Thursday, 01 Oct 2026 | 10:01 PM

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ओमान 15वां देश जिसपर ट्रम्प ने हमले की धमकी दी:अब तक 7 देशों पर अटैक किया, 4 पर कब्जा करने की चेतावनी दी

ओमान 15वां देश जिसपर ट्रम्प ने हमले की धमकी दी:अब तक 7 देशों पर अटैक किया, 4 पर कब्जा करने की चेतावनी दी

ट्रम्प ने बुधवार को ओमान पर हमला करने की धमकी दी। उन्होंने कहा कि अगर वह ईरान के साथ मिलकर होर्मुज स्ट्रेट को कंट्रोल करने की कोशिश करता है तो अमेरिका उसे उड़ा देगा। ओमान 15वां ऐसा देश है जिस पर ट्रम्प ने हमले की धमकी दी है। इतना ही नहीं, ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका ने 7 देशों पर हमले भी किए हैं। इसमें वेनेजुएला भी शामिल है जहां घुसकर अमेरिका ने राष्ट्रपति का किडनैप कर लिया था। इसके अलावा ट्रम्प 4 देशों पर कब्जा करने की चेतावनी भी दे चुके हैं। इसमें कनाडा, ग्रीनलैंड, वेनेजुएला और क्यूबा शामिल हैं। इसके अलावा ट्रम्प पनामा नहर पर भी कब्जा करने की धमकी दे चुके हैं। राष्ट्रपति बनने से पहले शांति की बात करते थे ट्रम्प साल 2024 में जब ट्रम्प राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे थे। तब वे खुद को अमन पसंद नेता के तौर पर पेश कर रहे थे। चुनावी रैलियों में वे अपने विरोधियों को युद्ध भड़काने वाला नेता कहते थे। उनका कहना था कि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद दुनिया में शांति आ जाएगी। उन्होंने कई बार कहा कि अगर वह राष्ट्रपति होते तो रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू ही नहीं होता। ट्रम्प खुद को ऐसा नेता बताते थे जो दुश्मन देशों से बातचीत कर सकता है और बिना बड़े युद्ध के समझौते करा सकता है। ट्रम्प कहते थे कि अगर उनके विरोधी सत्ता में आए तो अमेरिका फिर से इराक और अफगानिस्तान जैसे लंबे युद्धों में फंस जाएगा। लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद स्थिति बदल गई। 7 देश जिन पर अमेरिका ने हमला किया ट्रम्प, निक्सन की मैडमैन थ्योरी के फॉलोअर ट्रम्प कई बार ऐसे बयान देते हैं जिनसे दोस्त और दुश्मन दोनों असमंजस में रहते हैं कि अमेरिका अगला कदम क्या उठाएगा। विश्लेषकों का कहना है कि अपने विरोधियों के अलावा सहयोगी देशों को धमकाना अब ट्रम्प की शैली का हिस्सा बन चुका है। राजनीतिक विज्ञान में इसे मैडमैन थ्योरी कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि कोई नेता अपने विरोधियों को यह महसूस कराता है कि वह कुछ भी कर सकता है, ताकि सामने वाला डरकर समझौता कर ले। इस थ्योरी को सबसे पहले अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 1960 और 1970 के दशक में वियतनाम युद्ध के दौरान अपनाया था। निक्सन चाहते थे कि सोवियत संघ और उत्तरी वियतनाम को लगे कि वह इतने पागल हैं कि परमाणु हमला तक कर सकते हैं। उनका मानना था कि डर पैदा करके दुश्मन को बातचीत की मेज पर लाया जा सकता है। विरोधियों पर बेअसर रही ट्रम्प की मैडमैन थ्योरी बीबीसी के मुताबिक ट्रम्प की यह रणनीति सहयोगी देशों पर तो असर डालती दिख रही है लेकिन विरोधियों पर यह बेअसर है। ट्रम्प की धमकी के बाद नाटो देश अपना रक्षा बजट बढ़ा रहे हैं। यूक्रेन, अमेरिका को अपने खनिज संसाधन देने को तैयार हो गया। लेकिन रूस के राष्ट्रपति पुतिन पर इसका ज्यादा असर नहीं दिखा। ईरान का मामला और भी मुश्किल है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका उल्टा असर हो सकता है। पूर्व ब्रिटिश विदेश मंत्री विलियम हेग का कहना है कि इससे ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश और तेज कर सकता है। विशेषज्ञ माइकल डेश भी मानते हैं कि अब ईरान शायद चुपचाप परमाणु कार्यक्रम आगे बढ़ाएगा और अंत में परमाणु परीक्षण भी कर सकता है। ईरान यह देख रहा है कि जिन नेताओं के पास परमाणु हथियार नहीं थे, जैसे सद्दाम हुसैन और मुअम्मर गद्दाफी, उनकी सत्ता खत्म हो गई। जबकि उत्तर कोरिया के किम जोंग उन जैसे नेता परमाणु हथियार होने की वजह से सुरक्षित बने हुए हैं। इसलिए ईरान परमाणु हथियार को अपनी अंतिम सुरक्षा के रूप में देख सकता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और इजराइल सोच रहे थे कि अगर ईरान के शीर्ष नेताओं पर दबाव बनाया जाए तो वहां की व्यवस्था कमजोर हो जाएगी। लेकिन इतिहास इससे उल्टा संकेत देता है। 1980 में जब सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया था, तब भी मकसद इस्लामिक गणराज्य को कमजोर करना था। लेकिन हुआ उल्टा। ईरानी व्यवस्था और मजबूत हो गई।

ओमान 15वां देश जिसपर ट्रम्प ने हमले की धमकी दी:अब तक 7 देशों पर अटैक किया, 4 देशों को अमेरिका में मिलाने की चेतावनी दी

ओमान 15वां देश जिसपर ट्रम्प ने हमले की धमकी दी:अब तक 7 देशों पर अटैक किया, 4 देशों को अमेरिका में मिलाने की चेतावनी दी

