Wednesday, 10 Jun 2026 | 07:55 AM

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अमेरिका ने ईरान पर हवाई हमले किए:हेलिकॉप्टर गिराने के बदले में अटैक; तेहरान बोला- हर हमले का जवाब देंगे

अमेरिका ने ईरान पर हवाई हमले किए:हेलिकॉप्टर गिराने के बदले में अटैक; तेहरान बोला- हर हमले का जवाब देंगे

अमेरिकी सेना ने मंगलवार रात ईरान पर हवाई हमले किए हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने कहा कि सेना ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की है। सेंटकॉम के मुताबिक, यह हमला होर्मुज स्ट्रेट के पास अमेरिकी सेना के अपाचे हेलिकॉप्टर को गिराए जाने के जवाब में किया गया। इससे पहले ट्रम्प ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि होर्मुज स्ट्रेट के ऊपर गश्त कर रहे अमेरिकी AH-64 अपाचे हेलिकॉप्टर को ईरान ने मार गिराया। हालांकि उन्होंने कहा कि हेलिकॉप्टर में सवार दोनों पायलट सुरक्षित हैं और उन्हें कोई चोट नहीं आई। ट्रम्प ने लिखा था, “अमेरिका को इस हमले का जवाब देना ही होगा।” उधर, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी कार्रवाई पर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, “ईरानी सेना किसी भी हमले या धमकी को बिना जवाब नहीं छोड़ेंगे।” अराघची ने अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा, “अगर सुरक्षित रहना चाहते हैं तो हमारा क्षेत्र छोड़ दें। फारस की खाड़ी का इतिहास बाहरी ताकतों के बुरे अंजामों से भरा है।” हेलिकॉप्टर हादसे को लेकर अलग-अलग रिपोर्टें सामने आई हैं। एक अमेरिकी अधिकारी के मुताबिक, अपाचे हेलिकॉप्टर एक ईरानी ड्रोन से टकराने के बाद दुर्घटनाग्रस्त हुआ था। फिलहाल यह साफ नहीं है कि यह टक्कर जानबूझकर कराई गई थी या हादसा थी। मामले की जांच जारी है। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…

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2030 तक खत्म हो जाएगा अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन का सफर:नासा प्रशांत महासागर में गिराएगी मलबा, 9500 करोड़ रुपए का आएगा खर्च

2030 तक खत्म हो जाएगा अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन का सफर:नासा प्रशांत महासागर में गिराएगी मलबा, 9500 करोड़ रुपए का आएगा खर्च

पृथ्वी से करीब 400 किलोमीटर ऊपर पिछले 25 वर्षों से मानवता की सबसे बड़ी अंतरिक्ष प्रयोगशाला के रूप में काम कर रहा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। नासा ने 2028 से शुरू करके 2030 तक इसे सुरक्षित तरीके से धरती पर गिराने की अपनी योजना को सार्वजनिक किया है। इसके लिए नासा ने 1 अरब डॉलर (करीब 9500 करोड़ रुपए) का प्लान तैयार किया है। आईएसएस निर्धारित उम्र पूरी कर चुका है। इसका कार्यकाल कई बार बढ़ चुका है। पिछले कुछ सालों से इसमें लगातार तकनीकी खामियां आ रही हैं। स्टेशन को सुरक्षित बनाए रखने पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं। नासा अब अपने संसाधनों को चंद्रमा और मंगल मिशनों पर केंद्रित करना चाहता है। इसलिए आईएसएस को सम्मानजनक और सुरक्षित तरीके से रिटायर करने का फैसला लिया गया है। कैसे होगा अंतरिक्ष स्टेशन का अंत? करीब 4.5 लाख किलोग्राम वजनी आईएसएस को यूं ही पृथ्वी की ओर गिरने नहीं दिया जाएगा। 2028 के आसपास स्टेशन को कक्षा में बनाए रखने की प्रक्रिया धीरे-धीरे बंद कर दी जाएगी। विशेष अंतरिक्ष यान से उसे नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में धकेला जाएगा। वायुमंडल में प्रवेश करते ही स्टेशन का अधिकांश हिस्सा घर्षण से जलकर नष्ट हो जाएगा। हालांकि, इसके बाद भी स्पेस के बड़े टुकड़े पृथ्वी पर आबादी वाले क्षेत्रों में गिर सकते हैं। इसलिए नासा ने प्रशांत महासागर के एक दूरस्थ क्षेत्र को चुना है ताकि वायुमंडल में जलने के बाद बचा हुआ मलबा इसी सुनसान समुद्री क्षेत्र में गिरे। NASA के अनुसार, ISS को दक्षिण प्रशांत महासागर के क्षेत्र में क्रैश किया जाएगा। इस जगह का नाम पॉइंट नीमो है। यह जगह वैश्विक स्तर पर खास अंतरिक्ष के पुराने स्पेस स्टेशन, सैटेलाइट और दूसरे कचरे को डिस्पोज करने के लिए चुनी गई है। पॉइंट नीमो के आस पास किसी भी जहाज के जाने पर बैन है। यहां इंसानों के रहने के लिए कोई जगह नहीं है। साल 1971 से लेकर अब तक तकरीबन 300 तरह के अंतरिक्षीय कचरे को यहां गिराया गया है। इसमें अधिकतर अमेरिकी और रूसी कचरा शामिल है। 19 देशों के अंतरिक्ष यात्री ISS का दौरा कर चुके ISS में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सभी सुविधाएं मौजूद हैं। यहां 6 से 8 लोग 6 महीने तक रह सकते हैं। इस पर पृथ्वी से उड़ान भरने वाले बड़े-बड़े अंतरिक्ष यान उतारे जाते हैं। अब तक 19 देशों के 250 से ज्यादा अंतरिक्ष यात्रियों ने ISS का दौरा किया है। आईएसएस की जगह अब प्राइवेट स्पेस स्टेशन नासा के नेतृत्व में कई निजी कंपनियां अपने अंतरिक्ष स्टेशन बना रही हैं। इनमें वोस्ट कंपनी का हेवन-2, एक्सिओम का स्पेस स्टेशन, और ब्लू ओरिजिन का ऑर्बिट रीफ प्रमुख हैं। चीन पहले ही अपना स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में स्थापित कर चुका है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भी 2035 तक खुद का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है। ——————– ISS से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में हवा का रिसाव:नासा ने एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस क्राफ्ट में छिपने को कहा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) में हवा का रिसाव बढ़ने के बाद नासा ने तुरंत एक्शन लिया और एस्ट्रोनॉट्स को स्पेसक्राफ्ट में छिपने और सुरक्षित निकलने (इवैक्युएशन) के लिए तैयार रहने का आदेश दिया। हालांकि, करीब दो घंटे की मशक्कत और जांच के बाद स्थिति नियंत्रण में देखकर इस आदेश को वापस ले लिया गया। पूरी खबर पढ़ें…

