Sunday, 02 Aug 2026 | 05:18 AM

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‘तुम जैसे सिंगर से ऐसी उम्मीद नहीं थी’:‘चांद सिफारिश’ के आलाप में ऑटो-ट्यून वाली बात पर ललित पंडित ने शान को डांटा था

‘तुम जैसे सिंगर से ऐसी उम्मीद नहीं थी’:‘चांद सिफारिश’ के आलाप में ऑटो-ट्यून वाली बात पर ललित पंडित ने शान को डांटा था

गुरु पूर्णिमा के मौके पर सिंगर शान का नया साईं भजन ‘साई नाम सांचा’ रिलीज हुआ है। इसे संगीतकार ललित पंडित ने कंपोज किया है। दैनिक भास्कर से बातचीत में शान ने अपने गुरु, मां से जुड़ी साईं बाबा की यादें, ललित पंडित के साथ काम करने के किस्से, AI के बढ़ते असर और अपने बेटों के म्यूजिक करियर पर बात की। सवाल: गुरु पूर्णिमा के मौके पर सबसे पहले आपके गुरु के बारे में जानना चाहेंगे। आपकी जिंदगी में सबसे बड़ा गुरु कौन रहा है? जवाब: मेरे कई गुरु रहे हैं, लेकिन अगर एक नाम लेना हो तो उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहब का लूंगा। मैंने उनसे संगीत की तालीम ली। आज भी उनके परिवार से सीखना जारी है। मैं जो भी गा पा रहा हूं, वह उन्हीं की देन है। सवाल: आपने कहा कि जो कुछ सीखा, वह गुरु की देन है। क्या अब तक उनकी गुरु दक्षिणा चुका पाए हैं? जवाब: बिल्कुल नहीं। मैं आज तक कोई खास गुरु दक्षिणा नहीं दे पाया। मेरे लिए सबसे बड़ी गुरु दक्षिणा यही होगी कि मेरी गायकी हर दिन बेहतर होती रहे। अगर गुरुजी मुझे कहीं से सुन रहे होंगे, तो यही चाहेंगे कि मैं और मेहनत करूं और अच्छा गाऊं। सवाल: इसी गुरु पूर्णिमा पर आपका साईं भजन भी रिलीज हुआ है। आपने बताया था कि आपकी मां साईं बाबा में बहुत आस्था रखती थीं। यह भजन गाते वक्त उनकी कौन-सी याद सबसे ज्यादा आई? जवाब: मेरी मां बहुत ज्यादा धार्मिक नहीं थीं, लेकिन साईं बाबा में उनकी गहरी आस्था थी। हर गुरुवार हम दोनों साईं मंदिर जाते थे और अगरबत्ती जलाते थे। उस समय हमारी जिंदगी बहुत साधारण थी। यह भजन गाते समय वही पल याद आए। मां की याद के साथ साईं मंदिरों की याद भी ताजा हो गई। सवाल: इस भजन की रिकॉर्डिंग का किस्सा क्या है? जवाब: मैं जापान छुट्टियों पर जाने वाला था। तभी ललित जी का फोन आया। उन्होंने कहा कि अगर अभी रिकॉर्ड नहीं किया तो बात रह जाएगी। मैं तुरंत स्टूडियो पहुंचा, अपनी लाइनें रिकॉर्ड कीं और चला गया। उस दिन मेरी आवाज पूरी तरह ठीक नहीं थी, इसलिए चार लाइनें गाने में काफी मेहनत करनी पड़ी। पूरा गाना तैयार हुआ तो बहुत खुशी हुई। सवाल: आपने ललित पंडित के साथ कई सुपरहिट गाने गाए हैं। उनके साथ काम करने का अनुभव बाकी संगीतकारों से कितना अलग होता है? जवाब: उनके साथ काम करना हमेशा खास होता है। उन्होंने मुझसे हर तरह के गाने गवाए हैं। टेक्नोलॉजी आगे बढ़ गई है, लेकिन ललित जी आज भी शुद्ध गायकी पर भरोसा करते हैं। उनके साथ रिकॉर्डिंग करना ऐसा लगता है जैसे फिर से स्कूल पहुंच गए हों। सवाल: फिल्म ‘फना’ के गीत ‘चांद सिफारिश’ की रिकॉर्डिंग के दौरान ऑटो-ट्यून को लेकर क्या हुआ था? जवाब: गाने की शुरुआत में जो आलाप है, उसे रिकॉर्ड करने के बाद ललित जी को लगा कि उसे और बेहतर किया जा सकता है। मैंने मजाक में कहा कि ट्यूनर से ठीक कर दीजिए। यह सुनते ही ललित जी बोले, ‘तुम जैसे सिंगर से ऐसी बात की उम्मीद नहीं थी।’ फिर मैं तुरंत स्टूडियो पहुंचा और पूरा आलाप दोबारा रिकॉर्ड किया। सवाल: जतिन-ललित के साथ काम करते हुए आपने सबसे बड़ी सीख क्या ली? जवाब: मेरे शुरुआती गानों से लेकर आज तक प्लेबैक सिंगिंग की बहुत सारी बारीकियां मैंने उन्हीं से सीखी हैं। मैं उनके 90 के दशक के संगीत का बड़ा प्रशंसक हूं। आज भी उनके काम का फैन हूं। सवाल: अब AI भी म्यूजिक इंडस्ट्री का हिस्सा बनता जा रहा है। इसे आप किस नजरिए से देखते हैं? जवाब: AI एक अच्छा रेफरेंस टूल हो सकता है, लेकिन उसे पूरी तरह क्रिएटिव काम का विकल्प नहीं बनाना चाहिए। मैंने अपने कुछ म्यूजिक वीडियो AI की मदद से बनाए हैं, लेकिन गाने का संगीत और रिकॉर्डिंग पूरी तरह असली है। AI समय और पैसा बचाता है, लेकिन इससे कई लोगों का रोजगार प्रभावित हो रहा है। आने वाले समय में यह बड़ा मुद्दा बन सकता है। सवाल: ललित पंडित की अगली पीढ़ी के काम को कैसे देखते हैं? जवाब: मैंने रोहांश और अबीर को बचपन से देखा है। दोनों संस्कारी, मेहनती और प्रतिभाशाली हैं। संगीत उन्हें विरासत में मिला है। मुझे वे अपने बच्चों जैसे लगते हैं। सवाल: आपके दोनों बेटे भी म्यूजिक में हैं। इस समय वे क्या कर रहे हैं? जवाब: मेरे दोनों बेटे संगीत से जुड़े हैं। छोटे बेटे माही ने फिल्मों के लिए गाने गाए हैं। बड़ा बेटा सोहम म्यूजिक प्रोड्यूसर और म्यूजिक डायरेक्टर है। वह ‘नेवर सोबर’ नाम से काम करता है और ज्यादातर पर्दे के पीछे रहकर संगीत बनाता है। दोनों बहुत अच्छा काम कर रहे हैं।

