सुप्रीम कोर्ट की बिल्डर्स-बैंक गठजोड़ पर CBI को फटकार:कहा-घर खरीदने वालों के मामले लंबा नहीं खींच सकते, कब्जा दिए बिना किश्त लेने का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली-NCR और देश के दूसरे हिस्सों में घर खरीदने वालों को ठगने के लिए बैंकों और डेवलपर्स के बीच गठजोड़ की जांच के लिए सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन(CBI) को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि जांच को लंबा खींचने से फ्लैट खरीदने वालों को और परेशानी होगी। CBI ने अन्य राज्यों के केसों को संबंधित राज्य की एजेंसी को ट्रांसफर करने की मांग की थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने CBI के इस बयान पर एतराज जताया। टॉप कोर्ट 1,200 से ज्यादा घर खरीदने वालों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें मुख्य याचिका हिमांशु सिंह ने वकील अक्षय श्रीवास्तव के ज़रिए दायर की थी। याचिकाकर्ताओं ने NCR, खासकर नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गुरुग्राम में अलग-अलग हाउसिंग प्रोजेक्ट्स में सबवेंशन प्लान के तहत फ्लैट बुक किए थे। उनका आरोप है कि फ्लैट का कब्जा न होने के बावजूद बैंक उन्हें किश्तें देने के लिए मजबूर कर रहे थे। कोर्ट ने कहा- CBI का यही तरीका रहा तो वो कमेटी बनाएगा बेंच ने कहा कि अगर CBI का यही तरीका रहा, तो वह एजेंसी की जांच की निगरानी के लिए एक कमेटी बना सकती है। टॉप कोर्ट ने कहा कि अगर CBI को मामलों की जांच के लिए स्टाफ की कमी का सामना करना पड़ रहा है, तो वह राज्यों के DGP को लिख सकती है और उनकी इकोनॉमिक ऑफेंस विंग की मदद ले सकती है। कोर्ट ने इस आरोप पर नाराजगी जताई कि CBI बैंक अधिकारियों की जांच नहीं कर रही है। बेंच ने अगली सुनवाई तक एक हलफनामा दाखिल करने को कहा है। इसमें कहा गया कि CBI को पिछले साल 29 अप्रैल को एमिकस क्यूरी राजीव जैन की इस मामले में फाइल की गई रिपोर्ट देखनी चाहिए और एजेंसी को जांच पूरी होने की संभावित टाइमलाइन बताने का निर्देश दिया। सबवेंशन स्कीम क्या है? सबवेंशन स्कीम के तहत, बैंक मंजूर की गई रकम सीधे बिल्डरों के अकाउंट में डालते हैं। जिन्हें तब तक मंजूर लोन की रकम पर EMI देनी होती है जब तक कि फ्लैट घर खरीदने वालों को नहीं मिल जाते। जब बिल्डरों ने बैंकों की EMI नहीं चुकानी शुरू की, तो तीन-तरफा एग्रीमेंट के हिसाब से, बैंकों ने घर खरीदने वालों से EMI की मांग की, जो एग्रीमेंट में तीसरा पक्ष था। क्या है मामला… 29 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने CBI को सुपरटेक लिमिटेड समेत NCR में बिल्डरों के खिलाफ सात शुरुआती जांच रजिस्टर करने का निर्देश दिया था। घर खरीदने वालों को ठगने के लिए डेवलपमेंट अथॉरिटी के अधिकारियों, बैंकों और बिल्डरों की मिलीभगत पर नाराजगी जताई थी। कोर्ट ने कहा था कि उसे नोएडा, गुरुग्राम, यमुना एक्सप्रेसवे, ग्रेटर नोएडा, मोहाली, मुंबई, कोलकाता और इलाहाबाद में जाने-माने बैंकों और बिल्डरों के बीच पहली नजर में सांठगांठ मिली है। जज ने सुपरटेक लिमिटेड को घर खरीदने वालों के साथ धोखाधड़ी करने का मुख्य दोषी बताया था। कोर्ट ने पाया कि कॉर्पोरेशन बैंक ने सबवेंशन स्कीम के जरिए बिल्डरों को 2,700 करोड़ रुपए से ज्यादा का लोन दिया था। एमिकस रिपोर्ट से पता चला है कि अकेले सुपरटेक लिमिटेड ने 1998 से 5,157.86 करोड़ रुपए का लोन लिया है। पिछले साल CBI को जांच का आदेश दिया गया पिछले साल 23 सितंबर को, सुप्रीम कोर्ट ने CBI को मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता, मोहाली और प्रयागराज में रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में घर खरीदने वालों को ठगने के लिए बैंकों और डेवलपर्स के बीच सांठगांठ के बारे में छह और रेगुलर केस रजिस्टर करने की इजाजत दी थी। 20 जनवरी को, टॉप कोर्ट ने एक स्पेशल CBI कोर्ट से कहा कि वह इन मामलों में फेडरल एजेंसी द्वारा फाइल की गई तीन चार्जशीट पर दो हफ्ते के अंदर संज्ञान ले और ट्रायल को आगे बढ़ाए। उससे दो महीने पहले, कोर्ट ने CBI को 22 केस रजिस्टर करने की इजाजत दी थी। इनमें नेशनल कैपिटल रीजन (NCR) में सबवेंशन स्कीम का इस्तेमाल करके घर खरीदने वालों को ठगा गया था। ——————– ये खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट बोला- UCC लागू करने का समय आ गया:संसद फैसला करे; शरियत कानून में सुधार की जल्दबाजी न करें, इससे नुकसान की आशंका सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का समय आ गया है। इस पर फैसला करना कोर्ट के बजाय संसद का काम है। कोर्ट शरियत कानून 1937 की कुछ धाराओं को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था। कोर्ट ने कहा- शरियत कानून की धाराएं रद्द कर दी गईं तो मुस्लिम समुदाय में संपत्ति के बंटवारे को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं बचेगा। पूरी खबर पढ़ें…
सुप्रीम कोर्ट में लुधियाना के याचिकाकर्ता को फटकार:CJI ने कहा- जाओ लुधियाना 2-3 और स्वेटर बेचो, याचिका लिखने वाले नुकसान कर देंगे

