मूवी रिव्यू: दुल्हनिया ले आएगी:रिश्तों पर नहीं, समाज की सोच पर निशाना साधती है खुशाली कुमार की फिल्म

क्या 30 की उम्र पार होते ही लड़की की शादी कर देना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए? यही सवाल उठाती है निर्देशक आकाशादित्य लामा की फिल्म ‘दुल्हनिया ले आएगी’। कॉमेडी, इमोशन और पारिवारिक रिश्तों के ताने-बाने में बुनी गई यह फिल्म मनोरंजन के साथ एक जरूरी सामाजिक संदेश भी देती है कि शादी की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। हालांकि कहानी कई जगह अनुमानित लगती है, लेकिन इसका उद्देश्य और क्लाइमैक्स फिल्म को एक बार देखने लायक बना देते हैं। इस फिल्म की लेंथ 2 घंटा 8 मिनट है। दैनिक भास्कर ने इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार रेटिंग दी है। कैसी है फिल्म की कहानी? फिल्म की कहानी 32 वर्षीय नव्या (खुशहाली कुमार) के इर्द-गिर्द घूमती है। बढ़ती उम्र को लेकर उसके पिता (महेश मांजरेकर) लगातार उसकी शादी की चिंता करते रहते हैं। जल्दबाजी में उसकी शादी एक ऐसे लड़के से तय कर दी जाती है, जिसके पहले से कई लड़कियों के साथ अफेयर रह चुके होते हैं। नव्या को इस सच्चाई का पता चल जाता है, लेकिन वह अपने पिता का दिल नहीं तोड़ना चाहती। वह यह बात उनसे छिपा लेती है और तय करती है कि शादी तो उसी दिन होगी, लेकिन सही दूल्हे के साथ। इसके बाद शुरू होती है उसके लिए सही जीवनसाथी की तलाश, जिसमें कई मजेदार और भावुक घटनाएं सामने आती हैं। इस सफर में ओंकार कपूर का किरदार भी कहानी में अहम मोड़ लेकर आता है। फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका क्लाइमैक्स है। आखिर में निर्देशक यह संदेश देते हैं कि सरकार ने भले ही लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र तय कर दी हो, लेकिन शादी की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। लड़की को तभी शादी करनी चाहिए, जब उसे सही जीवनसाथी मिले। हालांकि पहले हाफ में कहानी थोड़ी धीमी गति से आगे बढ़ती है और कई घटनाएं पहले से अनुमानित लगती हैं। अगर स्क्रीनप्ले पर थोड़ा और काम किया जाता तो फिल्म और प्रभावशाली बन सकती थी। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? खुशहाली कुमार ने नव्या के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है। उन्होंने एक ऐसी लड़की की भावनाओं को अच्छी तरह पर्दे पर उतारा है, जो परिवार की खुशी और अपनी जिंदगी के फैसलों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है। ओंकार कपूर अपने किरदार में सहज नजर आते हैं और कहानी को हल्कापन देने में सफल रहते हैं। महेश मांजरेकर एक चिंतित पिता के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं। उनके और खुशहाली कुमार के बीच के भावनात्मक दृश्य फिल्म की सबसे मजबूत कड़ियों में शामिल हैं। वहीं पीयूष मिश्रा अपनी दमदार स्क्रीन प्रेजेंस और संवाद अदायगी से हर बार की तरह प्रभावित करते हैं। भले ही उनका किरदार बहुत लंबा न हो, लेकिन जहां भी नजर आते हैं, अपनी छाप छोड़ जाते हैं। डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष निर्देशक आकाशादित्य लामा ने गंभीर सामाजिक मुद्दे को भारी-भरकम बनाने के बजाय हल्के-फुल्के और मनोरंजक अंदाज में पेश किया है। यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहानी को पारिवारिक दर्शकों के हिसाब से सरल और सहज रखा है। सिनेमैटोग्राफी फिल्म के माहौल के अनुरूप है और रंगों का इस्तेमाल आकर्षक लगता है। एडिटिंग पहले हाफ में थोड़ी और कसी जा सकती थी, लेकिन दूसरे हाफ में कहानी अच्छी रफ्तार पकड़ लेती है। संवाद कई जगह मुस्कुराने पर मजबूर करते हैं, जबकि क्लाइमैक्स भावनात्मक असर छोड़ता है। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? फिल्म का संगीत इसकी मजबूत कड़ियों में से एक है। ‘बिटिया पराई नहीं होती’ गाना भावनात्मक रूप से दिल को छूता है और फिल्म के संदेश को मजबूती देता है। वहीं ‘जलवा दिखा जाए’ कहानी में मनोरंजन का तड़का लगाता है। दोनों गाने फिल्म के मूड के साथ अच्छी तरह मेल खाते हैं और याद रह जाते हैं। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? ‘दुल्हनिया ले आएगी’ कोई बहुत अलग कहानी नहीं कहती, लेकिन समाज में लड़कियों की शादी को लेकर बने दबाव और सोच पर जरूरी सवाल जरूर उठाती है। फिल्म कॉमेडी, इमोशन और सामाजिक संदेश का संतुलित मिश्रण है। अगर आप परिवार के साथ ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं, जो मनोरंजन के साथ एक सकारात्मक संदेश भी दे, तो यह फिल्म आपके लिए अच्छी पसंद हो सकती है।
मूवी रिव्यू: दुल्हनिया ले आएगी:रिश्तों पर नहीं, समाज की सोच पर निशाना साधती है खुशाली कुमार की फिल्म

