Tuesday, 06 Oct 2026 | 10:12 PM

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मूवी रिव्यू- पेड्डी:पहचान की लड़ाई को दमदार अंदाज में दिखाती है फिल्म, राम चरण के करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस, फर्स्ट हाफ स्लो, लेकिन कहानी असरदार

मूवी रिव्यू- पेड्डी:पहचान की लड़ाई को दमदार अंदाज में दिखाती है फिल्म, राम चरण के करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस, फर्स्ट हाफ स्लो, लेकिन कहानी असरदार

स्टार- 3.5/5 रनटाइम- 3 घंटे 8 मिनट कास्ट- राम चरण, जान्हवी कपूर, जगपति बाबू कई बार कुछ फिल्में कहानी से ज्यादा अपने जज्बातों के लिए याद रखी जाती हैं। पेड्डी भी ऐसी ही फिल्म है। यह सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की आवाज है जिनकी मौजूदगी तक सरकारी कागजों में दर्ज नहीं है। राम चरण और निर्देशक बुच्ची बाबू सना ने एक बड़े व्यावसायिक कैनवास पर पहचान, सम्मान और हक की लड़ाई को पेश करने की कोशिश की है। फिल्म हर मोड़ पर परफेक्ट नहीं है, लेकिन जब यह दिल पर वार करती है तो असर छोड़ जाती है। कैसी है फिल्म की कहानी? विजयनगरम जिले की पहाड़ियों के नीचे बसा एक गांव ऐसा है जिसका कोई सरकारी अस्तित्व नहीं है। वहां रहने वाले लोगों के पास पहचान नहीं, वोट देने का अधिकार नहीं और बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। पेड्डी इसी गांव का रहने वाला युवक है। वह गुड़ की फैक्ट्री में काम करता है और स्थानीय क्रिकेट मैचों में पैसे लेकर खेलने जाता है। गांव के बुजुर्ग अप्पलासूरी सालों से अपने गांव के लिए रेलवे स्टेशन की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज कोई नहीं सुनता। एक दर्दनाक घटना के बाद पेड्डी इस लड़ाई को अपना मिशन बना लेता है। क्रिकेट से शुरू हुआ उसका सफर कुश्ती और फिर एथलेटिक्स तक पहुंचता है। सवाल सिर्फ एक रेलवे स्टेशन का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे गांव को पहचान दिलाने का बन जाता है। पेड्डी इस लड़ाई को कैसे अंजाम देता है, यही फिल्म की मुख्य कहानी है। कैसी है स्टारकास्ट की एक्टिंग? राम चरण ने अपने करियर की सबसे परिपक्व और समर्पित परफॉर्मेंस दी है। उनका शारीरिक बदलाव, अलग बोली पर पकड़ और भावनात्मक दृश्यों में दिखाई गई ईमानदारी प्रभावित करती है। खासकर दूसरे हिस्से में उनका अभिनय कई जगह आंखें नम कर देता है। शिव राजकुमार सीमित लेकिन प्रभावी भूमिका में नजर आते हैं। उनके और राम चरण के बीच गुरु शिष्य वाला रिश्ता फिल्म की बड़ी ताकत बनकर उभरता है। जगपति बाबू ने अपने किरदार में भावनात्मक गहराई लाने की कोशिश की है। हालांकि कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा नाटकीय लगते हैं। जाह्नवी कपूर के हिस्से में ज्यादा कुछ करने को नहीं है। उनका किरदार कहानी के मुख्य मुद्दे से लगभग कटा हुआ महसूस होता है। एक मजबूत भूमिका बनने की संभावना थी, लेकिन लेखन ने उन्हें सिर्फ प्रेम कहानी तक सीमित कर दिया। कैसा है फिल्म का डायरेक्शन? बुच्ची बाबू सना की सबसे बड़ी ताकत भावनाओं को पर्दे पर जीवंत करना है। फिल्म का मूल विचार बेहद दमदार है और दूसरे हिस्से में निर्देशक इस विचार को मजबूती से पकड़कर रखते हैं। कुश्ती वाले दृश्य और अंतिम आधा घंटा फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है। हालांकि पहले हिस्से में कहानी कई बार भटकती है। रोमांस और कुछ व्यावसायिक मसाला दृश्य फिल्म की रफ्तार को धीमा करते हैं। तीन घंटे से ज्यादा की अवधि भी कुछ जगह महसूस होती है। तकनीकी पक्ष मजबूत है। रत्नवेलु की सिनेमैटोग्राफी गांव, खेल के मैदान और भावनात्मक दृश्यों को खूबसूरती से कैद करती है। प्रोडक्शन डिजाइन भी फिल्म को वास्तविकता के करीब रखता है। हालांकि कुछ दृश्य प्रभाव अपेक्षित स्तर के नहीं लगते। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? ए आर रहमान का संगीत फिल्म की आत्मा है। गाने कहानी का हिस्सा बनकर आते हैं और पृष्ठभूमि संगीत कई दृश्यों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। खासकर भावनात्मक और प्रेरणादायक दृश्यों में उनका काम फिल्म को ऊंचाई देता है। फाइनल वर्डिक्ट: फिल्म देखें या नहीं? पेड्डी एक ऐसी फिल्म है जो तर्क से ज्यादा भावनाओं के सहारे चलती है। इसमें कई कमियां हैं, कुछ सवाल भी अनुत्तरित रह जाते हैं, लेकिन फिल्म का दिल सही जगह पर है। राम चरण का शानदार अभिनय, दमदार क्लाइमैक्स और पहचान की लड़ाई पर आधारित भावनात्मक कहानी इसे देखने लायक बनाती है। अगर आपको खेल, संघर्ष और इंसानी जज्बातों से जुड़ी कहानियां पसंद हैं तो पेड्डी आपको निराश नहीं करेगी।

