Naseeruddin Shah Birthday Interesting Facts; Pakistani Wife | Ratna Pathak

2 घंटे पहलेलेखक: अभय पांडेय कॉपी लिंक नसीरुद्दीन शाह ने 210 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया है। साल 1960 के दशक की बात है। एक दुबला-पतला लड़का था, जिसे एक्टर बनने के लिए मुंबई जाना था। एक दिन उनके एक दोस्त की गर्लफ्रेंड का पत्र आया कि मुंबई आ जाओ, मेरे पापा फिल्मों में कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं, वो तुम्हारी मदद करेंगे। जिसके बाद वो मुंबई के निकल पड़ा। हालांकि जिस लड़की के भरोसे वो मुंबई पहुंचा, वो खुद बेहद साधारण जिंदगी जी रही थी। जिसके बाद उसने कुछ दिन रिश्तेदार के घर गुजारे, फिर वहां से भी जाना पड़ा। जेब खाली हुई तो जरी की फैक्ट्री के हॉल में रातें बिताईं। जहां वो तीस-चालीस लोगों के साथ फर्श पर वो सोया। कई बार लोकल ट्रेन में बिना टिकट सफर किया। बाद में यही लड़का आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे शानदार अभिनेताओं में से एक बना। स्पर्श, मासूम, सरफरोश, ए वेडनेसडे और इश्किया जैसी कई फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से उसने दर्शकों का दिल जीता। जी हां, हम बात कर रहे हैं नसीरुद्दीन शाह की। आज उनके 76वें जन्मदिन पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ ऐसे अनसुने किस्से। 16 साल की उम्र में घर छोड़कर मुंबई चले गए थे नसीरुद्दीन शाह अपनी आत्मकथा एंड देन वन डे में लिखते हैं दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद उनको ऐसा लगा जैसे जिंदगी का सबसे मुश्किल पड़ाव पीछे छूट चुका हो। उनके पिता चाहते थे कि वो डॉक्टर बनें, अफसर बनें या फौज में जाएं। नेशनल डिफेंस अकादमी का फॉर्म भी भरवा दिया गया। मगर नसीरुद्दीन शाह के दिल में एक ही सपना था- एक्टर बनना और वह सपना मुंबई जाकर ही पूरा हो सकता था। कॉलेज में दाखिला तो हो गया, लेकिन क्लास से ज्यादा वक्त वो सिनेमाघरों में बिताते थे। फीस के पैसे भी फिल्मों पर खर्च होने लगे। इसी दौरान उन्होंने मुंबई में रहने वाली अपने एक दोस्त की गर्लफ्रेंड को पत्र लिखा, जिसके पिता फिल्मों में कैरेक्टर आर्टिस्ट थे। उसका जवाब आया, ‘मुंबई आ जाओ, पापा तुम्हारी मदद करेंगे।’ बस, इतना सुनना था कि नसीरुद्दीन ने फीस के पैसों से ट्रेन का टिकट खरीद लिया, घड़ी और साइकिल बेचने की योजना बनाई और जेब में करीब पांच सौ रुपए लेकर मुंबई के लिए निकल पड़े। नसीरुद्दीन शाह की युवावस्था की तस्वीरें। यह उनकी किताब से ली गई हैं। (AI की मदद से तस्वीरों की क्वालिटी बेहतर की गई है।) हालांकि, जिस लड़की के परिवार के भरोसे वह मुंबई आए थे, वही बेहद साधारण जिंदगी जी रही थी। इसके बाद कुछ दिन वह रिश्तेदार के घर में रहे, लेकिन जब सबको समझ आ गया कि यह लड़का वापस जाने वाला नहीं है, तो वहां से चले गए और एक जरी कढ़ाई की फैक्ट्री के बड़े-से हॉल में रहने लगे। रात में वहीं तीस-चालीस लोग फर्श पर सोते थे। इस दौरान उन्होंने वेटर बनने की कोशिश की और ताज होटल में बेलबॉय की नौकरी के लिए आवेदन दिया, लेकिन हर जगह निराशा ही हाथ लगी। फिर एक दिन एक दलाल उन्हें फिल्मों में एक्स्ट्रा कलाकार का काम दिलाने ले गया। मेहनताना था सिर्फ साढ़े सात रुपए। फिल्म थी अमन, जिसमें राजेंद्र कुमार मुख्य भूमिका निभा रहे थे। अंतिम यात्रा वाले सीन में नसीरुद्दीन भी भीड़ का हिस्सा बने। कैमरे के सामने खड़े होकर उन्हें लगा जैसे उनका सपना पूरा हो गया हो। वहीं, फिल्म आने के बाद वह हंसते हुए कहा करते थे, “दोस्तो, फिल्म में और भी सीन थे, लेकिन वह इसलिए काट दिए गए क्योंकि मेरी एक्टिंग बहुत अच्छी थी।” दिलीप कुमार ने फिल्मों से दूर रहने की सलाह दी घर से बिना बताए मुंबई आए नसीरुद्दीन शाह एक दिन पामपोश रेस्तरां के बाहर फुटपाथ पर बैठे थे। तभी एक लंबी, चमचमाती ग्रे रंग की लिमोजीन उनके सामने आकर रुकी। पीछे का दरवाजा खुला और ऊंची एड़ी की सैंडल पहने एक महिला उतरीं। उन्होंने पूछा, ‘क्या तुम्हारा नाम नसीर है?’ शाह ने हैरानी में सिर हिलाया। महिला ने बिना समय गंवाए उन्हें कार की आगे वाली सीट पर बैठने का इशारा किया। थोड़ी देर बाद उन्होंने उस महिला को पहचान लिया। वे थीं सईदा खान, दिलीप कुमार की सबसे छोटी बहन। तब नसीरुद्दीन शाह को समझ आया कि आखिर उन्हें ढूंढ़ कैसे लिया गया। उनके पिता अजमेर की उस सूफी दरगाह के प्रशासक रह चुके थे, जहां दिलीप कुमार की एक और बहन सकीना अक्सर आया करती थीं। दो महीने तक उनका कोई पता न मिलने के बाद आखिरकार पिता ने उन्हीं से संपर्क किया और एक पुराने परिचय के सहारे दिलीप कुमार का परिवार शाह तक पहुंचा था। कार दिलीप कुमार के बंगले में दाखिल हुई। ऊपर ले जाकर उनकी मुलाकात सकीना से कराई गई। अजमेर में वे उनसे पहले मिल चुके थे, लेकिन इस बार सकीना बेहद नाराज थीं। उनके सामने वे रो पड़े और माफी मांगने लगे। आखिरकार उन्होंने घर लौटने की हामी भर दी। नसीरुद्दीन शाह और दिलीप कुमार ने एक साथ 1986 में रिलीज हुई सुभाष घई की फिल्म ‘कर्मा’ में काम किया। (AI की मदद से तस्वीर की क्वालिटी बेहतर की गई है।) बंगले के बेसमेंट में उन्हें रहने की जगह दे दी गई। कमरा साधारण था, लेकिन खाने-पीने और नहाने की पूरी व्यवस्था थी। एक दिन उनकी मुलाकात खुद दिलीप कुमार से भी हुई। शाह उनसे काम मांगना चाहते थे, लेकिन हिम्मत जुटा पाते, उससे पहले ही दिलीप कुमार ने उन्हें समझा दिया कि अच्छे परिवारों के लड़कों को फिल्म इंडस्ट्री में नहीं आना चाहिए। कुछ दिनों बाद दिलीप कुमार के परिवार ने शाह को मेरठ भेज दिया। लल्लनटॉप को दिए इंटरव्यू में नसीरुद्दीन शाह ने बताया था कि जब दिलीप कुमार ने उनसे कहा, ‘अच्छे घरों के लड़कों को फिल्मों में नहीं आना चाहिए,’ तो उस वक्त वो दिलीप कुमार से पूछना चाहते थे, ‘अगर ऐसा है, तो फिर आप खुद इस इंडस्ट्री में क्यों आए? आप भी तो एक अच्छे और संभ्रांत परिवार से थे।’ हालांकि, उनकी ऐसा कहने की हिम्मत नहीं हुई। 34 साल की पाकिस्तानी औरत से गुपचुप शादी की थी नसीरुद्दीन शाह की पहली शादी परवीन मुराद उर्फ मनारा सीकरी से हुई थी। उनकी मुलाकात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हुई
Annu Kapoor Interview | Struggle Journey Bollywood Uttar Da Puttar

2 घंटे पहले कॉपी लिंक दिग्गज अभिनेता अन्नू कपूर इन दिनों अपनी फिल्म ‘उत्तर दा पुत्तर’ को लेकर चर्चा में हैं। यह फिल्म एक बेहद संवेदनशील मगर व्यंग्यात्मक तरीके से इंसान के सबसे बड़े असमंजस ‘कर्म बड़ा या किस्मत’ पर सवाल उठाती है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में अन्नू कपूर ने अपने अधूरे सपनों, बॉलीवुड के संघर्ष, सोशल मीडिया के अंधविश्वास और जिंदगी के कड़वे अनुभवों पर खुलकर बात की। अन्नू कपूर ने बताया कि कैसे एक समय उनके पास ड्राइवर को देने के पैसे नहीं थे, लेकिन एक वफादार साथी और उनकी नियति ने उन्हें आज इस मुकाम पर पहुंचाया है। सवाल: ‘उत्तर दा पुत्तर’ सवाल पूछती है, कर्म बड़ा या किस्मत? आप किसे बड़ा मानते हैं? जवाब: मैं तो यही मानता हूं कि आपके कर्म भी आपकी किस्मत ही तय करती है। भाग्य से बाहर कुछ भी नहीं है। जिस रास्ते पर आपको जाना है और वहां जाकर जो कर्म करने हैं, वह सब पहले से तय (Pre-determined) है। हम तो सिर्फ निमित्त हैं, कोई और है जो हमें चला रहा है। आम आदमी के मन को समझाने के लिए यह कहना अच्छा लगता है कि ‘कर्म ठीक कर तो भाग्य बदल जाएगा’, लेकिन सच यही है कि हमारे एक-एक पल का लेखा-जोखा पहले से एल्गोरिथम की तरह सेट है। सवाल: अगर किस्मत का पहिया अलग घूमता, तो आज अन्नू कपूर अभिनेता होते या कुछ और? जवाब: मैं तो आईएएस (IAS) बनना चाहता था। पढ़ाई में रिकॉर्ड अच्छा था, अकादमिक रूप से भी ठीक था। लेकिन घर के हालात ऐसे नहीं थे कि माता-पिता आगे पढ़ा पाते। कोई स्कॉलरशिप देने वाला गॉडफादर भी नहीं था। जब पढ़ाई छूट गई, तो मजबूरी में पिताजी के थिएटर से जुड़ना पड़ा। जैसे कोई काम न मिलने पर बेटा पिता की दुकान पर बैठ जाता है, मेरे साथ भी वही हुआ। आज लोग इसे मेरी अच्छी किस्मत कहते हैं कि मैं एक्टर बना, लेकिन मैं मानता हूं कि मैं जो बनना चाहता था, वो नहीं बन पाया। सवाल: क्या कभी इस बात को लेकर किस्मत से कोई शिकायत रही? जवाब: उस उम्र में झटका लगा था, लेकिन वक्त सब सिखा देता है। मेरे बचपन का एक दोस्त था मंटू। वह पढ़ाई में बहुत तेज था, सरस्वती का उपासक था, लेकिन उसके पिता किराने के बड़े व्यापारी थे। पिता ने उसे जबरन अनाज की दुकान पर बिठा दिया। वह जिंदगी भर रोता रहा कि उसका मन कहीं और था, लेकिन उसकी किस्मत में 50 करोड़ के बिजनेस को 400 करोड़ बनाना लिखा था। जिंदगी हमेशा वहां नहीं ले जाती जहां आप जाना चाहते हैं, बल्कि वहां ले जाती है जहां आपको होना चाहिए। सवाल: आजकल सोशल मीडिया पर किस्मत चमकाने का बड़ा बाजार है। कोई अंगूठी बेच रहा है तो कोई वास्तु। इस अंधविश्वास को आप कैसे देखते हैं? जवाब: यह सब इंसानी डर और उम्मीद का कारोबार है। कोई नीलम पहना रहा है, कोई पन्ना। अगर संयोग से कुछ ठीक हो गया, तो लोग पत्थर को चमत्कारी मान लेते हैं। हकीकत यह है कि इन पत्थरों की कोई रीसेल वैल्यू नहीं है। पुराने समय में रोमन में ‘सैलरी’ शब्द नमक (सलेरिआ) से आया था, क्योंकि तब नमक की कीमत थी, सोने की नहीं। कोविड के दौर ने