'पर्सनल लाइफ पर बात न करें, भले ही अफेयर हो':गोविंदा बोले- कोमल के साथ फिल्म प्रमोशन के लिए लालबागचा राजा गया; मेरे खिलाफ सोची-समझी साजिश

बॉलीवुड एक्टर गोविंदा ने अपनी पर्सनल लाइफ और अफेयर के आरोपों को लेकर चल रही चर्चाओं पर तीखा ऐतराज जताया है। ANI को दिए इंटरव्यू में गोविंदा ने कहा कि उनकी निजी जिंदगी किसी और के लिए चिंता या चर्चा का विषय नहीं होनी चाहिए, भले ही कोई अफेयर ही क्यों न हो। हाल ही में अपनी अपकमिंग फिल्म ‘रूपा’ की एक्ट्रेस कोमल रानी स्वर्णकार के साथ लालबागचा राजा के दर्शन करने के बाद से उनकी पर्सनल लाइफ को लेकर कयास लगाए जा रहे थे। उन्होंने इन खबरों को अपनी इमेज खराब करने और परिवार से दूर करने की सोची-समझी साजिश बताया है। ‘भले ही अफेयर हो, किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं’ अपनी पर्सनल लाइफ पर हो रही बयानबाजी का जवाब देते हुए गोविंदा ने कहा, “यह किसी और के लिए चर्चा का विषय नहीं है, भले ही कोई अफेयर हो। मैं सिर्फ काम कर रहा हूं और एक पेशेवर रिश्ता बनाए हुए हूं।” गोविंदा के मुताबिक, लोग बिना वजह उनकी निजी जिंदगी को निशाना बना रहे हैं, जबकि उन्हें सिर्फ अपने काम से मतलब रखना चाहिए। फिल्म ‘रूपा’ के लिए प्रार्थना करने पहुंचे थे कोमल रानी स्वर्णकार के साथ गणपति पंडाल में दिखने पर सफाई देते हुए गोविंदा ने बताया कि वे अपनी आने वाली फिल्म ‘रूपा’ के लिए लालबागचा राजा के दरबार पहुंचे थे। इस फिल्म में कोमल रानी मुख्य भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने कहा, “इससे पहले भी मैं करिश्मा कपूर और रवीना टंडन के साथ मंदिरों में गया था और वे फिल्में बहुत बड़ी हिट साबित हुई थीं। मैं लंबे समय बाद नया काम शुरू कर रहा हूं, इसलिए प्रार्थना करने गया था।” परिवार से दूर करने और इमेज खराब करने की साजिश इंटरव्यू में गोविंदा ने अपने खिलाफ चल रही बातों को एक सोची-समझी चाल करार दिया। उन्होंने कहा, “यह किसी एक इंसान की गलती नहीं है, बल्कि बहुत सोच-समझकर बनाई गई योजना है। ऐसी चीजें आगे भी हो सकती हैं। यह मुझे मेरे परिवार से अलग करने और समाज में मेरी छवि खराब करने का प्लान है।” गोविंदा ने कहा कि उन्होंने हमेशा अपने काम पर ध्यान दिया है और आगे भी काम करते रहेंगे। कोमल संग दिखे गोविंदा, अकेली पहुंची थीं पत्नी सुनीता गोविंदा की पर्सनल लाइफ पिछले कुछ समय से लगातार सुर्खियों में है। हाल ही में गणेशोत्सव के दौरान मुंबई के प्रसिद्ध लालबागचा राजा पंडाल में गोविंदा अपनी को-स्टार कोमल रानी स्वर्णकार के साथ गणपति के दर्शन करने पहुंचे थे। वहीं, उसी दिन उनसे पहले उनकी पत्नी सुनीता आहूजा अकेले ही दर्शन के लिए पहुंची थीं। दोनों के अलग-अलग पहुंचने और कोमल के साथ दिखने के बाद से उनके रिश्ते और कथित अफेयर को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। सुनीता आहूजा बोलीं- इंसान धोखा ही देते हैं गणपति उत्सव के दौरान गोविंदा को अभिनेत्री और रूमर्ड गर्लफ्रेंड कोमल रानी स्वर्णकार के साथ दिखने के बाद सुनीता आहूजा का एक बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने इंसानों को धोखेबाज बताते हुए जानवरों से प्यार को बेहतर बताया। हालांकि, सुनीता ने अपने बयान में गोविंदा का नाम नहीं लिया। दरअसल, मुंबई एयरपोर्ट पर पैपराजी से बातचीत के दौरान सुनीता अपने पालतू कुत्ते विंटर के साथ थीं। पैपराजी से बात करते हुए सुनीता ने कहा कि इंसानों को जितना भी प्यार करो, कोई फायदा नहीं है। धोखा ही देते हैं। इनको प्यार करो, देखो, हमेशा चिपके रहते हैं। जानवरों से प्यार करो, इंसानों से नहीं। धोखेबाज होते हैं इंसान। आसपास के माहौल से परेशान हैं गोविंदा: अनुपम खेर वहीं अनुपम खेर ने कहा कि गोविंदा को अपनी आदतों या निजी परेशानियों को अपनी पूरी जिंदगी और काम पर हावी होने की इजाजत नहीं देनी चाहिए। अनुपम ने बताया कि वे गोविंदा पर कोई फैसला या टिप्पणी करने वाले व्यक्ति नहीं हैं और गोविंदा अपनी जिंदगी को बेहतर समझते हैं। उन्होंने खुलासा किया कि उन्होंने गोविंदा को फोन किया था, लेकिन उन्होंने वापस कॉल करने की बात कही। अनुपम उन्हें सिर्फ यह कहना चाहते थे कि यह मुश्किल दौर भी बीत जाएगा। अनुपम के मुताबिक, हर किसी की जिंदगी में परेशानियां आती हैं। गोविंदा अपने आसपास के माहौल और परिस्थितियों से थोड़े परेशान जरूर हैं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी है और वापसी की पूरी उम्मीद है। ‘गोविंदा की एक्टिंग और डांस में कोई मुकाबला नहीं’ अनुपम खेर ने गोविंदा के काम की तारीफ करते हुए कहा कि वे उन सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में से एक हैं, जिनके साथ उन्होंने काम किया है। दोनों ने साथ में 10 से 12 फिल्मों में काम किया है। अनुपम के मुताबिक, इम्प्रोवाइजेशन, एक्टिंग और डांस के मामले में गोविंदा का मुकाबला कोई नहीं कर सकता।
