न्यूयॉर्क में भारतीय मूल की महिला को ट्रेन ने कुचला:दोस्त के साथ ट्रेक पर बैठी थी; ट्रेन ऑपरेटर बोला- महिला हंस रही थी

अमेरिका के न्यूयॉर्क में एक हादसे में भारतीय मूल की महिला और उसके नेपाली-अमेरिकी दोस्त की मौत हो गई। दोनों की उम्र 24 साल थी। वे लोअर मैनहट्टन के एक सबवे स्टेशन पर रेलवे ट्रैक पर बैठे थे। इसी दौरान वहां से गुजर रही ट्रेन ने दोनों को कुचल दिया। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में दोनों ट्रेन आने से कुछ सेकंड पहले ट्रैक पर शांति से बैठे दिखाई दे रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेन ऑपरेटर ने बताया कि उसने महिला को हंसते हुए देखा था। वह दोस्त को अपनी तरफ खींच रही थी। ट्रेन ऑपरेटर बोला- इमरजेंसी ब्रेक लगाने की कोशिश की थी यह घटना स्प्रिंग स्ट्रीट सबवे स्टेशन की है। न्यूयॉर्क पुलिस विभाग (NYPD) के मुताबिक, न्यू जर्सी के डेटन की रहने वाली मलाइका चित्रे और सेरेविल के रहने वाले नवम कौल रात करीब 3:15 बजे ट्रैक पर थे। इसी दौरान ट्रेन ने दोनों को टक्कर मार दी। इसी दौरान एक राहगीर ने घटना का वीडियो बना ली। ट्रेन ऑपरेटर ने बताया कि उसने इमरजेंसी ब्रेक लगाने की कोशिश की, लेकिन ट्रेन को समय रहते रोका नहीं जा सका। पुलिस के मुताबिक, दोनों की मौके पर ही मौत हो गई। न्यूयॉर्क डेली न्यूज के मुताबिक, हादसे के बाद ट्रेन में मौजूद करीब 100 यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। ट्रैक पर क्यों बैठे, इसकी जांच जारी अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि मलाइका और नवम आधी रात को रेलवे ट्रैक पर क्यों बैठे थे। इस मामले की जांच जारी है। न्यूयॉर्क पोस्ट के मुताबिक, जांचकर्ता यह भी पता लगा रहे हैं कि कहीं दोनों ने शराब या कोई दूसरी नशे की चीज तो नहीं ली थी। इससे संभव है कि उन्हें खतरे का अंदाजा समय रहते नहीं हुआ हो। मौके से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। हालांकि, जांचकर्ताओं ने आत्महत्या की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। नवम के दोस्त बोले- गलत कदम की कोई वजह नहीं थी नवम कौल के दोस्तों और जानने वालों ने उन्हें मिलनसार और खुशमिजाज इंसान बताया। लोगों के मुताबिक, वह अपने समुदाय में काफी पसंद किए जाते थे। नवम के एक दोस्त की मां ने न्यूयॉर्क पोस्ट से कहा कि दोनों एक ही माहौल में बड़े हुए थे। वे एक ही दोस्तों के ग्रुप और साउथ एशियन कम्युनिटी का हिस्सा थे। सभी साथ में घूमते और त्योहार मनाते थे। उनके मुताबिक, नवम की जिंदगी में ऐसा कुछ नहीं था जिससे लगे कि वह कोई गलत या बेवकूफी भरा कदम उठा सकते हैं। उन्होंने बताया कि नवम नेपाली मूल के थे। उनके माता-पिता करीब 30 साल पहले नेपाल से अमेरिका आकर बस गए थे। मलाइका की पड़ोसी बोले- वह बहुत होशियार और समझदार थीं मलाइका के परिवार के घर के पास रहने वाले एक पड़ोसी ने बताया कि वह बहुत होशियार और समझदार छात्रा थीं। पड़ोसी ने न्यूयॉर्क पोस्ट से कहा कि मलाइका की मौत की खबर सुनकर उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्हें अब भी समझ नहीं आ रहा कि आखिर दोनों रेलवे ट्रैक पर क्यों थे। NYPD के मुताबिक, दोनों की मौत के मामले में जांच अभी जारी है। ———————– यह खबर भी पढ़ें… जंगली कुत्ते मादा की तलाश में 4000 km घूमे जाम्बिया के काफ्यू नेशनल पार्क से निकले तीन अफ्रीकी जंगली कुत्तों ने साथी और नया इलाका तलाशने के लिए करीब 4,126 किमी का सफर तय किया। पूरी खबर पढ़ें…
टोयोटा हिलक्स हूती विद्रोहियों की पसंदीदा गाड़ी बनी:इस पर मशीनगन-रॉकेट लगाना आसान, 45 साल से दुनिया भर के आतंकियों की पहचान बना