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2030 तक खत्म हो जाएगा अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन का सफर:नासा प्रशांत महासागर में गिराएगी मलबा, 9500 करोड़ रुपए का आएगा खर्च

2030 तक खत्म हो जाएगा अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन का सफर:नासा प्रशांत महासागर में गिराएगी मलबा, 9500 करोड़ रुपए का आएगा खर्च

पृथ्वी से करीब 400 किलोमीटर ऊपर पिछले 25 वर्षों से मानवता की सबसे बड़ी अंतरिक्ष प्रयोगशाला के रूप में काम कर रहा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (आईएसएस) अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। नासा ने 2028 से शुरू करके 2030 तक इसे सुरक्षित तरीके से धरती पर गिराने की अपनी योजना को सार्वजनिक किया है। इसके लिए नासा ने 1 अरब डॉलर (करीब 9500 करोड़ रुपए) का प्लान तैयार किया है। आईएसएस निर्धारित उम्र पूरी कर चुका है। इसका कार्यकाल कई बार बढ़ चुका है। पिछले कुछ सालों से इसमें लगातार तकनीकी खामियां आ रही हैं। स्टेशन को सुरक्षित बनाए रखने पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं। नासा अब अपने संसाधनों को चंद्रमा और मंगल मिशनों पर केंद्रित करना चाहता है। इसलिए आईएसएस को सम्मानजनक और सुरक्षित तरीके से रिटायर करने का फैसला लिया गया है। कैसे होगा अंतरिक्ष स्टेशन का अंत? करीब 4.5 लाख किलोग्राम वजनी आईएसएस को यूं ही पृथ्वी की ओर गिरने नहीं दिया जाएगा। 2028 के आसपास स्टेशन को कक्षा में बनाए रखने की प्रक्रिया धीरे-धीरे बंद कर दी जाएगी। विशेष अंतरिक्ष यान से उसे नियंत्रित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में धकेला जाएगा। वायुमंडल में प्रवेश करते ही स्टेशन का अधिकांश हिस्सा घर्षण से जलकर नष्ट हो जाएगा। हालांकि, इसके बाद भी स्पेस के बड़े टुकड़े पृथ्वी पर आबादी वाले क्षेत्रों में गिर सकते हैं। इसलिए नासा ने प्रशांत महासागर के एक दूरस्थ क्षेत्र को चुना है ताकि वायुमंडल में जलने के बाद बचा हुआ मलबा इसी सुनसान समुद्री क्षेत्र में गिरे। NASA के अनुसार, ISS को दक्षिण प्रशांत महासागर के क्षेत्र में क्रैश किया जाएगा। इस जगह का नाम पॉइंट नीमो है। यह जगह वैश्विक स्तर पर खास अंतरिक्ष के पुराने स्पेस स्टेशन, सैटेलाइट और दूसरे कचरे को डिस्पोज करने के लिए चुनी गई है। पॉइंट नीमो के आस पास किसी भी जहाज के जाने पर बैन है। यहां इंसानों के रहने के लिए कोई जगह नहीं है। साल 1971 से लेकर अब तक तकरीबन 300 तरह के अंतरिक्षीय कचरे को यहां गिराया गया है। इसमें अधिकतर अमेरिकी और रूसी कचरा शामिल है। 19 देशों के अंतरिक्ष यात्री ISS का दौरा कर चुके ISS में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए सभी सुविधाएं मौजूद हैं। यहां 6 से 8 लोग 6 महीने तक रह सकते हैं। इस पर पृथ्वी से उड़ान भरने वाले बड़े-बड़े अंतरिक्ष यान उतारे जाते हैं। अब तक 19 देशों के 250 से ज्यादा अंतरिक्ष यात्रियों ने ISS का दौरा किया है। आईएसएस की जगह अब प्राइवेट स्पेस स्टेशन नासा के नेतृत्व में कई निजी कंपनियां अपने अंतरिक्ष स्टेशन बना रही हैं। इनमें वोस्ट कंपनी का हेवन-2, एक्सिओम का स्पेस स्टेशन, और ब्लू ओरिजिन का ऑर्बिट रीफ प्रमुख हैं। चीन पहले ही अपना स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में स्थापित कर चुका है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भी 2035 तक खुद का अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है। ——————– ISS से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में हवा का रिसाव:नासा ने एस्ट्रोनॉट्स को स्पेस क्राफ्ट में छिपने को कहा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) में हवा का रिसाव बढ़ने के बाद नासा ने तुरंत एक्शन लिया और एस्ट्रोनॉट्स को स्पेसक्राफ्ट में छिपने और सुरक्षित निकलने (इवैक्युएशन) के लिए तैयार रहने का आदेश दिया। हालांकि, करीब दो घंटे की मशक्कत और जांच के बाद स्थिति नियंत्रण में देखकर इस आदेश को वापस ले लिया गया। पूरी खबर पढ़ें…

