को पार्टी के फ्रीज किए गए तीन बैंक खातों से सीमित लेनदेन की इजाजत दे दी। हालांकि खातों से सिर्फ रोजमर्रा और कानूनी मामलों से जुड़े खर्च ही किए जा सकेंगे। पूरी खबर पढ़ें…

Nepal Youth Protest | PM Balen Shah Resignation Demand; 3 Suicides in 3 Days

Nepal Youth Protest | PM Balen Shah Resignation Demand; 3 Suicides in 3 Days

काठमांडू49 मिनट पहले कॉपी लिंक नेपाल में युवाओं की बढ़ती नाराजगी फिर से सड़कों पर दिखाई देने लगी है। पिछले तीन दिनों में तीन युवाओं ने अपने ऊपर पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह का प्रयास किया। इनमें से दो की इलाज के दौरान मौत हो गई, जबकि एक युवक गंभीर रूप से झुलसा हुआ अस्पताल में भर्ती है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ‘बालेन’ के इस्तीफे की मांग तेज हो गई है। राजधानी काठमांडू में युवा प्रदर्शन कर रहे हैं, वहीं विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने सरकार पर युवाओं में उम्मीद और भरोसा जगाने में विफल रहने का आरोप लगाया है। जेन-जी नेपाल संगठन ने प्रधानमंत्री बालेन शाह पर जनविरोधी और निरंकुश तरीके से शासन चलाने का आरोप लगाया है। संगठन का कहना है कि बजट व नीतियों में युवाओं के रोजगार और आय बढ़ाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए। 2023 में बालेन शाह ने आत्मदाह को सरकार की विफलता कहा था प्रदर्शनकारियों ने 9 सितंबर को संसद भवन पर कब्जे के बाद उत्पात मचाया था। उन्होंने सुरक्षाकर्मियों के हथियार भी लूट लिए थे। 2023 की वह घटना भी चर्चा में है, जब प्रेम आचार्य ने आत्मदाह किया था। उस समय काठमांडू के मेयर रहे बालेन शाह ने इसे राज्य की चरम विफलता बताया था। अब मौजूदा घटनाओं पर उनकी चुप्पी विपक्ष और प्रदर्शनकारियों के निशाने पर है। नेपाल में लगातार सामने आ रही इन घटनाओं ने युवाओं की मानसिक स्थिति, बेरोजगारी और सरकारी नीतियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का मानना है कि यदि सरकार ने जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए तो विरोध और तेज हो सकता है। GenZ प्रोटेस्ट में विरोध का चेहरा बने बालेन 2022 में मेयर बनने के बाद बालेन ने शहर की सफाई, विरासत संरक्षण और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती के कदम उठाए। अवैध निर्माण पर कार्रवाई से ट्रैफिक सुधरा, हालांकि इसका विरोध भी हुआ, खासकर सड़क किनारे दुकानदारों और झुग्गी बस्तियों के लोगों से। बालेन शाह का प्रभाव केवल प्रशासन तक सीमित नहीं रहा। पिछले साल सितंबर में हुए प्रदर्शनों के दौरान उनके गाने युवाओं के बीच गूंजते रहे। इन प्रदर्शनों में 77 लोगों की मौत हुई थी और इसके पीछे सोशल मीडिया पर प्रतिबंध, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और धीमी अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों का गुस्सा था। प्रदर्शनकारियों ने उनके गाने ‘नेपाल हंसेको’ को एक तरह का प्रतीक बना लिया। 5 मार्च को हुए आम चुनाव में उनकी पार्टी ने बड़ी जीत हासिल की, जिससे नेपाल की पारंपरिक राजनीति को बड़ा झटका लगा। बालेन शाह ने झापा-5 सीट से पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को हराकर अपनी राजनीतिक ताकत साबित की। 35 साल की उम्र में प्रधानमंत्री पद संभालते ही वह नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बन गए हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