ट्रम्प ने बुधवार को ओमान पर हमला करने की धमकी दी। उन्होंने कहा कि अगर वह ईरान के साथ मिलकर होर्मुज स्ट्रेट को कंट्रोल करने की कोशिश करता है तो अमेरिका उसे उड़ा देगा। ओमान 15वां ऐसा देश है जिस पर ट्रम्प ने हमले की धमकी दी है। इतना ही नहीं, ट्रम्प के कार्यकाल में अमेरिका ने 7 देशों पर हमले भी किए हैं। इसमें वेनेजुएला भी शामिल है जहां घुसकर अमेरिका ने राष्ट्रपति का किडनैप कर लिया था। इसके अलावा ट्रम्प 4 देशों पर कब्जा करने की चेतावनी भी दे चुके हैं। इसमें कनाडा, ग्रीनलैंड, वेनेजुएला और क्यूबा शामिल हैं। इसके अलावा ट्रम्प पनामा नहर पर भी कब्जा करने की धमकी दे चुके हैं। राष्ट्रपति बनने से पहले शांति की बात करते थे ट्रम्प साल 2024 में जब ट्रम्प राष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे थे। तब वे खुद को अमन पसंद नेता के तौर पर पेश कर रहे थे। चुनावी रैलियों में वे अपने विरोधियों को युद्ध भड़काने वाला नेता कहते थे। उनका कहना था कि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद दुनिया में शांति आ जाएगी। उन्होंने कई बार कहा कि अगर वह राष्ट्रपति होते तो रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू ही नहीं होता। ट्रम्प खुद को ऐसा नेता बताते थे जो दुश्मन देशों से बातचीत कर सकता है और बिना बड़े युद्ध के समझौते करा सकता है। ट्रम्प कहते थे कि अगर उनके विरोधी सत्ता में आए तो अमेरिका फिर से इराक और अफगानिस्तान जैसे लंबे युद्धों में फंस जाएगा। लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद स्थिति बदल गई। 7 देश जिन पर अमेरिका ने हमला किया ट्रम्प, निक्सन की मैडमैन थ्योरी के फॉलोअर ट्रम्प कई बार ऐसे बयान देते हैं जिनसे दोस्त और दुश्मन दोनों असमंजस में रहते हैं कि अमेरिका अगला कदम क्या उठाएगा। विश्लेषकों का कहना है कि अपने विरोधियों के अलावा सहयोगी देशों को धमकाना अब ट्रम्प की शैली का हिस्सा बन चुका है। राजनीतिक विज्ञान में इसे मैडमैन थ्योरी कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि कोई नेता अपने विरोधियों को यह महसूस कराता है कि वह कुछ भी कर सकता है, ताकि सामने वाला डरकर समझौता कर ले। इस थ्योरी को सबसे पहले अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 1960 और 1970 के दशक में वियतनाम युद्ध के दौरान अपनाया था। निक्सन चाहते थे कि सोवियत संघ और उत्तरी वियतनाम को लगे कि वह इतने पागल हैं कि परमाणु हमला तक कर सकते हैं। उनका मानना था कि डर पैदा करके दुश्मन को बातचीत की मेज पर लाया जा सकता है। विरोधियों पर बेअसर रही ट्रम्प की मैडमैन थ्योरी बीबीसी के मुताबिक ट्रम्प की यह रणनीति सहयोगी देशों पर तो असर डालती दिख रही है लेकिन विरोधियों पर यह बेअसर है। ट्रम्प की धमकी के बाद नाटो देश अपना रक्षा बजट बढ़ा रहे हैं। यूक्रेन, अमेरिका को अपने खनिज संसाधन देने को तैयार हो गया। लेकिन रूस के राष्ट्रपति पुतिन पर इसका ज्यादा असर नहीं दिखा। ईरान का मामला और भी मुश्किल है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका उल्टा असर हो सकता है। पूर्व ब्रिटिश विदेश मंत्री विलियम हेग का कहना है कि इससे ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश और तेज कर सकता है। विशेषज्ञ माइकल डेश भी मानते हैं कि अब ईरान शायद चुपचाप परमाणु कार्यक्रम आगे बढ़ाएगा और अंत में परमाणु परीक्षण भी कर सकता है। ईरान यह देख रहा है कि जिन नेताओं के पास परमाणु हथियार नहीं थे, जैसे सद्दाम हुसैन और मुअम्मर गद्दाफी, उनकी सत्ता खत्म हो गई। जबकि उत्तर कोरिया के किम जोंग उन जैसे नेता परमाणु हथियार होने की वजह से सुरक्षित बने हुए हैं। इसलिए ईरान परमाणु हथियार को अपनी अंतिम सुरक्षा के रूप में देख सकता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और इजराइल सोच रहे थे कि अगर ईरान के शीर्ष नेताओं पर दबाव बनाया जाए तो वहां की व्यवस्था कमजोर हो जाएगी। लेकिन इतिहास इससे उल्टा संकेत देता है। 1980 में जब सद्दाम हुसैन ने ईरान पर हमला किया था, तब भी मकसद इस्लामिक गणराज्य को कमजोर करना था। लेकिन हुआ उल्टा। ईरानी व्यवस्था और मजबूत हो गई।

पूर्व टीएमसी मंत्री पार्थ चटर्जी ने चुनावी झटके के बाद पार्टी नेतृत्व की आलोचना की | न्यूज18

पूर्व टीएमसी मंत्री पार्थ चटर्जी ने चुनावी झटके के बाद पार्टी नेतृत्व की आलोचना की | न्यूज18

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एक्ट्रेस शहाना गोस्वामी ने कहा- वह ओपन रिलेशनशिप में हैं:बोलीं- मेरी जिंदगी में कई पार्टनर हैं, लेकिन ये रिश्ते कैजुअल नहीं हैं

एक्ट्रेस शहाना गोस्वामी ने कहा- वह ओपन रिलेशनशिप में हैं:बोलीं- मेरी जिंदगी में कई पार्टनर हैं, लेकिन ये रिश्ते कैजुअल नहीं हैं