पेरू में टूरिस्ट प्लेन क्रैश, क्रू समेत 13 की मौत:2000 साल पुरानी नाज्का लाइन्स देखने गए थे; मरने वालों की पहचान नहीं हो सकी

पेरू में टूरिस्ट प्लेन क्रैश, क्रू समेत 13 की मौत:2000 साल पुरानी नाज्का लाइन्स देखने गए थे; मरने वालों की पहचान नहीं हो सकी

पेरू के नाज्का शहर के बाहर शनिवार को पर्यटकों को ले जा रहा एक छोटा प्लेन क्रैश हो गया। इस हादसे में 13 लोगों की मौत हो गई है। एजेंसी रिपोर्ट्स के मुताबिक प्लेन ने पास के इका शहर से उड़ान भरी थी। नाज्का लाइन्स के पास पहुंचने के बाद प्लेन खेत में जाकर गिरा। इसमें आग लग गई। प्लेन में 2 पायलट्स के अलावा 11 पर्यटक थे। हादसे के बाद प्लेन के मलबे के पास जले हुए शव बिखरे पड़े थे। दरअसल, 2000 साल पुरानी नाज्का लाइन्स को पूरी तरह से केवल प्लेन या व्यूइंग टावर से ही देखा जा सकता है। इसलिए प्लेन पर्यटकों को लेकर निकला था। मरने वाले कहां से थे, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है। पेरू प्लेन हादसे के बाद खेत में बिखरे शव… 14 साल से सीनिक फ्लाइट्स ऑर्गनाइज कर रही थी कपंनी जो प्लेन हादसे का शिकार हुआ, उसे पेरू की कंपनी ‘एरोडियाना’ ऑपरेट कर रही थी। एयरलाइन की वेबसाइट के मुताबिक, वह पिछले 14 साल से सेसना ग्रैंड कारवां प्लेन का इस्तेमाल करके नाज्का लाइन्स के ऊपर सीनिक फ्लाइट्स (नजारे दिखाने वाली उड़ानें) की सुविधा दे रहे हैं। हादसे की जांच की जा रही है। एरोडियाना ने कोई कमेंट नहीं दिया। पेरू के मूल निवासियों ने बनाईं थीं नाज्का लाइन्स पेरू की राजधानी लीमा से लगभग 400 किमी दक्षिण में पेरू के नाज्का और पाल्पा रेगिस्तान में कुछ आकृतियां बनी हैं। माना जाता है कि इन्हें 200 ईसा पूर्व से 600 ईस्वी के बीच नाज्का सभ्यता के लोगों ने बनाया। रेगिस्तान की गहरे रंग की पत्थरीली सतह हटाकर नीचे की हल्की मिट्टी को दिखाया गया, जिससे ये आकृतियां बन गईं। कई आकृतियां 100 से 300 मीटर और उससे भी बड़ी हैं। कुछ सीधी रेखाएं कई किलोमीटर तक जाती हैं। इन्हें क्यों बनाया गया, यह आज भी रहस्य है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये धार्मिक अनुष्ठान, वॉटर सोर्स, अंतरिक्ष की गणनाओं या फिर संस्कृति से जुड़ी हो सकती हैं। यहां बहुत कम बारिश और शुष्क जलवायु होने के कारण ये आकृतियां करीब 2,000 साल से सुरक्षित बनी हुई हैं।

वर्ल्ड अपडेट्स:रूस की राजधानी मास्को के रेस्टोरेंट में धमाका, 3 की मौत, 15 घायल; एंटी टेरेरिस्ट कमेटी का दावा- यह बम ब्लास्ट था

वर्ल्ड अपडेट्स:रूस की राजधानी मास्को के रेस्टोरेंट में धमाका, 3 की मौत, 15 घायल; एंटी टेरेरिस्ट कमेटी का दावा- यह बम ब्लास्ट था

