'कॉलेज लाइफ एंजॉय' के नाम पर बॉयफ्रेंड बनाने का दबाव:DAVV गर्ल्स हॉस्टल में 5 छात्राओं की शिकायत; अनुचित गतिविधियों के आरोप में छात्रा निष्कासित

देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) के गर्ल्स हॉस्टल में एक छात्रा की गतिविधियों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। प्रथम वर्ष की एक छात्रा के खिलाफ अन्य छात्राओं को कथित रूप से अनुचित गतिविधियों के लिए उकसाने और दबाव बनाने की शिकायत मिलने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच कर उसे हॉस्टल से निष्कासित कर दिया है। हॉस्टल की पांच छात्राओं ने लिखित शिकायत में आरोप लगाया कि संबंधित छात्रा उन्हें बॉयफ्रेंड बनाने के लिए प्रेरित करती थी और इसे ‘कॉलेज लाइफ एंजॉय करने’ का हिस्सा बताती थी। शिकायत के मुताबिक, वह एक मोबाइल ऐप के जरिए बॉयफ्रेंड बनवाने की बात करती थी और अन्य छात्राओं से अज्ञात युवकों से बातचीत और घूमने-फिरने के लिए दबाव बनाती थी। वीडियो कॉल और दबाव की बात आई सामने जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि संबंधित छात्रा अज्ञात युवकों से वीडियो कॉल पर बातचीत करती थी और अन्य छात्राओं को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करती थी। कुछ छात्राओं ने खुद को असहज और भयभीत महसूस करने की बात कही है। पांच शिकायतकर्ता छात्राओं के अलावा दस से अधिक छात्राओं ने भी जांच के दौरान इन आरोपों की पुष्टि की है। प्रशासन का कहना है कि प्राथमिक जांच में आरोपों के समर्थन में पर्याप्त तथ्य मिले हैं। वार्डन को आठ दिन पहले मिली थी जानकारी करीब आठ दिन पहले हॉस्टल वार्डन को इस संबंध में शिकायत दी गई थी। शिकायत मिलने के बाद छात्रा के सामान की जांच की गई, जिसमें कुछ आपत्तिजनक सामग्री मिलने की बात सामने आई। उक्त सामग्री को जब्त कर लिया गया है। कुलपति को सौंपी गई रिपोर्ट पूरी जांच रिपोर्ट कुलपति प्रो. राकेश सिंघई और रजिस्ट्रार प्रज्ज्वल खरे को सौंप दी गई है। रिपोर्ट के आधार पर संबंधित छात्रा को तत्काल प्रभाव से हॉस्टल से निष्कासित कर दिया गया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी छात्राओं से अपील की है कि किसी भी प्रकार के दबाव, उत्पीड़न या अनुचित व्यवहार की स्थिति में तुरंत शिकायत करें। मामले में आगे की प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर उच्चस्तरीय बैठक की संभावना जताई जा रही है। यह खबर भी पढ़ें भोपाल की सगी बहनें धर्मांतरण के आरोप में अरेस्ट:गुजरात और मुंबई लड़कियां सप्लाई करतीं मध्य प्रदेश पुलिस ने भोपाल में काम देने के बहाने धर्मांतरण और सेक्स रैकेट चलाने के आरोप में दो सगी बहनों को गिरफ्तार किया है। पुलिस पूछताछ में सामने आया है कि वे लड़कियों का धर्मांतरण करवाकर अमीर युवकों को गुजरात और मुंबई तक सप्लाई करती थीं। दोनों ने इतना पैसा कमाया कि भोपाल की अब्बास नगर की एक झुग्गी से निकलकर आशिमा मॉल के पास सागर रॉयल विला में आलीशान विला खरीद लिया। अमरीन और आफरीन नाम की ये बहनें लग्जरी लाइफ स्टाइल जीती थीं। मामले का खुलासा तब हुआ, जब रविवार रात को भोपाल और छत्तीसगढ़ की रहने वाली दो युवतियां राजधानी के बाग सेवनिया थाने पहुंच गईं। दोनों ने थाने में अलग-अलग शिकायत दर्ज कराई। पुलिस ने तत्काल एक्शन लिया। सोमवार को अमरीन, आफरीन और चंदन यादव को गिरफ्तार कर लिया। तीन अन्य आरोपी बिलाल, चानू और यासिर की तलाश की जा रही है। शराब और ड्रग्स लेने के लिए दबाव डालती थीं
पैरों पर नजर आ रही सूजी उभरी नसें? वैरिकोज वेन्स से छुटकारा पाने का आसान तरीका

Last Updated:February 26, 2026, 23:56 IST Varicose Veins Natural Treatment: वैरिकोज वेन्स की परेशानी उम्र के साथ बढ़ सकती है. तकलीफ ज्यादा होने पर डॉक्टर से चेकअप जरूरी है. लेकिन शुरुआती स्टेज पर आप यहां बताए गए आयुर्वेदिक उपायों से ठीक कर सकते हैं. ख़बरें फटाफट Varicose Veins Natural Treatment In Hindi: पैरों की नसों का फूलना या सूजना एक आम लेकिन गंभीर समस्या हो सकती है. उम्रदराज लोगों में ये प्रॉब्लम ज्यादा कॉमन है. कई लोग इसे साधारण थकान या बढ़ती उम्र का असर समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन जब नसों में खून का बहाव सही ढंग से नहीं हो पाता, तो वे उभरकर दिखने लगती हैं और दर्द, जलन या भारीपन महसूस होता है. इस समस्या को डॉक्टर की भाषा में वैरिकोज वेन्स कहा जाता है. अच्छी बात यह है कि सही देखभाल और जीवनशैली अपनाकर इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. आयुर्वेद के अनुसार, यह दिक्कत शरीर में वात दोष बढ़ने और रक्त संचार कमजोर होने से जुड़ी होती है. वहीं, आधुनिक विज्ञान कहता है कि नसों के अंदर मौजूद छोटे वाल्व कमजोर हो जाते हैं, जिससे खून नीचे जमा होने लगता है और सूजन बढ़ जाती है. वैरिकोज वेन्स के लिए घरेलू उपाय कंप्रेशन स्टॉकिंग्स फायदेमंदइस परेशानी में कंप्रेशन स्टॉकिंग्स काफी फायदेमंद हो सकती हैं. ये खास तरह की जुराबें पैरों पर हल्का दबाव बनाती हैं, जिससे खून ऊपर की ओर बहने में मदद मिलती है. इससे सूजन और दर्द धीरे-धीरे कम होने लगता है. पैरों को कुछ देर ऊपर उठाकर रखेंपैरों को कुछ समय के लिए ऊपर उठाकर रखना भी आसान और असरदार उपाय है. लेटते समय पैरों के नीचे तकिया रख लें. इससे नसों पर दबाव कम होता है और खून का बहाव बेहतर होता है. खानपान का ध्यान रखेंखान-पान का ध्यान रखना भी जरूरी है. हल्का और पौष्टिक भोजन करें. हरी सब्जियां, फल, दालें और फाइबर से भरपूर चीजें शरीर को फायदा पहुंचाती हैं. विटामिन सी और पोटेशियम से भरपूर आहार सूजन कम करने में मदद करता है। साथ ही दिनभर पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है. रोजाना हल्का व्यायाम जरूर करेंटहलना, पैरों की स्ट्रेचिंग या आसान एक्सरसाइज से मांसपेशियां सक्रिय रहती हैं. जब पैर चलते हैं, तो खून ऊपर की ओर जाने में मदद मिलती है और नसों पर दबाव कम होता है. अगर समस्या ज्यादा बढ़ जाए या दर्द लगातार बना रहे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. About the Author शारदा सिंहSenior Sub Editor शारदा सिंह बतौर सीनियर सब एडिटर News18 Hindi से जुड़ी हैं. वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्यू पर आधारित रिपोर्ट्स बनाने में एक्सपर्ट हैं. शारदा पिछले 5 सालों से मीडिया …और पढ़ें First Published : February 26, 2026, 23:56 IST Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.
भाजपा नेता के भाई ने दलित बस्ती पर हमला किया:जान बचाने पहली मंजिल से कूदी महिला; पत्थरबाजी में एक घायल

नीमच जिले के काली कोटड़ी गांव में गुरुवार दोपहर भाजपा नेता उमराव सिंह गुर्जर के भाई गोपाल गुर्जर और उनके करीब 60 साथियों ने दलित बस्ती पर हमला कर दिया। इस दौरान हमलावरों ने घरों में तोड़फोड़ की और महिलाओं से मारपीट की। हमले में एक महिला गंभीर रूप से घायल हो गई, जबकि एक अन्य महिला ने अपनी जान बचाने के लिए घर की पहली मंजिल से छलांग लगा दी। गुरुवार दोपहर करीब 2:30 बजे लोडिंग टेंपो और पांच कारों में सवार होकर आए हमलावरों ने मनीष नायक, पुष्कर और अर्जुन नायक के घरों को निशाना बनाया। उन्होंने घरों में घुसकर जमकर तोड़फोड़ की। मनीष नायक की पत्नी पूजा मेघवाल पर पत्थर से हमला किया गया, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट आई। यहां से शुरू हुआ विवाद यह विवाद 24 फरवरी की रात को शुरू हुआ था, जब दीपेश गुर्जर ने अपनी बिना नंबर की थार गाड़ी से मनीष नायक की बाइक को टक्कर मार दी थी। इस हादसे में मनीष घायल हो गए थे। पीड़ितों का आरोप है कि मेडिकल जांच के बावजूद पुलिस ने प्रभावशाली लोगों के दबाव में आकर उन्हें ही झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दी थी। हमसे टकराने का अंजाम बुरा होगा पीड़ितों के अनुसार, गोपाल गुर्जर, सरदार सिंह, दीपेश और उनके साथियों ने जातिगत गालियां देते हुए धमकी दी कि “इस इलाके में हमारा आतंक है और हमसे टकराने का अंजाम बुरा होगा।” घटना के बाद डरे-सहमे पीड़ित परिवार शाम को नीमच पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचे और न्याय की गुहार लगाई। दहशत में परिवार ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि आरोपी मछली पालन के बड़े ठेकेदार हैं और उनके राजनीतिक रसूख के कारण पुलिस कार्रवाई करने से बच रही है। पीड़ितों ने चेतावनी दी है कि यदि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई और उन्हें सुरक्षा नहीं मिली, तो उनके परिवार की जान को खतरा बना रहेगा।
JNU में प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर पत्थर-जूते फेंके:UGC रेगुलेशन लागू करने की मांग कर रहा था छात्रसंघ; यूनिवर्सिटी ने कोर्ट ऑर्डर का उल्लंघन बताया