हम सबको सिखा दिया था कि तिजोरी में बंद सोना नहीं, बल्कि मुफ्त में मिलने वाली ऑक्सीजन का एक सिलेंडर सबसे बड़ी दौलत थी। सब वक्त और जरूरत का खेल है। सवाल: आप एक्टिंग, सिंगिंग, होस्टिंग सब करते हैं। तो ‘उत्तर दा पुत्तर’ में एक्टिंग और डायरेक्शन एक साथ क्यों नहीं किया? राजनीति में आने के भी ऑफर मिले होंगे? जवाब: भाई, दोनों चीजें एक साथ संभालना मेरे बस की बात नहीं है। मैं इतना टैलेंटेड नहीं हूं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे राजनीति मेरे बस की बात नहीं है। अच्छा वक्ता होना अलग बात है और देश चलाना बिल्कुल अलग। मैं गरीब हो सकता हूं, लेकिन इतना मूर्ख नहीं कि अपनी सीमाओं को न पहचानूं। फिल्म के निर्माता संदीप कपूर ने पहले मुझे डायरेक्ट करने को कहा था, लेकिन मैंने मना कर दिया। फिर उन्होंने मुझे यह विरोधाभासी किरदार दिया। फिल्म में मैं एक ऐसे फिजिक्स प्रोफेसर का रोल कर रहा हूं जो खुद मेटाफिजिक्स (अंधविश्वास/अध्यात्म) के चक्कर में ऑब्सेस्ड हो जाता है। सवाल: चार दशकों के करियर में आपने कई उतार-चढ़ाव देखे। जिंदगी का सबसे बड़ा सबक आपको कहां से मिला? जवाब: मैं किसी को ज्ञान नहीं देता, क्योंकि मैं खुद को अज्ञानी मानता हूं। हां, अनुभव जरूर साझा कर सकता हूं। साल 1985-86 की बात है, मैं जयपुर से कोटा जा रहा था। टोंक के पास एक खेत में गाड़ी रुकवाकर मैंने एक किसान से पानी मांगा। उसने बड़े सम्मान से पीतल के गिलास में ठंडा पानी पिलाया और ताजी गाजर खिलाई। मेरे मुंह से निकला ‘मजा आ गया’। उस साधारण किसान ने मुझसे एक ऐसी बात कही जो बड़े-बड़े लेखक नहीं लिख सकते। उसने कहा- “कंवर साहब, यो मजो भी घणी टेढ़ी चीज छे। नी आवे तो करोड़ रुपिया में नी आवे, ने आ जावे तो एक गिलास ठंडा पानी में आ जावे।” उस दिन मुझे समझ आया कि असली सुख पैसों में नहीं, संतुष्टि में है। मुझे ‘कबीर’, ‘अंताक्षरी’ और ‘विक्की डोनर’ जैसी फिल्मों में काम करके यही आत्मिक सुकून मिला। सवाल: आपकी जिंदगी का सबसे चुनौतीपूर्ण या वो दौर कौन सा था जिसने आपको अंदर तक झकझोर दिया? जवाब: मेरी जर्नी में ऐसे कई मोड़ आए। 4 मई 1992 से एक ऐसा भयानक दौर शुरू हुआ था, जो साढ़े चार महीने तक चला। मैं एक हजार रुपये किराये के छोटे से कमरे में रहता था। जेब में न एक पैसे का कैश था, न कोई चेक, न कोई शूटिंग। मैं दिन भर खाली रहता था, रात को दोस्तों के घर ताश खेलता था और सुबह देर से सोकर उठता था ताकि सीधे लंच कर सकूं और खाना बच जाए। उस समय मेरे ड्राइवर केशव दत्त ने जो किया, मैं कभी नहीं भूल सकता। जब मैंने तंगी के कारण उससे कहा कि तू कहीं और काम कर ले, मैं तुझे एचएलएल में बड़े अफसर के यहाँ लगवा देता हूं, जहां तुझे 750 की जगह 2000 रुपये सैलरी मिलेगी। तब
Aadarsh Bal Vidyalaya Cast Interview

27 मिनट पहले कॉपी लिंक मार्कशीट में कितने नंबर आए थे, यह शायद वक्त के साथ याद नहीं रहता, लेकिन स्कूल की घंटी, रीसेस, दोस्तों के साथ की गई शरारतें, टीचर्स की डांट और क्लासरूम के किस्से जिंदगीभर साथ चलते हैं। प्राइम वीडियो की नई सीरीज ‘आदर्श बाल विद्यालय’ भी इन्हीं यादों के सहारे आज की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाती है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में केके मेनन, नवीन कस्तूरिया, अर्चना पूरन सिंह, समीर सक्सेना और हिमांक गौर ने अपने स्कूल के दिनों की यादें ताजा कीं। बातचीत के दौरान कभी सब ठहाके लगाते नजर आए, तो कभी अच्छे टीचर्स और एजुकेशन सिस्टम को लेकर गंभीर बातें भी सामने आईं। ‘रीसेस का इंतजार रहता था, सबसे बड़ा टेंशन यूनिट टेस्ट होता था’ जब सभी कलाकारों से पूछा गया कि स्कूल की सबसे पहली याद क्या आती है, तो जवाब लगभग हर उस इंसान जैसा था जिसने स्कूल की जिंदगी जी है। नवीन कस्तूरिया ने मुस्कुराते हुए कहा कि सबसे पहले उन्हें रीसेस याद आती है। पूरा दिन उसी का इंतजार रहता था क्योंकि वही दोस्तों के साथ खुलकर मस्ती करने का समय होता था। उस उम्र में सबसे बड़ा टेंशन यूनिट टेस्ट का होता था। लगता था कि किसी तरह टेस्ट खत्म हो जाए, फिर कुछ दिनों के लिए जिंदगी आसान हो जाएगी। वहीं केके मेनन ने बताया कि उन्हें स्कूल के दिनों में हिस्ट्री सबसे ज्यादा पसंद थी। आज भी इतिहास पढ़ना और उससे जुड़ी चीजों को जानना उन्हें उतना ही अच्छा लगता है। किसी का सपना एयर होस्टेस, तो कोई ट्रेन ड्राइवर बनना चाहता था बात जब बचपन के सपनों पर पहुंची तो हर किसी का जवाब अलग था। अर्चना पूरन सिंह ने हंसते हुए बताया कि बचपन में वह एयर होस्टेस बनना चाहती थीं। वजह भी दिलचस्प थी। उन्हें लगता था कि एयर होस्टेस को दुनिया घूमने