नाव पलटी तो सुरैया को बचाने देव आनंद कूदे थे:शादी नहीं हुई तो पहली बार रोए, ‘गाइड’ को लेकर लोगों ने कहा था पागल

साल 1943 की बात है। एक युवा लड़का अपने सपनों को पूरा करने के लिए लाहौर से मुंबई पहुंचा। जेब में सिर्फ 30 रुपए थे और रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था। फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने का सपना था, लेकिन सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि मुंबई जैसे शहर में गुजारा कैसे हो। शुरुआत में उसे चॉल में रहना पड़ा। कुछ दिन बीते तो पैसे खत्म होने लगे। फिल्मों में काम मिलने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी। आखिरकार पेट पालने के लिए उसे नौकरी करनी पड़ी। मिलिट्री सेंसर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली, जहां वह ब्रिटिश सरकार के लिए मिलिट्री सेंसर का काम करते थे। उसे महीने की 65 रुपए तनख्वाह मिलती थी। लेकिन जिस लड़के के पास मुंबई पहुंचने के लिए सिर्फ 30 रुपए थे, उसने हार नहीं मानी। कुछ साल बाद वही शख्स हिंदी सिनेमा का ऐसा सितारा बना, जिसे लोग ‘एवरग्रीन स्टार’ कहने लगे। हम बात कर रहे हैं देव आनंद की और उनकी 103वीं बर्थ एनिवर्सरी पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातें… पिता स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के गुरदासपुर जिले में धर्मदेव पिशोरीमल आनंद के रूप में हुआ था। उनके पिता पिशोरी लाल आनंद गुरदासपुर में वकील थे और स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े थे। देव आनंद चार भाइयों में तीसरे थे। उनके भाई चेतन आनंद और विजय आनंद भी फिल्म जगत से जुड़े रहे, जबकि उनकी बहन शील कांता कपूर फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां थीं। उन्होंने शुरुआती पढ़ाई डलहौजी के सेक्रेड हार्ट स्कूल से की और बाद में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए किया। पिता ने पढ़ाई के लिए पैसे देने से मना कर दिया था देव आनंद आगे पढ़ना चाहते थे और उच्च शिक्षा के लिए लंदन जाने का सपना देखते थे, जबकि उनके पिता चाहते थे कि वह किसी बैंक में नौकरी कर लें, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उनकी आगे की पढ़ाई का खर्च उठाया जा सके। पिता ने साफ कह दिया कि अब उनकी पढ़ाई के लिए पैसे नहीं हैं। इसके बाद देव आनंद ने तय किया कि अगर जिंदगी में संघर्ष करना ही है, तो क्यों न अपने बचपन के सपने एक्टिंग के लिए संघर्ष किया जाए। इसी सपने को पूरा करने के लिए जून 1943 में वह लाहौर से ट्रेन पकड़कर मुंबई के लिए निकल पड़े। शुरुआत में काम नहीं मिला और पैसे खत्म हो गए तो उन्होंने चर्चगेट स्थित मिलिट्री सेंसर ऑफिस में 65 रुपए मासिक वेतन पर नौकरी की। बाद में एक अकाउंटिंग फर्म में 85 रुपए की तनख्वाह पर क्लर्क का काम भी किया। अभिनेता बनने की इच्छा उन्हें अशोक कुमार की फिल्मों से मिली। मिलिट्री सेंसर ऑफिस में करीब एक साल तक नौकरी करने के बाद देव आनंद अपने बड़े भाई चेतन आनंद के पास चले गए। चेतन उस समय भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से जुड़े थे। उन्होंने छोटे भाई को भी अपने साथ जोड़ लिया। यहां से देव आनंद को थिएटर में काम करने और अभिनय सीखने का मौका मिला। फिर किस्मत ने साथ दिया। साल 1946 में उन्हें प्रभात टॉकीज की फिल्म ‘हम एक हैं’ में