यमन के लाल सागर तट पर पिछले हफ्ते हूती लड़ाकों के काफिले में टोयोटा हिलक्स पिकअप बड़ी संख्या में नजर आईं। इन पर मशीनगन और रॉकेट लगे थे। टोयोटा हिलक्स पिछले करीब 45 साल से दुनिया के अलग-अलग संघर्षों में विद्रोहियों और आतंकी संगठनों के बीच इस्तेमाल होती रही है। इसकी कम कीमत, मजबूत बनावट और आसानी से हथियार लगाने की वजह से यह आम गाड़ी युद्ध के मैदान में बेहद काम की साबित हुई है। हूती लड़ाकों ने यमन के लाल सागर तट के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट पर नियंत्रण हासिल किया। टोयोटा हिलक्स आम नागरिकों की पिकअप से बदलकर विद्रोही युद्ध का प्रतीक बन चुकी है। IS से लेकर हूती लड़ाकों तक, कई सशस्त्र गुट इन्हें मोबाइल हथियार मंच की तरह इस्तेमाल करते हैं। अगर दुनिया भर के विद्रोहियों और गुरिल्लाओं की आम राइफल कलाश्निकोव पैटर्न की असॉल्ट राइफल है, तो उनकी पसंदीदा गाड़ी टोयोटा हिलक्स हो सकती है। यमन के हूती लड़ाकों से लेकर इराक में IS और अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज तक, हिलक्स संघर्ष वाले इलाकों में आम नजर आती है। फोर्ड, शेवरले और निसान जैसी कंपनियों की पिकअप भी इसी तरह इस्तेमाल होती हैं। इन पिकअप पर मशीनगन, ऑटोकैनन, एंटी-टैंक मिसाइल और दूसरे घातक हथियार लगाए जाते हैं। इस वजह से ये गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों की पसंद बन गई हैं। आधुनिक देशों की सेनाएं अपने सैनिकों को बचाने वाले अत्याधुनिक बख्तरबंद वाहन बनाने पर लाखों खर्च करती हैं। इसके उलट विद्रोही, आतंकी, गुरिल्ला या लड़ाके साधारण टोयोटा से जंग में पहुंच जाते हैं। इन गाड़ियों पर मशीनगन या रॉकेट लॉन्चर लगाया जाता है। ये वाहन शहरों में चलने वाली आम गाड़ियों जैसे दिखते हैं। हिलक्स की लोकप्रियता की वजह हिलक्स जैसी गाड़ियों का युद्ध में इस्तेमाल नया नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश स्पेशल फोर्सेज ने उत्तरी अफ्रीका में धुरी राष्ट्रों की पंक्तियों के पीछे हमलों के लिए जीप और हल्के ट्रकों का इस्तेमाल किया था। गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों में हिलक्स की लोकप्रियता की जड़ें 1980 के दशक के आखिर तक जाती हैं। उस समय लीबिया-चाड युद्ध अपने अंतिम चरण में था। सहारा के दक्षिण में स्थित देश चाड, मुअम्मर गद्दाफी के लीबिया से एक दशक से युद्ध लड़ रहा था। उसके पूर्व उपनिवेशवादी देश फ्रांस ने चाड को 400 हिलक्स और लैंड क्रूजर पिकअप दीं। इन वाहनों के साथ एंटी-टैंक और एंटी-एयर मिसाइलें भी दी गई थीं। फ्रांसीसी हवाई मदद के साथ इन टोयोटा वाहनों ने चाड को लीबिया के खिलाफ कई बड़ी सैन्य जीत दिलाईं। बाद में इस युद्ध को ‘टोयोटा वॉर’ नाम दिया गया। इस युद्ध ने दिखाया कि सही इस्तेमाल होने पर टोयोटा एक प्रभावी हथियार बन सकती है। इन वाहनों की रफ्तार और तेजी से दिशा बदलने की क्षमता ने उन्हें दुश्मन की गोलीबारी से बचने में मदद की। वे धीमे लीबियाई टैंकों के चारों ओर तेजी से घूमकर अचानक हमला कर सकती थीं। टोयोटा पिकअप सस्ती और टिकाऊ थीं। बुनियादी औजारों वाले लगभग किसी भी मैकेनिक से इनकी मरम्मत कराई जा सकती थी। दुनिया भर में आम नागरिकों के बीच लोकप्रिय होने के कारण इनके स्पेयर पार्ट्स आसानी से मिल जाते थे। हथियारों के विपरीत, टोयोटा हिलक्स या फोर्ड F-150 को विद्रोही गुटों तक पहुंचाने के लिए निर्यात पाबंदियों से नहीं गुजरना पड़ता। 1987 का युद्ध टोयोटा और विद्रोही गुटों की कहानी की शुरुआत भर था। समय के साथ अफगानिस्तान के पहाड़ों, इराक के रेगिस्तान और सोमालिया की सड़कों पर हिलक्स और दूसरी पिकअप आम दिखने लगीं। इन गाड़ियों को एक खास नाम भी मिला—‘टेक्निकल्स’। यह शब्द 1990 के दशक की शुरुआत में सोमालिया में सामने आया। उस समय सहायता एजेंसियां अपने कर्मचारियों और सामान की सुरक्षा के लिए स्थानीय सशस्त्र गुटों को पैसे देती थीं। इसे ‘टेक्निकल असिस्टेंस’ यानी तकनीकी सहायता कहा जाता था। बाद में हथियारों से लैस इन पिकअप के लिए ‘टेक्निकल्स’ नाम चलन में आ गया। विद्रोही गुटों को इतनी टोयोटा कैसे मिलती हैं इराक के कब्जे वाले शहरों में काली हिलक्स के साथ IS लड़ाके नजर आए। हूती लड़ाके भी यमन के लाल सागर तट पर ऐसी पिकअप तेजी से चलाते दिखे। सवाल यह है कि गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों को इतनी बड़ी संख्या में ये वाहन मिलते कैसे हैं। 2015 में IS के चरम पर पहुंचने के दौरान अमेरिकी आतंकवाद रोधी अधिकारियों ने टोयोटा से इस बारे में जवाब मांगा था। वे जानना चाहते थे कि आतंकी संगठन इतनी हिलक्स और लैंड क्रूजर कैसे हासिल कर रहा है। टोयोटा ने विद्रोहियों को वाहन बेचने से इनकार किया था। कंपनी ने 2015 में कहा था, “हमारी सख्त नीति है कि हम ऐसे संभावित खरीदारों को वाहन नहीं बेचते, जो उनका इस्तेमाल या उनमें बदलाव अर्धसैनिक या आतंकी गतिविधियों के लिए कर सकते हैं।” टोयोटा के आंकड़ों के मुताबिक, इराक में हिलक्स और लैंड क्रूजर की बिक्री 2011 में 6,000 से बढ़कर 2013 में 18,000 हो गई थी। 