क्या 30 की उम्र पार होते ही लड़की की शादी कर देना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए? यही सवाल उठाती है निर्देशक आकाशादित्य लामा की फिल्म ‘दुल्हनिया ले आएगी’। कॉमेडी, इमोशन और पारिवारिक रिश्तों के ताने-बाने में बुनी गई यह फिल्म मनोरंजन के साथ एक जरूरी सामाजिक संदेश भी देती है कि शादी की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। हालांकि कहानी कई जगह अनुमानित लगती है, लेकिन इसका उद्देश्य और क्लाइमैक्स फिल्म को एक बार देखने लायक बना देते हैं। इस फिल्म की लेंथ 2 घंटा 8 मिनट है। दैनिक भास्कर ने इस फिल्म को 5 में से 3 स्टार रेटिंग दी है। कैसी है फिल्म की कहानी? फिल्म की कहानी 32 वर्षीय नव्या (खुशहाली कुमार) के इर्द-गिर्द घूमती है। बढ़ती उम्र को लेकर उसके पिता (महेश मांजरेकर) लगातार उसकी शादी की चिंता करते रहते हैं। जल्दबाजी में उसकी शादी एक ऐसे लड़के से तय कर दी जाती है, जिसके पहले से कई लड़कियों के साथ अफेयर रह चुके होते हैं। नव्या को इस सच्चाई का पता चल जाता है, लेकिन वह अपने पिता का दिल नहीं तोड़ना चाहती। वह यह बात उनसे छिपा लेती है और तय करती है कि शादी तो उसी दिन होगी, लेकिन सही दूल्हे के साथ। इसके बाद शुरू होती है उसके लिए सही जीवनसाथी की तलाश, जिसमें कई मजेदार और भावुक घटनाएं सामने आती हैं। इस सफर में ओंकार कपूर का किरदार भी कहानी में अहम मोड़ लेकर आता है। फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका क्लाइमैक्स है। आखिर में निर्देशक यह संदेश देते हैं कि सरकार ने भले ही लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र तय कर दी हो, लेकिन शादी की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। लड़की को तभी शादी करनी चाहिए, जब उसे सही जीवनसाथी मिले। हालांकि पहले हाफ में कहानी थोड़ी धीमी गति से आगे बढ़ती है और कई घटनाएं पहले से अनुमानित लगती हैं। अगर स्क्रीनप्ले पर थोड़ा और काम किया जाता तो फिल्म और प्रभावशाली बन सकती थी। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? खुशहाली कुमार ने नव्या के किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाया है। उन्होंने एक ऐसी लड़की की भावनाओं को अच्छी तरह पर्दे पर उतारा है, जो परिवार की खुशी और अपनी जिंदगी के फैसलों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है। ओंकार कपूर अपने किरदार में सहज नजर आते हैं और कहानी को हल्कापन देने में सफल रहते हैं। महेश मांजरेकर एक चिंतित पिता के रूप में प्रभाव छोड़ते हैं। उनके और खुशहाली कुमार के बीच के भावनात्मक दृश्य फिल्म की सबसे मजबूत कड़ियों में शामिल हैं। वहीं पीयूष मिश्रा अपनी दमदार स्क्रीन प्रेजेंस और संवाद अदायगी से हर बार की तरह प्रभावित करते हैं। भले ही उनका किरदार बहुत लंबा न हो, लेकिन जहां भी नजर आते हैं, अपनी छाप छोड़ जाते हैं। डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष निर्देशक आकाशादित्य लामा ने गंभीर सामाजिक मुद्दे को भारी-भरकम बनाने के बजाय हल्के-फुल्के और मनोरंजक अंदाज में पेश किया है। यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने कहानी को पारिवारिक दर्शकों के हिसाब से सरल और सहज रखा है। सिनेमैटोग्राफी फिल्म के माहौल के अनुरूप है और रंगों का इस्तेमाल आकर्षक लगता है। एडिटिंग पहले हाफ में थोड़ी और कसी जा सकती थी, लेकिन दूसरे हाफ में कहानी अच्छी रफ्तार पकड़ लेती है। संवाद कई जगह मुस्कुराने पर मजबूर करते हैं, जबकि क्लाइमैक्स भावनात्मक असर छोड़ता है। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? फिल्म का संगीत इसकी मजबूत कड़ियों में से एक है। ‘बिटिया पराई नहीं होती’ गाना भावनात्मक रूप से दिल को छूता है और फिल्म के संदेश को मजबूती देता है। वहीं ‘जलवा दिखा जाए’ कहानी में मनोरंजन का तड़का लगाता है। दोनों गाने फिल्म के मूड के साथ अच्छी तरह मेल खाते हैं और याद रह जाते हैं। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? ‘दुल्हनिया ले आएगी’ कोई बहुत अलग कहानी नहीं कहती, लेकिन समाज में लड़कियों की शादी को लेकर बने दबाव और सोच पर जरूरी सवाल जरूर उठाती है। फिल्म कॉमेडी, इमोशन और सामाजिक संदेश का संतुलित मिश्रण है। अगर आप परिवार के साथ ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं, जो मनोरंजन के साथ एक सकारात्मक संदेश भी दे, तो यह फिल्म आपके लिए अच्छी पसंद हो सकती है।
बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

सिनेमा में कई हीरो आए, कई सुपरस्टार बने, लेकिन एक अभिनेता ऐसा भी था जिसने पर्दे पर उपकार, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों के जरिए देशभक्ति को जिया। उनका नाम था मनोज कुमार। देशप्रम ही वो वजह था कि लोग उनका असली नाम भूलने लगे और उन्हें सिर्फ एक नाम से पुकारने लगे ‘भारत कुमार’। उनकी फिल्मों में दिखने वाला जज्बा, जुनून और दर्द सिर्फ अभिनय नहीं था। उन्होंने खुद 10 साल की उम्र में भारत-पाक के बंटवारे से उठी चीखें सुनी और कई जाने जाते देखीं। बीमार मां को दर्द से कराहते देखा और छोटे भाई को दम तोड़ते भी। सिर पर छत नहीं थी, भविष्य का कोई भरोसा नहीं था और उम्मीद भी टूटने लगी, लेकिन किसे पता था कि पाकिस्तान से भागा वो बच्चा, देशभक्ति की ऐसी मिसाल बनेगा कि हर कोई उन्हें असल नाम से ज्यादा भारत कुमार के नाम से पहचानेगा। आज मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार की बर्थ एनिवर्सरी है। अप्रैल 2025 में उनका निधन हो गया है, लेकिन अगर आज वो होते तो 88 साल के हो जाते। उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए, विभाजन के दर्द