Wednesday, 10 Jun 2026 | 09:33 AM

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एयरटेल और वोडाफोन आइडिया को बॉम्बे हाई कोर्ट से राहत:सरकार का वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज वसूलने का फैसला रद्द; बैंक गारंटी भी वापस होगी

एयरटेल और वोडाफोन आइडिया को बॉम्बे हाई कोर्ट से राहत:सरकार का वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज वसूलने का फैसला रद्द; बैंक गारंटी भी वापस होगी

बॉम्बे हाई कोर्ट ने भारती एयरटेल लिमिटेड और वोडाफोन आइडिया लिमिटेड पर केंद्र सरकार के लगाए गए वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज (OTSC) को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सरकार के पास टेलीकॉम लाइसेंस दिए जाने के सालों बाद वित्तीय शर्तों को पिछली तारीख (रेट्रोस्पेक्टिव) से बदलने का कोई अधिकार नहीं है। जस्टिस मनीष पितले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट की डिवीजन बेंच ने सरकार के 2012 के इस फैसले को खारिज करते हुए कंपनियों की बैंक गारंटी भी लौटाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सरकार के 14 साल पुराने फैसले को पलटा जस्टिस मनीष पितले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट की बेंच ने केंद्र सरकार के 8 नवंबर और 28 दिसंबर 2012 के उन फैसलों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिनके तहत टेलीकॉम कंपनियों पर जुर्माना लगाया गया था। सरकार ने इन फैसलों के जरिए जुलाई 2008 से 6.2 मेगाहर्ट्ज (MHz) से अधिक के स्पेक्ट्रम होल्डिंग पर वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज लगाया था। कोर्ट ने न केवल सरकार के डिमांड नोटिस को रद्द किया, बल्कि टेलीकॉम ऑपरेटर्स द्वारा जमा की गई बैंक गारंटी को भी वापस करने का आदेश दिया है। एयरटेल ने कहा- टेलीकॉम सेक्टर के लिए बड़ा फैसला बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले का टेलीकॉम इंडस्ट्री ने स्वागत किया है। एयरटेल के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा कि हम वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज (OTSC) की मांग को रद्द करने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं। यह फैसला कानूनी और वित्तीय अनिश्चितता को खत्म करके भारत के टेलीकॉम सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन साबित होगा। इससे भविष्य के निवेश के लिए एक बेहतर माहौल तैयार होगा। क्या था पूरा विवाद और सरकार का तर्क? यह पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट के 2G स्पेक्ट्रम फैसले के बाद शुरू हुआ था। इसके बाद केंद्र सरकार ने तय सीमा से अधिक स्पेक्ट्रम रखने वाले पुराने ऑपरेटर्स पर वन-टाइम चार्ज लगाने का फैसला किया। टेलीकॉम विभाग (DoT) ने जुलाई 2008 से 6.2 मेगाहर्ट्ज से ज्यादा के स्पेक्ट्रम होल्डिंग्स पर यह चार्ज वसूलने की मांग की थी। सरकार का तर्क था कि ऑपरेटर्स को स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज के अलावा, स्पेक्ट्रम एलोकेशन के लिए अलग से भुगतान करना जरूरी था। कंपनियों ने दी थी कानूनी चुनौती भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया ने इस लेवी (टैक्स) को कोर्ट में चुनौती दी थी। कंपनियों का तर्क था कि न तो इंडियन टेलीग्राफ एक्ट, 1885 और न ही उनके लाइसेंस एग्रीमेंट में इस तरह के बैक-डेटेड (पिछली तारीख से) चार्ज लगाने का कोई प्रावधान है। उन्होंने दलील दी कि वे नेशनल टेलीकॉम