Thursday, 21 May 2026 | 03:19 AM

Trending :

बच्चे दिन-ब-दिन क्यों हो रहे हैं कमजोर? कहीं शरीर में छिपी ये कमी तो नहीं बना रही वजह गर्मियों के लिए पुदीना शिकंजी ड्रिंक: लू वाली गर्मी में शरीर को तुरंत ऊर्जावान ऊर्जा-ठंडी पुदीना शिकंजी, 5 मिनट से कम में तैयार करें सुबह उठते से ही करें मलासन, रीढ़ की हड्डी से लेकर पाचन तक के लिए फायदेमंद मूंग दाल पकौड़ा रेसिपी: कम तेल में बनेंगी एक्स्ट्रा क्रंची मूंग दाल पकौड़ा, जानिए परफेक्ट बैटर से लेकर फ्राई करने तक का राज वजन कंट्रोल से लेकर मजबूत हड्डियों तक, गर्मी में मिलेट्स खाने के कई फायदे, सेवन का तरीका जान लें घर पर टोफू बनाने की विधि: घर में ऐसे एक मिनट में सोयाबीन की मदद से टोफू, नहीं बाजार से टूटने की जरूरत; विधि नोट करें
EXCLUSIVE

Pradeep Sharma: Dawoods Bracelets Worn in 90s Mumbai

Pradeep Sharma: Dawoods Bracelets Worn in 90s Mumbai

23 मिनट पहले कॉपी लिंक मुंबई पुलिस के सबसे चर्चित और तेजतर्रार पूर्व पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा इन दिनों अपनी जिंदगी पर बनने वाली आगामी फिल्म को लेकर चर्चा में हैं। 90 के दशक में मुंबई को अंडरवर्ल्ड के खौफ से आजाद कराने में उनकी अहम भूमिका रही है। दैनिक भास्कर से बातचीत में प्रदीप शर्मा ने पुलिस महकमे के कड़वे सच, अपनी जिंदगी के उतार-चढ़ाव और राजनीति को लेकर अपनी राय साझा की। उन्होंने दाऊद इब्राहिम के बॉलीवुड में खौफ और उसकी वर्तमान स्थिति पर भी की खुलासे किए। इंटरव्यू के दौरान उन्होंने अपनी आने वाली फिल्म ‘अब तक 112’ पर भी बात की। पूर्व पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा। सवाल: एक प्रोफेसर के बेटे के मन में पुलिस बनने का ख्याल कैसे आया? जवाब: मेरे पिता धूलिया के कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर और वाइस प्रिंसिपल थे। वो चाहते थे कि मैं प्रोफेसर या साइंटिस्ट बनूं। मैंने एमएससी (MSc) तक पढ़ाई भी की। लेकिन हमारे घर के पास एक पुलिस इंस्पेक्टर रहने आए थे। जब मैं छोटा था, उन्हें बुलेट पर यूनिफॉर्म और गॉगल पहनकर जाते देखता था। बस, वहीं से वर्दी के प्रति एक आकर्षण और लगाव पैदा हो गया। मुझे रूटीन वाली जिंदगी पसंद नहीं थी, इसलिए मैंने यह रास्ता चुना। सवाल: 90 के दशक की मुंबई कैसी थी, जिसके खौफ की कहानियां आज भी सुनी जाती हैं? जवाब: उस समय मुंबई पर दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, अरुण गवली और अमर नाइक जैसे गैंगस्टर्स की मजबूत पकड़ थी। दिन में तीन-चार शूटआउट आम बात थी। बड़े बिजनेसमैन, पॉलिटिशियंस और फिल्म स्टार्स को जबरन वसूली (एक्सटॉर्शन) के कॉल्स आते थे। आम आदमी का हाल यह था कि अगर कोई मारुति 800 या ओमनी वैन भी खरीदता, तो भाई का फोन आ जाता था। यहां तक कि शादियों और घरों के इंटीरियर डेकोरेशन पर भी गैंगस्टर्स फोन नंबर छोड़ जाते थे कि ‘भाई को फोन करो’। दाऊद के नाम के ब्रेसलेट और ‘D’ लिखे लॉकेट्स पहने जाते थे। ऐसा डर का माहौल था। गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम। सवाल: उस खतरनाक दौर में जब आप ऑपरेशन्स पर जाते थे, तो क्या घर में डर का माहौल नहीं होता था? जवाब: वर्दी पहनने के बाद खौफ नहीं लगता। मेरी पत्नी स्वीकृति के पिता एक्स-एयरफोर्स ऑफिसर हैं, जिन्होंने 1965 और 1971 के युद्ध देखे हैं। इसलिए हमारे घर में डर जैसा माहौल कभी नहीं रहा। मेरी पत्नी को पूरा विश्वास था कि मुझे कुछ नहीं होने वाला। सवाल: ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों या सीरीज में दाऊद इब्राहिम को (बड़े साहब) को काफी बीमार दिखाया