मास्को के एक रेस्टोरेंट में हुए धमाके में कम से कम 3 लोगों की मौत हो गई है। इस घटना में 15 लोग घायल हुए हैं। रूसी सरकारी मीडिया ने शनिवार को यह जानकारी दी। घटना मास्को के कुद्रिन्सकाया स्क्वायर इलाके की है। धमाके के बाद फॉरेंसिक एक्सपर्ट और इमरजेंसी सर्विस के लोग पहुंच गए और रेस्क्यू शुरू किया। धमाके के बाद इलाके की घेराबंदी कर दी गई। जांच कर रही एंटी टेरेरिस्ट कमेटी का दावा है कि यह धमाका बम ब्लास्ट था। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… ट्रेडर्स अब पैसे देकर पहले देख सकेंगे ट्रम्प के पोस्ट अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सोशल मीडिया कंपनी ट्रुथ सोशल ने वॉल स्ट्रीट के हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स के लिए ट्रुथ एपीआई नाम की पेड सर्विस शुरू की है। इसके तहत कस्टमर मंथली फीस देकर ट्रम्प और दूसरे अकाउंट्स के पोस्ट तक तेज तकनीकी पहुंच हासिल कर सकेंगे, ताकि वे बाजार में तेजी से ट्रेड कर सकें। आलोचकों का कहना है कि ट्रम्प के टैरिफ, युद्ध, ब्याज दर और दूसरे नीतिगत फैसलों से शेयर, बॉन्ड और मुद्रा बाजार प्रभावित होते हैं, ऐसे में यह व्यवस्था इनसाइडर ट्रेडिंग और सार्वजनिक पद के निजी लाभ के लिए इस्तेमाल जैसे गंभीर सवाल खड़े करती है। वहीं ट्रम्प मीडिया का कहना है कि पोस्ट सभी के लिए एक ही समय पर जारी किए जाएंगे और सर्विस में कोई अनुचित लाभ नहीं है।

नेपाल के मशहूर पर्वतारोही निर्मल पुर्जा की पाकिस्तान में मौत:8 हजार मीटर ऊंची ब्रॉड पीक पर चढ़ रहे थे, हिमस्खलन में गई जान

नेपाल के मशहूर पर्वतारोही निर्मल पुर्जा की पाकिस्तान में मौत:8 हजार मीटर ऊंची ब्रॉड पीक पर चढ़ रहे थे, हिमस्खलन में गई जान

नेपाल के मशहूर पर्वतारोही निर्मल पुर्जा की पाकिस्तान में हिमस्खलन यानी एवलांच की चपेट में आने के बाद मौत हो गई। उनके निधन की पुष्टि उनकी ही पर्वतारोहण कंपनी एलीट एक्सपेडिशन ने की है। निर्मल पुर्जा 30 जुलाई को काराकोरम इलाके में 8,051 मीटर ऊंची ब्रॉड पीक की चोटी पर चढ़ाई कर रहे थे। इस दौरान करीब 7,000 मीटर की ऊंचाई पर यह हादसा हुआ। हिमस्खलन के बाद निर्मल पुर्जा समेत 10 पर्वतारोही लापता हो गए थे। इनमें छह नेपाली पर्वतारोही भी शामिल थे। मैप से समझिए हादसे की लोकेशन… 6 महीने में 14 सबसे ऊंची चोटियां फतह कीं ब्रिटिश स्पेशल फोर्स जॉइन करने वाले पहले नेपाली निर्मल पुर्जा का जन्म 25 जुलाई 1983 को नेपाल के म्याग्दी जिले के दाना गांव में हुआ था। उनके परिवार का सेना से गहरा नाता रहा है। कई पीढ़ियों से परिवार के लोग गोरखा रेजिमेंट में सेवा करते रहे। उनके पिता और तीन बड़े भाई भी गोरखा सैनिक थे। ऐसे माहौल में पले-बढ़े निर्मल ने भी बचपन से ही सैनिक बनने का सपना देखा। बाद में उन्होंने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया और ब्रिटिश सेना की गोरखा रेजिमेंट में भर्ती हो गए। करीब छह साल तक गोरखा सैनिक के रूप में सेवा देने के बाद उन्होंने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की। वह ब्रिटिश रॉयल नेवी की स्पेशल बोट सर्विस (SBS) में शामिल होने वाले पहले नेपाली बने। SBS ब्रिटेन की नौसेना की सबसे खतरनाक और प्रतिष्ठित स्पेशल फोर्स है। इसके सैनिक समुद्र, पहाड़, जंगल और दुश्मन के इलाके में सीक्रेट ऑपरेशन चलाने के लिए ट्रेंड होते हैं। इसमें चयन इतना मुश्किल है कि बहुत कम सैनिक इसे पूरा कर पाते हैं। करीब 16 साल तक सेना में रहते हुए निर्मल पुर्जा ने अत्यधिक ठंडे और मुश्किल इलाकों में कई स्पेशल ऑपरेशन में हिस्सा लिया। इसी दौरान उनके मन में दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करने का ख्याल आया। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने सुरक्षित सैन्य करियर छोड़ने का बड़ा फैसला लिया। सेना से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने पूरी तरह पर्वतारोहण पर फोकस किया। इसमें सबसे बड़ी चुनौती पैसों की थी। खर्च जुटाने के लिए उन्होंने अपना घर तक बेच दिया, ताकि दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों पर चढ़ने का सपना पूरा कर सकें।

