ग्वालियर में मेडिकल स्टूडेंट के लिए बनाया ग्रीन कॉरिडोर:एक दिन पहले आया था हार्ट अटैक, जान बचाने सड़क मार्ग से ले गए दिल्ली

ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज के एक स्टूडेंट को एक दिन पहले हार्ट अटैक आया था। छात्र वेंटिलेटर पर है। उसे शनिवार रात को ग्रीन कॉरिडोर बनाकर सड़क मार्ग से दिल्ली के लिए ले जाया गया है। प्रशासन, पुलिस व स्वास्थ्य विभाग ने संयुक्त रूप से काम कर जयारोग्य अस्पताल के कार्डियोलॉजी विभाग से मुरैना रोड के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाया। सड़क पर ट्रैफिक को रोक दिया गया और मेडिकल स्टूडेंट को एडवांस लाइफ सपोर्ट सिस्टम से लैस एम्बुलेंस के जरिए दिल्ली ले जाया है। रात 11 बजे ग्वालियर की सीमा से एंबुलेंस बाहर निकल गई थी। इंटर्नशिप कर रहे छात्र को आया था अटैक शुक्रवार शाम 7 बजे के लगभग ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज (जीआरएमसी) से इंटर्रशिप कर रहे दिल्ली निवासी मेडिकल स्टूडेंट शैलेंद्र पांडेय (25) को हार्ट अटैक आ गया था। तत्काल उसे जेएएच के कार्डियोलॉजी विभाग में भर्ती कराया था। छात्र की हालत शुक्रवार शाम से ही नाजुक बनी हुई थी और वह वेंटिलेटर पर था। शनिवार को उसकी हालत में कोई सुधार नहीं आया और हालत और बिगड़ी है, जिसके बाद मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. आरकेएस धाकड़ ने छात्र के परिजन से बातचीत कर उसे दिल्ली पहुंचाने की बातचीत आगे बढ़ाई। शनिवार को शहर में शादियों के कारण काफी जाम के हालात थे। छात्र को एम्बुलेंस से समय पर निकाला जा सके इसके लिए एसएसपी ग्वालियर धर्मवीर सिंह से मदद मांगी और ग्रीन कॉरिडोर बनाने के लिए कहा। एसएसपी ग्वालियर धर्मवीर सिंह ने तत्काल ट्रैफिक पुलिस से लेकर थाना पुलिस को अलर्ट किया। ग्रीन कॉरिडोर बनाकर इन रास्तों से निकाली गई एम्बुलेंस शनिवार रात को जेएएच के कार्डियोलॉजी विभाग से जीवाजी क्लब के सामने, एजी ऑफिस पुल, सिटी सेंटर, गोला का मंदिर से हजीरा, पुरानी छावनी होते हुए मुरैना-दिल्ली रोड के लिए निकाला गया है। मेडिकल स्टूडेंट के साथ उसके मां-पिता भी साथ में हैं। छात्र के साथ एम्बुलेंस में कार्डियोलॉजी एवं एनेस्थीसिया विशेषज्ञ डॉक्टर को भी रवाना किया है। एयर एम्बुलेंस का इंतजाम नहीं हो सका पहले छात्र को एयर एम्बुलेंस के जरिए दिल्ली ले जाने का तय हुआ था। शनिवार दोपहर से इसकी कवायत भी शुरू कर दी गई थी, लेकिन तकनीकी कारणों के चलते एयर एम्बुलेंस से उसे ले जाना संभव नहीं हो सका। जिसके बाद शनिवार रात को सड़क मार्ग से दिल्ली ले जाने का फैसला लिया गया। जीआरएमसी के डीन डॉ. आरकेएस धाकड़ ने कहा कि मेडिकल स्टूडेंट को हार्ट अटैक आया था उसके परिजन की मांग पर बेहत्तर इलाज के लिए एडवांस लाइफ सपोर्ट सिस्टम से लैस एम्बुलेंस के जरिए दिल्ली भेजा गया है। जिसके लिए ग्रीन कॉरिडोर भी बनाया गया था।
कांग्रेस कार्यालय के बाहर राहुल गांधी का पुतला दहन:छतरपुर में भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा का प्रदर्शन, पुलिस से धक्कामुक्की भी हुई

छतरपुर में शनिवार शाम भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा ने कांग्रेस और राहुल गांधी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। एआई इम्पैक्ट समिट विवाद को लेकर युवा मोर्चा कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस कार्यालय के बाहर राहुल गांधी का पुतला दहन किया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़प भी हुई। युवा मोर्चा के कार्यकर्ता चौबे कॉलोनी से पैदल रैली निकालकर डाकखाना चौराहे पहुंचे। वहां उन्होंने राहुल गांधी