पॉलिसी (NTP) 1999 के तहत रेवेन्यू-शेयरिंग फ्रेमवर्क और अतिरिक्त स्पेक्ट्रम मिलने पर बढ़ी हुई रेवेन्यू-शेयरिंग देनदारियों के जरिए पहले ही भुगतान कर चुके हैं। कॉन्ट्रैक्ट के बीच नियम बदलने की इजाजत नहीं हाई कोर्ट ने कंपनियों की दलीलों को सही माना। कोर्ट ने कहा कि टेलीग्राफ एक्ट की धारा 4 के तहत दिए गए टेलीकॉम लाइसेंस पूरी तरह से कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) के दायरे में आते हैं और सरकार इसकी शर्तों से बंधी हुई है। बेंच ने कहा कि सरकार को कॉन्ट्रैक्ट के बीच में गोल पोस्ट (नियम) बदलने की इजाजत नहीं दी जा सकती। दोनों पक्षों के सहमत होने और कॉन्ट्रैक्ट पर काम शुरू होने के बाद सरकार लाइसेंस की वित्तीय शर्तों को अकेले नहीं बदल सकती। रेवेन्यू बढ़ाना ही हमेशा पब्लिक इंटरेस्ट नहीं होता केंद्र सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया था कि यह चार्ज सार्वजनिक हित में लगाया गया है। कोर्ट ने सरकार के इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि केवल सरकारी राजस्व (रेवेन्यू) को अधिकतम करना ही स्वचालित रूप से सार्वजनिक हित नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने याद दिलाया कि NTP-1999 का मुख्य उद्देश्य किफायती टेलीकॉम सेवाएं देना, ग्रामीण कनेक्टिविटी बढ़ाना और स्पेक्ट्रम का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना था, न कि सरकार की कमाई बढ़ाना। ट्राई की सिफारिशों का भी हवाला दिया अदालत ने टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) और समय-समय पर बनी सरकारी कमेटियों की सिफारिशों का भी अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि पुरानी सिफारिशों में केवल 10 मेगाहर्ट्ज से अधिक के स्पेक्ट्रम एलोकेशन पर ही वन-टाइम चार्ज लगाने की बात कही गई थी। 10 मेगाहर्ट्ज तक के स्पेक्ट्रम होल्डिंग पर ऐसे किसी चार्ज का समर्थन नहीं किया गया था। इस मामले में ऑपरेटर्स के पास तय सीमा से ज्यादा स्पेक्ट्रम नहीं था और वे पहले से ही बढ़ा हुआ रेवेन्यू-शेयर चुका रहे थे। मद्रास हाई कोर्ट के पुराने फैसले से अलग रुख बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला एक पुराने मामले में आए फैसले से अलग है। इससे पहले 2016 में मद्रास हाई कोर्ट ने एयरसेल वाले मामले में सरकार के इसी तरह के चार्ज लगाने के फैसले को सही ठहराया था। हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट की बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले से असहमति जताई। बेंच ने कहा कि वे इस बात को स्वीकार नहीं कर सकते कि अतिरिक्त राजस्व जुटाने वाला हर कदम सार्वजनिक हित में ही हो। सरकार ने लाइसेंस की शर्तों में सुधार किए बिना ही यह चार्ज थोप दिया था। क्या होता है वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज (OTSC)? जब टेलीकॉम कंपनियों को शुरुआत में लाइसेंस दिए गए थे, तब उन्हें एक निश्चित सीमा (जैसे 4.4 MHz या 6.2 MHz) तक स्पेक्ट्रम बिना किसी अलग शुल्क के आवंटित किया गया था, जिसके लिए वे रेवेन्यू शेयर करती थीं। बाद में सरकार ने तय सीमा से अधिक स्पेक्ट्रम रखने वाली कंपनियों पर पिछली तारीख से एकमुश्त शुल्क लगाने का फैसला किया, जिसे वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज कहा जाता है। कंपनियों ने इसी बैक-डेटेड शुल्क का विरोध किया था। ये खबर भी पढ़ें… उज्ज्वला योजना में सिर्फ 4 सब्सिडी वाले सिलेंडर मिलेंगे: अब तक 9 सिलेंडर दिए जाते थे, इंटरनेशनल मार्केट में LPG के दाम 46% तक बढ़ने का असर उज्ज्वला योजना (PMUY) के लाभार्थियों को सब्सिडी वाले LPG सिलेंडर अब साल में 9 की बजाय सिर्फ 4 ही मिलेंगे। पेट्रोलियम मंत्रालय ने सोमवार को इसकी जानकारी दी। मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर LPG की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। युद्ध की वजह से LPG 46% तक महंगी हो चुकी है। पूरी खबर पढ़ें…