'पर्सनल लाइफ पर बात न करें, भले ही अफेयर हो':गोविंदा बोले- कोमल के साथ फिल्म प्रमोशन के लिए लालबागचा राजा गया; मेरे खिलाफ सोची-समझी साजिश

बॉलीवुड एक्टर गोविंदा ने अपनी पर्सनल लाइफ और अफेयर के आरोपों को लेकर चल रही चर्चाओं पर तीखा ऐतराज जताया है। ANI को दिए इंटरव्यू में गोविंदा ने कहा कि उनकी निजी जिंदगी किसी और के लिए चिंता या चर्चा का विषय नहीं होनी चाहिए, भले ही कोई अफेयर ही क्यों न हो। हाल ही में अपनी अपकमिंग फिल्म ‘रूपा’ की एक्ट्रेस कोमल रानी स्वर्णकार के साथ लालबागचा राजा के दर्शन करने के बाद से उनकी पर्सनल लाइफ को लेकर कयास लगाए जा रहे थे। उन्होंने इन खबरों को अपनी इमेज खराब करने और परिवार से दूर करने की सोची-समझी साजिश बताया है। ‘भले ही अफेयर हो, किसी को चिंता करने की जरूरत नहीं’ अपनी पर्सनल लाइफ पर हो रही बयानबाजी का जवाब देते हुए गोविंदा ने कहा, “यह किसी और के लिए चर्चा का विषय नहीं है, भले ही कोई अफेयर हो। मैं सिर्फ काम कर रहा हूं और एक पेशेवर रिश्ता बनाए हुए हूं।” गोविंदा के मुताबिक, लोग बिना वजह उनकी निजी जिंदगी को निशाना बना रहे हैं, जबकि उन्हें सिर्फ अपने काम से मतलब रखना चाहिए। फिल्म ‘रूपा’ के लिए प्रार्थना करने पहुंचे थे कोमल रानी स्वर्णकार के साथ गणपति पंडाल में दिखने पर सफाई देते हुए गोविंदा ने बताया कि वे अपनी आने वाली फिल्म ‘रूपा’ के लिए लालबागचा राजा के दरबार पहुंचे थे। इस फिल्म में कोमल रानी मुख्य भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने कहा, “इससे पहले भी मैं करिश्मा कपूर और रवीना टंडन के साथ मंदिरों में गया था और वे फिल्में बहुत बड़ी हिट साबित हुई थीं। मैं लंबे समय बाद नया काम शुरू कर रहा हूं, इसलिए प्रार्थना करने गया था।” परिवार से दूर करने और इमेज खराब करने की साजिश इंटरव्यू में गोविंदा ने अपने खिलाफ चल रही बातों को एक सोची-समझी चाल करार दिया। उन्होंने कहा, “यह किसी एक इंसान की गलती नहीं है, बल्कि बहुत सोच-समझकर बनाई गई योजना है। ऐसी चीजें आगे भी हो सकती हैं। यह मुझे मेरे परिवार से अलग करने और समाज में मेरी छवि खराब करने का प्लान है।” गोविंदा ने कहा कि उन्होंने हमेशा अपने काम पर ध्यान दिया है और आगे भी काम करते रहेंगे। कोमल संग दिखे गोविंदा, अकेली पहुंची थीं पत्नी सुनीता गोविंदा की पर्सनल लाइफ पिछले कुछ समय से लगातार सुर्खियों में है। हाल ही में गणेशोत्सव के दौरान मुंबई के प्रसिद्ध लालबागचा राजा पंडाल में गोविंदा अपनी को-स्टार कोमल रानी स्वर्णकार के साथ गणपति के दर्शन करने पहुंचे थे। वहीं, उसी दिन उनसे पहले उनकी पत्नी सुनीता आहूजा अकेले ही दर्शन के लिए पहुंची थीं। दोनों के अलग-अलग पहुंचने और कोमल के साथ दिखने के बाद से उनके रिश्ते और कथित अफेयर को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। सुनीता आहूजा बोलीं- इंसान धोखा ही देते हैं गणपति उत्सव के दौरान गोविंदा को अभिनेत्री और रूमर्ड गर्लफ्रेंड कोमल रानी स्वर्णकार के साथ दिखने के बाद सुनीता आहूजा का एक बयान सामने आया, जिसमें उन्होंने इंसानों को धोखेबाज बताते हुए जानवरों से प्यार को बेहतर बताया। हालांकि, सुनीता ने अपने बयान में गोविंदा का नाम नहीं लिया। दरअसल, मुंबई एयरपोर्ट पर पैपराजी से बातचीत के दौरान सुनीता अपने पालतू कुत्ते विंटर के साथ थीं। पैपराजी से बात करते हुए सुनीता ने कहा कि इंसानों को जितना भी प्यार करो, कोई फायदा नहीं है। धोखा ही देते हैं। इनको प्यार करो, देखो, हमेशा चिपके रहते हैं। जानवरों से प्यार करो, इंसानों से नहीं। धोखेबाज होते हैं इंसान। आसपास के माहौल से परेशान हैं गोविंदा: अनुपम खेर वहीं अनुपम खेर ने कहा कि गोविंदा को अपनी आदतों या निजी परेशानियों को अपनी पूरी जिंदगी और काम पर हावी होने की इजाजत नहीं देनी चाहिए। अनुपम ने बताया कि वे गोविंदा पर कोई फैसला या टिप्पणी करने वाले व्यक्ति नहीं हैं और गोविंदा अपनी जिंदगी को बेहतर समझते हैं। उन्होंने खुलासा किया कि उन्होंने गोविंदा को फोन किया था, लेकिन उन्होंने वापस कॉल करने की बात कही। अनुपम उन्हें सिर्फ यह कहना चाहते थे कि यह मुश्किल दौर भी बीत जाएगा। अनुपम के मुताबिक, हर किसी की जिंदगी में परेशानियां आती हैं। गोविंदा अपने आसपास के माहौल और परिस्थितियों से थोड़े परेशान जरूर हैं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी है और वापसी की पूरी उम्मीद है। ‘गोविंदा की एक्टिंग और डांस में कोई मुकाबला नहीं’ अनुपम खेर ने गोविंदा के काम की तारीफ करते हुए कहा कि वे उन सबसे बेहतरीन अभिनेताओं में से एक हैं, जिनके साथ उन्होंने काम किया है। दोनों ने साथ में 10 से 12 फिल्मों में काम किया है। अनुपम के मुताबिक, इम्प्रोवाइजेशन, एक्टिंग और डांस के मामले में गोविंदा का मुकाबला कोई नहीं कर सकता।
आलिया-रणबीर कपूर ‘डोंट बी शाय’ की स्क्रीनिंग में पहुंचे:‘हुंकार’ की स्क्रीनिंग में रणवीर सिंह- अनीत पड्डा नजर आए