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US Football World Cup 2026 Discrimination Claims

US Football World Cup 2026 Discrimination Claims

वॉशिंगटन9 मिनट पहले कॉपी लिंक सेनेगल, उज्बेकिस्तान और सोमालिया की फुटबॉल टीम की अमेरिका के एयरपोर्ट पर कड़ी जांच की गई। FIFA वर्ल्ड कप 2026 से पहले अमेरिका पर भेदभाव के आरोप लग रहे हैं। विवाद तब बढ़ा, जब सेनेगल, उज्बेकिस्तान और सोमालिया से जुड़े खिलाड़ियों व अधिकारियों की रनवे पर ही कड़ी जांच की गई। कुछ मामलों में डॉग स्क्वॉड भी बुलाया गया। इन घटनाओं के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं। लोगों ने सवाल उठाए हैं कि खिलाड़ियों और खेल अधिकारियों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है। विवाद उस समय और बढ़ गया, जब सोमालिया के रेफरी उमर आर्टन को वैध अमेरिकी वीजा होने के बावजूद मियामी एयरपोर्ट से वापस भेज दिया गया। आर्टन वर्ल्ड कप में रेफरी की जिम्मेदारी निभाने वाले पहले सोमाली अधिकारी बनने वाले थे। अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि अतिरिक्त जांच के बाद उन्हें प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई, लेकिन इसकी वजह नहीं बताई। इस फैसले पर सोमालिया के खेल मंत्रालय ने नाराजगी जताई है और इसे खेल भावना के खिलाफ बताया है। सोशल मीडिया पर वायरल 2 वीडियो एयरपोर्ट पर सेनेगल की नेशनल टीम के खिलाड़ियों और अधिकारियों की चेकिंग करते नजर आई अमेरिकी सिक्योरिटी टीम। नीदरलैंड्स के खिलाफ मैच से पहले उज्बेकिस्तान टीम को अमेरिका में कड़ी सुरक्षा का सामना करना पड़ा। टीम की स्निफर डॉग्स से भी तलाशी ली गई। यूजर्स बोले- फीफा चुप क्यों है कई यूजर्स ने फीफा पर भी आरोप लगाया कि विश्व फुटबॉल की सर्वोच्च संस्था फीफा उन देशों के खिलाड़ियों के साथ हुए अपमानजनक व्यवहार पर चुप है। जांच से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि क्या यह व्यवहार सभी टीमों के साथ समान था। एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा- क्या किसी श्वेत टीम के साथ भी ऐसा हुआ, या यह व्यवहार केवल सेनेगल के लिए था? यह अजीब है। ईरानी फुटबॉल संघ से रिजर्व टिकट वापस लिए ईरान के फुटबॉल महासंघ (FFIRI) ने आरोप लगाया कि फीफा विश्व कप के लिए उसके लिए रिजर्व टिकटों का हिस्सा वापस ले लिया गया।इससे उन ईरानी प्रशंसकों को बड़ा झटका लगा है जिन्होंने पहले ही यात्रा की बुकिंग कर ली थी, लेकिन अब वे अपनी टीम के मैच नहीं देख पाएंगे। ईरान का पहला मुकाबला न्यूजीलैंड के खिलाफ 16 जून को होगा। इसके बाद टीम 22 जून को बेल्जियम और 27 जून को इजिप्ट से भिड़ेगी। ईरानी महासंघ ने कहा- ईरानी समर्थकों को टिकट कोटे से वंचित करना खेल भावना और समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। ईरान की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम मैक्सिको पहुंची, जहां वह वर्ल्डकप के दौरान रुकेगी। हालांकि, टीम अपने सभी मैच अमेरिका में खेलेगी। फीफा वर्ल्डकप 11 जून से 19 जुलाई तक होगा फीफा वर्ल्डकप 11 जून से 19 जुलाई तक अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको की संयुक्त मेजबानी में खेला जाएगा। इस टूर्नामेंट में 48 टीमें हिस्सा लेंगी और 104 मैच खेले जाएंगे। ————— ये खबर भी पढ़ें…. भारत में जी एंटरटेनमेंट पर दिखेगा फीफा वर्ल्ड कप:टीवी पर ‘यूनाइट8 स्पोर्ट्स’ और जी5 एप पर लाइव स्ट्रीमिंग होगी भारत में फीफा वर्ल्ड कप 2026 टीवी पर ‘यूनाइट 8 स्पोर्ट्स’ और जी5 (Zee5) एप पर देख सकेंगे। जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेस लिमिटेड (ZEEL) ने वर्ल्ड कप 2026 और इसके आगामी एडिशन को भी ऑफिशियल ब्रॉडकास्ट करेगा। यूनाइट 8 स्पोर्ट्स कंपनी का नया स्पोर्ट्स चैनल है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

