टीएमसी की पहचान की लड़ाई छिड़ गई है क्योंकि विद्रोही गुट का नई पार्टी में विलय हो गया है और वास्तविक टीएमसी स्थिति का दावा किया गया है
तृणमूल कांग्रेस की पहचान को लेकर कानूनी लड़ाई छिड़ गई है क्योंकि विद्रोही गुट एक छोटी पार्टी में विलय कर रहा है और असली टीएमसी होने का दावा कर रहा है। यह घटनाक्रम विलय की वैधता, पार्टी के नाम, प्रतीक और फंड के भविष्य और क्या विद्रोही गुट मूल पार्टी की पहचान पर दावा कर सकता है, इस पर बड़े सवाल उठ रहे हैं। उम्मीद है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला खेमा दावों को चुनौती देगा, जिससे एक जटिल राजनीतिक और कानूनी टकराव पैदा होगा। यह विवाद अब आंतरिक विद्रोह से आगे बढ़ रहा है और संस्थागत क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है, जिसमें चुनाव आयोग, संसद और अदालतें संभावित रूप से मान्यता की लड़ाई में प्रमुख क्षेत्र बन रहे हैं। n18oc_ Indian18oc_politicsn18oc_plain-speakNews18 मोबाइल ऐप – https://onelink.to/desc-youtube आखरी अपडेट: 15 जून, 2026, 19:06 IST (टैग्सटूट्रांसलेट)बंगाल पॉलिटिक्स(टी)ब्रेकिंग न्यूज इंडिया(टी)सीएनएन-न्यूज18(टी)चुनाव आयोग(टी)भारतीय राजनीति(टी)ममता बनर्जी(टी)न्यूज18(टी)पार्टी फंड(टी)पार्टी का नाम विवाद(टी)पार्टी मान्यता(टी)राजनीतिक समाचार भारत(टी)राजनीतिक प्रतीक विवाद(टी)असली टीएमसी(टी)विद्रोही गुट का विलय(टी)छोटी पार्टी विलय(टी)टीएमसी(टी)टीएमसी संकट(टी)टीएमसी फंड्स(टी)टीएमसी पहचान की लड़ाई(टी)टीएमसी कानूनी लड़ाई(टी)टीएमसी विलय(टी)टीएमसी पार्टी चिन्ह(टी)टीएमसी विद्रोही गुट(टी)टीएमसी विद्रोह(टी)टीएमसी विभाजन(टी)टीएमसी प्रतीक(टी)तृणमूल कांग्रेस(टी)पश्चिम बंगाल की राजनीति
आरएसएस के कार्यक्रम में तीन कुलपतियों के शामिल होने से केरल में राजनीतिक तूफान, मुख्यमंत्री ने की निंदा | #साफ बात
केरल में तीन कुलपतियों के आरएसएस कार्यक्रम में शामिल होने से राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है, जिसकी मुख्यमंत्री और विपक्षी नेताओं ने तीखी आलोचना की है। यह विवाद शैक्षणिक तटस्थता, संस्थागत स्वतंत्रता और विश्वविद्यालय स्थानों में राजनीतिक या वैचारिक संगठनों की भूमिका पर सवाल उठा रहा है। यह बहस सांप्रदायिक समूहों के साथ कांग्रेस पार्टी के पिछले गठबंधनों पर भी सवाल उठा रही है, जिससे केरल के राजनीतिक टकराव में एक और परत जुड़ रही है। जैसे-जैसे विवाद गहराता जा रहा है, ध्यान इस बात पर बना हुआ है कि क्या विश्वविद्यालय के नेताओं को वैचारिक कार्यक्रमों में भाग लेना चाहिए और अकादमिक जुड़ाव और राजनीतिक संबद्धता के बीच कहां रेखा खींची जानी चाहिए। n18oc_plain-speak n18oc_ Indian18oc_politicsNews18 मोबाइल ऐप – https://onelink.to/desc-youtube आखरी अपडेट: 15 जून, 2026, 19:04 IST (टैग्सटूट्रांसलेट)शैक्षणिक स्वतंत्रता(टी)शैक्षणिक तटस्थता(टी)ब्रेकिंग न्यूज भारत(टी)कैंपस राजनीति(टी)मुख्यमंत्री आलोचना(टी)कांग्रेस(टी)कांग्रेस गठबंधन(टी)भारतीय राजनीति(टी)संस्थागत स्वतंत्रता(टी)केरल(टी)केरल सीएम(टी)केरल की राजनीति(टी)केरल के कुलपति(टी)न्यूज18(टी)विपक्षी नेता केरल(टी)राजनीतिक समाचार भारत(टी)राजनीतिक तूफान केरल(टी)आरएसएस कार्यक्रम(टी)आरएसएस पंक्ति केरल(टी)सांप्रदायिक समूह(टी)तीन कुलपति(टी)विश्वविद्यालय तटस्थता(टी)विश्वविद्यालय की राजनीति(टी)कुलपति आरएसएस कार्यक्रम में भाग लेते हैं(टी)कुलपति
बचपन के किस्से सुनाते हुए इमोशनल हुए महेश भट्ट:बीमार मां के बालों में सजाए थे जुगनू; बोले- जिंदगी भविष्य में नहीं इसी पल में है