One Room Home & 1984 Riots Factory Loss

One Room Home & 1984 Riots Factory Loss

35 मिनट पहले कॉपी लिंक कॉमेडियन राजीव ठाकुर ने हाल ही में बताया कि उनका परिवार एक कमरे के घर में रहता था, जहां बेडरूम, किचन और बाथरूम, सब कुछ उसी कमरे में था। 1984 के दंगों में उनके पिता की फैक्ट्री बर्बाद हो गई थी, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी। वैभव मुंजाल के पॉडकास्ट में राजीव अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए इमोशनल हो गए। उन्होंने कहा कि वह अपनी जिंदगी के उस दौर के बारे में ज्यादा बात करना पसंद नहीं करते क्योंकि उन दिनों की यादें आज भी उन्हें दर्द देती हैं। उन्होंने कहा, ‘मेरा सफर ऐसे हालात में शुरू हुआ, जिन्हें मैं याद भी नहीं करना चाहता। अगर आज मैं लोगों को इसके बारे में बताऊं तो उन्हें यह मनगढ़ंत लग सकता है। कई लोग कहते हैं कि अपने दर्द को स्टैंड-अप कॉमेडी में बदल दो। मैं कभी-कभी ऐसा करता हूं, लेकिन उन जोक्स को सुनाते समय भी दर्द इतना असली होता है कि मैं बैकस्टेज जाकर रो पड़ता हूं।’ राजीव ठाकुर ‘द कपिल शर्मा शो’ और ‘द ग्रेट इंडियन कपिल शो’ में नजर आए हैं। पूरा परिवार एक कमरे में रहता था राजीव ने बताया कि उनके माता-पिता की शादी के बाद परिवार की परिस्थितियां पूरी तरह बदल गई थीं। उनके मुताबिक, पिता को पुश्तैनी घर छोड़ना पड़ा और पूरा परिवार एक कमरे के मकान में रहने लगा। उन्होंने आगे कहा, ‘वही एक कमरा आपका बाथरूम है। वही कमरा किचन है। वही ड्राइंग रूम है। वही बेडरूम है। उस घर में तीन भाई-बहन हुए हैं। आप सोचो कि बाथरूम भी वही है, बेडरूम भी वही है, किचन भी वही है, तो जब कोई अंदर नहा रहा होता था या कुछ भी कर रहा होता था, तब बाकी चार लोग घर के बाहर बैठे होते थे। मुझे अपना घर पब्लिक टॉयलेट लगता था। सिर्फ 2 रुपए नहीं मिल रहे थे बाहर बैठने के।’ दंगों में पिता की फैक्ट्री बर्बाद हुई थी राजीव ने यह भी बताया कि अमृतसर में उनके पिता की धागे की फैक्ट्री थी, जो 1984 के दंगों के दौरान बर्बाद हो गई। इसके बाद पिता बेरोजगार हो गए और परिवार के सामने आर्थिक स्थिति खराब हो गई। उन्होंने कहा कि कई बार किराया देना भी मुश्किल हो जाता था। राजीव ने अपने बचपन की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए बताया कि घर में केवल 40 वॉट का एक बल्ब था। उन्होंने कहा कि उन्हें सफेद रोशनी देखने की इच्छा होती थी क्योंकि उनके घर में ट्यूबलाइट नहीं थी। उन्होंने यह भी बताया कि मकान मालिक रात 9 बजे बिजली बंद कर देता था, जिसके बाद परिवार या तो सो जाता था या मिट्टी के तेल के दीये की रोशनी में समय बिताता था। राजीव ठाकुर ने चर्चित वेब सीरीज आईसी 814: द कंधार हाईजैक में भी काम किया था। राजीव ठाकुर ने मुंबई आने से पहले अमृतसर में कपिल शर्मा और चंदन प्रभाकर के साथ अपने कॉमेडी सफर की शुरुआत की थी। उन्होंने साल 2007 में ‘द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज’ (सीजन 3) में भाग लिया था। इस सीजन के विनर कपिल शर्मा बने थे। राजीव ठाकुर ने ‘कॉमेडी सर्कस’ और ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ जैसे कई अन्य टेलीविजन शोज में काम किया। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