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक नाटकीय घटनाक्रम हुआ। इस घटनाक्रम के केंद्र में लुधियाना का एक होजरी कारोबारी रहा। लुधियाना के कारोबारी ने भारी भरकम कानूनी शब्दों वाली एक जनहित याचिका दायर की। याचिका पीएम केयर्स फंड के बारे में लगाई गई थी। सीजेआई व दो अन्य जजों की पीठ को याचिका पर शक हुआ तो सीजेआई ने कह दिया कि याचिकाकर्ता इसमें किसी और का मुखौटा बनकर काम कर रहा है। सीजेआई ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाई और उन्हें पास लुधियाना जाकर स्वेटर बेचने को कहा। पीएम केयर्स फड से संबंधित केस की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ कर रही थी। याचिका में कुछ ऐसे शब्द लिखे थे जिसका मतलब याचिकाकर्ता रजनीश सिद्धू खुद नहीं जानते थे। याचिका देख सीजेआई ने पूछी क्वालिफिकेशन सीजेआई ने जब याचिकाकर्ता की याचिका पढ़ी तो तुरंत उससे उसकी क्वालिफिकेशन पूछ ली। जिस पर उसने कहा कि वह 12 वीं पास है और होजरी का कारोबार करता है। जब CJI ने उनके इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) के बारे में पूछा, तो उन्होंने बताया कि पिछले साल उन्होंने लगभग 5.25 लाख रुपए टैक्स भरा था। याचिकाकर्ता ने जब कहा कि उसने पहले कभी किसी हाईकोर्ट में कोई याचिका दायर नहीं की है और यह उनका सीधे सुप्रीम कोर्ट में पहला मामला है। जिस पर सीजेआई ने कहा कि बड़ा बहादुरी का काम किया, सीधा लुधियाना से चलके आ गए। याचिका के मसौदे पर संदेह और ‘परीक्षा’ की चुनौती याचिका के मसौदे पर सीजेआई को शक हुआ तो उन्होंने याचिकाकर्ता को कहा कि मैं आपका एग्जाम करवाऊंगा, अगर आपके उसमें 30 प्रतिशत अंक भी आ गए तो मैं मान लूंगा कि पिटीशन आपने बनाई है। सीजेआई ने पूछा इमानदारी से बताएं याचिका किसने तैयार की CJI ने याचिकाकर्ता को इमानदारी से बताने को कहा कि याचिका किसने तैयार की है, अन्यथा उनके ITR विवरण साथ जोड़ने होंगे। याचिकाकर्ता अपने स्टैंड पर अड़े रहे और कहा, “सर, आप मेरा फोन चेक कर सकते हैं।” याचिकाकर्ता ने बताया कि शुरू में उन्होंने सितंबर में ‘मिस्टर दास’ नाम के एक टाइपिस्ट से इसका मसौदा तैयार करवाया था। विजिलेंस की जांच की धमकी दी तो बदला बयान जब कोर्ट ने पंजाब विजिलेंस ब्यूरो से जांच कराने की चेतावनी दी, तो याचिकाकर्ता ने जवाब दिया कि उन्होंने किसी वकील से सलाह नहीं ली है। उसने कहा कि मुझे किसी वकील पर भरोसा नहीं है, हालांकि मेरे कुछ अच्छे दोस्त वकील हैं। “फिडुशरी रिस्क” का अर्थ नहीं बता पाए याचिकाकर्ता CJI ने याचिका में इस्तेमाल किए गए शब्दों फिडुशरी रिस्क ऑफ कारपोरेट डोनर्स का अर्थ पूछा तो याचिकाकर्ता इसका उत्तर नहीं दे सके। जब उन्होंने अन्य दलीलें देना शुरू किया, तो CJI ने बीच में टोकते हुए कहा कि सिद्धू साहब, यह तो आपने कागज पर लिख रखा है, किसी वकील ने आपको लिख कर दिया है। अंतिम चेतावनी पर, याचिकाकर्ता ने स्वीकार किया कि उन्होंने 3-4 एआई टूल की मदद से खुद ही याचिका तैयार की है, क्योंकि उनके पास वकील करने के पैसे नहीं थे। उन्होंने बताया कि जो टाइपिस्ट है, उनको 4 जैकेट गिफ्ट करी थी, बहुत अच्छे हैं वह, 1 घंटे का 1000 मांग रहे थे। कोर्ट का फैसला और चेतावनी पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को भविष्य में ऐसी तुच्छ याचिकाएं दायर न करने की चेतावनी दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा “याचिकाकर्ता ने बिना किसी जिम्मेदारी के यह याचिका दायर की है और अस्पष्ट, बेबुनियाद और अपमानजनक आरोप लगाए हैं। पूछताछ में हमने पाया कि याचिकाकर्ता लुधियाना के एक स्कूल से 10+2 पास एक छोटा व्यापारी है। याचिका की भाषा, शब्दावली और ‘संवैधानिक सिद्धांत’ याचिकाकर्ता की अपनी सोच के नहीं हो सकते।” याचिका खारिज करते हुए CJI ने अंत में कहा “जाओ लुधियाना में 2-3 और स्वेटर बेचो। जिन लोगों का काम ऐसी याचिकाएं फाइल करवाना है, वे आप पर जुर्माना (costs) लगवाकर आपका और नुकसान करवा देंगे।” सीजेआई और याचिकाकर्ता के बीच हुई बातचीत, पढ़िए… मुख्य न्यायाधीश : क्या आपने याचिका का मसौदा तैयार किया है? याचिकाकर्ता: जी, मैंने खुद तैयार किया है। मैं अपना फोन यहां जमा करा सकता हूं। मुख्य न्यायाधीश: आपकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि क्या है? याचिकाकर्ता: 12वीं पास। मुख्य न्यायाधीश: किस स्कूल से? याचिकाकर्ता: सनातन धर्म स्कूल, लुधियाना। मुख्य न्यायाधीश: मैं यहीं अदालत में आपके लिए अंग्रेजी की परीक्षा आयोजित करवा दूंगा। अगर आप 30 अंक ले आते हैं, तब मैं इस पर विचार करूंगा। याचिकाकर्ता: जी हां, मैं दे सकता हूं। मुख्य न्यायाधीश: या तो आप सच बताइए, नहीं तो हम भारी जुर्माना लगाएंगे और जांच का आदेश देंगे। याचिकाकर्ता: आप मेरा फोन देख सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश: आपने याचिका में लिखा है- “कॉरपोरेट दानदाताओं के लिए फिड्यूशियरी रिस्क”। इसका क्या मतलब है? वकील: मैं याचिका का हवाला दे सकता हूं। मुख्य न्यायाधीश: मैं आखिरी बार पूछ रहा हूं कि यह याचिका किस वकील ने तैयार की है। आपने यह खुद नहीं बनाई है। वकील: मैंने एआई टूल्स पर खोज की थी। मैंने एक टाइपिस्ट को चार जैकेट भी गिफ्ट की थीं और उसने टाइपिंग के लिए 1000 रुपए प्रति घंटे लिए थे। दास सर। मुख्य न्यायाधीश: सुप्रीम कोर्ट के टाइपिस्ट ने यह याचिका तैयार की है। टाइपिस्ट को यहां बुलाइए।