मूवी रिव्यू- पेड्डी:पहचान की लड़ाई को दमदार अंदाज में दिखाती है फिल्म, राम चरण के करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस, फर्स्ट हाफ स्लो, लेकिन कहानी असरदार

मूवी रिव्यू- पेड्डी:पहचान की लड़ाई को दमदार अंदाज में दिखाती है फिल्म, राम चरण के करियर की बेस्ट परफॉर्मेंस, फर्स्ट हाफ स्लो, लेकिन कहानी असरदार

स्टार- 3.5/5 रनटाइम- 3 घंटे 8 मिनट कास्ट- राम चरण, जान्हवी कपूर, जगपति बाबू कई बार कुछ फिल्में कहानी से ज्यादा अपने जज्बातों के लिए याद रखी जाती हैं। पेड्डी भी ऐसी ही फिल्म है। यह सिर्फ एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की आवाज है जिनकी मौजूदगी तक सरकारी कागजों में दर्ज नहीं है। राम चरण और निर्देशक बुच्ची बाबू सना ने एक बड़े व्यावसायिक कैनवास पर पहचान, सम्मान और हक की लड़ाई को पेश करने की कोशिश की है। फिल्म हर मोड़ पर परफेक्ट नहीं है, लेकिन जब यह दिल पर वार करती है तो असर छोड़ जाती है। कैसी है फिल्म की कहानी? विजयनगरम जिले की पहाड़ियों के नीचे बसा एक गांव ऐसा है जिसका कोई सरकारी अस्तित्व नहीं है। वहां रहने वाले लोगों के पास पहचान नहीं, वोट देने का अधिकार नहीं और बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं। पेड्डी इसी गांव का रहने वाला युवक है। वह गुड़ की फैक्ट्री में काम करता है और स्थानीय क्रिकेट मैचों में पैसे लेकर खेलने जाता है। गांव के बुजुर्ग अप्पलासूरी सालों से अपने गांव के लिए रेलवे स्टेशन की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज कोई नहीं सुनता। एक दर्दनाक घटना के बाद पेड्डी इस लड़ाई को अपना मिशन बना लेता है। क्रिकेट से शुरू हुआ उसका सफर कुश्ती और फिर एथलेटिक्स तक पहुंचता है। सवाल सिर्फ एक रेलवे स्टेशन का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे गांव को पहचान दिलाने का बन जाता है। पेड्डी इस लड़ाई को कैसे अंजाम देता है, यही फिल्म की मुख्य कहानी है। कैसी है स्टारकास्ट की एक्टिंग? राम चरण ने अपने करियर की सबसे परिपक्व और समर्पित परफॉर्मेंस दी है। उनका शारीरिक बदलाव, अलग बोली पर पकड़ और भावनात्मक दृश्यों में दिखाई गई ईमानदारी प्रभावित करती है। खासकर दूसरे हिस्से में उनका अभिनय कई जगह आंखें नम कर देता है। शिव राजकुमार सीमित लेकिन प्रभावी भूमिका में नजर आते हैं। उनके और राम चरण के बीच गुरु शिष्य वाला रिश्ता फिल्म की बड़ी ताकत बनकर उभरता है। जगपति बाबू ने अपने किरदार में भावनात्मक गहराई लाने की कोशिश की है। हालांकि कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा नाटकीय लगते हैं। जाह्नवी कपूर के हिस्से में ज्यादा कुछ करने को नहीं है। उनका किरदार कहानी के मुख्य मुद्दे से लगभग कटा हुआ महसूस होता है। एक मजबूत भूमिका बनने की संभावना थी, लेकिन लेखन ने उन्हें सिर्फ प्रेम कहानी तक सीमित कर दिया। कैसा है फिल्म का डायरेक्शन? बुच्ची बाबू सना की सबसे बड़ी ताकत भावनाओं को पर्दे पर जीवंत करना है। फिल्म का मूल विचार बेहद दमदार है और दूसरे हिस्से में निर्देशक इस विचार को मजबूती से पकड़कर रखते हैं। कुश्ती वाले दृश्य और अंतिम आधा घंटा फिल्म का सबसे प्रभावशाली हिस्सा है। हालांकि पहले हिस्से में कहानी कई बार भटकती है। रोमांस और कुछ व्यावसायिक मसाला दृश्य फिल्म की रफ्तार को धीमा करते हैं। तीन घंटे से ज्यादा की अवधि भी कुछ जगह महसूस होती है। तकनीकी पक्ष मजबूत है। रत्नवेलु की सिनेमैटोग्राफी गांव, खेल के मैदान और भावनात्मक दृश्यों को खूबसूरती से कैद करती है। प्रोडक्शन डिजाइन भी फिल्म को वास्तविकता के करीब रखता है। हालांकि कुछ दृश्य प्रभाव अपेक्षित स्तर के नहीं लगते। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? ए आर रहमान का संगीत फिल्म की आत्मा है। गाने कहानी का हिस्सा बनकर आते हैं और पृष्ठभूमि संगीत कई दृश्यों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। खासकर भावनात्मक और प्रेरणादायक दृश्यों में उनका काम फिल्म को ऊंचाई देता है। फाइनल वर्डिक्ट: फिल्म देखें या नहीं? पेड्डी एक ऐसी फिल्म है जो तर्क से ज्यादा भावनाओं के सहारे चलती है। इसमें कई कमियां हैं, कुछ सवाल भी अनुत्तरित रह जाते हैं, लेकिन फिल्म का दिल सही जगह पर है। राम चरण का शानदार अभिनय, दमदार क्लाइमैक्स और पहचान की लड़ाई पर आधारित भावनात्मक कहानी इसे देखने लायक बनाती है। अगर आपको खेल, संघर्ष और इंसानी जज्बातों से जुड़ी कहानियां पसंद हैं तो पेड्डी आपको निराश नहीं करेगी।

