‘शक्ति का स्तंभ’: डीके शिवकुमार ने कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के लिए हार्दिक संदेश लिखा | भारत समाचार

आखरी अपडेट:29 मई, 2026, 11:54 IST कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद डीके शिवकुमार ने सिद्धारमैया की सराहना की, उनकी दशकों लंबी यात्रा, कल्याणकारी योजनाओं और कांग्रेस को मजबूत करने में समर्थन की सराहना की। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के अधीन काम करना सौभाग्य की बात है। (स्रोत: पीटीआई) सिद्धारमैया के कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के एक दिन बाद, उपमुख्यमंत्री और राज्य कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने अनुभवी नेता के लिए एक हार्दिक नोट लिखा और उनकी राजनीतिक यात्रा को श्रद्धांजलि दी, जो मैसूर के एक छोटे से गांव से शुरू हुई और उन्हें राज्य के शीर्ष राजनीतिक कार्यालय तक ले गई। एक्स से बात करते हुए, शिवकुमार ने सिद्धारमैया के नेतृत्व और कर्नाटक के विकास और शासन को आकार देने में उनकी भूमिका के लिए आभार व्यक्त किया। उन्होंने लिखा, “भगवान वरदान या अभिशाप नहीं देते। वह केवल अवसर देते हैं। वास्तव में मायने यह रखता है कि हम उन अवसरों से क्या बनाते हैं।” भगवान वरदान या शाप नहीं देते। वह केवल अवसर देता है. वास्तव में मायने यह रखता है कि हम उन अवसरों का क्या उपयोग करते हैं। श्री सिद्धारमैया अवरू का जीवन इस विचार के बेहतरीन प्रतिबिंबों में से एक है। मैसूर के एक साधारण गांव से लेकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में नेतृत्व करने तक, उनका… https://t.co/cWZy9eQ48o – डीके शिवकुमार (@DKशिवकुमार) 29 मई, 2026 शिवकुमार ने सिद्धारमैया की राजनीतिक यात्रा की सराहना की उपमुख्यमंत्री ने कहा, “मैसूर के एक साधारण गांव से लेकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में नेतृत्व करने तक की उनकी यात्रा लचीलेपन, दृढ़ता और सामाजिक न्याय के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में खड़ी है। जैसे ही वह मुख्यमंत्री के पद से हट रहे हैं, मैं कर्नाटक के लोगों के प्रति उनकी वर्षों की सेवा और नेतृत्व के लिए हार्दिक आभार और गहरा सम्मान व्यक्त करता हूं।” शिवकुमार ने सिद्धारमैया के लचीलेपन, नेतृत्व और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता की भी सराहना की, उनके कल्याण-संचालित शासन और कर्नाटक के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला। यह भी पढ़ें: सिद्धारमैया, डीके शिवकुमार ने दिल्ली में राहुल, सोनिया से की बातचीत; एजेंडे में कैबिनेट ओवरहाल उन्होंने कहा, “उनके कार्यकाल के दौरान की गई कई लोक कल्याण योजनाओं और कई विकासात्मक पहलों का प्रभाव कर्नाटक की विकास गाथा में महत्वपूर्ण अध्याय रहेगा। सार्वजनिक जीवन में लगभग पांच दशकों से अधिक समय में, उन्होंने जन-केंद्रित शासन और समावेशी नेतृत्व के माध्यम से हमारे राज्य के राजनीतिक और सामाजिक ताने-बाने को आकार दिया है।” ‘समर्थन का एक स्तंभ’ शिवकुमार ने कहा कि 2020 में केपीसीसी अध्यक्ष बनने के बाद से सिद्धारमैया समर्थन के स्तंभ रहे हैं। उन्होंने कहा, “जब से मुझे 2020 में केपीसीसी अध्यक्ष के रूप में सेवा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, सिद्धारमैया एक ताकत के स्तंभ की तरह मेरे साथ मजबूती से खड़े रहे हैं। हमने मिलकर पार्टी को मजबूत करने और लोगों तक इसके दृष्टिकोण को ले जाने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है।” शिवकुमार ने कहा, “उपमुख्यमंत्री के रूप में उनके साथ काम करना और उनके अनुभव, ज्ञान और राजनीतिक दूरदर्शिता से लगातार सीखना सौभाग्य की बात है। मुझे पूरी उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में उनका मार्गदर्शन हम सभी को प्रेरित और मजबूत करता रहेगा क्योंकि हम कर्नाटक की प्रगति और कल्याण की दिशा में काम करेंगे।” यह भी पढ़ें: सिद्धारमैया का इस्तीफा स्वीकार, कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहेंगे, कांग्रेस में बदलाव की प्रक्रिया पूरी इस प्रसिद्ध कहावत को दोहराते हुए कि कोई भी अकेले तेजी से चल सकता है, लेकिन साथ मिलकर आगे बढ़ सकता है, शिवकुमार ने कहा कि वह कर्नाटक के लोगों के कल्याण और प्रगति के लिए साझा यात्रा जारी रखने के लिए उत्सुक हैं। “जैसा कि कहा जाता है, “यदि आप तेज़ चलना चाहते हैं, तो अकेले चलें। यदि आप दूर तक चलना चाहते हैं, तो साथ चलें।” उन्होंने कहा, ”मैं कर्नाटक के लोगों के लिए इस यात्रा को एक साथ आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक हूं।” इस बीच, कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने शुक्रवार को सिद्धारमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया, इसके एक दिन बाद। जब से कांग्रेस ने कर्नाटक में सरकार बनाई है, राजनीतिक गलियारों में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच संभावित मुख्यमंत्री पद की व्यवस्था को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने कभी भी सार्वजनिक रूप से किसी भी सत्ता-साझाकरण समझौते की पुष्टि नहीं की है, लेकिन “2.5-वर्षीय सीएम फॉर्मूले” की अफवाहें बार-बार सामने आई हैं, खासकर दिल्ली में कर्नाटक के नेताओं और कांग्रेस आलाकमान के बीच प्रमुख बैठकों के दौरान। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया ‘शक्ति का स्तंभ’: डीके शिवकुमार ने कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के लिए हार्दिक संदेश लिखा अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)सिद्धारमैया का इस्तीफा(टी)डीके शिवकुमार श्रद्धांजलि(टी)कर्नाटक के मुख्यमंत्री(टी)सिद्धारमैया की राजनीतिक यात्रा(टी)कर्नाटक कांग्रेस नेतृत्व(टी)सामाजिक न्याय शासन(टी)कल्याण योजनाएं कर्नाटक(टी)केपीसीसी अध्यक्ष 2020