सीनियर फिल्ममेकर और लेखक महेश भट्ट ने मुंबई में आयोजित कार्यक्रम ‘इन सर्च ऑफ ट्रुथ’ में जीवन के कई अनछुए पहलुओं पर बात की। वर्सोवा के आरडीएक्स स्टूडियो में स्क्रिप्ट राइटर और डायरेक्टर सुहृता दास के साथ हुए इस संवाद में उन्होंने अपने बचपन, करियर के संघर्षों और रिश्तों पर खुलकर चर्चा की। महेश भट्ट ने कहा कि लोग अक्सर अपनी जिंदगी को भविष्य के लिए टालते रहते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि जीवन इसी पल और इसी सांस में है। इस कार्यक्रम में फिल्म निर्माण के अलावा मानसिक स्वास्थ्य और बच्चों के पालन-पोषण पर भी विचार साझा किए गए। राज खोसला से मिली थी शून्य से शुरुआत की सीख भट्ट ने अपने शुरुआती संघर्षों को याद करते हुए डायरेक्टर राज खोसला की एक बात का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि राज खोसला ने उनसे कहा था, “शून्य से शुरुआत करना एक बेहतरीन आंकड़ा है।” महेश भट्ट के मुताबिक, शून्य से शुरुआत करने में डरने की कोई बात नहीं है, बल्कि इस पर गर्व होना चाहिए क्योंकि हर बड़ी यात्रा की शुरुआत यहीं से होती है। उन्होंने बताया कि महज चार साल की उम्र में वे पहली बार सिनेमा की तरफ आकर्षित हुए थे और तभी से उनके भीतर कहानियां कहने की इच्छा जागी थी। बीमार मां के बालों में सजाए थे जुगनू बातचीत के दौरान महेश भट्ट अपनी मां को याद कर भावुक हो गए। उन्होंने बचपन का एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि एक बार उनकी मां काफी बीमार थीं। उन्हें हंसाने के लिए उन्होंने मां के बालों में जुगनू सजा दिए थे। उन्होंने कहा कि कला और बेहतरीन कहानियां अक्सर जीवन के ऐसे ही साधारण और मानवीय पलों से निकलती हैं। भट्ट ने माना कि उनकी ज्यादातर क्रिएटिविटी और फिल्में उनके निजी संघर्षों, असफलताओं और टूटे हुए दिल के अनुभवों का ही नतीजा हैं। पहले अलग दिखना चाहता था, अब लोगों से जुड़ना चाहता हूं अपने बचपन के विद्रोही स्वभाव पर बात करते हुए महेश भट्ट ने कहा कि एक समय था जब वे हमेशा भीड़ से अलग दिखना चाहते थे। लेकिन उम्र और अनुभव के साथ उन्हें समझ आया कि इंसान का असली विकास दूसरों से अलग होने में नहीं, बल्कि लोगों के साथ जुड़ने और जीवन को साझा करने में है। सफलता को लेकर उन्होंने कहा कि हमें लगता है कि अगली कामयाबी हमें खुशी देगी, लेकिन संतुष्टि इसी वर्तमान समय में जीने से मिलती है। बच्चों के पालन-पोषण और युवाओं को दी सलाह कार्यक्रम के आखिरी हिस्से में एक सवाल-जवाब का सेशन रखा गया। इसमें आए छात्रों, थिएटर आर्टिस्ट्स और राइटर्स ने महेश भट्ट से कई सवाल पूछे। पेरेंटिंग पर जवाब देते हुए भट्ट ने कहा कि बच्चे माता-पिता के उपदेशों से नहीं, बल्कि उनके व्यवहार को देखकर सीखते हैं। इसलिए माता-पिता को बच्चों को सिर्फ निर्देश देने के बजाय उनकी बात को ध्यान से सुनना चाहिए। युवाओं को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि असफलता से डरने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सबसे बड़ी सीख अक्सर हार से ही मिलती है।
एनसीईआरटी ने मोहनजो-दारो “डांसिंग गर्ल” पाठ्यपुस्तक चित्रण पंक्ति को समीक्षा के लिए विशेषज्ञों के पास भेजा | न्यूज18
कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में 4,500 साल पुरानी मोहनजो-दारो “डांसिंग गर्ल” के बदले हुए चित्रण पर बहस के बीच, एनसीईआरटी का कहना है कि बदलाव के पीछे कोई विशेष कारण नहीं था और इस मुद्दे को समीक्षा के लिए विशेषज्ञों के पास भेजा गया है। यह विवाद ऐतिहासिक सटीकता, पाठ्यपुस्तक संशोधन, सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व और प्राचीन भारतीय सभ्यता को छात्रों के सामने कैसे प्रस्तुत किया जा रहा है, इस पर सवाल उठा रहा है। उम्मीद है कि विशेषज्ञ समीक्षा में चित्रण की जांच की जाएगी और बदलाव पर उठाई गई चिंताओं का समाधान किया जाएगा। -newsNews18 मोबाइल ऐप – https://onelink.to/desc-youtube आखरी अपडेट: 15 जून, 2026, 17:02 IST (टैग्सटूट्रांसलेट)4500 साल पुरानी