Wednesday, 23 Sep 2026 | 10:44 PM

Trending :

ट्रम्प ने माना- ईरान के डर से प्लेन बदलना पड़ा:हमला होता तो पहले वाले पर होता; ट्रक में छिपकर दूसरे प्लेन तक पहुंचे

ट्रम्प ने माना- ईरान के डर से प्लेन बदलना पड़ा:हमला होता तो पहले वाले पर होता; ट्रक में छिपकर दूसरे प्लेन तक पहुंचे

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मान लिया है कि उन्होंने पिछले महीने तुर्किए में ईरान के डर से प्लेन बदला था। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि वे जिस प्लेन से NATO समिट में हिस्सा लेने गए थे उस पर हमले का सबसे ज्यादा खतरा था। ट्रम्प ने यह भी बताया कि उन्हें सुरक्षा कारणों से एयरपोर्ट के कैटरिंग ट्रक में बैठाकर दूसरे विमान तक ले जाया गया। ट्रम्प ने कहा- अगर कोई हमला होता तो उसी प्लेन को निशाना बनाया जाता। मैं वही करता हूं, जो सुरक्षा एजेंसियां कहती हैं। मुझे लगातार धमकियां मिलती रहती हैं। कतर के गिफ्ट किए प्लेन में बैठकर गए, मिलिट्री प्लेन से लौटे इससे पहले वॉशिंगटन पोस्ट ने दावा किया था कि 8 जुलाई को अंकारा से रवाना होते समय ट्रम्प कैमरों के सामने बोइंग 747-8 एयर फोर्स वन में सवार हुए थे। यह विमान उन्हें कतर ने गिफ्ट किया था। इसके बाद एयरपोर्ट पर सामान और खाना पहुंचाने वाली केटरिंग गाड़ी की मदद से उन्हें चुपचाप अमेरिकी वायुसेना के वीआईपी सैन्य विमान C-32A तक ले जाया गया। मीडिया को भी नहीं पता था कि ट्रम्प दूसरे विमान में हैं अमेरिकी राष्ट्रपति जब भी किसी दौरे पर जाते हैं, तो उनके साथ कुछ पत्रकार भी यात्रा करते हैं। सुरक्षा कारणों से हर जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती, लेकिन इन पत्रकारों को इतना जरूर पता होता है कि राष्ट्रपति किस विमान में हैं और कहां जा रहे हैं। तुर्किये से उड़ान भरते समय पत्रकारों को लगा कि ट्रम्प भी उसी पुराने एयर फोर्स वन में हैं, लेकिन हकीकत अलग थी। उड़ान के दौरान पत्रकारों को अपनी खिड़कियों के शेड नीचे रखने को कहा गया। यानी उन्हें बाहर देखने की इजाजत नहीं थी। ऐसी सावधानी आमतौर पर तब बरती जाती है, जब विमान किसी खतरे वाले इलाके से गुजर रहा हो। बाद में पत्रकारों ने ट्रम्प से पूछा कि खिड़कियों के शेड बंद रखने को क्यों कहा गया था। ट्रम्प ने कहा, “शायद हम एक खतरनाक फ्लाइट पर थे। उनकी सूची में सबसे ऊपर मेरा नाम है। अगर मैं मरूंगा, तो आप भी मरेंगे।” ट्रम्प वाला छोटा विमान पहले ब्रिटेन पहुंचा ट्रम्प को लेकर छोटा C-32A विमान रात करीब 10:20 बजे ब्रिटेन के RAF मिल्डेनहॉल एयरबेस पहुंचा। इसके कुछ मिनट बाद पुराना एयरफोर्स वन भी वहां पहुंच गया। इस विमान में पत्रकार सवार थे। इसके बाद उन्हें चुपचाप पुराने एयर फोर्स वन में लाया गया। कुछ देर बाद वे उसी विमान से उतरते दिखे, जिससे पत्रकारों को लगा कि वे पूरी यात्रा उसी में कर रहे थे। हालांकि, यह साफ नहीं है कि C-32A से उतरने के बाद ट्रम्प पुराने एयरफोर्स वन तक कैसे पहुंचे। ट्रम्प ने पत्रकारों की तरफ हाथ हिलाया, लेकिन उनसे बात नहीं की। ऐसा तरीका पहले भी अपनाया जा चुका है राष्ट्रपति को खतरे से बचाने के लिए उनके असली सफर को छिपाने का तरीका नया नहीं है। साल 2000 में राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पाकिस्तान गए थे। तब उन्हें एक ऐसे सरकारी विमान से भेजा गया था, जिस पर राष्ट्रपति के विमान की कोई पहचान नहीं थी। वहीं, उनका असली एयरफोर्स वन दूसरे रास्ते से भेजा गया था, ताकि लोगों को पता न चले कि राष्ट्रपति किस विमान में हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ईरान से मिले विश्वसनीय खतरे के इनपुट के बाद यह पूरा सुरक्षा ऑपरेशन कुछ ही घंटों में तैयार किया गया था। ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल डैन केन और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ समेत कुछ चुनिंदा अधिकारी इसमें शामिल थे। कतर से मिले नए विमान की सुरक्षा पर भी सवाल उठे ट्रम्प जिस बोइंग 747-8 विमान से तुर्किये पहुंचे थे, वह कतर के शाही परिवार ने पिछले साल अमेरिका को दिया था। अमेरिकी डिफेंस कंपनी L3 हैरिस टेक्नोलॉजीज ने इसे राष्ट्रपति के सफर के लिए तैयार किया है। ट्रम्प ने पहली बार इस विमान का इस्तेमाल 1 जुलाई को नॉर्थ डकोटा जाने के लिए किया था। कुछ दिन बाद वे इसी विमान से अपनी पहली विदेश यात्रा पर तुर्किये पहुंचे। इस विमान की सुरक्षा को लेकर पहले से सवाल उठते रहे हैं। अमेरिकी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, पुराने एयरफोर्स वन में राष्ट्रपति को हमले से बचाने के लिए कुछ खास सुरक्षा इंतजाम हैं, जो कतर से मिले विमान में नहीं हैं या उनकी क्षमता अलग है। व्हाइट हाउस ने कहा- नए विमान की सुरक्षा में कोई कमी नहीं कतर से मिले वाले विमान की सुरक्षा पर सवालों के जवाब में व्हाइट हाउस के कम्युनिकेशन डायरेक्टर स्टीव चेउंग ने कहा कि इस विमान में ट्रम्प और उनके साथ मौजूद लोगों की सुरक्षा के लिए खास इंतजाम किए गए हैं। उन्होंने कहा, अमेरिका के कई दुश्मन ट्रम्प को निशाना बनाना चाहते हैं। इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए हम हर जरूरी तरीका अपनाते हैं। यानी व्हाइट हाउस ने यह नहीं माना कि नए विमान में सुरक्षा की कोई कमी थी। उसका कहना है कि ट्रम्प की सुरक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर अलग-अलग तरीके अपनाए जा सकते हैं। पेंटागन यानी अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस मामले पर तुरंत कोई जवाब नहीं दिया।

अमेरिकी अधिकारी बोले- मोदी-ट्रम्प टैरिफ का मुद्दा सुलझाएंगे:कहा- उनके बीच अच्छे संबंध; पहले अमेरिका में भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल पास हुआ था

अमेरिकी अधिकारी बोले- मोदी-ट्रम्प टैरिफ का मुद्दा सुलझाएंगे:कहा- उनके बीच अच्छे संबंध; पहले अमेरिका में भारत पर 100% टैरिफ वाला बिल पास हुआ था

अमेरिकी राष्ट्रपति के वरिष्ठ सलाहकार नवारो ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और पीएम मोदी के बीच बहुत अच्छे संबंध हैं। दोनों नेता रूसी तेल से जुड़े 100% टैरिफ के मुद्दे को आपस में सुलझा लेंगे। दरअसल, शुक्रवार को अमेरिकी सीनेट ने 86-11 के बहुमत से भारत समेत 5 देशों पर 100% तक का टैरिफ लगाने वाला बिल पास कर किया था। हालांकि, अभी ये कानून नहीं बना है। अभी इसे अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में भेजा जाएगा। बिल के मुताबिक भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है। इसका मकसद रूस की तेल से होने वाली कमाई को कम करना है, ताकि उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर हो सके। पहले 500%टैरिफ का प्रस्ताव था 23 जुलाई को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100% कर दिया गया। ईरान के साथ ट्रेड करने वाली कंपनियों पर प्रतिबंध बढ़ेगा अगर यह कानून बन जाता है तो 1996 का ‘ईरान प्रतिबंध कानून’ 2031 तक बढ़ जाएगा। यह कानून उन गैर-अमेरिकी कंपनियों पर पाबंदी लगाता है जो ईरान के साथ व्यापार करती हैं। यह कानून इसी साल खत्म होने वाला था। इस बिल से अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार भी मिल जाएगा कि वे अमेरिका में आने वाले रूसी सामान पर 500% तक टैरिफ लगा सकें। राष्ट्रपति का यह अधिकार 5 साल तक लागू रहेगा। व्हाइट हाउस ने पहले भी रूस पर पाबंदियां लगाने की कोशिश की थी। लेकिन ईरान युद्ध के दौरान जब होर्मुज बंद हुआ, तो तेल का संकट आ गया। इस वजह से अमेरिकी प्रशासन को तेल की बिक्री पर कुछ समय के लिए छूट देनी पड़ी थी। भारत ने जून में आधे से ज्यादा तेल रूस से खरीदा भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4% था। यानी पिछले महीने भारत में आयात होने वाले हर दो बैरल तेल में एक से ज्यादा बैरल रूस से आया। रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। मई के मुकाबले जून में रूस से तेल आयात में करीब 39% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। यह बिल कानून बना तो भारत पर असर पहली स्थिति: भारत रूस से तेल खरीदता रहे अमेरिका के 100% टैरिफ का सीधा असर भारत के निर्यात बिल पर पड़ सकता है। इससे भारतीय सामान अमेरिका में दोगुना महंगा हो जाएगा। अमेरिकी खरीदार सस्ता विकल्प ढूंढेंगे जैसे बांग्लादेश, वियतनाम, मैक्सिको, चीन। नतीजतन भारत के टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स, लेदर, समुद्री उत्पाद, केमिकल्स आदि के ऑर्डर घट जाएंगे। दूसरी स्थिति: भारत रूस को छोड़कर दूसरे देशों से तेल खरीदे तो रूस से आने वाले तेल पर प्रतिबंध या टैरिफ का दबाव बढ़ता है, तो भारत को दूसरे देशों से तेल खरीदना पड़ेगा। यह महंगा पड़ सकता है, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है। अमेरिका के प्रतिबंध पूरे असरदार नहीं अमेरिका के प्रतिबंध और टैरिफ से कई देशों की अर्थव्यवस्था और कारोबार पर असर पड़ा, लेकिन राजनीतिक मकसद हमेशा पूरे नहीं हुए। 1. क्यूबा: 1960 से अमेरिका ने 1960 में क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। छह दशक से ज्यादा समय बीतने के बाद भी ये प्रतिबंध क्यूबा की सरकार को बदलने में सफल नहीं हुए। क्यूबा ने 2023 में संयुक्त राष्ट्र में कहा कि इन प्रतिबंधों से उसे अब तक 159 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ है। 2. इराक: 1990 से इराक पर 1990 में आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए। इनका उसकी अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जिंदगी पर बड़ा असर पड़ा। तेल से होने वाली कमाई और जरूरी सामान के आयात पर असर पड़ा। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में प्रतिबंधों के दौरान भूख, बीमारी और गरीबी बढ़ने की बात कही गई। 3. ईरान: 2012 से 2012 में कड़े प्रतिबंध लगाए जाने के बाद ईरान का तेल निर्यात करीब 10 लाख बैरल प्रतिदिन घट गया। उसकी अर्थव्यवस्था लगातार दो साल तक मंदी में रही। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, 2012-14 के दौरान प्रतिबंधों से ईरान के निर्यात को 17.1 अरब डॉलर, यानी उसकी GDP के करीब 4.5% का नुकसान हुआ। 4. चीन: 2018 से अमेरिका ने 2018 में चीन से आने वाले करीब 250 अरब डॉलर के सामान पर अतिरिक्त शुल्क (टैरिफ) लगाया। 2019 में चीन से अमेरिका आने वाला सामान 16.2% घटकर 452.2 अरब डॉलर रह गया और दोनों देशों के बीच व्यापार घाटा 17.6% कम हुआ। लेकिन अमेरिकी व्यापार आयोग के मुताबिक, इन टैरिफ का ज्यादातर खर्च अमेरिकी कंपनियों और खरीदारों ने उठाया। 5. रूस: 2022 से यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और दूसरे देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इससे रूस के लिए विदेशों से पैसा जुटाना, कारोबार करना और जरूरी तकनीक हासिल करना मुश्किल हुआ। IMF ने अप्रैल 2022 में अनुमान लगाया था कि उस साल रूस की अर्थव्यवस्था 8.5% घट सकती है। लेकिन रूस ने तेल समेत अपना सामान दूसरे देशों में बेचकर नुकसान को कुछ कम कर लिया। —————————– ये खबर भी पढ़ें… UK की व्हिस्की, कारें और ब्यूटी प्रोडक्ट्स सस्ते मिलेंगे:भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट आज से लागू, जानें किन चीजों के दाम बदलेंगे भारत में UK की कारें, व्हिस्की, कपड़े और फुटवियर आज से सस्ते मिलेंगे। आज से भारत-UK के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट लागू हो गया है। यानी अब भारत के 99% सामानों को UK में जीरो टैरिफ पर निर्यात किया जाएगा। वहीं UK के 99% सामान 3% एवरेज टैरिफ पर आयात होंगे। पूरी खबर यहां पढ़ें…