का मौका मिलता है और उनके पास ढेर सारी चॉकलेट होती हैं। बाद में उनका मन टीचर बनने का होने लगा। केके मेनन ने बताया कि बचपन में वह ट्रेन ड्राइवर बनना चाहते थे। उन्हें लोकोमोटिव और बड़े-बड़े वाहनों को देखकर हमेशा हैरानी होती थी कि आखिर इन्हें चलाया कैसे जाता होगा। नवीन कस्तूरिया ने कहा कि क्लास छह तक उनका सपना एक्टर बनने का था। बाद में आईआईटी की तैयारी शुरू हो गई, लेकिन फिल्मों का आकर्षण कभी खत्म नहीं हुआ। किसी टीचर के पास डंडा था, कोई ड्रैकुला की कहानी सुनाता था स्कूल के टीचर्स का जिक्र आते ही पूरी स्टारकास्ट अपने-अपने किस्से सुनाने लगी। समीर सक्सेना ने बताया कि उनके स्कूल में एक टीचर क्लास में आते ही शोर मचाने वाले बच्चों को लाइन में खड़ा कर एक-एक करके थप्पड़ मारते थे। आज उस घटना को याद करके हंसी आती है। केके मेनन ने कहा कि उनके समय में सजा देने के भी अलग-अलग तरीके होते थे। कोई चॉक फेंकता था, कोई डस्टर, तो कोई कान पकड़कर खड़ा कर देता था। अर्चना पूरन सिंह ने अपने इंग्लिश टीचर को याद किया, जो पढ़ाई के बीच ड्रैकुला की कहानियां सुनाने लगते थे। पूरी क्लास उनकी कहानी सुनने का इंतजार करती थी। वहीं समीर सक्सेना ने बताया कि उनके पीटी टीचर खेल कराने के बजाय हॉरर फिल्मों की कहानियां सुनाते थे। चीटिंग पर भी हुई खुलकर बात बातचीत के दौरान बोर्ड एग्जाम और चीटिंग के किस्से भी सामने आए। नवीन कस्तूरिया ने हंसते हुए स्वीकार किया कि 12वीं की फिजिक्स परीक्षा में वह किसी तरह पास हुए थे। वहीं केके मेनन ने एक मजेदार किस्सा सुनाया कि एक बार पीछे बैठे छात्र ने उनकी आंसर शीट देखकर पूरा जवाब उतार लिया था और आखिर में दोनों पकड़े गए। हालांकि, अर्चना पूरन सिंह ने कहा कि उनके स्कूल में चीटिंग के बारे में सोचना भी गलत माना जाता था। ‘सबसे अच्छे लोग टीचर बनेंगे, तभी देश बदलेगा’ मस्ती और यादों के बीच बातचीत शिक्षा व्यवस्था के गंभीर मुद्दों तक भी पहुंची। नवीन कस्तूरिया ने कहा कि अगर देश को आगे बढ़ाना है तो टीचर की नौकरी सबसे सम्मानित होनी चाहिए। अच्छे वेतन और सम्मान से ही सबसे काबिल लोग इस पेशे में आएंगे। केके मेनन ने भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि भारत में गुरु की परंपरा रही है, लेकिन धीरे-धीरे हमने टीचर्स को वह सम्मान देना कम कर दिया। उनका मानना है कि समाज में टीचर्स की इज्जत और आर्थिक स्थिति दोनों बेहतर होनी चाहिए। अर्चना पूरन सिंह ने कहा कि बच्चों को सिर्फ अच्छे मार्क्स लाने के लिए तैयार नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें अच्छा इंसान बनाने पर भी उतना ही जोर होना चाहिए। ‘लोग सिर्फ हंसेंगे नहीं, अपना बचपन भी याद करेंगे’ स्टारकास्ट का मानना है कि ‘आदर्श बाल विद्यालय’ सिर्फ एक हल्की-फुल्की कॉमेडी नहीं है। इसके जरिए शिक्षा व्यवस्था, टीचर्स, बच्चों और पेरेंट्स के रिश्तों पर कई जरूरी सवाल भी उठाए गए हैं। हिमांक गौर ने कहा कि शो में हर किसी को अपने स्कूल का कोई न कोई किरदार जरूर दिखाई देगा। वहीं समीर सक्सेना का मानना है कि इसमें दिखाए गए हालात भले ही मजाकिया लगें, लेकिन उनके पीछे जिंदगी की सच्चाइयां छिपी हैं। केके मेनन ने बातचीत खत्म करते हुए कहा कि अच्छी कहानियां सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि दर्शकों के मन में सवाल भी छोड़ जाती हैं। यही कोशिश ‘आदर्श बाल विद्यालय’ की भी है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
President Murmu Moldova Visit | PV Sindhu Wins Japan Open 2026

14 मिनट पहले कॉपी लिंक आज के प्रमुख करेंट अफेयर्स, जो सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स के लिए जरूरी हैं- इंटरनेशनल (INTERNATIONAL) 1. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू अपनी यात्रा के पहले दिन मोल्दोवा पहुंची 20 जुलाई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पूर्वी यूरोप में स्थित देश मोल्दोवा पहुंची हैं। वे आज मोल्दोवा की राष्ट्रपति माया सांडू से मुलाकात करेंगी। मुर्मू मोल्दोवा की संसद के अध्यक्ष इगोर ग्रोसु से मुलाकत करेंगी और भारत-मोल्दोवा संसदीय मैत्री समूह के सदस्यों से भी बातचीत करेंगी। राष्ट्रपति मुर्मू 19 जुलाई तीन देशों की यात्रा पर रवाना हुईं हैं। इस यात्रा में मुर्मू पूर्वी यूरोप में स्थित लैंडलॉक मोल्दोवा, उत्तरी मैसेडोनिया और रोमानिया जाएंगी। उत्तरी मैसेडोनिया और रोमानिया में राष्ट्रपति मुर्मू टॉप लीडर्स से मिलेंगी और बिजनेस फोरम को भी संबोधित करेंगी। इस यात्रा में व्यापार, निवेश, शिक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा सांस्कृतिक सहयोग पर चर्चा होगी। राष्ट्रपति मुर्मू की 3 देशों की ये यात्रा भारत के द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर करने के लिए हैं, इससे देशों के बीच संबंध मजबूत होंगे। राष्ट्रपति मुर्मू 25 जुलाई तक इन देशी की यात्रा पर हैं। ये किसी भारतीय राष्ट्रपति की मोल्दोवा और उत्तरी मैसेडोनिया की पहली यात्रा है। स्पोर्ट्स (SPORTS) 2. भारतीय शटलर पीवी सिंधु ने जापान ओपन 2026 जीता 19 जुलाई को भारत की स्टार बैडमिंटन प्लेयर पीवी सिंधु जापान ओपन सुपर-750 बैडमिंटन टूर्नामेंट जीता। सिंधु ये टूर्नामेंट जीतने वाली भारत की पहली बेडमिंटन प्लेयर हैं। 