नाचती हुई लड़की(टी)बदला हुआ चित्रण(टी)प्राचीन भारत(टी)ब्रेकिंग न्यूज भारत(टी)कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक(टी)सीएनएन-न्यूज18(टी)सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व(टी)नाचती हुई लड़की(टी)नाचती हुई लड़की की मूर्ति(टी)शिक्षा समाचार भारत(टी)हड़प्पा सभ्यता(टी)ऐतिहासिक सटीकता(टी)इतिहास की पाठ्यपुस्तक(टी)भारत का इतिहास(टी)सिंधु घाटी सभ्यता(टी)ताजा समाचार(टी)मोहनजो-दारो(टी)एनसीईआरटी(टी)एनसीईआरटी विशेषज्ञ समीक्षा(टी)एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक(टी)न्यूज18(टी)स्कूल पाठ्यपुस्तक(टी)पाठ्यपुस्तक विवाद(टी)पाठ्यपुस्तक पंक्ति
एनसीईआरटी कक्षा 9 की पाठ्यपुस्तक में मोहनजो-दारो में बदले गए “डांसिंग गर्ल” चित्रण पर विवाद छिड़ गया | न्यूज18
एनसीईआरटी की कक्षा 9 की नई कला पाठ्यपुस्तक में प्रतिष्ठित मोहनजो-दारो की “डांसिंग गर्ल” को उसके ऊपरी शरीर को ढंके हुए चित्रित करने के बाद बहस छिड़ गई है, जो दशकों से पाठ्यपुस्तकों में दिखाई देने वाले मूल प्रतिनिधित्व से अलग है। यह परिवर्तन ऐतिहासिक सटीकता, कलात्मक प्रतिनिधित्व, सांस्कृतिक व्याख्या और पाठ्यपुस्तक संशोधनों पर सवाल उठा रहा है। सिंधु घाटी सभ्यता की 4,500 साल पुरानी कांस्य मूर्ति “डांसिंग गर्ल” को लंबे समय से प्राचीन दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों में से एक माना जाता है। विवाद अब इस बात पर ध्यान केंद्रित कर रहा है कि क्या परिवर्तित चित्रण एक डिजाइन विकल्प, सांस्कृतिक पुनर्व्याख्या या ऐतिहासिक रूप से प्रलेखित छवि से एक अनावश्यक विचलन है। -newsNews18 मोबाइल ऐप – https://onelink.to/desc-youtube आखरी अपडेट: 15 जून, 2026, 17:01 IST (टैग्सटूट्रांसलेट)4500 साल पुरानी मूर्तिकला(टी)बदला हुआ चित्रण(टी)प्राचीन दक्षिण एशिया(टी)पुरातात्विक खोज(टी)कलात्मक प्रतिनिधित्व(टी)कक्षा 9 कला पाठ्यपुस्तक(टी)सांस्कृतिक व्याख्या(टी)नृत्य करती हुई लड़की(टी)नृत्य करती हुई लड़की का चित्रण(टी)शिक्षा समाचार भारत(टी)हड़प्पा सभ्यता(टी)ऐतिहासिक सटीकता(टी)इतिहास पाठ्यपुस्तक बहस(टी)भारत का इतिहास(टी)सिंधु घाटी सभ्यता(टी)मोहनजो-दारो(टी)एनसीईआरटी(टी)एनसीईआरटी कक्षा 9 पाठ्यपुस्तक(टी)एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक विवाद(टी)स्कूल पाठ्यपुस्तक(टी)पाठ्यपुस्तक पंक्ति(टी)ऊपरी शरीर ढका हुआ
अरबाज खान की कार में जबरन घुसा शख्स:सुरक्षाकर्मियों ने खींचकर बाहर निकाला और पीटा; असहज नजर आए एक्टर
बॉलीवुड एक्टर सलमान खान के भाई और फिल्ममेकर अरबाज खान की सुरक्षा में चूक का मामला सामने आया है। कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान एक शख्स जबरन अरबाज खान की खड़ी कार के अंदर घुसकर बैठ गया। इसके बाद वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने मुस्तैदी दिखाते हुए उस शख्स को गाड़ी से खींचकर बाहर निकाला। इस दौरान सुरक्षाकर्मियों और उस शख्स के बीच काफी धक्का-मुक्की हुई और सुरक्षाकर्मियों ने उसकी पिटाई भी कर दी। इस दौरान अरबाज भी वहां असहज दिखाई दिए। इस पूरी घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया है। दरवाजा खोलकर अंदर बैठ गया था युवक सोशल मीडिया पर सामने ये वीडियो के मुताबिक, यह घटना कोलकाता की है जहां अरबाज खान किसी इवेंट के सिलसिले में पहुंचे थे। जब अरबाज की लग्जरी कार बाहर खड़ी थी, तभी भीड़ में से एक युवक सुरक्षा घेरा तोड़कर कार के पास पहुंच गया। उसने अचानक कार का दरवाजा खोला और जबरन अंदर बैठ गया। युवक की इस हरकत से वहां अफरा-तफरी मच गई और आस-पास मौजूद लोग चिल्लाने लगे। सुरक्षाकर्मियों ने युवक को कार से खींचा, जमकर हुई बहस युवक को कार के अंदर बैठता देख अरबाज खान के निजी सुरक्षाकर्मी और वहां तैनात बाउंसर्स