एयरटेल और वोडाफोन आइडिया को बॉम्बे हाई कोर्ट से राहत:सरकार का वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज वसूलने का फैसला रद्द; बैंक गारंटी भी वापस होगी

एयरटेल और वोडाफोन आइडिया को बॉम्बे हाई कोर्ट से राहत:सरकार का वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज वसूलने का फैसला रद्द; बैंक गारंटी भी वापस होगी

बॉम्बे हाई कोर्ट ने भारती एयरटेल लिमिटेड और वोडाफोन आइडिया लिमिटेड पर केंद्र सरकार के लगाए गए वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज (OTSC) को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सरकार के पास टेलीकॉम लाइसेंस दिए जाने के सालों बाद वित्तीय शर्तों को पिछली तारीख (रेट्रोस्पेक्टिव) से बदलने का कोई अधिकार नहीं है। जस्टिस मनीष पितले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट की डिवीजन बेंच ने सरकार के 2012 के इस फैसले को खारिज करते हुए कंपनियों की बैंक गारंटी भी लौटाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सरकार के 14 साल पुराने फैसले को पलटा जस्टिस मनीष पितले और जस्टिस श्रीराम वी. शिरसाट की बेंच ने केंद्र सरकार के 8 नवंबर और 28 दिसंबर 2012 के उन फैसलों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिनके तहत टेलीकॉम कंपनियों पर जुर्माना लगाया गया था। सरकार ने इन फैसलों के जरिए जुलाई 2008 से 6.2 मेगाहर्ट्ज (MHz) से अधिक के स्पेक्ट्रम होल्डिंग पर वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज लगाया था। कोर्ट ने न केवल सरकार के डिमांड नोटिस को रद्द किया, बल्कि टेलीकॉम ऑपरेटर्स द्वारा जमा की गई बैंक गारंटी को भी वापस करने का आदेश दिया है। एयरटेल ने कहा- टेलीकॉम सेक्टर के लिए बड़ा फैसला बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले का टेलीकॉम इंडस्ट्री ने स्वागत किया है। एयरटेल के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा कि हम वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज (OTSC) की मांग को रद्द करने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं। यह फैसला कानूनी और वित्तीय अनिश्चितता को खत्म करके भारत के टेलीकॉम सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन साबित होगा। इससे भविष्य के निवेश के लिए एक बेहतर माहौल तैयार होगा। क्या था पूरा विवाद और सरकार का तर्क? यह पूरा विवाद सुप्रीम कोर्ट के 2G स्पेक्ट्रम फैसले के बाद शुरू हुआ था। इसके बाद केंद्र सरकार ने तय सीमा से अधिक स्पेक्ट्रम रखने वाले पुराने ऑपरेटर्स पर वन-टाइम चार्ज लगाने का फैसला किया। टेलीकॉम विभाग (DoT) ने जुलाई 2008 से 6.2 मेगाहर्ट्ज से ज्यादा के स्पेक्ट्रम होल्डिंग्स पर यह चार्ज वसूलने की मांग की थी। सरकार का तर्क था कि ऑपरेटर्स को स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज के अलावा, स्पेक्ट्रम एलोकेशन के लिए अलग से भुगतान करना जरूरी था। कंपनियों ने दी थी कानूनी चुनौती भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया ने