बशीर बद्र ने गजल को आम आदमी की जुबान बनाया:कुमार विश्वास बोले- वे जहां खड़े होते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था

उर्दू शायरी को आम लोगों की जुबान तक पहुंचाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर 12 बजकर 35 मिनट पर भोपाल स्थित घर पर निधन हो गया। 91 वर्षीय बशीर लंबे समय से बीमार थे और याददाश्त भी खो चुके थे। शाम को बड़ा बाग कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। पद्मश्री और साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजे गए बशीर ने करीब 700 गजलें और नज्में जबकि 4 हजार से ज्यादा शेर लिखे थे। 1987 के मेरठ दंगों में बशीर साहब का घर जला दिया गया था। इसमें सालों की जमा-पूंजी, डिग्रियां, किताबें और यादें राख हो गईं। इसके बाद वे भोपाल में आकर बस गए। इस गहरे सदमे में शायरी कही- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में। वे जहां खड़े होते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था बशीर बद्र के निधन पर देश-प्रदेश के शायर और कवियों ने दुख जताया है। कुमार विश्वास ने दैनिक भास्कर से बात करते हुए कहा- मैं बहुत कम लोगों के लिए यह कहता हूं कि उन्होंने भाषा को बदल दिया। बशीर बद्र साहब उन गिने-चुने लोगों में थे। उन्होंने सिर्फ गजल नहीं लिखी, उन्होंने गजल को ड्रॉइंगरूम से निकालकर आम आदमी की जुबान बना दिया। उन्होंने कहा- बशीर साहब से मेरा रिश्ता तीन दशक से ज्यादा का था। पहले मैं उन्हें एक श्रोता की तरह सुनता था, फिर एक साथी कवि की तरह उनके साथ मंच साझा करने लगा। हम दोनों का रिश्ता मेरठ से था, इसलिए एक अपनापन हमेशा महसूस होता था। बाद में जब वे कुछ अप्रिय परिस्थितियों के कारण भोपाल आकर बस गए, तब भी मुलाकातों और मुशायरों का सिलसिला चलता रहा। मैंने उन्हें हमेशा एक बड़े आदमी और बड़े शायर की तरह देखा। वे जहां खड़े हो जाते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था। बशीर बद्र भारतीय गजल के गौतम बुद्ध थे। जैसे भगवान बुद्ध ने कठिन आध्यात्म को पाली और प्राकृत जैसी लोकभाषाओं में उतारकर आम आदमी तक पहुंचाया, वैसे ही बशीर साहब ने बड़ी से बड़ी बात को इतनी सादगी से कहा कि वह सीधे लोगों के दिल में उतर गई। उनकी शायरी में कोई दिखावा नहीं था। चमत्कार पैदा करने की कोशिश नहीं थी, पर हर शेर खुद एक चमत्कार बन जाता था। संसद-विधानसभाओं में चले जाइए, अखबारों में देख लीजिए, सड़कों के नारों में सुन लीजिए- बशीर बद्र मौजूद मिलेंगे। उनका शेर भारत-पाक के रिश्तों की भाषा बना कुमार विश्वास ने कहा, ‘बशीर बद्र का शेर- दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए…भारत-पाक के रिश्तों की भाषा बन गया। दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष हाथ मिलाते थे, अगले दिन यही शेर अखबारों में छपा होता। यह शेर न जाने कितने मौकों पर कहा गया- उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो… न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए। मुझे याद है, मीना कुमारी जैसी बड़ी अदाकारा ने इसे अपनी डायरी में लिखा था। सोचिए, एक शेर किताबों से निकलकर जिंदगी का हिस्सा बन जाए, इससे बड़ी बात किसी शायर के लिए क्या होगी? बशीर साहब अच्छे शायर होने के साथ बहुत पढ़े-लिखे भी थे। उन्होंने पीएचडी की थी। उनमें एक प्रोफेसराना ठहराव था। बात करते थे तो लगता था जैसे कोई बहुत तहजीब वाला आदमी अपने इल्म को बहुत सलीके से आपके सामने रख रहा है। अपनी शायरी में हमेशा जिंदा रहेंगे बशीर बद्र कुमार विश्वास ने आगे बताया- मुझे भोपाल राजभवन का एक मुशायरा याद है। दो बड़े शायरों के बीच बहस बढ़ गई थी। माहौल खराब हो सकता था। लेकिन बशीर साहब ने जिस शालीनता से स्थिति संभाली, वह सिर्फ बड़े शायर का नहीं, बड़े इंसान का भी परिचय था। उनके आखिरी साल आसान नहीं थे। बीमारी तकलीफदेह थी। पर मैं यहां खास तौर पर डॉ. राहत बद्र का जिक्र करना चाहूंगा। जिस समर्पण और प्रेम से उन्होंने बशीर साहब की सेवा की, वह प्रेम की पराकाष्ठा है। आज के समय में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं। मुझे लगता है कि किसी शायर की असली मौत तब होती है जब उसके शेर लोगों की जिंदगी से चले जाएं। बशीर बद्र साहब के साथ ऐसा कभी नहीं होगा। वे अपने अशआर (कई सारे शेर) में हमेशा जिंदा रहेंगे। जब तक लोग मोहब्बत करेंगे, रिश्तों को बचाने की कोशिश करेंगे, टूटने के बाद भी मुस्कुराना सीखेंगे… तब तक बशीर बद्र जिंदा रहेंगे। अधूरी है तेरी रचना जरा तू पूरा करने दे… प्रसार भारती के चेयरमैन और मशहूर कवि प्रसून जोशी ने खास तौर पर लिखी कविता दैनिक भास्कर से साझा की है… अधूरी है तेरी रचना जरा तू पूरा करने दे यहां एक चोट रखने दे वहां एक घाव भरने दे यहीं काग़ज़ पे ये अल्फ़ाज़ सारे सूख जाएंगे ज़रा सा फैल जाने दे ज़रा बूंदें बिखरने दे अभी अंगूर में हूं और मुझे ख़ामोश रहना है सुराही में ज़रा शीशों में तू मुझको उतरने दे कहां बुझने का डर मुझको मैं कोई शमा थोड़े हूं ज़रा सी ज़ुल्फ़ हूं मुझको तू झोंकों से संवरने दे सुनी हैं धड़कनें उसकी कई चुपचाप कानों से यही उम्मीद है शायद मुझे बांहों में मरने दे सुने तू बैठ कर मुझको नहीं ऐसी तमन्ना है मैं हूं ट्रक पर लिखा एक शेर तू मुझको गुज़रने दे