'फिल्मों के किरदार से मुझे जज मत करो':Gen Z विवाद पर कंगना रनोट का पलटवार, बोलीं- रील और रियल लाइफ में फर्क समझिए

'फिल्मों के किरदार से मुझे जज मत करो':Gen Z विवाद पर कंगना रनोट का पलटवार, बोलीं- रील और रियल लाइफ में फर्क समझिए

Gen Z को लेकर दिए गए बयान पर घिरीं कंगना रनोट ने अब ट्रोलर्स को करारा जवाब दिया है। सोशल मीडिया पर उनकी फिल्मों के किरदारों की क्लिप्स शेयर कर उन्हें निशाने पर लेने वालों पर कंगना ने पलटवार करते हुए कहा कि फिल्मों में निभाए गए किरदार और असल जिंदगी के विचारों की तुलना करना गलत है। उन्होंने लोगों से रील और रियल लाइफ का फर्क समझने की अपील की। Gen Z को लेकर हाल ही में दिए गए बयान के बाद कंगना रनोट लगातार सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। उनके बयान के विरोध में कई ट्रोल पेजों और सोशल मीडिया यूजर्स ने उनकी फिल्मों के अलग-अलग किरदारों की तस्वीरें और वीडियो शेयर किए। इन पोस्ट्स के जरिए यह सवाल उठाया गया कि अगर कंगना फिल्मों में ऐसे किरदार निभा सकती हैं तो फिर वह Gen Z की सोच और व्यवहार पर सवाल कैसे उठा सकती हैं। अब इस पूरे विवाद पर कंगना ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर संसद में दिए गए अपने एक पुराने भाषण का वीडियो साझा करते हुए आलोचकों को जवाब दिया। कंगना ने कहा कि फिल्मों में निभाया गया किरदार किसी अभिनेता की निजी सोच या जीवन का प्रतिबिंब नहीं होता। अभिनय एक पेशा है और कलाकार अलग-अलग तरह के किरदार निभाते हैं, इसलिए उन्हें उनकी फिल्मों के आधार पर जज करना गलत है। कंगना ने अपने बयान में कहा कि कुछ लोग जानबूझकर युवाओं को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं। उनके मुताबिक, फिल्मी किरदारों और किसी अभिनेता के वास्तविक विचारों को एक जैसा बताना न सिर्फ गलत है, बल्कि यह दर्शकों के बीच भ्रम भी पैदा करता है। उन्होंने कहा कि फिल्मों का मकसद मनोरंजन करना होता है, न कि लोगों को वही व्यवहार अपनाने की सीख देना। किसी कलाकार ने पर्दे पर जो किरदार निभाया है, उसका मतलब यह नहीं कि वह असल जिंदगी में भी वैसा ही सोचता या व्यवहार करता है। कंगना ने लोगों से अपील की कि वे मनोरंजन और वास्तविक जीवन के बीच का फर्क समझें। कंगना का यह बयान ऐसे समय आया है जब सोशल मीडिया पर उनके पुराने फिल्मी किरदारों की क्लिप्स तेजी से वायरल हो रही हैं। कई यूजर्स का कहना था कि कंगना के ऑन-स्क्रीन किरदार और उनके हालिया बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। इसी आलोचना के जवाब में उन्होंने अपना पक्ष सार्वजनिक किया। कंगना ने यह भी संकेत दिया कि सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे को आधी-अधूरी जानकारी के साथ पेश करना युवाओं के बीच गलत संदेश पहुंचा सकता है। उनका कहना है कि किसी अभिनेता के निजी विचारों पर बहस की जा सकती है, लेकिन उसके फिल्मी किरदारों को उससे जोड़ना उचित नहीं है। कंगना के इस जवाब के बाद सोशल मीडिया पर बहस और तेज हो गई है। एक तरफ उनके समर्थक उनकी बात का समर्थन कर रहे हैं और अभिनय व निजी जीवन को अलग मानने की दलील दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आलोचक अब भी उनके हालिया बयान पर सवाल उठा रहे हैं। ऐसे में Gen Z को लेकर शुरू हुआ यह विवाद फिलहाल थमता नजर नहीं आ रहा।

गाजा से इजराइली सेना हटाने पर क्यों फंसे नेतन्याहू:इजराइली PM पर ट्रम्प को खुश करने के साथ चुनाव जीतने की चुनौती

गाजा से इजराइली सेना हटाने पर क्यों फंसे नेतन्याहू:इजराइली PM पर ट्रम्प को खुश करने के साथ चुनाव जीतने की चुनौती

