कॉफी अब सबसे महंगी आदतों में से एक:2020 में 4.3 डॉलर में मिलने वाला कॉफी पैकेट 9.6 डॉलर पहुंचा, पर मांग ठंडी नहीं पड़ी

लंदन के कू ब्रिज पर विंटेज इतालवी कॉफी कार्ट के बाहर लंबी कतार है। दौड़ लगाने वाले, पर्यटक और डॉग वॉकर, सभी हाथ में कॉफी लिए दिन शुरू करना चाहते हैं। लेकिन कार्ट चलाने वाले एंथनी डकवर्थ की नजर ग्राहकों से ज्यादा कीमतों पर टिकी है। उनके यहां आइस्ड लाते 4.5 पाउंड (580 रुपए) में मिलती है। उनकी चिंता है कि कीमत 5 पाउंड (644 रुपए) न पहुंच जाए। यह चिंता पूरे वैश्विक अर्थव्यवस्था की है। आज एक कप कॉफी में जलवायु संकट, ट्रेड वॉर और बदलती उपभोक्ता संस्कृति सब दिखाई देने लगे हैं। दुनिया की कॉफी मुख्य रूप से दो बीन्स पर टिकी है- अरेबिका और रोबस्टा। अरेबिका ब्राजील, इथियोपिया और केन्या की ठंडी पहाड़ियों में उगती है, जबकि कैफीन से भरपूर रोबस्टा पर वियतनाम का दबदबा है। लेकिन पिछले दो वर्षों में मौसम ने दोनों फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। नतीजतन अरेबिका बीन्स की कीमत औसत 1.2 डॉलर प्रति पाउंड से 4 डॉलर (384 रुपए) से ऊपर निकल गई। कॉफी उद्योग के दिग्गज गुइसेप्पे लावाज्जा मानते हैं कि राहत जल्द मिलने वाली नहीं है। इस बीच, अमेरिकी टैरिफ ने संकट और गहरा दिया। ट्रम्प प्रशासन ने वियतनाम पर 46%, इंडोनेशिया पर 32% और ब्राजील पर 50% तक टैरिफ लगा दिया। अमेरिका में पिसी कॉफी की कीमत 17% और इंस्टेंट कॉफी 25% तक महंगी हो गई। आखिरकार बढ़ती नाराजगी के बाद कॉफी को टैरिफ से राहत देनी पड़ी। लेकिन मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। लाल सागर में हूती हमलों के कारण वियतनाम से यूरोप जाने वाले जहाज अब अफ्रीका का लंबा चक्कर लगा रहे हैं। यात्रा 4,000 मील बढ़ गई। ऊपर से यूरोप के नए नियमों के तहत कॉफी किसानों को यह साबित करना होगा कि काफी जंगल काटकर नहीं उगाई गई। कीमत बढ़ने पर भी खरीदारी, इसीलिए दाम नीचे नहीं आते दिलचस्प है महंगी होने के बावजूद कॉफी की मांग कम नहीं हुई। तस्वीर साफ है- सप्लाई चेन संकट में है, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति कीमतें बढ़ा रहे हैं, लेकिन दुनिया का कॉफी प्रेम अडिग है। अब कॉफी सिर्फ ड्रिंक नहीं, बल्कि ‘एक्सपीरियंस’ बन चुकी है। चीनी कंपनी कॉफी डेटा और टेक्नोलॉजी के दम पर स्टारबक्स को चुनौती दे रही है, जबकि ब्रिटेन की ग्रेग्स ऑटोमेशन के जरिए सस्ती कॉफी बेचकर सबसे बड़ा कॉफी विक्रेता बन चुकी है।
कॉफी अब सबसे महंगी आदतों में से एक:2020 में 4.3 डॉलर में मिलने वाला कॉफी पैकेट 9.6 डॉलर पहुंचा, पर मांग ठंडी नहीं पड़ी

लंदन के कू ब्रिज पर विंटेज इतालवी कॉफी कार्ट के बाहर लंबी कतार है। दौड़ लगाने वाले, पर्यटक और डॉग वॉकर, सभी हाथ में कॉफी लिए दिन शुरू करना चाहते हैं। लेकिन कार्ट चलाने वाले एंथनी डकवर्थ की नजर ग्राहकों से ज्यादा कीमतों पर टिकी है। उनके यहां आइस्ड लाते 4.5 पाउंड (580 रुपए) में मिलती है। उनकी चिंता है कि कीमत 5 पाउंड (644 रुपए) न पहुंच जाए। यह चिंता पूरे वैश्विक अर्थव्यवस्था की है। आज एक कप कॉफी में जलवायु संकट, ट्रेड वॉर और बदलती उपभोक्ता संस्कृति सब दिखाई देने लगे हैं। दुनिया की कॉफी मुख्य रूप से दो बीन्स पर टिकी है- अरेबिका और रोबस्टा। अरेबिका ब्राजील, इथियोपिया और केन्या की ठंडी पहाड़ियों में उगती है, जबकि कैफीन से भरपूर रोबस्टा पर वियतनाम का दबदबा है। लेकिन पिछले दो वर्षों में मौसम ने दोनों फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। नतीजतन अरेबिका बीन्स की कीमत औसत 1.2 डॉलर प्रति पाउंड से 4 डॉलर (384 रुपए) से ऊपर निकल गई। कॉफी उद्योग के दिग्गज गुइसेप्पे लावाज्जा मानते हैं कि राहत जल्द मिलने वाली नहीं है। इस बीच, अमेरिकी टैरिफ ने संकट और गहरा दिया। ट्रम्प प्रशासन ने वियतनाम पर 46%, इंडोनेशिया पर 32% और ब्राजील पर 50% तक टैरिफ लगा दिया। अमेरिका में पिसी कॉफी की कीमत 17% और इंस्टेंट कॉफी 25% तक महंगी हो गई। आखिरकार बढ़ती नाराजगी के बाद कॉफी को टैरिफ से राहत देनी पड़ी। लेकिन मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। लाल सागर में हूती हमलों के कारण वियतनाम से यूरोप जाने वाले जहाज अब अफ्रीका का लंबा चक्कर लगा रहे हैं। यात्रा 4,000 मील बढ़ गई। ऊपर से यूरोप के नए नियमों के तहत कॉफी किसानों को यह साबित करना होगा कि काफी जंगल काटकर नहीं उगाई गई। कीमत बढ़ने पर भी खरीदारी, इसीलिए दाम नीचे नहीं आते दिलचस्प है महंगी होने के बावजूद कॉफी की मांग कम नहीं हुई। तस्वीर साफ है- सप्लाई चेन संकट में है, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति कीमतें बढ़ा रहे हैं, लेकिन दुनिया का कॉफी प्रेम अडिग है। अब कॉफी सिर्फ ड्रिंक नहीं, बल्कि ‘एक्सपीरियंस’ बन चुकी है। चीनी कंपनी कॉफी डेटा और टेक्नोलॉजी के दम पर स्टारबक्स को चुनौती दे रही है, जबकि ब्रिटेन की ग्रेग्स ऑटोमेशन के जरिए सस्ती कॉफी बेचकर सबसे बड़ा कॉफी विक्रेता बन चुकी है।