सुप्रीम कोर्ट बोला- UCC लागू करने का समय आ गया:संसद फैसला करे, शरियत कानून की धाराएं रद्द करने से कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का समय आ गया है। कोर्ट मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव का आरोप लगाकर शरियत कानून 1937 की कुछ धाराओं को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था। CJI सूर्यकांत,जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर महादेवन तीन जजों की बेंच ने कहा कि याचिका में भेदभाव का मुद्दा गंभीर है, लेकिन इस पर फैसला करना कोर्ट के बजाय संसद का काम है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि अगर शरियत कानून की धाराएं रद्द कर दी गईं तो मुस्लिम समुदाय में संपत्ति के बंटवारे को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं बचेगा। इससे कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि सुधार की जल्दी में ऐसा न हो कि जिन लोगों के अधिकारों की बात हो रही है, उन्हें ही नुकसान हो जाए। कोर्ट लागू करने की बात कई बार कह चुका जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कई बार सरकार से समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कह चुका है। उन्होंने कहा कि कई नियम सभी समुदायों पर एक जैसे लागू नहीं हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोर्ट सीधे ऐसे मामलों को असंवैधानिक घोषित कर दे। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि कोर्ट यह घोषित कर सकती है कि मुस्लिम महिलाओं को भी पुरुषों के बराबर संपत्ति में अधिकार मिलना चाहिए। उनका सुझाव था कि अगर शरियत कानून की धाराएं रद्द होती हैं तो ऐसे मामलों में भारतीय उत्तराधिकार कानून लागू किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि इस मुद्दे का स्थायी समाधान समान नागरिक संहिता ही है, लेकिन इसे लागू करने का फैसला संसद को लेना होगा।
सुप्रीम कोर्ट बोला- UCC लागू करने का समय आ गया:संसद फैसला करे, शरियत कानून की धाराएं रद्द करने से कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का समय आ गया है। कोर्ट मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव का आरोप लगाकर शरियत कानून 1937 की कुछ धाराओं को रद्द करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था। CJI सूर्यकांत,जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस आर महादेवन तीन जजों की बेंच ने कहा कि याचिका में भेदभाव का मुद्दा गंभीर है, लेकिन इस पर फैसला करना कोर्ट के बजाय संसद का काम है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि अगर शरियत कानून की धाराएं रद्द कर दी गईं तो मुस्लिम समुदाय में संपत्ति के बंटवारे को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं बचेगा। इससे कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि सुधार की जल्दी में ऐसा न हो कि जिन लोगों के अधिकारों की बात हो रही है, उन्हें ही नुकसान हो जाए। कोर्ट लागू करने की बात कई बार कह चुका क्या है शरियत कानून 1937 यह कानून मुस्लिम समुदाय में विवाह, तलाक और संपत्ति के बंटवारे जैसे मामलों में इस्लामी पर्सनल लॉ लागू करता है। भारत में केवल उत्तराखंड में UCC भारत में अभी केवल उत्तराखंड में UCC लागू है। वहां 28 जनवरी 2025 को UCC लागू किया गया। मुख्यमंत्री आवास में सीएम पुष्कर सिंह धामी ने इसका ऐलान किया था। ————————— ये खबर भी पढ़ें: उत्तराखंड UCC लागू करने वाला पहला राज्य बना:सीएम धामी बोले- हलाला, एक से ज्यादा शादियों, तीन तलाक पर पूरी तरह रोक लगेगी उत्तराखंड में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) आज से लागू हो गया है। मुख्यमंत्री आवास में सीएम पुष्कर सिंह धामी ने इसका ऐलान किया। यह कार्यक्रम सीएम आवास के मुख्य सेवक सदन में आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम सीएम आवास के मुख्य सेवक सदन में आयोजित किया गया। पढ़ें पूरी खबर…
SC Directs Centre for Vaccine Side Effects Compensation Policy

नई दिल्ली8 मिनट पहले कॉपी लिंक जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले में सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को कोविड-19 वैक्सीनेशन के बाद के साइड इफेक्ट्स की जांच के लिए एक्सपर्ट पैनल के गठन से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह उन लोगों के लिए नो-फॉल्ट मुआवजा नीति तैयार करे, जिन्हें कोविड-19 टीकाकरण के बाद गंभीर प्रतिकूल घटनाओं का सामना करना पड़ा है। कोर्ट ने साइड इफेक्ट्स से जुड़े आंकड़े समय-समय पर सार्वजनिक करने को भी कहा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने उस आज याचिका पर सुनवाई की, जिसमें मांग है कि वैक्सीन के बाद हुए कथित दुष्प्रभावों के चलते मृतकों के परिवार को मुआवजा दिया जाए। आरोप