बॉलीवुड एक्ट्रेस शहाना गोस्वामी ने हाल ही में बताया कि वह बिना किसी ‘प्राइमरी पार्टनर’ के ओपन रिलेशनशिप में हैं। सिद्धार्थ कन्नन को दिए इंटरव्यू में शहाना ने कहा, ‘फिलहाल मेरी जिंदगी में ऐसा कोई एक खास पार्टनर नहीं है। मेरी जिंदगी में कई लोग हैं, जिनसे मेरा लंबे समय से जुड़ाव है, लेकिन ये रिश्ते कैजुअल नहीं हैं। मेरे लिए कोई भी रिश्ता हल्का या टाइमपास नहीं होता।’ उन्होंने आगे कहा, ‘मेरे लिए ओपननेस का मतलब यह है कि किसी एक इंसान के साथ तय रिश्ता जरूरी नहीं है। लेकिन लोगों के साथ जुड़ाव और अपनापन बना रहता है। कभी वह सिर्फ दोस्ती होती है, कभी रिश्ता थोड़ा और गहरा भी हो सकता है। हर चीज को किसी एक नाम या दिशा में बांधना जरूरी नहीं है। सबसे जरूरी चीज प्यार और दोस्ती है। मेरे लिए दोस्त वही है, जिसके लिए दिल में सच्चा अपनापन हो।’ शहाना ने ओपन रिलेशनशिप में घोस्टिंग से इनकार किया शहाना गोस्वामी से जब ओपन रिलेशनशिप में घोस्टिंग यानी अचानक रिश्ता खत्म कर देने को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा, ‘असल में ऐसा नहीं होता। मैं लोगों को इग्नोर नहीं करती। इस तरह की जिंदगी अचानक नहीं मिलती। यहां तक पहुंचने के लिए इंसान को खुद पर बहुत काम करना पड़ता है। बाहर से यह आसान लगता है, लेकिन अपने अंदर की जलन और असुरक्षाओं का सामना करना पड़ता है।’ शहाना ने कहा कि उनके करीब आने वाले कई लोग उनकी सोच और आजादी को समझ नहीं पाते। कुछ लोग बिना किसी लड़ाई या विवाद के उनसे दूरी बना लेते हैं, क्योंकि वे खुद को असहज महसूस करने लगते हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं उन लोगों से अलग हूं, जिनसे वे पहले मिले हैं। मेरी वजह से कई लोगों की असुरक्षाएं बाहर आ जाती हैं। मैं जानबूझकर ऐसा नहीं करती, लेकिन मेरी आजादी लोगों को खुद के बारे में सोचने पर मजबूर करती है और हर कोई इसके लिए तैयार नहीं होता।’ कई पार्टनर्स एक-दूसरे से मिल चुके हैं: शहाना शहाना ने कहा कि कम उम्र में ही उन्हें ओपन रिलेशनशिप के बारे में समझ आ गई थी। एक्ट्रेस ने कहा, ‘मुझे हमेशा लगा कि प्यार आजाद होना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि रिश्ता किसी इंसान को बांध दे या उसकी जिंदगी सीमित कर दे। इसी सोच ने मेरे रिश्तों और उन्हें निभाने के तरीके को तय किया है।’ उन्होंने बताया कि उनके कई ओपन रिलेशनशिप पार्टनर्स एक-दूसरे से मिल चुके हैं। उनके मुताबिक, ऐसे रिश्ते तभी चल पाते हैं, जब उनमें ईमानदारी और खुलकर बातचीत हो। शहाना ने यह भी कहा कि लोग अक्सर यह सोच लेते हैं कि उनकी जिंदगी आसान है या उन्हें कभी मुश्किल भावनाओं का सामना नहीं करना पड़ा। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। उनके मुताबिक, आजादी का मतलब मुश्किलों से भागना नहीं होता। असली आजादी तब आती है, जब इंसान अपनी परेशानियों, डर और भावनाओं का सामना करता है और उनसे भागता नहीं। शहाना का कहना है कि बाहर से देखने वाले लोग अक्सर इसी बात को समझ नहीं पाते।

कोई राज्यसभा नहीं, कोई सेवानिवृत्ति नहीं: कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दिल्ली के बजाय बेंगलुरु को क्यों चुना | भारत समाचार