नेतन्याहू का गाजा के 70% हिस्से पर कब्जे का आदेश:इजराइली PM बोले- धीरे-धीरे कंट्रोल में लेंगे; पहले 50% नियंत्रण था, अब 60% हुआ

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने गाजा पट्टी के 70% हिस्से पर सैन्य नियंत्रण लेने का आदेश दिया है। वेस्ट बैंक में गुरुवार को एक कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा, “हम इस समय हमास को दबा रहे हैं। अब हम गाजा पट्टी के 60% इलाके को कंट्रोल करते हैं। पहले हम 50% पर थे, फिर 60% पर पहुंचे। मैंने आदेश दिया है कि इसे बढ़ाकर…” तभी भीड़ में से किसी ने चिल्लाकर कहा, “100%।” इस पर नेतन्याहू ने कहा, “एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं। पहले 70% तक पहुंचते हैं। फिलहाल वहीं से शुरुआत करते हैं। हम हर तरफ से उन पर दबाव बना रहे हैं और बाकी बचे लोगों से भी निपटेंगे।” इजराइल का एक्शन सीजफायर शर्तों के खिलाफ यह कदम अक्टूबर 2025 में हुए युद्धविराम समझौते की शर्तों के विपरीत माना जा रहा है। समझौते के तहत इजराइली सेना को एक तय ‘येलो लाइन’ के पीछे हटना था। इस लाइन के बाद गाजा का करीब 53% हिस्सा इजराइल के नियंत्रण में था। हमास का आरोप है कि इजराइल चुपचाप इस सीमा को और अंदर खिसका रहा है। अब कई रिपोर्टों के मुताबिक गाजा के करीब 60 से 64% इलाके पर इजराइल का नियंत्रण है। इजराइल-हमास के बीच शांति योजना के अगले चरण में हमास के हथियार छोड़ने और इजराइली सेना की वापसी का प्रस्ताव है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच बातचीत फिलहाल ठप पड़ी हुई है। 22 लाख लोगों को एक-तिहाई हिस्से में रहना पड़ सकता पहले से ही युद्ध, बमबारी और लगातार विस्थापन की वजह से गाजा के ज्यादातर इलाके तबाह हो चुके हैं। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इजराइल 70% इलाके पर कब्जा कर लेता है, तो गाजा के करीब 22 लाख लोगों को कुल जमीन के एक-तिहाई से भी कम हिस्से में रहना पड़ेगा। यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के विजिटिंग फेलो मुहम्मद शेहादा ने कहा कि हालात पहले ही बेहद खराब हैं। उनके मुताबिक, “हर खाली जगह पर विस्थापित परिवारों के टेंट लगे हैं। अगर इलाका और छोटा हुआ, तो बड़ी संख्या में लोगों के पास रहने की जगह ही नहीं बचेगी।” सीजफायर के 900 फिलिस्तीनियों की मौत इजराइल-हमास के बीच अक्टूबर 2025 में सीजफायर का ऐलान हुआ था। 7 महीने बीतने के बाद भी इजराइली सेना गाजा में हमले कर रही है। गाजा के स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि सीजफायर लागू होने के बाद से अब तक करीब 900 फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। इजराइली सेना ने ‘येलो लाइन’ के आसपास बड़े इलाके को नो-मैन्स-लैंड घोषित कर दिया है। यहां किसी भी गतिविधि को खतरा मानकर कार्रवाई की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की हालिया ब्रीफिंग में भी बताया गया कि उत्तरी गाजा के जबालिया इलाके में टैंकों की आवाजाही लगातार बढ़ रही है और ड्रोन किसी भी हलचल को निशाना बना रहे हैं।
नेतन्याहू का गाजा के 70% हिस्से पर कब्जे का आदेश:इजराइली PM बोले- धीरे-धीरे कंट्रोल में लेंगे; पहले 50% नियंत्रण था, अब 60% हुआ

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने गाजा पट्टी के 70% हिस्से पर सैन्य नियंत्रण लेने का आदेश दिया है। वेस्ट बैंक में गुरुवार को एक कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा, “हम इस समय हमास को दबा रहे हैं। अब हम गाजा पट्टी के 60% इलाके को कंट्रोल करते हैं। पहले हम 50% पर थे, फिर 60% पर पहुंचे। मैंने आदेश दिया है कि इसे बढ़ाकर…” तभी भीड़ में से किसी ने चिल्लाकर कहा, “100%।” इस पर नेतन्याहू ने कहा, “एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं। पहले 70% तक पहुंचते हैं। फिलहाल वहीं से शुरुआत करते हैं। हम हर तरफ से उन पर दबाव बना रहे हैं और बाकी बचे लोगों से भी निपटेंगे।” इजराइल का एक्शन सीजफायर शर्तों के खिलाफ यह कदम अक्टूबर 2025 में हुए युद्धविराम समझौते की शर्तों के विपरीत माना जा रहा है। समझौते के तहत इजराइली सेना को एक तय ‘येलो लाइन’ के पीछे हटना था। इस लाइन के बाद गाजा का करीब 53% हिस्सा इजराइल के नियंत्रण में था। हमास का आरोप है कि इजराइल चुपचाप इस सीमा को और अंदर खिसका रहा है। अब कई रिपोर्टों के मुताबिक गाजा के करीब 60 से 64% इलाके पर इजराइल का नियंत्रण है। इजराइल-हमास के बीच शांति योजना के अगले चरण में हमास के हथियार छोड़ने और इजराइली सेना की वापसी का प्रस्ताव है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच बातचीत फिलहाल ठप पड़ी हुई है। 