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अमेरिका में साइबर फ्रॉड 4 गुना तक बढ़ा‎:ग्राहकों को ठगी से बचाने के लिए ‎मनोवैज्ञानिकों का सहारा ले रहे बैंक‎

अमेरिका में साइबर फ्रॉड 4 गुना तक बढ़ा‎:ग्राहकों को ठगी से बचाने के लिए ‎मनोवैज्ञानिकों का सहारा ले रहे बैंक‎

अमेरिका में साइबर ठगी के बढ़ते मामलों ने‎ बैंकों की चिंता बढ़ा दी है। ठगी के मामलों में ‎तेजी आने के बाद कुछ बैंक अब तकनीक के‎ साथ मनोवैज्ञानिक तरीकों का भी सहारा ले रहे हैं। अमेरिका के सबसे बड़े बैंक जेपी मोर्गन ने‎इसी उद्देश्य से व्यवहार साइंटिस्ट की नियुक्ति ‎की है। अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई के‎ इंटरनेट क्राइम कंप्लेंट सेंटर के अनुसार 2025‎ में साइबर अपराधों से लोगों को 2 लाख करोड़ ‎रुपए से अधिक का नुकसान हुआ। यह 2024‎ की तुलना में 25% ज्यादा और 2020 के 42‎ हजार करोड़ रुपए से करीब चार गुना है।‎ जेपी मॉर्गन ने दो वर्ष पहले व्यवहार साइंटिस्ट‎ एलिजाबेथ हपर्ट को नियुक्त किया था। उनका‎ काम कॉल सेंटर और बैंक शाखाओं के‎ कर्मचारियों को यह समझाना है कि ठग किस ‎तरह लोगों का भरोसा जीतते हैं और उन्हें बैंक ‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎‎की सलाह पर संदेह करने के लिए तैयार करते ‎हैं। कई मामलों में ठग महीनों तक अपने शिकार‎ से संपर्क बनाए रखते हैं और फिर उनसे खुद ही ‎पैसे ट्रांसफर करवाते हैं। बैंक अब संदिग्ध‎ मामलों में ग्राहकों से सीधे संपर्क कर रहे हैं।‎ स्कैम विशेषज्ञ सवाल पूछकर और संदेह के‎ आधार पर ग्राहकों को ठगी के जाल से बाहर‎ निकालने की कोशिश करते हैं। बैंक पासवर्ड दर्ज‎ करते समय असामान्य रुकावट, हिचकिचाहट या ‎किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्क्रीन साझा करना‎ संभावित धोखाधड़ी के संकेत मान रहे हैं।‎

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नॉर्वे में बन रहा यूरोप का सबसे बड़ा एआई डेटासेंटर:माइक्रोसॉफ्ट और ओपनएआई करेंगे इस्तेमाल; ठंडे मौसम और सस्ती बिजली के कारण चुनी गई जगह

नॉर्वे में बन रहा यूरोप का सबसे बड़ा एआई डेटासेंटर:माइक्रोसॉफ्ट और ओपनएआई करेंगे इस्तेमाल; ठंडे मौसम और सस्ती बिजली के कारण चुनी गई जगह