जाता है। क्या असलियत भी वही है? जवाब: हां बिल्कुल। ‘धुरंधर’ में जिस तरीके से ‘बड़े साहब’ (दाऊद इब्राहिम) को बीमार और उनके हालात को दिखाया गया है, हकीकत में भी वो 80% वैसा ही है। फिल्मों में थोड़ा-बहुत ड्रामेटाइज तो करना ही पड़ता है, नहीं तो दुनिया उसे देखेगी नहीं; फिर तो डायरेक्टर और प्रोड्यूसर खुद ही अपनी फिल्म थिएटर में बैठकर देखेंगे। लेकिन जहां तक इंसिडेंट्स की बात है, वे सभी रियल इंसिडेंट्स से ही संबंधित हैं, इसलिए जो दिखाया गया है वो पूरी तरह फैक्ट (सच) है। धुरंधर में ‘बड़े साहब’ (दाऊद इब्राहिम)। सवाल: उस दौर में बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के तालमेल को आपने बहुत करीब से देखा, वो क्या था? जवाब: उस समय फिल्म इंडस्ट्री में बहुत डर था। एक्टर्स का चेहरा ही सब कुछ होता है, और गैंगस्टर्स सीधे धमकी देते थे कि ‘मुंह पर तेजाब फेंक दूंगा’। बेचारे डर के मारे वही करते थे जो अंडरवर्ल्ड कहता था। कुछ लोग उनसे मदद भी लेते थे। मैं एंटी-एक्सटॉर्शन सेल में था, तो मेरे पास फिल्म इंडस्ट्री के बहुत से लोग थ्रेट्स (धमकी) की शिकायतें लेकर आते थे और हम उन्हें सॉल्व करते थे। सवाल: आपने अपने करियर में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। क्या आपको लगता है कि सिस्टम ईमानदार अफसरों की कद्र नहीं करता? जवाब: यह मैंने हमेशा महसूस किया है, और मेरे जैसे कई पुलिस ऑफिसर्स इसे झेलते हैं। इस सिस्टम में इंस्पेक्टरों को ‘पेपर नैपकिन’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है; जब तक जरूरत है इस्तेमाल करो, और रोल खत्म होते ही साइड में फेंक दो। सवाल: ऐसा क्यों कह रहे हैं आप, कोई खास वाकया? जवाब: जब जेजे हॉस्पिटल में गैंगस्टर फिरोज कोकनी ने एक हवलदार की छाती में गोली मारकर उसे मार दिया और भाग गया, तो रात के तीन बजे कमिश्नर का फोन आया कि ‘प्रदीप, वी हैव टू न्यूट्रलाइज ऑल दिस थिंग्स’। हम जान पर खेलकर पीछे लगे और 8-10 दिन में आरोपियों को ढेर कर दिया। लेकिन जब वक्त बदलता है और कोई टेक्निकल गलती हो जाती है, तो यही सिस्टम आपको अकेला छोड़ देता है, कोई सपोर्ट नहीं करता। सवाल: क्या सीनियर्स को भी आपकी कामयाबी से इनसिक्योरिटी (असुरक्षा) होती थी? जवाब: बिल्कुल होती है। कमिश्नर दो-दो साल के लिए आते हैं, जबकि हम 35-40 साल से उसी शहर की सेवा कर रहे होते हैं। हमारे पब्लिक कॉन्टैक्ट्स ज्यादा होते थे। जब बड़े लोग कमिश्नर के पास जाकर कहते थे कि ‘मेरा केस प्रदीप शर्मा, विजय सालस्कर या दया नायक को दो’, तो कमिश्नर ऑफेंड हो जाते थे। उन्हें लगता था कि कमिश्नर मैं हूं और नाम इंस्पेक्टर का हो रहा है। इसी वजह से हमें सफर करना पड़ता था। सवाल: आपके करियर का सबसे दिलचस्प या यादगार केस कौन सा रहा? जवाब: मेरे लिए हर फोन कॉल एक कहानी होती थी। लेकिन एक बड़ा गैंगस्टर था, जिसे मैंने पूरे 10 साल ढूंढने के बाद न्यूट्रलाइज किया था। एक बार मैं अपने दोस्त के साथ खाना खा रहा था, तब उस गैंगस्टर का फोन जबरन वसूली के लिए आया। मैंने फोन लेकर कानूनी बात की, तो उसने मुझे और पूरी पुलिस फोर्स को गंदी गालियां दीं। मैंने उसी दिन ठान लिया था कि इसे आज नहीं तो कल खत्म करूंगा। पूरे 10 साल बाद मुझे वो मौका मिला। इसके अलावा लश्कर-ए-तैयबा के पाकिस्तानी आतंकवादियों को मारना और आईसी 814 हाईजैक की बैकअप टीम को पकड़ना भी बड़े ऑपरेशन्स थे। सवाल: आपकी जिंदगी से प्रेरित होकर ‘अब तक छप्पन’ जैसी फिल्में बनीं और अब ‘अब तक 112’ बनने जा रही है। क्या प्रदीप शर्मा की असली और अनसुनी कहानी देखने को मिलेगी? जवाब: फिल्में थोड़ी-बहुत सिनेमेटिक लिबर्टी

Pradeep Sharma: Dawoods Bracelets Worn in 90s Mumbai

Pradeep Sharma: Dawoods Bracelets Worn in 90s Mumbai

5 घंटे पहले कॉपी लिंक मुंबई पुलिस के सबसे चर्चित और तेजतर्रार पूर्व पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा इन दिनों अपनी जिंदगी पर बनने वाली आगामी फिल्म को लेकर चर्चा में हैं। 90 के दशक में मुंबई को अंडरवर्ल्ड के खौफ से आजाद कराने में उनकी अहम भूमिका रही है। दैनिक भास्कर से बातचीत में प्रदीप शर्मा ने पुलिस महकमे के कड़वे सच, अपनी जिंदगी के उतार-चढ़ाव और राजनीति को लेकर अपनी राय साझा की। उन्होंने दाऊद इब्राहिम के बॉलीवुड में खौफ और उसकी वर्तमान स्थिति पर भी की खुलासे किए। इंटरव्यू के दौरान उन्होंने अपनी आने वाली फिल्म ‘अब तक 112’ पर भी बात की। पूर्व पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा। सवाल: एक प्रोफेसर के बेटे के मन में पुलिस बनने का ख्याल कैसे आया? जवाब: मेरे पिता धूलिया के कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर और वाइस प्रिंसिपल थे। वो चाहते थे कि मैं प्रोफेसर या साइंटिस्ट बनूं। मैंने एमएससी (MSc) तक पढ़ाई भी की। लेकिन हमारे घर के पास एक पुलिस इंस्पेक्टर रहने आए थे। जब मैं छोटा था, उन्हें बुलेट पर यूनिफॉर्म और गॉगल पहनकर जाते देखता था। बस, वहीं से वर्दी के प्रति एक आकर्षण और लगाव पैदा हो गया। मुझे रूटीन वाली जिंदगी पसंद नहीं थी, इसलिए मैंने यह रास्ता चुना। सवाल: 90 के दशक की मुंबई कैसी थी, जिसके खौफ की कहानियां आज भी सुनी जाती हैं? जवाब: उस समय मुंबई पर दाऊद इब्राहिम, छोटा राजन, अरुण गवली और अमर नाइक जैसे गैंगस्टर्स की मजबूत पकड़ थी। दिन में तीन-चार शूटआउट आम बात थी। बड़े बिजनेसमैन, पॉलिटिशियंस और फिल्म स्टार्स को जबरन वसूली (एक्सटॉर्शन) के कॉल्स आते थे। आम आदमी का हाल यह था कि अगर कोई मारुति 800 या ओमनी वैन भी खरीदता, तो भाई का फोन आ जाता था। यहां तक कि शादियों और घरों के इंटीरियर डेकोरेशन पर भी गैंगस्टर्स फोन नंबर छोड़ जाते थे कि ‘भाई को फोन करो’। दाऊद के नाम के ब्रेसलेट और ‘D’ लिखे लॉकेट्स पहने जाते थे। ऐसा डर का माहौल था। गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम। सवाल: उस खतरनाक दौर में जब आप ऑपरेशन्स पर जाते थे, तो क्या घर में डर का माहौल नहीं होता था? जवाब: वर्दी पहनने के बाद खौफ नहीं लगता। मेरी पत्नी स्वीकृति के पिता एक्स-एयरफोर्स ऑफिसर हैं, जिन्होंने 1965 और 1971 के युद्ध देखे हैं। इसलिए हमारे घर में डर जैसा माहौल कभी नहीं रहा। मेरी पत्नी को पूरा विश्वास था कि मुझे कुछ नहीं होने वाला। सवाल: ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों या सीरीज में दाऊद इब्राहिम को (बड़े साहब) को काफी बीमार दिखाया जाता है। क्या असलियत भी वही है? जवाब: हां बिल्कुल। ‘धुरंधर’ में जिस तरीके से ‘बड़े साहब’ (दाऊद इब्राहिम) को बीमार और उनके हालात को दिखाया गया है, हकीकत में भी वो 80% वैसा ही है। फिल्मों में थोड़ा-बहुत ड्रामेटाइज तो करना ही पड़ता है, नहीं तो दुनिया उसे देखेगी नहीं; फिर तो डायरेक्टर और प्रोड्यूसर खुद ही अपनी फिल्म थिएटर में बैठकर