से निकलकर देश का हीरो बनने की कहानी- किस्सा- 1 दंगों में भाई की मौत हुई, यमुना में शव बहाया; इलाज न करने वाले डॉक्टर्स को लाठी से पीटा 24 जुलाई 1937 ब्रिटिश इंडिया के अबोटाबाद के पंजाबी हिंदू परिवार में हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी का जन्म हुआ, जो बाद में मनोज कुमार नाम से जाने गए। वो हिस्सा जहां उनका जन्म हुआ वो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा में आता है। मनोज कुमार महज 10 साल के थे, जब अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद बंटवारा शुरू हुआ। दंगे भड़के और जान बचाते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली के हडसन लाइन रिफ्यूजी कैंप में आकर रहने लगा। छोटा भाई कुक्कू महज 2 माह का था। पैदाइश से ही उसकी तबीयत खराब रहती थी और मां भी बीमार चल रही थी। दंगों के बीच डॉक्टर्स भी जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे, तभी भाई की सही इलाज न मिल पाने से मौत हो गई। बचपन का वो दर्द याद कर मनोज कुमार ने संसद टीवी के शो गुफ्तगू में कहा- वो रोता हुआ बचपन, जो लाहौर से बिछड़ गया, जो अबोटाबाद से बिछड़ गया। बहुत रोता हुआ बचपन था वो, आज भी सोचता हूं तो आंखे भले ही संभाल लूं, लेकिन दिल रोता है। दिल का रोना बहुत भयानक होता है। सबसे बड़ा मैं, मुझसे छोटी बहन ललिता। जब बंटवारा हुआ तो मां ने छोटे भाई को जन्म दिया। कुक्कू नाम था उसका, बीमार, मां भी बीमार। हम रिफ्यूजी कैंप में थे। मां को दिल्ली के तीस हजारी अस्पताल में रखा गया। जब सायरन बजता था, तो डॉक्टर-नर्स अंडरग्राउंड चले जाते थे। मां मेरी तड़प रही थी, भाई तड़प रहा था। मां चीख रही थी कि डॉक्टर को बुलाओ। वो सब अंडरग्राउंड थे। मां चीख मारी, मेरा भाई कुक्कू चला गया था। मैं गुस्से में था। मैं लाठी लेकर अंडरग्राउंड गया। डॉक्टर्स को भी मारा, नर्स को भी मारा। पिता जी आए, उन्होंने संभाला। दूसरे दिन उस 2 महीने के बच्चे को जमुना जी में बहा दिया, जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, वैसे-वैसे लगता था कि मैं डूब रहा हूं। फिर पिता जी ने रात को अपने सिर पर हाथ रखकर कसम खिलवाई कि जिंदगी में दंगा, मारपीट नहीं करना। आखिर में मनोज कुमार ने रुंहासी आवाज में कहा, जिसका बचपन मर गया, समझो वो आदमी ही मर गया। भाई की मौत के बाद भी मनोज कुमार, 2 महीने तक रिफ्यूजी कैंप में ही रहे और हालात बेहतर होने के बाद परिवार दिल्ली में ही बस गया। पिता स्टील की फैक्ट्री में काम करते थे, लेकिन साथ ही वो शायर थे। जब मनोज कुमार के पिता 5वीं में थे, तो लामा इकबाल ने उनकी नजम सुनकर उन्हें खिज्र का तकाजा दिया था। जब उनका कलाम छपा, तो महाराष्ट्र उर्दू एकेडमी से उन्हें सिमरन अवॉर्ड मिला। किस्सा- 2 दिलीप कुमार को फिल्मों में मरता देख मान लिया फरिश्ता, सोचा- मैं भी फरिश्ता बनूंगा दिल्ली में ही मनोज कुमार की पढ़ाई हुई। वह कम उम्र के थे, जब मामा उन्हें अक्सर फिल्में दिखाने ले जाते थे। तब दिलीप कुमार स्टार बन चुके थे, जिनकी फिल्में अक्सर सिनेमाघरों में लगती थीं। मनोज कुमार ने सबसे पहले दिलीप कुमार की 1947 में आई फिल्म जुगनू देखी, जिसमें उनके किरदार की मौत हो जाती है। तब तक मनोज कुमार नहीं जानते थे कि सिनेमा क्या होता है। कुछ समय बाद उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म शहीद (1948) देखी। उसमें भी दिलीप कुमार को मरता हुआ दिखाया गया। मनोज कुमार फिल्म देखकर घर लौटे, तो देर तक सोए ही नहीं। मन में बस एक ही ख्याल था कि जब वो शख्स एक साल पहले (फिल्म जुगनू में) मर चुके हैं, तो दोबारा (फिल्म शहीद में) कैसे मर सकते हैं। मां ने उन्हें जागते देखा, तो पूछ लिया- सोते क्यों नहीं हो? मनोज कुमार ने मासूम आवाज में कहा- बीजी (जैसा वो मां को पुकारते थे), आदमी कितनी बार मरता है? मां ने जवाब दिया- एक बार। मनोज कुमार ने फिर कहा- और जो 2-3 बार मरे? मां ने कहा- वो तो फरिश्ता ही होगा। उस दिन मनोज कुमार ने ठान लिया कि मैं भी बड़ा होकर फरिश्ता ही बनूंगा। किस्सा- 3 कजन का खत मिलने पर बॉम्बे पहुंचे, सेट पर सामान ढोने का काम मिला बढ़ती उम्र के साथ मनोज कुमार हीरो बनने का ख्याल पक्का करने लगे। उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। मनोज कुमार के कजन लेखराज भाकरी भी हिंदी सिनेमा से जुड़ चुके थे। एक दिन जब मनोज कुमार की लेखराज से मुलाकात हुई, तो उन्होंने मनोज को देखते ही कहा- तू तो हीरो लगता है। मनोज सुनकर खड़े हुए और झट से कहा- तो बना दीजिए। लेखराज ने जब फिल्में डायरेक्ट करना शुरू किया, तो उन्हें मनोज की कही वो बात याद रही। 1956 में उन्होंने मनोज के परिवार को खत लिखकर उन्हें बॉम्बे भेजने को कहा। माता-पिता की रजामंदी के बाद मनोज बॉम्बे पहुंचे और चाचा-चाची के घर में रहने लगे। लेखराज ने शुरुआत
'टी-सीरीज का राइवल हूं', फिर भी खुशहाली को किया कास्ट:डायरेक्टर आकाशादित्य लामा बोले- मैंने सिर्फ टैलेंटेड एक्ट्रेस देखा