22 लाख लोगों को एक-तिहाई हिस्से में रहना पड़ सकता पहले से ही युद्ध, बमबारी और लगातार विस्थापन की वजह से गाजा के ज्यादातर इलाके तबाह हो चुके हैं। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इजराइल 70% इलाके पर कब्जा कर लेता है, तो गाजा के करीब 22 लाख लोगों को कुल जमीन के एक-तिहाई से भी कम हिस्से में रहना पड़ेगा। यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के विजिटिंग फेलो मुहम्मद शेहादा ने कहा कि हालात पहले ही बेहद खराब हैं। उनके मुताबिक, “हर खाली जगह पर विस्थापित परिवारों के टेंट लगे हैं। अगर इलाका और छोटा हुआ, तो बड़ी संख्या में लोगों के पास रहने की जगह ही नहीं बचेगी।” सीजफायर के बावजूद 900 फिलिस्तीनियों की मौत इजराइल-हमास के बीच अक्टूबर 2025 में सीजफायर का ऐलान हुआ था। 7 महीने बीतने के बाद भी इजराइली सेना गाजा में हमले कर रही है। गाजा के स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि सीजफायर लागू होने के बाद से अब तक करीब 900 फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। इजराइली सेना ने ‘येलो लाइन’ के आसपास बड़े इलाके को नो-मैन्स-लैंड घोषित कर दिया है। यहां किसी भी गतिविधि को खतरा मानकर कार्रवाई की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की हालिया ब्रीफिंग में भी बताया गया कि उत्तरी गाजा के जबालिया इलाके में टैंकों की आवाजाही लगातार बढ़ रही है और ड्रोन किसी भी हलचल को निशाना बना रहे हैं।
ढकी हुई नेमप्लेट, गायब सरकारी प्रतीक: क्या सतीश जारकीहोली कर्नाटक कांग्रेस में बड़ी भूमिका के लिए तैयार हैं? | भारत समाचार

आखरी अपडेट:29 मई, 2026, 11:32 IST जैसे ही डीके शिवकुमार कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में सिद्धारमैया की जगह लेने की तैयारी कर रहे हैं, सतीश जारकीहोली केपीसीसी अध्यक्ष पद के लिए प्रमुख दावेदार के रूप में उभरे हैं। सतीश जारकीहोली ने कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन के दौरान कैबिनेट में जगह, केपीसीसी में भूमिका मांगी कर्नाटक नेतृत्व परिवर्तन: जैसा कि कर्नाटक राजनीतिक परिवर्तन की तैयारी कर रहा है और डीके शिवकुमार सिद्धारमैया से मुख्यमंत्री पद लेने वाले हैं, ध्यान सतीश जारकीहोली पर केंद्रित हो गया जब उनके आवास के बाहर नेमप्लेट कागज से ढकी हुई पाई गई, जबकि कर्नाटक सरकार का प्रतीक भी अब उनकी आधिकारिक कार पर दिखाई नहीं दे रहा था। यह घटनाक्रम सिद्धारमैया के कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से हटने के एक दिन बाद आया है। उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है और कांग्रेस सरकार में संभावित नेतृत्व परिवर्तन से पहले राज्य मंत्रिमंडल को भंग कर दिया गया है। #देखें | कर्नाटक: सतीश जारकीहोली के आवास के बाहर नेम प्लेट को कागज से ढक दिया गया; उनकी कार पर अब कर्नाटक सरकार का प्रतीक चिह्न नहीं दिख रहा है। सिद्धारमैया ने कल राज्य के सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। राज्य मंत्रिमंडल… pic.twitter.com/Y8dfx24OAH – एएनआई (@ANI) 29 मई, 2026 जारकीहोली निवर्तमान सिद्धारमैया कैबिनेट में लोक निर्माण मंत्री के रूप में कार्यरत थे। पार्टी सूत्रों ने बताया सीएनएन-न्यूज18 जारकीहोली ने पार्टी आलाकमान को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) के अध्यक्ष पद के साथ-साथ कैबिनेट में जगह पाने की अपनी इच्छा से अवगत कराया है। हालांकि, बेलगावी स्थित कांग्रेस नेता के करीबी सूत्रों ने कहा कि अभी तक कोई चर्चा नहीं हुई है। चूंकि उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के सिद्धारमैया का उत्तराधिकारी बनने की उम्मीद है, इसलिए ध्यान केपीसीसी प्रमुख पद की दौड़ पर केंद्रित हो गया है, जिसमें जारकीहोली एक मजबूत दावेदार के रूप में उभर रहे हैं। कौन हैं सतीश जारकीहोली? उत्तरी कर्नाटक के एक शक्तिशाली जमीनी नेता और कांग्रेस के भीतर एक अनुभवी संगठनात्मक हाथ, जारकीहोली ने राष्ट्रीय सुर्खियों से दूर चुपचाप प्रभाव बनाने में वर्षों बिताए हैं। आक्रामक सार्वजनिक स्थिति पर भरोसा करने वाले कई नेताओं के विपरीत, उनका उदय काफी हद तक धैर्यवान नेटवर्किंग, निर्वाचन क्षेत्र पर नियंत्रण और कई राजनीतिक चरणों के माध्यम से प्रासंगिक बने रहने की क्षमता से हुआ है। यदि उन्हें केपीसीसी प्रमुख नियुक्त किया जाता है, तो यह उनके राजनीतिक करियर की अब तक की सबसे बड़ी संगठनात्मक उन्नति होगी और उन्हें भविष्य की चुनावी लड़ाई से पहले