है कि 2021 में कोविशील्ड की पहली खुराक लेने के बाद 2 महिलाओं की मौत हो गई थी। कोर्ट की 3 अहम टिप्पणी मौजूदा व्यवस्था को देखते हुए टीकाकरण के बाद दुष्प्रभावों की जांच के लिए कोर्ट की तरफ से अलग समिति बनाने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति कानून का सहारा नहीं ले सकता है। कोर्ट ने कहा कि मुआवजा नीति बनाने का मतलब यह नहीं माना जाएगा कि भारत सरकार या किसी अन्य अथॉरिटी ने अपनी गलती या कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार कर ली है। PM ने कोवैक्सिन के 2 डोज लगवाए थे पीएम ने 8 अप्रैल 2021 को कोवैक्सिन का दूसरा डोज लिया था। पीएम नरेंद्र मोदी ने 1 मार्च 2021 को कोवैक्सिन का पहला डोज लिया था। जुलाई 2025: कोविड के बाद अचानक मौतों पर स्टडी: ICMR का दावा- वैक्सीन से इसका संबंध नहीं इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) ने अपनी स्टडी में बताया कि देश में हार्ट अटैक से होने वाली अचानक मौतों का कोविड वैक्सीन से कोई सीधा संबंध नहीं है। यह स्टडी 18 से 45 साल के लोगों की अचानक मौत पर आधारित है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्टडी में कहा गया है कि भारत की कोविड वैक्सीन सेफ और इफेक्टिव है। इससे होने वाले गंभीर साइडइफेक्ट के मामले रेयर हैं। स्टडी में बताया गया है कि अचानक हुई मौतों की अन्य वजहें हो सकती हैं। इनमें जेनेटिक्स, लाइफस्टाइल, पहले से मौजूद बीमारी और कोविड के बाद के कॉम्प्लिकेशन शामिल हैं। भारत में दो कोविड वैक्सीन विकसित हुई थीं। भारत बायोटेक ने ICMR के सहयोग से कोवैक्सिन का निर्माण किया था। वहीं, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने ब्रिटिश कंपनी एस्ट्राजेनेका के फॉर्मूले से कोवीशील्ड बनाई थी। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
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नई दिल्ली29 मिनट पहले कॉपी लिंक जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले में सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को कोविड-19 वैक्सीनेशन के बाद के साइड इफेक्ट्स की जांच के लिए एक्सपर्ट पैनल के गठन से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह उन लोगों के लिए नो-फॉल्ट मुआवजा नीति तैयार करे, जिन्हें कोविड-19 टीकाकरण के बाद गंभीर प्रतिकूल घटनाओं का सामना करना पड़ा है। कोर्ट ने साइड इफेक्ट्स से जुड़े आंकड़े समय-समय पर सार्वजनिक करने को भी कहा है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने उस आज याचिका पर सुनवाई की, जिसमें मांग है कि वैक्सीन के बाद हुए कथित दुष्प्रभावों के चलते मृतकों के परिवार को मुआवजा दिया जाए। आरोप है कि 2021 में कोविशील्ड की पहली खुराक लेने के बाद 2 महिलाओं की मौत हो गई थी। कोर्ट की 3 अहम टिप्पणी मौजूदा व्यवस्था को देखते हुए टीकाकरण के बाद दुष्प्रभावों की जांच के लिए कोर्ट की तरफ से अलग समिति बनाने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति कानून का सहारा नहीं ले सकता है। कोर्ट ने कहा कि मुआवजा नीति बनाने का मतलब यह नहीं माना जाएगा कि भारत सरकार या किसी अन्य अथॉरिटी ने अपनी गलती या कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार कर ली है। PM ने कोवैक्सिन के 2 डोज लगवाए थे पीएम ने 8 अप्रैल 2021 को कोवैक्सिन का दूसरा डोज लिया था। पीएम नरेंद्र मोदी ने 1 मार्च 2021 को कोवैक्सिन का पहला डोज लिया था। जुलाई 2025: कोविड के बाद अचानक मौतों पर स्टडी: ICMR का दावा- वैक्सीन से इसका संबंध नहीं इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) ने अपनी स्टडी में बताया कि देश में हार्ट अटैक से होने वाली अचानक मौतों का कोविड वैक्सीन से कोई सीधा संबंध नहीं है। यह स्टडी 18 से 45 साल के लोगों की अचानक मौत पर आधारित है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्टडी में कहा गया है कि भारत की कोविड वैक्सीन सेफ और इफेक्टिव है। इससे होने वाले गंभीर साइडइफेक्ट के मामले रेयर हैं। स्टडी में बताया गया है कि अचानक हुई मौतों की अन्य वजहें हो सकती हैं। इनमें जेनेटिक्स, लाइफस्टाइल, पहले से मौजूद बीमारी और कोविड के बाद के कॉम्प्लिकेशन शामिल हैं। भारत में दो कोविड वैक्सीन विकसित हुई थीं। भारत बायोटेक ने ICMR के सहयोग से कोवैक्सिन का निर्माण किया था। वहीं, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने ब्रिटिश कंपनी एस्ट्राजेनेका के फॉर्मूले से कोवीशील्ड बनाई थी। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Bhopal Child Rape-Murder Convict Atul Nihales Execution Stayed by SC