नॉर्वे चेस- वर्ल्ड चैंपियन गुकेश लगातार तीसरा मैच हारे:चौथे राउंड में कार्लसन ने हराया, स्टैंडिंग में सबसे निचले स्थान पर आए

भारतीय ग्रैंडमास्टर डी गुकेश का नॉर्वे चेस टूर्नामेंट में खराब दौर जारी है। उन्हें दुनिया के नंबर-1 खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन ने हराया। गुरुवार को मिली इस हार के बाद गुकेश स्टैंडिंग में सबसे नीचे पहुंच गए हैं। 7 बार के नॉर्वे चेस चैंपियन कार्लसन ने काले मोहरों से खेलते हुए गुकेश को मात दी। शुरुआती तीन राउंड में संघर्ष करने वाले कार्लसन अब 4.5 अंकों के साथ चौथे स्थान पर पहुंच गए हैं, जबकि गुकेश 3.5 अंकों के साथ आखिरी स्थान पर खिसक गए हैं। मैच के बाद कार्लसन ने कहा कि उन्हें गुकेश की ओपनिंग रणनीति देखकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीय खिलाड़ी ने जरूरत से ज्यादा आक्रामक खेला, जिसका फायदा उन्हें मिला। प्रज्ञानानंदा ने 17 चाल में टाईब्रेक जीता आर प्रज्ञानानंदा ने विन्सेंट कीमर को आर्मगेडन टाईब्रेक में हराकर दूसरा स्थान बरकरार रखा है। उन्होंने विन्सेंट कीमर के खिलाफ क्लासिकल मैच ड्रॉ होने के बाद आर्मगेडन टाईब्रेक में 17 चालों में जीत दर्ज की। इस जीत से वे 6 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर बने हुए हैं। फ्रांस के अलीरेजा फिरोजा 8.5 अंकों के साथ शीर्ष पर कायम हैं। दिव्या को मुजिचुक ने हराया, हम्पी आखिरी स्थान पर महिला वर्ग में भारत की दिव्या देशमुख को पहली बार आर्मगेडन में हार मिली। डिफेंडिंग चैंपियन अन्ना मुजिचुक ने उन्हें हराया। दिव्या 5.5 अंकों के साथ संयुक्त तीसरे स्थान पर हैं। वहीं कोनेरू हम्पी आखिरी स्थान पर बनी हुई हैं। ————————————————–
नेपाली पीएम के 100 में से 88 वादे अधूरे:शपथ के 30 दिन में 2 मंत्रियों ने सरकार छोड़ी, जेन-जी बोले- क्या काबिल लोग नहीं

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी सिर्फ दो महीने हुए हैं, लेकिन उनकी सरकार पर सवाल उठने लगे हैं। बालेन ने 27 मार्च को शपथ लेने के बाद 100 पॉइंट सुधार एजेंडा लॉन्च किया था। हालांकि, प्रधानमंत्री कार्यालय की ट्रैकर वेबसाइट पर 88 वादे ओवरड्यू यानी तय समय से पीछे बताए जा रहे हैं। इसके अलावा, सरकार बनने के 30 दिन के भीतर ही बालेन के दो बड़े मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा। श्रम मंत्री दीपक शाह पर पत्नी को गलत तरीके से नौकरी दिलाने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें हटाया गया। वहीं गृह मंत्री सूदन गुरुंग को एक जांच के दायरे में आए कारोबारी से रिश्तों के आरोपों के बाद इस्तीफा देना पड़ा। इससे जेन-जी युवाओं में नाराजगी बढ़ रही है। युवा सवाल उठा रहे हैं कि अगर यही लोग चुने गए, तो नई राजनीति में फर्क क्या है? क्या सरकार में काबिल लोग नहीं बचे? बालेन की पार्टी के भीतर भी सवाल उठ रहे बालेन सरकार के कई फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन हुए है। साथ ही अदालत में भी चुनौती दी गई है। विपक्ष के साथ-साथ अब उनकी पार्टी के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। संसद में विपक्ष के सवालों पर जवाब न देने पर वालेन की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेताओं आशिका तमांग और अमरेश कुमार सिंह ने भी सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाए। अमरेश सिंह ने कहा कि नेपाल का लोकतंत्र ‘पाकिस्तान मॉडल’ जैसा बनता जा रहा है, जहां सरकार संसद के प्रति जवाबदेह नहीं रहती। बालेन ने पीएम बनने के बाद कई वादे किए थे प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन ने मंत्रालयों की संख्या घटाने, घाटे वाले बोर्ड और समितियों को मर्ज करने और सरकारी कर्मचारियों व शिक्षकों को राजनीति से दूर रखने जैसे बड़े वादे किए थे। इसके अलावा गौरी बहादुर कार्की आयोग की सिफारिशें लागू करने, बंद पड़ी परियोजनाओं को फिर शुरू करने, निवेश और उद्योग सेवाओं को डिजिटल बनाने और ऊर्जा निर्यात की लंबी रणनीति तैयार करने की बात भी कही गई थी। गिरफ्तारी और आयोग रिपोर्ट पर विवाद बालेन सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के अंतरिम कार्यकाल में बनी कार्की आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फैसला किया। रिपोर्ट में भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग की जांच कर सुधार के सुझाव दिए गए थे। यह जेन Z आंदोलन से भी जुड़ी थी। सरकार पर आरोप लगा कि इसे स्पष्ट कानूनी आधार के बिना लागू किया गया। इसी बीच पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक की गिरफ्तारी को लेकर भी विवाद हुआ। आरोप लगा कि उचित कागजी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी। कानूनी और राजनीतिक स्तर पर इसका विरोध हुआ। नेपाली कांग्रेस नेता दीपक खड़का को भी लंबे समय तक हिरासत में रखने के बाद सबूतों की कमी के कारण रिहा करना पड़ा। अध्यादेशों से सरकार चलाने के आरोप बालेन सरकार के पास निचले सदन में दो-तिहाई बहुमत है, लेकिन ऊपरी सदन नेशनल असेंबली में उसका एक भी सदस्य नहीं है। नेपाल में कानून पास कराने और संशोधन के लिए ऊपरी सदन की अहम भूमिका होती है। ऐसे में बालेन सरकार आठ अध्यादेश लाई। इनमें सिविल सर्विस ट्रेड यूनियन और यूनिवर्सिटी छात्र संगठनों को खत्म करने के प्रस्ताव शामिल थे। नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी और छात्र संगठनों के विरोध के बीच इन अध्यादेशों पर रोक लगा दी। सोशल मीडिया पोस्ट में बालेन ने सफाई देते हुए कहा कि स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में पार्टी झंडे बंद करने से छात्रों और कर्मचारियों के अधिकार खत्म नहीं होंगे, बल्कि पेशेवर स्वतंत्रता मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा और नौकरशाही में छात्र और कर्मचारी संगठन राजनीतिक दलों की ‘स्लीपर सेल’ बन चुके हैं। उनके मुताबिक ट्रांसफर और प्रमोशन पार्टी के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता और काम के आधार पर होने चाहिए। बुलडोजर कार्रवाई पर सड़क से अदालत तक विरोध बालेन सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना अतिक्रमण हटाओ अभियान को लेकर हो रही है। नेपाल के अलग-अलग हिस्सों में बेघर और भूमिहीन लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। अधिकारियों के मुताबिक सिर्फ काठमांडू घाटी में करीब 4 हजार ढांचे तोड़े गए हैं। इससे कम से कम 15 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। बालेन जब काठमांडू के मेयर थे, तब भी उन्होंने बुलडोजर कार्रवाई को अपनी राजनीति का बड़ा हिस्सा बनाया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसी मॉडल को देशभर में लागू किया। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों समेत कई मानवाधिकार संगठनों ने भी इन कार्रवाइयों की आलोचना की है। उनका कहना है कि सरकार ने गरीब लोगों को बिना उचित पहचान, बातचीत और पुनर्वास योजना के हटाया। 2 महीने में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की चुनाव प्रचार के दौरान बालेन ने पारदर्शिता और जवाबदेही का वादा किया था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी चुप्पी सवालों के घेरे में है। शपथ लेने के बाद से उन्होंने न तो देश को संबोधित किया और न ही कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वह राष्ट्रपति के नीति और कार्यक्रम वाले भाषण के दौरान बीच में ही निकल गए थे। बाद में बिना सूचना संसद से भी अनुपस्थित रहे। विपक्ष ने संसद में लगातार हंगामा किया और प्रधानमंत्री से सदन में आकर जवाब देने की मांग की। भारत से सामान लाने पर सख्ती से सीमा इलाकों में नाराजगी नेपाल सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी के नियम सख्ती से लागू किए हैं। इसके बाद भारत-नेपाल सीमा पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। नियम के मुताबिक भारत से 100 नेपाली रुपए (लगभग 63 भारतीय रुपए) से ज्यादा का सामान लाने पर अनिवार्य कस्टम ड्यूटी देनी होगी। सामान की श्रेणी के हिसाब से टैक्स 5% से 80% तक है। दशकों से नेपाल के लोग भारतीय सीमा वाले शहरों से राशन, दवाइयां, कपड़े, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स और शादी का सामान खरीदते रहे हैं। नेपाली नववर्ष के बाद नियमों को सख्ती से लागू किया जाने लगा। इससे सीमा पर रहने वाले लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। लोगों के बीच नाराजगी बढ़ रही है। एक प्रदर्शनकारी ने ANI से कहा, “जन्म से लेकर मौत तक के सभी संस्कारों का सामान भारत से आता है। खाद तक कई बार वहीं से लानी पड़ती है। अब ऐसा लग रहा है जैसे बिना घोषणा
नॉर्वे चेस- वर्ल्ड चैंपियन गुकेश लगातार तीसरा मैच हारे:चौथे राउंड में कार्लसन ने हराया, स्टैंडिंग में सबसे निचले स्थान पर आए

भारतीय ग्रैंडमास्टर डी गुकेश का नॉर्वे चेस टूर्नामेंट में खराब दौर जारी है। उन्हें दुनिया के नंबर-1 खिलाड़ी मैग्नस कार्लसन ने हराया। गुरुवार को मिली इस हार के बाद गुकेश स्टैंडिंग में सबसे नीचे पहुंच गए हैं। 7 बार के नॉर्वे चेस चैंपियन कार्लसन ने काले मोहरों से खेलते हुए गुकेश को मात दी। शुरुआती तीन राउंड में संघर्ष करने वाले कार्लसन अब 4.5 अंकों के साथ चौथे स्थान पर पहुंच गए हैं, जबकि गुकेश 3.5 अंकों के साथ आखिरी स्थान पर खिसक गए हैं। मैच के बाद कार्लसन ने कहा कि उन्हें गुकेश की ओपनिंग रणनीति देखकर आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीय खिलाड़ी ने जरूरत से ज्यादा आक्रामक खेला, जिसका फायदा उन्हें मिला। प्रज्ञानानंदा ने 17 चाल में टाईब्रेक जीता आर प्रज्ञानानंदा ने विन्सेंट कीमर को आर्मगेडन टाईब्रेक में हराकर दूसरा स्थान बरकरार रखा है। उन्होंने विन्सेंट कीमर के खिलाफ क्लासिकल मैच ड्रॉ होने के बाद आर्मगेडन टाईब्रेक में 17 चालों में जीत दर्ज की। इस जीत से वे 6 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर बने हुए हैं। फ्रांस के अलीरेजा फिरोजा 8.5 अंकों के साथ शीर्ष पर कायम हैं। दिव्या को मुजिचुक ने हराया, हम्पी आखिरी स्थान पर महिला वर्ग में भारत की दिव्या देशमुख को पहली बार आर्मगेडन में हार मिली। डिफेंडिंग चैंपियन अन्ना मुजिचुक ने उन्हें हराया। दिव्या 5.5 अंकों के साथ संयुक्त तीसरे स्थान पर हैं। वहीं कोनेरू हम्पी आखिरी स्थान पर बनी हुई हैं। ————————————————–
