POK Ground Report; School Hospital Internet Closed

श्रीनगर13 मिनट पहलेलेखक: रऊफ डार कॉपी लिंक ‘हम इंडिया के एजेंट नहीं हैं, हम तो अपने हक के लिए लड़ रहे हैं।’ पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर, यानी POK से ये आवाजें ऐसे वक्त में आ रही है, जब वहां इंटरनेट बंद है। स्कूल नहीं खुल रहे, अस्पतालों में इलाज नहीं मिल रहा, कामकाज ठप है। लोग राशन और दवाइयों तक के लिए परेशान हैं। 5 जून से यहां जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी, यानी JAAC की अगुवाई में प्रदर्शन चल रहे हैं। विधानसभा में कश्मीरियों के लिए आरक्षित 12 सीटें खत्म करने की मांग है। प्रदर्शन में तीन महीने में 100 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। लोगों का आरोप है कि कई इलाकों में रास्तों और जरूरी सामान की आवाजाही पर पाबंदी है। प्रोटेस्ट शुरू होने के बाद से ही राजधानी मुजफ्फराबाद, रावलकोट, पुंछ और कोटली में इंटरनेट-ब्रॉडबैंड सर्विस बंद कर दी गई। इससे प्रदर्शन की खबरें बाहर नहीं आ रही हैं। दैनिक भास्कर ने PoK में रहने वाले और प्रदर्शन में शामिल लोगों से बात की। चुनिंदा ऑफिसों और होटलों में स्लो इंटरनेट चल रहा है। इसका एक्सेस मिलने के बाद उन्होंने हमें ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड करके भेजे हैं। 1. आदिल हुसैन, पुंछ डिवीजन ‘सेना ने इलाका घेर लिया है, राशन और दवाइयां तक नहीं आ रहीं’ कोटली में रहने वाले आदिल हुसैन ने दावा किया कि पुंछ डिवीजन में हालात ज्यादा खराब हैं। वे कहते हैं, ‘इस इलाके के साथ जिस तरह बर्ताव किया जा रहा है, वह शायद फिलिस्तीन के साथ किए बर्ताव से भी बदतर है। चारों तरफ पुलिस और सेना के जवान मौजूद हैं। वे लोगों पर गोली चला रहे हैं। लगभग हर दिन कोई न कोई मारा जा रहा है।’ इंटरनेट पहले से बंद है। राशन और दवाइयों की सप्लाई भी रोक दी गई है। इस इलाके में आने वाला कोई शख्स परिवार के लिए थोड़ा सा राशन भी नहीं ले जा सकता। उसकी तलाशी ली जाती है। राशन ले लिया जाता है। आदिल आगे कहते हैं, ‘पेट्रोल, डीजल और बाकी जरूरी चीजों की सप्लाई भी रोक दी गई है। पूरे एरिया की घेराबंदी है। सेना का मूवमेंट और जिस तरह वे यहां घुसने की कोशिश कर रहे हैं, उसे देखते हुए डर है कि बहुत लोग मारे जा सकते हैं।’ ‘यहां की पूरी आबादी JAAC के साथ खड़ी है और अपने हक के लिए लड़ रही है। दुनिया को इन हालात को इमरजेंसी की तरह देखना चाहिए। सरकार का भी यहां कंट्रोल नहीं दिख रहा है। लोगों का उनसे भरोसा उठ गया है।’ 2. ख्वाजा मुंतजिर, मुजफ्फराबाद डिवीजन ‘हमारे नेता दो महीने से गायब हैं, लोग डरकर घर में न बैठें’ प्रदर्शन में शामिल ख्वाजा मुंतजिर बताते हैं, ‘पुंछ और मुजफ्फराबाद डिवीजन के लोग लगभग ढाई महीने से सरकारी जबरदस्ती और जुल्म के खिलाफ लड़ रहे हैं। मुजफ्फराबाद से जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेता डॉ. आमिर साहब, दूसरे नेता और हमारे साथी दो महीने से ज्यादा वक्त से लापता हैं। उन्हें सिर्फ इसलिए सजा दी गई क्योंकि उन्होंने लोगों के हक के बारे में बात की।’ ‘वे कैद में हैं। बच्चों, परिवार और रिश्तेदारों से दूर हैं। हमारा फर्ज है कि हम उनके अधूरे मिशन को पूरा करने के लिए आगे बढ़ें। मैं मुजफ्फराबाद डिवीजन के लोगों से अपील है कि वे सेना की मौजूदगी से पैदा डर और धमकी से न डरें। घर से बाहर आएं। जिंदगी और मौत अल्लाह के हाथ में है। जहां जिस समय लिखा है, वहीं होगी।’ PoK में फायरिंग के वीडियो सामने आए हैं। दावा है कि सुरक्षाकर्मियों ने प्रदर्शन कर रहे लोगों पर गोलियां चलाईं। 3. सरदान उमर नजीर कश्मीरी, रावलकोट ‘30 मई तक सरकार ने बात की, फिर हम भारत के एजेंट कैसे हो गए’ आंदोलन के खिलाफ सबसे बड़ा नैरेटिव यही है कि ये पाकिस्तान विरोधी या भारत समर्थित है। JAAC नेता सरदान उमर नजीर कश्मीरी इस आरोप को खारिज करते हैं। वे कहते हैं, ‘रावलकोट में हम लॉन्ग मार्च करने वाले थे, लेकिन उसे टाल दिया। लोग धरने पर बैठे हैं। फौज और पुलिस ने बार-बार ताकत का इस्तेमाल किया। करीब 100 लोग मारे गए। सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया।’ ‘सरकार ने आंदोलन को कमजोर करने और लोगों को इससे दूर करने के लिए हमारे खिलाफ बार-बार प्रोपेगेंडा चलाया कि यह अलगाववादी आंदोलन है। मीडिया ने भी यही नैरेटिव आगे बढ़ाया।’ ‘हम इस प्रोपेगेंडा या मीडिया चैनलों से डरे नहीं हैं। ऐसे चैनल झूठ फैलाते हैं और रावलकोट में बैठे प्रदर्शनकारियों का भारत से रिश्ता होने का दावा करते हैं। अगर ऐसा था, तो 30 मई तक पाकिस्तान सरकार हमारे साथ बैठकर बातचीत क्यों कर रही थी।’ ’30 मई को भी पाकिस्तानी मंत्री हमारे साथ बात कर रहे थे और अचानक पांच दिन बाद आपको याद आया कि जिन लोगों के साथ आप बातचीत कर रहे थे, वे भारतीय एजेंट हैं।’ 2023 से शुरू हुआ आंदोलन, 2024 में टकराव बढ़ा जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी अचानक बना संगठन नहीं है। 2023 में रावलकोट में कारोबारी, सिविल सोसायटी के लोग, छात्र और एक्टिविस्ट साथ आए और एक संगठन बनाया। शुरुआत में इसके प्रदर्शनों का बड़ा मुद्दा गेहूं की बढ़ती कीमतें था। 2024 में आंदोलन बड़ा हुआ। तब प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव बढ़ा। तीन प्रदर्शनकारियों और एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई। 2025 में भी विरोध जारी रहा। 2026 में आंदोलन ज्यादा बड़ा हो गया। 5 जून 2026 को पाकिस्तान सरकार ने JAAC पर प्रतिबंध लगाकर उसे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। विरोध के बाद भी चुनाव, नवाज शरीफ की पार्टी जीती प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी मांगों में से एक POK विधानसभा की उन 12 सीटों को खत्म करना है, जो पाकिस्तान से बाहर रह रहे कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। उनका तर्क है कि इन सीटों के जरिए PoK की राजनीति में ऐसे लोगों को जगह दी जाती है, जो अब PoK में नहीं रहते। POK विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं। इनमें 45 पर सीधे चुनाव होते हैं। बाकी सीटें आरक्षित हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
पंजाबी महिला का पाकिस्तानी मुस्लिम पति फंसा:पहली पत्नी कोर्ट पहुंची; बोली- सरबजीत कौर ने घर कब्जाया, बच्चों समेत बाहर निकाला

भारत से पाकिस्तान गई पंजाबी महिला सरबजीत कौर से जुड़े मामले में अब नया मोड़ आया है। नासिर हुसैन की पहली पत्नी साइमा नासर लाहौर हाईकोर्ट पहुंच गई है। साइमा ने पति नासिर हुसैन और उससे निकाह करने वाली सरबजीत कौर के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। साइमा का आरोप है कि नासिर ने उनकी जानकारी और अनुमति के बिना सरबजीत से दूसरी शादी की। इसके बाद उन्हें चार नाबालिग बच्चों के साथ घर से निकाल दिया गया। साइमा ने अदालत से बच्चों के मासिक भत्ते और रहने के लिए घर की मांग की है। साइमा ने सरबजीत पर आरोप लगाया कि वह दादी बनने की उम्र में मोबाइल के जरिए गैर-मर्दों के सामने अश्लीलता करती है। घर में मेरे पति के साथ अश्लील हालत में रहती है। उससे मेरे बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है। याचिका में साइमा की 4 अहम बातें… 1. सरबजीत ने घर पर कब्जा किया साइमा नासर का आरोप है कि भारत से यात्रा वीजा पर पाकिस्तान आई सरबजीत कौर ने उनके घर पर जबरन कब्जा कर लिया। साइमा के मुताबिक, उन्हें और उनके चार छोटे बच्चों को घर से बाहर निकाल दिया गया। हमारे कपड़े भी फेंक दिए गए और परिवार के खाने का सहारा भी छीन लिया गया। 2. बिना अनुमति दूसरी शादी की साइमा के एडवोकेट अली चंगेजी संधू के अनुसार, पाकिस्तान के कानून के तहत दूसरी शादी को लेकर पहली पत्नी की लिखित अनुमति और संबंधित कानूनी प्रक्रिया का प्रावधान है। साइमा का कहना है कि नासिर हुसैन ने उनकी जानकारी और सहमति के बिना सरबजीत कौर से निकाह किया। अदालत ने नासिर हुसैन को नोटिस जारी किया है। 3. पति ने 10 महीने से संपर्क नहीं किया साइमा के मुताबिक, करीब 10 महीने से नासिर ने उनसे और बच्चों से संपर्क नहीं किया है। उनका आरोप है कि इस दौरान न तो बच्चों के पालन-पोषण के लिए कोई राशि दी गई और न ही उनका हक-मेहर अदा किया गया। साइमा का कहना है कि चार नाबालिग बच्चों की जिम्मेदारी उनके सामने सबसे बड़ा सवाल है। वह अदालत के जरिए बच्चों के लिए गुजारा भत्ता और रहने की व्यवस्था चाहती हैं। 4. बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हूं साइमा ने कहा- नासिर हुसैन और सरबजीत नामक महिला दिन-रात एक साथ रहकर मोबाइल वीडियो पर अश्लील वीडियो देखते है। दोनों आपत्तिजनक हालत में रहते हैं। ऐसी महिला के साथ रहना बिल्कुल संभव नहीं है क्योंकि इसका बच्चों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है। आगे चलकर उनके शादी-ब्याह और रिश्तों में भी रुकावट आएगी। इसलिए वे एक घर में साथ नहीं रह सकते और उन्हें सिर्फ उनका जायज हक दिया जाए। सरबजीत कौर मामले में अब तक क्या-क्या हुआ?