भोपाल के शाहजहांनाबाद इलाके में 5 साल की मासूम से रेप और हत्या के मामले में दोषी अतुल निहाले की फांसी की सजा पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। . शीर्ष अदालत ने अतुल की याचिका पर सुनवाई करते हुए डेथ सेंटेंस को अमल करने पर स्टे दे दिया है। कोर्ट अब मामले में सजा और दोष सिद्धि से जुड़े पहलुओं पर विस्तार से सुनवाई करेगा। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने दिया, जिसमें न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया शामिल हैं। बेंच ने फिलहाल फांसी की सजा के अमल पर रोक लगाते हुए मामले की आगे सुनवाई तय की है। अदालत अब रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर यह तय करेगी कि निचली अदालतों के फैसले में किसी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता है या नहीं। स्पेशल कोर्ट ने सुनाई थी तिहरी फांसी इस जघन्य मामले में भोपाल के विशेष पॉक्सो कोर्ट ने 18 मार्च 2025 को ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने आरोपी अतुल निहाले को तीन अलग-अलग धाराओं में फांसी की सजा सुनाई थी। बीएनएस लागू होने के बाद मध्यप्रदेश में यह पहला मामला था, जिसमें किसी दोषी को अलग-अलग धाराओं में तीन बार मृत्युदंड दिया गया था। इसके अलावा अदालत ने आरोपी को दो धाराओं में उम्रकैद और दो अन्य धाराओं में सात-सात साल की सजा भी सुनाई थी। हाईकोर्ट ने कहा था- इसकी कल्पना ही रूह कंपा देने वाली स्पेशल कोर्ट के फैसले को आरोपी ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इस पर सुनवाई करते हुए जबलपुर स्थित हाईकोर्ट की डबल बेंच ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए फांसी की सजा बरकरार रखी थी। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि आरोपी ने अत्यंत अमानवीय और नृशंस अपराध किया है। हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि पांच साल की बच्ची ने जिस पीड़ा को झेला, उसे शब्दों में समझ पाना मुश्किल है और इसकी कल्पना ही रूह कंपा देने वाली है। दुर्लभतम श्रेणी का अपराध माना गया भोपाल की विशेष अदालत ने अपने फैसले में इस अपराध को दुर्लभतम श्रेणी का मामला बताया था। कोर्ट ने कहा था कि यदि मृत्युदंड से भी बड़ी कोई सजा होती तो आरोपी उसका भी पात्र होता। अदालत ने अपने आदेश में लिखा था कि यदि समाज बच्चों को सुरक्षित माहौल नहीं दे सकता, जहां वे अपने घर और आसपास सुरक्षित खेल सकें, तो सभ्य समाज की कल्पना भी कठिन हो जाती है। 24 सितंबर 2024 को हुई थी वारदात यह घटना 24 सितंबर 2024 को शाहजहांनाबाद इलाके में हुई थी। दोपहर के समय पांच साल की बच्ची अपनी दादी के साथ मल्टी में स्थित बड़े पापा के फ्लैट पर थी। दादी ने उसे स्कूल की किताबें लाने के लिए नीचे भेजा था, लेकिन वह काफी देर तक वापस नहीं लौटी। इसके बाद परिवार और मल्टी में रहने वाले लोगों ने उसकी तलाश शुरू की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। बाद में बच्ची के पिता ने शाहजहांनाबाद थाने में उसके अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई। घर की टंकी में छिपाया गया था शव पुलिस जांच के दौरान आरोपी के घर से बदबू आने की शिकायत मिली। तलाशी लेने पर बाथरूम के ऊपर रखी प्लास्टिक की पानी की टंकी से दुर्गंध आ रही थी। जब टंकी को नीचे उतारा गया तो उसमें बच्ची का शव मिला। शव को कपड़ों और अन्य सामान से ढंक कर छिपाया गया था। जांच में सामने आया कि आरोपी ने वारदात के बाद शव को तीन दिन तक टंकी में छिपाकर रखा था। डीएनए और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बने अहम सबूत सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अदालत में कुल 22 गवाह पेश किए थे। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और डीएनए जांच इस केस के सबसे अहम सबूत साबित हुए। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ने बच्ची के साथ दुष्कर्म करने के बाद चाकू से कई वार किए थे, जिससे उसकी मौत हो गई। आरोपी के घर से खून से सने कपड़े और वारदात में इस्तेमाल किया गया चाकू भी बरामद किया गया था। मां और बहन को भी मिली सजा इस मामले में आरोपी की मां बसंती निहाले और बहन चंचल भालसे को भी अदालत ने दोषी माना था। जांच में सामने आया था कि दोनों ने आरोपी की मदद करते हुए वारदात को छिपाने की कोशिश की थी। अदालत ने इस आधार पर दोनों को दो-दो साल की सजा सुनाई थी। अब मामले में अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद ही होगा। फिलहाल शीर्ष अदालत ने फांसी की सजा के क्रियान्वयन पर रोक लगाकर आगे की सुनवाई तय की है। इस केस पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि यह हाल के वर्षों में सामने आए सबसे जघन्य अपराधों में से एक माना गया है। मामले से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… 1. मासूम के अपहरण ,दुष्कर्म और हत्या के आरोपी दोषी करार भोपाल के शाहजहानाबाद इलाके में 5 वर्षीय एक अबोध बालिका के अपहरण, दुष्कर्म और जघन्य हत्या के सनसनीखेज मामले में सोमवार को विशेष न्यायालय ने तीनों आरोपियों को दोषी करार दिया। आरोपियों में मुख्य आरोपी अतुल निहाले, उसकी मां बसंती बाई और बहन चंचल भालसे शामिल हैं। विशेष न्यायाधीश कुमुदिनी पटेल ने इस मामले में तीनों को दोषी ठहराया है। पढ़ें पूरी खबर… 2. आरोपी ने रेप के बाद गला घोंटा; फिर शव को पानी की टंकी में छिपाया था भोपाल के ईदगाह हिल्स इलाके के मल्टी में 5 साल की मासूम बच्ची से रेप के बाद हत्या करने के मामले में शाहजहांनाबाद थाना पुलिस ने अतुल भालसे, उसकी बहन चंचल भालसे और मां बसंती भालसे के खिलाफ कोर्ट में चालान पेश किया है। चालान के साथ पुलिस ने डीएनए टेस्ट रिपोर्ट, मेडिकल रिपोर्ट, दस्तावेज और पीड़ित के परिजन, चिकित्सक और पुलिसकर्मियों सहित गवाहों की लिस्ट भी कोर्ट में पेश की है। पुलिस ने आरोपी की मां और बहन को पुलिस के काम में बाधा डालने और सबूत छिपाने का आरोपी बनाया है। पढ़ें पूरी खबर…