तुरंत एक्शन में आ गए। उन्होंने तुरंत कार का गेट खोला और युवक को पकड़कर बाहर खींच लिया। वीडियो में देखा जा सकता है कि काले रंग के कपड़ों में तैनात सुरक्षाकर्मियों ने युवक को पकड़कर कार से दूर किया। इस दौरान वहां मौजूद भीड़ में से कुछ लोग ‘इसको मारो’ चिल्लाते हुए भी सुनाई दे रहे हैं। भीड़ को हटाने के लिए बाउंसर्स ने की धक्का-मुक्की घटना के समय कार के आस-पास भारी भीड़ जमा थी, जो अपने मोबाइल से वीडियो बना रही थी। सुरक्षाकर्मियों ने स्थिति को बिगड़ता देख युवक को पकड़कर एक तरफ कर दिया और भीड़ को पीछे धकेलना शुरू किया। वीडियो में साफ दिख रहा है कि सुरक्षाकर्मी बेहद गुस्से में थे और उन्होंने युवक को पकड़कर भीड़ से दूर ले जाकर उसकी पिटाई भी की। इसके बाद अरबाज खान की गाड़ी को वहां से सुरक्षित रवाना किया गया। 2023 में हुई अरबाज खान की दूसरी शादी वर्कफ्रंट और पर्सनल लाइफ की बात करें तो अरबाज खान पिछले कुछ समय से अपनी निजी जिंदगी को लेकर चर्चा में रहे हैं। उन्होंने दिसंबर 2023 में मेकअप आर्टिस्ट शूरा खान से दूसरी शादी की थी। इस निकाह में उनका पूरा परिवार और करीबी दोस्त शामिल हुए थे। अरबाज खान अक्सर शूरा खान के साथ अलग-अलग इवेंट्स और एयरपोर्ट पर स्पॉट किए जाते हैं। बता दें की अरबाज और उनकी पहली पत्नी मलाइका अरोरा का 2017 में तलाक हो गया था। ये खबर भी पढ़ें ‘कुमकुम भाग्य’ एक्ट्रेस संचिता उगले ने सुसाइड किया:साड़ी का फंदा बनाकर फांसी लगाई, पंखे से लटकी मिली बॉडी; मौत से कुछ घंटे पहले रील पोस्ट की टीवी एक्ट्रेस संचिता उगले ने सोमवार को सुसाइड कर लिया। वे 22 साल की थीं। पुलिस ने बताया कि एक्ट्रेस का शव घर में सीलिंग फैन से लटका मिला। उन्होंने साड़ी का फंदा बनाकर फांसी लगाई। पूरी खबर पढ़ें…
टीएमसी के बागी सांसद पार्टी की पहचान और प्रतीक पर कानूनी लड़ाई शुरू करने के लिए तैयार, एनसीपीआई में विलय की संभावना | न्यूज18

सूत्रों का कहना है कि बागी टीएमसी सांसद तृणमूल कांग्रेस की पहचान और प्रतीक पर कानूनी लड़ाई शुरू करने के लिए तैयार हैं, जबकि विद्रोही गुट और एनसीपीआई के बीच विलय आज होने की संभावना है। यह कदम टीएमसी संकट में एक बड़ी वृद्धि का संकेत देता है, जिससे लड़ाई आंतरिक विद्रोह से पार्टी के नाम, प्रतीक और संसदीय मान्यता पर कानूनी और संस्थागत दावों पर केंद्रित हो गई है। उम्मीद है कि विद्रोही गुट दल-बदल विरोधी प्रावधानों के तहत अपनी ताकत पर बहस करेगा, जबकि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला खेमा इस कदम को चुनौती दे सकता है। घटनाक्रम से महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं: टीएमसी की पहचान को कौन नियंत्रित करता है? क्या विद्रोही गुट चुनाव चिन्ह पर दावा कर सकता है? क्या एनसीपीआई विलय कानूनी जांच से गुजरेगा? और संसद और चुनाव आयोग कैसे प्रतिक्रिया देंगे? -newsNews18 मोबाइल ऐप – https://onelink.to/desc-youtube आखरी अपडेट: 15 जून, 2026, 16:22 IST (टैग्सटूट्रांसलेट)दलबदल विरोधी कानून(टी)बंगाल राजनीति(टी)ब्रेकिंग न्यूज इंडिया(टी)सीएनएन-न्यूज18(टी)चुनाव आयोग(टी)भारतीय राजनीति(टी)ममता बनर्जी(टी)एनसीपीआई(टी)एनसीपीआई विलय(टी)न्यूज18(टी)संसद मान्यता(टी)पार्टी प्रतीक विवाद(टी)राजनीतिक समाचार भारत(टी)विद्रोही टीएमसी एमपीएस(टी)टीएमसी(टी)टीएमसी संकट(टी)टीएमसी पहचान(टी)टीएमसी कानूनी लड़ाई(टी)टीएमसी एमपीएस(टी)टीएमसी एनसीपीआई विलय(टी)टीएमसी पार्टी चिन्ह(टी)टीएमसी विद्रोही गुट(टी)टीएमसी विद्रोही एमपीएस(टी)टीएमसी विद्रोह(टी)टीएमसी विभाजन(टी)टीएमसी प्रतीक(टी)टीएमसी प्रतीक लड़ाई(टी)तृणमूल कांग्रेस
टीएमसी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी के साथ विलय का बचाव किया, दो-तिहाई नियम का हवाला दिया
