Monday, 21 Sep 2026 | 04:46 PM

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पहलाज निहलानी का 76 साल की उम्र में निधन:शोला और शबनम, आंखें जैसी बेहतरीन फिल्में बनाईं, कभी खून की उल्टी होने की शिकायत थी

पहलाज निहलानी का 76 साल की उम्र में निधन:शोला और शबनम, आंखें जैसी बेहतरीन फिल्में बनाईं, कभी खून की उल्टी होने की शिकायत थी

डायरेक्टर- प्रोड्यूसर और CBFC (सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) के अध्यक्ष रहे पहलाज निहलानी का 76 साल की उम्र में निधन हो गया है। वह कई दिनों से बीमार थे। खबर लगातार अपडेट हो रही है पहलाज निहलानी की पॉपुलर फिल्में पहलाज निहलानी फिल्म प्रोड्यूसर हैं। उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा- रीना रॉय स्टारर ‘हथकड़ी’ (1982), गोविंदा- दिव्या भारती स्टारर ‘शोला और शबनम’ (1992), गोविंदा-चंकी पांडे स्टारर ‘आंखें’ (1993), अनिल कपूर- करिश्मा कपूर स्टारर ‘अंदाज’ (1994), अक्षय कुमार-करीना कपूर स्टारर ‘तलाश’ (2003), राय लक्ष्मी स्टारर ‘जूली 2’ (2017) और गोविंदा स्टारर ‘रंगीला राजा’ (2019) जैसी फिल्में बनाई हैं।

पहलाज निहलानी का 76 साल की उम्र में निधन:शोला और शबनम, आंखें जैसी बेहतरीन फिल्में बनाईं, गोविंदा को मानते थे इनसिक्योर

पहलाज निहलानी का 76 साल की उम्र में निधन:शोला और शबनम, आंखें जैसी बेहतरीन फिल्में बनाईं, गोविंदा को मानते थे इनसिक्योर

डायरेक्टर- प्रोड्यूसर और CBFC (सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) के अध्यक्ष रहे पहलाज निहलानी का 76 साल की उम्र में निधन हो गया है। वह कई दिनों से बीमार थे, उन्हें किडनी से संबंधित दिक्कतें थीं। खबर लगातार अपडेट हो रही है पहलाज निहलानी की पॉपुलर फिल्में पहलाज निहलानी फिल्म प्रोड्यूसर हैं। उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा- रीना रॉय स्टारर ‘हथकड़ी’ (1982), गोविंदा- दिव्या भारती स्टारर ‘शोला और शबनम’ (1992), गोविंदा-चंकी पांडे स्टारर ‘आंखें’ (1993), अनिल कपूर- करिश्मा कपूर स्टारर ‘अंदाज’ (1994), अक्षय कुमार-करीना कपूर स्टारर ‘तलाश’ (2003), राय लक्ष्मी स्टारर ‘जूली 2’ (2017) और गोविंदा स्टारर ‘रंगीला राजा’ (2019) जैसी फिल्में बनाई हैं। 2015-17 तक CBFC के चीफ रहे, कई आरोप लगे पहलाज निहलानी 2015 से 2017 तक CBFC के चीफ रहे हैं। कई लोगों ने उन पर फिल्मों से हिंसक और इंटिमेट सीन बेवजह छोटे करने के आरोप लगाए थे और इसके चलते उनका कार्यकाल विवादित रहा था। जेम्स बॉन्ड सीरीज की फिल्म ‘स्पेक्टर’ से किसिंग सीन को छोटा कराने पर सोशल मीडिया पर उनकी खूब आलोचना हुई थी। निहलानी ने शाहिद कपूर स्टार ‘उड़ता पंजाब’ में कथित तौर पर 69 कट लगाने के लिए कहा था, जो काफी चर्चा में रहा था। बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने CBFC के फैसले को गलत बताया और फिल्म सिर्फ एक कट के साथ रिलीज हुई थी। 2017 में सरकार ने उन्हें हटाकर गीतकार प्रसून जोशी को CBFC का नया चेयरमैन बनाया था। खून की उल्टियां होने पर, 5 साल पहले 29 दिनों तक एडमिट रहे थे पहलाज निहलानी को 5 साल पहले खून की उल्टियां हुई थीं, जिसके बाद वो 28 दिनों तक मुंबई के नानावटी अस्पातल में भर्ती रहे थे। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, “एक रात अचानक से 3 बजे मुझे बेचैनी होने लगी और खून की उल्टियां भी हुईं। मुझे अस्पताल में भर्ती होने की सलाह दी गई। यह क्रोनिक फूड पॉइजनिंग का मामला था। लेकिन इमरजेंसी थी। शुरुआत में मुझे 5-6 दिनों तक आईसीयू में भर्ती रखा गया।” “जब मैं आईसीयू से बाहर आया तो सोचा कि 2-3 दिन में मैं घर चला जाऊंगा। लेकिन लंबे समय तक मेरा टेम्प्रेचर कम नहीं हुआ। मुझे बुखार आ रहा था और शाम के वक्त पेट में भी बहुत दर्द हो रहा था। डायग्नोसिस बढ़ता गया और यह चिंता का विषय बन गया।” गोविंदा को दिया था करियर का पहला बड़ा ब्रेक पहलाज निहलानी ने ही गोविंदा को उनके करियर का पहला बड़ा ब्रेक दिया था। कुछ समय पहले ही उन्होंने लर्न फ्रॉम द लीजेंड के पॉडकास्ट में गोविंदा पर बात करते हुए कहा था, ‘फिल्म आंधी तूफान के बाद मैं मिथुन चक्रवर्ती और शत्रुघ्न के साथ एक फिल्म बनाना चाहता था। लेकिन उस समय मिथुन और शत्रुघ्न 4-4 शिफ्ट करते थे। इस वजह से हमारी नहीं बनी। फिर रीक्कू राकेश, गोविंदा को मेरे पास लेकर आए। फोटोग्राफ भी लेकर आए, लेकिन मुझे पसंद नहीं आए। उसका लुक पसंद नहीं आया।’ ‘अगले दिन वो मेरे पास वीडियो कैसेट लेकर आया, जिसमें उसके डांस थे। उस समय ब्रेक डांस माइकल जैक्सन की वजह से पॉपुलर थे। उसने मुझे कैसेट दिखाया, तो मैंने पूछा क्या-क्या आता है। मुझे उसका चेहरा पसंद नहीं था, लेकिन उसका डांस और एक्शन पसंद आया। मेरी स्टोरी पूरी एक्शन थी, तो मैंने उससे एक दिन मांगा। मैं लंदन जा रहा था, तो मैं उससे कहकर गया कि तुम अपनी तैयारी करो।’ आगे उन्होंने कहा, ‘लंदन में छुट्टियों के समय मैंने कहानी पूरी की। फिर मैंने उसमें डांस डाला। आज की डेट में उसके जितना टैलेंटेड कोई एक्टर नहीं है। हालांकि उस समय वो एडवोकेट के रोल में, इंसपेक्टर के रोल में फिट नहीं होता था, हाइट की वजह से। लेकिन अब वो स्टार हो गया, स्टार से तो कुछ भी करवा लो।’ गोविंदा के पास काम नहीं था, तो दी गई शोला और शबनम उसी पॉडकास्ट में पहलाज निहलानी ने आगे कहा, जब गोविंदा के पास काम नहीं था, ‘जब शोला और शबनम हमने शुरू की तो उससे पहली बार कॉमेडी रोल करवाया। फिर जब काम नहीं था उसके बाद तब फिल्म आंखें करवाई। दोनों फिल्मों में एकदम अलग रोल था।’ पहलाज निहलानी ने कहा था- गोविंदा इनसिक्योर है जब पहलाज निहलानी से पूछा गया कि क्या गोविंदा के नेगेटिव एटीट्यूड की वजह से कई प्रोड्यूसर और डायरेक्टर उनके साथ काम नहीं करना चाहते थे, तो इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘जब सक्सेस मिलती है, तो आदमी हर दर्द सह लेता है, लेकिन जब सक्सेस की सीढ़ी से नीचे उतरते हैं तो तकलीफ होती है। गोविंदा में वो प्रॉब्लम शुरू से थी। क्योंकि वो खुद को इनसिक्योर मानता था।’ ‘उसके पिता बहुत बड़े हीरो रहे हैं महबूब खान के। बड़ी-बड़ी पिक्चरें की, अच्छे प्रोड्यूसर भी रहे, नुकसान हुआ। इसके बाद उसने इतना दर्द सहा, बहुत सारी चीजें उसके हाथ से निकल गईं, स्ट्रगल करना पड़ा। वो सारी चीजें उसके अंदर थीं। वो इनसिक्योरिटी रहती हैं। उसे था कि कहीं से पैसे आ जाएं। उसके पास भाई-बहन की जिम्मेदारियां थीं। वो पैसे में उलझा रहता था, उसे करना भी सब था।’ ‘इस वजह से उसका एटीट्यूड ऐसा हो गया था। जब काम और प्रेशर बहुत हो जाता है, तो आप छोड़ नहीं सके, तो चीजें बढ़ गईं। फिर आदत बन गई, वहमी हो गया। जब नहीं चलता आदमी तो सब उसे डैमेज करते हैं, वर्ना गोविंदा जैसा हीरो ढूंढने पर नहीं मिलेगा।’