UK Grooming Gang Targeting Sikh Girls for Religious Conversion Claims

युवक ने दावा किया पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग से पहले सिख युवकों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करता है। ब्रिटेन में सिख लड़कियों को कथित तौर पर फंसाकर उनका ब्रेनवॉश, फिर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। इसका दावा एक सिख युवक ने किया है। यूके के एक चैनल के पॉडकास्ट में युवक ने पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग पर गैर-मुस्लिम लड़कियों, खासकर सिख लड़कियों को निशाना . युवक के मुताबिक, इसके लिए एक तय तरीके से लड़कियों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की जाती है। शुरुआत में सिख युवकों को लड़कियों के सामने मजाक, तानों से अपमानित किया जाता है, ताकि मुस्लिम युवकों की अधिक प्रभावशाली छवि बनाई जा सके। इसके बाद महंगे उपहार, कैश और बाहर घुमाने के जरिए भरोसा बढ़ाने हैं, उनके धर्म को लेकर सवाल खड़े करने और परिवार-दोस्तों से दूर करने का दावा किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराया जाता है। हालांकि, दैनिक भास्कर युवक के इन दावों की पुष्टि नहीं करता है। युवक ने कहा कि सिख लड़कियों के साथ दोस्ती बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। इसमें मुस्लिम सहेलियों की भूमिका होती है। कैसे जाल बिछाता है ग्रूमिंग गैंग, जानिए… सिख युवकों को अपमानित करना: पॉडकास्ट में युवक के दावे के अनुसार, पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग से पहले सिख युवकों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करता है। युवक ने कहा कि स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थल जैसी जगहों पर मजाक, ताने, नस्लीय या जातीय टिप्पणियों और कथित शारीरिक दुर्व्यवहार के जरिए सिख युवकों की सामाजिक स्थिति कमजोर करने की कोशिश की जाती है। उसके मुताबिक, इसका उद्देश्य सिख महिलाओं के सामने मुस्लिम युवकों की अधिक ‘दबंग’ या प्रभावशाली छवि बनाना होता है। दोस्ती और प्रभाव बनाने का दावा: युवक के अनुसार, इसके बाद सिख लड़कियों के साथ दोस्ती बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। इसमें कथित तौर पर कुछ मुस्लिम सहेलियों की भूमिका होती है, जो सिख लड़की को उस मुस्लिम युवक के बारे में सकारात्मक बातें बताती हैं और उसके प्रति भरोसा पैदा करने में मदद करती हैं। युवक ने दावा किया गया कि इस कथित प्रक्रिया में महंगे उपहार,कैश, रेस्तरां, क्लब और बार जैसी जगहों पर ले जाने के जरिए लड़की का भरोसा और भावनात्मक झुकाव हासिल करने की कोशिश की जाती है। यह महज दोस्ती नहीं बल्कि धीरे-धीरे प्रभाव और निर्भरता बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है। धर्म को लेकर सवाल खड़े करना: युवक के दावा किया कि तीसरे चरण में धर्म से जुड़े सवाल किए जाते हैं। लड़की के अपने धर्म यानी सिख धर्म को लेकर सवाल और संदेह पैदा किए जाते हैं और साथ ही मुस्लिम धर्म को बेहतर या अधिक महान बताने की कोशिश की जाती है। युवक ने कहा कि एक तरफ लड़की को उसके अपने धर्म के प्रति विश्वास को कमजोर किया जाता है और दूसरी तरफ मुस्लिम धर्म की श्रेष्ठता की धारणा पैदा की जाती है। परिवार और दोस्तों से अलगाव: युवक ने कहा कि जब लड़की का विश्वास हासिल कर लिया जाता है और उसका धार्मिक विश्वास कमजोर हो जाता है, तो कथित तौर पर उसे परिवार और पुराने दोस्तों से दूर करने की कोशिश की जाती है। युवक ने दावा किया कि गैंग के लोग लड़की की परिवार से बातचीत कम करवाना, दोस्तों से संपर्क तोड़ना, मानसिक रूप से अलग-थलग करना या घर छोड़ने के लिए मजबूर करना जैसी स्थितियों पैदा करते हैं। जिससे लड़की अपने सामाज से दूर हो जाती है और फिर अंत में उसका धर्म परिवर्तन करवा दिया जाता है। यूके में रहने वाले व्यक्ति ने 6 महीने युवती का वीडियो पोस्ट किया था। जिसमें उसने ग्रूमिंग गैंग का खुलासा किया था। 6 महीने पहले युवती ने भी किया था खुलासा इससे पहले भी एक युवती ने ब्रिटेन में सिख लड़कियों को लेकर ऐसे ही दावे किए थे। करीब 6 महीने पहले इंग्लैंड में रहने वाले पंजाबी नवदीप सिंह ने एक युवती का वीडियो पोस्ट किया था। युवती ने दावा किया था कि ब्रिटेन में ‘कौर-टू-खान’ मूवमेंट चल रहा है, जिसके तहत सिख लड़कियों को फंसाकर उनका धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। उसने इसके पीछे यूके में सक्रिय पाकिस्तानी मूल के कथित ग्रूमिंग गैंग को जिम्मेदार बताया था। युवती ने दावा किया था कि सिख लड़की को ‘कौर’ से ‘खान’ बनाने पर 10 हजार पाउंड दिए जाते हैं। उसके मुताबिक, ग्रूमिंग गैंग पहले लड़कियों को टारगेट कर उनसे भावनात्मक जुड़ाव बनाते हैं। इसके बाद उन्हें महंगी गाड़ियों और रेस्टोरेंट्स में घुमाया जाता है और जब लड़की उनके प्रभाव में आ जाती है तो उसका धर्म परिवर्तन कराया जाता है। युवती का यह भी दावा था कि अलग-अलग धर्म की लड़कियों के धर्म परिवर्तन के लिए रकम अलग है। उसके मुताबिक, सिख लड़की को मुस्लिम बनाने पर 10,000 पाउंड यानी करीब 11 लाख रुपए, जबकि हिंदू या ईसाई लड़की का धर्म परिवर्तन कराने पर 5,000 पाउंड यानी करीब साढ़े 5 लाख रुपए दिए जाते हैं। इन सभी दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। ************* ये खबर भी पढ़ें: सिख से मुस्लिम बनी पंजाबी युवती पहले से शादीशुदा निकली: पति ने इंग्लैंड में 7 दिन झाड़ियों में छिपकर रखी नजर, युवक संग घूमते पकड़ा अमृतसर की रहने वाली कोमलप्रीत कौर के धर्म परिवर्तन के मामले में नया खुलासा हुआ है। वह पहले से शादीशुदा थी। अब ससुराल वालों ने अपनी बहू पर बेटे को धोखा देने के आरोप लगाए हैं। परिवार के मुताबिक, उन्होंने करीब 2 साल पहले कोमलप्रीत को पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेजने में करीब 35 लाख रुपए खर्च किए थे। (पढ़ें पूरी खबर)
Riya Ahir Bigg Boss Controversy

1 घंटे पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र कॉपी लिंक NEET स्टूडेंट्स के प्रदर्शन के दौरान पुलिस वैन के सामने खड़े होकर वायरल हुईं रिया अहीर अब बिग बॉस-20 में एंट्री न मिलने के बाद चर्चा में हैं। रिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डू योर जॉब’ कहकर सवाल उठाया था। हालांकि, दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने मोदी के काम की तारीफ की और कहा कि उनमें काफी पोटेंशियल है। रिया खुद NEET की उम्मीदवार नहीं थीं, फिर भी बच्चों के भविष्य को अपना मुद्दा मानकर प्रदर्शन में शामिल हुईं। उन्होंने राहुल गांधी, सुप्रिया सुले और राज ठाकरे समेत कई नेताओं से मुलाकात का जिक्र किया, लेकिन किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ने से इनकार किया। वहीं, बिग बॉस-20 में जनता ने उन्हें लव गिल के मुकाबले नहीं चुना और रिया करीब 2 मिनट बाद ही शो से बाहर हो गईं। NEET की उम्मीदवार नहीं थीं, फिर भी पुलिस वैन के सामने खड़ी हुईं रिया अहीर को पहचान NEET स्टूडेंट्स के समर्थन में हुए प्रदर्शन के दौरान मिली। पुलिस वैन के सामने करीब 40 मिनट तक खड़े रहने का उनका वीडियो वायरल हुआ और वह सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गईं। जब उनसे पूछा गया कि वह खुद NEET की उम्मीदवार नहीं हैं, फिर बच्चों के लिए इतना बड़ा रिस्क क्यों लिया, तो रिया ने कहा कि उनकी परवरिश ऐसी हुई है कि कोई मुद्दा उन्हें व्यक्तिगत तौर पर प्रभावित न भी करे, लेकिन एक नागरिक के तौर पर वह उसे महत्वपूर्ण मानती हैं तो आवाज उठाती हैं। उनका कहना था कि ये बच्चे देश का भविष्य हैं। उन्होंने कहा कि उनकी जिंदगी अब तक काफी प्रिविलेज्ड रही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह दूसरों का दर्द नहीं समझ सकतीं। ‘कैमरा नहीं होता, तब भी पुलिस वैन के सामने खड़ी रहती’ रिया से पूछा गया कि अगर उस दिन कैमरा या मीडिया मौजूद नहीं होती, तो क्या वह पुलिस वैन के सामने करीब 40 मिनट तक खड़ी रहतीं? उन्होंने जवाब दिया कि वह 21 तारीख को भी प्रदर्शन में गई थीं, जब वहां कोई कैमरा या रिपोर्टर मौजूद नहीं था। उनके मुताबिक उस दिन शिवाजी पार्क में पुलिस वैन खड़ी थी, जिसमें बच्चे और प्रदर्शनकारी मौजूद थे। रिया ने कहा कि उन्होंने पहले ही वकीलों के नंबर निकालकर रखे थे, क्योंकि उन्हें पुलिस कार्रवाई की आशंका थी। उनके मुताबिक 21 तारीख को वहां सिर्फ वह और उनका फोन था। CJP मूवमेंट से कनेक्शन पर रिया ने क्या कहा? प्रदर्शन के बाद रिया को CJP मूवमेंट से जोड़कर देखा जाने लगा। हालांकि, उन्होंने इंटरव्यू में साफ कहा कि उनका CJP से कोई व्यक्तिगत कनेक्शन नहीं है। रिया के मुताबिक वह 21 और 22 तारीख को स्वतंत्र तौर पर प्रदर्शन में शामिल हुई थीं। उन्होंने दावा किया कि ये किसी राजनीतिक पार्टी की ओर से आयोजित प्रदर्शन नहीं थे। उन्होंने कहा कि उनका किसी राजनीतिक संगठन से निजी संबंध नहीं है और उन्होंने CJP से जुड़े लोगों के साथ इस तरह की कोई व्यक्तिगत बातचीत भी नहीं की। राहुल गांधी, सुप्रिया सुले और राज ठाकरे से हुई मुलाकात प्रदर्शन के दौरान रिया की मुलाकात कई राजनीतिक नेताओं से हुई। उन्होंने राहुल गांधी, सुप्रिया सुले, राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे, डिंपल यादव और धर्मेंद्र यादव समेत कई नेताओं का जिक्र किया। जब उनसे पूछा गया कि इन नेताओं में उन्हें सबसे जेन्युइन कौन लगा और किसमें उन्हें सबसे ज्यादा पॉलिटिशियन नजर आया, तो रिया ने कहा कि उनके अनुभव में कोई भी उन्हें पॉलिटिशियन जैसा नहीं लगा। रिया के मुताबिक इन मुलाकातों के दौरान किसी ने भी उनसे अपनी पार्टी का नाम लेकर बात नहीं की। उन्होंने राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र किया और कहा कि वहां बच्चों और युवाओं की बात हुई, पार्टी की नहीं। PM मोदी से कहा था- ‘डू योर जॉब’ रिया का सबसे चर्चित बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर था। उन्होंने मोदी से ‘जस्ट डू योर जॉब’ कहकर सवाल किया था। इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि अगर मोदी उनके सामने बैठकर पूछें कि उन्होंने अपना जॉब कहां फेल किया, तो वह क्या जवाब देंगी, रिया ने मोदी की आलोचना के बजाय उनके काम की तारीफ की। उन्होंने कहा कि देश की भागदौड़ संभालना आसान काम नहीं है। रिया ने मोदी को अनुभवी बताया और कहा कि उनमें काफी पोटेंशियल है। उन्होंने कहा कि मोदी ऐसा व्यक्तित्व हैं, जिनसे लोग प्रभावित होते हैं। उन्होंने देश में हुए अच्छे कामों और स्टार्टअप्स का जिक्र करते हुए कहा कि जहां क्रेडिट देना चाहिए, वहां वह क्रेडिट देंगी। महिलाओं पर बर्बरता हुई तो उस पर भी बात होनी चाहिए’ मोदी की तारीफ के तुरंत बाद रिया ने प्रदर्शन के बाद के हालात पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के बाद महिलाओं को गालियां दी गईं और अगर बर्बरता हुई है तो उस पर भी बात होनी चाहिए। रिया ने एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी के काम का क्रेडिट देने की बात कही, वहीं दूसरी तरफ प्रदर्शन के बाद महिलाओं के साथ हुए व्यवहार को लेकर सवाल भी उठाया। ‘राहुल गांधी PM होते, तब भी उनके खिलाफ खड़ी होती’ रिया से पूछा गया कि अगर राहुल गांधी प्रधानमंत्री होते और उनके कार्यकाल में भी पेपर लीक या पुलिस एक्शन जैसी स्थिति बनती, तो क्या वह उनके खिलाफ भी उसी तरह आवाज उठातीं? रिया ने जवाब दिया- ‘एब्सोल्यूटली, 100 परसेंट।’ उन्होंने कहा कि वह किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़कर अपनी पहचान नहीं बनाना चाहतीं। उनके मुताबिक एक नागरिक को अपने देश के लिए आवाज उठाने के लिए किसी पार्टी का हिस्सा होना जरूरी नहीं है। रिया ने कहा कि वह खुद को लेफ्टिस्ट या राइटिस्ट की पहचान में बांधना नहीं चाहतीं और उनका मुद्दा किसी पार्टी से ज्यादा देश और उसके नागरिकों से जुड़ा है। दूसरी सरकारों के खिलाफ भी आवाज उठाने का दावा जब रिया से पूछा गया कि पेपर लीक के मामले सिर्फ बीजेपी शासित राज्यों तक सीमित नहीं हैं और कर्नाटक, तेलंगाना जैसे राज्यों में भी ऐसे मामले सामने आए हैं, तो क्या उन्होंने वहां की सरकारों के खिलाफ भी इसी तरह आवाज उठाई? उन्होंने दावा किया कि उन्होंने दूसरी सरकारों और दूसरे राजनीतिक दलों से जुड़े मामलों पर भी अपनी आवाज उठाई है। Gen-Z की आवाज
Riya Ahir Bigg Boss Controversy

14 मिनट पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र कॉपी लिंक NEET स्टूडेंट्स के प्रदर्शन के दौरान पुलिस वैन के सामने खड़े होकर वायरल हुईं रिया अहीर अब बिग बॉस-20 में एंट्री न मिलने के बाद चर्चा में हैं। रिया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डू योर जॉब’ कहकर सवाल उठाया था। हालांकि, दैनिक भास्कर से बातचीत में उन्होंने मोदी के काम की तारीफ की और कहा कि उनमें काफी पोटेंशियल है। रिया खुद NEET की उम्मीदवार नहीं थीं, फिर भी बच्चों के भविष्य को अपना मुद्दा मानकर प्रदर्शन में शामिल हुईं। उन्होंने राहुल गांधी, सुप्रिया सुले और राज ठाकरे समेत कई नेताओं से मुलाकात का जिक्र किया, लेकिन किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ने से इनकार किया। वहीं, बिग बॉस-20 में जनता ने उन्हें लव गिल के मुकाबले नहीं चुना और रिया करीब 2 मिनट बाद ही शो से बाहर हो गईं। NEET की उम्मीदवार नहीं थीं, फिर भी पुलिस वैन के सामने खड़ी हुईं रिया अहीर को पहचान NEET स्टूडेंट्स के समर्थन में हुए प्रदर्शन के दौरान मिली। पुलिस वैन के सामने करीब 40 मिनट तक खड़े रहने का उनका वीडियो वायरल हुआ और वह सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गईं। जब उनसे पूछा गया कि वह खुद NEET की उम्मीदवार नहीं हैं, फिर बच्चों के लिए इतना बड़ा रिस्क क्यों लिया, तो रिया ने कहा कि उनकी परवरिश ऐसी हुई है कि कोई मुद्दा उन्हें व्यक्तिगत तौर पर प्रभावित न भी करे, लेकिन एक नागरिक के तौर पर वह उसे महत्वपूर्ण मानती हैं तो आवाज उठाती हैं। उनका कहना था कि ये बच्चे देश का भविष्य हैं। उन्होंने कहा कि उनकी जिंदगी अब तक काफी प्रिविलेज्ड रही है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह दूसरों का दर्द नहीं समझ सकतीं। ‘कैमरा नहीं होता, तब भी पुलिस वैन के सामने खड़ी रहती’ रिया से पूछा गया कि अगर उस दिन कैमरा या मीडिया मौजूद नहीं होती, तो क्या वह पुलिस वैन के सामने करीब 40 मिनट तक खड़ी रहतीं? उन्होंने जवाब दिया कि वह 21 तारीख को भी प्रदर्शन में गई थीं, जब वहां कोई कैमरा या रिपोर्टर मौजूद नहीं था। उनके मुताबिक उस दिन शिवाजी पार्क में पुलिस वैन खड़ी थी, जिसमें बच्चे और प्रदर्शनकारी मौजूद थे। रिया ने कहा कि उन्होंने पहले ही वकीलों के नंबर निकालकर रखे थे, क्योंकि उन्हें पुलिस कार्रवाई की आशंका थी। उनके मुताबिक 21 तारीख को वहां सिर्फ वह और उनका फोन था। CJP मूवमेंट से कनेक्शन पर रिया ने क्या कहा? प्रदर्शन के बाद रिया को CJP मूवमेंट से जोड़कर देखा जाने लगा। हालांकि, उन्होंने इंटरव्यू में साफ कहा कि उनका CJP से कोई व्यक्तिगत कनेक्शन नहीं है। रिया के मुताबिक वह 21 और 22 तारीख को स्वतंत्र तौर पर प्रदर्शन में शामिल हुई थीं। उन्होंने दावा किया कि ये किसी राजनीतिक पार्टी की ओर से आयोजित प्रदर्शन नहीं थे। उन्होंने कहा कि उनका किसी राजनीतिक संगठन से निजी संबंध नहीं है और उन्होंने CJP से जुड़े लोगों के साथ इस तरह की कोई व्यक्तिगत बातचीत भी नहीं की। राहुल गांधी, सुप्रिया सुले और राज ठाकरे से हुई मुलाकात प्रदर्शन के दौरान रिया की मुलाकात कई राजनीतिक नेताओं से हुई। उन्होंने राहुल गांधी, सुप्रिया सुले, राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे, डिंपल यादव और धर्मेंद्र यादव समेत कई नेताओं का जिक्र किया। जब उनसे पूछा गया कि इन नेताओं में उन्हें सबसे जेन्युइन कौन लगा और किसमें उन्हें सबसे ज्यादा पॉलिटिशियन नजर आया, तो रिया ने कहा कि उनके अनुभव में कोई भी उन्हें पॉलिटिशियन जैसा नहीं लगा। रिया के मुताबिक इन मुलाकातों के दौरान किसी ने भी उनसे अपनी पार्टी का नाम लेकर बात नहीं की। उन्होंने राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस का जिक्र किया और कहा कि वहां बच्चों और युवाओं की बात हुई, पार्टी की नहीं। PM मोदी से कहा था- ‘डू योर जॉब’ रिया का सबसे चर्चित बयान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर था। उन्होंने मोदी से ‘जस्ट डू योर जॉब’ कहकर सवाल किया था। इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि अगर मोदी उनके सामने बैठकर पूछें कि उन्होंने अपना जॉब कहां फेल किया, तो वह क्या जवाब देंगी, रिया ने मोदी की आलोचना के बजाय उनके काम की तारीफ की। उन्होंने कहा कि देश की भागदौड़ संभालना आसान काम नहीं है। रिया ने मोदी को अनुभवी बताया और कहा कि उनमें काफी पोटेंशियल है। उन्होंने कहा कि मोदी ऐसा व्यक्तित्व हैं, जिनसे लोग प्रभावित होते हैं। उन्होंने देश में हुए अच्छे कामों और स्टार्टअप्स का जिक्र करते हुए कहा कि जहां क्रेडिट देना चाहिए, वहां वह क्रेडिट देंगी। महिलाओं पर बर्बरता हुई तो उस पर भी बात होनी चाहिए’ मोदी की तारीफ के तुरंत बाद रिया ने प्रदर्शन के बाद के हालात पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन के बाद महिलाओं को गालियां दी गईं और अगर बर्बरता हुई है तो उस पर भी बात होनी चाहिए। रिया ने एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी के काम का क्रेडिट देने की बात कही, वहीं दूसरी तरफ प्रदर्शन के बाद महिलाओं के साथ हुए व्यवहार को लेकर सवाल भी उठाया। ‘राहुल गांधी PM होते, तब भी उनके खिलाफ खड़ी होती’ रिया से पूछा गया कि अगर राहुल गांधी प्रधानमंत्री होते और उनके कार्यकाल में भी पेपर लीक या पुलिस एक्शन जैसी स्थिति बनती, तो क्या वह उनके खिलाफ भी उसी तरह आवाज उठातीं? रिया ने जवाब दिया- ‘एब्सोल्यूटली, 100 परसेंट।’ उन्होंने कहा कि वह किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़कर अपनी पहचान नहीं बनाना चाहतीं। उनके मुताबिक एक नागरिक को अपने देश के लिए आवाज उठाने के लिए किसी पार्टी का हिस्सा होना जरूरी नहीं है। रिया ने कहा कि वह खुद को लेफ्टिस्ट या राइटिस्ट की पहचान में बांधना नहीं चाहतीं और उनका मुद्दा किसी पार्टी से ज्यादा देश और उसके नागरिकों से जुड़ा है। दूसरी सरकारों के खिलाफ भी आवाज उठाने का दावा जब रिया से पूछा गया कि पेपर लीक के मामले सिर्फ बीजेपी शासित राज्यों तक सीमित नहीं हैं और कर्नाटक, तेलंगाना जैसे राज्यों में भी ऐसे मामले सामने आए हैं, तो क्या उन्होंने वहां की सरकारों के खिलाफ भी इसी तरह आवाज उठाई? उन्होंने दावा किया कि उन्होंने दूसरी सरकारों और दूसरे राजनीतिक दलों से जुड़े मामलों पर भी अपनी आवाज उठाई है। Gen-Z की आवाज
Le Pen, Farage & AfD Win in Germany

2 घंटे पहले कॉपी लिंक पूर्वी जर्मनी के छोटे से राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट में रविवार को दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी जीत हासिल की। AfD के जीत की चर्चा सिर्फ जर्मनी तक सीमित नहीं रही। लंदन की डाउनिंग स्ट्रीट से लेकर पेरिस के एलिसी पैलेस तक इस नतीजे को लेकर चिंता जताई गई। यूरोप में शायद पहली बार हुआ है जब किसी राज्य चुनाव के नतीजे को लोकतंत्र के भविष्य से इतना जोड़कर देखा गया है। इसकी वजह जर्मनी का इतिहास है। नाजी शासन की तबाही के बाद जर्मनी ने लंबे समय तक दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी दलों को राजनीतिक मुख्यधारा से दूर रखा। लेकिन 2013 में बनी AfD लगातार मजबूत होती गई। अब यह पार्टी जर्मनी की राजनीति में ही नहीं, बल्कि यूरोप की राजनीति में भी अपना असर बढ़ाती दिखाई दे रही है। जर्मनी में एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद AfD के मुख्य उम्मीदवार अलरिच जीगमंड (बीच में) जश्न मनाते हुए। AfD की जीत का असर दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है एक्सपर्ट्स का मानना है कि जर्मनी में AfD की सफलता दूसरे यूरोपीय देशों के दक्षिणपंथी दलों को भी बढ़ावा दे सकती है। यूरोप इस समय गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है। सरकारें महंगाई और बढ़ती रोजमर्रा की लागत जैसी समस्याओं को दूर नहीं कर पा रही हैं। इससे लोगों में मौजूदा सरकारों और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है। अगले साल यूरोप के कई देशों में चुनाव होने हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और स्पेन में दक्षिणपंथी पार्टियां महंगाई, रोजगार और इमिग्रेशन के मुद्दे पर सरकारों को घेर रही हैं। उनका कहना है कि मौजूदा पार्टियां आम लोगों की समस्याएं दूर नहीं कर पाई हैं। फ्रांस: मरीन ले पेन के जीतने की संभावना सबसे ज्यादा फ्रांस को लेकर यूरोप की सेंटर पार्टियों की चिंता और ज्यादा है। अगले साल देश में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। इस चुनाव में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन चौथी बार राष्ट्रपति पद के लिए दावेदारी पेश करेंगी। ले पेन पिछले 14 साल से राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति में सक्रिय हैं और इस बार उनकी स्थिति सबसे मजबूत मानी जा रही है।हालांकि, ले पेन की जीत अभी तय नहीं है। अगर सेंटर-राइट और सेंटर-लेफ्ट पार्टियां मिलकर मजबूत उम्मीदवार उतारती हैं तो उनके सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। लेकिन अगर सेंटर का वोट बंटा रहा तो ले पेन के लिए राष्ट्रपति चुनाव जीतने का रास्ता आसान हो सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर पेरिस में दक्षिणपंथी सरकार बनती है तो इसका असर पूरे यूरोपीय संघ पर पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि फ्रांस यूरोप की बड़ी राजनीतिक और सैन्य ताकत है। वह परमाणु शक्ति भी है और यूरोपीय संघ की नींव रखने वाले देशों में शामिल रहा है। फ्रांस की दक्षिणपंथी नेता और नेशनल रैली (RN) की सांसद मरीन ले पेन एक टीवी डिबेट के दौरान। (फाइल फोटो) ब्रिटेन: दक्षिणपंथी पार्टियां मजबूत हो रहीं ब्रिटेन में नाइजल फराज की अगुआई वाली रिफॉर्म यूके ने हाल के स्थानीय चुनावों में बड़ी सफलता हासिल की। पार्टी ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर लेबर और कंजरवेटिव जैसी बड़ी पार्टियों को पीछे छोड़ दिया। वहीं, लेबर और कंजरवेटिव दोनों की सीटें घटीं। इससे साफ हुआ कि ब्रिटेन में पारंपरिक पार्टियों से नाराज मतदाताओं का एक हिस्सा अब फराज की पार्टी की ओर जा रहा है। हालांकि उनकी पार्टी के असंतुष्ट नेता रूपर्ट लोव अलग होकर एक अलग दक्षिणपंथी पार्टी बना चुके हैं। इससे दक्षिणपंथी वोटों के बंटने का खतरा पैदा हो गया है। ब्रिटेन की रिफॉर्म यूके पार्टी के नेता नाइजल फराज 5 सितंबर को बर्मिंघम में पार्टी के कार्यक्रम के दौरान। इटली: मेलोनी को दक्षिणपंथी नेता से ही चुनौती इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को यूरोप की दूसरी दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए एक उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। उनकी पार्टी की शुरुआत फासीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों ने की थी। फासीवादी विचारधारा- ऐसी राजनीति जिसमें एक मजबूत नेता और मजबूत सरकार को सबसे ऊपर रखा जाता है, विरोध को दबाया जाता है और देश की पहचान के नाम पर दूसरे समूहों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया जाता है। पिछले हफ्ते मेलोनी सरकार ने इटली गणराज्य के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार सत्ता में रहने का रिकॉर्ड बनाया है। इटली में अगले साल चुनाव होने हैं और मेलोनी के दोबारा सत्ता में आने की उम्मीद है। लेकिन उनके सामने उनसे भी ज्यादा दक्षिणपंथी नेता रॉबर्टो वान्नाची की चुनौती बढ़ रही है। वान्नाची की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए मेलोनी ने इमिग्रेशन जैसे मुद्दों पर अपना रुख और सख्त कर लिया है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी 4 सितंबर 2026 को बारी में रैली के दौरान भाषण देती हुईं। हंगरी में दक्षिणपंथी सरकार की हार हंगरी में प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की दक्षिणपंथी पार्टी फिदेज को अप्रैल में बड़ा झटका लगा। पार्टी करीब 16 साल तक सत्ता में रहने के बाद चुनाव हार गई। ओर्बान लंबे समय से हंगरी की राजनीति में मजबूत नेता माने जाते थे, लेकिन इस बार लोगों ने उनकी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। ओर्बान की सरकार के खिलाफ लोगों में कई मुद्दों को लेकर नाराजगी थी। इनमें भ्रष्टाचार, कमजोर होती अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसी आर्थिक परेशानियां शामिल थीं। इसके अलावा यूरोपीय संघ के साथ सरकार का लगातार टकराव भी लोगों के बीच चर्चा का मुद्दा बना रहा। यानी हंगरी का उदाहरण यह बताता है कि सिर्फ दक्षिणपंथी मुद्दों पर राजनीति करने से किसी पार्टी की जीत हमेशा पक्की नहीं होती। अगर लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार लोगों की रोजमर्रा की परेशानियां दूर नहीं कर पाती, तो मतदाता उससे भी नाराज हो सकते हैं। ओर्बान की हार से यूरोप की मुख्यधारा की पार्टियों को भी उम्मीद मिली है। जर्मनी, फ्रांस और दूसरे देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों के बढ़ते असर के बीच हंगरी का नतीजा यह दिखाता है कि दक्षिणपंथ का बढ़ना एकतरफा कहानी नहीं है। कहीं ऐसी पार्टियां मजबूत हो रही हैं, तो कहीं जनता उन्हें सत्ता से बाहर भी कर रही है। ————————– यह खबर भी पढ़ें… जर्मनी में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी पहली बार सत्ता के करीब:ट्रम्प ने नतीजे की तस्वीर शेयर की, फ्रांस बोला- यह यूरोप के लिए गंभीर समय जर्मनी
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15 मिनट पहले कॉपी लिंक पूर्वी जर्मनी के छोटे से राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट में रविवार को दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी जीत हासिल की। AfD के जीत की चर्चा सिर्फ जर्मनी तक सीमित नहीं रही। लंदन की डाउनिंग स्ट्रीट से लेकर पेरिस के एलिसी पैलेस तक इस नतीजे को लेकर चिंता जताई गई। यूरोप में शायद पहली बार हुआ है जब किसी राज्य चुनाव के नतीजे को लोकतंत्र के भविष्य से इतना जोड़कर देखा गया है। इसकी वजह जर्मनी का इतिहास है। नाजी शासन की तबाही के बाद जर्मनी ने लंबे समय तक दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी दलों को राजनीतिक मुख्यधारा से दूर रखा। लेकिन 2013 में बनी AfD लगातार मजबूत होती गई। अब यह पार्टी जर्मनी की राजनीति में ही नहीं, बल्कि यूरोप की राजनीति में भी अपना असर बढ़ाती दिखाई दे रही है। जर्मनी में एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद AfD के मुख्य उम्मीदवार अलरिच जीगमंड (बीच में) जश्न मनाते हुए। AfD की जीत का असर दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है एक्सपर्ट्स का मानना है कि जर्मनी में AfD की सफलता दूसरे यूरोपीय देशों के दक्षिणपंथी दलों को भी बढ़ावा दे सकती है। यूरोप इस समय गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है। सरकारें महंगाई और बढ़ती रोजमर्रा की लागत जैसी समस्याओं को दूर नहीं कर पा रही हैं। इससे लोगों में मौजूदा सरकारों और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है। अगले साल यूरोप के कई देशों में चुनाव होने हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और स्पेन में दक्षिणपंथी पार्टियां महंगाई, रोजगार और इमिग्रेशन के मुद्दे पर सरकारों को घेर रही हैं। उनका कहना है कि मौजूदा पार्टियां आम लोगों की समस्याएं दूर नहीं कर पाई हैं। फ्रांस: मरीन ले पेन के जीतने की संभावना सबसे ज्यादा फ्रांस को लेकर यूरोप की सेंटर पार्टियों की चिंता और ज्यादा है। अगले साल देश में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। इस चुनाव में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन चौथी बार राष्ट्रपति पद के लिए दावेदारी पेश करेंगी। ले पेन पिछले 14 साल से राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति में सक्रिय हैं और इस बार उनकी स्थिति सबसे मजबूत मानी जा रही है।हालांकि, ले पेन की जीत अभी तय नहीं है। अगर सेंटर-राइट और सेंटर-लेफ्ट पार्टियां मिलकर मजबूत उम्मीदवार उतारती हैं तो उनके सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। लेकिन अगर सेंटर का वोट बंटा रहा तो ले पेन के लिए राष्ट्रपति चुनाव जीतने का रास्ता आसान हो सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर पेरिस में दक्षिणपंथी सरकार बनती है तो इसका असर पूरे यूरोपीय संघ पर पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि फ्रांस यूरोप की बड़ी राजनीतिक और सैन्य ताकत है। वह परमाणु शक्ति भी है और यूरोपीय संघ की नींव रखने वाले देशों में शामिल रहा है। फ्रांस की दक्षिणपंथी नेता और नेशनल रैली (RN) की सांसद मरीन ले पेन एक टीवी डिबेट के दौरान। (फाइल फोटो) ब्रिटेन: दक्षिणपंथी पार्टियां मजबूत हो रहीं ब्रिटेन में नाइजल फराज की अगुआई वाली रिफॉर्म यूके ने हाल के स्थानीय चुनावों में बड़ी सफलता हासिल की। पार्टी ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर लेबर और कंजरवेटिव जैसी बड़ी पार्टियों को पीछे छोड़ दिया। वहीं, लेबर और कंजरवेटिव दोनों की सीटें घटीं। इससे साफ हुआ कि ब्रिटेन में पारंपरिक पार्टियों से नाराज मतदाताओं का एक हिस्सा अब फराज की पार्टी की ओर जा रहा है। हालांकि उनकी पार्टी के असंतुष्ट नेता रूपर्ट लोव अलग होकर एक अलग दक्षिणपंथी पार्टी बना चुके हैं। इससे दक्षिणपंथी वोटों के बंटने का खतरा पैदा हो गया है। ब्रिटेन की रिफॉर्म यूके पार्टी के नेता नाइजल फराज 5 सितंबर को बर्मिंघम में पार्टी के कार्यक्रम के दौरान। इटली: मेलोनी को दक्षिणपंथी नेता से ही चुनौती इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को यूरोप की दूसरी दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए एक उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। उनकी पार्टी की शुरुआत फासीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों ने की थी। फासीवादी विचारधारा- ऐसी राजनीति जिसमें एक मजबूत नेता और मजबूत सरकार को सबसे ऊपर रखा जाता है, विरोध को दबाया जाता है और देश की पहचान के नाम पर दूसरे समूहों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया जाता है। पिछले हफ्ते मेलोनी सरकार ने इटली गणराज्य के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार सत्ता में रहने का रिकॉर्ड बनाया है। इटली में अगले साल चुनाव होने हैं और मेलोनी के दोबारा सत्ता में आने की उम्मीद है। लेकिन उनके सामने उनसे भी ज्यादा दक्षिणपंथी नेता रॉबर्टो वान्नाची की चुनौती बढ़ रही है। वान्नाची की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए मेलोनी ने इमिग्रेशन जैसे मुद्दों पर अपना रुख और सख्त कर लिया है। इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी 4 सितंबर 2026 को बारी में रैली के दौरान भाषण देती हुईं। हंगरी में दक्षिणपंथी सरकार की हार हंगरी में प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की दक्षिणपंथी पार्टी फिदेज को अप्रैल में बड़ा झटका लगा। पार्टी करीब 16 साल तक सत्ता में रहने के बाद चुनाव हार गई। ओर्बान लंबे समय से हंगरी की राजनीति में मजबूत नेता माने जाते थे, लेकिन इस बार लोगों ने उनकी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। ओर्बान की सरकार के खिलाफ लोगों में कई मुद्दों को लेकर नाराजगी थी। इनमें भ्रष्टाचार, कमजोर होती अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसी आर्थिक परेशानियां शामिल थीं। इसके अलावा यूरोपीय संघ के साथ सरकार का लगातार टकराव भी लोगों के बीच चर्चा का मुद्दा बना रहा। यानी हंगरी का उदाहरण यह बताता है कि सिर्फ दक्षिणपंथी मुद्दों पर राजनीति करने से किसी पार्टी की जीत हमेशा पक्की नहीं होती। अगर लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार लोगों की रोजमर्रा की परेशानियां दूर नहीं कर पाती, तो मतदाता उससे भी नाराज हो सकते हैं। ओर्बान की हार से यूरोप की मुख्यधारा की पार्टियों को भी उम्मीद मिली है। जर्मनी, फ्रांस और दूसरे देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों के बढ़ते असर के बीच हंगरी का नतीजा यह दिखाता है कि दक्षिणपंथ का बढ़ना एकतरफा कहानी नहीं है। कहीं ऐसी पार्टियां मजबूत हो रही हैं, तो कहीं जनता उन्हें सत्ता से बाहर भी कर रही है। ————————– यह खबर भी पढ़ें… जर्मनी में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी पहली बार सत्ता के करीब:ट्रम्प ने नतीजे की तस्वीर शेयर की, फ्रांस बोला- यह यूरोप के लिए गंभीर समय जर्मनी