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 30 जुलाई को दावा किया कि गाजा को लेकर ऐतिहासिक समझौता हो गया है। हमास हथियार छोड़ने के लिए तैयार हो गया है। इसके साथ ही इजराइली सेना भी गाजा से पीछे हट जाएगी। ट्रम्प के ऐलान के बाद से सवाल पूछे जाने लगे हैं कि क्या इजराइल सच में गाजा से अपनी सेना हटा लेगा? यही शर्त अब इजराइल की राजनीति में सबसे बड़े विवाद की वजह बन गई है। इजराइल में कई नेता और वहां का मीडिया इस समझौते को लेकर नाराज हैं। एक तरफ ट्रम्प दावा कर रहे हैं कि इजराइल इस समझौते से बेहद खुश है। दूसरी तरफ इजराइल ने अब तक इसे लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है। अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक इजराइली सरकार के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि जब तक हमास के पूरी तरह हथियार छोड़ने का पक्का भरोसा नहीं हो जाता, तब तक गाजा से सेना हटाने का सवाल ही नहीं उठता। गाजा से सेना हटाने का इजराइल में इतना विरोध क्यों? 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजराइल ने गाजा में बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया। तब से अब तक 73 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं और गाजा का बड़ा हिस्सा तबाह हो चुका है। इसके बावजूद इजराइल में बड़ी संख्या में लोग अब भी गाजा के खिलाफ सख्त सैन्य कार्रवाई के पक्ष में हैं। जाहिर है कि गाजा से सेना हटाने और वहां दोबारा फिलिस्तीनी सरकार बहाल करने का विचार इजराइल में कई लोगों को पसंद नहीं है। उन्हें डर है कि अगर सेना हट गई तो हमास फिर से मजबूत होकर 7 अक्टूबर जैसा हमला कर सकता है। यही वजह है कि सरकार के कई मंत्री गाजा में भी वेस्ट बैंक की तरह यहूदी बस्तियां बसाने की वकालत कर चुके हैं। ऐसे में गाजा से सेना की वापसी और पुनर्निर्माण की योजना का विरोध होना स्वाभाविक माना जा रहा है। किन नेताओं ने सबसे ज्यादा विरोध किया? बेजलेल स्मोट्रिच: वित्त मंत्री नेतन्याहू सरकार में वित्त मंत्री रहे स्मोट्रिच ने कहा कि गाजा से इजराइली सेना नहीं हटनी चाहिए। हमास के लोगों से हथियार छीनना ही पहली शर्त है। आखिरकार इजराइल पूरे गाजा पर नियंत्रण करेगा और वहां फिर से यहूदी बस्तियां बसाई जाएंगी। इतमार बेन ग्विर: राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री बेन ग्विर ट्रम्प के प्लान को बुरा बताते हुए कहा कि अगर हमास के लड़ाकों को निशाना बनाना बंद कर दिया गया, तो उन्हें अगला हमला करने का मौका मिल जाएगा। गाजा में सैन्य कार्रवाई जारी रहनी चाहिए और वहां से लोगों के पलायन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। गादी आइजनकोट: पूर्व आर्मी चीफ ट्रम्प के ऐलान का विरोध सिर्फ कट्टर दक्षिणपंथी नेता ही नहीं कर रहे। पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट भी इसके खिलाफ माने जा रहे हैं। इस साल अक्टूबर में होने वाले चुनाव में गादी को नेतन्याहू का सबसे बड़ा विरोधी माना जा रहा है। गादी ने कहा कि अगर हमास की सैन्य और राजनीतिक ताकत पूरी तरह खत्म नहीं होती, तो यह इजराइल की बड़ी नाकामी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि हमास पहले जितना ही मजबूत हो चुका है। नेतन्याहू सबसे मुश्किल स्थिति में क्यों हैं? प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अभी तक इस समझौते पर सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शायद उनकी चुप्पी ही बताती है कि वे कितनी मुश्किल स्थिति में हैं। एक तरफ ट्रम्प हैं, जो इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहे हैं। दूसरी तरफ नेतन्याहू के अपने कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगी हैं, जो गाजा से सेना हटाने के सख्त खिलाफ हैं। अगर नेतन्याहू गाजा से सेना हटाने पर सहमत होते हैं, तो चुनाव से पहले उनके कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगी और वोटर उनसे दूर हो सकते हैं। दूसरी तरफ अगर वे समझौते को पूरी तरह ठुकरा देते हैं, तो ट्रम्प और अमेरिका नाराज हो सकते हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि नेतन्याहू शायद बीच का रास्ता अपनाएं। यानी कुछ इलाकों से सेना पीछे हटाने का दिखावा करें, लेकिन गाजा से पूरी तरह न निकलें। ट्रम्प को नाराज करना नेतन्याहू के लिए बहुत मुश्किल नेतन्याहू पर दबाव सिर्फ इजराइल के भीतर से नहीं, बल्कि अमेरिका से भी है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डोव वैक्समैन के मुताबिक, चुनाव से ठीक पहले नेतन्याहू ट्रम्प से रिश्ते खराब करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेंगे। हाल के समय में इजराइल में यह चर्चा बढ़ी है कि ट्रम्प सरकार का रुख पहले जैसा नहीं रहा। लेकिन इस पर लगभग सभी की राय एक है कि अमेरिका का सैन्य और सुरक्षा समर्थन इजराइल के लिए जरूरी है। इसीलिए विपक्ष नेतन्याहू को लगातार चेतावनी देता रहा है कि अगर अमेरिका के साथ रिश्ते बिगड़े, तो इसका राजनीतिक नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ेगा। इसके अलावा भ्रष्टाचार के मामलों से जूझ रहे नेतन्याहू को ट्रम्प से राजनीतिक और नैतिक समर्थन की उम्मीद है। नेतन्याहू यह भी चाहते होंगे कि ट्रम्प चुनावी माहौल में उनके लिए कोई बड़ा कूटनीतिक या राजनीतिक फायदा दिला सकते हैं। इसमें सऊदी अरब और इजराइल के बीच संबंध सामान्य कराने जैसा बड़ा समझौता या उनके खिलाफ चल रहे कानूनी मामलों पर समर्थन जैसे कदम भी शामिल हो सकते हैं। क्या सच में इजराइल गाजा से निकल जाएगा? इस सवाल का जवाब फिलहाल ‘नहीं’ मिलता दिख रहा है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि गाजा से इजराइली सेना की पूरी वापसी की संभावना लगभग नामुमकिन है। नेतन्याहू ट्रम्प को यह दिखा सकते हैं कि समझौता आगे बढ़ रहा है। इसके लिए वे समझौते की घोषणा, हस्ताक्षर समारोह या कुछ और करने का नाटक कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इजराइल गाजा से सेना हटा लेगा। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, गाजा से सेना न हटाना सिर्फ चुनावी या राजनीतिक मजबूरी नहीं है। यह नेतन्याहू की सुरक्षा नीति का भी अहम हिस्सा है। उनका हमेशा से मानना रहा है कि खतरों को रोकने के लिए इजराइल को अपनी सीमाओं के बाहर भी सैन्य मौजूदगी बनाए रखनी चाहिए। ऐसे में चुनाव नजदीक आने के साथ नेतन्याहू गाजा से पीछे हटने के बजाय और सख्त रुख अपना सकते हैं।