2014 में यह बिक्री घटकर 13,000 रह गई। ABC न्यूज ने इन आंकड़ों की रिपोर्ट की थी। यह आंकड़े उस समय के हैं, जब IS ने सीरिया से इराक में बड़ा हमला शुरू किया था। यह हमला राजधानी बगदाद के बाहरी इलाकों तक पहुंच गया था। टोयोटा सीधे आतंकियों को वाहन न भी बेचती हो, फिर भी गैर-सरकारी गुटों के पास इन्हें हासिल करने के अपने तरीके हैं। दुनिया भर में हिलक्स की लोकप्रियता के कारण पुरानी गाड़ियां खुले बाजार में हमेशा उपलब्ध रहती हैं। कंपनी ने 2014 में कहा था, “हम केवल अनुमान लगा सकते हैं कि ये वाहन गुप्त रास्तों से आते हैं और लोगों के बीच खरीदे-बेचे जाते हैं। खासकर पुराने वाहनों का ऐसा अनौपचारिक कारोबार किसी वाहन निर्माता के लिए ट्रैक करना बहुत मुश्किल है।” एक मामले में अमेरिका के एक प्लंबर की फोर्ड पिकअप IS लड़ाकों को बेच दी गई थी। उसके दरवाजे पर प्लंबर का नाम और फोन नंबर लिखा हुआ था। वह फोर्ड सीरिया में IS के लिए इस्तेमाल होती रही। गाड़ी पर वही पहचान संबंधी जानकारी लगी थी। बाद में अमेरिकी न्यूज चैनलों ने इसे दिखाया। गैर-सरकारी सशस्त्र गुट बिचौलियों की मदद भी ले सकते हैं। ये बिचौलिए स्थानीय और विदेशी बाजारों से वाहन खरीदते हैं। इसके बाद कंपनी की नीतियों से
टोयोटा हिलक्स हूती विद्रोहियों की पसंदीदा गाड़ी बनी:इस पर मशीनगन-रॉकेट लगाना आसान, 45 साल से दुनिया भर के आतंकियों की पहचान बनी

यमन में हूती विद्रोहियों के काफिले में एक खास तरह की पिकअप गाड़ियां लगातार चर्चा में हैं। हूती लड़ाके मशीनगन और रॉकेट से लेस टोयोटा हिलक्स समेत कई पिकअप गाड़ियों में नजर आए हैं। आम दिखने वाली ये गाड़ियां करीब 45 साल से दुनिया के अलग-अलग संघर्षों में विद्रोहियों और आतंकियों की पसंद बनी हुई हैं। इसकी कम कीमत, मजबूत बनावट और आसानी से हथियार लगाने की वजह से यह आम गाड़ी युद्ध के मैदान में बेहद काम की साबित हुई है। इन पिकअप पर मशीनगन, ऑटोकैनन, एंटी-टैंक मिसाइल और दूसरे घातक हथियार लगाए जाते हैं। ये वाहन शहरों में चलने वाली आम गाड़ियों जैसे दिखते हैं। हिलक्स की लोकप्रियता की वजह हिलक्स जैसी गाड़ियों का युद्ध में इस्तेमाल नया नहीं है। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश स्पेशल फोर्सेज ने उत्तरी अफ्रीका में धुरी राष्ट्रों की पंक्तियों के पीछे हमलों के लिए जीप और हल्के ट्रकों का इस्तेमाल किया था। गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों में हिलक्स की लोकप्रियता की जड़ें 1980 के दशक के आखिर तक जाती हैं। उस समय लीबिया-चाड युद्ध अपने अंतिम चरण में था। सहारा के दक्षिण में स्थित देश चाड, मुअम्मर गद्दाफी के लीबिया से एक दशक से युद्ध लड़ रहा था। उसके पूर्व उपनिवेशवादी देश फ्रांस ने चाड को 400 हिलक्स और लैंड क्रूजर पिकअप दीं। इन वाहनों के साथ एंटी-टैंक और एंटी-एयर मिसाइलें भी दी गई थीं। फ्रांसीसी हवाई मदद के साथ इन टोयोटा वाहनों ने चाड को लीबिया के खिलाफ कई बड़ी सैन्य जीत दिलाईं। बाद में इस युद्ध को ‘टोयोटा वॉर’ नाम दिया गया। इस युद्ध ने दिखाया कि सही इस्तेमाल होने पर टोयोटा एक प्रभावी हथियार बन सकती है। इन वाहनों की रफ्तार और तेजी से दिशा बदलने की क्षमता ने उन्हें दुश्मन की गोलीबारी से बचने में मदद की। वे धीमे लीबियाई टैंकों के चारों ओर तेजी से घूमकर अचानक हमला कर सकती थीं। टोयोटा पिकअप सस्ती और टिकाऊ थीं। बुनियादी औजारों वाले लगभग किसी भी मैकेनिक से इनकी मरम्मत कराई जा सकती थी। दुनिया भर में आम नागरिकों के बीच लोकप्रिय होने के कारण इनके स्पेयर पार्ट्स आसानी से मिल जाते थे। हथियारों के विपरीत, टोयोटा हिलक्स या फोर्ड F-150 को विद्रोही गुटों तक पहुंचाने के लिए निर्यात पाबंदियों से नहीं गुजरना पड़ता। 