One Room Home & 1984 Riots Factory Loss

One Room Home & 1984 Riots Factory Loss

37 मिनट पहले कॉपी लिंक कॉमेडियन राजीव ठाकुर ने हाल ही में बताया कि उनका परिवार एक कमरे के घर में रहता था, जहां बेडरूम, किचन और बाथरूम, सब कुछ उसी कमरे में था। 1984 के दंगों में उनके पिता की फैक्ट्री बर्बाद हो गई थी, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी। वैभव मुंजाल के पॉडकास्ट में राजीव अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए इमोशनल हो गए। उन्होंने कहा कि वह अपनी जिंदगी के उस दौर के बारे में ज्यादा बात करना पसंद नहीं करते क्योंकि उन दिनों की यादें आज भी उन्हें दर्द देती हैं। उन्होंने कहा, ‘मेरा सफर ऐसे हालात में शुरू हुआ, जिन्हें मैं याद भी नहीं करना चाहता। अगर आज मैं लोगों को इसके बारे में बताऊं तो उन्हें यह मनगढ़ंत लग सकता है। कई लोग कहते हैं कि अपने दर्द को स्टैंड-अप कॉमेडी में बदल दो। मैं कभी-कभी ऐसा करता हूं, लेकिन उन जोक्स को सुनाते समय भी दर्द इतना असली होता है कि मैं बैकस्टेज जाकर रो पड़ता हूं।’ राजीव ठाकुर ‘द कपिल शर्मा शो’ और ‘द ग्रेट इंडियन कपिल शो’ में नजर आए हैं। पूरा परिवार एक कमरे में रहता था राजीव ने बताया कि उनके माता-पिता की शादी के बाद परिवार की परिस्थितियां पूरी तरह बदल गई थीं। उनके मुताबिक, पिता को पुश्तैनी घर छोड़ना पड़ा और पूरा परिवार एक कमरे के मकान में रहने लगा। उन्होंने आगे कहा, ‘वही एक कमरा आपका बाथरूम है। वही कमरा किचन है। वही ड्राइंग रूम है। वही बेडरूम है। उस घर में तीन भाई-बहन हुए हैं। आप सोचो कि बाथरूम भी वही है, बेडरूम भी वही है, किचन भी वही है, तो जब कोई अंदर नहा रहा होता था या कुछ भी कर रहा होता था, तब बाकी चार लोग घर के बाहर बैठे होते थे। मुझे अपना घर पब्लिक टॉयलेट लगता था। सिर्फ 2 रुपए नहीं मिल रहे थे बाहर बैठने के।’ दंगों में पिता की फैक्ट्री बर्बाद हुई थी राजीव ने यह भी बताया कि अमृतसर में उनके पिता की धागे की फैक्ट्री थी, जो 1984 के दंगों के दौरान बर्बाद हो गई। इसके बाद पिता बेरोजगार हो गए और परिवार के सामने आर्थिक स्थिति खराब हो गई। उन्होंने कहा कि कई बार किराया देना भी मुश्किल हो जाता था। राजीव ने अपने बचपन की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए बताया कि घर में केवल 40 वॉट का एक बल्ब था। उन्होंने कहा कि उन्हें सफेद रोशनी देखने की इच्छा होती थी क्योंकि उनके घर में ट्यूबलाइट नहीं थी। उन्होंने यह भी बताया कि मकान मालिक रात 9 बजे बिजली बंद कर देता था, जिसके बाद परिवार या तो सो जाता था या मिट्टी के तेल के दीये की रोशनी में समय बिताता था। राजीव ठाकुर ने चर्चित वेब सीरीज आईसी 814: द कंधार हाईजैक में भी काम किया था। राजीव ठाकुर ने मुंबई आने से पहले अमृतसर में कपिल शर्मा और चंदन प्रभाकर के साथ अपने कॉमेडी सफर की शुरुआत की थी। उन्होंने साल 2007 में ‘द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज’ (सीजन 3) में भाग लिया था। इस सीजन के विनर कपिल शर्मा बने थे। राजीव ठाकुर ने ‘कॉमेडी सर्कस’ और ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ जैसे कई अन्य टेलीविजन शोज में काम किया। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

दिलजीत की फिल्म सतलुज पूरी तरह बैन:ZEE5 ग्लोबल कैटेगरी से भी हटाई, सेंट्रल कमेटी ने रिपोर्ट सौंपी; अब आगे क्या? जानिए सवाल-जवाब में सबकुछ

दिलजीत की फिल्म सतलुज पूरी तरह बैन:ZEE5 ग्लोबल कैटेगरी से भी हटाई, सेंट्रल कमेटी ने रिपोर्ट सौंपी; अब आगे क्या? जानिए सवाल-जवाब में सबकुछ