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आखरी अपडेट:28 मई, 2026, 17:12 IST बेंगलुरु में मजबूती से टिके रहकर, सिद्धारमैया ने यह सुनिश्चित किया कि वह कर्नाटक के राजनीतिक विमर्श के लिए अपरिहार्य बने रहें, और उनकी नजर भविष्य में क्षेत्रीय सत्ता में वापसी पर है। सिद्धारमैया अच्छी तरह से जानते हैं कि कर्नाटक में राजनीतिक परिदृश्य बेहद अस्थिर है, जहां सरकारी जनादेश तेजी से बदलते हैं और नेतृत्व समीकरण लगातार नए सिरे से लिखे जाते हैं। (फ़ाइल तस्वीर/पीटीआई) जब एक दिग्गज क्षेत्रीय नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी से हट जाता है, तो राज्यसभा के माध्यम से राष्ट्रीय राजनीति में संक्रमण को अक्सर मानक संस्थागत प्रक्षेपवक्र के रूप में देखा जाता है। फिर भी, कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के बाद, अनुभवी कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने जानबूझकर इस पारंपरिक राजनीतिक स्क्रिप्ट को तोड़ दिया। नई दिल्ली में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के उच्च-स्तरीय प्रस्तावों के बावजूद उन्हें संसद के ऊपरी सदन में एक सुरक्षित सीट की पेशकश की गई, अनुभवी अहिंदा रणनीतिकार ने गुरुवार को इस पद को दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया। उनका इनकार विद्रोह का कार्य नहीं है, बल्कि कर्नाटक की जीवंत जमीनी स्तर की राजनीति से उखाड़ फेंकने के उनके पूर्ण इनकार में निहित एक सुविचारित, दीर्घकालिक निर्णय है। सिद्धारमैया के लिए, नई दिल्ली का रुख संरचनात्मक रूप से अप्रभावी है। वह मानते हैं कि राज्यसभा में प्रवेश करने से वे प्रभावी रूप से राज्य के प्रत्यक्ष चुनावी रंगमंच से दूर हो जाएंगे, जिससे एक जननेता के रूप में उनकी मूल ताकत बेअसर हो जाएगी जो सीधे सार्वजनिक संपर्क पर पनपती है। संसदीय सीट स्वीकार करने से विपक्ष और उनकी अपनी पार्टी दोनों के भीतर उनके क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों को उनकी अनुपस्थिति में राज्य इकाई पर अपना प्रभाव मजबूत करने की अनुमति मिल जाती। बेंगलुरु में मजबूती से टिके रहकर, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि वह कर्नाटक के राजनीतिक विमर्श के लिए अपरिहार्य बने रहें, और क्षेत्रीय सत्ता में संभावित भविष्य की वापसी पर उनकी नजरें टिकी हुई हैं। नई दिल्ली प्रवास का प्रतिरोध कांग्रेस आलाकमान की ओर से राज्यसभा सीट की पेशकश काफी हद तक क्षेत्रीय गुटबाजी को कम करने और सिद्धारमैया के व्यापक प्रशासनिक अनुभव को राष्ट्रीय मंच पर इस्तेमाल करने का एक प्रयास था। हालाँकि, अनुभवी नेता ने ऐतिहासिक रूप से संघीय राजनीति के प्रति गहरी नापसंदगी बनाए रखी है, खुले तौर पर खुद को मिट्टी के राजनेता के रूप में पहचाना है। उन्होंने लगातार तर्क दिया कि जटिल सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं, विशेष रूप से पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और दलितों के बारे में उनकी समझ को राष्ट्रीय राजधानी में संसदीय बहस के बजाय कर्नाटक के भीतर प्रत्यक्ष विधायी कार्रवाई के माध्यम से सबसे प्रभावी ढंग से तैनात किया गया था। इसके अलावा, राज्यसभा में जाने से उनकी राजनीतिक शैली में नाटकीय बदलाव आएगा। सिद्धारमैया का अधिकार मूल रूप से ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा करने, विशाल सार्वजनिक रैलियों को संबोधित करने और राज्य विधानसभा की गतिशीलता को प्रभावित करने की उनकी क्षमता से उत्पन्न हुआ है। उच्च सदन में, अपने स्वभाव से, प्रत्यक्ष चुनावी जनादेश का अभाव है जो उनकी राजनीतिक वैधता को बढ़ावा देता है। सीट अस्वीकार करना उनके समर्थकों और विरोधियों दोनों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि उनका नई दिल्ली में एक वरिष्ठ राजनेता की भूमिका स्वीकार करने या सम्मानजनक राजनीतिक सेवानिवृत्ति में प्रवेश करने का कोई इरादा नहीं है। असेंबली रिटर्न के लिए रणनीतिक उत्तोलन को संरक्षित करना क्षेत्रीय नेता बने रहने के सैद्धांतिक रुख के पीछे एक अत्यधिक परिष्कृत सामरिक खाका छिपा है। सिद्धारमैया अच्छी तरह से जानते हैं कि कर्नाटक में राजनीतिक परिदृश्य बेहद अस्थिर है, जहां सरकारी जनादेश तेजी से बदलते हैं और नेतृत्व समीकरण लगातार नए सिरे से लिखे जाते हैं। यदि वह राष्ट्रीय राजधानी में चले गए होते, तो अपने वफादार विधायक आधार और अपने शक्तिशाली मतदाता गठबंधन पर मजबूत पकड़ बनाए रखना तार्किक और राजनीतिक रूप से असंभव हो जाता। संसदीय निकास मार्ग को अस्वीकार करके, उन्होंने राज्य कांग्रेस इकाई के भीतर अपने रणनीतिक प्रभाव को बरकरार रखा है। यह उन्हें राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका में आसानी से बदलाव करने की अनुमति देता है, जिससे वह कर्नाटक की दैनिक शासन संबंधी बहसों और मीडिया की सुर्खियों के केंद्र में रहते हैं। यह निरंतर राज्य-स्तरीय दृश्यता और सक्रिय जुड़ाव यह सुनिश्चित करता है कि जब राजनीतिक पेंडुलम संभवतः पीछे की ओर झुकता है, तो वह एक बार फिर राज्य का नेतृत्व करने के लिए सबसे व्यवहार्य, लोकप्रिय और आधिकारिक विकल्प बने रहते हैं, जिससे नई दिल्ली के आरामदायक गलियारों को अस्वीकार करने का उनका जुआ सही साबित होता है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया कोई राज्यसभा नहीं, कोई सेवानिवृत्ति नहीं: कर्नाटक के निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दिल्ली के बजाय बेंगलुरु को क्यों चुना? अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें

विनेश फोगाट का ट्रायल रुकवाने सुप्रीम कोर्ट पहुंचा WFI:हाईकोर्ट ने रेसलर को दी थी राहत; एशियन गेम्स के लिए 30-31 मई को होना है ट्रॉयल

विनेश फोगाट का ट्रायल रुकवाने सुप्रीम कोर्ट पहुंचा WFI:हाईकोर्ट ने रेसलर को दी थी राहत; एशियन गेम्स के लिए 30-31 मई को होना है ट्रॉयल

भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) ने पहलवान विनेश फोगाट को एशियन गेम्स 2026 चयन ट्रायल में हिस्सा लेने की अनुमति देने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। मामले पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। यह सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच करेगी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 मई को दिए आदेश में विनेश फोगाट को 30 और 31 मई को होने वाले चयन ट्रायल में भाग लेने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि ट्रायल की पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग कराई जाए और इसे पारदर्शी बनाने के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) द्वारा नियुक्त स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की निगरानी में कराया जाए। उधर, इस मामले में कुश्ती संघ हरियाणा के अध्यक्ष रमेश बोहर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कुश्ती फैडरेशन देश के पहलवानों के साथ ज्यादती न हो, इसलिए WFI कोर्ट गई है। जो पहलवान जिला, स्टेट और नेशनल तक मुकाबले में पहुंचा है, उसके सामने सीधे किसी को एंट्री नहीं दी जाएगी। कुश्ती फैडरेशन के अपने नियम हैं, खेल नियमों से चलता है। पहलवानों के हक के लिए WFI सुप्रीम कोर्ट में गई है। डबल बेंच से मिली थी राहत यह आदेश चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीजन बेंच ने सुनाया था। कोर्ट विनेश फोगाट की उस अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने सिंगल बेंच के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी। सिंगल जज बेंच ने उनकी याचिका पर अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। विनेश फोगाट ने अपनी याचिका में WFI की चयन नीति और उन्हें जारी किए गए शो-कॉज नोटिस को चुनौती दी है। अब सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इसका असर एशियन गेम्स 2026 के चयन प्रक्रिया पर पड़ सकता है। हम इस खबर को लगातार अपडेट कर रहे हैं…

IPL जितनी भाषाएं दुनिया की किसी लीग में नहीं- जियो-हॉटस्टार:अंपायर अनिल बोले- सूर्यवंशी बेस्ट प्लेयर; सरनदीप ने कहा- पंजाब क्रिकेटर्स का गढ़

IPL जितनी भाषाएं दुनिया की किसी लीग में नहीं- जियो-हॉटस्टार:अंपायर अनिल बोले- सूर्यवंशी बेस्ट प्लेयर; सरनदीप ने कहा- पंजाब क्रिकेटर्स का गढ़