1987 का युद्ध टोयोटा और विद्रोही गुटों की कहानी की शुरुआत भर था। समय के साथ अफगानिस्तान के पहाड़ों, इराक के रेगिस्तान और सोमालिया की सड़कों पर हिलक्स और दूसरी पिकअप आम दिखने लगीं। इन गाड़ियों को एक खास नाम भी मिला—‘टेक्निकल्स’। यह शब्द 1990 के दशक की शुरुआत में सोमालिया में सामने आया। उस समय सहायता एजेंसियां अपने कर्मचारियों और सामान की सुरक्षा के लिए स्थानीय सशस्त्र गुटों को पैसे देती थीं। इसे ‘टेक्निकल असिस्टेंस’ यानी तकनीकी सहायता कहा जाता था। बाद में हथियारों से लैस इन पिकअप के लिए ‘टेक्निकल्स’ नाम चलन में आ गया। विद्रोही गुटों को इतनी टोयोटा कैसे मिलती हैं इराक के कब्जे वाले शहरों में काली हिलक्स के साथ IS लड़ाके नजर आए। हूती लड़ाके भी यमन के लाल सागर तट पर ऐसी पिकअप तेजी से चलाते दिखे। सवाल यह है कि गैर-सरकारी सशस्त्र गुटों को इतनी बड़ी संख्या में ये वाहन मिलते कैसे हैं। 2015 में IS के चरम पर पहुंचने के दौरान अमेरिकी आतंकवाद रोधी अधिकारियों ने टोयोटा से इस बारे में जवाब मांगा था। वे जानना चाहते थे कि आतंकी संगठन इतनी हिलक्स और लैंड क्रूजर कैसे हासिल कर रहा है। टोयोटा ने विद्रोहियों को वाहन बेचने से इनकार किया था। कंपनी ने 2015 में कहा था, “हमारी सख्त नीति है कि हम ऐसे संभावित खरीदारों को वाहन नहीं बेचते, जो उनका इस्तेमाल या उनमें बदलाव अर्धसैनिक या आतंकी गतिविधियों के लिए कर सकते हैं।” टोयोटा के आंकड़ों के मुताबिक, इराक में हिलक्स और लैंड क्रूजर की बिक्री 2011 में 6,000 से बढ़कर 2013 में 18,000 हो गई थी। 2014 में यह बिक्री घटकर 13,000 रह गई। ABC न्यूज ने इन आंकड़ों की रिपोर्ट की थी। यह आंकड़े उस समय के हैं, जब IS ने सीरिया से इराक में बड़ा हमला शुरू किया था। यह हमला राजधानी बगदाद के बाहरी इलाकों तक पहुंच गया था। टोयोटा सीधे आतंकियों को वाहन न भी बेचती हो, फिर भी गैर-सरकारी गुटों के पास इन्हें हासिल करने के अपने तरीके हैं। दुनिया भर में हिलक्स की लोकप्रियता के कारण पुरानी गाड़ियां खुले बाजार में हमेशा उपलब्ध रहती हैं। कंपनी ने 2014 में कहा था, “हम केवल अनुमान लगा सकते हैं कि ये वाहन गुप्त रास्तों से आते हैं और लोगों के बीच खरीदे-बेचे जाते हैं। खासकर पुराने वाहनों का ऐसा अनौपचारिक कारोबार किसी वाहन निर्माता के लिए ट्रैक करना बहुत मुश्किल है।” एक मामले में अमेरिका के एक प्लंबर की फोर्ड पिकअप IS लड़ाकों को बेच दी गई थी। उसके दरवाजे पर प्लंबर का नाम और फोन नंबर लिखा हुआ था। वह फोर्ड सीरिया में IS के लिए इस्तेमाल होती रही। गाड़ी पर वही पहचान संबंधी जानकारी लगी थी। बाद में अमेरिकी न्यूज चैनलों ने इसे दिखाया। गैर-सरकारी सशस्त्र गुट बिचौलियों की मदद भी ले सकते हैं। ये बिचौलिए स्थानीय और विदेशी बाजारों से वाहन खरीदते हैं। इसके बाद कंपनी की नीतियों से बचने के लिए गाड़ियां अंतिम इस्तेमाल करने वालों तक पहुंचाई जाती हैं। बड़े संघर्ष शुरू होने से पहले वाहनों की बिक्री में अचानक बढ़ोतरी इसी प्रक्रिया का संकेत हो सकती है। टोयोटा के आंकड़ों में 2013 में इराक में IS के बड़े हमले से पहले बिक्री में भारी बढ़ोतरी दर्ज हुई थी। यमन के लाल सागर तट पर हिलक्स के बड़े बेड़े के साथ आगे बढ़ रहे हूती लड़ाकों को ये वाहन कैसे मिले, यह सवाल अब भी बना हुआ है। उन्होंने ये गाड़ियां पुरानी खरीदीं, बिचौलियों के जरिए शोरूम से लीं, विदेश से तस्करी कराईं या चुराईं—यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन जिस भी तरीके से ये हासिल की गई हों, साधारण और कम साजोसामान वाली हिलक्स विद्रोही गुटों के बीच अब भी बेहद पसंदीदा वाहन बनी हुई है।
स्वीपर की नौकरी तक नहीं मिलेगी:राखी सावंत पर भड़कीं कंगना रनोट, नरेंद्र मोदी पर दिए विवादित बयान पर जमकर लगाई फटकार