के खिलाफ नारे लगाए। इसके बाद रैली कांग्रेस कार्यालय की ओर बढ़ी, जहां कार्यकर्ताओं ने पुतला दहन करने का प्रयास किया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बैरिकेडिंग की थी, लेकिन कार्यकर्ताओं ने बैरिकेड तोड़ दिए। वे आगे बढ़े और राहुल गांधी का पुतला फूंक दिया। पुलिसकर्मियों ने जलते पुतले से ज्वलनशील पदार्थ हटाए और आग पर काबू पाया। स्थिति को नियंत्रित करने और सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए मौके पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। कहा- कांग्रेस की देशविरोधी नीतियां बर्दाश्त नहीं युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष नीरज चतुर्वेदी ने इस दौरान कहा कि कांग्रेस की कथित देशविरोधी नीतियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ऐसी गतिविधियां जारी रहती हैं, तो आंदोलन को और तेज किया जाएगा। इस प्रदर्शन में युवा मोर्चा के बड़ी संख्या में कार्यकर्ता उपस्थित रहे। पुलिस ने पुतले को लेकर छीना-झपटी की पुतला दहन को लेकर भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा जिलाध्यक्ष नीरज चतुर्वेदी की टीम जैसे ही पुतला दहन के लिए चौराहे पर पहुंची, पहले से तैनात पुलिस बल ने उन्हें रोक लिया। इसके बाद मौके पर हाई-वोल्टेज ड्रामा शुरू हो गया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, कार्यकर्ता नारेबाजी करते हुए पुतला जलाने पर अड़े रहे, जबकि पुलिस ने बिना अनुमति प्रदर्शन का हवाला देते हुए कार्रवाई की चेतावनी दी। इसी दौरान पुतले को लेकर छीना-झपटी की स्थिति बनी और सड़क पर अफरा-तफरी मच गई। कुछ देर के लिए यातायात भी प्रभावित रहा। पुलिस की सख्ती के बावजूद कार्यकर्ताओं का आक्रोश भारी पड़ा और वे पुतला दहन की मांग पर डटे रहे।
आधी रात, सुनसान सड़क और 3 लुटेरे; परिवार को बचाने तलवार लेकर सड़क पर निकल गई लुधियाना की सिखनी

होमवीडियोक्राइम आधी रात, सुनसान सड़क और 3 लुटेरे; परिवार को बचाने तलवार लेकर सड़क पर निकल गई लुधियाना की सिखनी X आधी रात, सुनसान सड़क और 3 लुटेरे; परिवार को बचाने तलवार लेकर सड़क पर निकल गई लुधियाना की सिखनी लुधियाना में ऑस्ट्रेलिया निवासी NRI हरजिंद कौर ने अदम्य साहस दिखाते हुए बदमाशों के लूट के मंसूबों को नाकाम कर दिया. ब्रिसबेन में एंकरिंग करने वाली हरजिंद अपनी सास और चाची के साथ कार से जा रही थीं. इसी दौरान बदमाशों ने कार के शीशे पर अंडे फेंककर उन्हें रोकने की साजिश रची. खतरे को भांपते हुए हरजिंद ने डरने के बजाय कार में रखी तलवार निकाल ली. उन्होंने रौद्र रूप अपनाकर लुटेरों को खुलेआम ललकारा, जिसे देख हमलावर डरकर भाग खड़े हुए. हरजिंद ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह कदम परिवार की सुरक्षा के लिए उठाया. उन्होंने युवतियों को आत्मरक्षा के लिए ‘गतका’ सीखने और शस्त्र साथ रखने की नसीहत दी है ताकि वे सुरक्षित रह सकें.लुधियाना में ऑस्ट्रेलिया निवासी NRI हरजिंद कौर ने अदम्य साहस दिखाते हुए बदमाशों के लूट के मंसूबों को नाकाम कर दिया. ब्रिसबेन में एंकरिंग करने वाली हरजिंद अपनी सास और चाची के साथ कार से जा रही थीं. इसी दौरान बदमाशों ने कार के शीशे पर अंडे फेंककर उन्हें रोकने की साजिश रची. खतरे को भांपते हुए हरजिंद ने डरने के बजाय कार में रखी तलवार निकाल ली. उन्होंने रौद्र रूप अपनाकर लुटेरों को खुलेआम ललकारा, जिसे देख हमलावर डरकर भाग खड़े हुए. हरजिंद ने स्पष्ट किया कि उन्होंने यह कदम परिवार की सुरक्षा के लिए उठाया. उन्होंने युवतियों को आत्मरक्षा के लिए ‘गतका’ सीखने और शस्त्र साथ रखने की नसीहत दी है ताकि वे सुरक्षित रह सकें.