सीएनएन-न्यूज18 से बात करते हुए टीएमसी सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी के साथ विलय का बचाव करते हुए कहा कि यह दल-बदल विरोधी कानूनों के तहत दो-तिहाई नियम का अनुपालन करता है। सुदीप का दावा है कि सांसद टीएमसी के प्रतीक पर चुने गए थे और कहते हैं कि पार्टी 20 जुलाई को संसद में अपना दावा पेश करेगी। उनकी टिप्पणी टीएमसी सांसदों की स्थिति, विलय की वैधता और दल-बदल विरोधी के तहत निहितार्थ पर गहरी राजनीतिक और कानूनी लड़ाई के बीच आई है। रूपरेखा। यह विकास संसदीय मान्यता, पार्टी प्रतीकों, गुटीय दावों और क्या विलय कानूनी और राजनीतिक जांच का सामना कर सकता है, पर महत्वपूर्ण सवाल उठाता है। -newsNews18 मोबाइल ऐप – https://onelink.to/desc-youtube आखरी अपडेट: 15 जून, 2026, 16:17 IST (टैग्सटूट्रांसलेट)दलबदल विरोधी कानून(टी)बंगाल राजनीति(टी)ब्रेकिंग न्यूज भारत(टी)सीएनएन-न्यूज18(टी)भारतीय राजनीति(टी)जुलाई 20 संसद(टी)ममता बनर्जी(टी)राष्ट्रवादी नागरिक पार्टी(टी)न्यूज18(टी)संसद दावा जुलाई 20(टी)राजनीतिक समाचार भारत(टी)सुदीप बंद्योपाध्याय(टी)सुदीप बंद्योपाध्याय सीएनएन न्यूज18(टी)दसवीं अनुसूची(टी)टीएमसी(टी)टीएमसी संकट(टी)टीएमसी गुट(टी)टीएमसी विलय(टी)टीएमसी एमपीएस(टी)टीएमसी एमपीएस का दावा दावा(टी)टीएमसी राष्ट्रवादी नागरिक पार्टी विलय(टी)टीएमसी विद्रोह(टी)टीएमसी प्रतीक(टी)तृणमूल कांग्रेस
एनसीपीआई विलय के अंदर: क्यों टीएमसी विद्रोहियों ने एकनाथ शिंदे प्लेबुक को दरकिनार कर दिया | भारत समाचार

आखरी अपडेट:15 जून, 2026, 15:58 IST एनसीपीआई का रास्ता चुनते हुए, विद्रोहियों ने संसदीय अस्तित्व सुरक्षित कर लिया, कालीघाट के नियंत्रण से मुक्त हो गए, एक स्वतंत्र पहचान हासिल की और एनडीए के साथ जुड़ने का रास्ता साफ कर लिया। विद्रोहियों ने “असली पार्टी” टेम्पलेट को दरकिनार कर दिया और एक अस्पष्ट, पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त इकाई-नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में चुपचाप, रातों-रात विलय कर लिया। (एएनआई) 28 में से 20 लोकसभा सांसदों और 80 में से 60 विधायकों के विद्रोही खेमे में होने के कारण, संसद में काकोली घोष दस्तीदार और बंगाल विधान सभा में रीताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के असंतुष्ट गुट के पास तख्तापलट करने के लिए आवश्यक सभी कार्ड थे। राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने तुरंत मान लिया कि वे एकनाथ शिंदे या अजीत पवार की चाल को क्रियान्वित करेंगे, जो ‘असली टीएमसी’ होने का दावा करेंगे, प्रतिष्ठित जुड़वां-फूलों के प्रतीक को फ्रीज करेंगे, और ममता बनर्जी को उनके द्वारा बनाए गए घर से बाहर धकेल देंगे। इसके बजाय, विद्रोहियों ने एक ऐसा कर्वबॉल फेंका जिसने न केवल कोलकाता बल्कि पूरे देश के राजनीतिक हलकों को हैरान कर दिया। ब्लॉक ने “वास्तविक पार्टी” टेम्पलेट को दरकिनार कर दिया और एक अस्पष्ट, पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त इकाई-नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में चुपचाप, रातों-रात विलय कर लिया। NCPI 2023 में गठित एक पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल (RUPP) है, जिसने उसी वर्ष त्रिपुरा में चुनाव लड़ा था। यह भी पढ़ें | ‘वन्स द एमपी-एमएलए थिंग्स आर डन…’: ऋतब्रत बनर्जी ने टीएमसी के अधिग्रहण का संकेत दिया, नजरें स्थानीय निकायों पर यह समझने के लिए कि तृणमूल के विद्रोहियों ने “असली टीएमसी” की शक्तिशाली ब्रांडिंग क्यों की या लगभग पांच घंटे की लंबी बैठक के बाद भाजपा के बंगाल प्रभारी भूपेन्द्र यादव ने उन्हें ऐसा करने की सलाह क्यों दी, किसी को प्रकाशिकी से परे देखना होगा और दल-बदल विरोधी कानून और संसदीय नौकरशाही की ठंडी, गणना की गई वास्तविकताओं में गोता लगाना होगा। ‘सादिक