एक्ट्रेस और सांसद कंगना रनोट, राखी सावंत के बयान पर भड़क गई हैं। राखी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर एक आपत्तिजनक कमेंट किया, जिस पर कंगना ने उन्हें फटकारते हुए कहा है कि ऐसे बयान देने वालों को कोई स्वीपर की नौकरी तक नहीं देगा। कंगना रनोट ने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट से लिखा है, “सिर्फ यही (राखी) नहीं, बल्कि ज्यादातर नाकाम और जलने वाले लोग किसी कामयाब महिला के कैरेक्टर पर कीचड़ उछालकर अपनी जलन, ईर्ष्या, नाकामी और घटिया सोच को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। लेकिन अब बहुत हो गया। ऐसी बार-बार और जानबूझकर की जाने वाली चरित्र हत्या और पब्लिक में बदनाम करने की कोशिशों को सहना बंद करना होगा। खुद को बेवजह अपमानित और आहत महसूस करना बंद करो और हर बात पर सफाई देना भी बंद करो।” आगे कंगना ने लिखा, “सफलता के लिए तुम भले ही अपना सबकुछ दांव पर लगा दो, लेकिन असली मजेदार बात तो ये है कि किसी को तुमसे कुछ चाहिए ही नहीं। तुम्हारे किए हुए सारे एहसान और सिफारिशें जोड़ लो, फिर भी तुम्हें स्वीपर की नौकरी तक नहीं मिलेगी क्योंकि उस नौकरी में भी थोड़ी काबिलियत और टैलेंट की जरूरत होती है। इसलिए ज्यादा खुशफहमी में मत रहो। एहसान करो या एहसान मत करो, तुम कहीं नहीं पहुंचने वालीं। अब चुपचाप बैठो, मेरी रील्स देखो और रोते रहो।” क्या था नरेंद्र मोदी पर राखी का बयान राखी सावंत ने हाल ही में कहा था कि वो प्रधानमंत्री के लिए वो कर सकती हैं, जो राखी सावंत और स्मृति ईरानी करती हैं। राखी सावंत ने हाल ही में मोहसिन खान के पॉडकास्ट एम.के.टॉक्स में कहा, “मोदी जी इधर-उधर क्यों देख रहे हैं? कंगना से उन्हें हड्डियों के अलावा और क्या मिलेगा? मोदी जी, स्मृति, कंगना और इन सभी महिलाओं ने आपको ऐसा क्या दिया कि आपने उन्हें मंत्री बना दिया? तो जो भी उन्होंने आपको दिया है, मैं भी आपको दे सकती हूं।” कंगना-राखी का पहले भी हुआ विवाद राखी सावंत और कंगना रनौत के बीच विवाद काफी पुराना है। दोनों के बीच पहली बार तब तकरार देखने को मिली थी, जब कंगना ने एक पुराने बयान में खुद की तुलना राखी सावंत से करने से इनकार किया था। दरअसल, उस समय कंगना से मीका सिंह के साथ किसिंग सीन को लेकर सवाल किया गया था। कंगना ने कथित तौर पर कहा था कि वह राखी सावंत नहीं हैं, जो इस तरह का सीन करेंगी। कंगना का यह बयान राखी को बिल्कुल पसंद नहीं आया। इसके बाद राखी ने कंगना को जवाब देते हुए कहा था कि अगर कंगना को इतनी ही पब्लिसिटी चाहिए थी, तो वह मीका को किस कर लेतीं, लेकिन उनका नाम लेकर पब्लिसिटी लेने की जरूरत नहीं थी। साल 2020 में कंगना और महाराष्ट्र सरकार के बीच विवाद के दौरान भी राखी सावंत ने कंगना पर निशाना साधा था। इसके बाद भी दोनों के बीच समय-समय पर बयानबाजी होती रही। कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट के समय भी राखी ने कंगना के बयानों की आलोचना की थी।
जंगली कुत्ते मादा की तलाश में 4000 km घूमे:9 महीने तक जोड़ीदार तलाशते रहे, अब तक की सबसे लंबी दूरी तय की

साथी की तलाश में जाम्बिया के तीन अफ्रीकी जंगली कुत्तों ने करीब 4,126 किलोमीटर का सफर तय किया। ये तीनों भाई 2025 के बीच में अपने पुराने इलाके से निकले और करीब 9 महीने तक लगातार घूमते रहे। अप्रैल 2026 तक उन्होंने यह दूरी पूरी कर ली थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक, जमीन पर रहने वाले किसी अफ्रीकी स्तनधारी के साथी की तलाश में दर्ज की गई यह अब तक की सबसे लंबी दूरी है। इन तीनों को मायूकूयूकू मेल्स (Mayukuyuku males) के नाम से पहचाना गया है। उनका सफर सिर्फ लंबा नहीं था, बल्कि बेहद मुश्किल भी था। रास्ते में उन्हें जंगलों के साथ-साथ सड़कें, शहर, खेती और औद्योगिक इलाके भी मिले। वे इनसे बचते हुए बार-बार अपना रास्ता बदलते रहे। 420 किमी की दूरी, लेकिन सफर 4 हजार किमी का अगर नक्शे पर दोनों छोरों के बीच सीधी लाइन खींचें तो तीनों भाइयों ने करीब 260 मील यानी 420 किमी की दूरी तय की। लेकिन असल में वे करीब 2,485 मील यानी 4 हजार किमी घूमे। सोचिए, मंजिल 420 किमी दूर हो और वहां पहुंचने के लिए 4 हजार किमी का चक्कर लगाना पड़े। इन जंगली कुत्तों के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। वे जहां इंसानी गतिविधियां ज्यादा देखते, वहां से रास्ता बदल लेते। इस तरह जंगलों और दूसरे प्राकृतिक इलाकों के बीच घूमते हुए उन्होंने एक लंबा घुमावदार रास्ता तय किया। वैज्ञानिक इस तरह अपने जन्म वाले झुंड या इलाके को छोड़कर साथी की तलाश में निकलने को डिस्पर्सल कहते हैं। यह माइग्रेशन से अलग है। माइग्रेशन में जानवर आमतौर पर मौसम के साथ भोजन या रहने की जगह की तलाश में एक इलाके से दूसरे इलाके जाते हैं और फिर लौटते हैं। डिस्पर्सल में जानवर नए साथी या