पंजाबी एक्टर और सिंगर दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज अब पूरी तरह बैन हो गई है। इसे OTT प्लेटफॉर्म ZEE5 की ग्लोबल कैटेगरी से भी हटा दिया गया है। इस फिल्म को अब विदेश में भी नहीं देखा जा सकेगा। इसी के साथ फिल्म के कंटेंट की जांच के लिए गठित केंद्रीय समिति ने भी सिफारिश कर दी है कि फिल्म को बैन ही रहने दिया जाए। क्योंकि, फिल्म भारत की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ है। सरकारी सूत्रों से हवाले से यह जानकारी शनिवार को न्यूज एजेंसी PTI ने दी। सूत्रों के अनुसार, समिति ने इस बात पर जोर दिया कि IT अधिनियम की धारा 69A के तहत फिल्म पर प्रतिबंध लगाना उचित था। इसमें पाया गया कि फिल्म की कहानी संतुलित नहीं है, क्योंकि यह उग्रवादियों के कृत्यों को छिपाती है। जबकि, उग्रवाद के दौरान पंजाब में सुरक्षा बलों की ओर से की गई ज्यादतियों को उजागर करती है। यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन को दर्शाती है, जिन्होंने 1984 और 1994 के बीच पंजाब में हजारों अज्ञात शवों के दाह संस्कार की जांच की थी। 1995 में पंजाब पुलिस ने उनका अपहरण कर हत्या कर दी थी। सुरक्षा संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 3 जुलाई को रिलीज होने के 2 दिन बाद ही इस फिल्म को भारत में ZEE5 से हटा दिया था। इसके बाद मंत्रालय ने फिल्म की विस्तृत जांच के लिए सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 के तहत एक अंतर-विभागीय समिति (आईडीसी) का गठन किया था। उसी समिति ने इसे बैन रखने की सिफारिश की है। पंजाब में यह मुद्दा राजनीतिक रंग ले चुका है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने प्रतिबंध हटाने की मांग की है और शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने राज्य भर में फिल्म प्रदर्शित करने की घोषणा की है। ऐसा क्या है इस फिल्म में, जो इस बैन किया जा रहा है, क्या यह फिल्म फिर से रिलीज होगी? सवाल-जवाब में जानते हैं सभी सवालों के जवाब। इस फिल्म में ऐसा क्या है, जिससे इसे बैन किया गया? यह फिल्म प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और संघर्ष पर आधारित है। फिल्म में खालड़ा का रोल दिलजीत दोसांझ ने निभाया है। इसमें खालड़ा द्वारा 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में उग्रवाद के दौर में पुलिस की ओर से लावारिस बताकर जलाए गए सिखों के शवों की खोज और उनके दस्तावेजीकरण की कहानी को दर्शाया गया है। फिल्म दिखाती है कि खालड़ा ने अमृतसर और तरनतारन के श्मशान घाटों से नगर निगम के रिकॉर्ड हासिल किए, जिससे साबित हुआ कि पुलिस ने हजारों युवाओं को अवैध हिरासत में लेकर मार डाला। इस दौरान साहस दिखाकर राज्य के सिस्टम के सामने खालड़ा खड़े रहे। दुनिया के सामने सच लाने के बाद सितंबर 1995 में पंजाब पुलिस ने खालड़ा की भी हत्या कर दी। फिल्म की किन चीजों पर विवाद हुआ? बैन पर राजनीतिक हुई, पार्टियों ने क्या-क्या कहा? शिरोमणि अकाली दल (SAD) SAD अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने इस बैन को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया। उन्होंने लिखा, “यह केवल सेंसरशिप नहीं है, बल्कि हमारी सामूहिक