क्रिकेट ब्रॉडकास्टर जियो हॉटस्टार ने दावा किया है कि दुनिया की किसी लीग में IPL जितनी इतनी भाषाएं नहीं हैं। दैनिक भास्कर मुंबई स्थित जियो-हॉटस्टार ऑफिस पहुंचा। यहां हेड कंटेंट सिद्धार्थ शर्मा, पूर्व अंपायर अनिल चौधरी, पूर्व क्रिकेटर और सिलेक्टर सरनदीप सिंह से बातचीत हुई। सिद्धार्थ ने बताया कि IPL अब 12 भाषाओं में देखा जा रहा है और भोजपुरी-हरियाणवी जैसी फीड्स तेजी से बढ़ रही हैं। वहीं पूर्व भारतीय अंपायर अनिल चौधरी ने युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी को मौजूदा दौर का सबसे बेहतरीन टी-20 बैटर बताया। दूसरी तरफ पूर्व क्रिकेटर और चयनकर्ता सरनदीप सिंह ने कहा कि पंजाब आज भी भारतीय क्रिकेट का सबसे बड़ा गढ़ है, जहां से लगातार बड़े खिलाड़ी निकल रहे हैं। नीचे सवाल-जवाब में पूरा इंटरव्यू पढ़ें… सवाल: IPL में 12 भाषाओं में कमेंट्री शुरू करने का आइडिया कैसे आया? सिद्धार्थ ने बताया कि लंबे समय तक भारत में क्रिकेट सिर्फ अंग्रेजी में दिखाया जाता था। 2013 में स्टार स्पोर्ट्स के पास बड़े क्रिकेट राइट्स आने के बाद हिंदी फीड की शुरुआत हुई।उन्होंने कहा- मकसद था कि ज्यादा से ज्यादा लोग अपनी भाषा में क्रिकेट देख सकें और उससे जुड़ाव महसूस करें। 2017 में तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फीड शुरू की गईं। इसके बाद डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ भोजपुरी, पंजाबी, हरियाणवी समेत कई नई भाषाएं जोड़ी गईं और अब IPL 12 भाषाओं में उपलब्ध है। सवाल: भोजपुरी कमेंट्री की शुरुआत में सबसे बड़ी चुनौती क्या थी? सिद्धार्थ के मुताबिक, सबसे बड़ी चुनौती सही कमेंटेटर ढूंढना थी। उन्होंने कहा कि हर भाषा में पूर्व क्रिकेटर उपलब्ध नहीं होते, इसलिए ऐसे लोगों को तलाशा गया जो क्रिकेट समझते हों और साथ ही अच्छे स्टोरीटेलर भी हों। उन्होंने बताया कि भोजपुरी कमेंट्री के लिए कई ऑडिशन लिए गए। 10-12 लोगों का पूल तैयार किया गया, फिर वर्कशॉप और ट्रेनिंग के बाद कुछ आवाजों को चुना गया। कमेंटेटर्स को यह भी सिखाया गया कि रोहित शर्मा की बैटिंग या विराट कोहली के कवर ड्राइव को किस अंदाज में पेश करना है। इसके लिए अलग ट्रेनिंग मॉड्यूल और फ्रेमवर्क बनाए गए। सवाल: भोजपुरी कमेंट्री इतनी वायरल क्यों हुई? सिद्धार्थ ने कहा कि भोजपुरी कमेंट्री की ताकत उसका देसी अंदाज और कहानी सुनाने की कला है। उन्होंने कहा कि भोजपुरी फीड में तकनीकी विश्लेषण से ज्यादा मनोरंजन, लोकल बोली, मुहावरे और भावनात्मक जुड़ाव पर फोकस किया गया। उनके मुताबिक, भोजपुरी कमेंटेटर क्रिकेट को ऐसे पेश करते हैं कि जो दर्शक खेल की बारीकियां नहीं भी समझते, वे भी उससे जुड़ जाते हैं। यही वजह है कि भोजपुरी कमेंट्री ने अपनी अलग पहचान बना ली। सवाल: IPL कमेंट्री में पूर्व खिलाड़ियों को इतनी अहमियत क्यों दी जाती है? सिद्धार्थ ने कहा कि कोशिश रहती है कि ऐसे लोगों को कमेंट्री में लाया जाए जो IPL इकोसिस्टम का हिस्सा रहे हों। सवाल: भारतीय ब्रॉडकास्ट की तुलना विदेशी लीग्स से कैसे होती है? सिद्धार्थ ने दावा किया कि IPL ब्रॉडकास्ट दुनिया की बड़ी स्पोर्ट्स लीग्स से आगे है। उन्होंने कहा कि कवरेज की चौड़ाई, भाषाओं की संख्या और दर्शकों तक पहुंच के मामले में IPL का मॉडल अनोखा है। सवाल: पंजाबी कमेंट्री का फ्लेवर बाकी भाषाओं से अलग कैसे है? पूर्व क्रिकेटर और कमेंटेटर सरनदीप सिंह ने कहा कि पंजाबी भाषा खुद में बहुत भावनात्मक और मजेदार है। उन्होंने बताया कि हिंदी और अंग्रेजी कमेंट्री में शब्द सीमित और औपचारिक होते हैं, जबकि पंजाबी में खुलकर बात होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पंजाबी में ऐसे लोकल शब्द और जुमले इस्तेमाल होते हैं जो गांवों और कस्बों की भाषा से आते हैं। सवाल: पंजाबी कमेंट्री में सबसे यादगार IPL पल कौन सा रहा? सरनदीप ने पंजाब किंग्स के बड़े रन चेज और आक्रामक खेल को सबसे यादगार बताया। उन्होंने कोलकाता में 262 रन चेज करने और मुंबई इंडियंस के खिलाफ अर्शदीप सिंह के प्रदर्शन का जिक्र किया। सवाल: पंजाब से इतने क्रिकेटर क्यों निकलते हैं? सरनदीप ने कहा कि पंजाब में खेलों की संस्कृति बहुत पुरानी है। उन्होंने युवराज सिंह, हरभजन सिंह, कपिल देव, नवजोत सिंह सिद्धू जैसे खिलाड़ियों का उदाहरण देते हुए कहा कि क्रिकेट वहां की संस्कृति का हिस्सा है। उन्होंने बताया कि पंजाब के अलग-अलग इलाकों- मालवा, दोआबा और माझा की अपनी अलग बोली और फ्लेवर है, जो खिलाड़ियों और कमेंट्री दोनों में दिखाई देता है। सवाल: आधुनिक क्रिकेट में फिटनेस कितनी जरूरी हो गई है? IPL में सबसे ज्यादा मैचों में अंपायरिंग करने वाले अनिल चौधरी ने कहा कि आज के क्रिकेट में फिटनेस सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। उनके मुताबिक, अगर खिलाड़ी या अंपायर फिट नहीं है तो वह खेल की स्पीड के साथ तालमेल नहीं बैठा सकता। सवाल: अभी के समय का बेस्ट टी-20 बैटर कौन है? अनिल ने बताया कि अभी जितने यंगस्टर्स वो शानदार खेल दिखा रहे हैं। आयुष म्हात्रे, यश राज पुंजा, देवदत्त पडीक्कल सभी बेहतरीन फॉर्म में रहे, लेकिन उनका पसंदीदा प्लेयर वैभव सूर्यवंशी है। वैभव की हिटिंग एबिलिटी को अनिल ने शानदार बताया।