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की बढ़ती मांग से दुनिया भर में डेटा सेंटर्स की होड़ है। इसी कड़ी में ब्रिटिश स्टार्टअप ‘Nscale’ नॉर्वे के नारविक में एक विशाल डेटा सेंटर बना रहा है। आर्कटिक सर्कल के पास बन रहा यह प्रोजेक्ट यूरोप के सबसे बड़े एआई डेटा सेंटर्स में से एक होगा। लोकेशन का फायदा नारविक में कड़ाके की ठंड होती है, जो डेटा सेंटर की गर्म चिप्स को नेचुरली ठंडा रखने में मदद करेगी। जून-जुलाई यहां का सबसे गर्म महीना होता है, तब भी अधिकतम तापमान 15 से 17 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है। सर्दियों में औसत तापमान -4 से -6 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। सस्ती बिजली नॉर्वे में हाइड्रोपावर से भरपूर और सस्ती ऊर्जा उपलब्ध है। यहां बिजली 3-4 रु. प्रति यूनिट है, जो यूरोप से काफी कम है। खपत पूरी तरह से चालू होने पर यह सेंटर 520 मेगावाट बिजली की खपत करेगा, जो कि नॉर्वे के सभी मौजूदा डेटा सेंटर्स की कुल खपत से भी ज्यादा है। लागत- तकनीक इसमें एनवीडिया के नए ‘वेरा रुबिन’ प्रोसेसर लगेंगे। प्रोजेक्ट की कुल लागत 9.57 लाख करोड़ रु. ज्यादा आंकी जा रही है, जिसमें 60-80% खर्च चिप्स का होगा। उपयोग इस सेंटर का इस्तेमाल ‘माइक्रोसॉफ्ट’ और ‘ओपनएआई’ करेंगे। साल के अंत तक इसे 1 लाख से ज्यादा एडवांस ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट के साथ शुरू किया जाएगा।

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Jill Biden expressed the pain of the White House.

Jill Biden expressed the pain of the White House.

वॉशिंगटन17 मिनट पहले कॉपी लिंक जिल ने हालिया इंटरव्यू में अपनी चुप्पी को पीढ़ीगत बताया। उन्होंने कहा, ‘हम इसी तरह बड़े हुए हैं।’- फाइल फोटो दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति के घर के भीतर क्या चलता है? क्या वहां भी आम घरों जैसी ही उलझनें होती हैं? अमेरिका की पूर्व फर्स्ट लेडी जिल बाइडेन की नई किताब ‘व्यू फ्रॉम द ईस्ट विंग’ ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन की पत्नी जिल का यह संस्मरण एक राजनेता की पत्नी के उस दर्द, अकेलेपन और असमंजस को बयां करता है, जो उसने दुनिया की सबसे शक्तिशाली चौखट पर रहकर महसूस किया। जिल ने स्वीकार किया है कि जून 2024 की उस ऐतिहासिक डिबेट से ठीक पहले, जब उन्होंने जो बाइडेन को देखा, तो वे ‘मिट्टी के पुतले जैसे बेजान’ लग रहे थे। रंग फीका था। जिल को लगा कि कुछ गलत है, लेकिन चुप रही। डिबेट के दौरान मंच पर बाइडेन लड़खड़ा गए। इसे टीवी पर देख रही जिल के मुंह से निकला, ‘ओ माई गॉड! क्या दुनिया सोचेगी कि जो हमेशा ऐसे ही रहते हैं?’ कैंसर जैसी गंभीर बीमारी भी छिपी रही किताब में सबसे भावुक और चौंकाने वाला खुलासा वह है, जब जिल बताती हैं कि बाइडेन को ‘स्टेज-4 प्रोस्टेट कैंसर’ था, जो उनकी हड्डियों तक फैल चुका था। इसके बावजूद उन्होंने पति से इस बारे में सीधी बात नहीं की। जिल लिखती हैं, ‘हमारे रिश्ते में व्यक्तिगत स्वास्थ्य को लेकर हमेशा ‘गोपनीयता का पर्दा’ रहा।’ यह गोपनीयता 2015 में जवान बेटे बो बाइडेन को ब्रेन कैंसर से खोने पर भी बनी रही। पीढ़ीगत अंतर और वफादारी का दबाव जिल ने हालिया इंटरव्यू में अपनी चुप्पी को पीढ़ीगत बताया। उन्होंने कहा, ‘हम इसी तरह बड़े हुए हैं।’ वाइट हाउस मामलों की विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार केटी रॉजर्स के अनुसार, यह किताब दिखाती है कि कैसे सत्ता के शीर्ष पर वफादारी को हर चीज से ऊपर रखा जाता है। जिल आधुनिक कामकाजी महिला थीं, जो प्रथम महिला होकर भी कॉलेज में पढ़ाती थीं, वहीं दूसरी ओर वे एक पुराने ढर्रे की शादी के नियमों से बंधी थीं, जहां पति की भावनाओं को उनकी सेहत से ज्यादा तवज्जो दी गई। अगर बाइडेन राष्ट्रपति चुनाव से न हटे होते तो जीत जाते जिल ने किताब में उस पल का भी जिक्र किया है, जब बाइडेन ने कमला हैरिस को फोन कर बताया कि वे राष्ट्रपति चुनाव की रेस से हट रहे हैं। जिल के मुताबिक हैरिस ने कहा, ‘क्या आप यह जल्दी कर सकते हैं, 20 मिनट में?’ तब जिल कमरे से बाहर चली गईं, क्योंकि वे राजनीति के उस क्रूर चेहरे को नहीं देखना चाहती थीं, जिसने उनके पूरे परिवार को मानसिक तनाव दिया। जिल ने एक हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा कहा​ कि 2020 में पहली बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ने का फैसला लेते वक्त दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन पार्टी नेताओं और सलाहकारों ने दबाव बनाया और वे दोबारा लड़े। जिल दावा करती हैं कि यदि वे मैदान से हटे नहीं होते तो जीतते। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

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Jill Biden expressed the pain of the White House.

Jill Biden expressed the pain of the White House.

वॉशिंगटन50 मिनट पहले कॉपी लिंक जिल ने हालिया इंटरव्यू में अपनी चुप्पी को पीढ़ीगत बताया। उन्होंने कहा, ‘हम इसी तरह बड़े हुए हैं।’- फाइल फोटो दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति के घर के भीतर क्या चलता है? क्या वहां भी आम घरों जैसी ही उलझनें होती हैं? अमेरिका की पूर्व फर्स्ट लेडी जिल बाइडेन की नई किताब ‘व्यू फ्रॉम द ईस्ट विंग’ ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन की पत्नी जिल का यह संस्मरण एक राजनेता की पत्नी के उस दर्द, अकेलेपन और असमंजस को बयां करता है, जो उसने दुनिया की सबसे शक्तिशाली चौखट पर रहकर महसूस किया। जिल ने स्वीकार किया है कि जून 2024 की उस ऐतिहासिक डिबेट से ठीक पहले, जब उन्होंने जो बाइडेन को देखा, तो वे ‘मिट्टी के पुतले जैसे बेजान’ लग रहे थे। रंग फीका था। जिल को लगा कि कुछ गलत है, लेकिन चुप रही। डिबेट के दौरान मंच पर बाइडेन लड़खड़ा गए। इसे टीवी पर देख रही जिल के मुंह से निकला, ‘ओ माई गॉड! क्या दुनिया सोचेगी कि जो हमेशा ऐसे ही रहते हैं?’ कैंसर जैसी गंभीर बीमारी भी छिपी रही किताब में सबसे भावुक और चौंकाने वाला खुलासा वह है, जब जिल बताती हैं कि बाइडेन को ‘स्टेज-4 प्रोस्टेट कैंसर’ था, जो उनकी हड्डियों तक फैल चुका था। इसके बावजूद उन्होंने पति से इस बारे में सीधी बात नहीं की। जिल लिखती हैं, ‘हमारे रिश्ते में व्यक्तिगत स्वास्थ्य को लेकर हमेशा ‘गोपनीयता का पर्दा’ रहा।’ यह गोपनीयता 2015 में जवान बेटे बो बाइडेन को ब्रेन कैंसर से खोने पर भी बनी रही। पीढ़ीगत अंतर और वफादारी का दबाव जिल ने हालिया इंटरव्यू में अपनी चुप्पी को पीढ़ीगत बताया। उन्होंने कहा, ‘हम इसी तरह बड़े हुए हैं।’ वाइट हाउस मामलों की विशेषज्ञ और वरिष्ठ पत्रकार केटी रॉजर्स के अनुसार, यह किताब दिखाती है कि कैसे सत्ता के शीर्ष पर वफादारी को हर चीज से ऊपर रखा जाता है। जिल आधुनिक कामकाजी महिला थीं, जो प्रथम महिला होकर भी कॉलेज में पढ़ाती थीं, वहीं दूसरी ओर वे एक पुराने ढर्रे की शादी के नियमों से बंधी थीं, जहां पति की भावनाओं को उनकी सेहत से ज्यादा तवज्जो दी गई। अगर बाइडेन राष्ट्रपति चुनाव से न हटे होते तो जीत जाते जिल ने किताब में उस पल का भी जिक्र किया है, जब बाइडेन ने कमला हैरिस को फोन कर बताया कि वे राष्ट्रपति चुनाव की रेस से हट रहे हैं। जिल के मुताबिक हैरिस ने कहा, ‘क्या आप यह जल्दी कर सकते हैं, 20 मिनट में?’ तब जिल कमरे से बाहर चली गईं, क्योंकि वे राजनीति के उस क्रूर चेहरे को नहीं देखना चाहती थीं, जिसने उनके पूरे परिवार को मानसिक तनाव दिया। जिल ने एक हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा कहा​ कि 2020 में पहली बार राष्ट्रपति चुनाव लड़ने का फैसला लेते वक्त दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव लड़ने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन पार्टी नेताओं और सलाहकारों ने दबाव बनाया और वे दोबारा लड़े। जिल दावा करती हैं कि यदि वे मैदान से हटे नहीं होते तो जीतते। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

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लॉस एंजिलिस में मेयर के लिए चुनाव:रेस में केरल में जन्मीं नित्या रमन भी, बोलीं-शहर की पहचान बड़ी इमारतें नहीं, गरीबों से व्यवहार

लॉस एंजिलिस में मेयर के लिए चुनाव:रेस में केरल में जन्मीं नित्या रमन भी, बोलीं-शहर की पहचान बड़ी इमारतें नहीं, गरीबों से व्यवहार