काम करने का मौका मिला। शर्ट की अदला-बदली, शुरू हुई देव आनंद और गुरु दत्त की दोस्ती फिल्म ‘हम एक हैं’ में देव आनंद बतौर हीरो काम कर रहे थे, जबकि गुरु दत्त वहां असिस्टेंट डायरेक्टर और कोरियोग्राफर के तौर पर काम कर रहे थे। स्टूडियो के सभी लोगों के कपड़े एक ही धोबी के पास जाते थे। एक दिन धोबी से ऐसी गलती हुई कि देव आनंद की सफेद शर्ट गुरु दत्त के कपड़ों के साथ चली गई। गुरु दत्त ने वह शर्ट पहन ली और स्टूडियो पहुंच गए। जब देव आनंद ने अपनी शर्ट गुरु दत्त के शरीर पर देखी, तो दोनों का आमना-सामना हुआ। लेकिन शर्ट को लेकर कोई नाराजगी नहीं हुई। दोनों इस अजीब संयोग पर खूब हंसे। यही छोटी-सी घटना आगे चलकर उनकी गहरी दोस्ती की शुरुआत बन गई। दोनों ने बाद में साथ काम भी किया। देव आनंद ने गुरु दत्त को फिल्म ‘बाजी’ के निर्देशन का मौका दिया। 1951 में रिलीज हुई यह फिल्म गुरु दत्त के निर्देशन करियर की महत्वपूर्ण शुरुआत बनी और देव आनंद के साथ उनकी दोस्ती भी सिनेमा के पर्दे पर नजर आई। फिल्म ‘जिद्दी’ ने देव आनंद के करियर की दिशा बदल दी। अशोक कुमार ने उन्हें इस फिल्म में काम करने का मौका दिया। फिल्म सफल रही और देव आनंद को पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने सिर्फ अभिनेता बनकर रुकने के बजाय खुद फिल्में बनाने का फैसला किया। 1949 में बड़े भाई चेतन आनंद के साथ नवकेतन फिल्म्स की शुरुआत की। इसी बैनर के तहत बनी ‘बाजी’ 1951 में रिलीज हुई। यह फिल्म सफल रही और देव आनंद की स्टार इमेज और मजबूत हो गई। 1950 के दशक में देव आनंद की कई फिल्में सफल रहीं। ‘जाल’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘सीआईडी’, ‘पेइंग गेस्ट’ और ‘काला पानी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें बड़े सितारों की कतार में खड़ा कर दिया। उनका बोलने का तेज अंदाज, संवाद अदायगी और कैमरे के सामने खास स्टाइल दर्शकों को पसंद आया। वह जिस तरह बात करते समय सिर हिलाते थे, वह भी उनकी पहचान बन गया। ‘गाइड’ ने करियर को दी नई पहचान 1960 का दशक देव आनंद के रोमांटिक हीरो वाले दौर के लिए खास रहा। ‘हम दोनों’, ‘तेरे घर के सामने’, ‘ज्वेल थीफ’ और ‘गाइड’ जैसी फिल्मों ने उनके स्टारडम को और मजबूत किया। 1965 में रिलीज हुई ‘गाइड’ उनके करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हुई। फिल्म में उनके साथ वहीदा रहमान थीं। यह फिल्म आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित थी और इसके फिल्म रूपांतरण में देव आनंद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। फिल्म में उन्होंने एक ऐसे किरदार को निभाया, जो साधारण रोमांटिक हीरो की उनकी छवि से काफी अलग था। ‘गाइड’ ने उन्हें एक गंभीर अभिनेता के तौर पर भी स्थापित किया। हालांकि, डीडी नेशनल को दिए एक इंटरव्यू में देव आनंद ने फिल्म ‘गाइड’ को लेकर बताया था कि जब उन्होंने इस फिल्म की योजना बनाई थी,
Taapsee Pannu Controversy | Bollywood Actress Replaced By Hero Wife