मतपत्र और विश्वास: क्या धर्म बंगाल के चुनावी विमर्श को नया आकार दे रहा है? यहाँ जानिए News18 को क्या मिला | राजनीति समाचार

आखरी अपडेट:21 फरवरी, 2026, 22:38 IST मस्जिद निर्माण, मंदिर परियोजनाओं और अल्पसंख्यक अधिकारों के इर्द-गिर्द प्रतिस्पर्धात्मक आख्यानों ने पश्चिम बंगाल में राजनीतिक बयानबाजी तेज कर दी है कोलकाता में एक दुर्गा-थीम वाले सांस्कृतिक परिसर (दुर्गा आंगन) की योजना 270 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के साथ 18 एकड़ में बनाई गई है। छवि/न्यूज़18 जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल एक महत्वपूर्ण चुनाव चक्र में प्रवेश कर रहा है, पार्टियों के बीच राजनीतिक संदेश से पता चलता है कि अभियान कथाओं में धर्म एक दृश्य विषय के रूप में उभर रहा है। एक तरफ प्रस्तावित बाबरी मस्जिद परियोजना और दूसरी तरफ राज्य सरकार द्वारा समर्थित बड़े पैमाने पर मंदिर और सांस्कृतिक परियोजनाओं के आसपास बहस तेज होने के साथ, मुख्य सवाल यह है: क्या चुनावी चर्चा शासन से आस्था-आधारित लामबंदी की ओर स्थानांतरित हो रही है? बाबरी मस्जिद प्रस्ताव और हुमायूँ कबीर की राजनीतिक पिच निष्कासित टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर द्वारा प्रस्तावित बाबरी मस्जिद परियोजना से संबंधित कार्य शुरू करने के बाद बहस में तेजी आई। कबीर, जिन्हें पहले कथित तौर पर मस्जिद मुद्दे पर उनके रुख के कारण तृणमूल कांग्रेस द्वारा निष्कासित कर दिया गया था, ने तब से जनता उन्नयन पार्टी नाम से एक नया राजनीतिक संगठन लॉन्च किया है। प्रस्तावित मस्जिद के शिलान्यास समारोह में एक बड़ी भीड़ देखी गई। कबीर ने 1,200 कुरान पाठ और “बाबरी यात्रा” की योजना की भी घोषणा की। हालाँकि सस्वर पाठ कार्यक्रम में उपस्थिति महत्वपूर्ण थी, लेकिन कथित तौर पर यात्रा में तुलनात्मक रूप से कम भीड़ उमड़ी। पर्यवेक्षकों ने नोट किया कि कबीर ने कार्यक्रम के दौरान विजय संकेत प्रदर्शित किए, जिससे आलोचना हुई कि यह पहल राजनीति से प्रेरित थी। कबीर ने एक स्पष्ट बयान में न्यूज 18 से कहा, “ममता बनर्जी धर्म के साथ राजनीति करती हैं। बीजेपी नेता भी धर्म के साथ राजनीति करते हैं। मेरे पास धर्म के साथ राजनीति करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है और मैं इसे स्पष्ट रूप से स्वीकार करता हूं।” उनकी टिप्पणियों ने इस तर्क को हवा दी है कि धर्म को जानबूझकर राजनीतिक क्षेत्र में लाया जा रहा है। हालाँकि, समर्थकों का दावा है कि वह उस बात का जवाब दे रहे हैं जिसे वे सत्तारूढ़ दल द्वारा धार्मिक प्रतीकों के उपयोग के रूप में वर्णित करते हैं। अल्पसंख्यक भावना और राजनीतिक असंतोष क्षेत्र के कुछ हिस्सों में, वक्फ अधिनियम, एसआईआर और ओबीसी से संबंधित चिंताओं जैसे मुद्दों पर अल्पसंख्यक मतदाताओं के वर्गों में असंतोष दिखाई देता है। कुछ मतदाताओं ने निराशा व्यक्त करते हुए सवाल उठाया कि क्या पहले किए गए वादे प्रभावी ढंग से निभाए गए थे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का सुझाव है कि कबीर इस भावना का फायदा उठाने और खुद को अल्पसंख्यक हितों के रक्षक के रूप में स्थापित करके समर्थन मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। राज्य द्वारा मंदिर और सांस्कृतिक परियोजनाएँ इसके साथ ही, राज्य सरकार ने कई बड़ी धार्मिक और सांस्कृतिक परियोजनाएँ शुरू की हैं: कोलकाता में एक दुर्गा-थीम वाले सांस्कृतिक परिसर (दुर्गा आंगन) की योजना 270 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत के साथ 18 एकड़ में बनाई गई है। जगन्नाथ धाम परियोजना पहले ही विकसित हो चुकी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने महाकाल मंदिर की योजना की घोषणा की। दुर्गा आंगन परियोजना स्थल. छवि/न्यूज़18 सरकार इन पहलों को सांस्कृतिक और विरासत परियोजनाओं के रूप में वर्णित करती है। हालाँकि, आलोचकों का तर्क है कि धार्मिक स्थलों पर दिखाई देने वाला जोर एक रणनीतिक राजनीतिक पुनर्गणना का संकेत देता है। राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ तृणमूल कांग्रेस ने धार्मिक राजनीति के आरोपों को खारिज कर दिया है. पार्टी प्रवक्ता कुणाल घोष ने News18 को बताया कि धर्म-आधारित राजनीति मुख्य रूप से भाजपा का क्षेत्र है और उन्होंने जोर देकर कहा कि विकास और सांप्रदायिक सद्भाव बंगाल में मुख्य मुद्दे बने हुए हैं। हालाँकि, भाजपा टीएमसी के प्रतिवाद को खारिज करती है। भाजपा नेता अग्निमित्र पॉल ने कहा कि युवाओं के लिए शासन और रोजगार वास्तविक मुद्दे हैं, उनका तर्क है कि मंदिर निर्माण राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। इस बीच, कांग्रेस नेता अधीर चौधरी की तीन दिन की ईद की छुट्टी की मांग पर भी बहस छिड़ गई है, आलोचकों ने इस कदम के पीछे चुनावी प्रेरणा का सुझाव दिया है। आईएसएफ के प्रमुख नौशाद सिद्दीकी ने शिक्षा और विकास को प्राथमिकता वाले मुद्दों के रूप में जोर देते हुए मतदाताओं से धर्म के नाम पर मतदान नहीं करने की अपील की। राज्य सचिव मोहम्मद सलीम के हुमायूं कबीर से मुलाकात के बाद सीपीआई (एम) भी