शरद पवार की पोती की शादी लखानी परिवार में, बीजेपी-आरएसएस संबंधों पर बनी सुर्खियां | राजनीति समाचार

Sanju Samson (left) and Suryakumar Yadav (PTI Photo)

आखरी अपडेट:04 जून, 2026, 11:59 IST महाराष्ट्र के प्रमुख परिवारों के बीच गठबंधन को कथित तौर पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फड़नवीस द्वारा सुगम बनाया गया था, जो दोनों नागपुर से आते हैं। शरद पवार की पोती रेवती सुले और बीजेपी नेता अरुण लखानी के बेटे सारंग शादी के बंधन में बंधने वाले हैं। (एक्स) जैसा कि राजनीतिक हलकों में शरद पवार की पोती रेवती सुले और भाजपा नेता अरुण लखानी के बेटे सारंग की आगामी शादी पर चर्चा जारी है, नया ध्यान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा के साथ लखानी परिवार के लंबे समय से जुड़ाव की ओर गया है। दोनों परिवारों के बीच बढ़ती नजदीकियों को लेकर शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत के बार-बार तंज कसने के बीच भी इस घटनाक्रम को महत्व मिला है, खासकर तब जब आगामी चुनावों के लिए एमएलसी की भाजपा सूची में लखानी का नाम शामिल है। लखानी वर्धा-चंद्रपुर-गढ़चिरौली से चुनाव लड़ेंगे। सूत्रों की मानें तो महाराष्ट्र के दो प्रमुख परिवारों के बीच गठबंधन केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस द्वारा किया गया था, जो दोनों नागपुर से हैं और लखानी और पवार परिवारों के साथ लंबे समय से संबंध साझा करने के लिए जाने जाते हैं। कौन हैं अरुण लखानी? महाराष्ट्र के बुलढाणा जिले के मलकापुर से एमटेक स्नातक, अरुण लखानी आरएसएस परंपरा में गहराई से जुड़े परिवार से आते हैं। उनके पिता, जिन्होंने 1934 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से एमटेक की डिग्री हासिल की थी, सक्रिय रूप से संघ से जुड़े थे, जबकि उनके बड़े भाई वर्तमान में मलकापुर के संघचालक के रूप में कार्यरत हैं। लखानी 1999 से भाजपा से जुड़े हुए हैं और वर्तमान में भाजपा की महाराष्ट्र इकाई के संयुक्त कोषाध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं, यह पद उन्होंने दिसंबर 2023 में ग्रहण किया था। राजनीति से परे, उन्होंने खेल प्रशासन में प्रमुख भूमिका निभाई है। वह 2014 से महाराष्ट्र बैडमिंटन एसोसिएशन के अध्यक्ष, 2016 से भारतीय बैडमिंटन एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और 2022 से राष्ट्रीय निकाय के कोषाध्यक्ष हैं। उन्हें 2026 में महाराष्ट्र ओलंपिक एसोसिएशन का कोषाध्यक्ष भी नियुक्त किया गया था। लखानी सामाजिक और शैक्षिक पहलों में भी सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं। उन्होंने 2016 से 2026 तक आरएसएस से जुड़े लक्ष्मणराव मानकर ट्रस्ट के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। ट्रस्ट विदर्भ के आदिवासी क्षेत्रों में लगभग 1,000 एकल-शिक्षक स्कूल चलाता है और विभिन्न शैक्षिक आउटरीच कार्यक्रम चलाता है। इससे पहले, उन्होंने नरकेसरी प्रकाशन का नेतृत्व किया, जो नागपुर से मराठी दैनिक तरुण भारत प्रकाशित करता है। उन्होंने 1998 से 2003 तक साईं मंदिर, नागपुर के अध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया। आगामी शादी ने काफी राजनीतिक दिलचस्पी पैदा कर दी है, पर्यवेक्षकों ने कहा कि यह महाराष्ट्र के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों में से एक और संघ परिवार और भाजपा के साथ गहरे संगठनात्मक और वैचारिक संबंधों वाले परिवार को एक साथ लाता है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना जगह : नागपुर, भारत, भारत समाचार राजनीति शरद पवार की पोती की शादी लखानी परिवार में होने वाली है, बीजेपी-आरएसएस संबंधों पर चर्चा अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)शरद पवार की पोती की शादी(टी)रेवती सुले की शादी(टी)अरुण लखानी के बेटे सारंग(टी)लखानी परिवार आरएसएस लिंक(टी)बीजेपी महाराष्ट्र की राजनीति(टी)नितिन गडकरी की भूमिका(टी)देवेंद्र फड़नवीस नागपुर(टी)महाराष्ट्र के राजनीतिक परिवार