अली’ दलदल का जाल विद्रोहियों द्वारा मूल पार्टी पर दावा करने से बचने का प्राथमिक कारण यह है कि “असली पार्टी” की लड़ाई कभी भी एक सप्ताह में नहीं जीती जाती है। प्रतीक आदेश के पैरा 15 के तहत, भारत का चुनाव आयोग (ईसीआई) एक सख्त कानूनी ढांचे पर निर्भर करता है – 1971 सादिक अली का फैसला। यह फ़ॉर्मूला तीन चीज़ों का परीक्षण करता है- पार्टी के उद्देश्य, उसका विधायी बहुमत, और उसका संगठनात्मक बहुमत। जबकि विद्रोहियों ने विधायी और संसदीय शाखाओं पर निर्विवाद रूप से नियंत्रण कर लिया था, उन्हें जमीनी स्तर पर एक दुर्गम दीवार का सामना करना पड़ा। तृणमूल कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा, बूथ-स्तरीय समितियों से लेकर जिला अध्यक्षों और मुख्य कार्यकारी तक, अभी भी ममता बनर्जी के प्रति पूरी तरह वफादार है। यदि विद्रोहियों ने “असली टीएमसी” शीर्षक का दावा किया होता, तो ईसीआई प्रक्रिया वर्षों नहीं तो महीनों तक खिंच जाती। अंतरिम में, विद्रोही सांसद विधायी अधर में फंसे रहेंगे, आधिकारिक टीएमसी व्हिप से बंधे रहेंगे, और लगातार कानूनी झगड़े के संपर्क में रहेंगे। सादिक अली फैसले का 2023 के ऐतिहासिक सुभाष देसाई फैसले से गहरा संबंध है और उस पर महत्वपूर्ण असर है। पहला फैसला चुनाव चिह्न विवादों को हल करने के लिए ईसीआई की मार्गदर्शक मिसाल बन गया, जबकि बाद वाले ने दलबदल के सवालों को संबोधित किया, अध्यक्ष की शक्तियों को रेखांकित किया और प्रतीक आवंटन को नियंत्रित करने वाले कानूनी ढांचे को स्पष्ट किया। 1971 के सादिक अली मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने किसी पार्टी के प्रतीक का अधिकार निर्धारित करने के लिए बहुमत समर्थन के परीक्षण को प्राथमिक मानदंड के रूप में स्थापित किया। हालाँकि, 2023 के सुभाष देसाई फैसले ने आगाह किया कि महज ‘संख्या का खेल’ भ्रामक हो सकता है, जहाँ विधायकों को दल-बदल विरोधी प्रावधानों के तहत संभावित अयोग्यता का सामना करना पड़ता है। यह भी पढ़ें | पहेली का आखिरी टुकड़ा: टीएमसी विद्रोहियों को अपने पक्ष में भारी वजन की आवश्यकता क्यों है जबकि सादिक अली का फैसला ऐसे युग में दिया गया था जब कोई दल-बदल विरोधी कानून मौजूद नहीं था, सुभाष देसाई के फैसले ने प्रतीक विवादों और दल-बदल विरोधी शासन के बीच बातचीत को स्पष्ट किया, यह सुनिश्चित करते हुए कि पार्टी की पहचान और विधायी बहुमत के सवालों का मूल्यांकन दल-बदल को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक ढांचे के भीतर किया जाता है। विद्रोही सांसदों के सामने कानूनी वास्तविकताएँ लोकसभा की परिस्थितियाँ महाराष्ट्र जैसे राज्य विधानसभा या पश्चिम बंगाल की वर्तमान स्थिति से मौलिक रूप से भिन्न हैं। संसद के भीतर विद्रोह शुरू करने के लिए कहीं अधिक कानूनी और प्रक्रियात्मक बाधाएं शामिल होती हैं। लोकसभा के भीतर, दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर दल-बदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है, काफी कठोरता के साथ लागू की जाती है। अध्यक्ष किसी अनसुलझे आंतरिक पार्टी विवाद के आधार पर एक अलग विद्रोही गुट को मान्यता नहीं दे सकते या बैठने की व्यवस्था को पुनर्व्यवस्थित नहीं कर सकते। तत्काल मान्यता प्राप्त कानूनी और संगठनात्मक ढांचे की अनुपस्थिति, या विद्रोही सांसदों द्वारा सदन के भीतर स्वतंत्र रूप से कार्य करने के किसी भी प्रयास से उन्हें अपनी पार्टी की सदस्यता ‘स्वेच्छा से छोड़ने’ के आधार पर अयोग्यता की कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता है। असंतुष्ट सांसद पूरी तरह से जागरूक थे या उन्हें इस जोखिम के बारे में अवगत कराया गया था। एक अलग ‘विद्रोही टीएमसी ब्लॉक’ के रूप में काम करने का प्रयास करने के साथ-साथ ममता बनर्जी की सत्ता को चुनौती देने से तेजी से दल-बदल विरोधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे संभावित रूप से उनके दावों पर निर्णय होने से बहुत पहले ही उनकी संसदीय सीटें खतरे में पड़ सकती हैं। दो-तिहाई विलय शील्ड दसवीं अनुसूची अयोग्यता के लिए बिल्कुल एक कठोर अपवाद प्रदान करती है, जो एक औपचारिक विलय है, जहां कम से कम दो-तिहाई विधायी विंग किसी अन्य पंजीकृत राजनीतिक दल में शामिल होने के लिए सहमत होते हैं। 