Mirzapur Movie: Rasika Duggal Nervous Before Release

17 मिनट पहलेलेखक: आशीष तिवारी कॉपी लिंक मिर्जापुर मूवी में मोहित मलिक के बिरजू लोहार के किरदार ने दर्शकों के बीच गहरी छाप छोड़ी है। वहीं, बिना त्रिपाठी की जटिल और अप्रत्याशित कहानी लगातार चर्चा में है। दैनिक भास्कर से बातचीत में दोनों कलाकारों ने बिरजू के किरदार, उसके आखिरी सीन, शूटिंग के अनुभव और दर्शकों की भावनात्मक प्रतिक्रिया पर बात की। मोहित ने बताया कि कम स्क्रीन टाइम के बावजूद बिरजू की पांच साल की जर्नी को पर्दे पर दिखाना उनके लिए कितना महत्वपूर्ण था। रसिका ने बीना त्रिपाठी के किरदार की परतों और उसकी रणनीति पर भी विचार साझा किए। ‘मिर्जापुर’ के महत्वपूर्ण सीन की शूटिंग को याद करते हुए मोहित और रसिका ने कैमरा टीम के सहयोग का जिक्र किया। सवाल: बिरजू लोहार का किरदार दर्शकों के बीच इतना लोकप्रिय हो गया है। क्या आपने सोचा था कि यह किरदार इतना प्रभाव छोड़ेगा? जवाब/मोहित मलिक: सच कहूं तो ऐसा सोचा नहीं था, लेकिन पूरी कोशिश जरूर की थी। मुझे पता था कि इतने बड़े कलाकारों और महत्वपूर्ण किरदारों के बीच मेरा स्क्रीन टाइम बहुत कम है। इसलिए मेरे लिए जरूरी था कि जब भी मैं स्क्रीन पर आऊं, तो बिरजू की पांच साल की जर्नी दिखाई दे। मुझे लगता है कि दर्शक भावनाओं से बहुत जल्दी जुड़ते हैं। मैंने इस किरदार के लिए पूरी मेहनत की और अपनी जान लगा दी। आखिर में फिल्म के कुछ खास पल सही तरीके से जुड़ जाते हैं और खूबसूरत कहानी बन जाती है। मुझे लगता है कि बिरजू के साथ भी ऐसा ही हुआ। सवाल: फिल्म का आखिरी सीन बहुत मार्मिक है। उस सीन की शूटिंग के दौरान सेट का माहौल कैसा था? जवाब/रसिका दुग्गल: मेरे अनुभव में कई बार ऐसा होता है कि जिस सीन को बाद में फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण या सबसे ज्यादा चर्चित सीन माना जाता है, उसकी शूटिंग के दिन सेट पर बहुत ज्यादा अव्यवस्था होती है। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था। हमारी शिफ्ट का समय काफी आगे बढ़ गया था। किसी को भूख लगी थी, किसी को घर जाना था और शूटिंग के लिए समय कम बचा था। ऐसे माहौल में एक्टर के लिए शांत रहना और समझना मुश्किल होता है कि यह मौका दोबारा नहीं मिलेगा। आपको उस पूरे शोर के बीच अपने विचार समेटने होते हैं और कोशिश करनी होती है कि उस पल को पूरी ईमानदारी से निभा सकें। इस सीन में भी हमारे सामने यही चुनौती थी। मोहित मलिक: उस समय हमें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि यह सीन इतना खास बन जाएगा। जैसा रसिका ने कहा, उस वक्त बहुत कुछ चल रहा था। लेकिन बाद में जब गाना, अभिनय और बाकी चीजें एक साथ जुड़ीं, तो वह सीन बहुत खूबसूरत बन गया। सवाल: इस सीन में गाने ने भी काफी भावनात्मक असर डाला है। आपको यह गाना पहली बार कब सुनने को मिला? जवाब/रसिका दुग्गल: हमने यह गाना पहली बार फिल्म की स्क्रीनिंग में सुना था। उससे पहले हमने सीन देखा था, लेकिन उसमें गाना शामिल नहीं था। मुझे लगता है कि इस गाने ने उस पूरे पल को ज्यादा प्रभावशाली बना दिया। यह गाना उस सीन को काव्यात्मक स्तर पर ले जाता है। मधुर ने इसे बहुत खूबसूरती से गाया है और पुनीत जी की लिखी हर लाइन की तरह इसमें भी बहुत गहराई है। गाने ने सीन की भावनाओं को और मजबूत किया है। मोहित मलिक: बिल्कुल। मधुर ने बहुत अच्छा गाया है। उस गाने ने सीन को अलग ही एहसास दिया। सवाल: बिरजू के किरदार को निभाते समय आपके लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या थी? मोहित मलिक: मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि कम स्क्रीन टाइम में भी किरदार की पूरी यात्रा दिखाई दे। मैं ऐसे कलाकारों के बीच काम कर रहा था, जिनके किरदार पहले से दर्शकों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। रवि किशन जी खुद बड़े स्टार हैं और उनका अपना प्रभाव है। ऐसे में मैं नए किरदार के साथ उस दुनिया में आया था। मुझे साबित करना था कि बिरजू की अपनी पहचान है और उसकी कहानी दर्शकों तक पहुंचे। मैं आभारी हूं कि पूरी टीम ने मुझे प्यार दिया और अपनापन महसूस कराया। सभी ने सहयोग किया, जिससे मेरे लिए यह अनुभव अच्छा रहा। बिना त्रिपाठी की भूमिका पर रसिका दुग्गल ने किरदार की जटिलता और उसकी रणनीति पर खुलकर बात की। सवाल: रसिका, बिना त्रिपाठी का किरदार हर बार नई परत के साथ सामने आता है। क्या आपको भी उसे समझते हुए कुछ नया महसूस होता है? जवाब/रसिका दुग्गल: बिल्कुल। मुझे भी बिना के बारे में ऐसा ही लगता है। जैसे ही मुझे लगता है कि मैं उसे समझने लगी हूं, पुनीत जी कुछ ऐसा लिखकर ले आते हैं कि मैं सोचती हूं, यह कैसे हुआ? बिना का किरदार बहुत जटिल है। वह पितृसत्तात्मक समाज में रहती है, जहां जैसे ही वह अपनी जगह बनाती है, कोई न कोई उसे पीछे धकेल देता है। फिर वह दोबारा अपनी जगह बनाती है। यही प्रक्रिया उसके किरदार को दिलचस्प बनाती है। वह कमजोर भी है और रणनीतिक भी। वह भावनात्मक भी है और बहुत चतुर भी। उसके अंदर कई परतें हैं और यही चीज उसे दूसरे किरदारों से अलग बनाती है। सवाल: दर्शक अब बिना को पहले से ज्यादा समझने लगे हैं। क्या आपको भी ऐसा लगता है? जवाब/रसिका दुग्गल: हां, लेकिन जैसे ही लगता है कि दर्शक उसे समझने लगे हैं, कहानी में कुछ नया सामने आ जाता है। मुझे लगता है कि बिना की यही सबसे बड़ी खासियत है। लोग अक्सर मुझसे कहते हैं कि उन्होंने पर्दे पर ऐसी महिला पहले नहीं देखी। वह जिस तरह परिस्थितियों को समझती है और अपने तरीके से आगे बढ़ती है, वह बहुत अलग है। मुझे यह भी लगता है कि वह हर स्थिति में खुद को ढाल सकती है। वह अपनी कमजोरियों को जानती है, लेकिन उनका इस्तेमाल कैसे करना है, यह भी समझती है। सवाल: बीना की कौन-सी खूबी आप अपनी असल जिंदगी में चाहेंगी? जवाब/रसिका दुग्गल: बीना की यह खूबी कि वह दूसरे लोगों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना जानती है। मैं असल जिंदगी में ऐसा बिल्कुल नहीं कर पाती। काश, मैं भी परिस्थितियों पर उतना
‘कच्चा बादाम गर्ल’ बनीं सीता तो मचा बवाल:अंजली अरोड़ा ने ट्रोलर्स को जवाब दिया, बोलीं- पुरानी छवि मेरी पूरी जिंदगी नहीं

अंजली अरोड़ा इन दिनों फिल्म ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ में सीता का किरदार निभाने को लेकर चर्चा में हैं। फिल्म में उनके लुक और किरदार की तारीफ हो रही है, वहीं सोशल मीडिया पर उन्हें ट्रोल भी किया जा रहा है। वजह उनकी पुरानी सोशल मीडिया इमेज, खासकर ‘कच्चा बादाम’ गाने पर वायरल हुईं डांसिंग रील्स हैं। दैनिक भास्कर से बातचीत में अंजली ने ट्रोलिंग और पुरानी छवि पर बात की। वहीं श्री राम का किरदार निभा रहे देव शर्मा ने कहा कि किसी के किए गए काम का असर उसकी पूरी जिंदगी पर पड़ सकता है। ‘कच्चा बादाम’ वाली इमेज को लेकर ट्रोल हो रही हैं अंजली अंजली अरोड़ा ने सोशल मीडिया पर डांसिंग रील्स से पहचान बनाई थी। खासतौर पर ‘कच्चा बादाम’ गाने पर उनका डांस वीडियो खूब वायरल हुआ था। इसके बाद वह सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर के तौर पर पहचानी जाने लगीं। बाद में उन्होंने रियलिटी शो ‘लॉक अप सीजन 1’ में हिस्सा लिया। अब जब वह ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ में सीता का किरदार निभा रही हैं, सोशल मीडिया पर उनकी पुरानी तस्वीरों और वीडियो को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ लोग उनकी ग्लैमरस और बिंदास सोशल मीडिया इमेज की तुलना सीता के किरदार से कर रहे हैं। इसी वजह से उन्हें ट्रोल किया जा रहा है। कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि डांसिंग और ग्लैमरस इमेज के लिए पहचानी जाने वाली अंजली सीता जैसे पवित्र किरदार को कैसे निभा सकती हैं। कुछ कमेंट्स में उन्हें ‘कच्चा बादाम गर्ल’ कहकर ट्रोल किया गया, तो कुछ यूजर्स ने लिखा कि ‘सीता के रोल में शूर्पणखा’। अंजली बोलीं- ‘वो मेरी पूरी जिंदगी नहीं है’ ट्रोलिंग को लेकर अंजली ने दैनिक भास्कर से कहा कि लोगों के पास किसी को जज करने का अधिकार है, लेकिन किसी की पुरानी जिंदगी उसकी पूरी पहचान नहीं हो सकती। उन्होंने कहा, “लोगों का काम है जज करना और उनके पास हक है। जो चीजें हैं, वो हैं ही। हम किसी भी चीज को अपनी लाइफ का एक पार्ट कह सकते हैं, लेकिन वो हमारी पूरी लाइफ नहीं होती।” अंजली ने कहा कि अगर लोग उन्हें पुरानी सोशल मीडिया इमेज के लिए याद करते हैं तो वह भी ठीक है, लेकिन उन्होंने इसके अलावा भी बहुत काम किया है और आगे भी करना चाहती हैं। उनके मुताबिक, “मैं चाहती हूं कि लोग मेरी पर्सनालिटी को अलग रखकर इस सिनेमा में मेरे किरदार को देखें और फिर जज करें।” ‘सीता’ के किरदार को लेकर अंजली ने की तैयारी सीता का किरदार मिलने पर अंजली खुद हैरान थीं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उनके मन में सवाल था कि वह यह किरदार कैसे निभा पाएंगी और उन्हें ही सीता का रोल क्यों दिया गया। डायरेक्टर के विजन और भरोसे के बाद उन्होंने खुद पर काम शुरू किया। शूटिंग के दौरान उन्होंने सीता के किरदार की कई चीजें अपनाने की कोशिश की। अंजली के मुताबिक, सीता उनके लिए धैर्य, त्याग और सादगी की मिसाल हैं। उन्होंने कहा कि मुश्किल हालात के बावजूद सीता ने धैर्य नहीं खोया और गुस्से में ऐसा फैसला नहीं लिया जिससे किसी और को नुकसान पहुंचे। ‘मैं आजकल की लड़की हूं, सीता से तुलना नहीं करूंगी’ जब अंजली से पूछा गया कि सीता के व्यक्तित्व से उनमें कितनी समानताएं हैं, उन्होंने खुद की तुलना सीता से करने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वह आज की पीढ़ी की लड़की हैं और उनके अपने विचार और लाइफस्टाइल हैं। हालांकि वह अपने धर्म और विश्वास से जुड़ी हुई हैं। अंजली ने कहा कि उनका विश्वास है कि जो उनका है, वह उनके पास जरूर आएगा और जो उनका नहीं है, वह पास आकर भी चला जाएगा। बच्चों को धर्म और संस्कारों से जोड़ना जरूरी अंजली अरोड़ा ने आज की पीढ़ी की परवरिश को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि बच्चों को आधुनिक सोच और लाइफस्टाइल के साथ आगे बढ़ने की आजादी मिलनी चाहिए, लेकिन उन्हें अपने धर्म, संस्कृति और संस्कारों की जानकारी भी होनी जरूरी है। अंजली ने कहा कि उनके माता-पिता ने उन्हें अपने धर्म से जुड़े रहने और अच्छे संस्कारों के साथ आगे बढ़ना सिखाया है। उनका मानना है कि आज के माता-पिता को भी बच्चों को समझाना चाहिए कि वे किस संस्कृति और परंपरा से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि संस्कार इंसान की जिंदगी में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। व्यक्ति कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाए, उसके संस्कार उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बने रहते हैं। अंजली के मुताबिक, इंसान देश में रहे या विदेश में, किसी भी जगह काम करे या किसी भी तरह की जिंदगी जिए, उसके संस्कार हमेशा उसके साथ रहते हैं। इसलिए बच्चों को बचपन से ही परिवार, धर्म, संस्कृति और अच्छे मूल्यों से जोड़ना जरूरी है। देव शर्मा बोले- ट्रोलिंग किसी की जिंदगी पर डाल सकती है असर फिल्म में श्री राम का किरदार निभा रहे देव शर्मा ने ट्रोलिंग के मुद्दे पर बात की। उन्होंने कहा कि रामायण से मिलने वाली सबसे बड़ी सीखों में से एक यह है कि इंसान को अपने हर काम के असर के बारे में सोचना चाहिए। देव ने कहा, “ट्रोलिंग या किसी का मजाक उड़ाना तब होता है, जब हम उसके आफ्टर इफेक्ट्स के बारे में नहीं समझते। हम उस समय काम कर देते हैं, लेकिन उसका इम्पैक्ट किसी इंसान की पूरी जिंदगी पर पड़ सकता है।” उन्होंने कहा कि रामायण और दूसरे ग्रंथों की सीख यही है कि इंसान जाने-अनजाने ऐसा काम न करे, जिससे किसी दूसरे व्यक्ति की जिंदगी प्रभावित हो। शील वर्मा बोले- रामायण को सुपरहीरो फिल्म की तरह नहीं दिखाया फिल्म में लक्ष्मण का किरदार निभा रहे शील वर्मा ने बताया कि ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ को ज्यादा वीएफएक्स और भव्यता के सहारे पेश करने की कोशिश नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि मेकर्स का फोकस रामायण की कहानी को सरलता और मूल भावना के साथ दिखाने पर रहा है। शील के मुताबिक, फिल्म को सुपरहीरो या मार्वल जैसी ग्रैंड फिल्म बनाने की कोशिश नहीं की गई। उन्होंने कहा कि “सिंप्लिसिटी हम परोस रहे हैं। रामायण को रामायण की तरह दिखा रहे हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि दर्शकों ने बचपन से जिस रामायण को देखा और
नेशनल फिल्म अवॉर्ड सेरेमनी आज:कार्तिक आर्यन, यामी को मिलेगा अवॉर्ड, दिल्ली की जगह गुजरात में होने पर विवाद; जानिए इतिहास, विवाद और इंट्रेस्टिंग फैक्ट्स

72वीं नेशनल फिल्म अवॉर्ड सेरेमनी आज गुजरात में आयोजित हो रही है। इतिहास में पहली बार नई दिल्ली के विज्ञान भवन की बजाए ये सेरेमनी गुजरात के केवड़िया में यानी स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के पास होगी, जिस पर विवाद है। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने इस फैसले की आलोचना की है। वहीं, शिवसेना के सांसद संजय राउत ने कलाकारों से इस समारोह का बहिष्कार करने की अपील की है। विवाद के बीच सेरेमनी की तैयारियां पूरी हो रही हैं। कार्तिक आर्यन को फिल्म ‘चंदू चैंपियन’ और ममूटी को ‘ब्रह्मयुग’ के लिए बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला है, जिसके लिए वह गुजरात पहुंच चुके हैं। बेस्ट एक्ट्रेस का अवॉर्ड यामी गौतम को फिल्म ‘आर्टिकल 370’ के लिए मिलेगा, जबकि बेस्ट हिंदी फिल्म ‘श्रीकांत’ और बेस्ट फीचर फिल्म का अवॉर्ड ‘आर्टिकल 370’ को दिया जाएगा। विजेताओं की घोषणा 18 जुलाई को चुकी है, आज राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू अवॉर्ड वितरण करेंगी। 72वीं नेशनल फिल्म अवॉर्ड सेरेमनी से पहले जानिए, विजेताओं की लिस्ट, सेरेमनी पर विवाद, इतिहास, इससे जुड़े इंट्रेस्टिंग फैक्ट्स और किस्से- इस साल इन फिल्मों और कलाकारों को मिलेगा अवॉर्ड, देखिए पूरी लिस्ट- नई दिल्ली की जगह गुजरात में सेरेमनी होने पर विवाद- नेशनल अवॉर्ड सेरेमनी नई दिल्ली की जगह गुजरात में आयोजित होने पर राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने कड़ी निंदा की। वहीं, शिवसेना के सांसद संजय राउत ने कलाकारों से इस समारोह का बहिष्कार करने की अपील की है। राज ठाकरे ने आपत्ति जताते हुए लिखा, ‘आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी? देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का महत्व कम करने की कोशिश के बाद अब क्या देश की राजधानी दिल्ली की अहमियत भी धीरे-धीरे खत्म करने की कोशिश हो रही है?’ शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि ये गुजरात से जुड़ा कोई प्रोग्राम नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय फिल्म पुरुस्कार है, तो इसकी लोकेशन गुजरात क्यों रखी गई। इसे राजधानी में ही रखना था, जैसा पिछले कई सालों से चला आ रहा है। उन्होंने अन्य सेलेब्स से इस इवेंट में न जाने और इसे बॉयकॉट करने की अपील की है। पिछले साल शाहरुख खान-रानी मुखर्जी ने जीता नेशनल अवॉर्ड शाहरुख खान ने 40 साल के करियर में पिछले साल फिल्म जवान के लिए बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड जीता। उनके साथ विक्रांत मैसी को भी 12वीं फेल के लिए बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला। जबकि रानी मुखर्जी को मिसेस चटर्जी वर्सेस नॉर्वे के लिए बेस्ट एक्ट्रेस चुना गया। पिछले साल मोहनलाल को इस साल अनंत नाग को मिला दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड 72वीं नेशनल फिल्म अवॉर्ड सेरेमनी में दिग्गज अभिनेता अनंत नाग को भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। 4 सितंबर 1948 को जन्मे अनंत नाग (अनंत नागरकट्टे) कन्नड़ सिनेमा के सबसे सम्मानित और दिग्गज अभिनेताओं में से एक हैं। अपने लंबे करियर के दौरान उन्होंने 300 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया है, जिनमें 250 से ज्यादा कन्नड़ फिल्में शामिल हैं। कन्नड़ के अलावा अनंत नाग ने हिंदी, तेलुगु, तमिल, मराठी, मलयालम और अंग्रेजी भाषाओं की फिल्मों में भी काम किया है। कन्नड़ सुपरस्टार यश की ब्लॉकबस्टर फिल्म KGF के दोनों पार्ट में वह नजर आए थे। नेशनल अवॉर्ड से जुड़े ये किस्से भी पढ़िए- ऑक्सीजन मास्क लगाकर अवॉर्ड लेने पहुंचे राज कपूर, राष्ट्रपति की एंबुलेंस दी गई साल 1972 में पृथ्वीराज कपूर को मरणोपरांत दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। 2 मई 1988 को हुई अवॉर्ड सेरेमनी में उनकी जगह ये अवॉर्ड लेने उनके बेटे राज कपूर पहुंचे थे। राज कपूर इतने बीमार रहते थे कि वो ऑक्सीजन सिलेंडर लिए और मास्क लगाए सेरेमनी में बैठे थे। जिस समय पृथ्वीराज कपूर का नाम अनाउंस हुआ, तो राज कपूर की हालत इतनी बिगड़ गई कि वो कुर्सी से उठ नहीं सके। ऐसे में राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने सेरेमनी का प्रोटोकॉल तोड़ते हुए खुद उनकी कुर्सी तक जाकर अवॉर्ड दिया। कुछ ही देर में राज कपूर को सेरेमनी में ही अस्थमा का अटैक पड़ा। राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाने के लिए अपनी गाड़ी दी। राज कपूर को दिल्ली के AIIMS में भर्ती करवाया गया था। 2 महीने तक चले इलाज के बाद उनका 2 जून 1988 को निधन हो गया। ये किस्सा राज कपूर की बेटी रीमा ने फिल्मफेयर को दिए इंटरव्यू में सुनाया था। फिल्म ब्लैक के नेशनल अवॉर्ड जीतने पर हुई थी कंट्रोवर्सी 53वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड में संजय लीला भंसाली की फिल्म ब्लैक को बेस्ट फीचर फिल्म (हिंदी) का नेशनल अवॉर्ड दिया गया था, जो हॉलीवुड फिल्म द मिरेकल वर्क की कहानी से प्रेरित थी। नेशनल अवॉर्ड के नियमों के अनुसार, किसी भी एडेप्शन फिल्म को अवॉर्ड नहीं दिया जा सकता। ऐसे में ज्यूरी मेंबर में शामिल देब बनर्जी ने आरोप लगाए कि फिल्म को फेवरिज्म कर अवॉर्ड दिया गया है। देव बनर्जी ने पिटीशन भी फाइल की थी, हालांकि कोई कार्यवाही नहीं हुई। फिल्म ब्लैक ने 3 नेशनल अवॉर्ड जीते, जिमें बेस्ट फीचर फिल्म (हिंदी), बेस्ट एक्टर (अमिताभ बच्चन) और बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन (सब्यसाची मुखर्जी) शामिल हैं। अवॉर्ड सेरेमनी पर लगे पक्षपात के आरोप इसी साल फिल्म परजानिया के लिए राहुल ढोलकिया को बेस्ट डायेरक्टर, सारिका को बेस्ट एक्ट्रेस और फिल्म परिणीता के लिए प्रदीप सरकार को बेस्ट डायरेक्टर डेब्यू का अवॉर्ड दिए जाने पर भी विवाद रहा। कोलकाता बेस्ड क्रिटिक और ज्यूरी में शामिल देब बनर्जी ने इनके खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में पिटीशन फाइल की थी। उनका आरोप था कि पक्षपात के जरिए इन कैटेगरी में अवॉर्ड दिए गए हैं। किरण खैर का नेशनल अवॉर्ड विवादों से रहा बंगाली फिल्म बरीवाली के लिए किरण खैर को बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड दिया गया था। इस फिल्म के नॉमिनेशन के दौरान भरे गए फॉर्म में कहा गया था कि किरण खैर ने अपनी आवाज खुद डब की है, हालांकि डबिंग आर्टिस्ट और एक्ट्रेस रीता कोइराला ने आरोप लगाए कि फिल्म में उन्होंने किरण खैर के लिए बंगाली डबिंग की थी, जिसको नॉमिनेशन फॉर्म में मेंशन नहीं किया गया था। 65वीं नेशनल अवॉर्ड सेरेमनी में 68 विजेताओं ने सेरेमनी में आने से इनकार किया था 65वीं नेशनल अवॉर्ड सेरेमनी 68 विजेताओं के सेरेमनी में न पहुंचने से विवादों में रही थी। विजेताओं को मिले इन्विटेशन कार्ड में