31 वर्षीय सिंधु ने फाइनल मुकाबले में जापान की अकाने यामागुची को 21-17, 21-17 से हराया। इससे पहले सिंधु 2019 में सबसे बड़ी वर्ल्ड चैंपियनशिप का हिस्सा रही थीं और उन्होंने इंटरनेशनल खिताब जीता था। सिंधु ने आखिरी खिताब 2022 में सिंगापुर ओपन सुपर 500 जीता था। सिंधु ने साल 2012 में पहली बार एशियन जूनियर बैडमिंटन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता।’ 2013 में वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप में ब्रॉन्ज जीतने वाली पहली भारतीय महिला थीं। 2013 में पीवी सिंधु को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। पीवी सिंधु को साल 2015 में पद्म श्री और साल 2020 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। जापान ओपन सुपर-750 जापान ओपन सुपर-750 बैडमिंटन का एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट है, जिसका आयोजन जापान के टोक्यो में किया जाता है। ये BWF (बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन) वर्ल्ड टूर का हिस्सा है और इसे खेलों में मिलने वाली रैंकिंग पॉइंट्स और प्राइज मनी के आधार पर चौथा सबसे बड़ा टूर्नामेंट माना जाता है। BWF पूरे साल कई तरह के टूर्नामेंट आयोजित करता है। सुपर-750 उन चुनिंदा 6 स्तरों में से एक है। इस स्तर के टूर्नामेंट जीतने पर खिलाड़ियों को 7000 से ज्यादा रैंकिंग पॉइंट्स मिलते हैं। पीवी सिंधु को साल 2020 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। नेशनल (NATIONAL 3. पनामा के विदेश मंत्री जेवियर एडुआर्डो भारत यात्रा पर आए 19 जुलाई को पनामा के विदेश मंत्री जेवियर एडुआर्डो मार्टिनेज-आचा वास्केज 5 दिनों की आधिकारिक यात्रा पर भारत पहुंचे। वे 23 जुलाई तक भारत में रहेंगे। जेवियर आज केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर से द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। जेवियर इस यात्रा दौरान भारत-पनामा संबंधों को बेहतर करने पर चर्चा करेंगे। साथ ही इस यात्रा में ट्रेड, इंवेस्टमेंट,मेरीटाइम सिक्योरिटी, कनेक्टिविटी के क्षेत्रों को बेहतर करने पर बात की जाएगी। जेवियर इस यात्रा के दौरान मंगलवार को नई दिल्ली में आधिकारिक कार्यक्रम में भी हिस्सा लेंगे। इस यात्रा के दौरान विदेश मंत्री जेवियर केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल से मिलेंगे और ट्रांसपोर्ट भवन में केंद्रीय पोर्ट्स, शिपिंग और वॉटरवेज से जुड़े मुद्दों पर बात करेंगे। विदेश मंत्री जेवियर इस यात्रा के दौरान विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ द्विपक्षीय वार्ता करेंगे और केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से मुलाकात करेंगे। इस बातचीत में मेरीटाइम सिक्योरिटी, लॉजिस्टिक्स, पोर्ट डेवलपमेंट और दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर भी बात होगी। भारत और पनामा के बीच ऐतिहासिक, आर्थिक और कूटनीतिक रूप से अत्यंत मजबूत और मैत्रीपूर्ण संबंध हैं। मध्य अमेरिकी क्षेत्र में पनामा वह पहला देश है जहां भारत ने 1973 में अपना स्थायी दूतावास स्थापित किया था। भारत और पनामा के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध 1962 में स्थापित हुए थे। 5. जांजीबार के राष्ट्रपति हुसैन अली ने उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन से मुलाकात की 19 जुलाई को जांजीबार के राष्ट्रपति हुसैन अली म्विनी ने भारत के रक्षा मंत्री डॉ. एस जयशंकर से मुलाकात की। इस मुलाकात में दोनों प्रमुखों ने व्यापार, निवेश, हेल्थकेयर, शिक्षा, समुद्री सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी और डिजिटल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर बात की। इसके साथ ही म्विनी ने उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन से भी मुलाकात की। राष्ट्रपति म्विनी, उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन के निमंत्रण पर अपनी पत्नी मरियम और