गुरुवार को मुंबई में आलिया भट्ट की प्रोड्यूस की हुई फिल्म ‘डोंट बी शाय’ की स्पेशल स्क्रीनिंग रखी गई। इस मौके पर आलिया भट्ट अपने पति रणबीर कपूर के साथ पहुंचीं। रणबीर की मां नीतू कपूर भी नजर आईं। वहीं, आलिया के पिता महेश भट्ट, मां सोनी राजदान और बहन शाहीन भट्ट भी स्क्रीनिंग में शामिल हुईं। दोनों परिवारों ने साथ में तस्वीरें भी खिंचवाईं। स्क्रीनिंग में करण जौहर, वरुण धवन, अयान मुखर्जी, शरवरी वाघ और समय रैना समेत कई सेलेब्स भी पहुंचे। ‘डोंट बी शाय’ को आलिया और शाहीन भट्ट ने अपने प्रोडक्शन हाउस एटरनल सनशाइन प्रोडक्शंस के तहत बनाया है। फिल्म 25 सितंबर को प्राइम वीडियो पर रिलीज हो गई है। अनीत पड्डा की वेब सीरीज ‘हुंकार’ की स्क्रीनिंग गुरुवार को वेब सीरीज ‘हुंकार: द रोअर’ की स्पेशल स्क्रीनिंग रखी गई। स्क्रीनिंग में एक्ट्रेस अनीत पड्डा और फातिमा सना शेख पहुंचीं। इनके अलावा श्वेता त्रिपाठी और रणवीर सिंह भी नजर आए। अनीत पड्डा की यह सीरीज फिल्म ‘सयारा’ की सफलता के बाद चर्चा में है। कोर्टरूम ड्रामा पर आधारित ‘हुंकार: द रोअर’ 25 सितंबर 2026 को रिलीज हुई है। इसमें अनीत पड्डा के अलावा रघुबीर यादव और फातिमा सना शेख भी अहम भूमिकाओं में हैं।
‘लव लॉटरी’- मूवी रिव्यू:प्यार किया, शादी की और फिर पत्नी के कत्ल का इल्जाम पति पर; आखिर असली कातिल कौन है?

प्यार हुआ, शादी हुई और फिर बीवी का कत्ल! मामला जब कोर्ट पहुंचता है तो पति खुद कटघरे में खड़ा है। अब वह कातिल है या कहानी का सबसे बड़ा शिकार? ‘लव लॉटरी’ इसी सवाल को लेकर अपना खेल शुरू करती है। फिल्म की कहानी कैसी है कार्तिक सक्सेना (अक्षय ओबेरॉय) की जिंदगी में भरनी वर्मा (हेली दारूवाला) आती है। मुलाकात प्यार में बदलती है और दोनों शादी कर लेते हैं। लेकिन शादी के बाद वही रिश्ता धीरे-धीरे उलझने लगता है। भरोसा कम होता है, तनाव बढ़ता है और दोनों के बीच दूरियां आ जाती हैं। फिर एक दिन भरनी की हत्या हो जाती है। पुलिस की नजर सीधे कार्तिक पर जाती है और इंस्पेक्टर विक्रम बिष्ट (कबीर दूहन सिंह) उसे गिरफ्तार कर लेते हैं। कार्तिक खुद को बेगुनाह बताता है, लेकिन उसके खिलाफ हालात कम नहीं होते। इसके बाद वह अपने वकील प्रशांत बत्रा (विक्रम शर्मा) के सामने अपनी शादी की पूरी कहानी बताता है। पहली मुलाकात से लेकर प्यार, शादी और रिश्ते में आई दरार तक। फिल्म की दिलचस्पी यहीं है जितना कार्तिक अपनी कहानी बताता है, उतना ही शक बढ़ता जाता है। फिल्म में एक्टिंग कैसी है अक्षय ओबेरॉय फिल्म की असली ताकत हैं। कार्तिक के किरदार में डर भी है, गुस्सा भी और खुद को बचाने की बेचैनी भी। अक्षय इन भावनाओं को बिना ज्यादा शोर किए निभाते हैं। कई सीन में वह इतने सामान्य दिखते हैं कि इसी वजह से उन पर शक और बढ़ जाता है। क्लाइमैक्स का उनका मोनोलॉग भी असर छोड़ता है। हेली दारूवाला भरनी के किरदार में जरूरी रहस्य बनाए रखती हैं। वह पूरी फिल्म में आसानी से पढ़ी नहीं जातीं, जो इस किरदार के लिए जरूरी है। कबीर दूहन सिंह पुलिस अधिकारी के रोल में फिट हैं। विजयंत कोहली कहानी में हल्कापन लाते हैं, हालांकि शादी और महिलाओं पर उनके किरदार की कुछ बातें जरूरत से ज्यादा सीधी लगती हैं। अग्नि अग्यारी और विक्रम शर्मा भी अपनी भूमिकाओं में असर छोड़ते हैं। फिल्म का निर्देशन कैसा है अरविंद पांडेय ने गंभीर मुद्दे को सीधे भाषण में बदलने के बजाय मर्डर मिस्ट्री और कोर्टरूम ड्रामा के रास्ते पेश किया है। फिल्म का पहला हाफ इसी वजह से ज्यादा मजेदार है। रिश्ता टूट रहा है और साथ ही हत्या की गुत्थी भी उलझ रही है। हर थोड़ी देर में कोई नई बात सामने आती है और शक की सुई घूमती रहती है। लेकिन दूसरे हाफ में कहानी थोड़ी धीमी पड़ती है। कोर्टरूम वाले हिस्से में कुछ ट्विस्ट उतना असर नहीं छोड़ते और कुछ बातें किरदारों के अनुभव के बजाय सीधे संवादों से समझाई जाती हैं। यही जगह फिल्म को और बेहतर बनाया जा सकता था। फिल्म पुरुष के नजरिए से वैवाहिक विवाद और भावनात्मक दबाव की बात करती है। विषय नया नहीं है, लेकिन इसे मर्डर मिस्ट्री के साथ जोड़ना दिलचस्प है। दिक्कत यह है कि कुछ जगह बहस बारीक रहने के बजाय बहुत सीधी हो जाती है। नवीन वी. मिश्रा की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के गंभीर माहौल को सूट करती है। उत्तराखंड की लोकेशंस खूबसूरत हैं। प्रकाश झा की एडिटिंग पहले हाफ को रफ्तार देती है, लेकिन 2 घंटे 21 मिनट की फिल्म के दूसरे हिस्से में थोड़ी कैंची और चलती तो मजा बढ़ता। फिल्म के तकनीकी क्रेडिट्स में यही सिनेमैटोग्राफी और एडिटिंग दर्ज हैं। फिल्म का म्यूजिक कैसा है अरविंद पांडेय और वरुण मिश्रा का संगीत कहानी के इमोशनल हिस्से को सपोर्ट करता है। ‘नजर लग जाएगी’ और ‘बेवफा’ रिश्ते में आए प्यार और टूटन को आगे बढ़ाते हैं। गाने फिल्म पर भारी नहीं पड़ते, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि फिल्म खत्म होने के बाद सबसे पहले यही याद आएं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘लव लॉटरी’ का पहला हाफ बाजी मारता है। प्यार से शुरू हुई कहानी जब हत्या तक पहुंचती है तो फिल्म पकड़ बना लेती है। अक्षय ओबेरॉय इस पकड़ को अपने अभिनय से और मजबूत करते हैं। दूसरे हाफ में वही कसाव नहीं रह जाता। कोर्टरूम ड्रामा थोड़ा खिंचता है और जेंडर से जुड़ी बहस भी कुछ जगह ज्यादा सीधे तरीके से रखी गई है। फिर भी फिल्म में इतना सस्पेंस है कि आप अंत तक यह जानना चाहेंगे कि कातिल कौन है और कार्तिक की कहानी में कितना सच है। जैकपॉट नहीं, लेकिन ‘लव लॉटरी’ की टिकट पूरी तरह घाटे का सौदा भी नहीं है।