25 मिनट पहले कॉपी लिंक बॉलीवुड एक्ट्रेस तापसी पन्नू ने फिल्म इंडस्ट्री के अपने कड़वे अनुभवों को लेकर बड़ा खुलासा किया है। नयनदीप रक्षित को दिए इंटरव्यू में तापसी ने बताया कि उन्हें एक बार फिल्म की शूटिंग की तारीखें पक्की होने के बाद भी सिर्फ इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि फिल्म के हीरो की पत्नी उन्हें पसंद नहीं करती थीं। तापसी के मुताबिक, जब उन्होंने फिल्म से बाहर किए जाने की वजह पूछी तो मेकर्स ने उन्हें यही कारण बताया। उन्होंने किसी एक्टर या फिल्म का नाम लिए बिना कहा कि करियर की शुरुआत में उन्हें बिना वजह रिप्लेस करने का सामना करना पड़ा था। तापसी ने हसते हुए हीरो की पत्नी वाला किस्सा सुनाया। ‘हीरो की पत्नी को मैं पसंद नहीं थी’ बातचीत में तापसी ने फिल्म से निकाले जाने का वाकया शेयर किया। तापसी ने कहा, मुझसे कहा गया कि फिल्म के हीरो ने मुझे रिप्लेस कर दिया है। भगवान ही वजह जानता है। मैं वजहों का अंदाजा लगाती रहती हूं। शायद उसमें असुरक्षा की भावना थी या वह किसी ऐसे इंसान को फिल्म में चाहता था जो उसके ज्यादा करीब हो। मुझे कोई ठोस वजह नहीं बताई गई। जब मैं बार-बार बाहर किए जाने का कारण पूछती रही, तो मुझे सिर्फ इतना कहा गया कि हीरो मुझे फिल्म में नहीं चाहता। तापसी ने आगे बताया, मुझे रिप्लेस करने की सबसे घटिया वजह यह दी गई कि ‘हीरो की पत्नी तुम्हें पसंद नहीं करती।’ मुझे आज तक नहीं पता कि वह मुझे पसंद क्यों नहीं करती थी। सीन्स को हाइपर-सेक्सुअलाइज किया जाता था तापसी ने अपने करियर के शुरुआती दिनों में सीन्स के शूटिंग पर भी बात की। उन्होंने कहा, “जब आप नए होते हैं, तो आपको नहीं पता होता कि पर्दे पर किसी सीन को हाइपर-सेक्सुअलाइज किया जा रहा है। शूटिंग के वक्त यह समझ नहीं आता कि सीन किस तरफ जा रहा है। मुझे लगता था कि यह सीन बहुत एस्थेटिक होगा, लेकिन जब स्क्रीन पर देखा तो लगा कि इसकी बिल्कुल जरूरत नहीं थी।” उन्होंने कहा कि आसपास के लोग कहते थे कि यह नॉर्मल है और सब ऐसा कर रहे हैं, इसलिए उन्हें लगा कि यह काम का हिस्सा है। बाद में समझ आया कि ग्लैमरस दिखे बिना भी काम किया जा सकता है और ग्लैमर के लिए हाइपर-सेक्सुअलाइजेशन जरूरी नहीं है। ‘बचने के लिए फिल्मों को खुद रिजेक्ट कर रही हूं’ इससे पहले न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में तापसी ने फिल्मों के चयन और एक ही तरह के रोल्स मिलने पर अपना पक्ष रखा था। उन्होंने बताया कि इंडस्ट्री में ग्लैमरस और गंभीर मुद्दों वाली फिल्मों के लिए अलग-अलग 5-5 एक्ट्रेसेस का सेट तय कर दिया गया है। तापसी ने कहा, “मैंने इसी वजह से फिल्में रिजेक्ट करना शुरू कर दिया है। मैं मेकर्स से साफ कह देती हूं कि दर्शक फिल्म का अंत आसानी से भांप लेंगे, इसलिए मुझे इस फिल्म में कास्ट न करें। मैं खुद मेकर्स को मना कर देती हूं ताकि एक ही तरह के रोल में न बंध जाऊं।” डायरेक्टर डेविड धवन की फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’ से तापसी ने बॉलीवूड में डेब्यू किया था। ‘गांधारी’ फिल्म में नजर आईं एक्ट्रेस तापसी पन्नू ने बॉलीवुड में ‘पिंक’, ‘थप्पड़’, ‘हसीन दिलरुबा’, ‘शाबाश मिठू’ और ‘डंकी’ जैसी फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई है। हाल ही में वे फिल्म ‘गांधारी’ में नजर आई हैं। ये खबर भी पढ़ें नेटफ्लिक्स पर कहानी चोरी का आरोप:राइटर बोले- चोरी कर बनाई गई तापसी पन्नू की फिल्म ‘गांधारी’; कंपनी को भेजा लीगल नोटिस तापसी पन्नू स्टारर अपकमिंग फिल्म ‘गांधारी’ के 3 सितंबर को नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने से पहले बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्क्रीनराइटर कल्याण बंदी ने नेटफ्लिक्स इंडिया और उसकी कंटेंट हेड मोनिका शेरगिल पर कहानी चोरी का आरोप लगाया है। पूरी खबर पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