दावा- अरुणाचल में चीनी घुसपैठ की बात झूठी:पड़ोसी देश की हरकतों पर भारतीय सेना की नजर; विदेश मंत्रालय बोला- अरुणाचल हमारा अटूट हिस्सा

दावा- अरुणाचल में चीनी घुसपैठ की बात झूठी:पड़ोसी देश की हरकतों पर भारतीय सेना की नजर; विदेश मंत्रालय बोला- अरुणाचल हमारा अटूट हिस्सा

अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सेना के सूत्रों ने दावा किया कि चीनी घुसपैठ की बातें झूठी हैं। ANI की रिपोर्ट के मुताबिक सेना ने मंगलवार को कहा कि सेना और भारत तिब्बत सीमा पुलिस लगातार चीन की हरकतों पर नजर रखे हुए है और सोशल मीडिया पर किए जा रहे घुसपैठ के दावे गलत हैं। विदेश मंत्रालय (MEA) ने भी कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अटूट हिस्सा है। MEA ने यह बात चीन की ओर से अरुणाचल प्रदेश के स्थानों को चीनी नाम देने की कोशिशों के बीच कही है। चीन अरुणाचल को ‘साउथ तिब्बत’ बताता रहा है ANI के मुताबिक, चीन अरुणाचल प्रदेश पर ‘साउथ तिब्बत’ के नाम से दावा करता रहा है। 1960 की सीमा वार्ता में चीन ने अरुणाचल प्रदेश की करीब 69,000 वर्ग किमी जमीन पर दावा किया था। भारत ने चीन के इस दावे को कई बार खारिज किया है। भारत सरकार ने शुक्रवार को अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों और उनकी भौगोलिक विशेषताओं को आधिकारिक नक्शे पर दर्ज किया था। इस पर चीन ने कहा कि भारत का अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों को अपने मैप पर दिखाना गलत है। यह अमान्य’ है। चीन अरुणाचल की जगहों के नाम जारी करता रहा है चीन ने कई बार अरुणाचल प्रदेश की जगहों के चीनी नामों की सूची जारी करता रहा है। वह अरुणाचल प्रदेश को जांगनान कहता है भारत ने चीन की इन कोशिशों को लगातार खारिज किया है। भारत का कहना है कि इनका भारत की राज्य पर संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ता।

हूती विद्रोहियों का सऊदी जहाज पर मिसाइल हमला:2 पाकिस्तानी समेत 3 की मौत; रेड सी में अब तक 8 जहाजों को निशाना बनाया

हूती विद्रोहियों का सऊदी जहाज पर मिसाइल हमला:2 पाकिस्तानी समेत 3 की मौत; रेड सी में अब तक 8 जहाजों को निशाना बनाया