IPL जितनी भाषाएं दुनिया की किसी लीग में नहीं- जियो-हॉटस्टार:अंपायर अनिल बोले- सूर्यवंशी बेस्ट प्लेयर; सरनदीप ने कहा- पंजाब क्रिकेटर्स का गढ़

IPL जितनी भाषाएं दुनिया की किसी लीग में नहीं- जियो-हॉटस्टार:अंपायर अनिल बोले- सूर्यवंशी बेस्ट प्लेयर; सरनदीप ने कहा- पंजाब क्रिकेटर्स का गढ़

क्रिकेट ब्रॉडकास्टर जियो हॉटस्टार ने दावा किया है कि दुनिया की किसी लीग में IPL जितनी इतनी भाषाएं नहीं हैं। दैनिक भास्कर मुंबई स्थित जियो-हॉटस्टार ऑफिस पहुंचा। यहां हेड कंटेंट सिद्धार्थ शर्मा, पूर्व अंपायर अनिल चौधरी, पूर्व क्रिकेटर और सिलेक्टर सरनदीप सिंह से बातचीत हुई। सिद्धार्थ ने बताया कि IPL अब 12 भाषाओं में देखा जा रहा है और भोजपुरी-हरियाणवी जैसी फीड्स तेजी से बढ़ रही हैं। वहीं पूर्व भारतीय अंपायर अनिल चौधरी ने युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी को मौजूदा दौर का सबसे बेहतरीन टी-20 बैटर बताया। दूसरी तरफ पूर्व क्रिकेटर और चयनकर्ता सरनदीप सिंह ने कहा कि पंजाब आज भी भारतीय क्रिकेट का सबसे बड़ा गढ़ है, जहां से लगातार बड़े खिलाड़ी निकल रहे हैं। नीचे सवाल-जवाब में पूरा इंटरव्यू पढ़ें… सवाल: IPL में 12 भाषाओं में कमेंट्री शुरू करने का आइडिया कैसे आया? सिद्धार्थ ने बताया कि लंबे समय तक भारत में क्रिकेट सिर्फ अंग्रेजी में दिखाया जाता था। 2013 में स्टार स्पोर्ट्स के पास बड़े क्रिकेट राइट्स आने के बाद हिंदी फीड की शुरुआत हुई।उन्होंने कहा- मकसद था कि ज्यादा से ज्यादा लोग अपनी भाषा में क्रिकेट देख सकें और उससे जुड़ाव महसूस करें। 2017 में तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फीड शुरू की गईं। इसके बाद डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ भोजपुरी, पंजाबी, हरियाणवी समेत कई नई भाषाएं जोड़ी गईं और अब IPL 12 भाषाओं में उपलब्ध है। सवाल: भोजपुरी कमेंट्री की शुरुआत में सबसे बड़ी चुनौती क्या थी? सिद्धार्थ के मुताबिक, सबसे बड़ी चुनौती सही कमेंटेटर ढूंढना थी। उन्होंने कहा कि हर भाषा में पूर्व क्रिकेटर उपलब्ध नहीं होते, इसलिए ऐसे लोगों को तलाशा गया जो क्रिकेट समझते हों और साथ ही अच्छे स्टोरीटेलर भी हों। उन्होंने बताया कि भोजपुरी कमेंट्री के लिए कई ऑडिशन लिए गए। 10-12 लोगों का पूल तैयार किया गया, फिर वर्कशॉप और ट्रेनिंग के बाद कुछ आवाजों को चुना गया। कमेंटेटर्स को यह भी सिखाया गया कि रोहित शर्मा की बैटिंग या विराट कोहली के कवर ड्राइव को किस अंदाज में पेश करना है। इसके लिए अलग ट्रेनिंग मॉड्यूल और फ्रेमवर्क बनाए गए। सवाल: भोजपुरी कमेंट्री इतनी वायरल क्यों हुई? सिद्धार्थ ने कहा कि भोजपुरी कमेंट्री की ताकत उसका देसी अंदाज और कहानी सुनाने की कला है। उन्होंने कहा कि भोजपुरी फीड में तकनीकी विश्लेषण से ज्यादा मनोरंजन, लोकल बोली, मुहावरे और भावनात्मक जुड़ाव पर फोकस किया गया। उनके मुताबिक, भोजपुरी कमेंटेटर क्रिकेट को ऐसे पेश करते हैं कि जो दर्शक खेल की बारीकियां नहीं भी समझते, वे भी उससे जुड़ जाते हैं। यही वजह है कि भोजपुरी कमेंट्री ने अपनी अलग पहचान बना ली। सवाल: IPL कमेंट्री में पूर्व खिलाड़ियों को इतनी अहमियत क्यों दी जाती है? सिद्धार्थ ने कहा कि कोशिश रहती है कि ऐसे लोगों को कमेंट्री में लाया जाए जो IPL इकोसिस्टम का हिस्सा रहे हों। सवाल: भारतीय ब्रॉडकास्ट की तुलना विदेशी लीग्स से कैसे होती है? सिद्धार्थ ने दावा किया कि IPL ब्रॉडकास्ट दुनिया की बड़ी स्पोर्ट्स लीग्स से आगे है। उन्होंने कहा कि कवरेज की चौड़ाई, भाषाओं की संख्या और दर्शकों तक पहुंच के मामले में IPL का मॉडल अनोखा है। सवाल: पंजाबी कमेंट्री का फ्लेवर बाकी भाषाओं से अलग कैसे है? पूर्व क्रिकेटर और कमेंटेटर सरनदीप सिंह ने कहा कि पंजाबी भाषा खुद में बहुत भावनात्मक और मजेदार है। उन्होंने बताया कि हिंदी और अंग्रेजी कमेंट्री में शब्द सीमित और औपचारिक होते हैं, जबकि पंजाबी में खुलकर बात होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पंजाबी में ऐसे लोकल शब्द और जुमले इस्तेमाल होते हैं जो गांवों और कस्बों की भाषा से आते हैं। सवाल: पंजाबी कमेंट्री में सबसे यादगार IPL पल कौन सा रहा? सरनदीप ने पंजाब किंग्स के बड़े रन चेज और आक्रामक खेल को सबसे यादगार बताया। उन्होंने कोलकाता में 262 रन चेज करने और मुंबई इंडियंस के खिलाफ अर्शदीप सिंह के प्रदर्शन का जिक्र किया। सवाल: पंजाब से इतने क्रिकेटर क्यों निकलते हैं? सरनदीप ने कहा कि पंजाब में खेलों की संस्कृति बहुत पुरानी है। उन्होंने युवराज सिंह, हरभजन सिंह, कपिल देव, नवजोत सिंह सिद्धू जैसे खिलाड़ियों का उदाहरण देते हुए कहा कि क्रिकेट वहां की संस्कृति का हिस्सा है। उन्होंने बताया कि पंजाब के अलग-अलग इलाकों- मालवा, दोआबा और माझा की अपनी अलग बोली और फ्लेवर है, जो खिलाड़ियों और कमेंट्री दोनों में दिखाई देता है। सवाल: आधुनिक क्रिकेट में फिटनेस कितनी जरूरी हो गई है? IPL में सबसे ज्यादा मैचों में अंपायरिंग करने वाले अनिल चौधरी ने कहा कि आज के क्रिकेट में फिटनेस सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। उनके मुताबिक, अगर खिलाड़ी या अंपायर फिट नहीं है तो वह खेल की स्पीड के साथ तालमेल नहीं बैठा सकता। सवाल: अभी के समय का बेस्ट टी-20 बैटर कौन है? अनिल ने बताया कि अभी जितने यंगस्टर्स वो शानदार खेल दिखा रहे हैं। आयुष म्हात्रे, यश राज पुंजा, देवदत्त पडीक्कल सभी बेहतरीन फॉर्म में रहे, लेकिन उनका पसंदीदा प्लेयर वैभव सूर्यवंशी है। वैभव की हिटिंग एबिलिटी को अनिल ने शानदार बताया।

सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया, पत्र सौंपा | भारत समाचार

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आखरी अपडेट:28 मई, 2026, 15:37 IST कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, उन्होंने कहा कि उन्होंने लोक भवन में अपना इस्तीफा सौंपा और ध्यान दिया कि राज्यपाल अपने कार्यालय में नहीं थे। कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने गुरुवार को औपचारिक रूप से कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, जो राज्य में एक बड़े नेतृत्व परिवर्तन का प्रतीक है। अपना इस्तीफा सौंपने के कुछ देर बाद सिद्धारमैया ने संवाददाताओं से कहा कि उन्होंने लोकभवन में अपना इस्तीफा सौंप दिया है. सिद्धारमैया ने अपना इस्तीफा कर्नाटक के राज्यपाल के विशेष सचिव प्रभु शंकर को सौंपा. राज्य से बाहर गए राज्यपाल थावरचंद गहलोत आज रात लौट रहे हैं. उनके साथ उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार भी थे। उन्होंने कहा, “मैंने अपना इस्तीफा राज्यपाल के कार्यालय को सौंप दिया है। राज्यपाल यहां नहीं हैं; वह आज रात लौट रहे हैं। इसलिए, मैंने उनके कार्यालय को इस्तीफा सौंप दिया है।” सिद्धारमैया ने कहा कि उन्होंने बार-बार कहा है कि जब भी कांग्रेस आलाकमान निर्देश देगा, वह पद छोड़ देंगे और उन्होंने कहा कि उनका इस्तीफा पार्टी नेतृत्व के निर्देशों के अनुरूप है। “आलाकमान द्वारा मुझे पहले इस्तीफा देने के लिए कहने के बाद मैंने आज अपना इस्तीफा सौंप दिया है। मुझे पूरा विश्वास है कि राज्यपाल जब आएंगे तो इसे स्वीकार करेंगे क्योंकि यह संविधान के अनुसार किया जाना है… हम पूर्ण बहुमत में हैं। इसलिए, यह संवैधानिक है कि मुख्यमंत्री को (सरकार बनाने के लिए) अनुमति दी जानी चाहिए।” सिद्धारमैया ने कांग्रेस नेताओं का जताया आभार उन्होंने आगे मौका देने के लिए कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी का आभार व्यक्त किया। सिद्धारमैया ने कहा, ”मैं सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के प्रति बहुत आभार व्यक्त करना चाहता हूं, जिन्होंने यह अवसर प्रदान किया।” उन्होंने कहा, “मैं 2006 में कांग्रेस में शामिल हुआ था। सभी पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं, लोकसभा और राज्यसभा सदस्यों ने मेरे प्रति प्यार और समर्थन दिखाया है। उन्होंने मुझे अवसर दिए हैं। मैं उन सभी को धन्यवाद देता हूं।” राहुल गांधी से मिलेंगे सिद्धारमैया सूत्रों ने कहा कि सिद्धारमैया के गुरुवार को बाद में राहुल गांधी से मिलने की उम्मीद है, इस दौरान कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) की बैठक के संबंध में निर्णय लिए जाने की संभावना है। सीएलपी की बैठक शनिवार को होने की उम्मीद है, जबकि अगले मुख्यमंत्री के लिए शपथ ग्रहण समारोह को सप्ताह के अंत तक अंतिम रूप दिए जाने की संभावना है, रविवार संभावित तारीख के रूप में उभर रहा है। सूत्रों ने कहा कि कितने मंत्री शपथ लेंगे, इस पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, हालांकि राहुल गांधी के भी समारोह में शामिल होने की संभावना है। डीके शिवकुमार बनेंगे कर्नाटक के अगले सीएम? सूत्रों ने सुझाव दिया है कि डीके शिवकुमार के कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री बनने की संभावना है, और उनके इस सप्ताह के अंत में शपथ लेने की उम्मीद है। शिवकुमार के अगले सीएम बनने की खबरों के बीच, उनके समर्थकों ने बुधवार को रामनगर में नारे लगाकर, पटाखे फोड़कर और मिठाइयां बांटकर जश्न मनाया। जब से कांग्रेस ने कर्नाटक में सरकार बनाई है, राजनीतिक गलियारों में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच संभावित मुख्यमंत्री पद की व्यवस्था को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने कभी भी सार्वजनिक रूप से किसी भी सत्ता-साझाकरण समझौते की पुष्टि नहीं की है, लेकिन “2.5-वर्षीय सीएम फॉर्मूले” की अफवाहें बार-बार सामने आई हैं, खासकर दिल्ली में कर्नाटक के नेताओं और कांग्रेस आलाकमान के बीच प्रमुख बैठकों के दौरान। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया ‘हाईकमान ने पूछा, मैंने इस्तीफा दे दिया’: सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)सिद्धारमैया का इस्तीफा(टी)कर्नाटक के मुख्यमंत्री(टी)कांग्रेस नेता सिद्धारमैया(टी)कर्नाटक की राजनीति(टी)मुख्यमंत्री का इस्तीफा(टी)लोक भवन(टी)कर्नाटक के राज्यपाल(टी)राजनीतिक समाचार भारत