इस लेवी (टैक्स) को कोर्ट में चुनौती दी थी। कंपनियों का तर्क था कि न तो इंडियन टेलीग्राफ एक्ट, 1885 और न ही उनके लाइसेंस एग्रीमेंट में इस तरह के बैक-डेटेड (पिछली तारीख से) चार्ज लगाने का कोई प्रावधान है। उन्होंने दलील दी कि वे नेशनल टेलीकॉम पॉलिसी (NTP) 1999 के तहत रेवेन्यू-शेयरिंग फ्रेमवर्क और अतिरिक्त स्पेक्ट्रम मिलने पर बढ़ी हुई रेवेन्यू-शेयरिंग देनदारियों के जरिए पहले ही भुगतान कर चुके हैं। कॉन्ट्रैक्ट के बीच नियम बदलने की इजाजत नहीं हाई कोर्ट ने कंपनियों की दलीलों को सही माना। कोर्ट ने कहा कि टेलीग्राफ एक्ट की धारा 4 के तहत दिए गए टेलीकॉम लाइसेंस पूरी तरह से कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) के दायरे में आते हैं और सरकार इसकी शर्तों से बंधी हुई है। बेंच ने कहा कि सरकार को कॉन्ट्रैक्ट के बीच में गोल पोस्ट (नियम) बदलने की इजाजत नहीं दी जा सकती। दोनों पक्षों के सहमत होने और कॉन्ट्रैक्ट पर काम शुरू होने के बाद सरकार लाइसेंस की वित्तीय शर्तों को अकेले नहीं बदल सकती। रेवेन्यू बढ़ाना ही हमेशा पब्लिक इंटरेस्ट नहीं होता केंद्र सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया था कि यह चार्ज सार्वजनिक हित में लगाया गया है। कोर्ट ने सरकार के इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि केवल सरकारी राजस्व (रेवेन्यू) को अधिकतम करना ही स्वचालित रूप से सार्वजनिक हित नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने याद दिलाया कि NTP-1999 का मुख्य उद्देश्य किफायती टेलीकॉम सेवाएं देना, ग्रामीण कनेक्टिविटी बढ़ाना और स्पेक्ट्रम का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना था, न कि सरकार की कमाई बढ़ाना। ट्राई की सिफारिशों का भी हवाला दिया अदालत ने टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) और समय-समय पर बनी सरकारी कमेटियों की सिफारिशों का भी अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि पुरानी सिफारिशों में केवल 10 मेगाहर्ट्ज से अधिक के स्पेक्ट्रम एलोकेशन पर ही वन-टाइम चार्ज लगाने की बात कही गई थी। 10 मेगाहर्ट्ज तक के स्पेक्ट्रम होल्डिंग पर ऐसे किसी चार्ज का समर्थन नहीं किया गया था। इस मामले में ऑपरेटर्स के पास तय सीमा से ज्यादा स्पेक्ट्रम नहीं था और वे पहले से ही बढ़ा हुआ रेवेन्यू-शेयर चुका रहे थे। मद्रास हाई कोर्ट के पुराने फैसले से अलग रुख बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फैसला एक पुराने मामले में आए फैसले से अलग है। इससे पहले 2016 में मद्रास हाई कोर्ट ने एयरसेल वाले मामले में सरकार के इसी तरह के चार्ज लगाने के फैसले को सही ठहराया था। हालांकि, बॉम्बे हाई कोर्ट की बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले से असहमति जताई। बेंच ने कहा कि वे इस बात को स्वीकार नहीं कर सकते कि अतिरिक्त राजस्व जुटाने वाला हर कदम सार्वजनिक हित में ही हो। सरकार ने लाइसेंस की शर्तों में सुधार किए बिना ही यह चार्ज थोप दिया था। क्या होता है वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज (OTSC)? जब टेलीकॉम कंपनियों को शुरुआत में लाइसेंस दिए गए थे, तब उन्हें एक निश्चित सीमा (जैसे 4.4 MHz या 6.2 MHz) तक स्पेक्ट्रम बिना किसी अलग शुल्क के आवंटित किया गया था, जिसके लिए वे रेवेन्यू शेयर करती थीं। बाद में सरकार ने तय सीमा से अधिक स्पेक्ट्रम रखने वाली कंपनियों पर पिछली तारीख से एकमुश्त शुल्क लगाने का फैसला किया, जिसे वन-टाइम स्पेक्ट्रम