किराने के सामान के लिए भी कर्ज ले रहे अमेरिकी:महंगाई में पेट भरना मुश्किल; 2साल में दोगुने हुए 'BNPL' यूजर्स, वर्षों चुका रहे ब्याज

किराने के सामान के लिए भी कर्ज ले रहे अमेरिकी:महंगाई में पेट भरना मुश्किल; 2साल में दोगुने हुए 'BNPL' यूजर्स, वर्षों चुका रहे ब्याज

कल्पना कीजिए कि आपने महीनों पहले जो सब्जी, दूध और ब्रेड खरीदी और खा भी लिया, उसका ब्याज आप आज भी चुका रहे हैं। यह कोई मजाक नहीं, बल्कि हकीकत है। अमेरिका में लाखों परिवार कुछ महीनों से यही परेशानी झेल रहे हैं। किराने के सामान की कीमतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि लोग अब उसे क्रेडिट कार्ड और “बाय नाउ, पे लेटर’ (बीएनपीएल) जैसी उधारी स्कीम्स की मदद से खरीद रहे हैं। फिर उसी कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं। अमेरिका की गैर-लाभकारी संस्था ‘अर्बन इंस्टीट्यूट’ के ताजा सर्वे के मुताबिक, कामकाजी उम्र (18-64 साल) के हर चार में से एक अमेरिकी वयस्क ने किराने के सामान के लिए क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल किया। लेकिन उसका पूरा बिल समय पर चुकाने में उसे दिक्कत हुई। सिर्फ 35% लोग ही पूरा बिल एक साथ चुका पाए, बाकी या तो न्यूनतम राशि चुका रहे हैं या इतना भुगतान भी नहीं कर पा रहे। नतीजतन छोटी सी किराने की खरीद, रिवॉल्विंग डेट यानी घूमते-फिरते कर्ज में बदल जाती है, जिस पर वर्षों तक ब्याज चुकाना पड़ता है। यह बोझ भी किसी एसेट के लिए नहीं, बल्कि खाने-पीने की आम जरूरतों के लिए उठाया जा रहा है। बीएनपीएल सर्विसेज की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। लेंडिंगट्री के मुताबिक, अमेरिका में करीब 29% बीएनपीएल यूजर्स अब किराने के सामान के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं, जो दो साल पहले सिर्फ 14% था। यानी हिस्सेदारी दोगुनी हो गई। जेन-जी (14 से 29 साल) में तो यह आंकड़ा 38% तक पहुंच जाता है। लेकिन सुविधा की यह चमक जल्द फीकी पड़ जाती है। करीब 47% यूजर्स ने बीते एक साल में कम से कम एक बार पेमेंट लेट की, जो एक साल पहले सिर्फ 34% थी। हर पांच में से करीब एक अमेरिकी अब किराने के लिए बचत के पैसे भी इस्तेमाल करने लगा है। कम व मध्यम आय वालों में यह आंकड़ा और भी ज्यादा है। विशेषज्ञों की चिंता यह है कि बचत और क्रेडिट, दोनों ऐसे रास्ते हैं जो छोटी अवधि में राहत तो देते हैं, लेकिन बार-बार इस्तेमाल होने पर परिवारों को लंबी अवधि की वित्तीय अस्थिरता की ओर धकेल सकते हैं। इसका मतलब है कि आज की भूख मिटाने के लिए लिया गया कर्ज, आपकी की जेब को वर्षों तक हल्का करता रहेगा। तगड़ी मार – अमेरिका में 5 साल में किराने के दाम 32% बढ़ चुके पांच साल में किराने के दाम करीब 32% बढ़ चुके हैं। ऐसे में लोग बिल टालने के लिए क्रेडिट कार्ड और बीएनपीएल का सहारा लेते हैं। लेकिन मिनिमम पेमेंट चूकने पर पहले करीब 30 डॉलर (2,862) की लेट फीस, फिर अगली बार 41 डॉलर (3,912) तक की पेनल्टी लगती है। साथ ही इसमें करीब 30% सालाना ब्याज भी जुड़ जाता है। यानी सस्ता लगने वाला रास्ता असल में सबसे महंगा साबित होता है

31 जुलाई तक 5.9 करोड़ ITR फाइल हुए:2025-26 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न भरने की डेडलाइन खत्म, अब ₹5000 तक लेट फीस लगेगी

31 जुलाई तक 5.9 करोड़ ITR फाइल हुए:2025-26 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न भरने की डेडलाइन खत्म, अब ₹5000 तक लेट फीस लगेगी