नेपाली पीएम के 100 में से 88 वादे अधूरे:शपथ के 30 दिन में 2 मंत्रियों ने सरकार छोड़ी, जेन-जी बोले- क्या काबिल लोग नहीं

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी सिर्फ दो महीने हुए हैं, लेकिन उनकी सरकार पर सवाल उठने लगे हैं। बालेन ने 27 मार्च को शपथ लेने के बाद 100 पॉइंट सुधार एजेंडा लॉन्च किया था। हालांकि, प्रधानमंत्री कार्यालय की ट्रैकर वेबसाइट पर 88 वादे ओवरड्यू यानी तय समय से पीछे बताए जा रहे हैं। इसके अलावा, सरकार बनने के 30 दिन के भीतर ही बालेन के दो बड़े मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ा। श्रम मंत्री दीपक शाह पर पत्नी को गलत तरीके से नौकरी दिलाने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें हटाया गया। वहीं गृह मंत्री सूदन गुरुंग को एक जांच के दायरे में आए कारोबारी से रिश्तों के आरोपों के बाद इस्तीफा देना पड़ा। इससे जेन-जी युवाओं में नाराजगी बढ़ रही है। युवा सवाल उठा रहे हैं कि अगर यही लोग चुने गए, तो नई राजनीति में फर्क क्या है? क्या सरकार में काबिल लोग नहीं बचे? बालेन की पार्टी के भीतर भी सवाल उठ रहे बालेन सरकार के कई फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन हुए है। साथ ही अदालत में भी चुनौती दी गई है। विपक्ष के साथ-साथ अब उनकी पार्टी के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। संसद में विपक्ष के सवालों पर जवाब न देने पर वालेन की पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेताओं आशिका तमांग और अमरेश कुमार सिंह ने भी सार्वजनिक तौर पर सवाल उठाए। अमरेश सिंह ने कहा कि नेपाल का लोकतंत्र ‘पाकिस्तान मॉडल’ जैसा बनता जा रहा है, जहां सरकार संसद के प्रति जवाबदेह नहीं रहती। बालेन ने पीएम बनने के बाद कई वादे किए थे प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन ने मंत्रालयों की संख्या घटाने, घाटे वाले बोर्ड और समितियों को मर्ज करने और सरकारी कर्मचारियों व शिक्षकों को राजनीति से दूर रखने जैसे बड़े वादे किए थे। इसके अलावा गौरी बहादुर कार्की आयोग की सिफारिशें लागू करने, बंद पड़ी परियोजनाओं को फिर शुरू करने, निवेश और उद्योग सेवाओं को डिजिटल बनाने और ऊर्जा निर्यात की लंबी रणनीति तैयार करने की बात भी कही गई थी। गिरफ्तारी और आयोग रिपोर्ट पर विवाद बालेन सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के अंतरिम कार्यकाल में बनी कार्की आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फैसला किया। रिपोर्ट में भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग की जांच कर सुधार के सुझाव दिए गए थे। यह जेन Z आंदोलन से भी जुड़ी थी। सरकार पर आरोप लगा कि इसे स्पष्ट कानूनी आधार के बिना लागू किया गया। इसी बीच पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक की गिरफ्तारी को लेकर भी विवाद हुआ। आरोप लगा कि उचित कागजी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई थी। कानूनी और राजनीतिक स्तर पर इसका विरोध हुआ। नेपाली कांग्रेस नेता दीपक खड़का को भी लंबे समय तक हिरासत में रखने के बाद सबूतों की कमी के कारण रिहा करना पड़ा। अध्यादेशों से सरकार चलाने के आरोप बालेन सरकार के पास निचले सदन में दो-तिहाई बहुमत है, लेकिन ऊपरी सदन नेशनल असेंबली में उसका एक भी सदस्य नहीं है। नेपाल में कानून पास कराने और संशोधन के लिए ऊपरी सदन की अहम भूमिका होती है। ऐसे में बालेन सरकार आठ अध्यादेश लाई। इनमें सिविल सर्विस ट्रेड यूनियन और यूनिवर्सिटी छात्र संगठनों को खत्म करने के प्रस्ताव शामिल थे। नेपाल सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी और छात्र संगठनों के विरोध के बीच इन अध्यादेशों पर रोक लगा दी। सोशल मीडिया पोस्ट में बालेन ने सफाई देते हुए कहा कि स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में पार्टी झंडे बंद करने से छात्रों और कर्मचारियों के अधिकार खत्म नहीं होंगे, बल्कि पेशेवर स्वतंत्रता मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि शिक्षा और नौकरशाही में छात्र और कर्मचारी संगठन राजनीतिक दलों की ‘स्लीपर सेल’ बन चुके हैं। उनके मुताबिक ट्रांसफर और प्रमोशन पार्टी के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता और काम के आधार पर होने चाहिए। बुलडोजर कार्रवाई पर सड़क से अदालत तक विरोध बालेन सरकार की सबसे ज्यादा आलोचना अतिक्रमण हटाओ अभियान को लेकर हो रही है। नेपाल के अलग-अलग हिस्सों में बेघर और भूमिहीन लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। अधिकारियों के मुताबिक सिर्फ काठमांडू घाटी में करीब 4 हजार ढांचे तोड़े गए हैं। इससे कम से कम 15 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। बालेन जब काठमांडू के मेयर थे, तब भी उन्होंने बुलडोजर कार्रवाई को अपनी राजनीति का बड़ा हिस्सा बनाया था। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसी मॉडल को देशभर में लागू किया। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों समेत कई मानवाधिकार संगठनों ने भी इन कार्रवाइयों की आलोचना की है। उनका कहना है कि सरकार ने गरीब लोगों को बिना उचित पहचान, बातचीत और पुनर्वास योजना के हटाया। 2 महीने में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की चुनाव प्रचार के दौरान बालेन ने पारदर्शिता और जवाबदेही का वादा किया था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी चुप्पी सवालों के घेरे में है। शपथ लेने के बाद से उन्होंने न तो देश को संबोधित किया और न ही कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की। वह राष्ट्रपति के नीति और कार्यक्रम वाले भाषण के दौरान बीच में ही निकल गए थे। बाद में बिना सूचना संसद से भी अनुपस्थित रहे। विपक्ष ने संसद में लगातार हंगामा किया और प्रधानमंत्री से सदन में आकर जवाब देने की मांग की। भारत से सामान लाने पर सख्ती से सीमा इलाकों में नाराजगी नेपाल सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर कस्टम ड्यूटी के नियम सख्ती से लागू किए हैं। इसके बाद भारत-नेपाल सीमा पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। नियम के मुताबिक भारत से 100 नेपाली रुपए (लगभग 63 भारतीय रुपए) से ज्यादा का सामान लाने पर अनिवार्य कस्टम ड्यूटी देनी होगी। सामान की श्रेणी के हिसाब से टैक्स 5% से 80% तक है। दशकों से नेपाल के लोग भारतीय सीमा वाले शहरों से राशन, दवाइयां, कपड़े, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स और शादी का सामान खरीदते रहे हैं। नेपाली नववर्ष के बाद नियमों को सख्ती से लागू किया जाने लगा। इससे सीमा पर रहने वाले लोगों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। लोगों के बीच नाराजगी बढ़ रही है। ——————- ये खबर भी पढ़ें… नेपाल बोला- भारतीय यात्री लिपुलेख से मानसरोवर न जाएं:ये हमारा इलाका; भारत बोला- नेपाल के दावे का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं नेपाल सरकार ने भारतीय तीर्थयात्रियों से लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर
सिद्धारमैया, डीके शिवकुमार ने दिल्ली में राहुल, सोनिया से बातचीत की; एजेंडे पर कैबिनेट ओवरहाल | भारत समाचार

आखरी अपडेट:29 मई, 2026, 10:01 IST सिद्धारमैया ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी से मुलाकात की क्योंकि कांग्रेस कर्नाटक में डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाली नई सरकार बनाने की योजना बना रही है। कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार ने दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात की. (स्रोत: पीटीआई) कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने शीर्ष पद से इस्तीफा देने के एक दिन बाद शुक्रवार को लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी से नई दिल्ली में 10 जनपथ पर मुलाकात की। बैठक में कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और कर्नाटक कांग्रेस प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने भाग लिया, जिसमें राज्य में अगली सरकार के गठन पर चर्चा हुई। नेताओं के आज दिन में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से भी मिलने की उम्मीद है। सूत्रों ने कहा कि विचार-विमर्श में राज्यसभा के लिए उम्मीदवारों को अंतिम रूप देना, विधान परिषद में नियुक्तियां और नई सरकार के शपथ ग्रहण समारोह से पहले संभावित कैबिनेट फेरबदल शामिल है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, डीके शिवकुमार के नेतृत्व में प्रस्तावित कैबिनेट में निवर्तमान सिद्धारमैया सरकार के कई मंत्रियों को बरकरार नहीं रखा जा सकता है। कांग्रेस नेतृत्व नई सरकार में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए चार उपमुख्यमंत्रियों की नियुक्ति पर भी विचार कर रहा है। राज्यपाल ने सिद्धारमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया इस बीच, कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने शुक्रवार को सिद्धारमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया, इसके एक दिन बाद। यह भी पढ़ें: सिद्धारमैया का इस्तीफा स्वीकार, कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने रहेंगे, कांग्रेस में बदलाव की प्रक्रिया पूरी बेंगलुरु में लोक भवन से जारी एक आधिकारिक संचार में कहा गया है कि राज्यपाल ने सिद्धारमैया की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। हालांकि, वैकल्पिक व्यवस्था होने तक सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने रहेंगे. आधिकारिक आदेश में कहा गया, “भारत के संविधान के अनुच्छेद 164(1) के तहत मुझे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, मैं, कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है और उनकी अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। वैकल्पिक व्यवस्था होने तक सिद्धारमैया मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करते रहेंगे।” कांग्रेस आलाकमान के आदेश पर सिद्धारमैया ने दिया इस्तीफा कांग्रेस आलाकमान के निर्देश के बाद सिद्धारमैया ने पद से इस्तीफा दे दिया. पद छोड़ने के बाद एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए, निवर्तमान मुख्यमंत्री ने उन्हें राज्य का नेतृत्व करने का अवसर देने के लिए कांग्रेस नेतृत्व और कर्नाटक के लोगों को धन्यवाद दिया। यह भी पढ़ें: ‘हाईकमान ने पूछा, मैंने इस्तीफा दे दिया’: सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया उन्होंने कहा, “मैं एक राजनेता हूं और मैंने समझा है कि संविधान हमारा धर्म है। मतदाता