चर्चा में आई। सलीम ने इसे एक राजनीतिक जुड़ाव बताया जिसका उद्देश्य धर्म-आधारित राजनीति का समर्थन करने के बजाय उसे हतोत्साहित करना है। मतदाता क्या कह रहे हैं? कोलकाता में अनौपचारिक “चा अड्डा” में, कई नागरिकों ने सुझाव दिया कि यद्यपि धार्मिक प्रकाशिकी दिखाई दे रही है, शासन और विकास निर्णायक कारक बने रहने की संभावना है। कुछ मतदाताओं का मानना है कि बंगाल की राजनीतिक संस्कृति परंपरागत रूप से प्रत्यक्ष सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का विरोध करती है, हालांकि वे स्वीकार करते हैं कि धार्मिक प्रतीकवाद मतदाताओं के एक वर्ग को प्रभावित कर सकता है। बड़ा सवाल इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस चुनावी मौसम में धर्म प्रचार अभियान में शामिल हो गया है। मस्जिद निर्माण, मंदिर परियोजनाओं और अल्पसंख्यक अधिकारों के इर्द-गिर्द प्रतिस्पर्धात्मक आख्यानों ने राजनीतिक बयानबाजी तेज कर दी है। हालाँकि, क्या धर्म अंततः मतदान व्यवहार का निर्धारण करेगा, यह अनिश्चित बना हुआ है। ऐतिहासिक रूप से, बंगाल के चुनाव शासन, कल्याण और विकास के मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं। यह चुनाव इस बात की परीक्षा कर सकता है कि क्या यह प्रवृत्ति जारी रहती है – या क्या आस्था-आधारित लामबंदी को मजबूत आधार मिलता है। अंततः, यह मतदाता ही तय करेंगे कि क्या मतदान धर्म पर केंद्रित होगा या फिर रोटी-रोजी की चिंता पर लौटेगा। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना पहले प्रकाशित: 21 फरवरी, 2026, 22:29 IST समाचार राजनीति मतपत्र और विश्वास: क्या धर्म बंगाल के चुनावी विमर्श को नया आकार दे रहा है? यहां देखिए News18 को क्या मिला अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18
मलाई सी कोमल, रोगों में संजीवनी…कांडा की गडेरी के कहने ही क्या, क्यों पहाड़ी थाली की जान, जानें सीक्रेट – Uttarakhand News

Last Updated:February 21, 2026, 22:22 IST कांडा की गडेरी को गरमा-गरम मडुवे की रोटी के साथ खाना पहाड़ की सबसे पसंदीदा परंपरा है. मडुवा पहाड़ों का प्रमुख अनाज है और सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है. गडेरी की मलाईदार सब्जी और मडुवे की मोटी रोटी पौष्टिक भोजन में शामिल है. स्थानीय लोग इसकी तुलना मलाई या मक्खन से करते हैं, क्योंकि पकने के बाद यह बेहद मुलायम हो जाती है. इसके टुकड़े इतने नरम होते हैं कि मुंह में रखते ही घुल जाते हैं. कांडा क्षेत्र की उपजाऊ मिट्टी और ठंडी जलवायु गडेरी की गुणवत्ता को कई गुना बढ़ा देती है. शहरों में लोग इसका और ऊंचे दाम देने को तैयार रहते हैं. उत्तराखंड के बागेश्वर जिला का कांडा क्षेत्र अपनी खास गडेरी के लिए जाना जाता है. यह गडेरी साधारण अरबी नहीं, बल्कि स्वाद और बनावट में बिल्कुल अलग मानी जाती है. स्थानीय लोग इसकी तुलना मलाई या मक्खन से करते हैं, क्योंकि पकने के बाद यह बेहद मुलायम हो जाती है. कांडा की गडेरी सिर्फ एक सब्जी नहीं, बल्कि यहां की कृषि परंपरा और जीवनशैली का अहम हिस्सा है. सर्दियों में यह हर घर की थाली में नजर आती है. इसकी लोकप्रियता अब पहाड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि मैदानी इलाकों तक इसकी मांग बढ़ रही है. वरिष्ठ पत्रकार व स्थानीय जानकार पंकज डसीला लोकल 18 से बताते हैं कि कांडा की गडेरी को मलाई जैसा कहे जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण इसकी कोमलता है. जब इसे पकाया जाता है, तो यह बहुत जल्दी गल जाती है. इसके टुकड़े इतने नरम होते हैं कि मुंह में रखते ही घुल जाते हैं. यही गुण इसे आम अरबी से अलग बनाता है. स्वाद में हल्की प्राकृतिक मिठास और चिकनाहट इसे और खास बना देती है. पहाड़ों में जहां भोजन सादा लेकिन पौष्टिक होता है, वहां ऐसी मलाईदार सब्जी लोगों को खास लगती है. इसे बुजुर्ग और बच्चों दोनों के लिए बेहतर आहार माना जाता है. कांडा क्षेत्र की उपजाऊ मिट्टी और ठंडी जलवायु गडेरी की गुणवत्ता को कई गुना बढ़ा देती है. यहां दिन और रात के तापमान में अंतर रहता है, जिससे कंद का विकास बेहतर होता है. यही कारण है कि कांडा की गडेरी सामान्य अरबी से बड़ी हो जाती है. मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक पोषक तत्व इसके स्वाद और बनावट को निखारते हैं. किसान पीढ़ियों से इसी क्षेत्र में गडेरी की खेती करते आ रहे हैं, अनुभव के आधार पर बीज का चयन करते हैं. यह प्राकृतिक संतुलन ही कांडा की गडेरी को खास और दुर्लभ बनाता है. Add News18 as Preferred Source on Google कांडा की गडेरी की एक बड़ी खासियत है, इसकी जैविक खेती. यहां के किसान रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं करते है. गोबर की खाद और जंगल से मिलने वाली प्राकृतिक खाद का उपयोग किया जाता है. इससे गडेरी न सिर्फ स्वाद में बेहतर होती है, बल्कि सेहत के लिए भी सुरक्षित रहती है. आज के समय में जब लोग केमिकल युक्त सब्जियों से परेशान हैं, कांडा की गडेरी शुद्ध भोजन का उदाहरण बनती जा रही है. यही वजह है कि शहरों में भी लोग इसे खास तौर पर ढूंढते हैं और ऊंचे दाम