नए इलाके की तलाश में निकलता है। अपने ही झुंड में जोड़ी नहीं बनाते अफ्रीकी जंगली कुत्ते झुंड में रहने वाले बेहद सामाजिक जानवर हैं। वे साथ मिलकर शिकार करते हैं और झुंड के बच्चों की देखभाल भी करते हैं। लेकिन वे आमतौर पर अपने जन्म वाले झुंड में प्रजनन नहीं करते। इसलिए बड़े होने पर उनके सामने दो रास्ते होते हैं। वे अपने झुंड में रहकर इंतजार करें और आगे चलकर उसी झुंड का हिस्सा बने रहें, या फिर करीब 2 से 3 साल की उम्र में साथी की तलाश में बाहर निकल जाएं। जाम्बिया में इन तीन भाइयों ने साथी की तलाश में निकलने का रास्ता चुना। राजधानी लुसाका से भी बचकर निकले तीनों का रास्ता सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं था। वे जाम्बिया के अलग-अलग वन्यजीव इलाकों के बीच घूमे। इस दौरान उन्होंने राजधानी लुसाका और भारी औद्योगिक विकास वाले इलाकों के आसपास से भी रास्ता बनाया। सड़कों, शहरों और खेती की वजह से कई प्राकृतिक इलाके एक-दूसरे से कट गए हैं। ऐसे में किसी जानवर के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल तक जाना आसान नहीं है। इसके बावजूद तीनों भाइयों ने इन बाधाओं के बीच रास्ता निकाला। वैज्ञानिकों के लिए यह एक अहम संकेत है। इससे पता चलता है कि पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में जंगली कुत्तों की अलग-अलग आबादियां शायद पहले के अनुमान से ज्यादा एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। तीन बहनें भी साथी की तलाश में निकलीं, 2 की मौत इसी रिसर्च में तीन मादा जंगली कुत्तों की गतिविधियों पर भी नजर रखी गई। उन्होंने भी साथी की तलाश में लंबी दूरी तय करना शुरू किया था। लेकिन उनका सफर पूरा नहीं हो सका। तीनों में से एक शिकारी के लगाए तार के फंदे यानी स्नेर में फंस गई। बाद में तीनों में से दो की मौत हो गई। दूसरी की मौत की जानकारी नहीं मिल पाई है। रिसर्चर्स ने इन जानवरों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए उनके गले में GPS कॉलर लगाए थे। इससे पता चला कि बची हुई मादा जंगली कुत्तियां बार-बार उसी जगह लौट रही थीं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ऐसा व्यवहार अक्सर तब देखा जाता है जब झुंड का कोई साथी मर जाता है। हालांकि, यह पूरी तरह तय नहीं है कि वे साथी को खोज रही थीं या उस जगह से उनका जुड़ाव बना हुआ था। इस रिसर्च में GPS कॉलर लगाए गए कुछ दूसरे जंगली कुत्तों की मौत भी अवैध शिकार के लिए लगाए गए फंदों में फंसने से हुई। जंगलों में करीब 6 हजार ही जंगली कुत्ते बचे अफ्रीकी जंगली कुत्ते अफ्रीका के सबसे दुर्लभ शिकारी जानवरों में शामिल हैं। जंगलों में इनकी संख्या करीब 6 हजार ही बची है। इनके लिए खतरा सिर्फ शिकारियों से नहीं है। सड़कें, शहर और खेती उनके रहने वाले इलाकों को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट रहे हैं। इससे साथी की तलाश में एक इलाके से दूसरे इलाके तक जाना मुश्किल हो सकता है। फिर भी इस रिसर्च में तीन भाइयों का 4 हजार किमी का सफर यह दिखाता है कि ये जानवर इंसानों से बदले हुए इलाकों के बीच भी रास्ता खोज सकते हैं। मोंटाना स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्कॉट क्रील, जो इस रिसर्च के प्रमुख लेखक हैं और 1991 से अफ्रीकी जंगली कुत्तों का अध्ययन कर रहे हैं, इसे सावधानी के साथ उम्मीद जगाने वाला नतीजा मानते हैं। उनके मुताबिक, पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में बाड़ से घिरे इलाकों को छोड़ दें तो जंगली कुत्तों की लगभग सभी बड़ी आबादियां एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं। लेकिन उनके मुताबिक तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। जानवर इतनी लंबी दूरी तय कर सकते हैं, लेकिन रास्ते में इंसानों की वजह से पैदा हुए खतरे भी हैं। इनमें सबसे बड़ा खतरा शिकारियों के लगाए फंदों का है। सिर्फ जंगल बचाना काफी नहीं, उनके बीच के रास्ते भी जरूरी यह रिसर्च इकोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुई है। इसके नतीजे बताते हैं कि वन्यजीवों के लिए सिर्फ संरक्षित जंगल बचाना पर्याप्त नहीं है। मान लीजिए दो बड़े जंगल हैं, लेकिन उनके बीच सड़क, शहर और खेती इतनी बढ़ गई कि जानवर एक से दूसरे तक पहुंच ही नहीं सकते। ऐसे में दोनों जंगल धीरे-धीरे अलग-अलग छोटे द्वीप जैसे बन जाएंगे। द नेचर कंजरवेंसी से जुड़े और रिसर्च के सह-लेखक ब्रूस एलेंडर के मुताबिक, जंगली कुत्तों और हाथियों जैसे बड़े इलाके में घूमने वाले जानवरों को जिंदा रहने के लिए जुड़े हुए प्राकृतिक इलाके चाहिए। इसलिए संरक्षण का मतलब सिर्फ जंगल