प्रशंसक हैं, भगवान हैं। मुझे कन्नड़ नाडु के 7 करोड़ लोगों से बात करने का अवसर मिला। मुझे दो बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला। मैं सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के प्रति बहुत आभार व्यक्त करना चाहता हूं, जिन्होंने यह अवसर प्रदान किया।” अनुभवी कांग्रेस नेता ने यह भी रेखांकित किया कि पार्टी को स्वतंत्र विधायकों के समर्थन से विधानसभा में आरामदायक बहुमत प्राप्त है। उन्होंने कहा, “हमारी पार्टी ने 135+1 सीटें जीती हैं। इसके अलावा, दो निर्दलीय विधायकों ने भी हमारी सरकार को समर्थन दिया है। हम पूर्ण बहुमत में हैं।” इस्तीफ़े के बाद मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास ‘कावेरी’ में एक महत्वपूर्ण नाश्ते की बैठक हुई, जहाँ डीके शिवकुमार को सिद्धारमैया के पैर छूते और उन्हें सम्मानपूर्वक गले लगाते देखा गया, यह इशारा कई लोगों ने कर्नाटक में एक प्रतीकात्मक नेतृत्व परिवर्तन के रूप में देखा। यह भी पढ़ें: सिद्धारमैया, डीके शिवकुमार फिर दिल्ली पहुंचे: कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन में आगे क्या है? जब से कांग्रेस ने कर्नाटक में सरकार बनाई है, राजनीतिक गलियारों में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच संभावित मुख्यमंत्री पद की व्यवस्था को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने कभी भी सार्वजनिक रूप से किसी भी सत्ता-साझाकरण समझौते की पुष्टि नहीं की है, लेकिन “2.5-वर्षीय सीएम फॉर्मूले” की अफवाहें बार-बार सामने आई हैं, खासकर दिल्ली में कर्नाटक के नेताओं और कांग्रेस आलाकमान के बीच प्रमुख बैठकों के दौरान। एएनआई से इनपुट के साथ चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया सिद्धारमैया, डीके शिवकुमार ने दिल्ली में राहुल, सोनिया से बातचीत की; एजेंडे में कैबिनेट ओवरहाल अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)सिद्धारमैया का इस्तीफा(टी)कर्नाटक की राजनीति(टी)डीके शिवकुमार कैबिनेट(टी)कांग्रेस आलाकमान(टी)कर्नाटक के मुख्यमंत्री(टी)राहुल गांधी से मुलाकात(टी)सोनिया गांधी की भूमिका(टी)मल्लिकार्जुन खड़गे
ऑब्सेस के लिए पीटर ने खुद पर बड़ा दांव लगाया:एक्ट्रेस ईशा सिंह बोलीं- टैलेंट से पहले छोटे शहरों के कलाकारों की पहचान परखी जाती

टीवी एक्ट्रेस ईशा सिंह और अभिनेता-निर्देशक पीटर विल्सन की फिल्म ‘ऑब्सेस’ आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में दोनों ने अपने संघर्ष, छोटे शहरों से मुंबई तक के सफर और बिना किसी गॉडफादर के इंडस्ट्री में जगह बनाने की चुनौतियों पर खुलकर बात की। पीटर ने बताया कि फिल्म को बनाने के लिए उन्होंने अभिनय, निर्देशन और प्रोडक्शन की जिम्मेदारी एक साथ संभाली, जबकि ईशा ने कहा कि उन्होंने इस फिल्म के लिए कई जोखिम भरे स्टंट खुद किए। पढ़िए पूरी बातचीत… सवाल: भोपाल और छोटे शहरों से मुंबई तक का सफर तय करके आज फिल्म ‘ऑब्सेस’ तक पहुंचने पर कैसा महसूस हो रहा है? जवाब/ईशा सिंह: अभी तक हम फिल्म की तैयारियों में इतने व्यस्त थे कि सफर के बारे में सोचने का समय ही नहीं मिला। लेकिन जब पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि हम बहुत दूर आ गए हैं। एक छोटे शहर से निकलकर यहां तक पहुंचना आसान नहीं था। मैं ईश्वर की बहुत आभारी हूं। सवाल: पीटर, आपने इस फिल्म को डायरेक्ट भी किया है, प्रोड्यूस भी किया है और इसमें अभिनय भी किया है। यह कितना चुनौतीपूर्ण था? जवाब/पीटर विल्सन: बहुत मुश्किल था। हमने पहले इस किरदार के लिए कई बड़े कलाकारों से बात की, लेकिन हमारे पास कोई बड़ा बैनर या इंडस्ट्री प्रोफाइल नहीं था। तब टीम ने कहा कि यह किरदार मुझे खुद निभाना चाहिए। मुझे इसके लिए 130-140 किलो तक वजन बढ़ाना पड़ा। एक डायरेक्टर के तौर पर मुझे तकनीकी और रचनात्मक दोनों पहलुओं पर ध्यान देना था। यह पूरी तरह जुनून और जिद का नतीजा है। सवाल: ईशा, जब आपको फिल्म का ऑफर मिला तो परिवार का क्या रिएक्शन था? जवाब/ईशा सिंह: यह मेरी दूसरी फिल्म है। इससे पहले मैंने ‘मिडिल क्लास लव’ की थी, जो एक रोमांटिक फिल्म थी। ‘ऑब्सेस’ पूरी तरह अलग है। जब मुझे कहानी सुनाई गई तो लगा कि यह कुछ नया और चुनौतीपूर्ण है। इसमें ग्लैमर कम और अभिनय की गुंजाइश ज्यादा थी। इसलिए मैंने तुरंत हां कह दी। सवाल: पीटर, आपने ईशा को इस किरदार के लिए क्यों चुना? जवाब/पीटर विल्सन: मुझे ऐसे कलाकार की तलाश थी जो किरदार के लिए पूरी तरह समर्पित हो। ईशा का थिएटर बैकग्राउंड और उनके काम के प्रति समर्पण मुझे पसंद आया। उन्होंने कहानी सुनते ही किरदार को समझ लिया था। मुझे भरोसा था कि वह इसे पूरी ईमानदारी से निभाएंगी। सवाल: छोटे शहरों से आने वाले कलाकारों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है? जवाब/ईशा सिंह: लोग अक्सर कहते हैं कि एक्टिंग कोई करियर नहीं है। खासकर लड़कियों को बहुत बातें सुननी पड़ती हैं। मुझे भी कहा गया कि यह बेवकूफी है। लेकिन मेरे माता-पिता ने मेरा पूरा साथ दिया। अगर परिवार का भरोसा हो तो मुश्किल रास्ते भी आसान लगने लगते हैं। पीटर विल्सन: मैं पंजाब के एक छोटे से गांव से आता हूं। इंडस्ट्री में मेरा कोई गॉडफादर नहीं था। कई बार लोगों ने मजाक उड़ाया और कहा कि फिल्म बनाकर दिखाओ, रिलीज करके दिखाओ। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मेरी टीम और साथियों ने मेरा पूरा साथ दिया। सवाल: क्या कभी रिजेक्शन या रिप्लेसमेंट का सामना करना पड़ा? जवाब/पीटर विल्सन: हां, कई बार ऐसा हुआ कि किसी प्रोजेक्ट में कास्ट होने के बाद भी मुझे रिप्लेस कर दिया गया। लेकिन इन अनुभवों ने मुझे और मजबूत बनाया। आज वही संघर्ष मेरी ताकत बन गया है। सवाल: आप दोनों के लिए ‘ऑब्सेशन’ का मतलब क्या है? जवाब/ईशा सिंह: मैं अपने काम को लेकर ऑब्सेस्ड हूं। मेरा मानना है कि मेहनत करते रहो और बाकी ऊपर वाले पर छोड़ दो। समय हर सवाल का जवाब देता है। पीटर विल्सन: मैं फिल्मों को लेकर ऑब्सेस्ड हूं। हमेशा सपना था कि अपनी फिल्म बनाऊं और अपनी कंपनी शुरू करूं। उसी जुनून ने मुझे यहां तक पहुंचाया है। सवाल: क्या कभी किसी फैन की दीवानगी डरावनी लगी? जवाब/ईशा सिंह: हां, एक फैन मेरी हर गतिविधि पर नजर रखता था। उसे पता होता था कि मैं कहां हूं और क्या कर रही हूं। बाद में उसने धमकियां देना शुरू कर दीं। हमें उसकी शिकायत करनी पड़ी। वह अनुभव काफी डरावना था। सवाल: फिल्म की शूटिंग के दौरान कोई यादगार या जोखिम भरा अनुभव? जवाब/ईशा सिंह: फिल्म में मैंने खुद ड्राइविंग और कई स्टंट किए हैं। एक बार शूटिंग के दौरान कार का बैलेंस बिगड़ गया था और बड़ा हादसा होते-होते बचा। उस समय मैं बहुत डर गई थी। पीटर विल्सन: हमने ज्यादातर स्टंट्स रियल लोकेशन्स पर शूट किए हैं। कई बार टीम और उपकरणों की सुरक्षा को लेकर भी खतरे पैदा हुए, लेकिन सौभाग्य से सब सुरक्षित रहा। सवाल: इंडस्ट्री से किस तरह का सपोर्ट मिला? जवाब/ईशा सिंह: मैं खुद को खुशकिस्मत मानती हूं कि मेरे आसपास बहुत अच्छे लोग हैं। मेरे दोस्तों और सहकर्मियों ने ट्रेलर देखकर काफी सराहना की। यह सपोर्ट मेरे लिए बहुत मायने रखता है। सवाल: फैंस के लिए क्या कहना चाहेंगी? जवाब/ईशा सिंह: मेरे फैंस ने हमेशा मेरा साथ दिया है। वे मेरे लिए पोस्टर बनाते हैं, ट्रेंड चलाते हैं और हर मुश्किल समय में मेरे साथ खड़े रहते हैं। मैं दिल से उनका धन्यवाद करती हूं और उम्मीद करती हूं कि उन्हें ‘ऑब्सेस’ पसंद आएगी। सवाल: दर्शकों से क्या कहना चाहेंगे? जवाब/पीटर विल्सन: ‘ऑब्सेस’ एक इंडिपेंडेंट फिल्म है, जिसे हमने पूरी मेहनत और ईमानदारी से बनाया है। यह एक अलग तरह का, रियलिस्टिक और एक्सपेरिमेंटल सिनेमा है। मैं चाहूंगा कि दर्शक इसे देखें और अपना प्यार दें।
कर्नाटक मुख्यमंत्री समाचार लाइव अपडेट: सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया; डीके शिवकुमार उनकी जगह ले सकते हैं

कर्नाटक मुख्यमंत्री समाचार लाइव अपडेट: कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने गुरुवार को राज्य में संभावित नेतृत्व परिवर्तन के बीच कांग्रेस आलाकमान के साथ चर्चा के बाद लोक भवन में राज्यपाल के विशेष सचिव को अपना इस्तीफा सौंप दिया। कांग्रेस के दिग्गज नेता ने कहा कि वह कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय बने रहेंगे और उन्होंने राज्यसभा जाने के पार्टी नेतृत्व के सुझाव को अस्वीकार कर दिया। उम्मीद है कि कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) अगले मुख्यमंत्री का फैसला करेंगे। इस बीच, राष्ट्रीय राजधानी में भारी बारिश और अशांति के कारण अपने बेटे यतींद्र सिद्धारमैया और कांग्रेस महासचिव रणदीप सिंह सुरजेवाला को लेकर जा रहे उनके विशेष विमान को जयपुर की ओर मोड़ दिए जाने के बाद सिद्धारमैया शुक्रवार को दिल्ली पहुंचे। राजनीतिक घटनाक्रम के बीच, कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, जो सिद्धारमैया के उत्तराधिकारी होने की संभावना है, गुरुवार को नई दिल्ली के चाणक्यपुरी में कर्नाटक भवन पहुंचे, जिससे राज्य की अगली नेतृत्व व्यवस्था पर अटकलें तेज हो गईं। यहां लाइव अपडेट्स फॉलो करें (टैग्सटूट्रांसलेट)कर्नाटक सीएम समाचार लाइव अपडेट(टी)कर्नाटक सीएम परिवर्तन समाचार(टी)सिद्धारमैया इस्तीफा(टी)सिद्धारमैया नवीनतम समाचार(टी)कर्नाटक के मुख्यमंत्री समाचार(टी)कर्नाटक के अगले सीएम(टी)डीके शिवकुमार समाचार(टी)डीके शिवकुमार अगले सीएम(टी)कांग्रेस कर्नाटक नेतृत्व परिवर्तन(टी)कर्नाटक राजनीतिक संकट(टी)कर्नाटक कांग्रेस समाचार (टी) सिद्धारमैया बनाम डीके शिवकुमार (टी) कर्नाटक सरकार समाचार (टी) कर्नाटक राज्यपाल समाचार (टी) कांग्रेस आलाकमान कर्नाटक (टी) कर्नाटक सीएम लाइव अपडेट
सिद्धारमैया ने 8 साल बाद कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया | डीके शिवकुमार बड़े पावर शिफ्ट के लिए तैयार | न्यूज18

एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव में, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने आठ साल बाद इस्तीफा दे दिया, जिससे डीके शिवकुमार के नेतृत्व का मार्ग प्रशस्त हो गया। भावनात्मक विदाई और विरोध के बीच, कांग्रेस पार्टी आंतरिक गतिशीलता और कैबिनेट वार्ता में उलझी हुई है, जो एक जटिल सत्ता परिवर्तन का संकेत देती है। -newsNews18 मोबाइल ऐप – https://onelink.to/desc-youtube आखरी अपडेट: 28 मई, 2026, 20:42 IST (टैग्सटूट्रांसलेट)बेंगलुरु समाचार(टी)ब्रेकिंग न्यूज(टी)कैबिनेट फेरबदल(टी)कांग्रेस आलाकमान(टी)कांग्रेस नेतृत्व(टी)कांग्रेस पार्टी(टी)डीके शिवकुमार(टी)भारत समाचार(टी)भारतीय राजनीति(टी)कर्नाटक सीएम(टी)कर्नाटक कांग्रेस(टी)कर्नाटक सरकार(टी)कर्नाटक समाचार(टी)कर्नाटक राजनीति(टी)राजनीतिक संकट(टी)सिद्धारमैया