पीएम को सलाह देने के सवाल पर मनोज बाजपेयी बोले:मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता, हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता होती है

पीएम को सलाह देने के सवाल पर मनोज बाजपेयी बोले:मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता, हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता होती है

फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ के प्रमोशन के दौरान अभिनेता मनोज बाजपेयी ने राजनीति और नेतृत्व से जुड़े सवाल पर संतुलित जवाब दिया। दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री को एक सलाह देनी हो तो वह क्या देंगे, तो उन्होंने कहा कि वह खुद को ऐसी स्थिति में नहीं मानते कि प्रधानमंत्री को कोई सलाह दे सकें। मनोज बाजपेयी ने कहा, “मैं प्रधानमंत्री को क्या सलाह दूंगा? मैं उस स्थिति में नहीं हूं। मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता हूं।” इससे स्पष्ट था कि वह राजनीतिक बहसों और टिप्पणियों से दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। बातचीत के दौरान मनोज ने कहा कि हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता का क्षेत्र होता है। उनका मानना है कि आर्थिक संकट, नीतिगत फैसले और देश चलाने जैसे मुद्दों पर फैसला लेने का काम उसी क्षेत्र के विशेषज्ञों का है। इंटरव्यू में 1991 के आर्थिक संकट और मौजूदा वैश्विक हालात पर सवाल पूछे जाने पर मनोज ने कहा कि ऐसे मामलों में आम आदमी या कलाकार की भूमिका सीमित होती है। अर्थव्यवस्था को संभालने और संकट से निकालने का काम विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं का है। मनोज ने कहा, “आपको पत्रकार की जिम्मेदारी निभानी आती है, मुझे अभिनेता की जिम्मेदारी निभानी आती है। इसके अलावा हम सिर्फ पढ़ सकते हैं और समझने की कोशिश कर सकते हैं कि देश और दुनिया में क्या हो रहा है।” उन्होंने बताया कि मुश्किल समय में आम लोग खर्च कम करके और आर्थिक रूप से सतर्क रहकर परिस्थितियों का सामना करते हैं। उनके मुताबिक, कई लोग भविष्य की अनिश्चितताओं को देखते हुए बड़े खर्चों से बच रहे हैं और बचत सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं। मनोज बाजपेयी का मानना है कि किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञता का सम्मान होना चाहिए। इसलिए वह राजनीतिक या आर्थिक फैसलों पर सार्वजनिक रूप से सलाह देने से बचते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने हमेशा अपने काम पर ध्यान दिया है और वही उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। वर्क फ्रंट पर मनोज बाजपेयी जल्द ही फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ में नजर आएंगे। फिल्म 1991 के आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि पर आधारित है और इसमें एक आरबीआई गवर्नर के सामने आने वाली चुनौतियों को दिखाया गया है। मनोज का कहना है कि यह सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, दबाव और कठिन परिस्थितियों में फैसले लेने की कहानी भी है। _________________________________ मनोज बाजपेयी का यह इंटरव्यू भी पढ़ें… आर्थिक संकट में देश संभालना बड़ी जिम्मेदारी:मनोज बाजपेयी बोले- आम आदमी खर्च नियंत्रित कर सकता है, लेकिन देश को संकट से एक्सपर्ट्स ही निकालते हैं 1991 के आर्थिक संकट पर बनी फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ को लेकर मनोज बाजपेयी ने दैनिक भास्कर से बातचीत की। उन्होंने कहा कि फिल्म में एक आरबीआई गवर्नर के देश की उम्मीद बनने और देश को संकट से निकालने की जंग दिखाई गई है। मनोज ने इसे ‘इकोनॉमिक थ्रिलर’ बताया। उन्होंने वैश्विक हालात, ईरान-यूएस तनाव, आम आदमी की परेशानियों, ओटीटी और थिएटर की कमी पर भी राय रखी।पूरा इंटरव्यू पढ़ें..

पीएम को सलाह देने के सवाल पर मनोज बाजपेयी बोले:मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता, हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता होती है

पीएम को सलाह देने के सवाल पर मनोज बाजपेयी बोले:मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता, हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता होती है

फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ के प्रमोशन के दौरान अभिनेता मनोज बाजपेयी ने राजनीति और नेतृत्व से जुड़े सवाल पर संतुलित जवाब दिया। दैनिक भास्कर को दिए इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्हें प्रधानमंत्री को एक सलाह देनी हो तो वह क्या देंगे, तो उन्होंने कहा कि वह खुद को ऐसी स्थिति में नहीं मानते कि प्रधानमंत्री को कोई सलाह दे सकें। मनोज बाजपेयी ने कहा, “मैं प्रधानमंत्री को क्या सलाह दूंगा? मैं उस स्थिति में नहीं हूं। मैं इन सब चक्करों में नहीं पड़ता हूं।” इससे स्पष्ट था कि वह राजनीतिक बहसों और टिप्पणियों से दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। बातचीत के दौरान मनोज ने कहा कि हर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी और विशेषज्ञता का क्षेत्र होता है। उनका मानना है कि आर्थिक संकट, नीतिगत फैसले और देश चलाने जैसे मुद्दों पर फैसला लेने का काम उसी क्षेत्र के विशेषज्ञों का है। इंटरव्यू में 1991 के आर्थिक संकट और मौजूदा वैश्विक हालात पर सवाल पूछे जाने पर मनोज ने कहा कि ऐसे मामलों में आम आदमी या कलाकार की भूमिका सीमित होती है। अर्थव्यवस्था को संभालने और संकट से निकालने का काम विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं का है। मनोज ने कहा, “आपको पत्रकार की जिम्मेदारी निभानी आती है, मुझे अभिनेता की जिम्मेदारी निभानी आती है। इसके अलावा हम सिर्फ पढ़ सकते हैं और समझने की कोशिश कर सकते हैं कि देश और दुनिया में क्या हो रहा है।” उन्होंने बताया कि मुश्किल समय में आम लोग खर्च कम करके और आर्थिक रूप से सतर्क रहकर परिस्थितियों का सामना करते हैं। उनके मुताबिक, कई लोग भविष्य की अनिश्चितताओं को देखते हुए बड़े खर्चों से बच रहे हैं और बचत सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे हैं। मनोज बाजपेयी का मानना है कि किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञता का सम्मान होना चाहिए। इसलिए वह राजनीतिक या आर्थिक फैसलों पर सार्वजनिक रूप से सलाह देने से बचते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने हमेशा अपने काम पर ध्यान दिया है और वही उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। वर्क फ्रंट पर मनोज बाजपेयी जल्द ही फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ में नजर आएंगे। फिल्म 1991 के आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि पर आधारित है और इसमें एक आरबीआई गवर्नर के सामने आने वाली चुनौतियों को दिखाया गया है। मनोज का कहना है कि यह सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि जिम्मेदारी, दबाव और कठिन परिस्थितियों में फैसले लेने की कहानी भी है। _________________________________ मनोज बाजपेयी का यह इंटरव्यू भी पढ़ें… आर्थिक संकट में देश संभालना बड़ी जिम्मेदारी:मनोज बाजपेयी बोले- आम आदमी खर्च नियंत्रित कर सकता है, लेकिन देश को संकट से एक्सपर्ट्स ही निकालते हैं 1991 के आर्थिक संकट पर बनी फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ को लेकर मनोज बाजपेयी ने दैनिक भास्कर से बातचीत की। उन्होंने कहा कि फिल्म में एक आरबीआई गवर्नर के देश की उम्मीद बनने और देश को संकट से निकालने की जंग दिखाई गई है। मनोज ने इसे ‘इकोनॉमिक थ्रिलर’ बताया। उन्होंने वैश्विक हालात, ईरान-यूएस तनाव, आम आदमी की परेशानियों, ओटीटी और थिएटर की कमी पर भी राय रखी।पूरा इंटरव्यू पढ़ें..

4,399 दिन का मील का पत्थर: कैसे पीएम मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले निर्वाचित प्रधान मंत्री के रूप में नेहरू से आगे निकलने के लिए तैयार हैं | भारत समाचार

New Delhi: Firefighters at the site after a fire broke out at a bed-and-breakfast in a five-storey building (Photos: PTI)