मंत्रियों,वरिष्ठ अधिकारियों के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत आए हैं। राष्ट्रपति हुसैन अली की ये यात्रा भारत- तंजानिया रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा है। जांजीबार हिंद महासागर में एक रणनीतिक जगह पर स्थित है, जो इसे समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बनाता है। ये जांजीबार भारत के अफ्रीका आउटरीच और SAGAR (क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास) विजन में एक महत्वपूर्ण भागीदार है। राष्ट्रपति म्विनी 17 जुलाई को भारत पहुंचे हैं। यात्रा की शुरुआत में वे IIT मद्रास के 63वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। IIT मद्रास जांजीबार कैंपस भारत और जांजीबार ने मिलकर तैयार किया है। इसकी स्थापना के दो साल भी पूरे हुए हैं। जांजीबार के राष्ट्रपति हुसैन अली 2023 में आधिकारिक तौर पर भारत आए थे। अवार्ड (AWARD) 6. राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का ऐलान हुआ 18 जुलाई को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का ऐलान हुआ। फिल्म आर्टिकल 370 को साल 2024 की बेस्ट फीचर फिल्म का पुरस्कार मिला। वहीं राजकुमार राव अभिनीत फिल्म ‘श्रीकांत’ को बेस्ट हिंदी फिल्म का पुरस्कार मिला। एक्ट्रेस यामी गौतम को आर्टिकल 370 में लीडिंग रोल में बेस्ट एक्ट्रेस का पुरस्कार दिया गया। वहीं, ‘ब्रमायुगम’ के लिए ममूटी और ‘चंदू चैंपियन’ के लिए कार्तिक आर्यन को संयुक्त रूप से लीडिंग रोल में बेस्ट एक्टर का पुरस्कार दिया गया। बेस्ट गैर-फीचर फिल्म का अवॉर्ड भंगार को मिला। नेशनल फिल्म पुरस्कार नेशनल फिल्म पुरस्कार की शुरुआत 1954 में हुई। शुरुआत में इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय सिनेमा को प्रोत्साहित करना और अलग-अलग भाषाओं की श्रेष्ठ फिल्मों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देना
Naseeruddin Shah Birthday Interesting Facts; Pakistani Wife | Ratna Pathak

13 मिनट पहलेलेखक: अभय पांडेय कॉपी लिंक नसीरुद्दीन शाह ने 210 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया है। साल 1960 के दशक की बात है। एक दुबला-पतला लड़का था, जिसे एक्टर बनने के लिए मुंबई जाना था। एक दिन उनके एक दोस्त की गर्लफ्रेंड का पत्र आया कि मुंबई आ जाओ, मेरे पापा फिल्मों में कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं, वो तुम्हारी मदद करेंगे। जिसके बाद वो मुंबई के निकल पड़ा। हालांकि जिस लड़की के भरोसे वो मुंबई पहुंचा, वो खुद बेहद साधारण जिंदगी जी रही थी। जिसके बाद उसने कुछ दिन रिश्तेदार के घर गुजारे, फिर वहां से भी जाना पड़ा। जेब खाली हुई तो जरी की फैक्ट्री के हॉल में रातें बिताईं। जहां वो तीस-चालीस लोगों के साथ फर्श पर वो सोया। कई बार लोकल ट्रेन में बिना टिकट सफर किया। बाद में यही लड़का आगे चलकर भारतीय सिनेमा के सबसे शानदार अभिनेताओं में से एक बना। स्पर्श, मासूम, सरफरोश, ए वेडनेसडे और इश्किया जैसी कई फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से उसने दर्शकों का दिल जीता। जी हां, हम बात कर रहे हैं नसीरुद्दीन शाह की। आज उनके 76वें जन्मदिन पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ ऐसे अनसुने किस्से। 16 साल की उम्र में घर छोड़कर मुंबई चले गए थे नसीरुद्दीन शाह अपनी आत्मकथा एंड देन वन डे में लिखते हैं दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद उनको ऐसा लगा जैसे जिंदगी का सबसे मुश्किल पड़ाव पीछे छूट चुका हो। उनके पिता चाहते थे कि वो डॉक्टर बनें, अफसर बनें या फौज में जाएं। नेशनल डिफेंस अकादमी का फॉर्म भी भरवा दिया गया। मगर नसीरुद्दीन शाह के दिल में एक ही सपना था- एक्टर बनना और वह सपना मुंबई जाकर ही पूरा हो सकता था। कॉलेज में दाखिला तो हो गया, लेकिन क्लास से ज्यादा वक्त वो सिनेमाघरों में बिताते थे। फीस के पैसे भी फिल्मों पर खर्च होने लगे। इसी दौरान उन्होंने मुंबई में रहने वाली अपने एक दोस्त की गर्लफ्रेंड को पत्र लिखा, जिसके पिता फिल्मों में कैरेक्टर आर्टिस्ट थे। उसका जवाब आया, ‘मुंबई आ जाओ, पापा तुम्हारी मदद करेंगे।’ बस, इतना सुनना था कि नसीरुद्दीन ने फीस के पैसों से ट्रेन का टिकट खरीद लिया, घड़ी और साइकिल बेचने की योजना बनाई और जेब में करीब पांच सौ रुपए लेकर मुंबई के लिए निकल पड़े। नसीरुद्दीन शाह की युवावस्था की तस्वीरें। यह उनकी किताब से ली गई हैं। (AI की मदद से तस्वीरों की क्वालिटी बेहतर की गई है।) हालांकि, जिस लड़की के परिवार के भरोसे वह मुंबई आए थे, वही बेहद साधारण जिंदगी जी रही थी। इसके बाद कुछ दिन वह रिश्तेदार के घर में रहे, लेकिन जब सबको समझ आ गया कि यह लड़का वापस जाने वाला नहीं है, तो वहां से चले गए और एक जरी कढ़ाई की फैक्ट्री के बड़े-से हॉल में रहने लगे। रात में वहीं तीस-चालीस लोग फर्श पर सोते थे। इस दौरान उन्होंने वेटर बनने की कोशिश की और ताज होटल में बेलबॉय की नौकरी के लिए आवेदन दिया, लेकिन हर जगह निराशा ही हाथ लगी। फिर एक दिन एक दलाल उन्हें फिल्मों में एक्स्ट्रा कलाकार का काम दिलाने ले गया। मेहनताना था सिर्फ साढ़े सात रुपए। फिल्म थी अमन, जिसमें राजेंद्र कुमार मुख्य भूमिका निभा रहे थे। अंतिम यात्रा वाले सीन में नसीरुद्दीन भी भीड़ का हिस्सा बने। कैमरे के सामने खड़े होकर उन्हें लगा जैसे उनका सपना पूरा हो गया हो। वहीं, फिल्म आने के बाद वह हंसते हुए कहा करते थे, “दोस्तो, फिल्म में और भी सीन थे, लेकिन वह इसलिए काट दिए गए क्योंकि मेरी एक्टिंग बहुत अच्छी थी।” दिलीप कुमार ने फिल्मों से दूर रहने की सलाह दी घर से बिना बताए मुंबई आए नसीरुद्दीन शाह एक दिन पामपोश रेस्तरां के बाहर फुटपाथ पर बैठे थे। तभी एक लंबी, चमचमाती ग्रे रंग की लिमोजीन उनके सामने आकर रुकी। पीछे का दरवाजा खुला और ऊंची एड़ी की सैंडल पहने एक महिला उतरीं। उन्होंने पूछा, ‘क्या तुम्हारा नाम नसीर है?’ शाह ने हैरानी में सिर हिलाया। महिला ने बिना समय गंवाए उन्हें कार की आगे वाली सीट पर बैठने का इशारा किया। थोड़ी देर बाद उन्होंने उस महिला को पहचान लिया। वे थीं सईदा खान, दिलीप कुमार की सबसे छोटी बहन। तब नसीरुद्दीन शाह को समझ आया कि आखिर उन्हें ढूंढ़ कैसे लिया गया। उनके पिता अजमेर की उस सूफी दरगाह के प्रशासक रह चुके थे, जहां दिलीप कुमार की एक और बहन सकीना अक्सर आया करती थीं। दो महीने तक उनका कोई पता न मिलने के बाद आखिरकार पिता ने उन्हीं से संपर्क किया और एक पुराने परिचय के सहारे दिलीप कुमार का परिवार शाह तक पहुंचा था। कार दिलीप कुमार के बंगले में दाखिल हुई। ऊपर ले जाकर उनकी मुलाकात सकीना से कराई गई। अजमेर में वे उनसे पहले मिल चुके थे, लेकिन इस बार सकीना बेहद नाराज थीं। उनके सामने वे रो पड़े और माफी मांगने लगे। आखिरकार उन्होंने घर लौटने की हामी भर दी। नसीरुद्दीन शाह और दिलीप कुमार ने एक साथ 1986 में रिलीज हुई सुभाष घई की फिल्म ‘कर्मा’ में काम किया। (AI की मदद से तस्वीर की क्वालिटी बेहतर की गई है।) बंगले के बेसमेंट में उन्हें रहने की जगह दे दी गई। कमरा साधारण था, लेकिन खाने-पीने और नहाने की पूरी व्यवस्था थी। एक दिन उनकी मुलाकात खुद दिलीप कुमार से भी हुई। शाह उनसे काम मांगना चाहते थे, लेकिन हिम्मत जुटा पाते, उससे पहले ही दिलीप कुमार ने उन्हें समझा दिया कि अच्छे परिवारों के लड़कों को फिल्म इंडस्ट्री में नहीं आना चाहिए। कुछ दिनों बाद दिलीप कुमार के परिवार ने शाह को मेरठ भेज दिया। लल्लनटॉप को दिए इंटरव्यू में नसीरुद्दीन शाह ने बताया था कि जब दिलीप कुमार ने उनसे कहा, ‘अच्छे घरों के लड़कों को फिल्मों में नहीं आना चाहिए,’ तो उस वक्त वो दिलीप कुमार से पूछना चाहते थे, ‘अगर ऐसा है, तो फिर आप खुद इस इंडस्ट्री में क्यों आए? आप भी तो एक अच्छे और संभ्रांत परिवार से थे।’ हालांकि, उनकी ऐसा कहने की हिम्मत नहीं हुई। 34 साल की पाकिस्तानी औरत से गुपचुप शादी की थी नसीरुद्दीन शाह की पहली शादी परवीन मुराद उर्फ मनारा सीकरी से हुई थी। उनकी मुलाकात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में हुई
Annu Kapoor Interview | Struggle Journey Bollywood Uttar Da Puttar

11 मिनट पहले कॉपी लिंक दिग्गज अभिनेता अन्नू कपूर इन दिनों अपनी फिल्म ‘उत्तर दा पुत्तर’ को लेकर चर्चा में हैं। यह फिल्म एक बेहद संवेदनशील मगर व्यंग्यात्मक तरीके से इंसान के सबसे बड़े असमंजस ‘कर्म बड़ा या किस्मत’ पर सवाल उठाती है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में अन्नू कपूर ने अपने अधूरे सपनों, बॉलीवुड के संघर्ष, सोशल मीडिया के अंधविश्वास और जिंदगी के कड़वे अनुभवों पर खुलकर बात की। अन्नू कपूर ने बताया कि कैसे एक समय उनके पास ड्राइवर को देने के पैसे नहीं थे, लेकिन एक वफादार साथी और उनकी नियति ने उन्हें आज इस मुकाम पर पहुंचाया है। सवाल: ‘उत्तर दा पुत्तर’ सवाल पूछती है, कर्म बड़ा या किस्मत? आप किसे बड़ा मानते हैं? जवाब: मैं तो यही मानता हूं कि आपके कर्म भी आपकी किस्मत ही तय करती है। भाग्य से बाहर कुछ भी नहीं है। जिस रास्ते पर आपको जाना है और वहां जाकर जो कर्म करने हैं, वह सब पहले से तय (Pre-determined) है। हम तो सिर्फ निमित्त हैं, कोई और है जो हमें चला रहा है। आम आदमी के मन को समझाने के लिए यह कहना अच्छा लगता है कि ‘कर्म ठीक कर तो भाग्य बदल जाएगा’, लेकिन सच यही है कि हमारे एक-एक पल का लेखा-जोखा पहले से एल्गोरिथम की तरह सेट है। सवाल: अगर किस्मत का पहिया अलग घूमता, तो आज अन्नू कपूर अभिनेता होते या कुछ और? जवाब: मैं तो आईएएस (IAS) बनना चाहता था। पढ़ाई में रिकॉर्ड अच्छा था, अकादमिक रूप से भी ठीक था। लेकिन घर के हालात ऐसे नहीं थे कि माता-पिता आगे पढ़ा पाते। कोई स्कॉलरशिप देने वाला गॉडफादर भी नहीं था। जब पढ़ाई छूट गई, तो मजबूरी में पिताजी के थिएटर से जुड़ना पड़ा। जैसे कोई काम न मिलने पर बेटा पिता की दुकान पर बैठ जाता है, मेरे साथ भी वही हुआ। आज लोग इसे मेरी अच्छी किस्मत कहते हैं कि मैं एक्टर बना, लेकिन मैं मानता हूं कि मैं जो बनना चाहता था, वो नहीं बन पाया। सवाल: क्या कभी इस बात को लेकर किस्मत से कोई शिकायत रही? जवाब: उस उम्र में झटका लगा था, लेकिन वक्त सब सिखा देता है। मेरे बचपन का एक दोस्त था मंटू। वह पढ़ाई में बहुत तेज था, सरस्वती का उपासक था, लेकिन उसके पिता किराने के बड़े व्यापारी थे। पिता ने उसे जबरन अनाज की दुकान पर बिठा दिया। वह जिंदगी भर रोता रहा कि उसका मन कहीं और था, लेकिन उसकी किस्मत में 50 करोड़ के बिजनेस को 400 करोड़ बनाना लिखा था। जिंदगी हमेशा वहां नहीं ले जाती जहां आप जाना चाहते हैं, बल्कि वहां ले जाती है जहां आपको होना चाहिए। सवाल: आजकल सोशल मीडिया पर किस्मत चमकाने का बड़ा बाजार है। कोई अंगूठी बेच रहा है तो कोई वास्तु। इस अंधविश्वास को आप कैसे देखते हैं? जवाब: यह सब इंसानी डर और उम्मीद का कारोबार है। कोई नीलम पहना रहा है, कोई पन्ना। अगर संयोग से कुछ ठीक हो गया, तो लोग पत्थर को चमत्कारी मान लेते हैं। हकीकत यह है कि इन पत्थरों की कोई रीसेल वैल्यू नहीं है। पुराने समय में रोमन में ‘सैलरी’ शब्द नमक (सलेरिआ) से आया था, क्योंकि तब नमक की कीमत थी, सोने की नहीं। कोविड के दौर ने हम सबको सिखा दिया था कि तिजोरी में बंद सोना नहीं, बल्कि मुफ्त में मिलने वाली ऑक्सीजन का एक सिलेंडर सबसे बड़ी दौलत थी। सब वक्त और जरूरत का खेल है। सवाल: आप एक्टिंग, सिंगिंग, होस्टिंग सब करते हैं। तो ‘उत्तर दा पुत्तर’ में एक्टिंग और डायरेक्शन एक साथ क्यों नहीं किया? राजनीति में आने के भी ऑफर मिले होंगे? जवाब: भाई, दोनों चीजें एक साथ संभालना मेरे बस की बात नहीं है। मैं इतना टैलेंटेड नहीं हूं। बिल्कुल वैसे ही, जैसे राजनीति मेरे बस की बात नहीं है। अच्छा वक्ता होना अलग बात है और देश चलाना बिल्कुल अलग। मैं गरीब हो सकता हूं, लेकिन इतना मूर्ख नहीं कि अपनी सीमाओं को न पहचानूं। फिल्म के निर्माता संदीप कपूर ने पहले मुझे डायरेक्ट करने को कहा था, लेकिन मैंने मना कर दिया। फिर उन्होंने मुझे यह विरोधाभासी किरदार दिया। फिल्म में मैं एक ऐसे फिजिक्स प्रोफेसर का रोल कर रहा हूं जो खुद मेटाफिजिक्स (अंधविश्वास/अध्यात्म) के चक्कर में ऑब्सेस्ड हो जाता है। सवाल: चार दशकों के करियर में आपने कई उतार-चढ़ाव देखे। जिंदगी का सबसे बड़ा सबक आपको कहां से मिला? जवाब: मैं किसी को ज्ञान नहीं देता, क्योंकि मैं खुद को अज्ञानी मानता हूं। हां, अनुभव जरूर साझा कर सकता हूं। साल 1985-86 की बात है, मैं जयपुर से कोटा जा रहा था। टोंक के पास एक खेत में गाड़ी रुकवाकर मैंने एक किसान से पानी मांगा। उसने बड़े सम्मान से पीतल के गिलास में ठंडा पानी पिलाया और ताजी गाजर खिलाई। मेरे मुंह से निकला ‘मजा आ गया’। उस साधारण किसान ने मुझसे एक ऐसी बात कही जो बड़े-बड़े लेखक नहीं लिख सकते। उसने कहा- “कंवर साहब, यो मजो भी घणी टेढ़ी चीज छे। नी आवे तो करोड़ रुपिया में नी आवे, ने आ जावे तो एक गिलास ठंडा पानी में आ जावे।” उस दिन मुझे समझ आया कि असली सुख पैसों में नहीं, संतुष्टि में है। मुझे ‘कबीर’, ‘अंताक्षरी’ और ‘विक्की डोनर’ जैसी फिल्मों में काम करके यही आत्मिक सुकून मिला। सवाल: आपकी जिंदगी का सबसे चुनौतीपूर्ण या वो दौर कौन सा था जिसने आपको अंदर तक झकझोर दिया? जवाब: मेरी जर्नी में ऐसे कई मोड़ आए। 4 मई 1992 से एक ऐसा भयानक दौर शुरू हुआ था, जो साढ़े चार महीने तक चला। मैं एक हजार रुपये किराये के छोटे से कमरे में रहता था। जेब में न एक पैसे का कैश था, न कोई चेक, न कोई शूटिंग। मैं दिन भर खाली रहता था, रात को दोस्तों के घर ताश खेलता था और सुबह देर से सोकर उठता था ताकि सीधे लंच कर सकूं और खाना बच जाए। उस समय मेरे ड्राइवर केशव दत्त ने जो किया, मैं कभी नहीं भूल सकता। जब मैंने तंगी के कारण उससे कहा कि तू कहीं और काम कर ले, मैं तुझे एचएलएल में बड़े अफसर के यहाँ लगवा देता हूं, जहां तुझे 750 की जगह 2000 रुपये सैलरी मिलेगी। तब