फिल्म ‘दुल्हनिया ले आएगी’ को लेकर अभिनेत्री खुशहाली कुमार और निर्देशक-निर्माता आकाशादित्य लामा ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। इंटरव्यू में लामा ने मजाकिया अंदाज में खुद को टी-सीरीज का ‘राइवल’ बताते हुए खुशहाली की कास्टिंग की वजह बताई। दोनों ने शादी को लेकर युवाओं की बदलती सोच, रिश्तों में भरोसे की अहमियत और फिल्म के संदेश पर बात की। खुशहाली ने पीयूष मिश्रा और महेश मांजरेकर के साथ काम करने का अनुभव साझा किया। साथ ही पिता गुलशन कुमार की विरासत, अपनी अलग पहचान और समाजसेवा से जुड़े किस्से भी बताए। सवाल: आजकल युवाओं में शादी को लेकर डर बढ़ रहा है। ऐसे में ‘दुल्हनिया ले आएगी’ जैसी फिल्म लाने का विचार कैसे आया? जवाब/आकाशादित्य लामा: शादी के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है और शादी से ही बनता है। हमारी फिल्म कॉमेडी जरूर है, लेकिन इसके जरिए रिश्तों, प्यार और पिता-बेटी के रिश्ते की बात कही गई है। गंभीर बातों को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश किया है। खुशहाली कुमार: शादी तब करनी चाहिए, जब आप उसके लिए तैयार हों। सरकार ने शादी की न्यूनतम उम्र तय की है, लेकिन कोई एक्सपायरी डेट नहीं रखी। सही साथी मिले और आप मानसिक रूप से तैयार हों, तभी शादी का फैसला लेना चाहिए। यही बात फिल्म भी मजेदार अंदाज में कहती है। सवाल: खुशहाली कुमार को इस फिल्म के लिए कैसे चुना? जवाब/आकाशादित्य लामा: (हंसते हुए) लोग कहते हैं कि खुशहाली बड़ी म्यूजिक कंपनी की मालकिन हैं। मैं भी आजकल एक छोटी-सी म्यूजिक कंपनी चला रहा हूं, इसलिए फिलहाल हम दोनों राइवल हैं। ऐसे में मैं उनके पास क्यों जाता? लेकिन सच यह है कि मैंने उन्हें सिर्फ एक अभिनेत्री के तौर पर चुना। मैंने उनकी फिल्म ‘धोखा: राउंड द कॉर्नर’ देखी थी और ‘स्टारफिश’ के कुछ हिस्से भी। मेरी कहानी की ‘नव्या’ के लिए वही सबसे फिट लगीं। मैं ऐसी अभिनेत्री चाहता था, जिसकी कोई तय इमेज न हो। खुशहाली ने पहले कॉमेडी नहीं की थी, इसलिए लगा कि उनके साथ फिल्म में नई ताजगी आएगी। कहानी उन्हें पसंद आई और वहीं से हमारी यात्रा शुरू हुई। सवाल: फिल्म में पीयूष मिश्रा और महेश मांजरेकर जैसे बड़े कलाकार हैं। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब/आकाशादित्य लामा: कई लोगों ने पहले ही कहा था कि इतने बड़े कलाकारों को संभालना आसान नहीं होगा। लेकिन मेरा अनुभव बिल्कुल उल्टा रहा। अगर कलाकार को भरोसा हो जाए कि निर्देशक अपना काम जानता है और निर्माता उसका सम्मान करता है, तो कोई दिक्कत नहीं होती। दिलचस्प बात यह रही कि महेश मांजरेकर, पीयूष मिश्रा और स्नेहिल दीक्षित खुद भी निर्देशक हैं। मैंने इस फिल्म से सीखा कि निर्देशक को डायरेक्ट करना सबसे आसान होता है। खुशहाली कुमार: पीयूष जी की एनर्जी कमाल की है। रात की शूटिंग हो या दिन की, वह हमेशा पूरे उत्साह के साथ सेट पर आते थे। महेश सर के साथ पिता-बेटी के भावनात्मक दृश्य करना मेरे लिए खास अनुभव रहा। वह इतने नैचुरल अभिनेता हैं कि उनके साथ अभिनय करना आसान हो जाता है। सवाल: अगर फिल्म की शूटिंग का बिहाइंड द सीन वीडियो रिलीज हो, तो सबसे यादगार पल कौन-सा होगा? जवाब/आकाशादित्य लामा: दो सीन मेरे सबसे करीब हैं। पहला, जब नव्या अपने पिता से कहना चाहती है कि वह शादी नहीं करना चाहती, लेकिन उनकी भावनाओं को देखकर चुप रह जाती है। दूसरा, फिल्म के आखिर में खुशहाली का लंबा मोनोलॉग। उन्होंने उसे बिना रीटेक के एक ही बार में पूरा किया। ट्रायल शो में लोग पहले हंस रहे थे, लेकिन यह सीन आते ही माहौल भावुक हो गया। खुशहाली कुमार: सेट पर सबसे ज्यादा मजा तब आता था, जब सर खुद एक्टिंग करके सीन समझाते थे। उनका थिएटर बैकग्राउंड है, इसलिए वह हर सीन निभाकर दिखाते थे। कई बार हमें हंसी रोकना मुश्किल हो जाता था। सवाल: आजकल शादी को लेकर युवाओं की सोच बदल रही है। कई लोग शादी से बचना चाहते हैं। आप इसे कैसे देखते हैं? जवाब/आकाशादित्य लामा: कुछ घटनाओं की वजह से लोगों के मन में डर बढ़ा है, लेकिन रिश्ते भरोसे से चलते हैं। सोशल मीडिया के दौर में हर घटना तुरंत वायरल हो जाती है। हमें सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि सामने वाले ने क्या कहा, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि उसने ऐसा क्यों कहा। रिश्तों में विश्वास और धैर्य सबसे जरूरी हैं। परिवार के साथ ज्यादा समय बिताने की जरूरत है। खुशहाली कुमार: मैं भी मानती हूं कि शादी तभी करनी चाहिए, जब दोनों लोग उसके लिए तैयार हों। कई बार परिवार या समाज के दबाव में लोग शादी कर लेते हैं और बाद में परेशानियां शुरू हो जाती हैं। आज लड़कियां खुलकर अपनी बात कह रही हैं। अगर कोई पहले करियर बनाना चाहती है, तो उसके फैसले का सम्मान होना चाहिए। हर इंसान को वही करना चाहिए, जो वह सच में चाहता है। सवाल: खुशहाली, लोग आपको अक्सर टी-सीरीज और गुलशन कुमार के परिवार से जोड़कर देखते हैं। क्या आपको लगता है कि अब आपकी अलग पहचान भी बन चुकी है? जवाब/खुशहाली कुमार: मुझे गर्व है कि मैं गुलशन कुमार जी की बेटी हूं। मैं हमेशा चाहूंगी कि लोग मुझे उनके नाम से भी याद रखें। लेकिन जब मुझे मेहनत की वजह से काम मिलता है, तो वह खुशी अलग होती है। ‘धोखा’ के बाद यह फिल्म मुझे मेरी एक्टिंग देखकर मिली। उससे पहले मैं फैशन डिजाइनर थी। पेरिस और न्यूयॉर्क में शो किए, हॉलीवुड कलाकारों के लिए डिजाइनिंग की। वहां मुझे कोई परिवार की वजह से नहीं जानता था। वहां जो पहचान मिली, वह मेरी मेहनत की वजह से मिली। सवाल: इस फिल्म से जुड़ी सबसे खास याद क्या रहेगी? जवाब/खुशहाली कुमार: यह मेरे प्रोडक्शन हाउस के बाहर साइन की गई पहली फिल्म और पहली कॉमेडी भी है। पहला साइनिंग अमाउंट मिलने पर मैंने उसे भगवान गणेश के चरणों में रखा। यही पल मेरे लिए सबसे खास रहेगा। मेरी कोशिश रहती है कि कमाई का एक हिस्सा जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। कई लड़कियों की पढ़ाई का खर्च मैं उठाती हूं। पहले अपनी फैक्ट्री के पास बच्चों को रोज खाना भी खिलाती थी। मुझे लगता है कि ये संस्कार मुझे पापा से
बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

सिनेमा में कई हीरो आए, कई सुपरस्टार बने, लेकिन एक अभिनेता ऐसा भी था जिसने पर्दे पर उपकार, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों के जरिए देशभक्ति को जिया। उनका नाम था मनोज कुमार। देशप्रम ही वो वजह था कि लोग उनका असली नाम भूलने लगे और उन्हें सिर्फ एक नाम से पुकारने लगे ‘भारत कुमार’। उनकी फिल्मों में दिखने वाला जज्बा, जुनून और दर्द सिर्फ अभिनय नहीं था। उन्होंने खुद 10 साल की उम्र में भारत-पाक के बंटवारे से उठी चीखें सुनी और कई जाने जाते देखीं। बीमार मां को दर्द से कराहते देखा और छोटे भाई को दम तोड़ते भी। सिर पर छत नहीं थी, भविष्य का कोई भरोसा नहीं था और उम्मीद भी टूटने लगी, लेकिन किसे पता था कि पाकिस्तान से भागा वो बच्चा, देशभक्ति की ऐसी मिसाल बनेगा कि हर कोई उन्हें असल नाम से ज्यादा भारत कुमार के नाम से पहचानेगा। आज मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार की बर्थ एनिवर्सरी है। अप्रैल 2025 में उनका निधन हो गया है, लेकिन अगर आज वो होते तो 88 साल के हो जाते। उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए, विभाजन के दर्द से निकलकर देश का हीरो बनने की कहानी- किस्सा- 1 दंगों में भाई की मौत हुई, यमुना में शव बहाया; इलाज न करने वाले डॉक्टर्स को लाठी से पीटा 24 जुलाई 1937 ब्रिटिश इंडिया के अबोटाबाद के पंजाबी हिंदू परिवार में हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी का जन्म हुआ, जो बाद में मनोज कुमार नाम से जाने गए। वो हिस्सा जहां उनका जन्म हुआ वो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा में आता है। मनोज कुमार महज 10 साल के थे, जब अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद बंटवारा शुरू हुआ। दंगे भड़के और जान बचाते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली के हडसन लाइन रिफ्यूजी कैंप में आकर रहने लगा। छोटा भाई कुक्कू महज 2 माह का था। पैदाइश से ही उसकी तबीयत खराब रहती थी और मां भी बीमार चल रही थी। दंगों के बीच डॉक्टर्स भी जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे, तभी भाई की सही इलाज न मिल पाने से मौत हो गई। बचपन का वो दर्द याद कर मनोज कुमार ने संसद टीवी के शो गुफ्तगू में कहा- वो रोता हुआ बचपन, जो लाहौर से बिछड़ गया, जो अबोटाबाद से बिछड़ गया। बहुत रोता हुआ बचपन था वो, आज भी सोचता हूं तो आंखे भले ही संभाल लूं, लेकिन दिल रोता है। दिल का रोना बहुत भयानक होता है। सबसे बड़ा मैं, मुझसे छोटी बहन ललिता। जब बंटवारा हुआ तो मां ने छोटे भाई को जन्म दिया। कुक्कू नाम था उसका, बीमार, मां भी बीमार। हम रिफ्यूजी कैंप में थे। मां को दिल्ली के तीस हजारी अस्पताल में रखा गया। जब सायरन बजता था, तो डॉक्टर-नर्स अंडरग्राउंड चले जाते थे। मां मेरी तड़प रही थी, भाई तड़प रहा था। मां चीख रही थी कि डॉक्टर को बुलाओ। वो सब अंडरग्राउंड थे। मां चीख मारी, मेरा भाई कुक्कू चला गया था। मैं गुस्से में था। मैं लाठी लेकर अंडरग्राउंड गया। डॉक्टर्स को भी मारा, नर्स को भी मारा। पिता जी आए, उन्होंने संभाला। दूसरे दिन उस 2 महीने के बच्चे को जमुना जी में बहा दिया, जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, वैसे-वैसे लगता था कि मैं डूब रहा हूं। फिर पिता जी ने रात को अपने सिर पर हाथ रखकर कसम खिलवाई कि जिंदगी में दंगा, मारपीट नहीं करना। आखिर में मनोज कुमार ने रुंहासी आवाज में कहा, जिसका बचपन मर गया, समझो वो आदमी ही मर गया। भाई की मौत के बाद भी मनोज कुमार, 2 महीने तक रिफ्यूजी कैंप में ही रहे और हालात बेहतर होने के बाद परिवार दिल्ली में ही बस गया। पिता स्टील की फैक्ट्री में काम करते थे, लेकिन साथ ही वो शायर थे। जब मनोज कुमार के पिता 5वीं में थे, तो लामा इकबाल ने उनकी नजम सुनकर उन्हें खिज्र का तकाजा दिया था। जब उनका कलाम छपा, तो महाराष्ट्र उर्दू एकेडमी से उन्हें सिमरन अवॉर्ड मिला। किस्सा- 2 दिलीप कुमार को फिल्मों में मरता देख मान लिया फरिश्ता, सोचा- मैं भी फरिश्ता बनूंगा दिल्ली में ही मनोज कुमार की पढ़ाई हुई। वह कम उम्र के थे, जब मामा उन्हें अक्सर फिल्में दिखाने ले जाते थे। तब दिलीप कुमार स्टार बन चुके थे, जिनकी फिल्में अक्सर सिनेमाघरों में लगती थीं। मनोज कुमार ने सबसे पहले दिलीप कुमार की 1947 में आई फिल्म जुगनू देखी, जिसमें उनके किरदार की मौत हो जाती है। तब तक मनोज कुमार नहीं जानते थे कि सिनेमा क्या होता है। कुछ समय बाद उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म शहीद (1948) देखी। उसमें भी दिलीप कुमार को मरता हुआ दिखाया गया। मनोज कुमार फिल्म देखकर घर लौटे, तो देर तक सोए ही नहीं। मन में बस एक ही ख्याल था कि जब वो शख्स एक साल पहले (फिल्म जुगनू में) मर चुके हैं, तो दोबारा (फिल्म शहीद में) कैसे मर सकते हैं। मां ने उन्हें जागते देखा, तो पूछ लिया- सोते क्यों नहीं हो? मनोज कुमार ने मासूम आवाज में कहा- बीजी (जैसा वो मां को पुकारते थे), आदमी कितनी बार मरता है? मां ने जवाब दिया- एक बार। मनोज कुमार ने फिर कहा- और जो 2-3 बार मरे? मां ने कहा- वो तो फरिश्ता ही होगा। उस दिन मनोज कुमार ने ठान लिया कि मैं भी बड़ा होकर फरिश्ता ही बनूंगा। किस्सा- 3 कजन का खत मिलने पर बॉम्बे पहुंचे, सेट पर सामान ढोने का काम मिला बढ़ती उम्र के साथ मनोज कुमार हीरो बनने का ख्याल पक्का करने लगे। उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। मनोज कुमार के कजन लेखराज भाकरी भी हिंदी सिनेमा से जुड़ चुके थे। एक दिन जब मनोज कुमार की लेखराज से मुलाकात हुई, तो उन्होंने मनोज को देखते ही कहा- तू तो हीरो लगता है। मनोज सुनकर खड़े हुए और झट से कहा- तो बना दीजिए। लेखराज ने जब फिल्में डायरेक्ट करना शुरू किया, तो उन्हें मनोज की कही वो बात याद रही। 1956 में उन्होंने मनोज के परिवार को खत लिखकर उन्हें बॉम्बे भेजने को कहा। माता-पिता की रजामंदी के बाद मनोज बॉम्बे पहुंचे और चाचा-चाची के घर में रहने लगे। लेखराज ने शुरुआत
'टी-सीरीज का राइवल हूं', फिर भी खुशहाली को किया कास्ट:डायरेक्टर आकाशादित्य लामा बोले- मैंने सिर्फ टैलेंटेड एक्ट्रेस देखा

फिल्म ‘दुल्हनिया ले आएगी’ को लेकर अभिनेत्री खुशहाली कुमार और निर्देशक-निर्माता आकाशादित्य लामा ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। इंटरव्यू में लामा ने मजाकिया अंदाज में खुद को टी-सीरीज का ‘राइवल’ बताते हुए खुशहाली की कास्टिंग की वजह बताई। दोनों ने शादी को लेकर युवाओं की बदलती सोच, रिश्तों में भरोसे की अहमियत और फिल्म के संदेश पर बात की। खुशहाली ने पीयूष मिश्रा और महेश मांजरेकर के साथ काम करने का अनुभव साझा किया। साथ ही पिता गुलशन कुमार की विरासत, अपनी अलग पहचान और समाजसेवा से जुड़े किस्से भी बताए। सवाल: आजकल युवाओं में शादी को लेकर डर बढ़ रहा है। ऐसे में ‘दुल्हनिया ले आएगी’ जैसी फिल्म लाने का विचार कैसे आया? जवाब/आकाशादित्य लामा: शादी के बिना समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है और शादी से ही बनता है। हमारी फिल्म कॉमेडी जरूर है, लेकिन इसके जरिए रिश्तों, प्यार और पिता-बेटी के रिश्ते की बात कही गई है। गंभीर बातों को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश किया है। खुशहाली कुमार: शादी तब करनी चाहिए, जब आप उसके लिए तैयार हों। सरकार ने शादी की न्यूनतम उम्र तय की है, लेकिन कोई एक्सपायरी डेट नहीं रखी। सही साथी मिले और आप मानसिक रूप से तैयार हों, तभी शादी का फैसला लेना चाहिए। यही बात फिल्म भी मजेदार अंदाज में कहती है। सवाल: खुशहाली कुमार को इस फिल्म के लिए कैसे चुना? जवाब/आकाशादित्य लामा: (हंसते हुए) लोग कहते हैं कि खुशहाली बड़ी म्यूजिक कंपनी की मालकिन हैं। मैं भी आजकल एक छोटी-सी म्यूजिक कंपनी चला रहा हूं, इसलिए फिलहाल हम दोनों राइवल हैं। ऐसे में मैं उनके पास क्यों जाता? लेकिन सच यह है कि मैंने उन्हें सिर्फ एक अभिनेत्री के तौर पर चुना। मैंने उनकी फिल्म ‘धोखा: राउंड द कॉर्नर’ देखी थी और ‘स्टारफिश’ के कुछ हिस्से भी। मेरी कहानी की ‘नव्या’ के लिए वही सबसे फिट लगीं। मैं ऐसी अभिनेत्री चाहता था, जिसकी कोई तय इमेज न हो। खुशहाली ने पहले कॉमेडी नहीं की थी, इसलिए लगा कि उनके साथ फिल्म में नई ताजगी आएगी। कहानी उन्हें पसंद आई और वहीं से हमारी यात्रा शुरू हुई। सवाल: फिल्म में पीयूष मिश्रा और महेश मांजरेकर जैसे बड़े कलाकार हैं। उनके साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब/आकाशादित्य लामा: कई लोगों ने पहले ही कहा था कि इतने बड़े कलाकारों को संभालना आसान नहीं होगा। लेकिन मेरा अनुभव बिल्कुल उल्टा रहा। अगर कलाकार को भरोसा हो जाए कि निर्देशक अपना काम जानता है और निर्माता उसका सम्मान करता है, तो कोई दिक्कत नहीं होती। दिलचस्प बात यह रही कि महेश मांजरेकर, पीयूष मिश्रा और स्नेहिल दीक्षित खुद भी निर्देशक हैं। मैंने इस फिल्म से सीखा कि निर्देशक को डायरेक्ट करना सबसे आसान होता है। खुशहाली कुमार: पीयूष जी की एनर्जी कमाल की है। रात की शूटिंग हो या दिन की, वह हमेशा पूरे उत्साह के साथ सेट पर आते थे। महेश सर के साथ पिता-बेटी के भावनात्मक दृश्य करना मेरे लिए खास अनुभव रहा। वह इतने नैचुरल अभिनेता हैं कि उनके साथ अभिनय करना आसान हो जाता है। सवाल: अगर फिल्म की शूटिंग का बिहाइंड द सीन वीडियो रिलीज हो, तो सबसे यादगार पल कौन-सा होगा? जवाब/आकाशादित्य लामा: दो सीन मेरे सबसे करीब हैं। पहला, जब नव्या अपने पिता से कहना चाहती है कि वह शादी नहीं करना चाहती, लेकिन उनकी भावनाओं को देखकर चुप रह जाती है। दूसरा, फिल्म के आखिर में खुशहाली का लंबा मोनोलॉग। उन्होंने उसे बिना रीटेक के एक ही बार में पूरा किया। ट्रायल शो में लोग पहले हंस रहे थे, लेकिन यह सीन आते ही माहौल भावुक हो गया। खुशहाली कुमार: सेट पर सबसे ज्यादा मजा तब आता था, जब सर खुद एक्टिंग करके सीन समझाते थे। उनका थिएटर बैकग्राउंड है, इसलिए वह हर सीन निभाकर दिखाते थे। कई बार हमें हंसी रोकना मुश्किल हो जाता था। सवाल: आजकल शादी को लेकर युवाओं की सोच बदल रही है। कई लोग शादी से बचना चाहते हैं। आप इसे कैसे देखते हैं? जवाब/आकाशादित्य लामा: कुछ घटनाओं की वजह से लोगों के मन में डर बढ़ा है, लेकिन रिश्ते भरोसे से चलते हैं। सोशल मीडिया के दौर में हर घटना तुरंत वायरल हो जाती है। हमें सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि सामने वाले ने क्या कहा, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि उसने ऐसा क्यों कहा। रिश्तों में विश्वास और धैर्य सबसे जरूरी हैं। परिवार के साथ ज्यादा समय बिताने की जरूरत है। खुशहाली कुमार: मैं भी मानती हूं कि शादी तभी करनी चाहिए, जब दोनों लोग उसके लिए तैयार हों। कई बार परिवार या समाज के दबाव में लोग शादी कर लेते हैं और बाद में परेशानियां शुरू हो जाती हैं। आज लड़कियां खुलकर अपनी बात कह रही हैं। अगर कोई पहले करियर बनाना चाहती है, तो उसके फैसले का सम्मान होना चाहिए। हर इंसान को वही करना चाहिए, जो वह सच में चाहता है। सवाल: खुशहाली, लोग आपको अक्सर टी-सीरीज और गुलशन कुमार के परिवार से जोड़कर देखते हैं। क्या आपको लगता है कि अब आपकी अलग पहचान भी बन चुकी है? जवाब/खुशहाली कुमार: मुझे गर्व है कि मैं गुलशन कुमार जी की बेटी हूं। मैं हमेशा चाहूंगी कि लोग मुझे उनके नाम से भी याद रखें। लेकिन जब मुझे मेहनत की वजह से काम मिलता है, तो वह खुशी अलग होती है। ‘धोखा’ के बाद यह फिल्म मुझे मेरी एक्टिंग देखकर मिली। उससे पहले मैं फैशन डिजाइनर थी। पेरिस और न्यूयॉर्क में शो किए, हॉलीवुड कलाकारों के लिए डिजाइनिंग की। वहां मुझे कोई परिवार की वजह से नहीं जानता था। वहां जो पहचान मिली, वह मेरी मेहनत की वजह से मिली। सवाल: इस फिल्म से जुड़ी सबसे खास याद क्या रहेगी? जवाब/खुशहाली कुमार: यह मेरे प्रोडक्शन हाउस के बाहर साइन की गई पहली फिल्म और पहली कॉमेडी भी है। पहला साइनिंग अमाउंट मिलने पर मैंने उसे भगवान गणेश के चरणों में रखा। यही पल मेरे लिए सबसे खास रहेगा। मेरी कोशिश रहती है कि कमाई का एक हिस्सा जरूरतमंद लोगों तक पहुंचे। कई लड़कियों की पढ़ाई का खर्च मैं उठाती हूं। पहले अपनी फैक्ट्री के पास बच्चों को रोज खाना भी खिलाती थी। मुझे लगता है कि ये संस्कार मुझे पापा से
हेयरफॉल: बालों की झड़ी से परेशान हैं तो मेथी में फैले ये 4 कपड़े, 2 सप्ताह में शानदार दिखते हैं

इस भाग में भारी जिंदगी, प्रदूषण, तनाव और गलत भाषा का सबसे पहला असर हमारे बालों पर पड़ता है। बालों का स्टाइल एक ऐसी समस्या बन गई है, जिससे हर दूसरा व्यक्ति परेशान है। बाजार में कई तरह के हेयर केयर उत्पाद मौजूद हैं, लेकिन उनमें मौजूद केमिकल कई बार बालों को नुकसान पहुंचाते हैं। अगर आप भी बालों से परेशान हैं और कोई प्रभावशाली प्राकृतिक उपाय ढूंढ रहे हैं, तो मेथी दाना आपके लिए वरदान साबित हो सकता है। मेथी में प्रोटीन, निकोटिनिक एसिड और फोलिक एसिड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो बालों के प्रोटीन को मजबूत बनाते हैं। नारियल तेल बाले को गहराई से पोषण आहार के लिए जाना जाता है। जब इसे मेथी के साथ शामिल किया जाता है, तो यह बालों के झड़ने की समस्या को जड़ से ख़त्म करने में मदद करता है। 2 लार्ज मेथी दाना और लें उसे नारियल तेल में कैनवास पेंटिंग गर्म कर लें। जब तेल गुनगुना हो जाए, तो इससे स्कैल्प की मालिश करें। इसे हर हफ्ते 2 बार खरीदें। डैंड्रफ और ड्राय स्कैल्प भी बाल स्कैल्प का एक बड़ा कारण होते हैं। दही में मौजूद लैक्टिक एसिड स्कैल्प को साफ और वर्गीकृत किया गया है। रातभर भीगे हुए मेथी दानों को पीसकर पेस्ट बना लें। अब इसमें 3-4 बड़े ताज़ा डेयरी रेवेअर शामिल हैं। इस पैक को बालों की जड़ों से सिरों तक और 30 मिनट बाद किसी भी फफूंदी से धो लें। एलोवेरा जेल बाल प्राकृतिक रूप से चमकदार और मजबूत बनते हैं। इसमें मौजूद एंजाइम एंजाइम को बढ़ावा दिया जाता है। मेथी के पेस्ट में 2 माइक्रो ताज़ा एलोवेरा जेल पकड़े। इस मिक्सचर को स्कैल्प पर अच्छी तरह से सजाया गया है। यह बालों के झड़ने को तुरंत नियंत्रित करने में मदद करता है और बालों को स्थापित करता है। प्याज के रस में प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा होती है, जो नए बाल ओबने और स्कैल्प के ब्लड सर्कोलन को बेहतर बनाने में सहायक होता है। मेथी के पाउडर या पेस्ट में 2 प्याज का रस मिला लें। इसे अपने नाम की मदद से स्कैल्प पर लगाएं। 20 से 25 मिनट बाद बालों को धो लें।
दांतों में सूजन और त्वचा पर खुजली हो सकती है किडनी रोग होने के लक्षण, भूलकर भी न करें

गुर्दा रोग: शरीर को स्वस्थ और डिटॉक्स रखने में हमारी किडनी की बेहद अहम भूमिका है। यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है। हालाँकि, जब किडनी के कार्य करने की क्षमता प्रभावित होती है, तो शरीर कई तरह के प्रारंभिक संकेत देना शुरू कर देता है। बार-बार लोग इन योग्यताओं को सामान्य समझकर अंतिम कर देते हैं, जो आगे चलकर किडनी फेलियर या गंभीर किडनी रोग का कारण बन सकते हैं। अगर आपके दांतों या पंजों में किसी बाहरी चोट के कारण सूजन आ रही है, तो यह किडनी की बीमारी का बड़ा संकेत हो सकता है। किडनी जब ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर से पसीना और अतिरिक्त पानी बाहर नहीं निकलता है। यह तरल पदार्थ स्टाइरीन और ऑर्थोडॉक्स ऑर्गेनाइजेशन में जमा होने लगता है, जिससे सूजन दिखाई देती है। त्वचा पर अधिक खुजली और रूखापन होना त्वचा में लगातार खुजली होना सिर्फ एलर्जी या त्वचा संक्रमण ही नहीं है, बल्कि किडनी की मांसपेशियों की ओर भी संकेत होता है। खून में टॉक्सिन्स का होना, पदार्थ का स्तर बढ़ना, त्वचा पर गंभीर खुजली, रूखापन और रैशेज शामिल हैं। बार-बार पेशाब आना या पेशाब में खून आना। खून में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी और विषाक्त पदार्थों के जमाव के कारण होते हैं। सुबह-सुबह नज़र के नीचे सूजन दिखाई देती है। यदि आपके शरीर में यह लक्षण 4-5 दिन से अधिक समय तक लगातार दिखाई देता है, तो बिना किसी देरी के डॉक्टर से संपर्क करें। आप तुरंत केएफटी (किडनी फंक्शन टेस्ट), यूरिन टेस्ट और ब्लड डॉक्युमेंट की जांच करें। पर्याप्त पानी पिएं, नमक का सेवन नियंत्रित करें, और डॉक्टर की सलाह के बिना पेनकिलर खाने से सलाह लें।
लौकी राजमा मसाला रेसिपी: बच्चे नहीं खाते लौकी? राजमा के साथ-साथ किराने की सब्जी; स्वाद के साथ स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम है

सामग्री: 1 लोकी, 1 कप मोटा राजमा, 2 प्याज, 2 हरी मिर्च, 1 अदरक लहसुन पेस्ट, ½ अदरक लहसुन पेस्ट, ½ अदरक लहसुन पेस्ट, हल्दी पाउडर, लाल और गरम मसाला, 1 धनिया पाउडर और कसूरी मेथी, तेल, नमक, हरा धनियां छवि: फ्रीपिक बनाने की विधि: सबसे पहले राजमा को रातभर के लिए छोड़ दिया गया और सुबह कुकर में नर्मा तक का नाम ले लिया गया। एक कड़ाही में तेल गरम करें। इसमें जीरा डाला गया। जब जीरा चटकने लगे, तब स्टोनमैन स्टोनला होने तक भुन लें। छवि: फ्रीपिक अब अदरक-लहसुन का पेस्ट और हरी मिर्च का पेस्ट 1 मिनट तक। इसके बाद टमाटर की प्यूरी और हल्दी, लाल मिर्च, धनिया पाउडर और नमक मिलाकर तब तक मिलाया जाता है, जब तक कि मसाले से तेल अलग न हो जाए। छवि: एआई अब कटी हुई लड़की लगाई और 4-5 मिनट तक की शूटिंग के साथ-साथ अच्छी तरह से काम किया। छोटा हुआ राजमा और ज़रूरत के अनुसार थोड़ा सा पानी मिला। ढलकर 10-12 मिनट तक मिनट पर काम करने वाला, ताकि लोकी अच्छी तरह से गल जाए। छवि: एआई गरम मसाला और कसूरी मेथी रचना 2 मिनट तक का समय। गैस बंद करें और ऊपर से हरा धनिया गार्निश करें। गरमा-गरम लौकी राजमा मसाला को तंदूरी रोटी, पराठा या चावल के साथ बनायें। छवि: एआई लौकी और राजमा का स्ट्रैटेजी कॉम्बिनेशन शरीर को आवश्यक पोषक तत्व देता है। राजमारोइन और डाकू का अच्छा स्रोत है। लोकी पाचन के लिए अद्भुत है और शरीर को स्टॉक में रखने में मदद मिलती है। छवि: मेटा एआई यह रेसिपी बच्चों के लिए भी लोकी का स्वादिष्ट तरीका है। लंच और डिनर दोनों के लिए यह एक बेहतरीन और लाजवाब विकल्प है। छवि: एआई अगर आप रोज की दुकान से कुछ अलग और स्वादिष्ट बनाना चाहते हैं, तो लोकी राजमा मसाला जरूर बनाएं। इसकी म्यूजिकल स्वाद और म्यूजिकल प्रॉपर्टी इसे पूरे परिवार की पसंदीदा डिश बना सकती है। छवि: एआई
सारा तेंदुलकर: ना मराठी पोशाकें, ना हैवी जूलरी, सुदूर सूट, सारा का ‘नेचुरल लुक’ हुआ वायरल वीडियो

23 जुलाई 2026 को 19:38 IST पर अपडेट किया गया सारा तेंदुलकर फैशन: सचिन की लाडली सारा टैलेंट भले ही फिल्मों में नहीं हैं, लेकिन उनकी फैन फॉलोइंग और पॉपुलैरिटी किसी भी बड़ी हीरोइन से कम नहीं है। ऐसे में सोशल मीडिया पर सारा का सिंपल लुक तेजी से वायरल हो रहा है। अनुसरण करना : सारा हमेशा अपने सिंपल और एलिगेंट फैशन सेंस के लिए जानी जाती हैं। उनका सदाबहार और खूबसूरत ‘नेचुरल लुक’ प्रेमियों का दिल जीत जाता है। छवि: सोशल मीडिया हाल ही में सारा का एक नया वीडियो वायरल हुआ है। वे इसमें बिना भारी-भरकम आकृतियों और बिना किसी भव्यता के बेहद खूबसूरत लग रही हैं। छवि: सोशल मीडिया सारा को हाल ही में एक शोरूम के बाहर प्रदर्शित किया गया था। रेड कार्पेट हो या कैज़ुअल आउटिंग, उनके स्टाइल हमेशा छाए रहते हैं। छवि: सोशल मीडिया सैलून के बाहरी हिस्से में सारा मैरून कलर के खूबसूरत फ्लोरल लेक को-ऑर्ड सेट में देखा गया। उनका यह कैम्फर्ट पोर्टेबल इंडो-वेस्टर्न अवतार कॉम्फ्रे का था। छवि: सोशल मीडिया इन दिनों शॉर्ट कुर्ती के साथ प्लाजो पैंट्स का काफी ट्रेंड है। यह देसी और ट्रेंडी मॉडल सारा पर बहुत जंच रही थी। छवि: सोशल मीडिया वीडियो देखें छवि: सोशल मीडिया सारा की इन तस्वीरों और वीडियो पर लोग खूब प्यार लुटा रहे हैं। उनकी इसी साज़िश और मस्जिद ने एक बार फिर इंटरनेट पर ख़र्च किया है। छवि: सोशल मीडिया द्वारा प्रकाशित: समृद्धि ब्रेजा प्रकाशित 23 जुलाई 2026 19:38 IST पर (टैग्सटूट्रांसलेट)सारा सावंत फैशन(टी)सारा सावंत(टी)सारा तेंदुलकर(टी)सारा तेंदुलकर वीडियो(टी)सारा तेंदुलकर फैशन(टी)सचिन सावंत(टी)सचिन तेंदुलकर