चार्ज कहा जाता है। कंपनियों ने इसी बैक-डेटेड शुल्क का विरोध किया था। ये खबर भी पढ़ें… उज्ज्वला योजना में सिर्फ 4 सब्सिडी वाले सिलेंडर मिलेंगे: अब तक 9 सिलेंडर दिए जाते थे, इंटरनेशनल मार्केट में LPG के दाम 46% तक बढ़ने का असर उज्ज्वला योजना (PMUY) के लाभार्थियों को सब्सिडी वाले LPG सिलेंडर अब साल में 9 की बजाय सिर्फ 4 ही मिलेंगे। पेट्रोलियम मंत्रालय ने सोमवार को इसकी जानकारी दी। मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर LPG की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। युद्ध की वजह से LPG 46% तक महंगी हो चुकी है। पूरी खबर पढ़ें…

दुनिया की टॉप-100 कंपनियों में एक भी भारतीय नहीं:रिलायंस, एयरटेल और TCS की मार्केट वैल्यू घटी; शेयर मार्केट में लगातार गिरावट का असर

दुनिया की टॉप-100 कंपनियों में एक भी भारतीय नहीं:रिलायंस, एयरटेल और TCS की मार्केट वैल्यू घटी; शेयर मार्केट में लगातार गिरावट का असर

मार्केट वैल्यू के आधार पर दुनिया की टॉप-100 कंपनियों की लिस्ट में अब भारत की एक भी कंपनी नहीं बची है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2025 की शुरुआत तक इस ग्लोबल लिस्ट में भारत की तीन कंपनियां- रिलायंस इंडस्ट्रीज, HDFC बैंक और TCS शामिल थीं, लेकिन अब इस लिस्ट में एक भी कंपनी शामिल नहीं है। घरेलू शेयर बाजार में लगातार गिरावट के कारण इन भारतीय कंपनियों की वैल्यू घटी है। देश की सबसे वैल्यूएबल कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ग्लोबल रैंकिंग में 106वें स्थान पर आ गई है। यह कंपनी 2025 की शुरुआत में 57वें और 2026 की शुरुआत में 73वें स्थान पर आ गई थी। देश के प्राइवेट सेक्टर के सबसे बड़े बैंक HDFC बैंक की रैंकिंग अब 190 हो गई है, जो 2025 की शुरुआत में 97वें नंबर पर थी। देश की सबसे बड़ी टेलीकॉम ऑपरेटर भारती एयरटेल भी 2026 की शुरुआत में 164वें स्थान पर थी, जो अब गिरकर 202वें स्थान पर आ गई है। एनवीडिया नंबर-1, अल्फाबेट दूसरे और एपल तीसरे पर जहां एक तरफ भारतीय कंपनियां रेंकिंग में पीछे हो गई हैं, वहीं ग्लोबल मार्केट्स में दुनिया की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों का दबदबा बना हुआ है। एनवीडिया वर्तमान में 5.33 ट्रिलियन डॉलर (₹513 लाख करोड़) के मार्केट कैप के साथ दुनिया की सबसे वैल्यूएबल कंपनी बनी हुई है। इसके बाद अल्फाबेट 4.7 ट्रिलियन डॉलर (₹455 लाख करोड़) और एपल 4.3 ट्रिलियन डॉलर (₹416 लाख करोड़) के मार्केट कैप के साथ दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन चौथे और पांचवें नंबर पर है। ICICI, SBI और IT सेक्टर की कंपनियों की रैंकिंग भी घटी टॉप 500 में भारत की 15 कंपनियों में सिर्फ 9 बचीं ग्लोबल मार्केट कैप के टॉप 500 की लिस्ट में भारत की कंपनियों की संख्या साल 2025 की शुरुआत में 15 और साल 2026 की शुरुआत में 13 थी, जो अब घटकर केवल 9 रह गई है। घरेलू स्तर पर भी 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा मार्केट कैप वाली लिस्टेड भारतीय कंपनियों का क्लब भी अब छोटा हो गया है। साल की शुरुआत में ऐसी करीब 6 कंपनियां थीं, जो अब घटकर सिर्फ 3 रह गई हैं। 