‘लव लॉटरी’- मूवी रिव्यू:प्यार किया, शादी की और फिर पति पर पत्नी के कत्ल का इल्जाम; आखिर असली कातिल कौन है?

प्यार हुआ, शादी हुई और फिर बीवी का कत्ल! मामला जब कोर्ट पहुंचता है तो पति खुद कटघरे में खड़ा है। अब वह कातिल है या कहानी का सबसे बड़ा शिकार? फिल्म ‘लव लॉटरी’ इसी सवाल को लेकर अपना खेल शुरू करती है। फिल्म की कहानी कैसी है कार्तिक सक्सेना (अक्षय ओबेरॉय) की जिंदगी में भरनी वर्मा (हेली दारूवाला) आती है। मुलाकात प्यार में बदलती है और दोनों शादी कर लेते हैं। लेकिन शादी के बाद वही रिश्ता धीरे-धीरे उलझने लगता है। भरोसा कम होता है, तनाव बढ़ता है और दोनों के बीच दूरियां आ जाती हैं। फिर एक दिन भरनी की हत्या हो जाती है। पुलिस की नजर सीधे कार्तिक पर जाती है और इंस्पेक्टर विक्रम बिष्ट (कबीर दुहन सिंह) उसे गिरफ्तार कर लेते हैं। कार्तिक खुद को बेगुनाह बताता है, लेकिन उसके खिलाफ हालात कम नहीं होते। इसके बाद वह अपने वकील प्रशांत बत्रा (विक्रम शर्मा) के सामने अपनी शादी की पूरी कहानी बताता है। पहली मुलाकात से लेकर प्यार, शादी और रिश्ते में आई दरार तक। फिल्म की दिलचस्पी यहीं है जितना कार्तिक अपनी कहानी बताता है, उतना ही शक बढ़ता जाता है। फिल्म में एक्टिंग कैसी है अक्षय ओबेरॉय फिल्म की असली ताकत हैं। कार्तिक के किरदार में डर भी है, गुस्सा भी और खुद को बचाने की बेचैनी भी। अक्षय इन भावनाओं को बिना ज्यादा शोर किए निभाते हैं। कई सीन में वह इतने सामान्य दिखते हैं कि इसी वजह से उन पर शक और बढ़ जाता है। क्लाइमैक्स का उनका मोनोलॉग भी असर छोड़ता है। हेली दारूवाला भरनी के किरदार में जरूरी रहस्य बनाए रखती हैं। वह पूरी फिल्म में आसानी से पढ़ी नहीं जातीं, जो इस किरदार के लिए जरूरी है। कबीर दुहन सिंह पुलिस अधिकारी के रोल में फिट हैं। विजयंत कोहली कहानी में हल्कापन लाते हैं, हालांकि शादी और महिलाओं पर उनके किरदार की कुछ बातें जरूरत से ज्यादा सीधी लगती हैं। अग्नि अग्यारी और विक्रम शर्मा भी अपनी भूमिकाओं में असर छोड़ते हैं। फिल्म का निर्देशन कैसा है अरविंद पांडेय ने गंभीर मुद्दे को सीधे भाषण में बदलने के बजाय मर्डर मिस्ट्री और कोर्टरूम ड्रामा के रास्ते पेश किया है। फिल्म का पहला हाफ इसी वजह से ज्यादा मजेदार है। रिश्ता टूट रहा है और साथ ही हत्या की गुत्थी भी उलझ रही है। हर थोड़ी देर में कोई नई बात सामने आती है और शक की सुई घूमती रहती है। लेकिन दूसरे हाफ में कहानी थोड़ी धीमी पड़ती है। कोर्टरूम वाले हिस्से में कुछ ट्विस्ट उतना असर नहीं छोड़ते और कुछ बातें किरदारों के अनुभव के बजाय सीधे संवादों से समझाई जाती हैं। यही जगह फिल्म को और बेहतर बनाया जा सकता था। फिल्म पुरुष के नजरिए से वैवाहिक विवाद और इमोशनल प्रेशर की बात करती है। विषय नया नहीं है, लेकिन इसे मर्डर मिस्ट्री के साथ जोड़ना दिलचस्प है। दिक्कत यह है कि कुछ जगह बहस बारीक रहने के बजाय बहुत सीधी हो जाती है। नवीन वी. मिश्रा की सिनेमैटोग्राफी फिल्म के गंभीर माहौल को सूट करती है। उत्तराखंड की लोकेशंस खूबसूरत हैं। प्रकाश झा की एडिटिंग पहले हाफ को रफ्तार देती है, लेकिन 2 घंटे 21 मिनट की फिल्म के दूसरे हिस्से में थोड़ी कैंची और चलती तो मजा बढ़ता। फिल्म के तकनीकी क्रेडिट्स में यही सिनेमैटोग्राफी और एडिटिंग दर्ज हैं। फिल्म का म्यूजिक कैसा है अरविंद पांडेय और वरुण मिश्रा का संगीत कहानी के इमोशनल हिस्से को सपोर्ट करता है। ‘नजर लग जाएगी’ और ‘बेवफा’ रिश्ते में आए प्यार और टूटन को आगे बढ़ाते हैं। गाने फिल्म पर भारी नहीं पड़ते, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि फिल्म खत्म होने के बाद सबसे पहले यही याद आएं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘लव लॉटरी’ का पहला हाफ बाजी मारता है। प्यार से शुरू हुई कहानी जब हत्या तक पहुंचती है तो फिल्म पकड़ बना लेती है। अक्षय ओबेरॉय इस पकड़ को अपने अभिनय से और मजबूत करते हैं। दूसरे हाफ में वही कसाव नहीं रह जाता। कोर्टरूम ड्रामा थोड़ा खिंचता है और जेंडर से जुड़ी बहस भी कुछ जगह ज्यादा सीधे तरीके से रखी गई है। फिर भी फिल्म में इतना सस्पेंस है कि आप अंत तक यह जानना चाहेंगे कि कातिल कौन है और कार्तिक की कहानी में कितना सच है। जैकपॉट नहीं, लेकिन ‘लव लॉटरी’ की टिकट पूरी तरह घाटे का सौदा भी नहीं है।
'द वन'- मूवी रिव्यू:वन देवी की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्य से भरी कहानी, जंगल में छिपा है कौन सा राज?

हमारे देश में कहानियों की कोई कमी नहीं है, कमी है उन्हें बड़े पर्दे पर नए अंदाज में सुनाने की। ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ बिहार की मिट्टी से निकली ऐसी ही एक लोककथा को लेकर आती है, जहां वन देवी, रहस्यमयी जंगल, छठी मइया की आस्था और इंसान की अपनी सोच आमने-सामने आती है। फिल्म की शुरुआत जितनी दिलचस्पी जगाती है, उतना ही सवाल भी छोड़ती है कि जंगल के अंदर आखिर है क्या? अच्छी बात यह है कि फिल्म काफी देर तक इस सवाल को जिंदा रखती है, बस बाद में जब जवाब मिलने शुरू होते हैं तो कुछ रहस्य उतने रहस्यमयी नहीं रह जाते। फिल्म की कहानी कैसी है कहानी ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की है, जो अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ बिहार के पुश्तैनी गांव आता है। शहर में पले ऋषि के लिए गांव और उसकी मान्यताएं पुरानी सोच का हिस्सा हैं। दोनों का अपना पारिवारिक दर्द भी है और छठ के लिए घर लौटने का रिश्ता भी। गांव के पास एक जंगल है, जिसके बीच वन देवी का मंदिर है। स्थानीय लोककथा के मुताबिक सूर्यास्त के बाद इस जंगल में जाना मना है। फिल्म की प्रेरणा बिहार के बिहटा स्थित वन देवी मंदिर से जुड़ी इसी लोककथा से ली गई है, जहां जंगल और देवी को लेकर पीढ़ियों से कई मान्यताएं चली आ रही हैं। ऋषि इन बातों को नहीं मानता। इसी बीच जंगल को लेकर विकास और प्रकृति के बीच खींचतान सामने आती है, लेकिन जब ऋषि जंगल में पहुंचता है और एक पुरानी मुहर टूटने के बाद अलौकिक ताकत जागती है, तब उसकी अपनी सोच भी सवालों के घेरे में आ जाती है। पहला हिस्सा यहीं सबसे ज्यादा पकड़ बनाता है। गांव का माहौल, रिश्ते, हल्का हास्य और जंगल का रहस्य साथ-साथ चलते हैं। लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी प्रकृति और जमीन के सवाल से निकलकर सीधे अच्छाई बनाम बुराई की बड़ी लड़ाई की तरफ बढ़ जाती है। इससे शुरुआत में बना वह जमीन से जुड़ा संघर्ष थोड़ा पीछे छूटता है। कहानी में विचार कम नहीं हैं, बस कुछ विचारों को पूरी तरह खुलने का मौका नहीं मिलता। फिल्म में एक्टिंग कैसी है सिद्धार्थ मल्होत्रा ऋषि के किरदार में एक्शन के साथ भावनात्मक बदलाव भी संभालते हैं। उनका अविश्वास धीरे-धीरे विश्वास में बदलता है, हालांकि इस बदलाव को थोड़ा और समय मिलता तो किरदार और गहराता। तमन्ना भाटिया सहज लगती हैं और सिद्धार्थ के साथ उनकी पति-पत्नी वाली केमिस्ट्री फिल्म के फैंटेसी हिस्से को मानवीय आधार देती है। उनके किरदार में संभावनाएं हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें पूरी तरह इस्तेमाल नहीं करता। सुनील ग्रोवर फिल्म का अच्छा सरप्राइज हैं। गंभीर किरदार में उनका अंदाज अलग लगता है और उनकी कहानी खुलने के साथ उत्सुकता बढ़ती है। मनीष पॉल पहले हिस्से में हंसी और हल्कापन लाते हैं। श्वेता तिवारी और अनूप सोनी भी अपने किरदारों में ठीक बैठते हैं। फिल्म का निर्देशन कैसा है निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उन्होंने बिहार की एक कम सुनी गई लोककथा को सिर्फ डर की कहानी नहीं बनाया। इसमें परिवार है, प्रकृति है, आस्था है, विकास का सवाल है और फैंटेसी भी है। दिक्कत बस यही है कि इतनी सारी चीजों को साथ लेकर चलने की कोशिश में स्क्रीनप्ले कभी-कभी खुद अपनी रफ्तार से आगे निकल जाता है। शुरुआत में जो रहस्य धीरे-धीरे बनता है, बाद में उसके कई जवाब जल्दी मिल जाते हैं। कुछ चीजें अगर थोड़ी देर और छिपी रहतीं तो जंगल का रोमांच और टिक सकता था। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की बड़ी ताकत है। जंगल की हरियाली, धुंध, अंधेरा और रोशनी मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं कि कई बार जंगल खुद कहानी का किरदार लगता है। प्रोडक्शन डिजाइन में बिहार की मिट्टी और गांव की पहचान बनी रहती है। रहस्यमयी जीवों और पुराने घटनाक्रम को समझाने वाला एनीमेशन भी फिल्म का दिलचस्प प्रयोग है। वीएफएक्स में पैमाना बड़ा रखा गया है। कुछ दृश्य शानदार लगते हैं, जबकि कुछ जगह कंप्यूटर से बने हिस्से उतने सहज नहीं बैठते। बड़े पर्दे पर फिल्म का स्केल जरूर दिखाई देता है। फिल्म का म्यूजिक कैसा है ‘समझो ना’ कहानी के रोमांटिक हिस्से को जगह देता है, जबकि ‘ठुमक ठुमक’ माहौल में मस्ती भरता है। लेकिन सबसे ज्यादा फिल्म की जड़ों से जुड़ता है ‘छठी मइया’। छठ के घाट, अर्घ्य और भक्ति वाला माहौल फिल्म को बिहार की संस्कृति से जोड़ता है। हां, यहां सिनेमा ने अपनी थोड़ी आजादी भी ली है—कुछ दृश्य असली छठ की सादगी से ज्यादा फिल्मी और सजाए हुए लगते हैं। असल छठ चार दिन की साधना, व्रत, अनुशासन और डूबते-उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा पर टिका है; फिल्म उसका भाव पकड़ती है, हर बारीकी नहीं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘द वन’ एक देसी फैंटेसी एडवेंचर है, जो बिहार की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्यमयी जंगल को अपनी दुनिया का आधार बनाती है। फिल्म का माहौल, सिनेमैटोग्राफी और कलाकार इसे देखने लायक बनाते हैं। दूसरे हिस्से में कहानी कुछ जानी-पहचानी राह पकड़ती है, लेकिन अपनी मिट्टी से जुड़ी दुनिया और बड़े पर्दे का स्केल इसका असर बनाए रखते हैं। रास्ता हर जगह बराबर मजबूत नहीं है, लेकिन ‘द वन’ की दुनिया में कदम रखना एक दिलचस्प सिनेमाई अनुभव जरूर है।