देखेंगे। लेकिन जहां तक इंसिडेंट्स की बात है, वे सभी रियल इंसिडेंट्स से ही संबंधित हैं, इसलिए जो दिखाया गया है वो पूरी तरह फैक्ट (सच) है। धुरंधर में ‘बड़े साहब’ (दाऊद इब्राहिम)। सवाल: उस दौर में बॉलीवुड और अंडरवर्ल्ड के तालमेल को आपने बहुत करीब से देखा, वो क्या था? जवाब: उस समय फिल्म इंडस्ट्री में बहुत डर था। एक्टर्स का चेहरा ही सब कुछ होता है, और गैंगस्टर्स सीधे धमकी देते थे कि ‘मुंह पर तेजाब फेंक दूंगा’। बेचारे डर के मारे वही करते थे जो अंडरवर्ल्ड कहता था। कुछ लोग उनसे मदद भी लेते थे। मैं एंटी-एक्सटॉर्शन सेल में था, तो मेरे पास फिल्म इंडस्ट्री के बहुत से लोग थ्रेट्स (धमकी) की शिकायतें लेकर आते थे और हम उन्हें सॉल्व करते थे। सवाल: आपने अपने करियर में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं। क्या आपको लगता है कि सिस्टम ईमानदार अफसरों की कद्र नहीं करता? जवाब: यह मैंने हमेशा महसूस किया है, और मेरे जैसे कई पुलिस ऑफिसर्स इसे झेलते हैं। इस सिस्टम में इंस्पेक्टरों को ‘पेपर नैपकिन’ की तरह इस्तेमाल किया जाता है; जब तक जरूरत है इस्तेमाल करो, और रोल खत्म होते ही साइड में फेंक दो। सवाल: ऐसा क्यों कह रहे हैं आप, कोई खास वाकया? जवाब: जब जेजे हॉस्पिटल में गैंगस्टर फिरोज कोकनी ने एक हवलदार की छाती में गोली मारकर उसे मार दिया और भाग गया, तो रात के तीन बजे कमिश्नर का फोन आया कि ‘प्रदीप, वी हैव टू न्यूट्रलाइज ऑल दिस थिंग्स’। हम जान पर खेलकर पीछे लगे और 8-10 दिन में आरोपियों को ढेर कर दिया। लेकिन जब वक्त बदलता है और कोई टेक्निकल गलती हो जाती है, तो यही सिस्टम आपको अकेला छोड़ देता है, कोई सपोर्ट नहीं करता। सवाल: क्या सीनियर्स को भी आपकी कामयाबी से इनसिक्योरिटी (असुरक्षा) होती थी? जवाब: बिल्कुल होती है। कमिश्नर दो-दो साल के लिए आते हैं, जबकि हम 35-40 साल से उसी शहर की सेवा कर रहे होते हैं। हमारे पब्लिक कॉन्टैक्ट्स ज्यादा होते थे। जब बड़े लोग कमिश्नर के पास जाकर कहते थे कि ‘मेरा केस प्रदीप शर्मा, विजय सालस्कर या दया नायक को दो’, तो कमिश्नर ऑफेंड हो जाते थे। उन्हें लगता था कि कमिश्नर मैं हूं और नाम इंस्पेक्टर का हो रहा है। इसी वजह से हमें सफर करना पड़ता था। सवाल: आपके करियर का सबसे दिलचस्प या यादगार केस कौन सा रहा? जवाब: मेरे लिए हर फोन कॉल एक कहानी होती थी। लेकिन एक बड़ा गैंगस्टर था, जिसे मैंने पूरे 10 साल ढूंढने के बाद न्यूट्रलाइज किया था। एक बार मैं अपने दोस्त के साथ खाना खा रहा था, तब उस गैंगस्टर का फोन जबरन वसूली के लिए आया। मैंने फोन लेकर कानूनी बात की, तो उसने मुझे और पूरी पुलिस फोर्स को गंदी गालियां दीं। मैंने उसी दिन ठान लिया था कि इसे आज नहीं तो कल खत्म करूंगा। पूरे 10 साल बाद मुझे वो मौका मिला। इसके अलावा लश्कर-ए-तैयबा के पाकिस्तानी आतंकवादियों को मारना और आईसी 814 हाईजैक की बैकअप टीम को पकड़ना भी बड़े ऑपरेशन्स थे। सवाल: आपकी जिंदगी से प्रेरित होकर ‘अब तक छप्पन’ जैसी फिल्में बनीं और अब ‘अब तक 112’ बनने जा रही है। क्या प्रदीप शर्मा की असली और अनसुनी कहानी देखने को मिलेगी? जवाब: फिल्में थोड़ी-बहुत सिनेमेटिक लिबर्टी