स्मृति, सच्चाई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक हमला है। पंजाब अपने अतीत का ईमानदारी से सामना करने का हकदार है, दमन से नहीं।” अकाली दल ने घोषणा की कि सरकार के इस बैन को चुनौती देने के लिए पंजाब के हर गांव और गुरुद्वारों में इस फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग करेंगे, ताकि युवा अपनी पहचान और इतिहास को जान सकें। कांग्रेस वरिष्ठ नेता व विधायक सुखपाल सिंह खैरा ने केंद्र सरकार के इस कदम की निंदा की। उन्होंने कहा कि खालड़ा के अपहरण और पुलिस बर्बरता के सच को दिखाने वाली फिल्म को रोकना अन्यायपूर्ण है। पार्टी के अन्य नेताओं ने आरोप लगाया कि जब द कश्मीर फाइल्स और द केरल स्टोरी जैसी संवेदनशील नैरेटिव वाली फिल्मों को बिना किसी बाधा के अनुमति मिल सकती है, तो तथ्यों और अदालती फैसलों पर आधारित सतलुज पर प्रतिबंध लगाना केंद्र सरकार के दोहरे मापदंड को दर्शाता है। आम आदमी पार्टी (AAP) पंजाब की सत्ताधारी AAP ने भी फिल्म को ZEE5 से हटाने के फैसले की आलोचना की। पार्टी प्रवक्ताओं ने मांग की कि फिल्म को तुरंत बहाल किया जाना चाहिए, क्योंकि नई पीढ़ी के लिए राज्य के इस दर्दनाक और ऐतिहासिक सच को समझना बेहद जरूरी है। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) सिख धार्मिक मामलों की सर्वोच्च संस्था SGPC ने फिल्म का पूरी तरह समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा का बलिदान सिख कौम के लिए सर्वोच्च है और फिल्म के माध्यम से उनकी आवाज को दबाने की कोशिशें कभी कामयाब नहीं होंगी। भारतीय जनता पार्टी (BJP) केंद्रीय राज्यमंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने फिल्म की टाइमिंग और उसके नैरेटिव पर सवाल उठाए। बीजेपी का तर्क है कि चुनाव या संवेदनशील समय में ऐसी फिल्में पंजाब में दोबारा अशांति फैला सकती हैं। केंद्र ने फिल्म के खिलाफ क्या कहा? फिल्म रिलीज के बाद केंद्र सरकार ने क्या किया? 1. IT एक्ट की धारा 69A का उपयोग कर फिल्म तुरंत हटवाई फिल्म के रिलीज होने के ठीक 48 घंटे के भीतर केंद्र सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने IT एक्ट की धारा 69A और IT नियम, 2021 के तहत प्राप्त आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल किया। सरकार ने सुरक्षा चिंताओं और सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने का हवाला देते हुए ZEE5 को तुरंत इस फिल्म को भारत में अपने प्लेटफॉर्म से हटाने का लिखित निर्देश जारी किया। 2. हाई-लेवल स्पेशल कमेटी का गठन फिल्म को केवल हटाने तक ही केंद्र नहीं रुका। इसके कंटेंट की गहराई से जांच करने के लिए केंद्र सरकार ने IT नियम 2021 के नियम 14 के तहत एक उच्च स्तरीय अंतर-विभागीय समिति बनाई। इस विशेष समिति को फिल्म के दृश्यों, नैरेटिव और उसके संभावित सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों की समीक्षा कर सरकार को अंतिम सिफारिश सौंपने का जिम्मा दिया गया। 3. CBFC के नियमों का कड़ाई से पालन करने की हिदायत केंद्र सरकार ने साफ किया कि कोई भी फिल्म प्रोड्यूसर सेंसर बोर्ड (CBFC) के सर्टिफिकेशन प्रोसेस को बायपास कर सीधे ओटीटी पर ऐसी संवेदनशील फिल्में रिलीज नहीं कर सकता। सरकार ने रुख अपनाया कि यदि फिल्म को दोबारा भारत में स्ट्रीम

हरियाणवी गाने भोला-भोली की रील पर विवाद:गंगा में प्रदीप बूरा ने पत्नी पूजा हुड्‌डा को उठाया; यूजर बोला- इन पर इमरान हाशमी सूट करेगा

हरियाणवी गाने भोला-भोली की रील पर विवाद:गंगा में प्रदीप बूरा ने पत्नी पूजा हुड्‌डा को उठाया; यूजर बोला- इन पर इमरान हाशमी सूट करेगा

हरियाणवी म्यूजिक इंडस्ट्री के कलाकार पूजा हुड्डा और प्रदीप बूरा का नया गाना ‘भोला भोली’ रिलीज होते ही विवादों में घिर गया है। हरिद्वार की हर की पौड़ी पर शूट की गई एक रील को लेकर सोशल मीडिया पर दोनों को जमकर ट्रोल किया जा रहा है। रील में गंगा नदी में प्रदीप बूरा अपनी पत्नी पूजा हुड्डा को गोद में उठाए नजर आ रहे हैं। बैकग्राउंड में गाना बज रहा है, ‘एक घाट पै भोली खड़ी अर एक घाट पै भोला, अरदास करै मां गंगा तै म्हारा मेल करा दे तौला।’ दोनों के भीगे कपड़ों और धार्मिक स्थल पर फिल्माए गए इस दृश्य पर कुछ लोगों ने आपत्ति जताते हुए इसे धार्मिक आस्था और हर की पौड़ी की गरिमा के खिलाफ बताया है। एक यूजर ने लिखा कि इन पर भोले बाबा नहीं, इमरान हाशमी सूट करेगा। विवाद बढ़ने के बाद प्रदीप बूरा ने दैनिक भास्कर से बातचीत में अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ पति-पत्नी के प्रेम पर आधारित म्यूजिक वीडियो का हिस्सा है और इसमें कुछ भी अश्लील नहीं है। 6 जुलाई को रिलीज हुआ था गाना पूजा हुड्डा और प्रदीप बूरा का नया गाना ‘भोला भोली’ 6 जुलाई को रिलीज हुआ था। इसकी शूटिंग हरिद्वार और ऋषिकेश के अलग-अलग धार्मिक व पर्यटन स्थलों पर की गई थी। पूरी शूटिंग करीब दो दिन में पूरी हुई। यूट्यूब पर इस गाने को अब तक करीब ढाई करोड़ बार देखा और सुना जा चुका है। गाने के प्रमोशन के लिए पूजा हुड्डा और प्रदीप बूरा ने हरिद्वार में कई रील भी बनाई थीं। यूजर ने लिखा- ऐसी चीजें शोभा नहीं देतीं इन रील्स पर यूजर अलग-अलग तरह के कमेंट कर रहे हैं। कुछ लोगों ने लिखा कि आस्था के केंद्र हरिद्वार जैसे पवित्र स्थान पर गंगा नदी में इस तरह अश्लील हरकत करना गलत है। एक यूजर ने कहा, “आप जैसे बड़े कलाकारों से ऐसी उम्मीद नहीं थी।” वहीं दूसरे ने लिखा, “भोले बाबा के नाम पर इस तरह का कंटेंट शोभा नहीं देता।” कुछ यूजर्स ने इसे “बेशर्मी” करार दिया, जबकि कई ने कहा कि “आप अच्छे कलाकार हैं, आपको ऐसी चीजें शोभा नहीं देतीं।” महिला बोली- ऐसे कलाकारों का विरोध करना चाहिए विवाद के बीच सोशल मीडिया पर एक महिला का वीडियो भी वायरल हुआ। महिला ने कहा कि जो लोग पहले मासूम शर्मा का विरोध करते थे, उन्हें अब पूजा हुड्डा और प्रदीप बूरा के वीडियो पर भी बोलना चाहिए। आखिर कौन सा भोला और कौन सी भोली कांवड़ यात्रा के दौरान इस तरह का व्यवहार करेंगे। महिला ने आरोप लगाया कि मासूम शर्मा पर अक्सर बदमाशी को बढ़ावा देने वाले गाने बनाने के आरोप लगाए जाते थे, लेकिन उन्होंने कभी किसी धार्मिक स्थल पर इस तरह का वीडियो नहीं बनाया। उसने पूजा हुड्डा की ड्रेसिंग पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह का कंटेंट समाज में गलत संदेश देता है। जो कलाकार धार्मिक स्थलों पर इस तरह का कंटेंट बनाते हैं, उनका विरोध किया जाना चाहिए। प्रदीप बूरा बोले- हमारी रील में कुछ भी अश्लील नहीं विवाद पर प्रदीप बूरा ने कहा, “अगर लोगों को उस रील में वल्गर कंटेंट नजर आ रहा है, तो फिर भी वे उसे देख रहे हैं। हमने उस वीडियो में कोई आपत्तिजनक कपड़े नहीं पहने हैं। भोले और पार्वती की भी लव मैरिज हुई थी। लोग हरिद्वार जाकर शराब पीते हैं, लेकिन हमारी रील में ऐसा कुछ भी नहीं है। हमने सिर्फ पति-पत्नी के प्यार को दिखाया है, जो भोले और पार्वती के रूप में दर्शाया गया है। हमारी रील देखकर किसी पर कोई गलत प्रभाव नहीं पड़ रहा।”

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