आखरी अपडेट:04 जून, 2026, 01:07 IST यह परिवर्तन समकालीन शासन कला में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, जिसने भारत के सबसे चुनावी रूप से सफल प्रधान मंत्री के रूप में पीएम मोदी की स्थिति को मजबूत किया है। नेहरू के निर्वाचित रिकॉर्ड से परे पीएम मोदी का ऐतिहासिक उत्थान भारत की घरेलू नीति और इसके वैश्विक भू-राजनीतिक अभिविन्यास पर गहरा प्रभाव डालता है। फ़ाइल छवि/एएफपी एक ऐतिहासिक मील के पत्थर में, जो मूल रूप से भारत के आधुनिक राजनीतिक परिदृश्य को फिर से परिभाषित करता है, नरेंद्र मोदी देश के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले निर्वाचित प्रधान मंत्री बनने के लिए जवाहरलाल नेहरू के लंबे समय से चले आ रहे रिकॉर्ड को पार करने के लिए तैयार हैं। पीएम मोदी, जिन्होंने पहली बार 26 मई 2014 को पद की शपथ ली थी, और तब से लगातार उच्च-जनादेश वाली चुनावी जीत हासिल की है, 10 जून को कार्यालय में लगातार 4,399 दिन पूरे कर लेंगे। ऐसा करने पर, वह आधिकारिक तौर पर एक निर्वाचित नेता के रूप में नेहरू की संचयी अवधि को ग्रहण कर लेंगे, जो 4,398 दिनों की थी। यह परिवर्तन समकालीन शासन कला में एक महत्वपूर्ण बदलाव का प्रतीक है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के इतिहास में सबसे अधिक चुनावी रूप से सफल प्रधान मंत्री के रूप में पीएम मोदी की स्थिति को मजबूत किया है। आसन्न मील का पत्थर भारत में निरंतर राजनीतिक स्थिरता और केंद्रीकृत शासन के एक दुर्लभ युग को रेखांकित करता है। दशकों तक, भारतीय नेतृत्व की दीर्घायु का संरचनात्मक मानदंड स्वतंत्रता के बाद के नेहरू-गांधी युग के मुकाबले मापा जाता था। जमीनी स्तर पर कल्याणकारी अर्थशास्त्र, मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल और एक विशिष्ट मुखर सांस्कृतिक आख्यान के अत्यधिक शक्तिशाली संयोजन के माध्यम से पारंपरिक राजनीतिक आधिपत्य को व्यवस्थित रूप से खत्म करके, नरेंद्र मोदी ने देश के लोकतांत्रिक लोकाचार को नया आकार दिया है। उनका प्रशासनिक मॉडल एक दशक से भी अधिक समय से बड़े पैमाने पर राजनीतिक पूंजी को बनाए रखने में कामयाब रहा है, और पारंपरिक सत्ता-विरोधी कारकों को प्रभावी ढंग से खारिज कर दिया है, जो आमतौर पर दुनिया भर में दीर्घकालिक लोकतांत्रिक प्रशासन को थका देते हैं। दीर्घायु की चुनावी गणना इस ऐतिहासिक परिवर्तन को समझने के लिए कुल कार्यकाल और निर्वाचित कार्यकाल के बीच विश्लेषणात्मक अंतर महत्वपूर्ण है। जवाहरलाल नेहरू आजादी के बाद लगभग 17 वर्षों तक देश के सर्वोच्च कार्यकारी पद पर रहे, और 15 अगस्त, 1947 से अंतरिम सरकार के अनिर्वाचित प्रमुख के रूप में कार्य किया। हालाँकि, औपचारिक संवैधानिक ढांचे के तहत सीधे निर्वाचित नेता के रूप में उनकी स्थिति केवल 13 मई, 1952 को शुरू हुई, जब उन्होंने भारत के पहले लोकतांत्रिक आम चुनावों के बाद शपथ ली। वह निर्वाचित अध्याय 27 मई, 1964 को उनकी मृत्यु तक फैला रहा। इसके विपरीत, केंद्र सरकार के शीर्ष पर नरेंद्र मोदी के पूरे कार्यकाल को प्रत्यक्ष, बड़े पैमाने पर लोकप्रिय जनादेश का समर्थन प्राप्त रहा है। यह चुनावी लचीलापन भारतीय मतदाताओं तक शासन पहुंचाने के तरीके में मूलभूत परिवर्तन पर आधारित है। पिछले बारह वर्षों में, प्रशासन ने व्यवस्थित रूप से राजनीतिक प्रतिमान को स्वतंत्रता के बाद के दशकों की धीमी, वृद्धिशील प्रगति से तीव्र, प्रौद्योगिकी-संचालित विकास मैट्रिक्स में स्थानांतरित कर दिया है। मैक्रो-इंफ्रास्ट्रक्चर पर अभूतपूर्व पूंजी व्यय के साथ-साथ सैकड़ों-हजारों किलोमीटर उन्नत राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण और रेलवे नेटवर्क का पूर्ण आधुनिकीकरण – बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष-लाभ वाली कल्याणकारी पहलों को लागू करके, नरेंद्र मोदी ने एक अविश्वसनीय रूप से टिकाऊ, क्रॉस-सेक्शनल चुनावी गठबंधन बनाया है जो पारंपरिक जाति और क्षेत्रीय विभाजनों तक फैला हुआ है। एक संरचनात्मक और वैश्विक प्रतिमान बदलाव नेहरू के निर्वाचित रिकॉर्ड से परे पीएम मोदी का ऐतिहासिक उत्थान भारत की घरेलू नीति और इसके वैश्विक भू-राजनीतिक अभिविन्यास पर गहरा प्रभाव डालता है। नेहरू के प्रारंभिक नेतृत्व के तहत, भारत ने एक समाजवादी आर्थिक ढांचे और एक सख्ती से गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को अपनाया, जो खंडित शीत युद्ध के माहौल की जटिलताओं से निपटने के लिए डिज़ाइन की गई थी। हालाँकि, नरेंद्र मोदी के विस्तारित कार्यकाल ने एक बाजार-संचालित, तकनीकी रूप से एकीकृत अर्थव्यवस्था की ओर एक निश्चित परिवर्तन की देखरेख की है, जो एक अप्राप्य व्यावहारिक विदेश नीति के साथ मिलकर नई दिल्ली को आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण ध्रुवीय शक्ति के रूप में स्थापित करती है। इस निरंतर कार्यकारी स्थिरता ने सत्तारूढ़ प्रशासन को गहन परिवर्तनकारी और ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील नीतिगत एजेंडा को क्रियान्वित करने की अनुमति दी है, जिसे पिछले गठबंधन युग में लगभग असंभव माना जाता था। प्रमुख संरचनात्मक बदलाव – व्यापक कर सुधार और एक विस्तृत डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण से लेकर निर्णायक राष्ट्रीय सुरक्षा युद्धाभ्यास और ऐतिहासिक विधायी अपडेट तक – सभी इस निरंतर विधायी आदेश के कारण साकार हुए हैं। जैसा कि नरेंद्र मोदी ने इस महत्वपूर्ण मील के पत्थर को पार कर लिया है, परिवर्तन केवल कार्यालय में बिताए गए दिनों की गणना से कहीं अधिक दर्शाता है; यह एक “न्यू इंडिया” के संस्थागतकरण का प्रतीक है, जिसने एक अत्यधिक विशिष्ट, आधुनिक वैश्विक पहचान बनाने के लिए अपने मध्य-शताब्दी के टेम्पलेट्स से दृढ़ता से दूर चला गया है। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना लेखक के बारे में न्यूज़ डेस्क न्यूज़ डेस्क उत्साही संपादकों और लेखकों की एक टीम है जो भारत और विदेशों में होने वाली सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं का विवरण और विश्लेषण करती है। लाइव अपडेट से लेकर एक्सक्लूसिव रिपोर्ट से लेकर गहन व्याख्याताओं तक…और पढ़ें न्यूज़ इंडिया 4,399 दिन का मील का पत्थर: कैसे पीएम मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधान मंत्री के रूप में नेहरू से आगे निकलने के लिए तैयार हैं अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)नरेंद्र मोदी(टी)जवाहरलाल नेहरू(टी)प्रधानमंत्री