यमनी सरकार से जुड़े मीडिया के मुताबिक, ईरान समर्थित हूतियों ने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में एक जहाज पर हमला किया। इस हमले में तीन क्रू मेंबर मारे गए, जिनमें दो पाकिस्तानी और एक इंडोनेशियाई नागरिक था। यमनी सरकार समर्थित मीडिया ने मंगलवार को यह जानकारी दी। अल-जुम्हूरिया टीवी ने बताया कि यमन के हूतियों के हमले में दो पाकिस्तानी और एक इंडोनेशियाई नागरिक की मौत हुई है। जहाज का नाम नहीं बताया गया अल-जुम्हूरिया टीवी ने हमले में निशाना बनाए गए जहाज का नाम नहीं बताया। ईरान की समाचार एजेंसी आईएसएनए के मुताबिक, यह सऊदी जहाज था और उसे मिसाइल से निशाना बनाया गया। सऊदी अरब की नाकाबंदी का ऐलान करने के बाद हूती संगठन उसके आसपास के समुद्री इलाकों में जहाजों पर हमले कर रहा है। संगठन ने सऊदी अरब के अंदर भी हमले किए हैं। इन हमलों का केंद्र बाब अल-मंदेब स्ट्रेटरहा है। यह जलमार्ग लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। लाल सागर में जहाजों की आवाजाही पर असर हूतियों के हमलों से सऊदी अरब का तेल निर्यात प्रभावित हुआ है। समुद्री यातायात पर भी असर पड़ा है, जिसके चलते जहाज सुरक्षा कारणों से लाल सागर और स्वेज नहर से बच रहे हैं। अब जहाज पश्चिमी देशों तक पहुंचने के लिए अफ्रीका के चारों ओर से जा रहे हैं। इससे सामान की डिलीवरी धीमी हो रही है, सामान की कमी बढ़ रही है, सप्लाई लाइन का संकट बन रहा है और रोजमर्रा का खर्च बढ़ रहा है। यमन में ईरान और सऊदी अरब आमने-सामने ईरान और सऊदी अरब यमन में छद्म युद्ध लड़ रहे हैं। दोनों देश वहां विरोधी पक्षों का समर्थन करते हैं। सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन करता है, जबकि ईरान हूतियों के साथ है। हूती संगठन यमन के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखता है। हूतियों ने 2023 और 2024 में भी लाल सागर में नियमित रूप से जहाजों पर हमले किए थे। इससे समुद्री यातायात पर असर पड़ा था। इस समय हूतियों के हमलों का असर इसलिए ज्यादा महसूस हो रहा है, क्योंकि दुनिया पहले से ही होर्मुज स्ट्रेटके बंद होने से जूझ रही है। होर्मुज और स्वेज नहर में यातायात धीमा ईरान जहाजों को होर्मुज स्ट्रेटसे गुजरने की अनुमति नहीं दे रहा है। वहीं, हूती संगठन अब लाल सागर से गुजरने वाले जहाजों पर हमला कर रहा है। दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की आवाजाही होर्मुज स्ट्रेटसे होती है। लाल सागर में मौजूद स्वेज नहर पूर्वी गोलार्ध को पश्चिमी गोलार्ध से जोड़ती है। अब दोनों जलमार्गों में जहाजों की आवाजाही बहुत धीमी हो गई है।

हाईटेक चीन में ‘मान्यताओं’ से तय होते करोड़ों के प्रोजेक्ट:सरकारी से लेकर सैन्य अफसर तक परंपराओं में उलझे; सैकड़ों, हाईवे-पुल प्रभावित

हाईटेक चीन में ‘मान्यताओं’ से तय होते करोड़ों के प्रोजेक्ट:सरकारी से लेकर सैन्य अफसर तक परंपराओं में उलझे; सैकड़ों, हाईवे-पुल प्रभावित

चीन की युआनयांग में नए औद्योगिक पार्क और उससे जुड़ने वाले फोर-लेन हाईवे की योजना मंजूर हो चुकी थी। इंजीनियर नक्शे व बजट को अंतिम रूप दे चुके थे, पर शिलान्यास से पहले ताओवादी फेंग शुई मास्टर ने दावा किया कि प्रस्तावित मार्ग की उत्तर-पूर्व दिशा ली वेई की जन्मतिथि के अनुसार अशुभ है और इससे करिअर प्रभावित हो सकता है। इसके बाद वेई ने हाईवे का रूट बदलवा दिया। इसके लिए अतिरिक्त जमीन लेनी पड़ी। प्रोजेक्ट 14 महीने लेट हुआ और 21 करोड़ रुपए लागत बढ़ गई। इसी तरह जियांग्शी प्रांत में पुल का निर्माण 20% हो चुका था। इसी दौरान अधिकारी झेंग गुआंगझोउ ने फेंग शुई सलाहकार से परामर्श लिया। सलाहकार ने दावा किया कि पुल का पिलर क्षेत्र की कथित ‘ड्रैगन वेंस’ (प्राकृतिक ऊर्जा) को काट रहा है, जिससे झेंग को जेल हो सकती है। उन्होंने निर्माण रुकवा दिया और पिलर 50 मीटर आगे बढ़वा दिया। पहले से बने पिलर भी तोड़ने पड़े। प्रोजेक्ट दो साल तक अटका रहा और 29 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। चीन में फेंग शुई और कई मान्यताएं सिर्फ घरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई प्रशासनिक फैसलों और ​प्रोजेक्ट को भी प्रभावित कर रही है। दिलचस्प यह है कि इन मान्यताओं का खुलकर विरोध करने वाली ‘कम्युनिस्ट पार्टी’ के अफसर और मेयर ही इनके घोर समर्थक बने हुए हैं। ​वॉल स्ट्रीट की रिपोर्ट के अनुसार इन मान्यताओं के कारण बीते एक दशक में सैकड़ों हाईवे, पुल व औद्योगिक पार्क प्रभावित हुए। नक्शे बदलने व तोड़-फोड़ से प्रोजेक्ट्स 3 से 4 साल लेट हुए। एक ही मामले में 23 में से 16 बड़े प्रोजेक्ट बीच में ही रद्द या ठप कर दिए गए। सेना को ऑडिट कराना पड़ा – चीन की सबसे संवेदनशील रॉकेट फोर्स और रक्षा तंत्र में हुई बड़ी कार्रवाई के पीछे भ्रष्टाचार के अलावा इन पारंपरिक मान्यताओं को भी बड़ी वजह बताया गया। जांच में पता चला कि कुछ वरिष्ठ अधिकारी आधुनिक सैन्य जरूरतों के बजाय ताओवादी भविष्यवाणियों (ताओ धर्म की विद्या के आधार पर अनुमान) प्राचीन ग्रंथों और गणनाओं के आधार पर फैसले ले रहे थे। इनके चलते कई रक्षा प्रोजेक्ट्स व रणनीतिक ढांचों की मंजूरी में महीनों की देरी हुई। हालात इतने गंभीर हो गए कि 2023-24 में चीन को रक्षा बजट और प्रमुख प्रोजेक्ट्स का ऑडिट कराना पड़ा। ‘अशुभ दिशा’ मानकर निवेश कम, जीडीपी औसतन 2.3% कम बोस्टन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने 2000 से 2018 के बीच 300 चीनी मेयरों की जन्मतिथियों व उनकी कथित ‘अशुभ’ दिशाओं की स्टडी की। ताकि पता चल सके कि वे जन्मतिथि व मान्यताओं के आधार पर किस तरह फैसले लेते हैं। नतीजे चौंकाने वाले थे। जिन क्षेत्रों को मेयर अशुभ दिशा में मानते थे, वहां कम निवेश करते थे। इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा और उन जिलों की जीडीपी औसतन 2.3% कम रही। रोजगार व निजी निवेश भी घटे। इससे चीन को हर साल कुल जीडीपी का 0.1% का घाटा हुआ। दस साल में यह नुकसान 15 लाख करोड़ रु. रहा।