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी(JNU) में स्टूडेंट यूनियन के प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली पुलिस पर पत्थर फेंके, पुलिसवालों को काटा और जूते फेंके। पुलिस ने कहा कि इसमें कई पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन(JNUSU) UGC रेगुलेशन लागू करने की मांग को लेकर मार्च निकाल रहा था। ये मार्च शिक्षा मंत्रालय तक निकाला जाना था लेकिन पुलिस ने इसे बीच में ही रोक दिया। पुलिस का आरोप है कि मार्च रोकने के बाद कुछ प्रोटेस्टर्स ने उनपर हमला कर दिया। इसके बीच यूनिवर्सिटी का भी बयान आया। JNU ने कहा कि यह मांग माननीय सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का उल्लंघन है जिसने रेगुलेशन पर स्टे जारी किया था। JNU के वाइस चांसलर या रजिस्ट्रार के पास रेगुलेशन पर कोई अधिकार नहीं है। पुलिस पर हमले की 3 तस्वीरेंं… JNU ने कहा- हमारी सरकार को जवाबदेही JNU ने सोशल मीडिया X पर एक पोस्ट में कहा कि JNU एक पब्लिक यूनिवर्सिटी है इसलिए सरकार, पार्लियामेंट और भारतीय टैक्सपेयर्स के प्रति जवाबदेह है। यह बहुत बुरा है कि एक महिला OBC वाइस चांसलर पर झूठे आरोप लगाकर हमला किया जा रहा है, सिर्फ पब्लिक प्रॉपर्टी की हिंसा और तोड़-फोड़ के मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए। पहले इस पूरे मामले को समझें UGC के नए कानून का नाम है- ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशन्स, 2026।’ इसके तहत कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में SC, ST और OBC छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव रोकने के लिए कई निर्देश दिए गए थे। नए नियमों के तहत, कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में विशेष समितियां, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीमें बनाने का निर्देश दिया गया। ये टीमें SC, ST और OBC छात्रों की शिकायतों को देखेंगी। सरकार का कहना है कि ये बदलाव उच्च शिक्षा संस्थानों में निष्पक्षता और जवाबदेही लाने के लिए किए गए हैं। हालांकि, सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि UGC ने जाति आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और इससे कॉलेजों में अराजकता पैदा होगी। सवर्ण जाति के स्टूडेंट्स का आरोप है कि नए नियमों में सवर्ण छात्र ‘स्वाभाविक अपराधी’ बना दिए गए हैं। इनसे उनके खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा मिलेगा। 30 जनवरी: सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए नियमों पर रोक लगाई सुप्रीम कोर्ट ने 30 जनवरी को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी थी। CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या की बेंच ने कहा कि इसके प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनका गलत इस्तेमाल हो सकता है। कोर्ट ने यह टिप्पणी मृत्युंजय तिवारी, एडवोकेट विनीत जिंदल और राहुल दीवान की याचिकाओं पर की, जिनमें आरोप लगाया गया है कि नए नियम जनरल कैटेगरी के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं। UGC ने 13 जनवरी को अपने नए नियमों को नोटिफाई किया था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और UGC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही नियमों का ड्राफ्ट फिर से तैयार करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में अगली सुनवाई अब 19 मार्च को होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल 2012 के UGC नियम देशभर में लागू रहेंगे। ———— ये खबर भी पढ़ें… ‘करप्शन इन ज्यूडीशियरी’ वाली NCERT किताब पर SC का बैन:कहा- हार्ड कॉपी वापस लें, डिजिटल कॉपी हटाएं सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ चैप्टर वाली NCERT के 8वीं क्लास की सोशल साइंस की किताब बैन कर दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जो किताबें छप चुकी हैं, उसे जब्त कीजिए और डिजिटल कॉपियों को भी हटाइए। पूरी खबर पढ़ें…
‘पाखंड’: सिद्धारमैया ने उर्दू स्वास्थ्य विज्ञापन विवाद पर बीजेपी की आलोचना की, कहा कि यह ‘मानक सरकारी प्रक्रिया’ है | राजनीति समाचार

आखरी अपडेट:26 फरवरी, 2026, 20:56 IST विवाद ने व्यक्तिगत मोड़ ले लिया क्योंकि कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री के घर पर बोली जाने वाली उर्दू पर भाजपा की टिप्पणियों को व्यापक रूप से उनकी पत्नी तब्बू राव के संदर्भ के रूप में देखा गया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस विचार को खारिज कर दिया कि उन्हें भाषाई गौरव में सबक की जरूरत है। (छवि: न्यूज18) कर्नाटक में स्वास्थ्य विभाग के अखबारों में विज्ञापनों को लेकर ताजा भाषा विवाद छिड़ गया है लेकिन इस बार यह कन्नड़ के बारे में नहीं है। कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के बीच एक उर्दू अखबार में स्वास्थ्य संबंधी विज्ञापन को लेकर वाकयुद्ध छिड़ गया है। भाजपा द्वारा यह आरोप लगाए जाने के बाद कि राज्य सरकार “तुष्टिकरण की राजनीति” में लगी हुई है, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने गुरुवार को भगवा पार्टी पर कड़ा प्रहार किया और उनके “पाखंड” को उजागर करते हुए कहा कि यह “मानक सरकारी प्रक्रिया” है। विवाद ने व्यक्तिगत मोड़ ले लिया क्योंकि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुंडू राव के घर पर बोली जाने वाली भाषा पर भाजपा की टिप्पणियों को व्यापक रूप से उनकी पत्नी तब्बू राव के संदर्भ के रूप में देखा गया। उन्होंने हमले की निंदा करते हुए इसे “आत्म-धोखे की पराकाष्ठा” बताया और कहा कि उनका परिवार घर पर उर्दू भी नहीं बोलता। तब्बू राव ने कहा कि उनके पति के राजनीति में आने के बाद से उनकी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि के कारण उन्हें गलत तरीके से निशाना बनाया गया है। “क्या उर्दू में येदियुरप्पा और प्रधान मंत्री मोदी वाले विज्ञापन नहीं हैं? क्या वे तुष्टीकरण में लिप्त हैं?” उन्होंने भाजपा के अचानक “कन्नड़ प्रेम” को शर्मनाक दोहरा मापदंड करार देते हुए पूछा। विवाद क्या है? यह विवाद ‘कुसुमा संजीवनी’ कार्यक्रम के लॉन्च से शुरू हुआ था, जो एक सरकारी पहल है जो हीमोफीलिया रोगियों के लिए मुफ्त एम्बुलेंस सेवाओं के साथ रोगनिरोधी उपचार प्रदान करती है। इस आयोजन को बढ़ावा देने के लिए, राज्य स्वास्थ्य विभाग ने विभिन्न प्रकाशनों में विज्ञापन जारी किए। उर्दू दैनिक समाचार पत्रों में छपने वाले संस्करण पूरी तरह से उर्दू भाषा में छपे थे, जिसे भाजपा ने तुरंत “विवाद की जड़” के रूप में लिया। सिद्धारमैया ने क्या कहा? सिद्धारमैया ने मंगलुरु में पत्रकारों से बात करते हुए विपक्ष के विरोध के तर्क पर सवाल उठाया. “विज्ञापन देते समय क्या हमें उर्दू अखबारों को भी नहीं देना चाहिए?” उन्होंने पूछा, भाजपा ने अपने पिछले कार्यों की अनदेखी करते हुए मौजूदा सरकार की हर बात का विरोध करने की आदत बना ली है। पहले कन्नड़ कवलु समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के बाद, उन्होंने इस विचार को खारिज कर दिया कि उन्हें भाषाई गौरव में सबक की आवश्यकता है, उनके लिए “कन्नड़ सिर्फ एक भाषा नहीं है, यह जीवन है”। बीजेपी ने क्या कहा? सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक तीखे हमले में, कर्नाटक भाजपा ने “कन्नड़ विरोधी, राज्य विरोधी कांग्रेस सरकार” पर राजनीतिक लाभ के लिए स्थानीय भाषा के हितों का बलिदान देने का आरोप लगाया। इसने सवाल किया कि क्या राज्य की प्रशासनिक भाषा बदल गई है, सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से पूछा गया: “क्या कर्नाटक की प्रशासनिक भाषा कन्नड़ या उर्दू है?” भाजपा ने आरोप लगाया कि सरकार ने केवल विज्ञापन के बजाय उर्दू में एक आधिकारिक निमंत्रण जारी किया था और दिनेश गुंडू राव पर व्यक्तिगत कटाक्ष करते हुए कहा कि वह अपने कार्यालय का उपयोग अपने घर में बोली जाने वाली भाषा को बढ़ावा देने के लिए कर रहे थे। स्वास्थ्य मंत्री ने क्या कहा? इस बीच, राव ने तीखा खंडन करते हुए भाजपा पर “बौद्धिक दिवालियापन” और आधिकारिक सरकारी निमंत्रण और एक मानक समाचार पत्र विज्ञापन के बीच अंतर करने में विफल रहने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यह कदम एक “नियमित प्रशासनिक अभ्यास” था, यह समझाते हुए कि विशिष्ट समाचार पत्र की भाषा में विज्ञापन प्रकाशित करना मानक प्रक्रिया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जानकारी उसके इच्छित पाठकों तक पहुंचे। उन्होंने कहा कि सरकारी विज्ञापन का लक्ष्य सभी नागरिकों तक सार्वजनिक योजनाओं की जानकारी प्रभावी ढंग से पहुंचाना है। उन्होंने पिछले भाजपा प्रशासन द्वारा उर्दू में प्रकाशित पिछले विज्ञापनों की एक श्रृंखला साझा की और विशेष रूप से बीएस येदियुरप्पा और बसवराज बोम्मई जैसे भाजपा मुख्यमंत्रियों का नाम लेते हुए पूछा कि क्या उनके कार्यकाल के दौरान उर्दू विज्ञापनों के उपयोग का मतलब यह है कि वे “राष्ट्र-विरोधी” या “तुष्टिकरण” में लगे हुए थे। (रोहिणी स्वामी के इनपुट्स के साथ) पहले प्रकाशित: 26 फरवरी, 2026, 20:56 IST समाचार राजनीति ‘पाखंड’: सिद्धारमैया ने उर्दू स्वास्थ्य विज्ञापन विवाद पर बीजेपी की आलोचना की, कहा कि यह ‘मानक सरकारी प्रक्रिया’ है अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)कर्नाटक भाषा विवाद(टी)कर्नाटक स्वास्थ्य विभाग विज्ञापन(टी)उर्दू अखबार विवाद कर्नाटक(टी)सिद्धारमैया बीजेपी भाषा बहस(टी)कुसुमा संजीविनी कार्यक्रम(टी)दिनेश गुंडू राव उर्दू(टी)बीजेपी कांग्रेस भाषा राजनीति(टी)कन्नड़ भाषा मुद्दा