सलमान खान ने एंटीलिया में लिया बप्पा का आशीर्वाद:तिलक लगवाकर फूल अर्पण किए, सिद्धार्थ-कियारा ने भी दर्शन किए; राधिका मर्चेंट की भक्तिमय परफॉर्मेंस में डूबे मेहमान

सलमान खान अंबानी परिवार के गणपति सेलिब्रेशन का हिस्सा बने हैं। इस दौरान उन्होंने बप्पा का आशीर्वाद लिया और भगवान को फूल अर्पण किए। एंटीलिया में हुए गणपति सेलिब्रेशन की शुरुआत में राधिका मर्चेंट ने भक्तिमय प्रस्तुति दी। सलमान खान ने नए लुक के साथ एंटीलिया में एंट्री ली और तस्वीरें क्लिक कराईं। कुछ देर बाद उन्होंने गणपति प्रतिमा के सामने जाकर आशीर्वाद लिया। पंडित जी ने उन्हें तिलक लगाया और पटका पहनाया। आगे सलमान ने गणपति बप्पा को पुष्प अर्पित किए। राधिका मर्चेंट ने गणपति सेलिब्रेशन में क्लासिकल भक्तिमय भरतनाट्यम परफॉर्मेंस दी, जिसे पॉपुलर कोरियोग्राफर वैभवी मर्चेंट ने कोरियोग्राफ किया है। वैभवी ने सोशल मीडिया से राधिका का वीडियो पोस्ट किया। देखिए राधिका मर्चेंट की डांस परफॉर्मेंस की झलक- एंटीलिया के गणपति सेलिब्रेशन की ये इनसाइड झलकियां भी देखिए- विक्की-कटरीना, सिद्धार्थ-कियारा ने भी लिया आशीर्वाद विक्की कौशल और कटरीना कैफ ने भी एंटीलिया में बप्पा का आशीर्वाद लिया और फूल अर्पित किए। नए पेरेंट्स बने सिद्धार्थ मल्होत्रा और कियारा आडवाणी भी हाथ जोड़े बप्पा के दर्शन करते नजर आए। गणपति पूजा में साथ दिखा अंबानी परिवार इस सेलिब्रेशन से पहले अंबानी परिवार में पूजा आयोजित की गई, जिसमें महज परिवार के सदस्य और चंद करीबी शामिल हुए थे। एंटीलिया में गणपति बप्पा का स्वागत गणपति बप्पा के स्वागत के लिए एंटीलिया गेंदे के फूलों, शानदार लाइटिंग और त्योहारों वाली सजावट से जगमगा उठा। इस मौके पर नीता अंबानी, राधिका मर्चेंट, अनंत अंबानी और मुकेश अंबानी गणपति बप्पा का स्वागत करते नजर आए। नीता अंबानी ने गहरे लाल रंग का पारंपरिक परिधान पहना था। वह शानदार गहनों में नजर आईं। राधिका मर्चेंट ने चमकीले नारंगी रंग का कढ़ाईदार एथनिक आउटफिट चुना। उन्होंने पारंपरिक एक्सेसरीज के साथ अपना फेस्टिव लुक पूरा किया।
ट्रम्प की डाक वोटिंग सख्त करने की कोशिश पर रोक:सुप्रीम कोर्ट के 9 में से 7 जज खिलाफ; वोटरों की जानकारी USPS को देने का था आदेश

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने डाक से वोटिंग के नियम सख्त करने की राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कोशिश पर लगी रोक हटाने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने सोमवार को निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट के 9 में से 7 जज ट्रम्प के नियमों के खिलाफ रहे। मामला नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से जुड़ा है। ट्रम्प ने मार्च में आदेश जारी किया था। वे चाहते थे कि डाक से वोट भेजने वाले लोगों की लिस्ट राज्यों को अमेरिकी डाक सेवा (USPS) को दी जाए। ट्रम्प का कहना था कि डाक से वोटिंग में गड़बड़ी रोकने के लिए नए नियम जरूरी हैं। विरोध करने वालों ने कहा कि इन नियमों से सही वोट भी रुक सकते हैं और राष्ट्रपति राज्यों के चुनावी सिस्टम में जरूरत से ज्यादा दखल दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल ट्रम्प के नियम लागू करने की अनुमति नहीं दी। ट्रम्प के नियम के तहत USPS रोक सकता था बैलेट अगर कोई बैलेट नए नियमों के मुताबिक नहीं होता या वोट देने वाले का नाम तय लिस्ट में नहीं मिलता, तो USPS उस बैलेट को रोक सकता था। डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार वाले राज्यों और वोटिंग अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठनों ने इन नियमों का विरोध किया था। उनका कहना था कि इससे चुनाव के दौरान लोगों की परेशानी बढ़ सकती है। खबर लगातार अपडेट की जा रही है…