सीरिया में पूर्व राष्ट्रपति असद को फांसी की सजा:लाखों लोगों की मौत के जिम्मेदार पाए गए; ममेरे भाई को पिंजरे में कोर्ट लाया गया

सीरिया में पूर्व राष्ट्रपति असद को फांसी की सजा:लाखों लोगों की मौत के जिम्मेदार पाए गए; ममेरे भाई को पिंजरे में कोर्ट लाया गया

सीरिया की एक अदालत ने मंगलवार को देश के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद और उनके छोटे भाई माहेर अल-असद को फांसी की सजा सुनाई। दोनों को मानवता के खिलाफ अपराध और युद्ध अपराध के मामले में यह सजा मिली। इसी मामले में बशर अल-असद के मामा के बेटे अतीफ नजीब को भी फांसी की सजा सुनाई गई। बशर और माहेर दिसंबर 2024 में सत्ता गिरने के बाद रूस भाग गए थे। पुतिन सरकार ने उन्हें शरण दी हुई है। ऐसे में दोनों की गैरमौजदगी में यह सजा सुनाई गई। भाई अतीफ नजीब रूस नहीं भाग पाए थे अतीफ नजीब रूस नहीं भाग पाए थे। उन्हें जनवरी 2025 में गिरफ्तार कर लिया गया था। अतीफ मंगलवार को अदालत में पेश हुए। वह असद सरकार के सबसे बड़े अधिकारियों में से एक हैं, जिन पर अदालत में मुकदमा चला। अतीफ को कैदी की वर्दी पहनाकर पिंजरे में लाया गया था, जहां उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। अतीफ नजीब सीरियाई सेना में ब्रिगेडियर जनरल रह चुके हैं। 2011 में वे दारा प्रांत में राजनीतिक सुरक्षा शाखा के प्रमुख थे। अतीफ पर आरोप है कि 2011 में सीरिया के दारा राज्य में प्रदर्शनकारियों पर सख्ती से निपटने का आदेश दिया था। उनके आदेश के बाद ही पूरे सीरिया में विरोध प्रदर्शन और उग्र हो गया जो बाद में 14 साल तक चलता रहा। इस गृहयुद्ध में करीब 5 लाख लोगों की मौत हुई। सुरक्षा के बीच पिंजरे में खड़ा था नजीब सुनवाई के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। नजीब कैदियों की वर्दी पहनकर पिंजरे के अंदर खड़ा था, तभी जज ने सजा सुनाई। नजीब को बाद में गिरफ्तार किया गया था। वह मुकदमे का सामना करने वाले सबसे ऊंचे पद वाले अधिकारियों में शामिल है। 2011 में दरा में राजनीतिक सुरक्षा शाखा का प्रमुख था आतिफ नजीब सीरियाई सेना में ब्रिगेडियर जनरल रह चुका है। 2011 में वह असद के शासन के दौरान दक्षिणी सीरिया के दरा प्रांत में राजनीतिक सुरक्षा शाखा का प्रमुख था। असद और उनके भाई माहेर दिसंबर 2014 में विद्रोहियों के दमिश्क में पहुंचने के बाद रूस भाग गए थे।

सीरिया में पूर्व राष्ट्रपति असद को फांसी की सजा:लाखों लोगों की मौत के जिम्मेदार पाए गए; ममेरे भाई को पिंजरे में कोर्ट लाया गया

सीरिया में पूर्व राष्ट्रपति असद को फांसी की सजा:लाखों लोगों की मौत के जिम्मेदार पाए गए; ममेरे भाई को पिंजरे में कोर्ट लाया गया

सीरिया की एक अदालत ने मंगलवार को देश के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल-असद और उनके छोटे भाई माहेर अल-असद को फांसी की सजा सुनाई। दोनों को मानवता के खिलाफ अपराध और युद्ध अपराध के मामले में यह सजा मिली। इसी मामले में बशर अल-असद के मामा के बेटे अतीफ नजीब को भी फांसी की सजा सुनाई गई। बशर और माहेर दिसंबर 2024 में सत्ता गिरने के बाद रूस भाग गए थे। पुतिन सरकार ने उन्हें शरण दी हुई है। ऐसे में दोनों की गैरमौजदगी में यह सजा सुनाई गई। अतीफ नजीब रूस नहीं भाग पाए थे। उन्हें जनवरी 2025 में गिरफ्तार कर लिया गया था। अतीफ मंगलवार को अदालत में पेश हुए। सुनवाई के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। उनको कैदी की वर्दी पहनाकर पिंजरे में लाया गया था। अतीफ के आदेश के बाद सीरिया में गृहयुद्ध भड़का था अतीफ नजीब सीरियाई सेना में ब्रिगेडियर जनरल रह चुके हैं। 2011 में वे दारा प्रांत में राजनीतिक सुरक्षा शाखा के प्रमुख थे। वह असद सरकार के सबसे बड़े अधिकारियों में से एक हैं, जिन पर अदालत में मुकदमा चला। अतीफ पर आरोप है कि 2011 में सीरिया के दारा राज्य में प्रदर्शनकारियों पर सख्ती से निपटने का आदेश दिया था। उनके आदेश के बाद ही पूरे सीरिया में विरोध प्रदर्शन और उग्र हो गया जो बाद में 14 साल तक चलता रहा। इस गृहयुद्ध में करीब 5 लाख लोगों की मौत हुई। कैसे शुरू हुआ सीरिया का गृहयुद्ध? दिसंबर 2024 में सत्ता से हटे असद उत्तर-पश्चिमी प्रांत इदलिब से विद्रोही ताकतों ने हमला शुरू किया और तेजी से दमिश्क की ओर बढ़ीं। 8 दिसंबर 2024 को विरोधी ताकतें दमिश्क पहुंच गईं। इसके बाद असद परिवार के पांच दशक से ज्यादा लंबे शासन का अंत हो गया। दिसंबर 2024 में असद सत्ता से हट गए थे। असद अपने परिवार के साथ सीरिया छोड़कर रूस चले गए। रूस ने उन्हें शरण दी। अदालत में उनके खिलाफ सुनवाई उनकी गैरमौजूदगी में हुई। उनके छोटे भाई माहेर असद भी सीरिया से बाहर हैं।

10 और 20 रुपए के पॉलीमर नोटों को मंजूरी:फील्ड ट्रायल में दोनों के 100-100 करोड़ नोट जारी होंगे, सफल होने पर नियमित जारी होंगे

10 और 20 रुपए के पॉलीमर नोटों को मंजूरी:फील्ड ट्रायल में दोनों के 100-100 करोड़ नोट जारी होंगे, सफल होने पर नियमित जारी होंगे

नई दिल्ली, 11 अगस्त, मंगलवार। सरकार ने 10 और 20 रुपए के पॉलीमर बैंकनोट के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी है। दोनों मूल्यवर्ग के 100-100 करोड़ पॉलीमर नोट जारी किए जाएंगे। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने मंगलवार को राज्यसभा में लिखित जवाब में यह जानकारी दी। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपने केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश पर RBI एक्ट, 1934 की धारा 25 के तहत सरकार को यह प्रस्ताव भेजा था। सफल ट्रायल के बाद नियमित जारी होंगे नोट RBI ने 10 और 20 रुपए के 100-100 करोड़ पॉलीमर नोटों के फील्ड ट्रायल का प्रस्ताव दिया था। ट्रायल सफल होने के बाद इन दोनों मूल्यवर्ग के पॉलीमर नोट नियमित रूप से जारी करने की योजना है। वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। RBI के मुताबिक, पॉलीमर नोट कागज से बने नोटों के साथ जारी किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि पॉलीमर नोटों की खरीद की प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है। इसलिए फिलहाल इनके जारी होने की सही समय सीमा और इस पर होने वाले खर्च का व्यावहारिक तौर पर आकलन करना संभव नहीं है। महंगाई 2025-26 में घटकर 2.1% रही एक अन्य सवाल के जवाब में सीतारमन ने बताया कि कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) से मापी जाने वाली औसत खुदरा महंगाई 2023-24 में 5.4% से घटकर 2024-25 में 4.6% और 2025-26 में 2.1% रह गई। उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया संकट से जिंसों की कीमतों में आए झटके और दुनिया भर में ऊर्जा की ऊंची कीमतों के कारण महंगाई बढ़ी। सब्जियों की कीमतों में मौसमी तेजी और अल नीनो की प्रतिकूल परिस्थितियों की आशंका से 2026-27 की पहली तिमाही में खुदरा महंगाई बढ़कर 3.9% हो गई। हालांकि, यह अब भी RBI के 4% महंगाई लक्ष्य से कम है। GST में 18%, 5% और 40% की दरें वित्त मंत्री ने कहा कि GST काउंसिल की 56वीं बैठक में दो-दर वाला ढांचा लाया गया है। इसमें सामान्य दर 18%, मेरिट दर 5% और कुछ चुनिंदा वस्तुओं व सेवाओं के लिए विशेष डिमेरिट दर 40% रखी गई है। उन्होंने कहा कि 40% की दर में पहले का मुआवजा उपकर भी शामिल है। इसलिए कुल टैक्स बोझ में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। इस बदलाव से कई वस्तुओं और सेवाओं की दरों को 28% से घटाकर 18%, 18% से घटाकर 12% या 5% और 12% से घटाकर 5% या शून्य किया गया है। पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 10 रुपए घटी सीतारमन ने कहा कि इनपुट लागत कम करने, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने, निर्यात प्रतिस्पर्धा मजबूत करने और रणनीतिक क्षेत्रों को समर्थन देने के लिए सरकार ने कई वस्तुओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) में बदलाव किया। केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित ये बदलाव 2 फरवरी 2026 से लागू हुए। जरूरी वस्तुओं की कीमतों का दबाव कम करने के लिए क्रूड पाम ऑयल, क्रूड सोयाबीन ऑयल और क्रूड सनफ्लावर ऑयल पर BCD घटाई गई। इसके अलावा, मसूर पर कृषि इन्फ्रास्ट्रक्चर और डेवलपमेंट सेस कम किया गया। मार्च 2026 में पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय एक्साइज ड्यूटी 10 रुपए प्रति लीटर घटाई गई। 12 लाख रुपए तक की सालाना आय पर टैक्स छूट वित्त मंत्री ने कहा कि अप्रत्यक्ष करों में सुधार के साथ सरकार ने लोगों की खर्च करने योग्य आय भी बढ़ाई है। सालाना 12 लाख रुपए तक की आय को इनकम टैक्स से छूट दी गई है। सैलरी पाने वाले लोगों के लिए स्टैंडर्ड डिडक्शन के बाद 12.75 लाख रुपए तक की सालाना आय टैक्स से मुक्त है। उन्होंने कहा कि इन उपायों से घरेलू खपत को समर्थन मिला है। GDP में निजी अंतिम उपभोग खर्च का हिस्सा 2022-23 के आधार वर्ष पर 56.5% से 56.7% के बीच लगभग स्थिर रहा। सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के जारी ताजा GDP अनुमान के मुताबिक, 2025-26 में प्रति व्यक्ति निजी अंतिम उपभोग खर्च (PFCE) 6.8% बढ़ा। 2023-24 में इसकी वृद्धि 4.8% रही थी। सीतारमन ने कहा कि सरकार देश में कीमतों की स्थिति पर लगातार नजर रखती है। बदलती आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार लोगों की क्रय शक्ति बचाने के लिए वित्तीय, प्रशासनिक और सप्लाई से जुड़े कदम उठाए जाते हैं। उन्होंने कहा कि इन उपायों का खास ध्यान निम्न और मध्यम आय वाले परिवारों पर रहता है।

10 और 20 रुपए के पॉलीमर नोटों को मंजूरी:वित्त मंत्री बोलीं- ट्रायल में दोनों के 100-100 करोड़ नोट छपेंगे, ये 30 साल तक चलेंगे

10 और 20 रुपए के पॉलीमर नोटों को मंजूरी:वित्त मंत्री बोलीं- ट्रायल में दोनों के 100-100 करोड़ नोट छपेंगे, ये 30 साल तक चलेंगे

सरकार ने 10 और 20 रुपए के पॉलीमर बैंक नोट के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दे दी है। दोनों के 100-100 करोड़ पॉलीमर नोट जारी किए जाएंगे। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने मंगलवार को राज्यसभा में लिखित जवाब में यह जानकारी दी। सफल ट्रायल के बाद नियमित जारी होंगे नोट RBI ने 10 और 20 रुपए के 100-100 करोड़ पॉलीमर नोटों के फील्ड ट्रायल का प्रस्ताव दिया था। ट्रायल सफल होने के बाद इन दोनों के पॉलीमर नोट नियमित रूप से जारी किए जाएंगे। वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ने प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। RBI के मुताबिक, पॉलीमर नोट कागज से बने नोटों के साथ जारी किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि पॉलीमर नोटों की खरीद की प्रक्रिया अभी शुरुआती चरण में है। इसलिए फिलहाल इनके जारी होने की सही समय सीमा बता पाना संभव नहीं है। सवाल-जवाब में जानें इस खबर से जुड़ी जरूरी बातें… सवाल 1: पॉलीमर नोट क्या होते हैं और सरकार इन्हें क्यों ला रही? जवाब: पॉलीमर बैंकनोट्स कागज के बजाय एक खास किस्म के प्लास्टिक मटेरियल यानी पॉलीमर सबस्ट्रेट पर छापे जाते हैं। ये छूने में तो सामान्य नोटों जैसे ही हल्के होते हैं, लेकिन पानी में भीगने पर भी नहीं गलते और लंबे समय तक चलते हैं। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में बताया था कि ये नोट दुनिया के कई देशों जैसे ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा में पॉलीमर करेंसी नोट 30 साल से भी अधिक समय तक सफलतापूर्वक उपयोग में रहे हैं। इन्हें लाने की मुख्य वजहें- लंबी उम्र: ये नोट पानी, धूल और गंदगी से खराब नहीं होते और आसानी से फटते भी नहीं हैं। नकली नोटों पर लगाम: पॉलीमर शीट पर एडवांस सिक्योरिटी फीचर्स आसानी से जोड़े जा सकते हैं, जिससे नकली नोट बनाना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। छपाई खर्च में बचत: कागजी नोट जल्दी खराब होते हैं, जिससे छपाई का खर्च बढ़ता है। FY25 में आरबीआई ने कागजी नोटों की छपाई पर ₹6,372.8 करोड़ खर्च किए थे। पॉलीमर नोट लंबे चलेंगे, जिससे बार-बार छापने का खर्च घटेगा। सवाल 2: क्या पुराने कागजी नोट बंद हो जाएंगे? जवाब: बिल्कुल नहीं। सरकार और आरबीआई ने पूरी तरह साफ किया है कि पॉलीमर नोट आने से पुराने कागजी नोट चलन से बाहर नहीं होंगे। सर्कुलेशन जारी रहेगा: जब तक नए नोट पूरी तरह स्थापित नहीं होते, तब तक कागजी नोट सर्कुलेशन में बने रहेंगे। सवाल 3: पॉलीमर नोट का प्रस्ताव कब आया था? जवाब: भारत ने 2012 में पहली बार नोटों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए पॉलीमर नोट लाने का प्रयास किया था, लेकिन तकनीकी वजहों से प्रोजेक्ट रुक गया था। मई-जून : मीडिया रिपोर्ट्स और आरबीआई की रिपोर्ट में शेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए पॉलीमर नोटों पर विचार की बात आई। जून में RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने पुष्टि की कि पॉलीमर नोटों का प्रस्ताव विचाराधीन है और इसके नफा-नुकसान का वैल्यूएशन किया जा रहा है। सवाल 4: दुनिया के किन देशों में प्लास्टिक नोट चलते हैं? दुनिया के 60 से ज्यादा देशों में पॉलीमर बैंकनोट्स चलन में शामिल किए जा चुके हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम (यूके) और न्यूजीलैंड जैसे देश शामिल हैं। सवाल 5: भारत में कब-कब नोट बदले गए? जवाब: आजादी से लेकर अब तक भारत में बड़े पैमाने पर 3 बार नोटबंदी या बड़े मूल्य के नोटों को बंद करने का फैसला लिया गया है… 1. पहली बार – जनवरी 1946 (ब्रिटिश काल/आजादी से ठीक पहले): क्या हुआ: तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने ₹500, ₹1000 और ₹10,000 के बड़े नोटों को बंद कर दिया था। मकसद: काले धन और युद्ध के दौरान हुई अवैध कमाई को बाहर निकालना। बाद में: 1954 में सरकार ने ₹1,000, ₹5,000 और ₹10,000 के नोट फिर से शुरू किए थे। 2. दूसरी बार – जनवरी 1978 (मोरारजी देसाई सरकार): क्या हुआ: जनता पार्टी की सरकार ने ₹1,000, ₹5,000 और ₹10,000 के बड़े नोटों को बंद कर दिया। मकसद: चुनाव में होने वाले काले धन के इस्तेमाल और भ्रष्टाचार को रोकना। 3. तीसरी बार – 8 नवंबर 2016 (नरेंद्र मोदी सरकार): क्या हुआ: रात 8 बजे प्रधानमंत्री मोदी ने देश में चल रहे ₹500 और ₹1,000 के नोटों को रातों-रात अमान्य घोषित कर दिया। बदलाव: इनकी जगह ₹500 का नया नोट और पहली बार ₹2,000 का नया नोट जारी किया गया। ₹2000 के नोट की वापसी (मई 2023): 19 मई 2023 को RBI ने ‘क्लीन नोट पॉलिसी’ के तहत ₹2,000 के नोट को चलन (सर्कुलेशन) से वापस लेने का ऐलान किया। हालांकि इसे नोटबंदी नहीं कहा गया क्योंकि इसे बैंक में जमा करने या बदलने का समय दिया गया था।

दुनिया का ब्यूटी हब बन रहा दक्षिण कोरिया:लोगों के आइडिया से तैयार प्रोडक्ट महज तीन माह में जमीन पर उतार रहीं मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां

दुनिया का ब्यूटी हब बन रहा दक्षिण कोरिया:लोगों के आइडिया से तैयार प्रोडक्ट महज तीन माह में जमीन पर उतार रहीं मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां

जरा सोचिए, आपके पास किसी स्किनकेयर प्रोडक्ट का आइडिया हो और महज 3 महीने में वह लॉन्च हो जाए। न तो फैक्ट्री लगाने की जरूरत पड़ी और न ही रिसर्च लैब की। यही मॉडल दक्षिण कोरिया की ब्यूटी इंडस्ट्री (K-ब्यूटी) को ग्लोबल पावरहाउस बना रहा है। इसका कारोबारी ढांचा दिग्गज सेमीकंडक्टर कंपनी टीएसएमसी जैसा है। जैसे टीएसएमसी दूसरों (जैसे एपल) के डिजाइन पर चिप बनाती है, वैसे ही ओडीएम (ओरिजिनल डिजाइन मैन्युफैक्चरर) कंपनियां नए ब्रांड्स के आइडिया को प्रोडक्ट में बदल रही हैं। इस बिजनेस मॉडल के केंद्र में कोलमार कोरिया और कॉसमैक्स जैसी कंपनियां हैं, जो खुद का कोई कंज्यूमर ब्रांड नहीं बेचतीं। इनका काम रिसर्च, प्रोडक्ट डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग तक सीमित है। कोलमार ने 2024 में ऐसा सिस्टम बनाया, जिससे आइडिया को तैयार प्रोडक्ट में बदलने का समय 9-12 महीने से घटकर सिर्फ 3 महीने रह गया। इनके पास हमेशा 150 से अधिक सेमी-फिनिश्ड प्रोडक्ट्स का कैटलॉग रहता है, जिससे नए उद्यमियों के लिए शुरुआती लागत और रिस्क कम हो जाते हैं। अनोखे बिजनेस मॉडल की बदौलत दक्षिण कोरिया में बिना अपनी फैक्ट्री के कॉस्मेटिक्स बिजनेस करने वाली कंपनियों की संख्या 2025 में बढ़कर 28,412 हो गई। यह एक दशक पहले की तुलना में 4 गुना अधिक है। मैडेका क्रीम और मैन्यो जैसी हिट स्किनकेयर लाइन्स इसी मॉडल की देन हैं। उत्पादन की जिम्मेदारी बाहरी कंपनियों पर होने से नए ब्रांड्स पूरा फोकस सिर्फ मार्केटिंग, ब्रांडिंग और बिक्री पर कर पाते हैं। इस मैन्युफैक्चरिंग मॉडल के दम पर दक्षिण कोरिया में कॉस्मेटिक्स उत्पादन 17.9 ट्रिलियन वॉन (1.19 लाख करोड़ रुपए) के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। 2025 में दक्षिण कोरिया का कॉस्मेटिक्स निर्यात 12% बढ़कर 1 लाख करोड़ रुपए से ऊपर निकल गया। इससे दक्षिण कोरिया अमेरिका को पछाड़कर फ्रांस के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ब्यूटी प्रोडक्ट निर्यातक बन गया। हालांकि, ‘के-ब्यूटी’ की इस जबरदस्त सफलता पर अब ‘सी-ब्यूटी’ का खतरा मंडराने लगा है। चीन की कंपनियां दक्षिण कोरिया का ही कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग मॉडल अपनाकर तेजी से नए ब्रांड्स लॉन्च कर रही हैं। जिस फॉर्मूले से कोरिया ग्लोबल लीडर बना, अब उसी फॉर्मूले की नकल करके चीन उसके सामने कड़ी प्रतिस्पर्धा पेश कर रहा है। सरकार की मदद से विस्तार की राह भी आसान सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग ही नहीं, दक्षिण कोरिया के सीजे ओलिव यंग जैसे रिटेल नेटवर्क्स ने भी नए ब्रांड्स को वैश्विक प्लेटफॉर्म दिया। इसके 1,400 से अधिक स्टोर्स पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं, जबकि इसका ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म 60 देशों में सर्विस दे रहा है। कोरियाई सरकार भी 2020 से कॉस्मेटिक्स को सेमीकंडक्टर और एंटरटेनमेंट की तरह प्रमुख एक्सपोर्ट सेक्टर मानकर सब्सिडी और लोन दे रही है। इससे इस सेक्टर के लिए विस्तार की राह असान हो गई है।