पंजाब-चंडीगढ़ में चढ़ेगा टेस्ट क्रिकेट का फीवर:6 जून को मुल्लांपुर में भारत-अफगानिस्तान का मैच, शुभमन गिल होंगे कप्तान; गंभीर पहुंचे नाडा साहिब

पंजाब-चंडीगढ़ में चढ़ेगा टेस्ट क्रिकेट का फीवर:6 जून को मुल्लांपुर में भारत-अफगानिस्तान का मैच, शुभमन गिल होंगे कप्तान; गंभीर पहुंचे नाडा साहिब

आईपीएल के मैच भले ही खत्म हो गए हैं, लेकिन क्रिकेट का रोमांच अभी बाकी है। 6 जून से न्यू चंडीगढ़ में भारत और अफगानिस्तान के बीच एकमात्र टेस्ट मैच खेला जाएगा। दोनों टीमें चंडीगढ़ पहुंच चुकी हैं और प्रैक्टिस जारी है। यह ऐतिहासिक मुकाबला पंजाब और देश के लिए काफी अहम माना जा रहा है। इससे पहले भारतीय टीम के हेड कोच गौतम गंभीर ने नाडा साहिब पहुंचकर माथा टेका और आशीर्वाद लिया। बता दें कि, यह मैच 2 वजहों से खास है। पहला मुल्लांपुर में बने स्टेडियम में पहली बार कोई टेस्ट मैच खेला जाएगा। ऐसे में पीसीए इसकी मेजबानी में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता। दूसरा शहर के युवा खिलाड़ी शुभमन गिल टीम इंडिया की कप्तानी करेंगे। वहीं, गुरनूर सिंह के लिए भी यह मुकाबला खास रहेगा। शुभमन ने हाल ही में आईपीएल में भी शानदार प्रदर्शन किया था। पिच क्यूरेटर से कोच की लंबी चर्चा भारत और अफगानिस्तान के बीच इससे पहले 2018 में एकमात्र टेस्ट मैच खेला गया था, जिसमें भारत जीती थी। उस समय टीम की कमान अजिंक्य रहाणे के हाथों में थी। हेड कोच गौतम गंभीर भी चंडीगढ़ पहुंच चुके हैं। उन्होंने पिच क्यूरेटर के साथ लंबी चर्चा की है। इसकी एक बड़ी वजह अफगानिस्तान का मजबूत स्पिन आक्रमण है। अफगान टीम के पास कई बेहतरीन स्पिनर मौजूद हैं। वहीं भारतीय टीम इस विभाग में थोड़ी कमजोर नजर आ रही है। रविचंद्रन अश्विन संन्यास ले चुके हैं, जबकि रविंद्र जडेजा टीम का हिस्सा नहीं हैं। अक्षर पटेल को भी टीम में जगह नहीं मिली है। हालांकि कुलदीप यादव और वाशिंगटन सुंदर टीम में शामिल हैं। हर्ष दुबे को पहली बार भारतीय टीम में मौका मिला है। मैच से जुड़ी यह 3 बातें भी ध्यान में रखिए:- 6 से 10 जून तक खेला जाएगा मैच: पीसीए सचिव गुरमीत सिंह मीत हेयर ने बताया कि 6 से 10 जून तक भारत और अफगानिस्तान के बीच टेस्ट मैच खेला जाएगा। उन्होंने कहा कि पहली बार मुल्लांपुर स्टेडियम को टेस्ट मैच की मेजबानी का मौका मिला है। यह भारत का 31वां और पंजाब का तीसरा टेस्ट वेन्यू होगा। 250 रुपए से शुरू टिकट: गुरमीत सिंह मीत हेयर ने खास तौर पर अभिभावकों से अपील की है कि वे गर्मी की छुट्टियों के दौरान बच्चों को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का अनुभव दिलाने के लिए स्टेडियम लेकर आएं। इससे बच्चों को अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को मैदान पर खेलते देखने का मौका मिलेगा। मैच के लिए टिकट की कीमत 250 रुपए से शुरू रखी गई है। एक टिकट पर दर्शक पांचों दिन मैच देख सकेंगे। वे चाहें तो पूरा दिन या किसी विशेष सत्र के दौरान भी स्टेडियम पहुंच सकते हैं। कप्तान होंगे शुभमन गिल, टीम में गुरनूर बराड़ भी: भारतीय टेस्ट टीम की कप्तानी पंजाब के स्टार बल्लेबाज शुभमन गिल करेंगे, जबकि पंजाब के ही गुरनूर बराड़ भी टीम का हिस्सा हैं। क्रिकेट प्रशंसकों से भारतीय टीम और पंजाब के खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाने के लिए बड़ी संख्या में स्टेडियम पहुंचने की अपील की गई है। देखिए मैच से जुड़ी PHOTOS:- स्पिन बॉलिंग कोच ने संभाली जिम्मेदारी भारत के स्पिन बॉलिंग कोच साईराज बहुतुले भी टीम से जुड़ चुके हैं और उन्होंने प्रैक्टिस सेशन में हिस्सा लिया। इससे पहले वह आईपीएल में पंजाब किंग्स के स्पिन बॉलिंग कोचिंग सेटअप का हिस्सा रहे हैं। वहीं गुरजपनीत सिंह, आकिब नबी, प्रिंस यादव, सारांश जैन, जीशान अंसारी और शिवांग कुमार नेट बॉलर के रूप में टीम इंडिया के साथ जुड़े हुए हैं।