देने को तैयार रहते हैं. पहाड़ी इलाकों में सर्दियां काफी कठोर होती हैं. ऐसे में कांडा की गडेरी को सर्दियों की खास डाइट माना जाता है. इसकी तासीर गर्म होती है, जिससे शरीर को अंदर से ऊर्जा मिलती है. यह ठंड से होने वाले जोड़ों के दर्द और कमजोरी में भी फायदेमंद है. खेतों में मेहनत करने वाले किसान इसे ताकत का स्रोत मानते हैं. सर्दियों के मौसम में गडेरी की सब्जी या भुजिया लगभग हर घर में बनती है, जिससे शरीर गर्म और सक्रिय बना रहता है. कांडा की गडेरी को बनाने का तरीका भी इसे खास बनाता है. इसे अक्सर लोहे की कड़ाही में पकाया जाता है, जिससे इसका स्वाद और बढ़ जाता है. इसमें भांग के दानों का रस डाला जाता है, जो पहाड़ी खाने की पहचान है. भांग का हल्का स्वाद गडेरी की मलाईदार बनावट के साथ बेहतरीन मेल बनाता है. इसे धीमी आंच पर पकाया जाता है ताकि इसके पोषक तत्व सुरक्षित रहें. यही पारंपरिक तरीका पीढ़ियों से चला आ रहा है, आज भी लोग इसे उसी तरह बनाना पसंद करते हैं. कांडा की गडेरी को गरमा-गरम मडुवे की रोटी के साथ खाना यहां की सबसे पसंदीदा परंपरा है. मडुवा पहाड़ों का प्रमुख अनाज है और सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है. गडेरी की मलाईदार सब्जी और मडुवे की मोटी रोटी पौष्टिक भोजन में शामिल है. साथ में भांग की चटनी स्वाद को और बढ़ा देती है. यह भोजन सिर्फ पेट नहीं भरता, बल्कि पहाड़ की संस्कृति और परंपरा का स्वाद भी कराता है. कांडा क्षेत्र सिर्फ गडेरी के लिए ही नहीं, बल्कि अपने धार्मिक और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी जाना जाता है. यहां स्थित कालिका मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है. साथ ही क्षेत्र के चाय बागान पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. जो लोग यहां घूमने आते हैं, वे कांडा की गडेरी का स्वाद लेना नहीं भूलते. धीरे-धीरे यह सब्जी स्थानीय पर्यटन का भी हिस्सा बनती जा रही है. स्वाद, सेहत और संस्कृति-तीनों का संगम कांडा की गडेरी को सच में खास बनाता है. First Published : February 21, 2026, 22:22 IST
आयुर्वेद के अनुसार खाने का सही समय सूरज के साथ क्यों जरूरी है

भूख लगने पर खाना के सिवा कुछ नहीं दिखता है, और न खाओ तो सबसे पहले दिमाग काम करना बंद कर देता है. इसलिए लोग खाने के सही समय को नजरअंदाज करके इस बात पर ध्यान देते हैं, कि जब भूख लगे तब खाना खा लेना चाहिए.जबकि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद के अनुसार, हमारा शरीर कोई मशीन नहीं है, बल्कि प्रकृति का हिस्सा है. इसे ठीक रखने के लिए दवाइयों या सख्त डाइट की बजाय सूरज के रिदम का सम्मान करना चाहिए. वास्तव में बॉडी सन क्लॉक के हिसाब से चलती है.सदियों पुराना आयुर्वेद यही सिखाता आ रहा है कि खाने का समय घड़ी से नहीं, बल्कि सूर्योदय और सूर्यास्त से तय होना चाहिए. जब हम सूरज के साथ खाते हैं तो पाचन तंत्र मजबूत होता है और शरीर अंदर से खुद ठीक होने लगता है. बीमारियों की जड़ सूरज को नजरअंदाज करनाआजकल हम घड़ी के हिसाब से जीते हैं, जिससे शरीर सूरज के पीछे चलता है. जब हम सूरज ढलने के बाद भी भारी खाना खाते हैं तो पाचन तंत्र पर बोझ पड़ता है और कई बीमारियां शुरू हो जाती हैं. आयुर्वेद का मूल मंत्र है– जब सूरज तेज हो, तब खाएं; जब सूरज डूब जाए, तब आराम करें. इस साधारण नियम को अपनाकर लोग बिना किसी सख्त डाइट के स्वस्थ रह सकते हैं. हर समय का खाना अलग होना चाहिएब्रेकफास्टआयुर्वेद के अनुसार, दिन के तीन मुख्य समय हैं और हर समय का खाना अलग होना चाहिए. सुबह की शुरुआत हल्के और सादे भोजन से करें. सूरज उगते ही शरीर में पाचन की आग धीरे-धीरे जलनी शुरू होती है, इसलिए भारी या तला-भुना खाना न खाएं. इसके बजाय हल्दी वाला दूध, पोहा, उपमा, इडली, पोहा, फल या हल्का दलिया जैसे खाद्य पदार्थ लें. ये पेट को आराम देते हैं, एनर्जी बढ़ाते हैं और दिनभर तरोताजा रखते हैं. लंचइसके बाद दोपहर का समय सबसे जरूरी है. जब सूरज सबसे ऊपर होता है, तब पाचन की अग्नि सबसे तेज जलती है. आयुर्वेद कहता है कि दोपहर का भोजन सबसे पौष्टिक और भरपूर होना चाहिए. इस समय दाल-चावल, रोटी-सब्जी, सांभर-चावल, घी वाली खिचड़ी खा सकते हैं. भारी और पौष्टिक भोजन दोपहर में ही पचता है, क्योंकि अग्नि मजबूत होती है. डिनरशाम को सूरज ढलते ही शरीर धीमा हो जाता है. पाचन की आग कमजोर पड़ जाती है, इसलिए रात का खाना हल्का और जल्दी पचने वाला होना चाहिए. सूप, खिचड़ी, मूंग दाल, नरम सब्जियां, दही-चावल या हल्की रोटी-सब्जी अच्छे विकल्प हैं. भारी, तला-भुना, मसालेदार या ज्यादा मीठा खाना रात में परेशानी पैदा करता है – जैसे अपच, भारीपन, नींद न आना या वजन बढ़ना. रात में तेज भूख का मतलब गड़बड़ीआयुर्वेद में यह भी कहा गया है कि ‘जब भी भूख लगे, खाओ’ जैसी आम सलाह गलत है. भूख का समय सूरज के साथ जुड़ा होता है. सुबह हल्की भूख, दोपहर में तेज भूख और शाम को बहुत कम भूख महसूस होनी चाहिए. अगर शाम को ज्यादा भूख लग रही है तो इसका मतलब है कि दिन का खान-पान गड़बड़ है. Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.