अंबानी परिवार की गणेश पूजा में पहुंचे सलमान खान:विक्की-कटरीना, आलिया रणबीर समेत कई सेलेब्स शामिल हुए, देखिए तस्वीरें

अंबानी परिवार ने अपने घर एंटीलिया में गणेश चतुर्थी 2026 का जश्न मनाया। परिवार ने गणपति बप्पा का स्वागत किया, जिन्हें प्यार से ‘एंटीलिया चा राजा’ कहा जाता है। इस मौके पर बॉलीवुड की कई हस्तियां मुकेश अंबानी के घर पहुंचीं। सलमान खान, कटरीना कैफ-विक्की कौशल, कियारा आडवाणी-सिद्धार्थ मल्होत्रा और कई सितारे सेलिब्रेशन में शामिल हुए। देखिए अंबानी परिवार के गणपति सेलिब्रेशन में पहुंचे सेलेब्स के लुक- एंटीलिया में गणपति बप्पा का स्वागत मूर्ति के स्वागत के दौरान एंटीलिया गेंदे के फूलों, शानदार लाइटिंग और त्योहारों वाली सजावट से जगमगा उठा। सामने आए वीडियो और तस्वीरों में घर के अंदर और बाहर हो रहे जश्न की झलक दिखी। इस मौके पर नीता अंबानी, राधिका मर्चेंट, अनंत अंबानी और मुकेश अंबानी गणपति बप्पा का स्वागत करते नजर आए। नीता अंबानी ने गहरे लाल रंग का पारंपरिक परिधान पहना था। वह शानदार गहनों में नजर आईं। राधिका मर्चेंट ने चमकीले नारंगी रंग का कढ़ाई वाला एथनिक आउटफिट चुना। उन्होंने पारंपरिक एक्सेसरीज के साथ अपना फेस्टिव लुक पूरा किया।
ट्रम्प बोले- होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा का पैसा दे दुनिया:कहा- अमेरिका ने तेल सप्लाई जारी रखी, दूसरे देशों ने कोई मदद नहीं की

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को हॉर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा का खर्च दूसरे देशों से लेने की बात कही। उन्होंने कहा कि संकट खत्म होने के बाद उन देशों को अमेरिका को पैसा देना चाहिए, जिन्होंने उसकी मदद नहीं की। ट्रम्प ने ट्रूथ सोशल पर कहा कि हॉर्मुज स्ट्रेट से तेल की सप्लाई अभी भी जारी है। उनके मुताबिक, अमेरिका कई पीढ़ियों से अपने हितों की जगह दूसरे देशों के लिए ज्यादा काम करता रहा है। उन्होंने ईरान के साथ चल रहे संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि हॉर्मुज से तेल की आवाजाही से जिन देशों को फायदा हो रहा है, उन्हें इसकी सुरक्षा का खर्च भी उठाना चाहिए। खबर लगातार अपडेट की जा रही है…
ट्रम्प बोले- होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा का पैसा दे दुनिया:कहा- अमेरिका ने तेल सप्लाई जारी रखी, दूसरे देशों ने कोई मदद नहीं की

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोमवार को हॉर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा का खर्च दूसरे देशों से लेने की बात कही। उन्होंने कहा कि उन देशों को अमेरिका को पैसा देना चाहिए, जिन्होंने ईरान के साथ जारी संघर्ष में अमेरिका की मदद नहीं की। ट्रम्प ने ट्रूथ सोशल पर कहा कि हॉर्मुज स्ट्रेट से तेल की सप्लाई अभी भी जारी है। उनके मुताबिक, अमेरिका कई पीढ़ियों से अपने हितों की जगह दूसरे देशों के लिए ज्यादा काम करता रहा है। ट्रम्प ने कहा, दुनिया के जिन देशों ने हमारी बिल्कुल मदद नहीं की, उन्हें इस SCAM संकट के खत्म होने पर अमेरिका को भुगतान करना चाहिए और वे ऐसा करेंगे। ट्रम्प ने अमेरिका में महंगाई के लिए बाइडेन को जिम्मेदार बताया ट्रम्प ने ट्रूथ सोशल पर अमेरिका में बढ़ती कीमतों और तेल के दाम के लिए पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन को जिम्मेदार बताया। उन्होंने कहा कि महंगाई के लिए उनकी सरकार जिम्मेदार नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि बाइडेन के कार्यकाल में तेल की कीमत अभी से ज्यादा थी। ट्रम्प ने यह भी दावा किया कि उनकी सरकार ने ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोक दिया। ट्रम्प बोले- ईरान जल्द समझौता करना चाहता है ट्रम्प ने यह भी कहा कि ईरान अमेरिका के साथ बातचीत करना चाहता है और जल्द समझौता करने की कोशिश कर रहा है। ट्रम्प ने साफ किया कि अमेरिका ईरान से बातचीत करेगा या नहीं, इसका फैसला वही करेंगे। उन्होंने ईरान के साथ चल रहे संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि हॉर्मुज से तेल की आवाजाही से जिन देशों को फायदा हो रहा है, उन्हें इसकी सुरक्षा का खर्च भी उठाना चाहिए। खबर लगातार अपडेट की जा रही है…