'द वन'- मूवी रिव्यू:वन देवी की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्य से भरी कहानी, जंगल में छिपा है कौन सा राज?

हमारे देश में कहानियों की कोई कमी नहीं है, कमी है उन्हें बड़े पर्दे पर नए अंदाज में सुनाने की। ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ बिहार की मिट्टी से निकली ऐसी ही एक लोककथा को लेकर आती है, जहां वन देवी, रहस्यमयी जंगल, छठी मइया की आस्था और इंसान की अपनी सोच आमने-सामने आती है। फिल्म की शुरुआत जितनी दिलचस्पी जगाती है, उतना ही सवाल भी छोड़ती है कि जंगल के अंदर आखिर है क्या? अच्छी बात यह है कि फिल्म काफी देर तक इस सवाल को जिंदा रखती है, बस बाद में जब जवाब मिलने शुरू होते हैं तो कुछ रहस्य उतने रहस्यमयी नहीं रह जाते। फिल्म की कहानी कैसी है कहानी ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की है, जो अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ बिहार के पुश्तैनी गांव आता है। शहर में पले ऋषि के लिए गांव और उसकी मान्यताएं पुरानी सोच का हिस्सा हैं। दोनों का अपना पारिवारिक दर्द भी है और छठ के लिए घर लौटने का रिश्ता भी। गांव के पास एक जंगल है, जिसके बीच वन देवी का मंदिर है। स्थानीय लोककथा के मुताबिक सूर्यास्त के बाद इस जंगल में जाना मना है। फिल्म की प्रेरणा बिहार के बिहटा स्थित वन देवी मंदिर से जुड़ी इसी लोककथा से ली गई है, जहां जंगल और देवी को लेकर पीढ़ियों से कई मान्यताएं चली आ रही हैं। ऋषि इन बातों को नहीं मानता। इसी बीच जंगल को लेकर विकास और प्रकृति के बीच खींचतान सामने आती है, लेकिन जब ऋषि जंगल में पहुंचता है और एक पुरानी मुहर टूटने के बाद अलौकिक ताकत जागती है, तब उसकी अपनी सोच भी सवालों के घेरे में आ जाती है। पहला हिस्सा यहीं सबसे ज्यादा पकड़ बनाता है। गांव का माहौल, रिश्ते, हल्का हास्य और जंगल का रहस्य साथ-साथ चलते हैं। लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी प्रकृति और जमीन के सवाल से निकलकर सीधे अच्छाई बनाम बुराई की बड़ी लड़ाई की तरफ बढ़ जाती है। इससे शुरुआत में बना वह जमीन से जुड़ा संघर्ष थोड़ा पीछे छूटता है। कहानी में विचार कम नहीं हैं, बस कुछ विचारों को पूरी तरह खुलने का मौका नहीं मिलता। फिल्म में एक्टिंग कैसी है सिद्धार्थ मल्होत्रा ऋषि के किरदार में एक्शन के साथ भावनात्मक बदलाव भी संभालते हैं। उनका अविश्वास धीरे-धीरे विश्वास में बदलता है, हालांकि इस बदलाव को थोड़ा और समय मिलता तो किरदार और गहराता। तमन्ना भाटिया सहज लगती हैं और सिद्धार्थ के साथ उनकी पति-पत्नी वाली केमिस्ट्री फिल्म के फैंटेसी हिस्से को मानवीय आधार देती है। उनके किरदार में संभावनाएं हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें पूरी तरह इस्तेमाल नहीं करता। सुनील ग्रोवर फिल्म का अच्छा सरप्राइज हैं। गंभीर किरदार में उनका अंदाज अलग लगता है और उनकी कहानी खुलने के साथ उत्सुकता बढ़ती है। मनीष पॉल पहले हिस्से में हंसी और हल्कापन लाते हैं। श्वेता तिवारी और अनूप सोनी भी अपने किरदारों में ठीक बैठते हैं। फिल्म का निर्देशन कैसा है निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उन्होंने बिहार की एक कम सुनी गई लोककथा को सिर्फ डर की कहानी नहीं बनाया। इसमें परिवार है, प्रकृति है, आस्था है, विकास का सवाल है और फैंटेसी भी है। दिक्कत बस यही है कि इतनी सारी चीजों को साथ लेकर चलने की कोशिश में स्क्रीनप्ले कभी-कभी खुद अपनी रफ्तार से आगे निकल जाता है। शुरुआत में जो रहस्य धीरे-धीरे बनता है, बाद में उसके कई जवाब जल्दी मिल जाते हैं। कुछ चीजें अगर थोड़ी देर और छिपी रहतीं तो जंगल का रोमांच और टिक सकता था। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की बड़ी ताकत है। जंगल की हरियाली, धुंध, अंधेरा और रोशनी मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं कि कई बार जंगल खुद कहानी का किरदार लगता है। प्रोडक्शन डिजाइन में बिहार की मिट्टी और गांव की पहचान बनी रहती है। रहस्यमयी जीवों और पुराने घटनाक्रम को समझाने वाला एनीमेशन भी फिल्म का दिलचस्प प्रयोग है। वीएफएक्स में पैमाना बड़ा रखा गया है। कुछ दृश्य शानदार लगते हैं, जबकि कुछ जगह कंप्यूटर से बने हिस्से उतने सहज नहीं बैठते। बड़े पर्दे पर फिल्म का स्केल जरूर दिखाई देता है। फिल्म का म्यूजिक कैसा है ‘समझो ना’ कहानी के रोमांटिक हिस्से को जगह देता है, जबकि ‘ठुमक ठुमक’ माहौल में मस्ती भरता है। लेकिन सबसे ज्यादा फिल्म की जड़ों से जुड़ता है ‘छठी मइया’। छठ के घाट, अर्घ्य और भक्ति वाला माहौल फिल्म को बिहार की संस्कृति से जोड़ता है। हां, यहां सिनेमा ने अपनी थोड़ी आजादी भी ली है—कुछ दृश्य असली छठ की सादगी से ज्यादा फिल्मी और सजाए हुए लगते हैं। असल छठ चार दिन की साधना, व्रत, अनुशासन और डूबते-उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा पर टिका है; फिल्म उसका भाव पकड़ती है, हर बारीकी नहीं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘द वन’ एक देसी फैंटेसी एडवेंचर है, जो बिहार की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्यमयी जंगल को अपनी दुनिया का आधार बनाती है। फिल्म का माहौल, सिनेमैटोग्राफी और कलाकार इसे देखने लायक बनाते हैं। दूसरे हिस्से में कहानी कुछ जानी-पहचानी राह पकड़ती है, लेकिन अपनी मिट्टी से जुड़ी दुनिया और बड़े पर्दे का स्केल इसका असर बनाए रखते हैं। रास्ता हर जगह बराबर मजबूत नहीं है, लेकिन ‘द वन’ की दुनिया में कदम रखना एक दिलचस्प सिनेमाई अनुभव जरूर है।
बॉलीवुड एक्टर यशपाल शर्मा का भाई रिश्वत लेते अरेस्ट:हिसार ACB ने ₹3 हजार लेते रंगेहाथ पकड़ा; 2 दिन बाद प्रमोशन होना था

हिसार में बॉलीवुड एक्टर यशपाल शर्मा का भाई राजेश कुमार रिश्वत कांड में फंस गया है। उसे 3 हजार रुपए की रिश्वत लेते अरेस्ट किया गया है। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने गुरुवार को उसे रंगे हाथ पकड़ा। अधिकारियों का कहना है कि राजेश ने राजगढ़-चंडीगढ़ हाईवे के पास एग्रीकल्चर लैंड पर कॉलोनी के लिए नहर के पानी की व्यवस्था के संबंध में रिश्वत मांगी थी। राजेश कुमार सिंचाई विभाग में असिस्टेंट रेवेन्यू क्लर्क (ARC) है। बताया जा रहा है कि 2 दिन बाद उनका प्रमोशन होने वाला था। वहीं, राजेश के भाई घनश्याम शर्मा ने दैनिक भास्कर से बातचीत में दावा कि उसने रिश्वत नहीं ली थी। वो सरकारी फीस थी, उसकी रसीद भी दी जाती है। इधर, ACB ने गिरफ्तारी की पुष्टि करते हुए राजेश की अरेस्टिंग का एक फोटो भी जारी किया है। जानिए, ट्रैप लगाकर कैसे पकड़ा गया आरोपी एक-दो दिन में प्रमोशन होने वाला था बताया जा रहा है कि राजेश शर्मा सिंचाई विभाग में एआरसी पद पर तैनात हैं। उनका एक-दो दिन में प्रमोशन होने वाला था और इसके ऑर्डर भी जारी हो चुके थे। इसी बीच वह रिश्वत के मामले में गिरफ्तार हो गया। सूत्रों के मुताबिक, देर रात तक एसीबी की टीम मामले की जांच में जुटी थी। राजेश शर्मा को ऑफिस में बैठाकर पूछताछ की गई। भाई बोले- हमें भी नहीं जाने दिया यशपाल शर्मा के दूसरे भाई घनश्याम शर्मा ने बताया कि जब उन्हें पता चला कि उनके भाई को किसी केस में पकड़ा गया है। इसके बाद वे ऑफिस पहुंचे, लेकिन उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। उन्होंने कहा कि भाई राजेश को फंसाया जा रहा है। राजेश ने चालान के लिए फीस मांगी थी, जिसकी बाकायदा रसीद भी दी जाती है। यहां जानिए, कौन हैं यशपाल शर्मा हिसार में जन्म: यशपाल शर्मा का जन्म 1 जनवरी 1967 को हिसार में हुआ था। उनके पिता PWD में चपरासी थे। सात भाई-बहनों के परिवार में आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। परिवार की आर्थिक तंगी के चलते उन्होंने कम उम्र में काम शुरू कर दिया। गाय-बकरियां चराने, गोबर के उपले बनाने, खेत जोतने, पंचर लगाने और चक्की पर आटा पीसने तक का काम किया। रामलीला से एक्टिंग तक: यशपाल ने कॉलेज के दौरान रामलीला और नाटकों में अभिनय शुरू किया। NSD में चयन के लिए उन्हें तीन बार रिजेक्शन मिला। चौथी कोशिश में NSD में उनका चयन हुआ। तीन साल NSD और दो साल रेपेट्री में काम करने के बाद टीवी से उन्होंने करिअर की शुरुआत की।
25 सितंबर के करेंट अफेयर्स:रक्षा मंत्रालय ने ₹810 करोड़ के सैटेलाइट वेपन की डील की, भारत को एमी अवार्ड्स में दो नॉमिनेशन मिले

आज के प्रमुख करेंट अफेयर्स, जो सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स के लिए जरूरी हैं- नेशनल (NATIONAL) 1. रक्षा मंत्रालय ने 160 सैटेलाइट स्मार्ट एंटी-एयरफील्ड वेपन की डील की इंटरनेशनल (INTERNATIONAL) 2. एमी अवार्ड्स नॉमिनेशन में भारत को 2 नॉमिनेशन मिले स्पोर्ट्स (SPORTS) 3. पुणे में होगी रोड वर्ल्ड चैंपियनशिप मिसलीनियस 4. दिल्ली में ‘दुर्गा योजना’ को मंजूरी मिली 5. अहमदाबाद में अंबेडकर म्यूजियम और ई-लाइब्रेरी शुरू हुई आज का इतिहास ——————– ये खबर भी पढ़ें.. 24 सितंबर के करेंट अफेयर्स:पंजाब की पांच सहकारी चीनी मिलों को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, लावणी क्वीन शकुंतला नगरकर का निधन आज के प्रमुख करेंट अफेयर्स, जो सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स के लिए जरूरी हैं-पूरी खबर पढ़ें..