SC Halts NCERT Book Sale Over Judiciary Corruption Chapter Row

नई दिल्ली16 मिनट पहले कॉपी लिंक राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने किताब के ‘ज्यूडीशियरी करप्शन’ चैप्टर को लेकर बिना शर्त माफी मांगी है। इस चैप्टर को लेकर विवाद हुआ था। इसके बाद किताब की बिक्री पर रोक लगा दी गई थी। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। CJI सूर्यकांत ने कहा था कि न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं दे सकते। NCERT ने प्रेस रिलीज में कहा- NCERT की सोशल साइंस की आठवीं (पार्ट-2) की टेक्स्ट बुक ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ का चैप्टर 4 ‘द रोल ऑफ ज्यूडीशियरी इन अवर सोसाइटी’ था। NCERT के डायरेक्टर और सदस्य इसके लिए बिना किसी शर्त के माफी मांगते हैं। पूरी किताब को ही वापस बुला लिया गया है। अब यह उपलब्ध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने जताई थी नाराजगी 25 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद ‘ज्यूडीशियल करप्शन’ चैप्टर वाली NCERT किताब की बिक्री पर रोक लगा दी गई थी। NCERT के सूत्रों ने इसकी पुष्टि की थी। सूत्रों के अनुसार, NCERT ने चैप्टर का सुझाव देने वाले एक्सपर्ट्स और इसे मंजूरी देने वाले अधिकारियों की इंटरनल मीटिंग बुलाई। किताब को वेबसाइट से भी हटा लिया गया है। सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में मामला उठाया था। सुनवाई के दौरान सिब्बल ने CJI सूर्यकांत, जस्टिस विपुल एम पंचोली और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच को बताया कि क्लास 8 के बच्चों को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में पढ़ाया जा रहा है। यह निंदनीय है। सिंघवी ने कहा कि NCERT ने मान लिया है कि राजनीति, ब्यूरोक्रेसी और अन्य संस्थानों में भ्रष्टाचार है ही नहीं। इसपर CJI सूर्यकांत ने कहा- दुनिया में किसी को भी न्यायपालिका को बदनाम करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। यह एक सोची-समझी और गहरी साजिश लगती है। मुझे पता है इससे कैसे निपटना है। मैं यह केस खुद हैंडल करूंगा। हम इस बारे में और कुछ नहीं कहना चाहते। सरकारी सूत्रों ने कहा- शासन के तीनों अंगों को जोड़ना चाहिए था NCERT चेयरमैन दिनेश प्रसाद सकलानी का इस मुद्दे पर कोई जवाब नहीं दिया था। काउंसिल के एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि मामला अब कोर्ट में विचाराधीन है। इसलिए वे इस मुद्दे पर कुछ भी नहीं बोंलेंगे। इस बीच सरकारी सूत्रों ने कहा कि भले ही NCERT एक ऑटोनॉमस संस्था है, लेकिन चैप्टर जोड़ने से पहले अधिकारियों को ध्यान देना चाहिए था। सरकारी सूत्रों ने कहा कि अगर भ्रष्टाचार का मुद्दा शामिल करना था, तो उसमें शासन के तीनों अंगों- कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को भी जोड़ा जाना चाहिए था। सरकारी सूत्रों ने कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित आंकड़े संसदीय अभिलेखों और नेशनल ज्यूडीशियल डेटा ग्रिड में मौजूद हैं, लेकिन फैक्ट्स के क्रॉस वेरिफिकेशन के लिए केंद्र से परामर्श नहीं लिया गया। NCERT की नई सोशल साइंस टेक्स्टबुक में चैप्टर था NCERT ने 23 फरवरी को क्लास 8 के स्टूडेंट्स के लिए सोशल साइंस की नई टेक्स्ट बुक जारी की थी। ये किताब एकेडमिक सेशन 2026-27 से स्कूलों में पढ़ाई जानी थी। इसका पहला पार्ट जुलाई 2025 में रिलीज किया गया था। किताब का नाम ‘एक्सप्लोरिंग सोसायटी: इंडिया एंड बियॉन्ड पार्ट 2’ है। इसमें ‘द रोल ऑफ द ज्यूडीशियरी इन अवर सोसायटी’ चैप्टर के अंदर ‘करप्शन इन द ज्यूडिशियरी’ का टॉपिक जोड़ा गया है। इसमें कहा गया है कि भ्रष्टाचार, बड़ी संख्या में पेंडिंग मामले और जजों की भारी कमी ज्यूडिशियल सिस्टम के सामने प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं। जज आचार संहिता से बंधे होते हैं, जो न केवल कोर्ट में उनके व्यवहार को कंट्रोल करता है, बल्कि कोर्च के बाहर उनके आचरण को भी तय करती है। किताब के एक सेक्शन का टाइटल ‘Justice delayed is justice denied’ है। इसका मतलब है- इंसाफ में देरी इंसाफ न मिलने जैसा है। यहां सुप्रीम कोर्ट में 81 हजार, हाईकोर्ट्स में 62 लाख 40 हजार, डिस्ट्रिक्ट और सबऑर्डिनेट कोर्ट के 4 करोड़ 70 लाख पेंडिंग केस की संख्या भी बताई गई है। किताब का वो हिस्सा जिसमें करप्शन और पेंडिंग केस का जिक्र… नई किताब में ज्यूडीशियरी से जुड़े अहम पॉइंट्स… इसमें कोर्ट की हायरार्की और न्याय तक पहुंच को समझाने से ज्यादा ज्यूडीशियल सिस्टम के सामने आने वाली चुनौतियों जैसे करप्शन और केस बैकलॉग को बताया गया है। करप्शन वाले सेक्शन में बताया गया है कि जज एक कोड ऑफ कंडक्ट से बंधे होते हैं जो न केवल कोर्ट में बल्कि कोर्ट के बाहर भी उनके व्यवहार को कंट्रोल करता है। ज्यूडिशियरी के अंदरूनी अकाउंटेबिलिटी सिस्टम को भी समझाया गया है। सेंट्रलाइज्ड पब्लिक ग्रीवांस रिड्रेस एंड मॉनिटरिंग सिस्टम (CPGRAMS) के जरिए शिकायतें लेने के तय तरीके भी बताए गए हैं। किताब के मुताबिक CPGRAMS सिस्टम के जरिए 2017 और 2021 के बीच 1,600 ज्यादा शिकायतें मिली थीं। किताब में गंभीर मामलों में जजों को हटाने के संवैधानिक नियम के बारे में भी बताया गया है कि पार्लियामेंट इंपीचमेंट मोशन पास करके जज को हटा सकती है। बच्चे पढ़ेंगे कि ऐसे मोशन पर सही जांच के बाद ही विचार किया जाता है। इस दौरान जज को मामले में अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाता है। चैप्टर में लिखा है- लोग ज्यूडिशियरी के अलग-अलग लेवल पर करप्शन का सामना करते हैं। गरीबों और जरूरतमंदों की न्याय तक पहुंच की समस्या और बिगड़ सकती है। यह भी बताया है कि राज्य और केंद्र ट्रांसपेरेंसी और पब्लिक ट्रस्ट को मजबूत करने की कोशिशें कर रहे हैं। इसमें टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल और करप्शन के मामलों के खिलाफ फास्ट एक्शन लेना शामिल है। किताब में पूर्व CJI बीआर गवई का भी जिक्र किताब में भारत के पूर्व चीफ जस्टिस बीआर गवई का भी जिक्र है, जिन्होंने जुलाई 2025 में कहा था कि ज्यूडिशियरी के अंदर करप्शन और गलत कामों के मामलों का पब्लिक ट्रस्ट पर बुरा असर पड़ता है। उन्होंने कहा था, ‘हालांकि, इस ट्रस्ट को फिर से बनाने का रास्ता इन मुद्दों को सुलझाने के लिए उठाए गए तेज, निर्णायक और ट्रांसपेरेंट एक्शन में है… ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी डेमोक्रेटिक गुण हैं।’ NCERT की किताब वेबसाइट पर मौजूद नहीं NCERT की 8वीं क्लास की सोशल साइंस का पार्ट 2 इसी हफ्ते जारी हुआ था। CJI की टिप्पणी के बाद ये किताब NCERT की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में प्याज-लहसुन को तामसिक मानने की याचिका:CJI ने पूछा-आधी रात को पिटीशन ड्राफ्ट करते हो क्या; फालतू बताकर 5 याचिकाएं खारिज

सुप्रीम कोर्ट में एक वकील ने 5 पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन(PIL)/जनहित याचिका फाइल की थीं। इनमें से एक कहा गया था कि प्याज और लहसुन में तामसिक या नेगेटिव एनर्जी होती है या नहीं इसके लिए रिसर्च की मांग की गई थी। इस पर सोमवार को सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया(CJI) सूर्यकांत ने एडवोकेट सचिन गुप्ता को फटकार लगाई। CJI ने पूछा- आधी रात को ये सब पिटीशन ड्राफ्ट करते हो क्या? CJI और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने वकील की पांचों PIL अस्पष्ट, फालतू और बेबुनियाद बताकर खारिज कर दीं। पिटीशनर ने जवाब दिया कि यह एक आम मुद्दा है और दावा किया कि गुजरात में खाने में प्याज के इस्तेमाल को लेकर कथित तौर पर एक तलाक हुआ था। CJI बोले- आप जैन समुदाय की भावना को ठेस पहुंचाना चाहते हैं प्याज और लहसुन से संबंधित पिटीशन में जैन समुदाय के खाने-पीने के तरीकों का जिक्र था, जो पारंपरिक रूप से प्याज, लहसुन और जड़ वाली सब्जियों को तामसिक खाना मानते हुए उनसे परहेज करते हैं। CJI ने गुप्ता से पूछा, “आप जैन समुदाय की भावनाओं को ठेस क्यों पहुँचाना चाहते हैं? बेंच ने कहा- आप वकील नहीं होते फाइन लगाते बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि अगर पिटीशनर वकील नहीं होता तो हम बहुत ज्यादा फाइन लगाकर इसे खारिज करते। बेंच ने आगे कहा कि याचिका कैजुअल ड्राफ्टिंग और सुप्रीम कोर्ट पर बोझ डालने का एक उदाहरण है। गुप्ता को चेतावनी दी गई कि अगली बार जब आप ऐसी पिटीशन फाइल करेंगे, तो बहुत ज्यादा फाइन लगाएंगे। एडवोकेट सचिन गुप्ता की ये याचिकाएं भी खारिज ————– ये खबर भी पढ़ें… सुप्रीम कोर्ट बोला-AI जेनरेटेड सबूतों पर फैसला लेना बिल्कुल गलत:इसका सीधा असर न्याय प्रक्रिया पर पड़ता है सुप्रीम कोर्ट ने 2 मार्च को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार सबूतों के आधार पर फैसला लिखना गलत है। जस्टिस पी एस नरसिम्हा और आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि यह साधारण गलती नहीं हो सकती। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि इसका सीधा असर न्याय देने की प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर पड़ता है। पूरी खबर पढ़ें…
Companies to Get ₹14.5 Lakh Crore Refund, Supreme Court Slams Trump