भारत-अमेरिका ट्रेड डील के विरोध में आंदोलन:तीन मंत्रियों के इस्तीफे की मांग; 24 फरवरी को विधानसभा घेराव करेगी कांग्रेस

मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी 24 फरवरी 2026 को भोपाल में मध्य प्रदेश विधानसभा का घेराव करेगी। इस संबंध में शनिवार शाम मंदसौर जिला कांग्रेस कार्यालय पर प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष रीना बौरासी की अगुवाई में प्रेस वार्ता हुई। बताया गया कि यह आंदोलन प्रस्तावित भारत-अमेरिका ट्रेड डील के विरोध, प्रदेश के किसानों के हितों की रक्षा तथा राज्य सरकार के तीन मंत्रियों के इस्तीफे की मांग को लेकर किया जा रहा है। यह घेराव प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में होगा। प्रेस वार्ता के दौरान विधायक विपिन जैन, शहर ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष इष्टा भाचावत सहित अन्य कांग्रेस पदाधिकारी उपस्थित रहे। उन्होंने किसानों और कार्यकर्ताओं से 24 फरवरी को भोपाल पहुंचकर विधानसभा घेराव में भाग लेने की अपील की है। ट्रेड डील से किसानों को नुकसान की आशंका प्रदेश कांग्रेस का मत है कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते में कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क में संभावित कमी से मध्य प्रदेश के कपास, सोयाबीन और मक्का उत्पादक किसानों को गंभीर आर्थिक नुकसान हो सकता है। बताया गया कि अमेरिका में औसत कृषि जोत लगभग 170 हेक्टेयर है, जबकि भारत में यह औसतन 1 से 1.5 हेक्टेयर के बीच है। अमेरिकी किसानों को व्यापक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सब्सिडी मिलती है, जबकि भारतीय किसान पहले से ही बढ़ती लागत, मौसमी अस्थिरता और बाजार संकट का सामना कर रहे हैं। सोयाबीन उत्पादकों पर सीधा असर उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश देश का अग्रणी सोयाबीन उत्पादक राज्य है, जहां लगभग 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की खेती होती है। यदि अमेरिकी सोयाबीन तेल या सोया खली का आयात बढ़ता है तो स्थानीय मंडियों में दाम गिरने की आशंका है। इससे किसानों के साथ-साथ स्थानीय प्रसंस्करण उद्योग पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अमेरिका विश्व का सबसे बड़ा मक्का निर्यातक देश है। एथेनॉल उत्पादन के बाद बचने वाले डिस्टलर ड्राइड ग्रेन जैसे उत्पादों के आयात से पशु आहार बाजार प्रभावित हो सकता है, जिससे प्रदेश के मक्का उत्पादकों को नुकसान उठाना पड़ेगा। कपास किसानों के लिए चिंताजनक स्थिति कपास के संदर्भ में भी स्थिति चिंताजनक बताई गई। आयात शुल्क में कमी होने पर अमेरिकी कपास के आयात से निमाड़ और मालवा क्षेत्र के कपास किसानों को सीधा आर्थिक आघात लगेगा। पहले से लागत और मूल्य संकट झेल रहे किसानों की आय पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। प्रदेश कांग्रेस का मानना है कि इस प्रकार का व्यापार समझौता स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था, मंडी व्यवस्था और न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली पर दबाव डालेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नगदी संकट और रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। तीन मंत्रियों के इस्तीफे की मांग प्रदेश कांग्रेस ने नैतिक जिम्मेदारी तय करते हुए तीन मंत्रियों से इस्तीफे की मांग की है – कैलाश विजयवर्गीय – इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित जल प्रकरण में जवाबदेही के आधार पर। विजय शाह – कर्नल सोफिया को आतंकवादियों की बहन कहने तथा सार्वजनिक जीवन की गरिमा के विपरीत दिए गए बयानों के संदर्भ में। राजेंद्र शुक्ला – जहरीले कफ सिरप से बच्चों की मृत्यु एवं स्वास्थ्य विभाग से जुड़े गंभीर मामलों में जवाबदेही के आधार पर। विधानसभा घेराव के जरिए रखी जाएंगी ये मांगें भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर विस्तृत श्वेतपत्र जारी किया जाए। मध्य प्रदेश के किसानों के हितों की संवैधानिक और नीतिगत सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। संबंधित मंत्रियों से नैतिक आधार पर तत्काल इस्तीफा लिया जाए। किसानों के लिए मूल्य सुरक्षा एवं आय संरक्षण की ठोस व्यवस्था लागू की जाए।
फिरोजाबाद में मौसम बदलने से बीमारियां बढ़ीं, डॉक्टर की सलाह जरूरी

Last Updated:February 21, 2026, 21:45 IST बदलते मौसम में अचानक सर्दी और गर्मी के असर से लोग बीमार हो रहे हैं. वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. मनोज कुमार ने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने और मौसम के अनुसार खान-पान व कपड़ों का ध्यान रखने की सलाह दी है. जानें कैसे बचें बीमारियों से. ख़बरें फटाफट फिरोजाबाद. जैसे-जैसे मौसम बदलता जा रहा है, वैसे ही लोग बीमार हो रहे हैं।. सर्दी के बाद गर्मी ने अपना तेवर दिखाना शुरू कर दिया है, जिसकी वजह से लोग बीमार हो रहे हैं. लोगों को सर्दी-जुकाम हो रहा है और इसके साथ ही पेट की भी बीमारियां देखने को मिल रही हैं. इसको लेकर डॉक्टर भी मरीजों को अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की सलाह दे रहे हैं. सर्दी–गर्मी से लोगों को हो रही दिक्कत फिरोजाबाद मेडिकल कॉलेज अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. मनोज कुमार ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए बताया कि अचानक मौसम बदल रहा है. रात में लोगों को सर्दी लगती है, तो वहीं दिन में तेज धूप से पसीना आ रहा है, इसलिए यह मौसम स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. इस मौसम में कपड़े पहनने से लेकर खाने-पीने तक की चीजों का सही प्रयोग करना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस मौसम में लोग एकदम सारे गर्म कपड़े नहीं छोड़ें. इसके साथ ही खाने-पीने के लिए ठंडी चीजों से परहेज करें. डॉ. कुमार ने बताया कि अभी लोग इसी वजह से अधिक बीमार हो रहे हैं कि वे मौसम के हिसाब से चीजें नहीं खा रहे हैं. इस मौसम में अधिक ऑयली, भुनी और फास्ट फूड का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे पेट की बीमारियां भी हो सकती हैं. धीरे-धीरे करें बदलाव, वरना हो जाएंगे बीमार वरिष्ठ फिजिशियन ने बताया कि मौसम धीरे-धीरे बदल रहा है, लेकिन लोग एकदम से बदलाव कर देते हैं. इसकी वजह से हमारी बॉडी तापमान के अनुसार काम नहीं कर पाती, इसलिए आपको भी मौसम के हिसाब से रहना चाहिए. यदि कोई भी बीमारी हो, या जो डायबिटीज या हार्ट के मरीज हैं, वे इस मौसम में धीरे-धीरे बाहर निकलें. किसी भी तरह की बीमारी होने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाकर संपर्क करें. पानी अच्छे से पीएं और ज्यादा से ज्यादा खान पान का ख्याल रखें. About the Author Monali Paul Hello I am Monali, born and brought up in Jaipur. Working in media industry from last 9 years as an News presenter cum news editor. Came so far worked with media houses like First India News, Etv Bharat and NEW…और पढ़ें Location : Firozabad,Uttar Pradesh First Published : February 21, 2026, 21:45 IST
नाक से खून, कब्ज और पीसीओएस में मददगार, जानें आयुर्वेद में दूब का महत्व, कई बीमारियों में असरदार – Uttar Pradesh News

Last Updated:February 21, 2026, 21:41 IST सनन्दन उपाध्याय/बलिया: हर जगह दिखने वाली साधारण घास, जो खेत से लेकर आंगन और आयुर्वेद से लेकर आस्था तक अपनी अलग पहचान रखती है. जी हां आमतौर पर पैरों तले बिछी रहने वाली यह घास औषधीय गुणों का खजाना है. इसका सही तरीके से प्रयोग कर कई रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है. आगे विस्तार से जानिए… सेहत की दुनिया में दूब घास को प्राकृतिक उपचार के रूप में बेहद उपयोगी बताया गया है. इसे शीतल, रक्तस्तंभक और पाचन सुधारक भी कहा गया है. इसके अलावा, नकसीर यानी नाक से खून आने पर दूब का ताजा रस माथे पर लगाने और कुछ मात्रा में सेवन करने से राहत मिल सकती है. यहीं नहीं, गर्मियों में शरीर की आंतरिक गर्मी शांत करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है. दुर्वा यानी दूब महिलाओं के लिए भी फायदेमंद है. पीसीओएस जैसी हार्मोनल असंतुलन की स्थिति में भी दूब का रस दही के साथ लेने से अत्यधिक रक्तस्राव और दर्द में आराम मिल सकता है. ध्यान रखें कि, विशेषज्ञ सलाह के बिना किसी भी घरेलू नुस्खे को अपनाना उचित नहीं होता है. हालांकि, ग्रामीण परंपराओं में इसका प्रयोग आज भी किया जाता है. राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय नगर बलिया की सात साल अनुभवी आयुर्वेदाचार्य डॉ प्रियंका सिंह के अनुसार, दूब कब्ज से राहत दिलाने और पेट को साफ रखने में बेहद लाभकारी और गुणकारी साबित हो सकती है. इसका हल्का काढ़ा बनाकर पीने से गैस और अपच में आराम मिलने की बात कही जाती है. इसके अलावा, इसमें प्राकृतिक तत्व भी पाए जाते हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मददगार हैं. Add News18 as Preferred Source on Google शुगर और खून की कमी जैसी समस्याओं में भी दूब का उल्लेख मिलता है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसके अर्क को ब्लड शुगर संतुलित करने में सहायक माना गया है. इसमें आयरन तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो खून की कमी दूर करने में उपयोगी सिद्ध हो सकती है. धार्मिक दृष्टिकोण से दूब का अत्यंत पवित्र स्थान है. हिंदू परंपरा में इसे भगवान गणेश जी को अर्पित किया जाता है और शुभ का प्रतीक माना जाता है. पूजा-पाठ में दूर्वा चढ़ाने की परंपरा केवल आस्था नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देती है. इस छोटी सी घास को भारतीय संस्कृति से गहरा जुड़ाव है. खेती और पशुपालन में भी दूब का महत्त्व कम नहीं है. लमसम 10 से 12% प्रोटीन युक्त यह घास पशुओं के लिए पौष्टिक चारे का काम करती है. सूखे की स्थिति में भी तेजी से उगने की इसकी क्षमता रखने के कारण किसानों का भरोसेमंद साथी भी है. कई जगहों पर तो प्राकृतिक चारे के रूप में भी इसको प्राथमिकता दी जाती है. दूब का पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका होती है. इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़ती हैं, जिससे कटाव रुक जाती है. यही कारण है कि इसे लॉन, पार्क और गोल्फ कोर्स में बड़े पैमाने पर लगाया जाता है. कम देखभाल में भी हरी-भरी रहने वाली यह घास सचमुच धरती की हरी और मजबूत ढाल है. First Published : February 21, 2026, 21:41 IST
बरगद के पत्तों के फायदे: पाचन, त्वचा व जोड़ों के दर्द में असरदार

Last Updated:February 21, 2026, 21:28 IST वट वृक्ष (बरगद) के पत्ते, छाल और कोपलें एंटीऑक्सीडेंट, एंटी-इंफ्लेमेटरी और रोगाणुरोधी गुणों से भरपूर होती हैं. जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूती प्रदान करते हैं. इन पत्तियों का काढ़ा या अर्क संक्रमण से लड़ने, त्वचा रोगों, मधुमेह और श्वसन संबंधी समस्याओं में कारगर माना जाता है. जिससे समग्र स्वास्थ्य में सुधार होता है। वट वृक्ष यानी के बरगद के पत्ते औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं. जो पाचन में सुधार, त्वचा रोगों, जोड़ों के दर्द, सूजन और डायबिटीज जैसी समस्याओं में बेहद फायदेमंद माने जाते हैं. इनके कोमल पत्तों का लेप घावों को भरने में सहायक है और इनका रस एंटी-इंफ्लेमेटरी के रूप में कार्य करता है. डॉक्टर रवि आर्य ने बताया कि बरगद के कोमल पत्ते (कूपल) और दूध दस्त, पेचिश और पाचन संबंधी समस्याओं के लिए आयुर्वेद में एक प्रभावी प्राकृतिक उपचार हैं. कसैले गुणों के कारण, यह आंतों की गति को नियंत्रित करते हैं और मल को बांधते हैं. इसके कूपलों को रात भर भिगोकर सुबह पानी पीने या दही के साथ सेवन करने से दस्त में तुरंत लाभ होता है. बरगद के पत्तों में एंटी-इंफ्लेमेटरी (सूजनरोधी) गुण होते हैं जो जोड़ों के दर्द, मोच और सूजन में कारगर हैं. सबसे असरदार उपाय में पत्तों पर घी/सरसों का तेल लगाकर गर्म करें और सूजन वाले स्थान पर बांधें. इसके ताजे पत्तों का लेप खुजली व लाल चकत्तों में आराम देता है. जो एक प्राकृतिक और सुरक्षित विकल्प है. Add News18 as Preferred Source on Google वट वृक्ष (बरगद) के पत्ते और अन्य भाग हड्डियों के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं. इनमें कैल्शियम और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं. जो हड्डियों को मजबूत बनाने, जोड़ों के दर्द, गठिया और सूजन को कम करने में सहायक हैं. यह दर्द से राहत और टूटी हड्डियों के उपचार में मदद करता है. बरगद के पत्ते औषधीय खजाना हैं. जिनमें एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं. इनमें ट्राइटरपेन्स, फ्रीडेलिन, सिटोस्टेरॉल, और फ्लेवोनोइड्स जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं. ये पत्ते मधुमेह नियंत्रण, त्वचा रोगों (दाग-धब्बे, खुजली), जोड़ों के दर्द, दस्त, और इम्यूनिटी बढ़ाने में सहायक होते हैं. बरगद के पत्ते जीवाणुरोधी और सूजनरोधी गुणों से भरपूर होते हैं. जो त्वचा की समस्याओं और शरीर के दर्द में राहत देते है. ताजे पत्तों का लेप खुजली, मुंहासे और घावों को जल्दी भरने में मदद करता है. जबकि पत्तों का गर्म काढ़ा जोड़ों के दर्द में उपयोगी है. First Published : February 21, 2026, 21:28 IST