वित्त वर्ष 2025-26 के लिए बिना किसी पेनल्टी और ब्याज के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने की आखिरी तारीख 31 जुलाई निकल गई है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के मुताबिक, इस डेडलाइन यानी 31 जुलाई तक देश में 5.9 करोड़ से अधिक टैक्सपेयर्स अपने ITR जमा कर चुके हैं। यह समयसीमा उन व्यक्तिगत टैक्सपेयर्स (ITR-1 और ITR-2) के लिए थी, जिन्हें अपने खातों का ऑडिट कराने की आवश्यकता नहीं होती है। आईटी विभाग ने ‘X’ पर दी जानकारी इनकम टैक्स विभाग ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर जानकारी देते हुए बताया कि टैक्सपेयर्स की ओर से शानदार रिस्पॉन्स मिला है। विभाग ने लिखा, “31 जुलाई तक 2025-26 के लिए 5.9 करोड़ से ज्यादा ITR दाखिल किए जा चुके हैं। हालांकि, यह संख्या पिछले साल की तुलना में अभी कम दिख रही है, क्योंकि पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में सरकार ने डेडलाइन को बढ़ाकर 16 सितंबर 2025 किया था, तब तक कुल 7.3 करोड़ से अधिक रिटर्न दाखिल हुए थे। ITR-1 (सहज): सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला फॉर्म ITR फॉर्म 1, जिसे ‘सहज’ भी कहा जाता है, एक बेहद सरल फॉर्म है। इसका इस्तेमाल देश के छोटे और मध्यम वर्ग के टैक्सपेयर्स बड़े पैमाने पर करते हैं। कौन भर सकता है: यह फॉर्म उन भारतीय निवासियों के लिए है जिनकी सालाना कमाई ₹50 लाख तक है। कमाई का जरिया: इसमें सैलरी से आय, एक घर से होने वाली आय, अन्य स्रोतों से आय (जैसे ब्याज) और सालाना ₹5,000 तक की कृषि आय शामिल है। ITR-2: बिजनेस से अलग और कैपिटल गेन्स वाले टैक्सपेयर्स के लिए ITR-2 फॉर्म उन इंडिविजुअल्स और हिंदू अनडिवाइडेड फैमिलीज (HUF) द्वारा भरा जाता है: 31 जुलाई की डेडलाइन छूट गई तो अब क्या करें? अगर आप किसी वजह से 31 जुलाई तक अपना ITR फाइल नहीं कर पाए हैं, तो घबराने की जरूरत नहीं है। आप अभी भी बिलेटेड रिटर्न फाइल कर सकते हैं:

31 जुलाई तक 5.9 करोड़ ITR फाइल हुए:2025-26 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न भरने की डेडलाइन खत्म, अब ₹5000 तक लेट फीस लगेगी

31 जुलाई तक 5.9 करोड़ ITR फाइल हुए:2025-26 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न भरने की डेडलाइन खत्म, अब ₹5000 तक लेट फीस लगेगी

वित्त वर्ष 2025-26 के लिए बिना किसी पेनल्टी और ब्याज के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करने की आखिरी तारीख 31 जुलाई निकल गई है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के मुताबिक, इस डेडलाइन यानी 31 जुलाई तक देश में 5.9 करोड़ से अधिक टैक्सपेयर्स अपने ITR जमा कर चुके हैं। यह समयसीमा उन व्यक्तिगत टैक्सपेयर्स (ITR-1 और ITR-2) के लिए थी, जिन्हें अपने खातों का ऑडिट कराने की आवश्यकता नहीं होती है। आईटी विभाग ने ‘X’ पर दी जानकारी इनकम टैक्स विभाग ने शनिवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर जानकारी देते हुए बताया कि टैक्सपेयर्स की ओर से शानदार रिस्पॉन्स मिला है। विभाग ने लिखा, “31 जुलाई तक 2025-26 के लिए 5.9 करोड़ से ज्यादा ITR दाखिल किए जा चुके हैं। हालांकि, यह संख्या पिछले साल की तुलना में अभी कम दिख रही है, क्योंकि पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में सरकार ने डेडलाइन को बढ़ाकर 16 सितंबर 2025 किया था, तब तक कुल 7.3 करोड़ से अधिक रिटर्न दाखिल हुए थे। ITR-1 (सहज): सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला फॉर्म ITR फॉर्म 1, जिसे ‘सहज’ भी कहा जाता है, एक बेहद सरल फॉर्म है। इसका इस्तेमाल देश के छोटे और मध्यम वर्ग के टैक्सपेयर्स बड़े पैमाने पर करते हैं। कौन भर सकता है: यह फॉर्म उन भारतीय निवासियों के लिए है जिनकी सालाना कमाई ₹50 लाख तक है। कमाई का जरिया: इसमें सैलरी से आय, एक घर से होने वाली आय, अन्य स्रोतों से आय (जैसे ब्याज) और सालाना ₹5,000 तक की कृषि आय शामिल है। ITR-2: बिजनेस से अलग और कैपिटल गेन्स वाले टैक्सपेयर्स के लिए ITR-2 फॉर्म उन इंडिविजुअल्स और हिंदू अनडिवाइडेड फैमिलीज (HUF) द्वारा भरा जाता है: 31 जुलाई की डेडलाइन छूट गई तो अब क्या करें? अगर आप किसी वजह से 31 जुलाई तक अपना ITR फाइल नहीं कर पाए हैं, तो घबराने की जरूरत नहीं है। आप अभी भी बिलेटेड रिटर्न फाइल कर सकते हैं:

एथेनॉल से पेट्रोल पर ₹30 प्रति लीटर की बचत हुई:सरकार का दावा- ब्लेंडिंग न होती तो दिल्ली में ₹125 लीटर मिलता, अभी ₹102 में मिल रहा

एथेनॉल से पेट्रोल पर ₹30 प्रति लीटर की बचत हुई:सरकार का दावा- ब्लेंडिंग न होती तो दिल्ली में ₹125 लीटर मिलता, अभी ₹102 में मिल रहा

क्रूड ऑयल की कीमतें जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में 135 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई थीं, तब अगर तेल कंपनियों ने पेट्रोल में एथेनॉल की ब्लेंडिंग न की होती, तो दिल्ली में पेट्रोल का भाव लगभग 125 रुपए प्रति लीटर पहुंच गया होता। शुक्रवार को पेट्रोलियम मंत्रालय ने एथेनॉल प्रोग्राम की लागत, खाद्य सुरक्षा पर असर और टैक्सपेयर्स की सब्सिडी से जुड़े दावों का जवाब देते हुए यह बात कही। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि संकट के समय पर इस प्रोग्राम की वजह से पेट्रोल पर प्रति लीटर लगभग 30 रुपए की बचत हुई। दिल्ली में अभी 102 रुपए लीटर है E20 पेट्रोल पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, वैश्विक बाजार में क्रूड की कीमतें बढ़ने के बावजूद देश में उपभोक्ताओं को पेट्रोल 94.77 रुपए प्रति लीटर के भाव पर मिला। इसका कारण यह था कि पूर्व-निर्धारित कीमतों पर घरेलू स्तर पर खरीदे गए एथेनॉल की हर एक लीटर पेट्रोल में 20% हिस्सेदारी थी। इसी वजह से रिटेल कीमतें क्रूड के तेज उछाल से बची रहीं। 28 फरवरी को पश्चिमी एशिया में तनाव और संघर्ष शुरू होने के बाद, सरकार ने करीब 75 दिनों तक पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखा था। इसके बाद मई में दामों में 7.5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी। दिल्ली में फिलहाल मानक E20 पेट्रोल (91-ऑक्टेन) की कीमत 102.12 रुपए प्रति लीटर है, जबकि 100-ऑक्टेन वाला पेट्रोल 169 रुपए प्रति लीटर के भाव पर मिल रहा है। गरीबों का अनाज या FCI का चावल डायवर्ट नहीं हुआ पेट्रोलियम मंत्रालय ने उन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिनमें कहा जा रहा था कि गरीबों के हक का खाद्यान्न एथेनॉल उत्पादन के लिए डायवर्ट किया जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट किया कि इस प्रोग्राम को चलाने या सपोर्ट देने के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) के सब्सिडी वाले चावल का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। माइलेज पर कितना असर: 2 से 6% तक घट सकती है एफिशिएंसी सड़क परिवहन मंत्रालय ने ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) के एक अध्ययन का हवाला दिया। गुरुवार को लोकसभा में जानकारी देते हुए मंत्रालय ने बताया कि E10 ईंधन के लिए डिजाइन की गई BS-III, BS-IV और BS-VI गाड़ियां जब E20 पर चलाई जाती हैं, तो उनकी कैपेसिटी और उम्र के हिसाब से माइलेज (फ्यूल एफिशिएंसी) में 2 से 6% तक की गिरावट आ सकती है। इससे पहले 20 जुलाई को तेल मंत्रालय ने राज्यसभा में बताया था कि ऐसी गाड़ियों में माइलेज की यह कमी लगभग 3-5% तक ही सीमित रहती है। वैज्ञानिक जांच के बाद लागू हुआ E20 दोनों मंत्रालयों ने जोर देकर कहा कि एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) प्रोग्राम को पूरी तरह से वैज्ञानिक रूप से जांचे-परखे और चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया है। जैसे-जैसे देश में उत्पादन क्षमता और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार होता गया, ब्लेंडिंग के स्तर को भी धीरे-धीरे बढ़ाया गया। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने लोकसभा में बताया कि E20 पर शिफ्ट होने का फैसला फ्यूल सिस्टम, इंजन की मजबूती, ड्राइवैबिलिटी, मटीरियल कम्पैटिबिलिटी और एमिशन परफॉर्मेंस की पूरी जांच और वैलिडेशन के बाद ही लिया गया है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान वाहन निर्माताओं, तेल विपणन कंपनियों (OMCs) और चीनी व अनाज उद्योग से लगातार सलाह-मशविरा किया गया। 23 करोड़ से ज्यादा गाड़ियों पर कोई असर नहीं सरकार ने लैब स्टडीज और रियल-वर्ल्ड डेटा का हवाला देते हुए बताया कि E20 फ्यूल के इस्तेमाल से गाड़ियों की ओवरऑल परफॉर्मेंस पर कोई विपरीत या प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। सड़कों पर चल रही 20 करोड़ से ज्यादा टू-व्हीलर्स और 3 करोड़ से अधिक पेट्रोल कारें इन एथेनॉल-मिश्रित ईंधनों पर चल रही हैं। एथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से इंजन खराब होने का कोई भी प्रामाणिक या सत्यापित मामला सामने नहीं आया है।