Hindi News Business US Trade Tariffs: Companies To Get ₹14.5 Lakh Crore Refund, Supreme Court Slams Trump वॉशिंगटन4 दिन पहले कॉपी लिंक अमेरिका की इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन को आदेश दिया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगाए गए टैरिफ का पैसा कंपनियों को लौटाया जाए। टैरिफ से दिसंबर तक 10.79 लाख करोड़ रुपए वसूले गए थे और कुल रिफंड 14.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। जज रिचर्ड ईटन ने लंबित मामलों में टैरिफ हटाकर दोबारा कैलकुलेशन करने को कहा। ट्रम्प ने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट-1977 के तहत कई देशों पर टैरिफ लगाए थे। अमेरिकी कंपनियों ने कोर्ट में चुनौती दी। 20 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ रद्द करते हुए कहा कि टैरिफ तय करने का अधिकार कांग्रेस के पास है राष्ट्रपति के पास नहीं। तब रिफंड पर स्पष्टता नहीं थी। टेनेसी की एटमस फिल्ट्रेशन की याचिका पर जज ने रिफंड का आदेश दिया है। क्लिंटन ने की थी ईटन की नियुक्ति, टैरिफ रिफंड के केस भी वही सुनेंगे पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 1999 में जज ईटन की नियुक्ति की थी। ईटन ने कहा कि टैरिफ रिफंड की सुनवाई वे खुद करेंगे, ताकि रिफंड प्रक्रिया उलझे नहीं। ट्रम्प सरकार के पास अब ये 3 विकल्प 1. अपील: सरकार ऊपरी कोर्ट में चुनौती दे। 2. स्टे: सरकार अस्थायी रोक मांग सकती है। 3. देरी: कस्टम्स में लिक्विडेशन (अंतिम हिसाब) के बाद आयातक को दावा/चुनौती के लिए 180 दिन मिलते हैं। इससे सरकार भी रिफंड 6 माह तक टाल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प को लगाई थी फटकार, कहा- हर देश से युद्ध की स्थिति में नहीं ट्रम्प ने पिछले साल अप्रैल में ग्लोबल टैरिफ का ऐलान किया था। इससे पहले 20 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प प्रशासन को फटकारते हुए कहा था कि अमेरिका दुनिया के हर देश के साथ युद्ध की स्थिति में नहीं है। हालांकि फैसले को लेकर 3 जजों- जस्टिस सैमुअल एलिटो, क्लेरेंस थॉमस और ब्रेट कैवनॉ ने इस फैसले से असहमति जताई। कैवनॉ ने अपने नोट में लिखा कि टैरिफ नीति समझदारी भरी है या नहीं, यह अलग सवाल है, लेकिन उनके मुताबिक यह कानूनीतौर पर वैध थी। कैवनॉ ने अपने नोट में भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर लगाए गए टैरिफ का भी जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि ये टैरिफ विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों के तहत लगाए गए थे। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में कुल 9 जज हैं। इनमें से 6 जजों को रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किया है, जबकि 3 जज डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किए। फैसले के खिलाफ वोट करने वाले तीनों जज रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों ने नियुक्त किए थे। ट्रम्प भी रिपब्लिकन पार्टी से हैं। ट्रम्प ने 24 घंटे में ग्लोबल टैरिफ बढ़ाकर 15% कर दिया था सुप्रीम कोर्ट के फैसले से नाराज होकर ट्रम्प ने अगले ही दिन ग्लोबल टैरिफ 10% से बढ़ाकर 15% करने का ऐलान कर दिया था। ट्रम्प ने एक आदेश पर हस्ताक्षर कर दुनियाभर के देशों पर नया टैरिफ लगा दिया था। यह 15% टैरिफ 24 फरवरी से लागू हो गया है। इससे पहले उन्होंने टैरिफ को अवैध बताने वाले जजों की भी आलोचना की। ट्रम्प ने कहा था- मुझे कोर्ट के कुछ जजों पर शर्म आ रही है। वे देश के लिए कलंक हैं, उनमें हमारे देश के लिए सही काम करने की हिम्मत नहीं है। ट्रम्प ने 49 साल पुराने कानून का इस्तेमाल कर टैरिफ लगाया था ट्रम्प के टैरिफ विवाद के केंद्र में एक कानून है, जिसका नाम इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) है। यह कानून 1977 में बनाया गया था। इसका मकसद यह था कि अगर देश पर कोई गंभीर खतरा जैसे युद्ध जैसी स्थिति, विदेशी दुश्मन से बड़ा आर्थिक खतरा या असाधारण अंतरराष्ट्रीय संकट आए तो राष्ट्रपति को कुछ खास शक्तियां दी जा सकें। इन शक्तियों के तहत राष्ट्रपति विदेशी लेन-देन पर रोक लगा सकता है, उन्हें नियंत्रित कर सकता है या कुछ आर्थिक फैसले तुरंत लागू कर सकता है। ट्रम्प ने टैरिफ लगाने के लिए IEEPA का ही सहारा लिया था। निचली अदालतों ने टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था इससे पहले निचली अदालतों (कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड और फेडरल सर्किट कोर्ट) ने टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था। उनका मानना था कि IEEPA टैरिफ लगाने की इतनी व्यापक शक्ति नहीं देता। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में मौखिक बहस सुनी थी, जहां जजों ने ट्रम्प की ओर से पेश की गईं दलीलों पर संदेह जताया था। कोर्ट के 6-3 बहुमत के बावजूद, जस्टिस ने पूछा था कि क्या राष्ट्रपति कांग्रेस की मंजूरी के बिना इतने बड़े पैमाने पर टैरिफ लगा सकता है, क्योंकि टैरिफ टैक्स का रूप हैं और यह संसद की जिम्मेदारी हैं। ——————- ट्रम्प के टैरिफ से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प के इमरजेंसी टैरिफ की वसूली बंद:समझौते से पीछे हटने वाले देशों को ट्रम्प की धमकी, कहा- गेम मत खेलो, ऊंचे टैरिफ लगाऊंगा अमेरिकी सरकार आज से राष्ट्रपति ट्रम्प की तरफ से लगाए गए इमरजेंसी टैरिफ की वसूली बंद कर देगी। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को टैरिफ समझौते से पीछे हटने वाले देशों को चेतावनी दी है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…