केरल में जन्मीं नित्या रमन (44) लॉस एंजिलिस के मेयर पद के प्राथमिक चुनाव में दूसरे स्थान पर पहुंच गईं। वे अब नवंबर में होने वाले चुनाव में मेयर करेन बैस को चुनौती देती दिख रही हैं। 72 वर्षीय करेन 34.7% वोटों के साथ पहले स्थान पर हैं। नित्या को 27.1% वोट मिले। मेयर पद का उम्मीदवार प्राथमिक चुनाव में 50% से अधिक वोट हासिल कर सीधे जीत सकता है। नहीं तो टॉप-2 उम्मीदवार रनऑफ चुनाव में आमने-सामने होते हैं। लॉस एंजिलिस न्यूयॉर्क के बाद अमेरिका का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है। हॉलीवुड भी यहीं है। नित्या कहती हैं कि लोगों की मदद के लिए राजनीतिक सोच बनाने में भारत का अहम योगदान है। कैसे, जानिए उन्हीं की जुबानी… मैं 6 साल की उम्र में अमेरिका आ गई थी। स्कूल में प्रवासी और रंग दोनों के आधार पर भेदभाव झेला। इस अनुभव ने सामाजिक न्याय के प्रति मुझमें गहरी संवेदना पैदा की। हार्वर्ड में पॉलिटिकल थ्योरी पढ़ी। एमआईटी से अर्बन प्लानिंग की डिग्री ली। 2020 में पहली बार लॉस एंजिलिस सिटी काउंसिल में जीती तो ये ‘राजनीतिक भूकंप’ कहा गया। लोग मानते हैं कि मेरी राजनीति यहीं से शुरू हुई। पर, इसकी जड़ें दिल्ली और चेन्नई की झुग्गियों में हैं। दिल्ली ने सवाल दिए, चेन्नई ने जवाब पढ़ाई के बाद मैं भारत लौटी। दिल्ली में एक दिन देखा कि एक विशाल झुग्गी बस्ती तोड़ दी गई। एक लाख से ज्यादा लोग बेघर हो गए। इस पर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई। समझ आया कि गरीबों की समस्या सिर्फ गरीबी नहीं, बल्कि उन्हें अदृश्य बना दिया जाना है। दिल्ली ने सवाल दिए, तो चेन्नई ने जवाब। वहां ‘ट्रांसपेरेंट चेन्नई’ पहल के तहत झुग्गी बस्तियों का नक्शा बनाया। पानी, शौचालय, ड्रेनेज और बुनियादी सुविधाओं का डेटा जुटाया। बदलाव के लिए संवेदना के साथ आंकड़े भी जरूरी हैं। शहरी समस्याएं व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी होती हैं। भारत में झुग्गी, अमेरिका में फुटपाथ 2013 में लॉस एंजिलिस पहुंची। यहां झुग्गियों की जगह बेघर लोग फुटपाथ पर थे। प्रशासनिक कार्यालय में नौकरी के दौरान बेघरों पर होने वाले खर्च पर शोध की जिम्मेदारी मिली। इन पर हर साल 10 करोड़ डॉलर खर्च हो रहे हैं। लेकिन, 90% खर्च इन्हें जेल भेजने जैसे कामों पर था। आवास, पुनर्वास और स्थायी समाधान पर खर्च बहुत कम था। बदलाव के लिए राजनीति में उतरी। राजनीति करियर नहीं, सिर्फ काम का जरिया जब मैंने मेयर का चुनाव लड़ने की सोची तो लोगों ने कहा कि यह सही समय नहीं है। मैंने कहा कि संकट कभी समय देखकर नहीं आते। मैं यहां करियर बनाने या 20 साल तक कुर्सी पर चिपके रहने के लिए नहीं आई हूं। मैं अर्बन प्लानर हूं। राजनीति मेरा पेशा नहीं, अपना काम पूरा करने का जरिया है। बदलाव का कोई बेहतर तरीका राजनीति के बाहर भी दिखा तो मैं उसे अपनाने में संकोच नहीं करूंगी। किसी शहर की महानता उसकी चमकदार इमारतों से नहीं, बल्कि इससे तय होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। अगर एक शहर हर व्यक्ति को सम्मानजनक आवास, सुरक्षित जीवन और अवसर नहीं दे सकता, तो उसकी समृद्धि अधूरी है।

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US Court Blocks H-1B Visa Tax; Registration Drops 38% Post Fee Hike

US Court Blocks H-1B Visa Tax; Registration Drops 38% Post Fee Hike

वॉशिंगटन डीसी4 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिका में फेडरल कोर्ट ने ट्रम्प के H-1B वीजा पर 1 लाख डॉलर (करीब 95 लाख रुपए) फीस वसूलने वाली नीति को रद्द कर दिया है। बोस्टन कोर्ट ने कहा कि यह फीस नहीं बल्कि एक टैक्स है और इसे लागू करने के लिए राष्ट्रपति नहीं बल्कि संसद की मंजूरी जरूरी थी। ट्रम्प ने सितंबर 2025 में घोषणा की थी कि जो कंपनियां H-1B वीजा पर विदेशी कर्मचारियों को नौकरी देंगी, उन्हें हर वीजा के लिए 1 लाख डॉलर की एक्स्ट्रा फीस देनी होगी। इसके बाद 20 राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने इसे चुनौती दी थी। अब कोर्ट के फैसले के खिलाफ ट्रम्प सरकार अपील कर सकती है। H-1B एक गैर-प्रवासी वीजा है, जिसके जरिए अमेरिकी कंपनियां कुछ समय के लिए विदेशों से हाई स्किल वाले पेशेवरों को नौकरी पर रख सकती हैं। पहले H-1B वीजा आवेदन करने पर कंपनियों को करीब 2000 से 5000 डॉलर तक फीस देनी पड़ती थी। इस वीजा का सबसे ज्यादा इस्तेमाल भारतीय IT और टेक प्रोफेशनल्स करते हैं। ऐसे में कोर्ट के इस फैसले को भारतीयों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। ट्रम्प सरकार बोली- H-1B का दुरुपयोग हो रहा ट्रम्प सरकार ने अदालत में दलील दी थी कि H-1B सिस्टम का दुरुपयोग हो रहा है। सरकार के मुताबिक कई कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की जगह कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को रख रही थीं। ऐसे में यह फीस टैक्स नहीं बल्कि एक तरह का आर्थिक दंड है। सरकार ने कहा कि इमिग्रेशन कानून के तहत राष्ट्रपति को विदेशी नागरिकों की एंट्री सीमित करने का अधिकार है। लेकिन कोर्ट इस दलील से सहमत नहीं हुई। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने 19 सितंबर 2025 को H-1B वीजा को लेकर नियमों में बदलाव से जुड़े ऑर्डर पर साइन किया था। सरकार ने माना- फीस बढ़ने के बाद आवेदन घटे ट्रम्प सरकार के फीस बढ़ने का असर वीजा आवेदनों पर भी पड़ा। US सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेज (USCIS) के आकड़ो के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 के लिए H-1B रजिस्ट्रेशन में 38.5% की गिरावट आई। यह संख्या 3.44 लाख से घटकर 2.11 लाख रह गई। अमेरिकी सरकार ने खुद कोर्ट में माना था कि फीस बढ़ने के बाद H-1B वीजा के आवेदन तेजी से घटे हैं। मार्च में प्रशासन ने बताया था कि 15 फरवरी तक सिर्फ 85 लोगों ने ही नई फीस जमा की थी। H-1B प्रोग्राम के तहत हर साल 65,000 वीजा जारी किए जाते हैं। इसके अलावा एडवांस डिग्री वाले विदेशी प्रोफेशनल्स के लिए और 20,000 वीजा दिए जाते हैं। यह वीजा आमतौर पर 3 से 6 साल के लिए मंजूर होता है। भारत पर सबसे ज्यादा असर पड़ा था ट्रम्प सरकार के इस फैसले का सबसे ज्यादा असर भारत पर पड़ा था। बड़ी संख्या में भारतीय IT प्रोफेशनल्स H-1B वीजा के जरिए अमेरिका में काम करते हैं। AI की वजह से टेक सेक्टर में छंटनी और नए इमिग्रेशन नियमों के कारण विदेशी कर्मचारियों की भर्ती पहले ही धीमी हो चुकी थी। इस बीच कई भारतीय कर्मचारियों की नौकरी चली गई। अमेरिकी नियमों के मुताबिक नौकरी जाने के बाद नए रोजगार के लिए सिर्फ 60 दिन का समय मिलता है। नौकरी नहीं मिलने पर कई भारतीयों को वापस लौटना पड़ा। जयशंकर ने भी उठाया था मुद्दा विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इसी साल मई में यह मामला अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के सामने उठाया था। रुबियो ने माना था कि नए इमिग्रेशन सिस्टम में बदलाव के दौरान कुछ दिक्कतें और तनाव हो सकते हैं। हालांकि उन्होंने कहा था कि अमेरिका इमिग्रेशन सिस्टम को ज्यादा प्रभावी बनाने की कोशिश कर रहा है और लंबे समय में इसका फायदा सभी पक्षों को मिलेगा। रूबियो ने यह भी कहा था कि यह कदम खासतौर पर भारत को निशाना बनाकर नहीं उठाया गया है। उनके मुताबिक अमेरिका पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर अवैध प्रवास की समस्या से जूझ रहा है। 20 मिलियन से ज्यादा लोग गैरकानूनी तरीके से अमेरिका में दाखिल हुए और उसी चुनौती से निपटने के लिए यह बदलाव किए जा रहे हैं। ————————- H-1B वीजा से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… अमेरिका में 15 हजार भारतीयों की छंटनी, नई जॉब नहीं:H-1B पर गए थे, ट्रम्प के सख्त नियम से अब डिपोर्ट का खतरा अमेरिका में 15 हजार भारतीय टेक कर्मियों की नौकरी जाने के बाद उनके सामने संकट खड़ा हो गया है। अब उनपर डिपोर्टेशन का खतरा मंडरा रहा है। दरअसल, ये सभी एच-1बी वीजा पर अमेरिका गए थे, लेकिन छंटनी के बाद इनके पास नई नौकरी ढूंढने व वीजा स्टेटस बचाने के लिए सीमित समय बचा है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

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