28 लोकसभा सांसदों में से ठीक 20 को खींचकर, विद्रोहियों ने 71.4 प्रतिशत का आरामदायक बहुमत हासिल कर लिया, जिससे संवैधानिक बाधाएं दूर हो गईं। इस प्रकार एनसीपीआई में जाना एक अत्यधिक रणनीतिक, रक्षात्मक कानूनी उपकरण था। यह भी पढ़ें | सायोनी घोष से लेकर युसुफ
‘मुसलमान अब कालीन नहीं फैलाएंगे’: ओवैसी ने ‘हिस्सेदारी’ पिच के साथ यूपी 2027 अभियान शुरू किया | भारत समाचार

आखरी अपडेट:15 जून, 2026, 15:49 IST एआईएमआईएम प्रमुख ने कहा कि मुसलमानों और अन्य हाशिये पर रहने वाले समुदायों को अब केवल बड़े राजनीतिक दलों के वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी (पीटीआई छवि) एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए अपनी पार्टी का अभियान बहराइच से शुरू किया, एक संदेश दिया जो सामान्य विपक्षी कथा से परे था। “हिस्सेदारी” (सत्ता में भागीदारी) और “बाराबारी” (समानता) की बात करते हुए, ओवेसी ने घोषणा की कि मुसलमान अब अन्य पार्टियों के लिए “कालीन नहीं बिछाएंगे”, उन्होंने राजनीतिक भागीदारी को केवल चुनावी समर्थन के बजाय सत्ता-साझाकरण के सवाल के रूप में फिर से परिभाषित करने के एआईएमआईएम के प्रयास को उजागर किया। अपने संबोधन में, ओवैसी ने कहा कि मुसलमानों और अन्य हाशिए पर रहने वाले समुदायों को अब केवल बड़े राजनीतिक दलों के वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए और चुनावी जीत में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले समुदायों को भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व, निर्णय लेने और शासन में समान हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। उनका यह दावा कि दूसरों के लिए “कालीन फैलाने” का समय खत्म हो गया है, का उद्देश्य मतदाताओं को राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए प्रोत्साहित करना था न कि केवल उन पार्टियों का समर्थन करने तक सीमित रहना जो उनके हितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। इस टिप्पणी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। ओवैसी की नवीनतम टिप्पणी से पता चलता है कि एआईएमआईएम राजनीतिक बातचीत को चुनावी अंकगणित से प्रतिनिधित्व और निर्णय लेने की शक्ति में स्थानांतरित करने की कोशिश कर रही है, जिससे राज्य में विपक्षी राजनीति के भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण सवाल उठ रहे हैं। लखनऊ के डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर शशिकांत पांडे के अनुसार, ओवैसी के बयान का महत्व अल्पसंख्यक राजनीति के ढांचे को बदलने के उनके प्रयास में निहित है। “ओवैसी चर्चा को संरक्षण से भागीदारी की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। दशकों से, उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीति ने भाजपा को हराने के लिए सबसे अच्छी स्थिति वाली पार्टी का समर्थन करने पर ध्यान केंद्रित किया है। एआईएमआईएम अब पूछ रही है कि क्या चुनावी समर्थन को राजनीतिक शक्ति में आनुपातिक हिस्सेदारी में तब्दील किया जाना चाहिए।” बहराइच रैली महज एक अभियान की शुरुआत नहीं थी बल्कि 2027 के चुनावों के लिए एआईएमआईएम की रणनीति की घोषणा थी। बड़ी मुस्लिम आबादी वाले जिले को चुनकर, ओवैसी ने संकेत दिया कि पार्टी पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपने पदचिह्न का विस्तार करने और स्थापित विपक्षी कथा को चुनौती देने का इरादा रखती है। जबकि ओवैसी ने कथित मुठभेड़ हत्याओं और कानून-व्यवस्था के मुद्दों पर भाजपा सरकार की आलोचना की, राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि उनका संदेश विपक्षी दलों, विशेष रूप से समाजवादी पार्टी पर समान रूप से निर्देशित था, जिसे पारंपरिक रूप से मुस्लिम मतदाताओं के बीच भारी समर्थन प्राप्त है। प्रोफेसर पांडे ने कहा, “असली राजनीतिक मुकाबला केवल एआईएमआईएम और बीजेपी के बीच नहीं है।” “यह एआईएमआईएम और समाजवादी पार्टी के बीच भी है कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने का वैध दावा कौन कर सकता है।” एआईएमआईएम का तर्क है कि धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए समर्थन हमेशा आनुपातिक राजनीतिक प्रभाव में तब्दील नहीं होता है और पांडे का मानना है कि यह रणनीति विशेष रूप से युवा मतदाताओं के लिए है। “नई पीढ़ी तेजी से प्रतीकात्मक आवास के बजाय प्रतिनिधित्व के बारे में सवाल पूछ रही है। राजनीति को सत्ता में भागीदारी के सवाल के रूप में पेश करके ओवैसी उस भावना को भुनाने का प्रयास कर रहे हैं।” ओवैसी के भाषण का एक अन्य प्रमुख पहलू उत्तर प्रदेश में कथित पुलिस मुठभेड़ों की उनकी आलोचना थी। उन्होंने दावा किया कि निर्दोष लोगों को निशाना बनाया जा रहा है और उन्होंने इसे राज्य सत्ता का दुरुपयोग बताया। हालाँकि, भाजपा ने लगातार मुठभेड़ों को एक मजबूत कानून-व्यवस्था नीति और अपराधियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई के सबूत के रूप में पेश किया है। इस मुद्दे को उठाकर, ओवैसी एआईएमआईएम को संवैधानिक अधिकारों और उचित प्रक्रिया के रक्षक के रूप में स्थापित कर रहे हैं। पांडे ने कहा, “मुठभेड़ का मुद्दा एआईएमआईएम को पहचान की राजनीति से परे अपनी अपील का विस्तार करने की अनुमति देता है।” “यह पार्टी को संवैधानिक सुरक्षा उपायों, नागरिक स्वतंत्रता और कानूनी जवाबदेही के लिए खुद को एक आवाज के रूप में पेश करने में सक्षम बनाता है।” साथ ही, एआईएमआईएम मुसलमानों, दलितों और अन्य हाशिये पर रहने वाले समुदायों का एक व्यापक गठबंधन बनाने की संभावना तलाश रही है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस तरह के गठबंधन पर अक्सर चर्चा होती रही है, लेकिन चुनावी वास्तविकताओं ने इसे हासिल करना मुश्किल बना दिया है। पांडे ने कहा, “दलित-मुस्लिम राजनीतिक गठबंधन के विचार में सैद्धांतिक ताकत है।” “हालांकि, उस विचार को एक स्थायी चुनावी गठबंधन में बदलने के लिए जमीनी स्तर पर संगठन, विश्वसनीय स्थानीय नेतृत्व और दीर्घकालिक सामाजिक जुड़ाव की आवश्यकता होती है।” आलोचकों का तर्क है कि उत्तर प्रदेश में एआईएमआईएम का विस्तार विपक्षी वोटों को विभाजित कर सकता है और अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है। ओवेसी ने उस आरोप को बार-बार खारिज किया है और कहा है कि लोकतांत्रिक राजनीति सामरिक मतदान के बजाय वास्तविक प्रतिनिधित्व पर आधारित होनी चाहिए। क्या एआईएमआईएम अपनी बयानबाजी को चुनावी सफलता में बदल पाएगी, यह अनिश्चित बना हुआ है। अपने अभियानों के माध्यम से ध्यान आकर्षित करने के बावजूद पार्टी को अब तक उत्तर प्रदेश में महत्वपूर्ण जीत हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ा है। फिर भी प्रतिनिधित्व, भागीदारी और सत्ता-साझाकरण पर इसके बढ़ते जोर ने पहले ही राज्य के राजनीतिक विमर्श में एक नया आयाम डाल दिया है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना जगह : बहराईच, भारत, भारत न्यूज़ इंडिया ‘मुसलमान अब कालीन नहीं फैलाएंगे’: ओवैसी ने ‘हिस्सेदारी’ पिच के साथ यूपी 2027 अभियान की शुरुआत की अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी