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57 मिनट पहले कॉपी लिंक बॉलीवुड एक्ट्रेस तापसी पन्नू ने फिल्म इंडस्ट्री के अपने कड़वे अनुभवों को लेकर बड़ा खुलासा किया है। नयनदीप रक्षित को दिए इंटरव्यू में तापसी ने बताया कि उन्हें एक बार फिल्म की शूटिंग की तारीखें पक्की होने के बाद भी सिर्फ इसलिए निकाल दिया गया क्योंकि फिल्म के हीरो की पत्नी उन्हें पसंद नहीं करती थीं। तापसी के मुताबिक, जब उन्होंने फिल्म से बाहर किए जाने की वजह पूछी तो मेकर्स ने उन्हें यही कारण बताया। उन्होंने किसी एक्टर या फिल्म का नाम लिए बिना कहा कि करियर की शुरुआत में उन्हें बिना वजह रिप्लेस करने का सामना करना पड़ा था। तापसी ने हसते हुए हीरो की पत्नी वाला किस्सा सुनाया। ‘हीरो की पत्नी को मैं पसंद नहीं थी’ बातचीत में तापसी ने फिल्म से निकाले जाने का वाकया शेयर किया। तापसी ने कहा, मुझसे कहा गया कि फिल्म के हीरो ने मुझे रिप्लेस कर दिया है। भगवान ही वजह जानता है। मैं वजहों का अंदाजा लगाती रहती हूं। शायद उसमें असुरक्षा की भावना थी या वह किसी ऐसे इंसान को फिल्म में चाहता था जो उसके ज्यादा करीब हो। मुझे कोई ठोस वजह नहीं बताई गई। जब मैं बार-बार बाहर किए जाने का कारण पूछती रही, तो मुझे सिर्फ इतना कहा गया कि हीरो मुझे फिल्म में नहीं चाहता। तापसी ने आगे बताया, मुझे रिप्लेस करने की सबसे घटिया वजह यह दी गई कि ‘हीरो की पत्नी तुम्हें पसंद नहीं करती।’ मुझे आज तक नहीं पता कि वह मुझे पसंद क्यों नहीं करती थी। सीन्स को हाइपर-सेक्सुअलाइज किया जाता था तापसी ने अपने करियर के शुरुआती दिनों में सीन्स के शूटिंग पर भी बात की। उन्होंने कहा, “जब आप नए होते हैं, तो आपको नहीं पता होता कि पर्दे पर किसी सीन को हाइपर-सेक्सुअलाइज किया जा रहा है। शूटिंग के वक्त यह समझ नहीं आता कि सीन किस तरफ जा रहा है। मुझे लगता था कि यह सीन बहुत एस्थेटिक होगा, लेकिन जब स्क्रीन पर देखा तो लगा कि इसकी बिल्कुल जरूरत नहीं थी।” उन्होंने कहा कि आसपास के लोग कहते थे कि यह नॉर्मल है और सब ऐसा कर रहे हैं, इसलिए उन्हें लगा कि यह काम का हिस्सा है। बाद में समझ आया कि ग्लैमरस दिखे बिना भी काम किया जा सकता है और ग्लैमर के लिए हाइपर-सेक्सुअलाइजेशन जरूरी नहीं है। ‘बचने के लिए फिल्मों को खुद रिजेक्ट कर रही हूं’ इससे पहले न्यूज एजेंसी पीटीआई से बातचीत में तापसी ने फिल्मों के चयन और एक ही तरह के रोल्स मिलने पर अपना पक्ष रखा था। उन्होंने बताया कि इंडस्ट्री में ग्लैमरस और गंभीर मुद्दों वाली फिल्मों के लिए अलग-अलग 5-5 एक्ट्रेसेस का सेट तय कर दिया गया है। तापसी ने कहा, “मैंने इसी वजह से फिल्में रिजेक्ट करना शुरू कर दिया है। मैं मेकर्स से साफ कह देती हूं कि दर्शक फिल्म का अंत आसानी से भांप लेंगे, इसलिए मुझे इस फिल्म में कास्ट न करें। मैं खुद मेकर्स को मना कर देती हूं ताकि एक ही तरह के रोल में न बंध जाऊं।” डायरेक्टर डेविड धवन की फिल्म ‘चश्मे बद्दूर’ से तापसी ने बॉलीवूड में डेब्यू किया था। ‘गांधारी’ फिल्म में नजर आईं एक्ट्रेस तापसी पन्नू ने बॉलीवुड में ‘पिंक’, ‘थप्पड़’, ‘हसीन दिलरुबा’, ‘शाबाश मिठू’ और ‘डंकी’ जैसी फिल्मों से अपनी अलग पहचान बनाई है। हाल ही में वे फिल्म ‘गांधारी’ में नजर आई हैं। ये खबर भी पढ़ें नेटफ्लिक्स पर कहानी चोरी का आरोप:राइटर बोले- चोरी कर बनाई गई तापसी पन्नू की फिल्म ‘गांधारी’; कंपनी को भेजा लीगल नोटिस तापसी पन्नू स्टारर अपकमिंग फिल्म ‘गांधारी’ के 3 सितंबर को नेटफ्लिक्स पर रिलीज होने से पहले बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्क्रीनराइटर कल्याण बंदी ने नेटफ्लिक्स इंडिया और उसकी कंटेंट हेड मोनिका शेरगिल पर कहानी चोरी का आरोप लगाया है। पूरी खबर पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
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साल 1943 की बात है। एक युवा लड़का अपने सपनों को पूरा करने के लिए लाहौर से मुंबई पहुंचा। जेब में सिर्फ 30 रुपए थे और रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था। फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने का सपना था, लेकिन सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि मुंबई जैसे शहर में गुजारा कैसे हो। शुरुआत में उसे चॉल में रहना पड़ा। कुछ दिन बीते तो पैसे खत्म होने लगे। फिल्मों में काम मिलने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी। आखिरकार पेट पालने के लिए उसे नौकरी करनी पड़ी। मिलिट्री सेंसर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली, जहां वह ब्रिटिश सरकार के लिए मिलिट्री सेंसर का काम करते थे। उसे महीने की 65 रुपए तनख्वाह मिलती थी। लेकिन जिस लड़के के पास मुंबई पहुंचने के लिए सिर्फ 30 रुपए थे, उसने हार नहीं मानी। कुछ साल बाद वही शख्स हिंदी सिनेमा का ऐसा सितारा बना, जिसे लोग ‘एवरग्रीन स्टार’ कहने लगे। हम बात कर रहे हैं देव आनंद की और उनकी 103वीं बर्थ एनिवर्सरी पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातें… पिता स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के गुरदासपुर जिले में धर्मदेव पिशोरीमल आनंद के रूप में हुआ था। उनके पिता पिशोरी लाल आनंद गुरदासपुर में वकील थे और स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े थे। देव आनंद चार भाइयों में तीसरे थे। उनके भाई चेतन आनंद और विजय आनंद भी फिल्म जगत से जुड़े रहे, जबकि उनकी बहन शील कांता कपूर फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां थीं। उन्होंने शुरुआती पढ़ाई डलहौजी के सेक्रेड हार्ट स्कूल से की और बाद में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए किया। पिता ने पढ़ाई के लिए पैसे देने से मना कर दिया था देव आनंद आगे पढ़ना चाहते थे और उच्च शिक्षा के लिए लंदन जाने का सपना देखते थे, जबकि उनके पिता चाहते थे कि वह किसी बैंक में नौकरी कर लें, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उनकी आगे की पढ़ाई का खर्च उठाया जा सके। पिता ने साफ कह दिया कि अब उनकी पढ़ाई के लिए पैसे नहीं हैं। इसके बाद देव आनंद ने तय किया कि अगर जिंदगी में संघर्ष करना ही है, तो क्यों न अपने बचपन के सपने एक्टिंग के लिए संघर्ष किया जाए। इसी सपने को पूरा करने के लिए जून 1943 में वह लाहौर से ट्रेन पकड़कर मुंबई के लिए निकल पड़े। शुरुआत में काम नहीं मिला और पैसे खत्म हो गए तो उन्होंने चर्चगेट स्थित मिलिट्री सेंसर ऑफिस में 65 रुपए मासिक वेतन पर नौकरी की। बाद में एक अकाउंटिंग फर्म में 85 रुपए की तनख्वाह पर क्लर्क का काम भी किया। अभिनेता बनने की इच्छा उन्हें अशोक कुमार की फिल्मों से मिली। मिलिट्री सेंसर ऑफिस में करीब एक साल तक नौकरी करने के बाद देव आनंद अपने बड़े भाई चेतन आनंद के पास चले गए। चेतन उस समय भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से जुड़े थे। उन्होंने छोटे भाई को भी अपने साथ जोड़ लिया। यहां से देव आनंद को थिएटर में काम करने और अभिनय सीखने का मौका मिला। फिर किस्मत ने साथ दिया। साल 1946 में उन्हें प्रभात टॉकीज की फिल्म ‘हम एक हैं’ में काम करने का मौका मिला। शर्ट की अदला-बदली, शुरू हुई देव आनंद और गुरु दत्त की दोस्ती फिल्म ‘हम एक हैं’ में देव आनंद बतौर हीरो काम कर रहे थे, जबकि गुरु दत्त वहां असिस्टेंट डायरेक्टर और कोरियोग्राफर के तौर पर काम कर रहे थे। स्टूडियो के सभी लोगों के कपड़े एक ही धोबी के पास जाते थे। एक दिन धोबी से ऐसी गलती हुई कि देव आनंद की सफेद शर्ट गुरु दत्त के कपड़ों के साथ चली गई। गुरु दत्त ने वह शर्ट पहन ली और स्टूडियो पहुंच गए। जब देव आनंद ने अपनी शर्ट गुरु दत्त के शरीर पर देखी, तो दोनों का आमना-सामना हुआ। लेकिन शर्ट को लेकर कोई नाराजगी नहीं हुई। दोनों इस अजीब संयोग पर खूब हंसे। यही छोटी-सी घटना आगे चलकर उनकी गहरी दोस्ती की शुरुआत बन गई। दोनों ने बाद में साथ काम भी किया। देव आनंद ने गुरु दत्त को फिल्म ‘बाजी’ के निर्देशन का मौका दिया। 1951 में रिलीज हुई यह फिल्म गुरु दत्त के निर्देशन करियर की महत्वपूर्ण शुरुआत बनी और देव आनंद के साथ उनकी दोस्ती भी सिनेमा के पर्दे पर नजर आई। फिल्म ‘जिद्दी’ ने देव आनंद के करियर की दिशा बदल दी। अशोक कुमार ने उन्हें इस फिल्म में काम करने का मौका दिया। फिल्म सफल रही और देव आनंद को पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने सिर्फ अभिनेता बनकर रुकने के बजाय खुद फिल्में बनाने का फैसला किया। 1949 में बड़े भाई चेतन आनंद के साथ नवकेतन फिल्म्स की शुरुआत की। इसी बैनर के तहत बनी ‘बाजी’ 1951 में रिलीज हुई। यह फिल्म सफल रही और देव आनंद की स्टार इमेज और मजबूत हो गई। 1950 के दशक में देव आनंद की कई फिल्में सफल रहीं। ‘जाल’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘सीआईडी’, ‘पेइंग गेस्ट’ और ‘काला पानी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें बड़े सितारों की कतार में खड़ा कर दिया। उनका बोलने का तेज अंदाज, संवाद अदायगी और कैमरे के सामने खास स्टाइल दर्शकों को पसंद आया। वह जिस तरह बात करते समय सिर हिलाते थे, वह भी उनकी पहचान बन गया। ‘गाइड’ ने करियर को दी नई पहचान 1960 का दशक देव आनंद के रोमांटिक हीरो वाले दौर के लिए खास रहा। ‘हम दोनों’, ‘तेरे घर के सामने’, ‘ज्वेल थीफ’ और ‘गाइड’ जैसी फिल्मों ने उनके स्टारडम को और मजबूत किया। 1965 में रिलीज हुई ‘गाइड’ उनके करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हुई। फिल्म में उनके साथ वहीदा रहमान थीं। यह फिल्म आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित थी और इसके फिल्म रूपांतरण में देव आनंद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। फिल्म में उन्होंने एक ऐसे किरदार को निभाया, जो साधारण रोमांटिक हीरो की उनकी छवि से काफी अलग था। ‘गाइड’ ने उन्हें एक गंभीर अभिनेता के तौर पर भी स्थापित किया। हालांकि, डीडी नेशनल को दिए एक इंटरव्यू में देव आनंद ने फिल्म ‘गाइड’ को लेकर बताया था कि जब उन्होंने इस फिल्म की योजना बनाई थी,