बॉलीवुड एक्टर यशपाल शर्मा का भाई रिश्वत लेते अरेस्ट:हिसार ACB ने ₹3 हजार लेते रंगेहाथ दबोचा; 2 दिन बाद प्रमोशन होना था

हिसार में बॉलीवुड एक्टर यशपाल शर्मा का भाई राजेश कुमार रिश्वत कांड में फंस गया है। उसे 3 हजार रुपए की रिश्वत लेते अरेस्ट किया गया है। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने गुरुवार को उसे रंगे हाथ पकड़ा। अधिकारियों का कहना है कि राजेश ने राजगढ़-चंडीगढ़ हाईवे के पास एग्रीकल्चर लैंड पर कॉलोनी के लिए नहर के पानी की व्यवस्था के संबंध में रिश्वत मांगी थी। राजेश कुमार सिंचाई विभाग में असिस्टेंट रेवेन्यू क्लर्क (ARC) है। बताया जा रहा है कि 2 दिन बाद उनका प्रमोशन होने वाला था। वहीं, राजेश के भाई घनश्याम शर्मा ने दैनिक भास्कर से बातचीत में दावा कि उसने रिश्वत नहीं ली थी। वो सरकारी फीस थी, उसकी रसीद भी दी जाती है। इधर, ACB ने गिरफ्तारी की पुष्टि करते हुए राजेश की अरेस्टिंग का एक फोटो भी जारी किया है। जानिए, ट्रैप लगाकर कैसे पकड़ा गया आरोपी सिंचाई व्यवस्था के लिए रिश्वत मांगी: ACB से जुड़े सूत्रों का कहना है कि एक कॉलोनी में सिंचाई व्यवस्था कराने के बदले शिकायतकर्ता से रिश्वत मांगी गई थी। शिकायत मिलते ही टीम ने पहले रिश्वत मांगने के आरोपों की पुष्टि की। इसके बाद आरोपी को पकड़ने के लिए ट्रैप लगाया। ₹3 हजार देकर राजेश के पास भेजा: एसीबी अधिकारियों का कहना है कि शिकायतकर्ता को 3 हजार रुपए देकर आरोपी के पास भेजा गया। जैसे ही राजेश कुमार ने शिकायतकर्ता से रुपए लिए, टीम ने मौके पर पहुंचकर उसे रंगे हाथ पकड़ लिया। हिसार में केस दर्ज किया: ACB अधिकारियों का कहना है कि राजेश के पास से रिश्वत के 3 हजार रुपए भी बरामद कर लिए गए। एसीबी ने आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत हिसार में केस दर्ज किया है। मामले में आरोपी से पूछताछ की जा रही है और आगे की जांच जारी है। एक-दो दिन में प्रमोशन होने वाला था बताया जा रहा है कि राजेश शर्मा सिंचाई विभाग में एआरसी पद पर तैनात हैं। उनका एक-दो दिन में प्रमोशन होने वाला था और इसके ऑर्डर भी जारी हो चुके थे। इसी बीच वह रिश्वत के मामले में गिरफ्तार हो गया। सूत्रों के मुताबिक, देर रात तक एसीबी की टीम मामले की जांच में जुटी थी। राजेश शर्मा को ऑफिस में बैठाकर पूछताछ की गई। भाई बोले- हमें भी नहीं जाने दिया यशपाल शर्मा के दूसरे भाई घनश्याम शर्मा ने बताया कि जब उन्हें पता चला कि उनके भाई को किसी केस में पकड़ा गया है। इसके बाद वे ऑफिस पहुंचे, लेकिन उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। उन्होंने कहा कि भाई राजेश को फंसाया जा रहा है। राजेश ने चालान के लिए फीस मांगी थी, जिसकी बाकायदा रसीद भी दी जाती है। यहां जानिए, कौन हैं यशपाल शर्मा हिसार में जन्म: यशपाल शर्मा का जन्म 1 जनवरी 1967 को हिसार में हुआ था। उनके पिता PWD में चपरासी थे। सात भाई-बहनों के परिवार में आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। परिवार की आर्थिक तंगी के चलते उन्होंने कम उम्र में काम शुरू कर दिया। गाय-बकरियां चराने, गोबर के उपले बनाने, खेत जोतने, पंचर लगाने और चक्की पर आटा पीसने तक का काम किया। रामलीला से एक्टिंग तक: यशपाल ने कॉलेज के दौरान रामलीला और नाटकों में अभिनय शुरू किया। NSD में चयन के लिए उन्हें तीन बार रिजेक्शन मिला। चौथी कोशिश में NSD में उनका चयन हुआ। तीन साल NSD और दो साल रेपेट्री में काम करने के बाद टीवी से उन्होंने करिअर की शुरुआत की।