कर्नाटक में कांग्रेस की रणनीति के केंद्र में स्थापित करेगी। उन्होंने 2008 से यमकनमर्दी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है और पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने उत्पाद शुल्क, वन और पर्यावरण और लोक निर्माण सहित कई प्रमुख विभागों को संभाला है। पार्टी नेताओं का मानना है कि कर्नाटक कांग्रेस के भीतर विभिन्न गुटों के बीच संबंध बनाए रखने की उनकी क्षमता उनके पक्ष में काम कर सकती है क्योंकि पार्टी एक नए राजनीतिक चरण की तैयारी कर रही है। यदि उन्हें केपीसीसी अध्यक्ष नियुक्त किया जाता है, तो यह जारकीहोली के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी संगठनात्मक भूमिका होगी और उन्हें भविष्य के चुनावों से पहले कर्नाटक में कांग्रेस की रणनीति के केंद्र में स्थापित करेगी। (एजेंसियों से इनपुट के साथ) चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया ढकी हुई नेमप्लेट, गायब सरकारी प्रतीक: क्या सतीश जारकीहोली कर्नाटक कांग्रेस में बड़ी भूमिका के लिए तैयार हैं? अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)कर्नाटक नेतृत्व परिवर्तन(टी)डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री(टी)सिद्धारमैया का इस्तीफा(टी)सतीश जारकीहोली केपीसीसी प्रमुख(टी)कर्नाटक कांग्रेस की राजनीति(टी)केपीसीसी अध्यक्ष पद की दौड़(टी)कर्नाटक कैबिनेट विघटन(टी)कांग्रेस सरकार कर्नाटक
कर्नाटक में केरल मॉडल? कांग्रेस नए मंत्रिमंडल के लिए युवा और अनुभवी चेहरों के मिश्रण पर विचार कर रही है | भारत समाचार

आखरी अपडेट:29 मई, 2026, 10:42 IST कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद सहित 34 कैबिनेट पद हैं। दो इस्तीफों और एक मंत्री की मृत्यु के बाद वर्तमान में तीन सीटें खाली हैं। सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार सीएम बन सकते हैं। कर्नाटक नेतृत्व परिवर्तन: केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ प्रयोग के साथ समानताएं बनाते हुए, कांग्रेस आलाकमान कथित तौर पर सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कर्नाटक के लिए एक युवा और नए मंत्रिमंडल पर विचार कर रहा है। सूत्रों के हवाले से टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित कैबिनेट फेरबदल में युवा और अनुभवी नेताओं का मिश्रण होगा, जो वीडी सतीशन के नेतृत्व वाले केरल कैबिनेट में निहित एक मॉडल है। वर्तमान कर्नाटक कैबिनेट में कई वरिष्ठ मंत्रियों को नई सरकार में शायद सिद्धारमैया के डिप्टी डीके शिवकुमार के बाद जगह नहीं मिल पाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें कथित तौर पर समाज कल्याण मंत्री एचसी महादेवप्पा, ऊर्जा मंत्री केजे जॉर्ज और गृह मंत्री जी परमेश्वर शामिल हैं। माना जाता है कि सिद्धारमैया के करीबी माने जाने वाले मंत्रियों में बिरथी सुरेश, संतोष लाड, दिनेश गुंडू राव और बीजेड ज़मीर अहमद खान भी जांच के दायरे में हैं। पार्टी सूत्रों का हवाला देते हुए रिपोर्ट के अनुसार, उनका यह कदम कांग्रेस सरकारों में युवा नेताओं के अधिक प्रतिनिधित्व के लिए राहुल गांधी के प्रयास के अनुरूप है। हालाँकि, वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने कहा है कि नए कर्नाटक मंत्रिमंडल पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, उन्होंने कहा कि मंत्रियों के चयन में अनुभव एक महत्वपूर्ण कारक रहेगा। रिपोर्ट के अनुसार, आलाकमान वरिष्ठ और युवा नेताओं के संतुलित मिश्रण को चुन सकता है। वर्तमान सिद्धारमैया सरकार के लगभग 15 मौजूदा मंत्रियों और पांच युवा चेहरों को बरकरार रखा जा सकता है, जबकि शेष पद नए मुख्यमंत्री द्वारा चुने गए नए लोगों को दिए जा सकते हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद सहित 34 कैबिनेट पद हैं, केएन राजन्ना और बी नागेंद्र के इस्तीफे और डी सुधाकर की मृत्यु के बाद वर्तमान में तीन रिक्तियां हैं। सूत्रों ने यह भी कहा कि राहुल गांधी ने पहले सिद्धारमैया को अपने मंत्रिमंडल में 50 वर्ष से कम उम्र के अधिक विधायकों को शामिल करने की सलाह दी थी और इस बार भी इसी तरह का दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है। हालाँकि, पूर्व मंत्री आरवी देशपांडे ने अनुभवी नेताओं को पूरी तरह से हटाने के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि कोई सरकार केवल नए चेहरों के साथ काम नहीं कर सकती और स्थिरता और निरंतरता के लिए अनुभवी मंत्रियों की जरूरत होती है। देशपांडे ने यह भी कहा कि वह कैबिनेट पद की मांग नहीं कर रहे हैं, लेकिन अगर पेशकश की गई तो इस पर विचार करेंगे। 