‘बोझ है, लेकिन संशोधन की जरूरत नहीं’: कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की 5 ‘गारंटियों’ पर डीके शिवकुमार | राजनीति समाचार

आखरी अपडेट:26 फरवरी, 2026, 20:11 IST कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने बाद में कहा कि भले ही पांच “गारंटियां” एक वित्तीय बोझ थीं, राज्य सरकार उन्हें जारी रखने की अपनी प्रतिबद्धता पर दृढ़ है। कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने कहा कि बढ़ती लागत के बावजूद, गारंटी को संशोधित करने या वापस लेने की कोई योजना नहीं है, सीएम सिद्धारमैया ने सालाना 52,000 करोड़ रुपये से अधिक का अनुमान लगाया है। (छवि:न्यूज़18/फ़ाइल) कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस राज्य सरकार की प्रमुख “गारंटी” योजनाओं के बारे में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की स्पष्ट टिप्पणी के बाद विवाद की एक नई लहर पैदा कर रही है, जिसे उन्होंने सरकारी खजाने पर “बोझ” कहा है। लेकिन, शिवकुमार बाद में अपना रुख बदलते दिखे और कहा कि भले ही पांच “गारंटियां” एक वित्तीय बोझ थीं, राज्य सरकार उन्हें जारी रखने की अपनी प्रतिबद्धता पर दृढ़ है। उन्होंने कहा कि बढ़ती लागत के बावजूद, गारंटी को संशोधित करने या वापस लेने की कोई योजना नहीं है, मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने हाल ही में सालाना 52,000 करोड़ रुपये से अधिक का अनुमान लगाया है। शिवकुमार ने संवाददाताओं से कहा, ”गारंटी सरकार सहित सभी के लिए बोझ है, लेकिन हम इसे नहीं रोकेंगे।” उन्होंने कहा कि इन योजनाओं की प्राथमिक चिंता व्यापक लीक का पता लगाना है, जहां मृत व्यक्तियों के नाम पर लाभ उठाया जा रहा है। उन्होंने संसाधनों के दुरुपयोग से जुड़े दो प्रमुख मुद्दों पर प्रकाश डाला, यह देखते हुए कि कुछ परिवार चावल के राशन और मूल रूप से बुजुर्ग सदस्यों को आवंटित वित्तीय सहायता का दावा करना जारी रखते हैं, जिनकी मृत्यु हो चुकी है। उन्होंने कहा कि इससे बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है, जिससे सरकार को इन कमियों को दूर करने के लिए एक कठोर जवाबदेही प्रक्रिया शुरू करने और यह सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित किया गया है कि धन केवल पात्र, जीवित लाभार्थियों तक ही पहुंचे। उन्होंने कहा, “मैं एक बात कह रहा हूं और आप इसकी अलग तरह से व्याख्या कर रहे हैं। हम योजनाओं को संशोधित नहीं करना चाहते हैं, लेकिन मृत लोगों के नाम पर लाभ उठाया जा रहा है। यहां तक कि उन लोगों के हिस्से से चावल लिया जा रहा है जो बूढ़े हो चुके हैं और उनका निधन हो चुका है। हम इन दो मुद्दों पर जवाबदेही तय करने पर विचार कर रहे हैं।” सरकार की प्रतिक्रिया में, गारंटी कार्यान्वयन समिति के अध्यक्ष एचएम रेवन्ना ने कहा कि इन विसंगतियों की पहचान करने के लिए एक व्यापक सर्वेक्षण किया गया है। चूँकि योजनाएँ प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) प्रणालियों पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं, लाभार्थियों की मृत्यु पर वास्तविक समय के डेटा की कमी के कारण भुगतान लगभग ढाई वर्षों तक बिना ध्यान दिए जारी रहा। रेवन्ना ने कहा कि सरकार अब इन निधियों को पुनः प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है। उन्होंने कहा, “हमने इस पर एक सर्वेक्षण किया है। चूंकि पैसा डीबीटी के माध्यम से भेजा जा रहा था, इसलिए यह पता लगाना मुश्किल था कि लाभार्थी जीवित था या मृत और इस प्रकार, पैसा बहता रहा। हमने उस पैसे को वापस लेने पर चर्चा की है और इस वसूली को सुविधाजनक बनाने के लिए मुख्य सचिव, अतिरिक्त सचिव और बैंक अधिकारियों के साथ परामर्श किया है।” सिद्धारमैया ने शिवकुमार की टिप्पणियों को व्यापक संदर्भ प्रदान करने के लिए कदम उठाया और बताया कि “बोझ” शब्द राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के बजाय 52,000 करोड़ रुपये के वार्षिक व्यय के विशाल पैमाने को संदर्भित करता है। उन्होंने जनता को आश्वस्त किया कि शुरुआत से ही इन गारंटियों के लिए धन वितरित करने के बावजूद, राज्य के विकास कार्यों को दरकिनार नहीं किया गया है। सिद्धारमैया ने कहा, “गारंटी की कीमत हमें 52,000 करोड़ रुपये से अधिक है। उन्होंने (डीके शिवकुमार) कहा होगा कि इस लिहाज से यह एक बोझ है। लेकिन हम विकास कार्य कर रहे हैं।” चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना पहले प्रकाशित: 26 फरवरी, 2026, 20:11 IST समाचार राजनीति ‘बोझ है, लेकिन संशोधन की जरूरत नहीं’: कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की 5 ‘गारंटियों’ पर डीके शिवकुमार अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)कर्नाटक गारंटी योजनाएं(टी)कांग्रेस सरकार कर्नाटक(टी)डीके शिवकुमार टिप्पणी(टी)वित्तीय बोझ कर्नाटक योजनाएं(टी)कल्याणकारी लाभों का दुरुपयोग(टी)प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण कर्नाटक(टी)लाभार्थी जवाबदेही कर्नाटक(टी)सिद्धारमैया गारंटी योजनाएं
भाजपा नेता के गृह प्रवेश में देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी:मोहल्ले में तनाव, कैलाशपुरी में दो पक्ष आमने-सामने

रीवा शहर के कैलाशपुरी इलाके में गुरुवार शाम एक भाजपा नेता के घर गृह प्रवेश कार्यक्रम आयोजित किया गया। आरोप है कि लाउड स्पीकर से देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। घटना के बाद मोहल्ले में आक्रोश फैल गया और कुछ देर के लिए दो पक्ष आमने-सामने आ गए। बैकुंठपुर से भाजपा नेता सीताराम साकेत के घर गृह प्रवेश कार्यक्रम रखा गया था। कार्यक्रम के दौरान सुबह करीब 10 बजे से लाउड स्पीकर पर भगवान शंकर, मां दुर्गा, भगवान कृष्ण सहित अन्य देवी-देवताओं के लिए अपशब्द कहे जा रहे थे। मोहल्ले की निवासी रागिनी सिंह बघेल ने बताया कि शुरुआत में लगा कि कार्यक्रम का शोर-शराबा है और बात थम जाएगी, लेकिन आपत्तिजनक टिप्पणियां लगातार जारी रहीं। जब वे और अन्य लोग समझाने पहुंचे तो विवाद की स्थिति बन गई और मारपीट जैसी नौबत आ गई। इसके बाद तत्काल डायल 100 को सूचना दी गई। मौके पर पहुंची पुलिस ने दोनों पक्षों से बातचीत कर फीडबैक लिया। स्थानीय लोगों ने मामले की लिखित शिकायत थाने में देने की बात कही है। इस बीच भाजपा नेता के भतीजे, जो करहिया मंडी में शासकीय सेवक बताए जा रहे हैं, पर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। उधर, पूरे घटनाक्रम पर भाजपा नेता सीताराम साकेत का कहना है कि उनके घर कार्यक्रम में कई लोग आए थे। “किसी ने कुछ कह दिया होगा। यदि ऐसा हुआ है तो मैं इसे स्वीकार करता हूं और इसके लिए खेद प्रकट करता हूं। पुलिस का कहना है कि शिकायत मिलने पर तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल इलाके में स्थिति सामान्य बताई जा रही है, लेकिन तनाव का माहौल बना हुआ है।
भक्ति के अंधेरे चेहरे पर सिहरनभरी कहानी:‘चरक: फेयर ऑफ फेथ’ का ट्रेलर रिलीज; 6 मार्च 2026 को सिनेमाघरों में दस्तक

फिल्म ‘चरक: फेयर ऑफ फेथ’ का दमदार ट्रेलर रिलीज कर दिया गया है। अंधविश्वास, तांत्रिक अनुष्ठानों और लोक आस्था की जटिल परतों को उधेड़ती यह लोककथा-आधारित थ्रिलर 6 मार्च 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। फिल्म को सुदीप्तो सेन का समर्थन प्राप्त है, जिन्होंने इससे पहले The Kerala Story का निर्देशन किया था। चरक मेले की पृष्ठभूमि में सस्पेंस निर्देशक शीलादित्य मौलिक के निर्देशन में बनी यह फिल्म ग्रामीण भारत में प्रचलित कठोर धार्मिक अनुष्ठानों और उनसे जुड़े सामाजिक यथार्थ को सामने लाती है। ट्रेलर में ‘चरक मेला’ की झलक दिखाई गई है। एक ऐसा पारंपरिक उत्सव, जो गहरी आस्था के साथ-साथ खतरनाक रस्मों के लिए भी जाना जाता है। ट्रेलर की शुरुआत मेले की तैयारियों से होती है, जहां पूरा गांव इसे अपनी वर्षों पुरानी मनोकामनाओं की पूर्ति का जरिया मानता है। लेकिन जैसे-जैसे अनुष्ठान उग्र होते जाते हैं, कहानी आस्था और कट्टरता, भक्ति और विनाश के बीच की महीन रेखा पर सवाल खड़े करती नजर आती है। सीबीएफसी से मिली मंजूरी निर्माता सुदीप्तो सेन ने बताया कि फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद Central Board of Film Certification (सीबीएफसी) समिति ने विषयवस्तु को लेकर कुछ आपत्तियां जताई थीं। इसके बाद फिल्म को उच्च समीक्षा पैनल के पास भेजा गया। सुझाए गए बदलावों के साथ फिल्म को मंजूरी मिल गई है। सेन ने कहा कि वे इस निर्णय से संतुष्ट हैं और फिल्म को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाने को लेकर उत्साहित हैं। कंटेंट पर भरोसा: पेन स्टूडियोज फिल्म को पेन स्टूडियोज प्रस्तुत कर रहा है, जिसका नेतृत्व डॉ. डॉ. जयंतीलाल गडा कर रहे हैं। गडा का कहना है कि आज के दौर में मजबूत कंटेंट ही सबसे बड़ा आकर्षण है। ‘चरक’ जैसी विचारोत्तेजक कहानी दर्शकों को रोमांच के साथ सोचने पर भी मजबूर करेगी। सशक्त स्टारकास्ट फिल्म में अंजली पाटिल, साहिदुर रहमान, सुभ्रत दत्ता, शशि भूषण, नलनीश नील, शंखदीप और शौनक श्यामल जैसे कलाकार अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे। ‘चरक: फेयर ऑफ फेथ’ का निर्माण धवल जयंतीलाल गडा और सिपिंग टी सिनेमा ने सुदीप्तो सेन प्रोडक्शंस के सहयोग से किया है, जबकि राजेश भट्ट एसोसिएट प्रोड्यूसर हैं।अंधविश्वास और आस्था के टकराव को बड़े पर्दे पर पेश करती यह फिल्म अपने विषय और ट्रीटमेंट को लेकर पहले ही चर्चा में आ चुकी है। अब देखना होगा कि रिलीज के बाद दर्शकों की क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।
1 अप्रैल से 20% एथेनॉल मिक्स पेट्रोल अनिवार्य:तेल कंपनियों को E20 पेट्रोल बेचना होगा, पुरानी गाड़ियों के माइलेज पर असर संभव

केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल से देशभर में E20 पेट्रोल की बिक्री अनिवार्य कर दी है। पेट्रोलियम मंत्रालय ने इस संबंध में नोटिफिकेशन जारी किया है। इसके अनुसार, अब सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में तेल कंपनियों को 20% एथेनॉल मिला हुआ पेट्रोल ही सप्लाई करना होगा। हालांकि, देश के कई हिस्सों में E20 (20% इथेनॉल मिक्स) पेट्रोल की शुरुआत 2023 से ही हो चुकी है, लेकिन ये ऑप्शनल था। सरकार ने हाल ही में एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य 2030 से घटाकर 2025-26 कर दिया था, जिसे अब पूर्ण रूप से लागू किया जा रहा है। 95 रिसर्च ऑक्टेन नंबर का ही E20 पेट्रोल बेच सकेंगे इस फ्यूल के लिए रिसर्च ऑक्टेन नंबर (RON) कम से कम 95 तय किया गया है, ताकि इंजनों को सुरक्षित रखा जा सके। RON यानी फ्यूल की ‘नॉकिंग’ (इंजन के अंदर समय से पहले आग लगना) को रोकने की क्षमता को दिखाता है। RON यह बताता है कि पेट्रोल कितना ‘मजबूत’ या ‘सहनशील’ है। जिस पेट्रोल का RON नंबर जितना ज्यादा होगा, वह उतनी ही आसानी से इंजन के दबाव को झेलेगा और बिना किसी आवाज या झटके के सही समय पर जलेगा। इससे इंजन की लाइफ बढ़ती है और वह सुचारू रूप से चलता है। अभी तक भारत में बिकने वाला साधारण पेट्रोल का 91 RON होता है और सिर्फ ‘प्रीमियम’ पेट्रोल (जैसे XP95) ही 95 RON का मिलता है। पुरानी गाड़ियों का माइलेज 3-7% तक गिर सकता है इंडस्ट्री विशेषज्ञों का कहना है कि 2023 से 2025 के बीच बने ज्यादातर वाहन E-20 ईंधन के हिसाब से ही डिजाइन किए गए हैं, इसलिए उनमें कोई दिक्कत नहीं आएगी। हालांकि, बहुत पुराने वाहनों में कुछ समस्याएं दिख सकती हैं… माइलेज: पुराने वाहनों की फ्यूल एफिशिएंसी में 3% से 7% तक की गिरावट आ सकती है। पुर्जों पर असर: लंबे समय तक इस्तेमाल से पुराने इंजनों के रबर और प्लास्टिक के हिस्सों में खराबी आने की आशंका है। इन इलाकों में मिल सकती है थोड़ी छूट पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि असाधारण परिस्थितियों में कुछ खास इलाकों के लिए सीमित समय के लिए इस नियम से छूट दी जा सकती है। हालांकि, मुख्य रूप से यह नियम पूरे देश के फ्यूल स्टेशनों पर लागू होगा। एथेनॉल से ₹1.40 लाख करोड़ से ज्यादा विदेशी मुद्रा बचाई सरकार के इस फैसले के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना है। तेल मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, 2014-15 से अब तक पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की वजह से भारत ने ₹1.40 लाख करोड़ से ज्यादा की विदेशी मुद्रा बचाई है। इसके अलावा, एथेनॉल का उत्पादन गन्ना, मक्का और अनाज से होता है, जिससे किसानों की आय में भी बढ़ेगी। क्या होता है एथेनॉल? एथेनॉल एक तरह का अल्कोहल है, जो स्टार्च और शुगर के फर्मेंटेशन से बनाया जाता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर गाड़ियों में इको-फ्रैंडली फ्यूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है। एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने के रस से होता है, लेकिन स्टार्च कॉन्टेनिंग मटेरियल्स जैसे मक्का, सड़े आलू, कसावा और सड़ी सब्जियों से भी एथेनॉल तैयार किया जा सकता है। 1G एथेनॉल : फर्स्ट जनरेशन एथेनॉल गन्ने के रस, मीठे चुकंदर, सड़े आलू, मीठा ज्वार और मक्का से बनाया जाता है। 2G एथेनॉल : सेकंड जनरेशन एथेनॉल सेल्युलोज और लिग्नोसेल्यूलोसिक मटेरियल जैसे – चावल की भूसी, गेहूं की भूसी, कॉर्नकॉब (भुट्टा), बांस और वुडी बायोमास से बनाया जाता है। 3G बायोफ्यूल : थर्ड जनरेशन बायोफ्यूल को एलगी से बनाया जाएगा। अभी इस पर काम चल रहा है। अप्रैल-2023 से देश में बिक रहा E-20 पेट्रोल-डीजल गाड़ियों से होने वाले एयर पॉल्यूशन को रोकने और फ्यूल के दाम कम करने के लिए दुनियाभर की सरकारें एथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल पर काम कर रही हैं। भारत में भी एथेनॉल को पेट्रोल-डीजल के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। इससे गाड़ियों का माइलेज भी बढ़ेगा। देश में 5% एथेनॉल से प्रयोग शुरू हुआ था जो अब 20% तक पहुंच चुका है। सरकार अप्रैल के महीने में नेशनल बायो फ्यूल पॉलिसी लागू कर E-20 (20% एथेनॉल + 80% पेट्रोल) से E-80 (80% एथेनॉल + 20% पेट्रोल) पर जाने के लिए प्रोसेस शुरू कर चुकी है। इसके अलावा देश में अप्रैल से सिर्फ फ्लेक्स फ्यूल कंप्लाइंट गाड़ियां ही बेची जा रही हैं। साथ ही पुरानी गाड़ियां एथेनॉल कंप्लाएंट व्हीकल में चेंज की जा सकेंगी। एथेनॉल मिलाने से क्या फायदा है? पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से पेट्रोल के उपयोग से होने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी। इसके इस्तेमाल से गाड़ियां 35% कम कार्बन मोनोऑक्साइड का उत्सर्जन करती है। सल्फर डाइऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन का उत्सर्जन भी एथेनॉल कम करता है। एथेनॉल में मौजूद 35% ऑक्सीजन के चलते ये फ्यूल नाइट्रोजन ऑक्साइड के उत्सर्जन को भी कम करता है। ——————- ये खबर भी पढ़ें… पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से रोकने की याचिका खारिज: सुप्रीम कोर्ट में सरकार बोली- याचिकाकर्ता इंग्लैंड का, बाहरी नहीं बताएगा कौन सा पेट्रोल इस्तेमाल करें सुप्रीम कोर्ट ने 1 सितंबर 2025 को पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के प्लान को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। इस प्लान के तहत देश में बिकने वाले पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाया जा रहा है। 2023 में एथेनॉल मिलाने की शुरुआत की गई थी। सरकार ने 2025-26 तक देश के सभी पेट्रोल पंप्स पर E20 पेट्रोल उपलब्ध कराने का टारगेट रखा है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने ये फैसला सुनाया। ये याचिका वकील अक्षय मल्होत्रा ने दायर की थी। पूरी खबर पढ़ें…
ग्रेड-बेस्ड ड्राइविंग लाइसेंस सिस्टम लाएगी सरकार:ट्रैफिक नियम तोड़ने पर लाइसेंस रद्द या सस्पेंड होगा, हादसे रोकने के लिए पहल

देश में सड़क हादसों को कम करने और जिम्मेदार ड्राइविंग को बढ़ावा देने के लिए सरकार ग्रेड (अंक) आधारित ड्राइविंग लाइसेंस प्रणाली शुरू करने की योजना बना रही है। इसमें ट्रैफिक नियम तोड़ने पर लाइसेंस रद्द या निलंबित करने का प्रावधान होगा। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि हर साल देश में लगभग 1.8 लाख लोगों की मौत सड़क हादसों में होती है। इसके मुख्य कारण हैं – गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल, तेज रफ्तार, गलत दिशा में गाड़ी चलाना और नशे में ड्राइविंग। उन्होंने कहा कि लोगों की जान बहुत कीमती है और सरकार सड़क सुरक्षा के लिए कई कदम उठा रही है। ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन पर जुर्माना बढ़ाया गया है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या नियमों का सही पालन कराना है। लोगों में कानून का डर और सम्मान कम है। हर साल भारत में 5 लाख सड़क हादसे ———————- ये खबर भी पढ़ें: भास्कर इन्वेस्टिगेशन लाइसेंस के लिए फर्जी आधार, 3 कार्ड पर पता अलग-अलग:इंदौर-उज्जैन में बने फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस; भास्कर के पास फर्जीवाड़े के सबूत न लर्निंग लाइसेंस बनवाने की जरूरत, न ड्राइविंग टेस्ट देने का झंझट। बस एक ऑनलाइन फोटो, कुछ फर्जी दस्तावेज…और आपके हाथ में होगा एक असली ड्राइविंग लाइसेंस, जो भारत के किसी भी कोने में मान्य होगा। मप्र के आरटीओ यानी क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय इसी तरह बिना जांच पड़ताल के फर्जी लाइसेंस जारी कर रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर…