'आमिर खान गाय-भैंस नहीं कि साथ लाऊं':हरदोई में भाई फैजल बोले- तहसीलदार की लापता मां को खोजने वाले को 2.51 लाख देंगे

'आमिर खान गाय-भैंस नहीं कि साथ लाऊं':हरदोई में भाई फैजल बोले- तहसीलदार की लापता मां को खोजने वाले को 2.51 लाख देंगे

मशहूर फिल्म अभिनेता आमिर खान के बड़े भाई और अभिनेता फैसल खान गुरुवार को हरदोई स्थित अपने पैतृक गांव पहुंचे। उन्होंने तहसीलदार संध्या यादव से मुलाकात की। एक महीने पहले लापता हुईं उनकी मां लल्ली देवी (71) की तलाश में मदद करने के लिए लोगों से अपील की। फैसल खान ने कहा- लल्ली देवी पिछले एक महीने से लापता हैं। परिवार उनकी तलाश के लिए लगातार प्रयास कर रहा। उनकी सकुशल जानकारी देने या उन्हें सुरक्षित घर पहुंचाने वाले व्यक्ति को 2 लाख 51 हजार रुपए का इनाम दिया जाएगा। आमिर खान के गांव नहीं आने संबंधी सवाल पर उन्होंने कहा, “वो कोई गाय-भैंस तो हैं नहीं कि पकड़कर ले आऊं। जब उनका मन होगा, वे खुद आ जाएंगे।” दरअसल, आमिर और फैसल खान के पूर्वज शाहबाद क्षेत्र के निवासी थे। परिवार की करीब 120 बीघा कृषि भूमि और बाग अख्तियारपुर-दिलावरपुर गांवों में स्थित है। फैसल खान इन खेतों और बागों की देखरेख करते हैं। फैसल, फिल्म मेला सहित कई फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं। देखिए तस्वीरें… अब पूरा मामला जानिए… तहसीलदार संध्या यादव ने बताया- उनकी मां लल्ली देवी 30 अप्रैल 2026 को लखनऊ के अर्जुनगंज-अहिमामऊ क्षेत्र स्थित एक मंदिर में दर्शन करने गई थीं। मंदिर से निकलने के बाद वह रास्ता भटक गईं और फिर घर नहीं लौट सकीं। आखिरी बार उन्हें अहिमामऊ स्थित शहीद पथ सर्विस लेन के पास फौजी ढाबा क्षेत्र में देखा गया था। इसके बाद से उनका कोई सुराग नहीं मिल सका। परिवार ने मामले में लखनऊ के सुशांत गोल्फ सिटी थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई है। पुलिस के साथ-साथ परिजन भी लगातार उनकी तलाश में जुटे हैं। सोशल मीडिया पर अभियान चलाया गया है, पोस्टर जारी किए गए हैं। विभिन्न जिलों में उनकी खोजबीन कराई जा रही है। तहसीलदार की मां के बाएं हाथ पर बना है टैटू संध्या यादव ने बताया- मेरी मां लल्ली देवी की लंबाई लगभग पांच फीट है। वह अंतिम बार लाल साड़ी और हरी चूड़ियां पहने हुए देखी गई थीं। उनकी पहचान का सबसे प्रमुख चिन्ह बाएं हाथ पर बना ‘लल्ली देवी’ और ‘रामधारी’ नाम का टैटू है। फैसल बोले- पैतृक जमीन की देखरेख के लिए आया फैसल खान ने मीडिया से भी बातचीत की है। गांव आने के मकसद पर उन्होंने बताया कि शाहाबाद क्षेत्र के अख्तियारपुर और दिलावरपुर गांव में उनके परिवार की करीब 120 बीघा पैतृक जमीन और बागान हैं। उनकी देखरेख के लिए वह यहां आए हैं। खेती और फार्मिंग में उनकी हमेशा रुचि रही है। अब वह स्वयं इसकी जिम्मेदारी संभालना चाहते हैं। फिल्म सिटी का किया समर्थन फैसल खान ने यूपी में प्रस्तावित फिल्म सिटी की सराहना करते हुए कहा कि इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। फिल्म उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा। ——————————– ये खबर भी पढ़िए… बदायूं में दरोगा का खिड़की से लटका शव मिला:घुटने के बल बैठी पोजिशन में था, एसपी बोलीं- सुसाइड की आशंका बदायूं में दरोगा का शव कमरे में दरवाजे के ऊपर बनी खिड़की से फंदे के सहारे लटका मिला। शव घुटने के बल बैठी पोजिशन में था। कमरे से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। हालांकि, एसपी अंकिता शर्मा ने सुसाइड की आशंका जताई है। एसपी ने बताया- दरोगा मेघश्याम गौतम (55) कोर्ट सुरक्षा में तैनात थे। वो मूलरूप से मथुरा के गोविंदनगर थाना के सकना गांव के रहने वाले थे। पूरी खबर पढ़ें…

मूंग दाल पकौड़ी कढ़ी रेसिपी: सादी नहीं, घर में ऐसे बनाएं मूंग दाल पकौड़ी वाली कढ़ी, रोटी ही सही! विधि नोट करें

तस्वीर का विवरण

पकौड़ी के लिए: 1 कप ढोली मूंग दाल, 1 हरी मिर्च, 1 बड़ा चम्मच अदरक, नमक स्वाद मसाला, तेल के लिए तेल छवि: एआई कढ़ी के लिए: 2 कप दही, 3 कप बड़े बेसन, 4 कप पानी, 1 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर, नमक का स्वाद छवि: फ्रीपिक धन्यवाद के लिए: 1 बड़ा चम्मच घी, 1 छोटा चम्मच घी, 1/2 छोटा चम्मच घी, 2 छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर, 8-10 चम्मच लाल मिर्च पाउडर, 1/2 छोटा चम्मच लाल मिर्च पाउडर छवि: एआई बनाने की विधि: सबसे पहले मूंग दाल को 3-4 घंटे के लिए रवाना करें। इसके बाद पानी की दाल को पीस लें। अब इसमें हरी मिर्च, अदरक और नमक मिला हुआ है। छवि: सोशल मीडिया एक कड़ाही में तेल गर्म करें और छोटे-छोटे पकौड़े को तले तक लें। छवि: एआई एक बड़े तालाब में दही और बेसन को अच्छी तरह से फेंट लें ताकि पेट न रहें। अब इसमें पानी, हल्दी और नमक मिलाकर क्लासिक क्लासिक से नासाल तैयार करें। तैयार मिश्रण को गैस पर रखें और स्थिर मसाले वाले मोर्टार जारी करें। छवि: फ्रीपिक जब कढ़ी गाढ़ी लगे तो इसमें तली हुई मूंग दाल की पकौड़ी डाल देते हैं। दोपहर 15-20 मिनट तक पकाने की विधि ताकि पकौड़ी कढ़ी का स्वाद अच्छी तरह सोख लें। छवि: एआई एक छोटे पैन में घी गर्म करें। इसमें जीरा, राई, हींग, सूखी लाल मिर्च और कैरी पत्ते डाले जाते हैं। जब तत्काल चटकने लगें तो तुरंत लाल मिर्च पाउडर का पेस्ट बनाएं यह तड़का कढ़ी में डाल दें। छवि: एआई गरमा-गरम मूंग दाल पकौड़ी कढ़ी को स्वादिष्ट चावल, जीरा चावल या रोटी के साथ बनाएं। ऊपर से छोटी हरी धनिया का स्वाद और भी बढ़ जाता है। छवि: सोशल मीडिया पकाऊ किरदारों को सख्ती से सख्त न करें, इससे वे कढ़ी में नर और स्वादिष्ट शैतानी करते हैं। खट्टी कढ़ी पसंद हो तो दही थोड़ी ज्यादा कट्टा इस्तेमाल करें। लॉबी में लहसुन की मशीनरी का भी स्वाद लिया जा सकता है। छवि: एआई स्वादिष्ट मूंग दाल पकौड़ी वाली कढ़ी आपके परिवार को जरूर पसंद आएगी और हर कोई इसके शौकीन के बिना नहीं रहेगा। छवि: सोशल मीडिया

दावा- सूर्यकुमार यादव से टी-20 कप्तानी छिनेगी:3 महीने पहले टी-20 वर्ल्ड कप जिताया था; आयरलैंड-इंग्लैंड दौरे के लिए टीम में जगह मिलनी मुश्किल

दावा- सूर्यकुमार यादव से टी-20 कप्तानी छिनेगी:3 महीने पहले टी-20 वर्ल्ड कप जिताया था; आयरलैंड-इंग्लैंड दौरे के लिए टीम में जगह मिलनी मुश्किल

भारतीय टी-20 कप्तान सूर्यकुमार यादव को कप्तानी से हटाया जाएगा। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक आयरलैंड और इंग्लैंड दौरे से पहले BCCI, टीम मैनेजमेंट और चयन समिति नए कप्तान चुनने की तैयारी में हैं। सूर्यकुमार की टीम में जगह भी खतरे में हैं। इसी साल 8 मार्च को अहमदाबाद में सूर्यकुमार की कप्तानी में भारत ने टी-20 वर्ल्ड कप जीता था। BCCI ने टीम मैनेजमेंट और सिलेक्शन कमिटी के साथ मिलकर नया कप्तान चुनने का फैसला किया है। इस प्रक्रिया में मुख्य कोच गौतम गंभीर से भी चर्चा की गई है। टीम को नए कप्तान के साथ आगे बढ़ना चाहिए रिपोर्ट में एक BCCI अधिकारी के हवाले से कहा गया है, चयन समिति, BCCI और टीम मैनेजमेंट ने कोच गौतम गंभीर से चर्चा के बाद तय किया है कि अब टीम को नए कप्तान के साथ आगे बढ़ना चाहिए। सूर्यकुमार की कप्तानी में टीम ने टी-20 वर्ल्ड कप जीता, लेकिन उनकी फॉर्म और भविष्य को देखते हुए आगे बढ़ने का समय आ गया है। अधिकारी ने यह भी कहा, उनका टीम में सिलेक्शन भी मुश्किल हैं और यह फैसला जल्द ही सूर्यकुमार को बता दिया जाएगा। 26 जून से आयरलैंड सीरीज भारत की टीम इस महीने आयरलैंड में दो टी-20 मैच खेलेगी। इसके बाद इंग्लैंड दौरे पर 5 टी-20 मुकाबले होंगे। नए कप्तान की घोषणा इन दौरों से पहले होने की उम्मीद है। IPL में 270 रन ही बना सके सूर्यकुमार की बल्लेबाजी फॉर्म पिछले दो वर्षों से चिंता का विषय रही है। 2026 IPL सीजन में भी उनका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ एक अर्धशतक लगाने के बावजूद उन्होंने 13 पारियों में सिर्फ 270 रन बनाए। इस दौरान उनका औसत 20.76 रहा। सूर्या ने बतौर कप्तान 42 टी-20 जीते सूर्या भारत के सबसे सफल टी-20 कप्तानों में शामिल हैं। उनकी कप्तानी में भारत ने 52 टी-20 इंटरनेशनल मैच खेले, जिनमें 42 जीते , 8 हारे और दो मैच नो रिजल्ट रहा। उनका जीत प्रतिशत 80.76% रहा। सूर्यकुमार की अगुआई में भारत ने 2026 टी-20 वर्ल्ड कप, 2025 एशिया कप अपने नाम कीं। सूर्या टी-20 में 4 शतक लगा चुके सूर्यकुमार यादव ने 113 मैचों की 107 पारियों में 3272 रन बनाए हैं। उनका औसत 36.35 और स्ट्राइक रेट 162.94 रहा है। सूर्यकुमार के नाम 4 शतक और 25 अर्धशतक दर्ज हैं, जबकि उनका बेस्ट स्कोर 117 रन है। उन्होंने 297 चौके, 179 छक्के और 58 कैच भी लिए हैं। रोहित के बाद सूर्या को कप्तानी मिली थी वेस्टइंडीज में 2024 टी-20 वर्ल्ड कप जीतने के बाद रोहित शर्मा ने इस फॉर्मेट से संन्यास लिया था। इसके बाद सूर्यकुमार यादव को भारत की टी-20 टीम की कप्तानी सौंपी गई थी।

निष्कासित विधायकों के बहुमत का दावा, ममता को चुनौती, टीएमसी में विद्रोह गहराया | कठिन तथ्य

निष्कासित विधायकों के बहुमत का दावा, ममता को चुनौती, टीएमसी में विद्रोह गहराया | कठिन तथ्य

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस एक बड़े आंतरिक विद्रोह का सामना कर रही है, निष्कासित विधायक कथित तौर पर बहुमत के समर्थन का दावा कर रहे हैं और ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती दे रहे हैं। संकट ने निरंकुश निर्णय लेने, पारिवारिक नियंत्रण और पार्टी रैंकों के भीतर बढ़ते असंतोष के आरोपों को जन्म दिया है। विद्रोही खेमे के दावे ने संभावित विभाजन की अटकलों को तेज कर दिया है और टीएमसी की भविष्य की सत्ता संरचना के बारे में गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जैसा कि बंगाल की राजनीति में एक नाटकीय पुनर्गठन देखा जा रहा है, सभी की निगाहें अब ममता बनर्जी के अगले कदम पर हैं और आधिकारिक टीएमसी नेतृत्व चुनौती का जवाब कैसे देता है। टीएमसी सत्ता संघर्ष पर नवीनतम अपडेट के लिए पूरी रिपोर्ट देखें। n18oc_ Indian18oc_politicsn18oc_the-hard-factsNews18 मोबाइल ऐप – https://onelink.to/desc-youtube

देहरादून में 6-7 जून को होगा पिकल बॉल का रोमांच:परेड ग्राउंड में होंगे मुकाबले; इंडियन पिकल बॉल लीग फाउंडेशन करा रहा सीजन-1

देहरादून में 6-7 जून को होगा पिकल बॉल का रोमांच:परेड ग्राउंड में होंगे मुकाबले; इंडियन पिकल बॉल लीग फाउंडेशन करा रहा सीजन-1

राजधानी देहरादून के परेड ग्राउंड में 6 और 7 जून को उत्तराखंड पिकल बॉल लीग – सीजन 1 का भव्य आयोजन होने जा रहा है। इस चैंपियनशिप में युवा प्रतिभाओं के साथ-साथ अनुभवी खिलाड़ी भी कोर्ट में अपना दम दिखाएंगे।यह आयोजन इंडियन पिकल बॉल लीग फाउंडेशन (आईपीएलएफ) द्वारा किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य में पिकल बॉल खेल को बढ़ावा देना और हर उम्र के खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए एक बेहतरीन मंच प्रदान करना है। सभी आयु वर्ग के खिलाड़ी लेंगे हिस्सा, जुटेंगे अतिथि आईपीएलएफ के डायरेक्टर अमित कुमार ने बताया कि, इस दो दिवसीय लीग में अलग-अलग डिवीजन में बेहद रोमांचक मैच खेले जाएंगे। इसमें सभी आयु वर्ग के खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं। आयोजन का मकसद समुदाय की भागीदारी बढ़ाना और इस डायनामिक खेल के प्रति जागरूकता फैलाना है। लीग के दौरान खेल जगत से जुड़े कई उत्साही और गणमान्य अतिथि भी विशेष रूप से उपस्थित रहेंगे, जो खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाएंगे। खेल प्रेमियों के लिए यह वीकेंड बेहद खास होने वाला है।