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Le Pen, Farage & AfD Win in Germany

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2 घंटे पहले

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पूर्वी जर्मनी के छोटे से राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट में रविवार को दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी जीत हासिल की। AfD के जीत की चर्चा सिर्फ जर्मनी तक सीमित नहीं रही। लंदन की डाउनिंग स्ट्रीट से लेकर पेरिस के एलिसी पैलेस तक इस नतीजे को लेकर चिंता जताई गई।

यूरोप में शायद पहली बार हुआ है जब किसी राज्य चुनाव के नतीजे को लोकतंत्र के भविष्य से इतना जोड़कर देखा गया है। इसकी वजह जर्मनी का इतिहास है।

नाजी शासन की तबाही के बाद जर्मनी ने लंबे समय तक दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी दलों को राजनीतिक मुख्यधारा से दूर रखा। लेकिन 2013 में बनी AfD लगातार मजबूत होती गई। अब यह पार्टी जर्मनी की राजनीति में ही नहीं, बल्कि यूरोप की राजनीति में भी अपना असर बढ़ाती दिखाई दे रही है।

जर्मनी में एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद AfD के मुख्य उम्मीदवार अलरिच जीगमंड (बीच में) जश्न मनाते हुए।

जर्मनी में एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद AfD के मुख्य उम्मीदवार अलरिच जीगमंड (बीच में) जश्न मनाते हुए।

AfD की जीत का असर दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है

एक्सपर्ट्स का मानना है कि जर्मनी में AfD की सफलता दूसरे यूरोपीय देशों के दक्षिणपंथी दलों को भी बढ़ावा दे सकती है।

यूरोप इस समय गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है। सरकारें महंगाई और बढ़ती रोजमर्रा की लागत जैसी समस्याओं को दूर नहीं कर पा रही हैं। इससे लोगों में मौजूदा सरकारों और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है।

अगले साल यूरोप के कई देशों में चुनाव होने हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और स्पेन में दक्षिणपंथी पार्टियां महंगाई, रोजगार और इमिग्रेशन के मुद्दे पर सरकारों को घेर रही हैं। उनका कहना है कि मौजूदा पार्टियां आम लोगों की समस्याएं दूर नहीं कर पाई हैं।

फ्रांस: मरीन ले पेन के जीतने की संभावना सबसे ज्यादा

फ्रांस को लेकर यूरोप की सेंटर पार्टियों की चिंता और ज्यादा है। अगले साल देश में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। इस चुनाव में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन चौथी बार राष्ट्रपति पद के लिए दावेदारी पेश करेंगी।

ले पेन पिछले 14 साल से राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति में सक्रिय हैं और इस बार उनकी स्थिति सबसे मजबूत मानी जा रही है।हालांकि, ले पेन की जीत अभी तय नहीं है।

अगर सेंटर-राइट और सेंटर-लेफ्ट पार्टियां मिलकर मजबूत उम्मीदवार उतारती हैं तो उनके सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। लेकिन अगर सेंटर का वोट बंटा रहा तो ले पेन के लिए राष्ट्रपति चुनाव जीतने का रास्ता आसान हो सकता है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर पेरिस में दक्षिणपंथी सरकार बनती है तो इसका असर पूरे यूरोपीय संघ पर पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि फ्रांस यूरोप की बड़ी राजनीतिक और सैन्य ताकत है। वह परमाणु शक्ति भी है और यूरोपीय संघ की नींव रखने वाले देशों में शामिल रहा है।

फ्रांस की दक्षिणपंथी नेता और नेशनल रैली (RN) की सांसद मरीन ले पेन एक टीवी डिबेट के दौरान। (फाइल फोटो)

फ्रांस की दक्षिणपंथी नेता और नेशनल रैली (RN) की सांसद मरीन ले पेन एक टीवी डिबेट के दौरान। (फाइल फोटो)

ब्रिटेन: दक्षिणपंथी पार्टियां मजबूत हो रहीं

ब्रिटेन में नाइजल फराज की अगुआई वाली रिफॉर्म यूके ने हाल के स्थानीय चुनावों में बड़ी सफलता हासिल की। पार्टी ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर लेबर और कंजरवेटिव जैसी बड़ी पार्टियों को पीछे छोड़ दिया। वहीं, लेबर और कंजरवेटिव दोनों की सीटें घटीं।

इससे साफ हुआ कि ब्रिटेन में पारंपरिक पार्टियों से नाराज मतदाताओं का एक हिस्सा अब फराज की पार्टी की ओर जा रहा है। हालांकि उनकी पार्टी के असंतुष्ट नेता रूपर्ट लोव अलग होकर एक अलग दक्षिणपंथी पार्टी बना चुके हैं। इससे दक्षिणपंथी वोटों के बंटने का खतरा पैदा हो गया है।

ब्रिटेन की रिफॉर्म यूके पार्टी के नेता नाइजल फराज 5 सितंबर को बर्मिंघम में पार्टी के कार्यक्रम के दौरान।

ब्रिटेन की रिफॉर्म यूके पार्टी के नेता नाइजल फराज 5 सितंबर को बर्मिंघम में पार्टी के कार्यक्रम के दौरान।

इटली: मेलोनी को दक्षिणपंथी नेता से ही चुनौती

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को यूरोप की दूसरी दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए एक उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। उनकी पार्टी की शुरुआत फासीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों ने की थी।

फासीवादी विचारधारा- ऐसी राजनीति जिसमें एक मजबूत नेता और मजबूत सरकार को सबसे ऊपर रखा जाता है, विरोध को दबाया जाता है और देश की पहचान के नाम पर दूसरे समूहों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया जाता है।

पिछले हफ्ते मेलोनी सरकार ने इटली गणराज्य के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार सत्ता में रहने का रिकॉर्ड बनाया है।

इटली में अगले साल चुनाव होने हैं और मेलोनी के दोबारा सत्ता में आने की उम्मीद है। लेकिन उनके सामने उनसे भी ज्यादा दक्षिणपंथी नेता रॉबर्टो वान्नाची की चुनौती बढ़ रही है। वान्नाची की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए मेलोनी ने इमिग्रेशन जैसे मुद्दों पर अपना रुख और सख्त कर लिया है।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी 4 सितंबर 2026 को बारी में रैली के दौरान भाषण देती हुईं।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी 4 सितंबर 2026 को बारी में रैली के दौरान भाषण देती हुईं।

हंगरी में दक्षिणपंथी सरकार की हार

हंगरी में प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की दक्षिणपंथी पार्टी फिदेज को अप्रैल में बड़ा झटका लगा। पार्टी करीब 16 साल तक सत्ता में रहने के बाद चुनाव हार गई। ओर्बान लंबे समय से हंगरी की राजनीति में मजबूत नेता माने जाते थे, लेकिन इस बार लोगों ने उनकी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।

ओर्बान की सरकार के खिलाफ लोगों में कई मुद्दों को लेकर नाराजगी थी। इनमें भ्रष्टाचार, कमजोर होती अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसी आर्थिक परेशानियां शामिल थीं। इसके अलावा यूरोपीय संघ के साथ सरकार का लगातार टकराव भी लोगों के बीच चर्चा का मुद्दा बना रहा।

यानी हंगरी का उदाहरण यह बताता है कि सिर्फ दक्षिणपंथी मुद्दों पर राजनीति करने से किसी पार्टी की जीत हमेशा पक्की नहीं होती। अगर लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार लोगों की रोजमर्रा की परेशानियां दूर नहीं कर पाती, तो मतदाता उससे भी नाराज हो सकते हैं।

ओर्बान की हार से यूरोप की मुख्यधारा की पार्टियों को भी उम्मीद मिली है। जर्मनी, फ्रांस और दूसरे देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों के बढ़ते असर के बीच हंगरी का नतीजा यह दिखाता है कि दक्षिणपंथ का बढ़ना एकतरफा कहानी नहीं है। कहीं ऐसी पार्टियां मजबूत हो रही हैं, तो कहीं जनता उन्हें सत्ता से बाहर भी कर रही है।

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यह खबर भी पढ़ें…

जर्मनी में कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी पहली बार सत्ता के करीब:ट्रम्प ने नतीजे की तस्वीर शेयर की, फ्रांस बोला- यह यूरोप के लिए गंभीर समय

जर्मनी की दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने सक्सोनी-आनहाल्ट के राज्य चुनाव में बड़ी जीत हासिल की है। एग्जिट पोल के मुताबिक, AfD को करीब 44% वोट मिले हैं और वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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राजनीति