सेंसेक्स में 100 अंक की बढ़त:74,400 पर कारोबार कर रहा, निफ्टी भी 50 अंक चढ़ा; ऑटो और फार्मा शेयर्स में ज्यादा खरीदारी

सेंसेक्स में 100 अंक की बढ़त:74,400 पर कारोबार कर रहा, निफ्टी भी 50 अंक चढ़ा; ऑटो और फार्मा शेयर्स में ज्यादा खरीदारी

शेयर बाजार में आज यानी 4 जून को बढ़त है। सेंसेक्स 100 अंक की बढ़त के साथ 74,400 पर कारोबार कर रहा है। निफ्टी में भी करीब 50 अंक की तेजी है, ये 23,400 के स्तर पर है। आज ऑटो, फार्मा और कंज्यूमर ड्यूरेबल में ज्यादा खरीदारी है। एशियाई बाजारों में भी आज गिरावट कल अमेरिकी बाजारों में गिरावट रही विदेशी निवेशकों ने कल 5,617 करोड़ के शेयर बेचे कल बाजार में रही थी गिरावट इससे पहले कल यानी 3 जून को शेयर बाजार में गिरावट रही थी। सेंसेक्स 303 अंक की गिरावट के साथ 74,346 पर बंद हुआ था। निफ्टी में भी 77 अंकों की गिरावट रही, ये 23,405 पर बंद हुआ था।

मूवी रिव्यू- पेड्डी:पहचान की लड़ाई को दमदार अंदाज में दिखाती है फिल्म, राम चरण के करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस, फर्स्ट हाफ स्लो, लेकिन कहानी असरदार

मूवी रिव्यू- पेड्डी:पहचान की लड़ाई को दमदार अंदाज में दिखाती है फिल्म, राम चरण के करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस, फर्स्ट हाफ स्लो, लेकिन कहानी असरदार

स्टार- 3.5/5 रनटाइम- 3 घंटे 8 मिनट कास्ट- राम चरण, जान्हवी कपूर, जगपति बाबू कई बार कुछ फिल्में कहानी से ज्यादा अपने जज्बातों के लिए याद रखी जाती हैं। पेड्डी भी ऐसी ही फिल्म है। यह सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की आवाज है जिनकी मौजूदगी तक सरकारी कागजों में दर्ज नहीं है। राम चरण और निर्देशक बुच्ची बाबू सना ने एक बड़े व्यावसायिक कैनवास पर पहचान, सम्मान और हक की लड़ाई को पेश करने की कोशिश की है। फिल्म हर मोड़ पर परफेक्ट नहीं है, लेकिन जब यह दिल पर वार करती है तो असर छोड़ जाती है। कैसी है फिल्म की कहानी? विजयनगरम जिले की पहाड़ियों के नीचे बसा एक गांव ऐसा है जिसका कोई सरकारी अस्तित्व नहीं है। वहां रहने वाले लोगों के पास पहचान नहीं, वोट देने का अधिकार नहीं और बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। पेड्डी इसी गांव का रहने वाला युवक है। वह गुड़ की फैक्ट्री में काम करता है और स्थानीय क्रिकेट मैचों में पैसे लेकर खेलने जाता है। गांव के बुजुर्ग अप्पलासूरी सालों से अपने गांव के लिए रेलवे स्टेशन की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज कोई नहीं सुनता। एक दर्दनाक घटना के बाद पेड्डी इस लड़ाई को अपना मिशन बना लेता है। क्रिकेट से शुरू हुआ उसका सफर कुश्ती और फिर एथलेटिक्स तक पहुंचता है। सवाल सिर्फ एक रेलवे स्टेशन का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे गांव को पहचान दिलाने का बन जाता है। पेड्डी इस लड़ाई को कैसे अंजाम देता है, यही फिल्म की मुख्य कहानी है। कैसी है स्टारकास्ट की एक्टिंग? राम चरण ने अपने करियर की सबसे परिपक्व और समर्पित परफॉर्मेंस दी है। उनका शारीरिक बदलाव, अलग बोली पर पकड़ और भावनात्मक दृश्यों में दिखाई गई ईमानदारी प्रभावित करती है। खासकर दूसरे हिस्से में उनका अभिनय कई जगह आंखें नम कर देता है। शिव राजकुमार सीमित लेकिन प्रभावी भूमिका में नजर आते हैं। उनके और राम चरण के बीच गुरु शिष्य वाला रिश्ता फिल्म की बड़ी ताकत बनकर उभरता है। जगपति बाबू ने अपने किरदार में भावनात्मक गहराई लाने की कोशिश की है। हालांकि कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा नाटकीय लगते हैं। जाह्नवी कपूर के हिस्से में ज्यादा कुछ करने को नहीं है। उनका किरदार कहानी के मुख्य मुद्दे से लगभग कटा हुआ महसूस होता है। एक मजबूत भूमिका बनने की संभावना थी, लेकिन लेखन ने उन्हें सिर्फ प्रेम कहानी तक सीमित कर दिया। कैसा है फिल्म का डायरेक्शन? बुच्ची बाबू सना की सबसे बड़ी ताकत भावनाओं को पर्दे पर जीवंत करना है। फिल्म का मूल विचार बेहद दमदार है और दूसरे हिस्से में निर्देशक इस विचार को मजबूती से पकड़कर रखते हैं। कुश्ती वाले दृश्य और अंतिम आधा घंटा फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है। हालांकि पहले हिस्से में कहानी कई बार भटकती है। रोमांस और कुछ व्यावसायिक मसाला दृश्य फिल्म की रफ्तार को धीमा करते हैं। तीन घंटे से ज्यादा की अवधि भी कुछ जगह महसूस होती है। तकनीकी पक्ष मजबूत है। रत्नवेलु की सिनेमैटोग्राफी गांव, खेल के मैदान और भावनात्मक दृश्यों को खूबसूरती से कैद करती है। प्रोडक्शन डिजाइन भी फिल्म को वास्तविकता के करीब रखता है। हालांकि कुछ दृश्य प्रभाव अपेक्षित स्तर के नहीं लगते। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? ए आर रहमान का संगीत फिल्म की आत्मा है। गाने कहानी का हिस्सा बनकर आते हैं और पृष्ठभूमि संगीत कई दृश्यों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। खासकर भावनात्मक और प्रेरणादायक दृश्यों में उनका काम फिल्म को ऊंचाई देता है। फाइनल वर्डिक्ट: फिल्म देखें या नहीं? पेड्डी एक ऐसी फिल्म है जो तर्क से ज्यादा भावनाओं के सहारे चलती है। इसमें कई कमियां हैं, कुछ सवाल भी अनुत्तरित रह जाते हैं, लेकिन फिल्म का दिल सही जगह पर है। राम चरण का शानदार अभिनय, दमदार क्लाइमैक्स और पहचान की लड़ाई पर आधारित भावनात्मक कहानी इसे देखने लायक बनाती है। अगर आपको खेल, संघर्ष और इंसानी जज्बातों से जुड़ी कहानियां पसंद हैं तो पेड्डी आपको निराश नहीं करेगी।

मूवी रिव्यू- पेड्डी:पहचान की लड़ाई को दमदार अंदाज में दिखाती है फिल्म, राम चरण के करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस, फर्स्ट हाफ स्लो, लेकिन कहानी असरदार

मूवी रिव्यू- पेड्डी:पहचान की लड़ाई को दमदार अंदाज में दिखाती है फिल्म, राम चरण के करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस, फर्स्ट हाफ स्लो, लेकिन कहानी असरदार

स्टार- 3.5/5 रनटाइम- 3 घंटे 8 मिनट कास्ट- राम चरण, जान्हवी कपूर, जगपति बाबू कई बार कुछ फिल्में कहानी से ज्यादा अपने जज्बातों के लिए याद रखी जाती हैं। पेड्डी भी ऐसी ही फिल्म है। यह सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की आवाज है जिनकी मौजूदगी तक सरकारी कागजों में दर्ज नहीं है। राम चरण और निर्देशक बुच्ची बाबू सना ने एक बड़े व्यावसायिक कैनवास पर पहचान, सम्मान और हक की लड़ाई को पेश करने की कोशिश की है। फिल्म हर मोड़ पर परफेक्ट नहीं है, लेकिन जब यह दिल पर वार करती है तो असर छोड़ जाती है। कैसी है फिल्म की कहानी? विजयनगरम जिले की पहाड़ियों के नीचे बसा एक गांव ऐसा है जिसका कोई सरकारी अस्तित्व नहीं है। वहां रहने वाले लोगों के पास पहचान नहीं, वोट देने का अधिकार नहीं और बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। पेड्डी इसी गांव का रहने वाला युवक है। वह गुड़ की फैक्ट्री में काम करता है और स्थानीय क्रिकेट मैचों में पैसे लेकर खेलने जाता है। गांव के बुजुर्ग अप्पलासूरी सालों से अपने गांव के लिए रेलवे स्टेशन की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज कोई नहीं सुनता। एक दर्दनाक घटना के बाद पेड्डी इस लड़ाई को अपना मिशन बना लेता है। क्रिकेट से शुरू हुआ उसका सफर कुश्ती और फिर एथलेटिक्स तक पहुंचता है। सवाल सिर्फ एक रेलवे स्टेशन का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे गांव को पहचान दिलाने का बन जाता है। पेड्डी इस लड़ाई को कैसे अंजाम देता है, यही फिल्म की मुख्य कहानी है। कैसी है स्टारकास्ट की एक्टिंग? राम चरण ने अपने करियर की सबसे परिपक्व और समर्पित परफॉर्मेंस दी है। उनका शारीरिक बदलाव, अलग बोली पर पकड़ और भावनात्मक दृश्यों में दिखाई गई ईमानदारी प्रभावित करती है। खासकर दूसरे हिस्से में उनका अभिनय कई जगह आंखें नम कर देता है। शिव राजकुमार सीमित लेकिन प्रभावी भूमिका में नजर आते हैं। उनके और राम चरण के बीच गुरु शिष्य वाला रिश्ता फिल्म की बड़ी ताकत बनकर उभरता है। जगपति बाबू ने अपने किरदार में भावनात्मक गहराई लाने की कोशिश की है। हालांकि कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा नाटकीय लगते हैं। जाह्नवी कपूर के हिस्से में ज्यादा कुछ करने को नहीं है। उनका किरदार कहानी के मुख्य मुद्दे से लगभग कटा हुआ महसूस होता है। एक मजबूत भूमिका बनने की संभावना थी, लेकिन लेखन ने उन्हें सिर्फ प्रेम कहानी तक सीमित कर दिया। कैसा है फिल्म का डायरेक्शन? बुच्ची बाबू सना की सबसे बड़ी ताकत भावनाओं को पर्दे पर जीवंत करना है। फिल्म का मूल विचार बेहद दमदार है और दूसरे हिस्से में निर्देशक इस विचार को मजबूती से पकड़कर रखते हैं। कुश्ती वाले दृश्य और अंतिम आधा घंटा फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है। हालांकि पहले हिस्से में कहानी कई बार भटकती है। रोमांस और कुछ व्यावसायिक मसाला दृश्य फिल्म की रफ्तार को धीमा करते हैं। तीन घंटे से ज्यादा की अवधि भी कुछ जगह महसूस होती है। तकनीकी पक्ष मजबूत है। रत्नवेलु की सिनेमैटोग्राफी गांव, खेल के मैदान और भावनात्मक दृश्यों को खूबसूरती से कैद करती है। प्रोडक्शन डिजाइन भी फिल्म को वास्तविकता के करीब रखता है। हालांकि कुछ दृश्य प्रभाव अपेक्षित स्तर के नहीं लगते। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? ए आर रहमान का संगीत फिल्म की आत्मा है। गाने कहानी का हिस्सा बनकर आते हैं और पृष्ठभूमि संगीत कई दृश्यों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। खासकर भावनात्मक और प्रेरणादायक दृश्यों में उनका काम फिल्म को ऊंचाई देता है। फाइनल वर्डिक्ट: फिल्म देखें या नहीं? पेड्डी एक ऐसी फिल्म है जो तर्क से ज्यादा भावनाओं के सहारे चलती है। इसमें कई कमियां हैं, कुछ सवाल भी अनुत्तरित रह जाते हैं, लेकिन फिल्म का दिल सही जगह पर है। राम चरण का शानदार अभिनय, दमदार क्लाइमैक्स और पहचान की लड़ाई पर आधारित भावनात्मक कहानी इसे देखने लायक बनाती है। अगर आपको खेल, संघर्ष और इंसानी जज्बातों से जुड़ी कहानियां पसंद हैं तो पेड्डी आपको निराश नहीं करेगी।

पीएम को सलाह देने के सवाल पर मनोज बाजपेयी बोले:मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता, हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता होती है

पीएम को सलाह देने के सवाल पर मनोज बाजपेयी बोले:मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता, हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता होती है

फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ के प्रमोशन के दौरान अभिनेता मनोज बाजपेयी ने राजनीति और नेतृत्व से जुड़े सवाल पर संतुलित जवाब दिया। दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री को एक सलाह देनी हो तो वह क्या देंगे, तो उन्होंने कहा कि वह खुद को ऐसी स्थिति में नहीं मानते कि प्रधानमंत्री को कोई सलाह दे सकें। मनोज बाजपेयी ने कहा, “मैं प्रधानमंत्री को क्या सलाह दूंगा? मैं उस स्थिति में नहीं हूं। मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता हूं।” इससे स्पष्ट था कि वह राजनीतिक बहसों और टिप्पणियों से दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। बातचीत के दौरान मनोज ने कहा कि हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता का क्षेत्र होता है। उनका मानना है कि आर्थिक संकट, नीतिगत फैसले और देश चलाने जैसे मुद्दों पर फैसला लेने का काम उसी क्षेत्र के विशेषज्ञों का है। इंटरव्यू में 1991 के आर्थिक संकट और मौजूदा वैश्विक हालात पर सवाल पूछे जाने पर मनोज ने कहा कि ऐसे मामलों में आम आदमी या कलाकार की भूमिका सीमित होती है। अर्थव्यवस्था को संभालने और संकट से निकालने का काम विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं का है। मनोज ने कहा, “आपको पत्रकार की जिम्मेदारी निभानी आती है, मुझे अभिनेता की जिम्मेदारी निभानी आती है। इसके अलावा हम सिर्फ पढ़ सकते हैं और समझने की कोशिश कर सकते हैं कि देश और दुनिया में क्या हो रहा है।” उन्होंने बताया कि मुश्किल समय में आम लोग खर्च कम करके और आर्थिक रूप से सतर्क रहकर परिस्थितियों का सामना करते हैं। उनके मुताबिक, कई लोग भविष्य की अनिश्चितताओं को देखते हुए बड़े खर्चों से बच रहे हैं और बचत सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं। मनोज बाजपेयी का मानना है कि किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञता का सम्मान होना चाहिए। इसलिए वह राजनीतिक या आर्थिक फैसलों पर सार्वजनिक रूप से सलाह देने से बचते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने हमेशा अपने काम पर ध्यान दिया है और वही उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। वर्क फ्रंट पर मनोज बाजपेयी जल्द ही फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ में नजर आएंगे। फिल्म 1991 के आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि पर आधारित है और इसमें एक आरबीआई गवर्नर के सामने आने वाली चुनौतियों को दिखाया गया है। मनोज का कहना है कि यह सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, दबाव और कठिन परिस्थितियों में फैसले लेने की कहानी भी है। _________________________________ मनोज बाजपेयी का यह इंटरव्यू भी पढ़ें… आर्थिक संकट में देश संभालना बड़ी जिम्मेदारी:मनोज बाजपेयी बोले- आम आदमी खर्च नियंत्रित कर सकता है, लेकिन देश को संकट से एक्सपर्ट्स ही निकालते हैं 1991 के आर्थिक संकट पर बनी फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ को लेकर मनोज बाजपेयी ने दैनिक भास्कर से बातचीत की। उन्होंने कहा कि फिल्म में एक आरबीआई गवर्नर के देश की उम्मीद बनने और देश को संकट से निकालने की जंग दिखाई गई है। मनोज ने इसे ‘इकोनॉमिक थ्रिलर’ बताया। उन्होंने वैश्विक हालात, ईरान-यूएस तनाव, आम आदमी की परेशानियों, ओटीटी और थिएटर की कमी पर भी राय रखी।पूरा इंटरव्यू पढ़ें..

पीएम को सलाह देने के सवाल पर मनोज बाजपेयी बोले:मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता, हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता होती है

पीएम को सलाह देने के सवाल पर मनोज बाजपेयी बोले:मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता, हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता होती है

फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ के प्रमोशन के दौरान अभिनेता मनोज बाजपेयी ने राजनीति और नेतृत्व से जुड़े सवाल पर संतुलित जवाब दिया। दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री को एक सलाह देनी हो तो वह क्या देंगे, तो उन्होंने कहा कि वह खुद को ऐसी स्थिति में नहीं मानते कि प्रधानमंत्री को कोई सलाह दे सकें। मनोज बाजपेयी ने कहा, “मैं प्रधानमंत्री को क्या सलाह दूंगा? मैं उस स्थिति में नहीं हूं। मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता हूं।” इससे स्पष्ट था कि वह राजनीतिक बहसों और टिप्पणियों से दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। बातचीत के दौरान मनोज ने कहा कि हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता का क्षेत्र होता है। उनका मानना है कि आर्थिक संकट, नीतिगत फैसले और देश चलाने जैसे मुद्दों पर फैसला लेने का काम उसी क्षेत्र के विशेषज्ञों का है। इंटरव्यू में 1991 के आर्थिक संकट और मौजूदा वैश्विक हालात पर सवाल पूछे जाने पर मनोज ने कहा कि ऐसे मामलों में आम आदमी या कलाकार की भूमिका सीमित होती है। अर्थव्यवस्था को संभालने और संकट से निकालने का काम विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं का है। मनोज ने कहा, “आपको पत्रकार की जिम्मेदारी निभानी आती है, मुझे अभिनेता की जिम्मेदारी निभानी आती है। इसके अलावा हम सिर्फ पढ़ सकते हैं और समझने की कोशिश कर सकते हैं कि देश और दुनिया में क्या हो रहा है।” उन्होंने बताया कि मुश्किल समय में आम लोग खर्च कम करके और आर्थिक रूप से सतर्क रहकर परिस्थितियों का सामना करते हैं। उनके मुताबिक, कई लोग भविष्य की अनिश्चितताओं को देखते हुए बड़े खर्चों से बच रहे हैं और बचत सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं। मनोज बाजपेयी का मानना है कि किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञता का सम्मान होना चाहिए। इसलिए वह राजनीतिक या आर्थिक फैसलों पर सार्वजनिक रूप से सलाह देने से बचते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने हमेशा अपने काम पर ध्यान दिया है और वही उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। वर्क फ्रंट पर मनोज बाजपेयी जल्द ही फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ में नजर आएंगे। फिल्म 1991 के आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि पर आधारित है और इसमें एक आरबीआई गवर्नर के सामने आने वाली चुनौतियों को दिखाया गया है। मनोज का कहना है कि यह सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, दबाव और कठिन परिस्थितियों में फैसले लेने की कहानी भी है। _________________________________ मनोज बाजपेयी का यह इंटरव्यू भी पढ़ें… आर्थिक संकट में देश संभालना बड़ी जिम्मेदारी:मनोज बाजपेयी बोले- आम आदमी खर्च नियंत्रित कर सकता है, लेकिन देश को संकट से एक्सपर्ट्स ही निकालते हैं 1991 के आर्थिक संकट पर बनी फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ को लेकर मनोज बाजपेयी ने दैनिक भास्कर से बातचीत की। उन्होंने कहा कि फिल्म में एक आरबीआई गवर्नर के देश की उम्मीद बनने और देश को संकट से निकालने की जंग दिखाई गई है। मनोज ने इसे ‘इकोनॉमिक थ्रिलर’ बताया। उन्होंने वैश्विक हालात, ईरान-यूएस तनाव, आम आदमी की परेशानियों, ओटीटी और थिएटर की कमी पर भी राय रखी।पूरा इंटरव्यू पढ़ें..

4,399 दिन का मील का पत्थर: कैसे पीएम मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले निर्वाचित प्रधान मंत्री के रूप में नेहरू से आगे निकलने के लिए तैयार हैं | भारत समाचार

New Delhi: Firefighters at the site after a fire broke out at a bed-and-breakfast in a five-storey building (Photos: PTI)

आखरी अपडेट:04 जून, 2026, 01:07 IST यह परिवर्तन समकालीन शासन कला में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, जिसने भारत के सबसे चुनावी रूप से सफल प्रधान मंत्री के रूप में पीएम मोदी की स्थिति को मजबूत किया है। नेहरू के निर्वाचित रिकॉर्ड से परे पीएम मोदी का ऐतिहासिक उत्थान भारत की घरेलू नीति और इसके वैश्विक भू-राजनीतिक अभिविन्यास पर गहरा प्रभाव डालता है। फ़ाइल छवि/एएफपी एक ऐतिहासिक मील के पत्थर में, जो मूल रूप से भारत के आधुनिक राजनीतिक परिदृश्य को फिर से परिभाषित करता है, नरेंद्र मोदी देश के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले निर्वाचित प्रधान मंत्री बनने के लिए जवाहरलाल नेहरू के लंबे समय से चले आ रहे रिकॉर्ड को पार करने के लिए तैयार हैं। पीएम मोदी, जिन्होंने पहली बार 26 मई 2014 को पद की शपथ ली थी, और तब से लगातार उच्च-जनादेश वाली चुनावी जीत हासिल की है, 10 जून को कार्यालय में लगातार 4,399 दिन पूरे कर लेंगे। ऐसा करने पर, वह आधिकारिक तौर पर एक निर्वाचित नेता के रूप में नेहरू की संचयी अवधि को ग्रहण कर लेंगे, जो 4,398 दिनों की थी। यह परिवर्तन समकालीन शासन कला में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के इतिहास में सबसे अधिक चुनावी रूप से सफल प्रधान मंत्री के रूप में पीएम मोदी की स्थिति को मजबूत किया है। आसन्न मील का पत्थर भारत में निरंतर राजनीतिक स्थिरता और केंद्रीकृत शासन के एक दुर्लभ युग को रेखांकित करता है। दशकों तक, भारतीय नेतृत्व की दीर्घायु का संरचनात्मक मानदंड स्वतंत्रता के बाद के नेहरू-गांधी युग के मुकाबले मापा जाता था। जमीनी स्तर पर कल्याणकारी अर्थशास्त्र, मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल और एक विशिष्ट मुखर सांस्कृतिक आख्यान के अत्यधिक शक्तिशाली संयोजन के माध्यम से पारंपरिक राजनीतिक आधिपत्य को व्यवस्थित रूप से खत्म करके, नरेंद्र मोदी ने देश के लोकतांत्रिक लोकाचार को नया आकार दिया है। उनका प्रशासनिक मॉडल एक दशक से भी अधिक समय से बड़े पैमाने पर राजनीतिक पूंजी को बनाए रखने में कामयाब रहा है, और पारंपरिक सत्ता-विरोधी कारकों को प्रभावी ढंग से खारिज कर दिया है, जो आमतौर पर दुनिया भर में दीर्घकालिक लोकतांत्रिक प्रशासन को थका देते हैं। दीर्घायु की चुनावी गणना इस ऐतिहासिक परिवर्तन को समझने के लिए कुल कार्यकाल और निर्वाचित कार्यकाल के बीच विश्लेषणात्मक अंतर महत्वपूर्ण है। जवाहरलाल नेहरू आजादी के बाद लगभग 17 वर्षों तक देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद पर रहे, और 15 अगस्त, 1947 से अंतरिम सरकार के अनिर्वाचित प्रमुख के रूप में कार्य किया। हालाँकि, औपचारिक संवैधानिक ढांचे के तहत सीधे निर्वाचित नेता के रूप में उनकी स्थिति केवल 13 मई, 1952 को शुरू हुई, जब उन्होंने भारत के पहले लोकतांत्रिक आम चुनावों के बाद शपथ ली। वह निर्वाचित अध्याय 27 मई, 1964 को उनकी मृत्यु तक फैला रहा। इसके विपरीत, केंद्र सरकार के शीर्ष पर नरेंद्र मोदी के पूरे कार्यकाल को प्रत्यक्ष, बड़े पैमाने पर लोकप्रिय जनादेश का समर्थन प्राप्त रहा है। यह चुनावी लचीलापन भारतीय मतदाताओं तक शासन पहुंचाने के तरीके में मूलभूत परिवर्तन पर आधारित है। पिछले बारह वर्षों में, प्रशासन ने व्यवस्थित रूप से राजनीतिक प्रतिमान को स्वतंत्रता के बाद के दशकों की धीमी, वृद्धिशील प्रगति से तीव्र, प्रौद्योगिकी-संचालित विकास मैट्रिक्स में स्थानांतरित कर दिया है। मैक्रो-इंफ्रास्ट्रक्चर पर अभूतपूर्व पूंजी व्यय के साथ-साथ सैकड़ों-हजारों किलोमीटर उन्नत राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण और रेलवे नेटवर्क का पूर्ण आधुनिकीकरण – बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष-लाभ वाली कल्याणकारी पहलों को लागू करके, नरेंद्र मोदी ने एक अविश्वसनीय रूप से टिकाऊ, क्रॉस-सेक्शनल चुनावी गठबंधन बनाया है जो पारंपरिक जाति और क्षेत्रीय विभाजनों तक फैला हुआ है। एक संरचनात्मक और वैश्विक प्रतिमान बदलाव नेहरू के निर्वाचित रिकॉर्ड से परे पीएम मोदी का ऐतिहासिक उत्थान भारत की घरेलू नीति और इसके वैश्विक भू-राजनीतिक अभिविन्यास पर गहरा प्रभाव डालता है। नेहरू के प्रारंभिक नेतृत्व के तहत, भारत ने एक समाजवादी आर्थिक ढांचे और एक सख्ती से गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को अपनाया, जो खंडित शीत युद्ध के माहौल की जटिलताओं से निपटने के लिए डिज़ाइन की गई थी। हालाँकि, नरेंद्र मोदी के विस्तारित कार्यकाल ने एक बाजार-संचालित, तकनीकी रूप से एकीकृत अर्थव्यवस्था की ओर एक निश्चित परिवर्तन की देखरेख की है, जो एक अप्राप्य व्यावहारिक विदेश नीति के साथ मिलकर नई दिल्ली को आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण ध्रुवीय शक्ति के रूप में स्थापित करती है। इस निरंतर कार्यकारी स्थिरता ने सत्तारूढ़ प्रशासन को गहन परिवर्तनकारी और ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील नीतिगत एजेंडा को क्रियान्वित करने की अनुमति दी है, जिसे पिछले गठबंधन युग में लगभग असंभव माना जाता था। प्रमुख संरचनात्मक बदलाव – व्यापक कर सुधार और एक विस्तृत डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण से लेकर निर्णायक राष्ट्रीय सुरक्षा युद्धाभ्यास और ऐतिहासिक विधायी अपडेट तक – सभी इस निरंतर विधायी आदेश के कारण साकार हुए हैं। जैसा कि नरेंद्र मोदी ने इस महत्वपूर्ण मील के पत्थर को पार कर लिया है, परिवर्तन केवल कार्यालय में बिताए गए दिनों की गणना से कहीं अधिक दर्शाता है; यह एक “न्यू इंडिया” के संस्थागतकरण का प्रतीक है, जिसने एक अत्यधिक विशिष्ट, आधुनिक वैश्विक पहचान बनाने के लिए अपने मध्य-शताब्दी के टेम्पलेट्स से दृढ़ता से दूर चला गया है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना लेखक के बारे में न्यूज़ डेस्क न्यूज़ डेस्क उत्साही संपादकों और लेखकों की एक टीम है जो भारत और विदेशों में होने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं का विवरण और विश्लेषण करती है। लाइव अपडेट से लेकर एक्सक्लूसिव रिपोर्ट से लेकर गहन व्याख्याताओं तक…और पढ़ें न्यूज़ इंडिया 4,399 दिन का मील का पत्थर: कैसे पीएम मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधान मंत्री के रूप में नेहरू से आगे निकलने के लिए तैयार हैं अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)नरेंद्र मोदी(टी)जवाहरलाल नेहरू(टी)प्रधानमंत्री