79 वर्षीय डेसफांडे ने टीओआई से कहा, ”हमने अब तक नई कैबिनेट के बारे में कुछ नहीं सुना है, लेकिन अगर सरकार चलानी है तो केवल नए चेहरे ही नहीं हो सकते हैं।” उन्होंने आगे कहा, ”हालांकि नए चेहरों का स्वागत है, लेकिन निरंतरता की जरूरत है और सरकार को काम करने के लिए अनुभवी हाथों की जरूरत है।” यूडीएफ कैबिनेट ने एक कैबिनेट की शुरुआत की जिसमें प्रमुख युवा कांग्रेस नेता और अनुभवी राजनेता शामिल थे। उल्लेखनीय शख्सियतों में कुंदरा का प्रतिनिधित्व करने वाले पीसी विष्णुनाथ थे, जो लंबे समय से कांग्रेस में सक्रिय हैं और केपीसीसी के कार्यकारी अध्यक्ष सहित विभिन्न भूमिकाओं में कार्यरत हैं। यूडीएफ का एक और नया चेहरा रोजी एम जॉन ने अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और नेतृत्व अनुभव के साथ वादा निभाया। विविधता को शामिल करते हुए कैबिनेट में बिंदू कृष्णा और केए तुलसी जैसे नेता भी शामिल हैं, जो हाशिए पर रहने वाले समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया कर्नाटक में केरल मॉडल? कांग्रेस नए मंत्रिमंडल के लिए युवा और अनुभवी चेहरों के मिश्रण पर विचार कर रही है अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)कर्नाटक कैबिनेट में फेरबदल(टी)कर्नाटक नेतृत्व परिवर्तन(टी)कांग्रेस आलाकमान(टी)सिद्धारमैया बाहर निकलना(टी)डीके शिवकुमार(टी)युवा नेता कांग्रेस(टी)वरिष्ठ मंत्री कर्नाटक(टी)राहुल गांधी धक्का
नॉर्वे चेस- वर्ल्ड चैंपियन गुकेश लगातार तीसरा मैच हारे:चौथे राउंड में कार्लसन ने हराया, स्टैंडिंग में सबसे निचले स्थान पर आए

भारतीय ग्रैंडमास्टर डी गुकेश का नॉर्वे चेस टूर्नामेंट में खराब दौर जारी है। उन्हें दुनिया के नंबर-1 खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन ने हराया। गुरुवार को मिली इस हार के बाद गुकेश स्टैंडिंग में सबसे नीचे पहुंच गए हैं। 7 बार के नॉर्वे चेस चैंपियन कार्लसन ने काले मोहरों से खेलते हुए गुकेश को मात दी। शुरुआती तीन राउंड में संघर्ष करने वाले कार्लसन अब 4.5 अंकों के साथ चौथे स्थान पर पहुंच गए हैं, जबकि गुकेश 3.5 अंकों के साथ आखिरी स्थान पर खिसक गए हैं। मैच के बाद कार्लसन ने कहा कि उन्हें गुकेश की ओपनिंग रणनीति देखकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीय खिलाड़ी ने जरूरत से ज्यादा आक्रामक खेला, जिसका फायदा उन्हें मिला। प्रज्ञानानंदा ने 17 चाल में टाईब्रेक जीता आर प्रज्ञानानंदा ने विन्सेंट कीमर को आर्मगेडन टाईब्रेक में हराकर दूसरा स्थान बरकरार रखा है। उन्होंने विन्सेंट कीमर के खिलाफ क्लासिकल मैच ड्रॉ होने के बाद आर्मगेडन टाईब्रेक में 17 चालों में जीत दर्ज की। इस जीत से वे 6 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर बने हुए हैं। फ्रांस के अलीरेजा फिरोजा 8.5 अंकों के साथ शीर्ष पर कायम हैं। दिव्या को मुजिचुक ने हराया, हम्पी आखिरी स्थान पर महिला वर्ग में भारत की दिव्या देशमुख को पहली बार आर्मगेडन में हार मिली। डिफेंडिंग चैंपियन अन्ना मुजिचुक ने उन्हें हराया। दिव्या 5.5 अंकों के साथ संयुक्त तीसरे स्थान पर हैं। वहीं कोनेरू हम्पी आखिरी स्थान पर बनी हुई हैं। ————————————————–
नेपाली पीएम के 100 में से 88 वादे अधूरे:शपथ के 30 दिन में 2 मंत्रियों ने सरकार छोड़ी, जेन-जी बोले- क्या काबिल लोग नहीं

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी सिर्फ दो महीने हुए हैं, लेकिन उनकी सरकार पर सवाल उठने लगे हैं। बालेन ने 27 मार्च को शपथ लेने के बाद 100 पॉइंट सुधार एजेंडा लॉन्च किया था। हालांकि, प्रधानमंत्री कार्यालय की ट्रैकर वेबसाइट पर 88 वादे ओवरड्यू यानी तय समय से पीछे बताए जा रहे हैं। इसके अलावा, सरकार बनने के 30 दिन के भीतर ही बालेन के दो बड़े मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा। श्रम मंत्री दीपक शाह पर पत्नी को गलत तरीके से नौकरी दिलाने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें हटाया गया। वहीं गृह मंत्री सूदन गुरुंग को एक जांच के दायरे में आए कारोबारी से रिश्तों के आरोपों के बाद इस्तीफा देना पड़ा। इससे जेन-जी युवाओं में नाराजगी बढ़ रही है। युवा सवाल उठा रहे हैं कि अगर यही लोग चुने गए, तो नई राजनीति में फर्क क्या है? क्या सरकार में काबिल लोग नहीं बचे? बालेन की पार्टी के भीतर भी सवाल उठ रहे बालेन सरकार के कई फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन हुए है। साथ ही अदालत में भी चुनौती दी गई है। विपक्ष के साथ-साथ अब उनकी पार्टी के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। संसद में विपक्ष के सवालों पर जवाब न देने पर वालेन की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेताओं आशिका तमांग और अमरेश कुमार सिंह ने भी सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाए। अमरेश सिंह ने कहा कि नेपाल का लोकतंत्र ‘पाकिस्तान मॉडल’ जैसा बनता जा रहा है, जहां सरकार संसद के प्रति जवाबदेह नहीं रहती। बालेन ने पीएम बनने के बाद कई वादे किए थे प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन ने मंत्रालयों की संख्या घटाने, घाटे वाले बोर्ड और समितियों को मर्ज करने और सरकारी कर्मचारियों व शिक्षकों को राजनीति से दूर रखने जैसे बड़े वादे किए थे। इसके अलावा गौरी बहादुर कार्की आयोग की सिफारिशें लागू करने, बंद पड़ी परियोजनाओं को फिर शुरू करने, निवेश और उद्योग सेवाओं को डिजिटल बनाने और ऊर्जा निर्यात की लंबी रणनीति तैयार करने की बात भी कही गई थी। गिरफ्तारी और आयोग रिपोर्ट पर विवाद बालेन सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के अंतरिम कार्यकाल में बनी कार्की आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फैसला किया। रिपोर्ट में भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग की जांच कर सुधार के सुझाव दिए गए थे। यह जेन Z आंदोलन से भी जुड़ी थी। सरकार पर आरोप लगा कि इसे स्पष्ट कानूनी आधार के बिना लागू किया गया। इसी बीच पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक की गिरफ्तारी को लेकर भी विवाद हुआ। आरोप लगा कि उचित कागजी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी। कानूनी और राजनीतिक स्तर पर इसका विरोध हुआ। नेपाली कांग्रेस नेता दीपक खड़का को भी लंबे समय तक हिरासत में रखने के बाद सबूतों की कमी के कारण रिहा करना पड़ा। अध्यादेशों से सरकार चलाने के आरोप बालेन सरकार के पास निचले सदन में दो-तिहाई बहुमत है, लेकिन ऊपरी सदन नेशनल असेंबली में उसका एक भी सदस्य नहीं है। नेपाल में कानून पास कराने और संशोधन के लिए ऊपरी सदन की अहम भूमिका होती है। ऐसे में बालेन सरकार आठ अध्यादेश लाई। इनमें सिविल सर्विस ट्रेड यूनियन और यूनिवर्सिटी छात्र संगठनों को खत्म करने के प्रस्ताव शामिल थे। नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी और छात्र संगठनों के विरोध के बीच इन अध्यादेशों पर रोक लगा दी। सोशल मीडिया पोस्ट में बालेन ने सफाई देते हुए कहा कि स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में पार्टी झंडे बंद करने से छात्रों और कर्मचारियों के अधिकार खत्म नहीं होंगे, बल्कि पेशेवर स्वतंत्रता मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा और नौकरशाही में छात्र और कर्मचारी संगठन राजनीतिक दलों की ‘स्लीपर सेल’ बन चुके हैं। उनके मुताबिक ट्रांसफर और प्रमोशन पार्टी के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता और काम के आधार पर होने चाहिए। बुलडोजर कार्रवाई पर सड़क से अदालत तक विरोध बालेन सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना अतिक्रमण हटाओ अभियान को लेकर हो रही है। नेपाल के अलग-अलग हिस्सों में बेघर और भूमिहीन लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। अधिकारियों के मुताबिक सिर्फ काठमांडू घाटी में करीब 4 हजार ढांचे तोड़े गए हैं। इससे कम से कम 15 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। बालेन जब काठमांडू के मेयर थे, तब भी उन्होंने बुलडोजर कार्रवाई को अपनी राजनीति का बड़ा हिस्सा बनाया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसी मॉडल को देशभर में लागू किया। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों समेत कई मानवाधिकार संगठनों ने भी इन कार्रवाइयों की आलोचना की है। उनका कहना है कि सरकार ने गरीब लोगों को बिना उचित पहचान, बातचीत और पुनर्वास योजना के हटाया। 2 महीने में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की चुनाव प्रचार के दौरान बालेन ने पारदर्शिता और जवाबदेही का वादा किया था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी चुप्पी सवालों के घेरे में है। शपथ लेने के बाद से उन्होंने न तो देश को संबोधित किया और न ही कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वह राष्ट्रपति के नीति और कार्यक्रम वाले भाषण के दौरान बीच में ही निकल गए थे। बाद में बिना सूचना संसद से भी अनुपस्थित रहे। विपक्ष ने संसद में लगातार हंगामा किया और प्रधानमंत्री से सदन में आकर जवाब देने की मांग की। भारत से सामान लाने पर सख्ती से सीमा इलाकों में नाराजगी नेपाल सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी के नियम सख्ती से लागू किए हैं। इसके बाद भारत-नेपाल सीमा पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। नियम के मुताबिक भारत से 100 नेपाली रुपए (लगभग 63 भारतीय रुपए) से ज्यादा का सामान लाने पर अनिवार्य कस्टम ड्यूटी देनी होगी। सामान की श्रेणी के हिसाब से टैक्स 5% से 80% तक है। दशकों से नेपाल के लोग भारतीय सीमा वाले शहरों से राशन, दवाइयां, कपड़े, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स और शादी का सामान खरीदते रहे हैं। नेपाली नववर्ष के बाद नियमों को सख्ती से लागू किया जाने लगा। इससे सीमा पर रहने वाले लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। लोगों के बीच नाराजगी बढ़ रही है। एक प्रदर्शनकारी ने ANI से कहा, “जन्म से लेकर मौत तक के सभी संस्कारों का सामान भारत से आता है। खाद तक कई बार वहीं से लानी पड़ती है। अब ऐसा लग रहा है जैसे बिना घोषणा
नॉर्वे चेस- वर्ल्ड चैंपियन गुकेश लगातार तीसरा मैच हारे:चौथे राउंड में कार्लसन ने हराया, स्टैंडिंग में सबसे निचले स्थान पर आए

भारतीय ग्रैंडमास्टर डी गुकेश का नॉर्वे चेस टूर्नामेंट में खराब दौर जारी है। उन्हें दुनिया के नंबर-1 खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन ने हराया। गुरुवार को मिली इस हार के बाद गुकेश स्टैंडिंग में सबसे नीचे पहुंच गए हैं। 7 बार के नॉर्वे चेस चैंपियन कार्लसन ने काले मोहरों से खेलते हुए गुकेश को मात दी। शुरुआती तीन राउंड में संघर्ष करने वाले कार्लसन अब 4.5 अंकों के साथ चौथे स्थान पर पहुंच गए हैं, जबकि गुकेश 3.5 अंकों के साथ आखिरी स्थान पर खिसक गए हैं। मैच के बाद कार्लसन ने कहा कि उन्हें गुकेश की ओपनिंग रणनीति देखकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीय खिलाड़ी ने जरूरत से ज्यादा आक्रामक खेला, जिसका फायदा उन्हें मिला। प्रज्ञानानंदा ने 17 चाल में टाईब्रेक जीता आर प्रज्ञानानंदा ने विन्सेंट कीमर को आर्मगेडन टाईब्रेक में हराकर दूसरा स्थान बरकरार रखा है। उन्होंने विन्सेंट कीमर के खिलाफ क्लासिकल मैच ड्रॉ होने के बाद आर्मगेडन टाईब्रेक में 17 चालों में जीत दर्ज की। इस जीत से वे 6 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर बने हुए हैं। फ्रांस के अलीरेजा फिरोजा 8.5 अंकों के साथ शीर्ष पर कायम हैं। दिव्या को मुजिचुक ने हराया, हम्पी आखिरी स्थान पर महिला वर्ग में भारत की दिव्या देशमुख को पहली बार आर्मगेडन में हार मिली। डिफेंडिंग चैंपियन अन्ना मुजिचुक ने उन्हें हराया। दिव्या 5.5 अंकों के साथ संयुक्त तीसरे स्थान पर हैं। वहीं कोनेरू हम्पी आखिरी स्थान पर बनी हुई हैं। ————————————————–
नेपाली पीएम के 100 में से 88 वादे अधूरे:शपथ के 30 दिन में 2 मंत्रियों ने सरकार छोड़ी, जेन-जी बोले- क्या काबिल लोग नहीं

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी सिर्फ दो महीने हुए हैं, लेकिन उनकी सरकार पर सवाल उठने लगे हैं। बालेन ने 27 मार्च को शपथ लेने के बाद 100 पॉइंट सुधार एजेंडा लॉन्च किया था। हालांकि, प्रधानमंत्री कार्यालय की ट्रैकर वेबसाइट पर 88 वादे ओवरड्यू यानी तय समय से पीछे बताए जा रहे हैं। इसके अलावा, सरकार बनने के 30 दिन के भीतर ही बालेन के दो बड़े मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा। श्रम मंत्री दीपक शाह पर पत्नी को गलत तरीके से नौकरी दिलाने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें हटाया गया। वहीं गृह मंत्री सूदन गुरुंग को एक जांच के दायरे में आए कारोबारी से रिश्तों के आरोपों के बाद इस्तीफा देना पड़ा। इससे जेन-जी युवाओं में नाराजगी बढ़ रही है। युवा सवाल उठा रहे हैं कि अगर यही लोग चुने गए, तो नई राजनीति में फर्क क्या है? क्या सरकार में काबिल लोग नहीं बचे? बालेन की पार्टी के भीतर भी सवाल उठ रहे बालेन सरकार के कई फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन हुए है। साथ ही अदालत में भी चुनौती दी गई है। विपक्ष के साथ-साथ अब उनकी पार्टी के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। संसद में विपक्ष के सवालों पर जवाब न देने पर वालेन की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेताओं आशिका तमांग और अमरेश कुमार सिंह ने भी सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाए। अमरेश सिंह ने कहा कि नेपाल का लोकतंत्र ‘पाकिस्तान मॉडल’ जैसा बनता जा रहा है, जहां सरकार संसद के प्रति जवाबदेह नहीं रहती। बालेन ने पीएम बनने के बाद कई वादे किए थे प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन ने मंत्रालयों की संख्या घटाने, घाटे वाले बोर्ड और समितियों को मर्ज करने और सरकारी कर्मचारियों व शिक्षकों को राजनीति से दूर रखने जैसे बड़े वादे किए थे। इसके अलावा गौरी बहादुर कार्की आयोग की सिफारिशें लागू करने, बंद पड़ी परियोजनाओं को फिर शुरू करने, निवेश और उद्योग सेवाओं को डिजिटल बनाने और ऊर्जा निर्यात की लंबी रणनीति तैयार करने की बात भी कही गई थी। गिरफ्तारी और आयोग रिपोर्ट पर विवाद बालेन सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के अंतरिम कार्यकाल में बनी कार्की आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फैसला किया। रिपोर्ट में भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग की जांच कर सुधार के सुझाव दिए गए थे। यह जेन Z आंदोलन से भी जुड़ी थी। सरकार पर आरोप लगा कि इसे स्पष्ट कानूनी आधार के बिना लागू किया गया। इसी बीच पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक की गिरफ्तारी को लेकर भी विवाद हुआ। आरोप लगा कि उचित कागजी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी। कानूनी और राजनीतिक स्तर पर इसका विरोध हुआ। नेपाली कांग्रेस नेता दीपक खड़का को भी लंबे समय तक हिरासत में रखने के बाद सबूतों की कमी के कारण रिहा करना पड़ा। अध्यादेशों से सरकार चलाने के आरोप बालेन सरकार के पास निचले सदन में दो-तिहाई बहुमत है, लेकिन ऊपरी सदन नेशनल असेंबली में उसका एक भी सदस्य नहीं है। नेपाल में कानून पास कराने और संशोधन के लिए ऊपरी सदन की अहम भूमिका होती है। ऐसे में बालेन सरकार आठ अध्यादेश लाई। इनमें सिविल सर्विस ट्रेड यूनियन और यूनिवर्सिटी छात्र संगठनों को खत्म करने के प्रस्ताव शामिल थे। नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी और छात्र संगठनों के विरोध के बीच इन अध्यादेशों पर रोक लगा दी। सोशल मीडिया पोस्ट में बालेन ने सफाई देते हुए कहा कि स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में पार्टी झंडे बंद करने से छात्रों और कर्मचारियों के अधिकार खत्म नहीं होंगे, बल्कि पेशेवर स्वतंत्रता मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा और नौकरशाही में छात्र और कर्मचारी संगठन राजनीतिक दलों की ‘स्लीपर सेल’ बन चुके हैं। उनके मुताबिक ट्रांसफर और प्रमोशन पार्टी के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता और काम के आधार पर होने चाहिए। बुलडोजर कार्रवाई पर सड़क से अदालत तक विरोध बालेन सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना अतिक्रमण हटाओ अभियान को लेकर हो रही है। नेपाल के अलग-अलग हिस्सों में बेघर और भूमिहीन लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। अधिकारियों के मुताबिक सिर्फ काठमांडू घाटी में करीब 4 हजार ढांचे तोड़े गए हैं। इससे कम से कम 15 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। बालेन जब काठमांडू के मेयर थे, तब भी उन्होंने बुलडोजर कार्रवाई को अपनी राजनीति का बड़ा हिस्सा बनाया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसी मॉडल को देशभर में लागू किया। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों समेत कई मानवाधिकार संगठनों ने भी इन कार्रवाइयों की आलोचना की है। उनका कहना है कि सरकार ने गरीब लोगों को बिना उचित पहचान, बातचीत और पुनर्वास योजना के हटाया। 2 महीने में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की चुनाव प्रचार के दौरान बालेन ने पारदर्शिता और जवाबदेही का वादा किया था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी चुप्पी सवालों के घेरे में है। शपथ लेने के बाद से उन्होंने न तो देश को संबोधित किया और न ही कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वह राष्ट्रपति के नीति और कार्यक्रम वाले भाषण के दौरान बीच में ही निकल गए थे। बाद में बिना सूचना संसद से भी अनुपस्थित रहे। विपक्ष ने संसद में लगातार हंगामा किया और प्रधानमंत्री से सदन में आकर जवाब देने की मांग की। भारत से सामान लाने पर सख्ती से सीमा इलाकों में नाराजगी नेपाल सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी के नियम सख्ती से लागू किए हैं। इसके बाद भारत-नेपाल सीमा पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। नियम के मुताबिक भारत से 100 नेपाली रुपए (लगभग 63 भारतीय रुपए) से ज्यादा का सामान लाने पर अनिवार्य कस्टम ड्यूटी देनी होगी। सामान की श्रेणी के हिसाब से टैक्स 5% से 80% तक है। दशकों से नेपाल के लोग भारतीय सीमा वाले शहरों से राशन, दवाइयां, कपड़े, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स और शादी का सामान खरीदते रहे हैं। नेपाली नववर्ष के बाद नियमों को सख्ती से लागू किया जाने लगा। इससे सीमा पर रहने वाले लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। लोगों के बीच नाराजगी बढ़ रही है। ——————- ये खबर भी पढ़ें… नेपाल बोला- भारतीय यात्री लिपुलेख से मानसरोवर न जाएं:ये हमारा इलाका; भारत बोला- नेपाल के दावे का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं नेपाल सरकार ने भारतीय तीर्थयात्रियों से लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर