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पूर्वी जर्मनी के छोटे से राज्य सैक्सोनी-अनहाल्ट में रविवार को दक्षिणपंथी पार्टी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने बड़ी जीत हासिल की। AfD के जीत की चर्चा सिर्फ जर्मनी तक सीमित नहीं रही। लंदन की डाउनिंग स्ट्रीट से लेकर पेरिस के एलिसी पैलेस तक इस नतीजे को लेकर चिंता जताई गई।

यूरोप में शायद पहली बार हुआ है जब किसी राज्य चुनाव के नतीजे को लोकतंत्र के भविष्य से इतना जोड़कर देखा गया है। इसकी वजह जर्मनी का इतिहास है।

नाजी शासन की तबाही के बाद जर्मनी ने लंबे समय तक दक्षिणपंथी और कट्टरपंथी दलों को राजनीतिक मुख्यधारा से दूर रखा। लेकिन 2013 में बनी AfD लगातार मजबूत होती गई। अब यह पार्टी जर्मनी की राजनीति में ही नहीं, बल्कि यूरोप की राजनीति में भी अपना असर बढ़ाती दिखाई दे रही है।

जर्मनी में एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद AfD के मुख्य उम्मीदवार अलरिच जीगमंड (बीच में) जश्न मनाते हुए।

जर्मनी में एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद AfD के मुख्य उम्मीदवार अलरिच जीगमंड (बीच में) जश्न मनाते हुए।

AfD की जीत का असर दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है

एक्सपर्ट्स का मानना है कि जर्मनी में AfD की सफलता दूसरे यूरोपीय देशों के दक्षिणपंथी दलों को भी बढ़ावा दे सकती है।

यूरोप इस समय गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है। सरकारें महंगाई और बढ़ती रोजमर्रा की लागत जैसी समस्याओं को दूर नहीं कर पा रही हैं। इससे लोगों में मौजूदा सरकारों और राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है।

अगले साल यूरोप के कई देशों में चुनाव होने हैं। ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और स्पेन में दक्षिणपंथी पार्टियां महंगाई, रोजगार और इमिग्रेशन के मुद्दे पर सरकारों को घेर रही हैं। उनका कहना है कि मौजूदा पार्टियां आम लोगों की समस्याएं दूर नहीं कर पाई हैं।

फ्रांस: मरीन ले पेन के जीतने की संभावना सबसे ज्यादा

फ्रांस को लेकर यूरोप की सेंटर पार्टियों की चिंता और ज्यादा है। अगले साल देश में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं। इस चुनाव में दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन चौथी बार राष्ट्रपति पद के लिए दावेदारी पेश करेंगी।

ले पेन पिछले 14 साल से राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति में सक्रिय हैं और इस बार उनकी स्थिति सबसे मजबूत मानी जा रही है।हालांकि, ले पेन की जीत अभी तय नहीं है।

अगर सेंटर-राइट और सेंटर-लेफ्ट पार्टियां मिलकर मजबूत उम्मीदवार उतारती हैं तो उनके सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। लेकिन अगर सेंटर का वोट बंटा रहा तो ले पेन के लिए राष्ट्रपति चुनाव जीतने का रास्ता आसान हो सकता है।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक अगर पेरिस में दक्षिणपंथी सरकार बनती है तो इसका असर पूरे यूरोपीय संघ पर पड़ सकता है। इसकी वजह यह है कि फ्रांस यूरोप की बड़ी राजनीतिक और सैन्य ताकत है। वह परमाणु शक्ति भी है और यूरोपीय संघ की नींव रखने वाले देशों में शामिल रहा है।

फ्रांस की दक्षिणपंथी नेता और नेशनल रैली (RN) की सांसद मरीन ले पेन एक टीवी डिबेट के दौरान। (फाइल फोटो)

फ्रांस की दक्षिणपंथी नेता और नेशनल रैली (RN) की सांसद मरीन ले पेन एक टीवी डिबेट के दौरान। (फाइल फोटो)

ब्रिटेन: दक्षिणपंथी पार्टियां मजबूत हो रहीं

ब्रिटेन में नाइजल फराज की अगुआई वाली रिफॉर्म यूके ने हाल के स्थानीय चुनावों में बड़ी सफलता हासिल की। पार्टी ने सबसे ज्यादा सीटें जीतकर लेबर और कंजरवेटिव जैसी बड़ी पार्टियों को पीछे छोड़ दिया। वहीं, लेबर और कंजरवेटिव दोनों की सीटें घटीं।

इससे साफ हुआ कि ब्रिटेन में पारंपरिक पार्टियों से नाराज मतदाताओं का एक हिस्सा अब फराज की पार्टी की ओर जा रहा है। हालांकि उनकी पार्टी के असंतुष्ट नेता रूपर्ट लोव अलग होकर एक अलग दक्षिणपंथी पार्टी बना चुके हैं। इससे दक्षिणपंथी वोटों के बंटने का खतरा पैदा हो गया है।

ब्रिटेन की रिफॉर्म यूके पार्टी के नेता नाइजल फराज 5 सितंबर को बर्मिंघम में पार्टी के कार्यक्रम के दौरान।

ब्रिटेन की रिफॉर्म यूके पार्टी के नेता नाइजल फराज 5 सितंबर को बर्मिंघम में पार्टी के कार्यक्रम के दौरान।

इटली: मेलोनी को दक्षिणपंथी नेता से ही चुनौती

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को यूरोप की दूसरी दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए एक उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। उनकी पार्टी की शुरुआत फासीवादी विचारधारा से जुड़े लोगों ने की थी।

फासीवादी विचारधारा- ऐसी राजनीति जिसमें एक मजबूत नेता और मजबूत सरकार को सबसे ऊपर रखा जाता है, विरोध को दबाया जाता है और देश की पहचान के नाम पर दूसरे समूहों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया जाता है।

पिछले हफ्ते मेलोनी सरकार ने इटली गणराज्य के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार सत्ता में रहने का रिकॉर्ड बनाया है।

इटली में अगले साल चुनाव होने हैं और मेलोनी के दोबारा सत्ता में आने की उम्मीद है। लेकिन उनके सामने उनसे भी ज्यादा दक्षिणपंथी नेता रॉबर्टो वान्नाची की चुनौती बढ़ रही है। वान्नाची की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए मेलोनी ने इमिग्रेशन जैसे मुद्दों पर अपना रुख और सख्त कर लिया है।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी 4 सितंबर 2026 को बारी में रैली के दौरान भाषण देती हुईं।

इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी 4 सितंबर 2026 को बारी में रैली के दौरान भाषण देती हुईं।

हंगरी में दक्षिणपंथी सरकार की हार

हंगरी में प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की दक्षिणपंथी पार्टी फिदेज को अप्रैल में बड़ा झटका लगा। पार्टी करीब 16 साल तक सत्ता में रहने के बाद चुनाव हार गई। ओर्बान लंबे समय से हंगरी की राजनीति में मजबूत नेता माने जाते थे, लेकिन इस बार लोगों ने उनकी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।

ओर्बान की सरकार के खिलाफ लोगों में कई मुद्दों को लेकर नाराजगी थी। इनमें भ्रष्टाचार, कमजोर होती अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसी आर्थिक परेशानियां शामिल थीं। इसके अलावा यूरोपीय संघ के साथ सरकार का लगातार टकराव भी लोगों के बीच चर्चा का मुद्दा बना रहा।

यानी हंगरी का उदाहरण यह बताता है कि सिर्फ दक्षिणपंथी मुद्दों पर राजनीति करने से किसी पार्टी की जीत हमेशा पक्की नहीं होती। अगर लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार लोगों की रोजमर्रा की परेशानियां दूर नहीं कर पाती, तो मतदाता उससे भी नाराज हो सकते हैं।

ओर्बान की हार से यूरोप की मुख्यधारा की पार्टियों को भी उम्मीद मिली है। जर्मनी, फ्रांस और दूसरे देशों में दक्षिणपंथी पार्टियों के बढ़ते असर के बीच हंगरी का नतीजा यह दिखाता है कि दक्षिणपंथ का बढ़ना एकतरफा कहानी नहीं है। कहीं ऐसी पार्टियां मजबूत हो रही हैं, तो कहीं जनता उन्हें सत्ता से बाहर भी कर रही है।

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