‘गिरगिट से भी खतरनाक’: चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी ने ‘गिरगिट’ कविता से विद्रोहियों पर हमला किया | भारत समाचार

DK Shivakumar is set to be next Chief Minister

आखरी अपडेट:28 मई, 2026, 13:07 IST विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर इस्तीफे और असंतोष बढ़ने पर ममता बनर्जी ने टीएमसी विद्रोहियों पर हमला करते हुए गिरगिट कविता पोस्ट की। टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने पार्टी के बागियों पर निशाना साधते हुए ‘गिरगिट’ कविता लिखी। विधानसभा चुनावों में अपनी करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में गहराते आंतरिक संकट के मद्देनजर, पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने “गिरगिट (गिरगिट)” शीर्षक से एक तीखे शब्दों वाली कविता लिखी, जो पार्टी के विद्रोहियों पर पलटवार करती नजर आई। यह कविता, जो बंगाली में लिखी गई है और उनके फेसबुक पेज पर पोस्ट की गई है, पार्टी के उन असंतुष्टों पर एक अप्रत्यक्ष हमला प्रतीत होती है, जिन्होंने चुनाव में हार के बाद या तो पार्टी पदों से इस्तीफा दे दिया है या सार्वजनिक रूप से नेतृत्व की आलोचना की है। कविता की शुरुआती पंक्तियों में ममता ने लिखा, “गिरगिट से भी ज्यादा खतरनाक – कम से कम आकार बदलने वाला अपनी आजीविका के लिए रंग बदलता है।” कविता में, ममता ने ऐसे लोगों पर “कुछ घंटों के भीतर रंग और चरित्र बदलने” और व्यक्तिगत लाभ के लिए “लोगों और कार्यकर्ताओं के आत्मसम्मान को बेचने” का आरोप लगाया, जो स्पष्ट रूप से उन लोगों की आलोचना के रूप में सामने आया जिन्होंने संकट के बीच पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाया है। यह भी पढ़ें: ‘कॉकरोचों को पूरा समर्थन’: टीएमसी की ममता, अभिषेक बनर्जी ने कॉकरोच जनता पार्टी का समर्थन किया कविता की अंतिम पंक्तियों में, तृणमूल सुप्रीमो ने विद्रोहियों को चेतावनी देते हुए संकेत दिया कि अंततः उन्हें अपने कार्यों के परिणामों का सामना करना पड़ेगा। कविता में कहा गया है, “जैसे रथ के पहिए चलेंगे, वैसे ही आपके पहिए भी चलेंगे। आपको परिणाम मिलेंगे। उस दिन गद्दारों को समझ आएगा कि मूल्यहीन अमानवीयता क्या होती है।” इस्तीफों की लहर, असंतोष ने टीएमसी को प्रभावित किया यह कविता उस दिन जारी की गई जब तृणमूल कांग्रेस के भीतर आंतरिक अशांति और अधिक गहरी होती दिखाई दी, जिसमें पार्टी के भीतर से कई इस्तीफों और असंतोष की खुली अभिव्यक्तियाँ सामने आईं। केएमसी बरो XII के अध्यक्ष सुशांत घोष ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जबकि पार्टी के प्रवक्ता और पार्षद अरूप चक्रवर्ती ने केएमसी लेखा समिति से इस्तीफा दे दिया। यह भी पढ़ें: बंगाल में ममता की हार के बाद इंडिया ब्लॉक का सवाल: अब विपक्ष का नेतृत्व कौन करता है? एक अन्य घटनाक्रम में, बारासात की सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने तृणमूल के प्रदेश अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को एक और इस्तीफा सौंप दिया, जिसमें उन्होंने सभी संगठनात्मक जिम्मेदारियां छोड़ दीं और यह स्पष्ट कर दिया कि वह पार्टी में बनी रहेंगी। पूर्व मंत्री और गायक इंद्रनील सेन ने भी सक्रिय चुनावी राजनीति से हटने के अपने फैसले की घोषणा की। कई नेताओं ने पार्टी की हालिया चुनावी असफलताओं के लिए संगठन के भीतर बढ़ती “वीवीआईपी संस्कृति” को जिम्मेदार ठहराया है और आरोप लगाया है कि चुनावों के बाद जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को तेजी से दरकिनार कर दिया गया है और उन्हें समर्थन नहीं मिल रहा है। अपने त्याग पत्र में, दस्तीदार ने राशन घोटाले, भर्ती अनियमितताओं और आरजी कर बलात्कार-और-हत्या मामले से जुड़े विवादों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन घटनाओं ने जनता के गुस्से को बढ़ाने और विश्वास के क्षरण में योगदान दिया है। ममता बनर्जी ने पहले नतीजों के बाद नवनिर्वाचित विधायकों के साथ अपनी पहली बैठक के दौरान असंतोष के संकेतों को स्वीकार किया था, और टिप्पणी की थी कि जो लोग पार्टी के साथ रहने के इच्छुक नहीं हैं वे छोड़ने के लिए स्वतंत्र हैं। इस पृष्ठभूमि में, उनकी नवीनतम कविता को राजनीतिक हलकों में आंतरिक असंतुष्टों के लिए एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि पार्टी हाल के वर्षों में अपनी सबसे गंभीर संगठनात्मक चुनौतियों में से एक का सामना कर रही है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया ‘गिरगिट से भी खतरनाक’: चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी ने ‘गिरगिट’ कविता के साथ विद्रोहियों पर हमला किया अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)ममता बनर्जी कविता(टी)तृणमूल कांग्रेस संकट(टी)टीएमसी आंतरिक असंतोष(टी)गिरगिट गिरगिट कविता(टी)पार्टी विद्रोही टीएमसी(टी)इस्तीफों की लहर(टी)वीवीआईपी संस्कृति आलोचना(टी)बंगाल विधानसभा हार