100 बिलियन डॉलर क्लब में सिर्फ तीन कंपनियां बचीं भारतीय बाजार में लगातार गिरावट के कारण देश के दूसरे सबसे बड़े लेंडर ICICI बैंक, सबसे बड़े पब्लिक सेक्टर बैंक SBI और TCS ने यह स्टेटस खो दिया है। अब सिर्फ रिलायंस इंडस्ट्रीज, HDFC बैंक और भारती एयरटेल है, जिनका मार्केट कैप 100 बिलियन डॉलर से ज्यादा है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कच्चे तेल की कीमतों का असर भारतीय बाजारों में इस गिरावट की शुरुआत 2024 के मीड से शुरू हो गई थी। ज्यादा वैल्युएशन, सुस्त अर्निंग्स, रुपए में कमजोरी और ट्रेड वार की चिंताओं के बीच विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली के कारण भारतीय शेयरों में गिरावट का लंबा दौर शुरू हुआ। इसके बाद अमेरिका-ईरान-इजराइल संघर्ष ने कच्चे तेल की कीमतों को 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचा दिया, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ गया। ग्लोबल ब्रोकरेज हाउसेज ने भी भारतीय बाजार की रेटिंग घटाई बाजार पर दबाव बढ़ने का एक मुख्य कारण ग्लोबल ब्रोकरेज हाउसेज का रेटिंग घटाना भी रहा। मार्च में UBS, मॉर्गन स्टेनली और नोमुरा ने भारतीय बाजारों पर अपनी रेटिंग घटाई है। जिसके बाद अप्रैल में जेपी मॉर्गन, HSBC और गोल्डमैन सैक्स ने भी भारतीय बाजार की रेटिंग घटाई है। मई के पहले सप्ताह में सीटी बैंक भी इसमें शामिल हो गई। इन सभी रिपोर्ट्स में हाई वैल्युएशन प्रीमियम, तेल के कारण अर्निंग्स रिस्क, कमजोर होता रुपया और हाई-ग्रोथ टेक्नोलॉजी व AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) सेक्टर में भारत के सीमित एक्सपोजर को लेकर समान चिंताएं जताई गई हैं। मार्केट कैपिटलाइजेशन क्या होता है? मार्केट कैप किसी भी कंपनी के टोटल आउटस्टैंडिंग शेयरों यानी वे सभी शेयर जो फिलहाल उसके शेयरहोल्डर्स के पास हैं, उनकी वैल्यू है। इसका कैलकुलेशन कंपनी के जारी शेयरों की कुल संख्या को उनकी कीमत से गुणा करके किया जाता है। इसे एक उदाहरण से समझें… मान लीजिए… कंपनी ‘A’ के 1 करोड़ शेयर मार्केट में लोगों ने खरीद रखे हैं। अगर एक शेयर की कीमत 20 रुपए है, तो कंपनी की मार्केट वैल्यू 1 करोड़ x 20 यानी 20 करोड़ रुपए होगी। कंपनियों की मार्केट वैल्यू शेयर की कीमतों के बढ़ने या घटने के चलते बढ़ता-घटता है। इसके और कई कारण हैं… मार्केट कैप के उतार-चढ़ाव का कंपनी और निवेशकों पर क्या प्रभाव पड़ता है? कंपनी पर असर : बड़ा मार्केट कैप कंपनी को मार्केट से फंड जुटाने, लोन लेने या अन्य कंपनी एक्वायर करने में मदद करता है। वहीं, छोटे या कम मार्केट कैप से कंपनी की फाइनेंशियल डिसीजन लेने की क्षमता कम हो जाती है। निवेशकों पर असर : मार्केट कैप बढ़ने से निवेशकों को डायरेक्ट फायदा होता है। क्योंकि उनके शेयरों की कीमत बढ़ जाती है। वही, गिरावट से नुकसान हो सकता है, जिससे निवेशक शेयर बेचने का फैसला ले सकते हैं। उदाहरण: अगर TCS का मार्केट कैप ₹12.43 लाख करोड़ बढ़ता है, तो निवेशकों की संपत्ति बढ़ेगी, और कंपनी को भविष्य में निवेश के लिए ज्यादा पूंजी मिल सकती है। लेकिन मार्केट कैप गिरता है तो इसका नुकसान हो सकता है। ये खबर भी पढ़ें… पेट्रोल-डीजल के दाम 90 पैसे बढ़े: 4 दिन पहले ₹3-3 बढ़ाए थे; 15 राज्यों में पेट्रोल ₹100 लीटर पार, डीजल 17 में ₹90 से ऊपर देश में पेट्रोल और डीजल आज 19 मई से औसतन 90 पैसे प्रति लीटर और महंगा हो गया है। इससे पहले 15 मई, शुक्रवार को ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में 3-3 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई थी। यानी पांच दिन के भीतर में यह दूसरी बढ़ोतरी है। देश के 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पेट्रोल 100 रुपए लीटर के ऊपर बिक रहा है। वहीं 17 में डीजल का दाम 90 रुपए लीटर से ज्यादा है। पूरी खबर पढ़ें…