आमेर बना ‘आश्रम’ का नया ठिकाना, सागरलेक पर बनाया सेट:बाबा निराला बने बॉबी देओल पर फिल्माया सीन, चंदन रॉय सान्याल और त्रिधा चौधरी भी हुई स्पॉट

जयपुर और आसपास के इलाकों में इन दिनों प्रकाश झा के निर्देशन में बन रही चर्चित वेबसीरीज ‘आश्रम 4’ की शूटिंग जारी है। सीरीज के लिए शहर की अलग-अलग लोकेशन को कहानी के अनुरूप तैयार किया जा रहा है। अब आमेर स्थित सागर लेक के आसपास के क्षेत्र में सीरीज के लिए एक नया सेट तैयार किया गया है, जहां बाबा निराला के किरदार में नजर आ रहे बॉबी देओल पर महत्वपूर्ण सीन फिल्माए गए। सागर लेक के पास शूटिंग के लिए कथा का माहौल तैयार किया गया। यहां बाबा निराला के रूप में बॉबी देओल लोगों के बीच कथा सुनाते हुए नजर आए। शूटिंग के दौरान बड़ी संख्या में कलाकार और जूनियर आर्टिस्ट भी मौजूद रहे। पूरे सेट को इस तरह तैयार किया गया कि यह बाबा निराला के आश्रम और उसके धार्मिक आयोजनों से जुड़े माहौल का हिस्सा नजर आए। यहां देखिए शूटिंग से जुड़े फोटोज… बाबा निराला ने सुनाई कथा, भक्तों की भीड़ के बीच फिल्माए गए सीन सागर लेक के पास बनाए गए सेट पर बाबा निराला के कथा सुनाने वाले दृश्यों को फिल्माया गया। बॉबी देओल ने बाबा निराला के गेटअप में शूटिंग की। कथा सुनाते बाबा निराला के आसपास बड़ी संख्या में लोग और उनके अनुयायियों के रूप में कलाकार मौजूद रहे। सीरीज की कहानी में बाबा निराला के प्रभाव और उसके इर्द-गिर्द बने धार्मिक माहौल को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। ऐसे में आमेर की लोकेशन पर फिल्माए जा रहे ये दृश्य कहानी के लिहाज से अहम माने जा रहे हैं। शूटिंग के दौरान सीरीज के प्रमुख कलाकारों में शामिल चंदन रॉय सान्याल भी नजर आए। वे सीरीज में भोपा स्वामी का किरदार निभा रहे हैं। बॉबी देओल और चंदन रॉय सान्याल से जुड़े दृश्यों की शूटिंग के लिए सागर लेक के आसपास विशेष तैयारियां की गईं। त्रिधा चौधरी पर भी फिल्माए गए अहम सीन शूटिंग के दौरान अभिनेत्री त्रिधा चौधरी भी नजर आईं। सीरीज में उनके किरदार से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण दृश्यों को भी आमेर की इस लोकेशन पर फिल्माया गया। शूटिंग के लिए कलाकारों के कॉस्ट्यूम और मेकअप को कहानी के अनुरूप रखा गया। आमेर की ऐतिहासिक और प्राकृतिक लोकेशन को देखते हुए इसे सीरीज के कुछ दृश्यों के लिए उपयुक्त माना गया है। सागर लेक के आसपास का क्षेत्र शूटिंग के दौरान एक अलग ही दृश्यात्मक पृष्ठभूमि तैयार करता नजर आया। बॉबी देओल के बॉडी डबल का भी इस्तेमाल शूटिंग में बॉबी देओल के बॉडी डबल का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। ऐसे दृश्यों में, जहां कैमरा एंगल या शॉट की जरूरत के मुताबिक अभिनेता का पूरा चेहरा दिखाना आवश्यक नहीं होता, बॉडी डबल के जरिए शूटिंग पूरी की जाती है। इससे शूटिंग के दौरान समय बचाने के साथ अलग-अलग शॉट्स को तेजी से पूरा करने में मदद मिलती है। ‘आश्रम 4’ की शूटिंग में बॉबी देओल के साथ अन्य प्रमुख कलाकारों के सीन भी अलग-अलग हिस्सों में फिल्माए जा रहे हैं। जयपुर की कई लोकेशन पर चल रहा शूट ‘आश्रम 4’ की शूटिंग पिछले कई दिनों से जयपुर की अलग-अलग लोकेशन पर चल रही है। इससे पहले भी जयपुर और आसपास के क्षेत्रों को सीरीज के अलग-अलग दृश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया है। शहर की ऐतिहासिक इमारतों, ग्रामीण इलाकों और प्राकृतिक लोकेशन को कहानी के मुताबिक सेट में बदला जा रहा है। शूटिंग के लिए प्रोडक्शन टीम की ओर से कलाकारों के लिए व्यापक व्यवस्थाएं की गई हैं। सेट पर आठ से दस वैनिटी वैन की व्यवस्था की गई है, जिनका इस्तेमाल कलाकारों के मेकअप, कॉस्ट्यूम और आराम के लिए किया जा रहा है। बड़े स्तर पर चल रही शूटिंग के कारण सेट पर तकनीकी टीम, कलाकारों, जूनियर आर्टिस्ट और प्रोडक्शन स्टाफ की मौजूदगी बनी हुई है।
एक्ट्रेस नुसरत भरूचा को रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर:इंडोनेशिया के बाली में एक्सीडेंट, एयर एंबुलेंस से मुंबई लाया जा रहा, सर्जरी होगी

एक्ट्रेस नुसरत भरूचा के बाली में हुए हादसे के बाद रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया है। न्यूज एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक, नुसरत फिलहाल बाली के अस्पताल में भर्ती हैं और डॉक्टरों की निगरानी में हैं। शुक्रवार को नुसरत की टीम की पब्लिसिस्ट संचिता त्रिवेदी ने बताया कि डॉक्टर आगे की जांच के बाद उनकी रीढ़ की सर्जरी करेंगे। उन्हें इलाज के लिए एयर एंबुलेंस से बाली से मुंबई लाने की तैयारी की जा रही है। मुंबई पहुंचने के बाद उनकी सर्जरी होगी। टीम के मुताबिक, चोट और सर्जरी की वजह से नुसरत को आराम करने और ठीक होने में समय लगेगा। इसका असर आने वाले हफ्तों में उनकी काम से जुड़ी जिम्मेदारियों पर भी पड़ सकता है। टीम ने सभी से उनकी निजता का सम्मान करने और उन्हें इलाज पर ध्यान देने देने की अपील की है। बता दें कि हादसे से करीब एक हफ्ते पहले नुसरत ने सोशल मीडिया पर छुट्टियों की कुछ तस्वीरें शेयर की थीं। टाइगर श्रॉफ की फिल्म में एंट्री नुसरत के टाइगर श्रॉफ की अगली फिल्म की कास्ट में शामिल होने की भी खबर है। यह टाइगर और नुसरत की पहली ऑन-स्क्रीन जोड़ी होगी। एक सूत्र ने पिंकविला को बताया, “टीम को ऐसी एक्ट्रेस चाहिए थी, जो कहानी में मजबूती और भावनात्मक गहराई ला सके। नुसरत हमेशा सबसे मजबूत विकल्पों में थीं।” फिल्म में पश्मीना रोशन, अभिषेक बनर्जी और एल्विश यादव भी अहम भूमिकाओं में हैं। शूटिंग के दौरान घायल हुई थीं नुसरत साल 2023 में नुसरत भरूचा के शूटिंग के दौरान घायल होने की दो घटनाएं सामने आई थीं। अप्रैल 2023 में फिल्म ‘अकेली’ की शूटिंग के दौरान भी नुसरत हादसे का शिकार हुई थीं। एक सीन में उन्हें भागते हुए दिखाया जाना था। इसी दौरान वह संगमरमर के फर्श पर सिर के बल गिर गई थीं। हादसे के बाद वह करीब आधे घंटे तक दर्द से रोती रहीं। डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें कुछ दिन आराम करने की सलाह दी थी। वहीं, जनवरी 2023 में फिल्म ‘छोरी 2’ की शूटिंग के दौरान एक एक्शन सीन करते समय उनके चेहरे पर चोट लग गई थी। चोट इतनी थी कि उन्हें चेहरे और भौंह के पास टांके लगवाने पड़े थे। इसके बाद उनका एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें वह टांके लगवाती नजर आई थीं। अगस्त 2021 में शूटिंग के दौरान तबीयत बिगड़ी थी इससे पहले अगस्त 2021 में नुसरत की शूटिंग के दौरान अचानक तबीयत बिगड़ गई थी। वह लव रंजन की फिल्म की शूटिंग कर रही थीं। करीब 23-24 दिनों से लगातार काम करने के कारण वह काफी थक गई थीं। घटना वाले दिन उन्हें तेज चक्कर आए और वह ठीक से खड़ी या बात नहीं कर पा रही थीं। इसके बाद उन्हें मुंबई के हिंदुजा अस्पताल ले जाया गया। वहां उनका ब्लड प्रेशर 65/55 तक गिर गया था। डॉक्टरों ने जांच के बाद इसे गंभीर वर्टिगो अटैक बताया था। इसकी वजह ज्यादा तनाव और थकान बताई गई थी। इलाज के बाद उन्हें घर भेज दिया गया। डॉक्टरों ने 15 दिन आराम की सलाह दी थी। उनकी वजह से फिल्म की शूटिंग भी रोक दी गई थी। मौलाना रजवी ने मंदिर जाने पर आपत्ति जताई थी नुसरत भरूचा पिछले साल उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर पहुंची थीं। उन्होंने महाकाल के दर्शन किए और भस्म आरती में भी शामिल हुईं। नुसरत ने मंदिर से अपनी तस्वीर भी शेयर की थी और लिखा था, ‘जय श्री महाकाल।’ इसके बाद ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने उनके मंदिर जाने और हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करने पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने इसे शरिया कानून के खिलाफ बताते हुए ‘गुनाह-ए-अजीम’ (बड़ा पाप) कहा था और नुसरत को तौबा (माफी) करने व कलमा पढ़ने की सलाह दी थी। नुसरत मुस्लिम बोहरा परिवार से ताल्लुक रखती हैं। हालांकि, उन्होंने बताया था कि उनका परिवार बचपन से ही सभी धर्मों का सम्मान करता रहा है। नुसरत के मुताबिक, वह मंदिरों के अलावा गुरुद्वारे और चर्च भी जाती रही हैं। उन्होंने वैष्णो देवी और केदारनाथ के दर्शन भी किए हैं। साथ ही वह नमाज भी पढ़ती हैं।
एक्ट्रेस नुसरत भरूचा को रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर:इंडोनेशिया के बाली में एक्सीडेंट, एयर एंबुलेंस से मुंबई लाया जा रहा, सर्जरी होगी

एक्ट्रेस नुसरत भरूचा के बाली में हुए हादसे के बाद रीढ़ की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया है। न्यूज एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक, नुसरत फिलहाल बाली के अस्पताल में भर्ती हैं और डॉक्टरों की निगरानी में हैं। शुक्रवार को नुसरत की टीम की पब्लिसिस्ट संचिता त्रिवेदी ने बताया कि डॉक्टर आगे की जांच के बाद उनकी रीढ़ की सर्जरी करेंगे। उन्हें इलाज के लिए एयर एंबुलेंस से बाली से मुंबई लाने की तैयारी की जा रही है। मुंबई पहुंचने के बाद उनकी सर्जरी होगी। टीम के मुताबिक, चोट और सर्जरी की वजह से नुसरत को आराम करने और ठीक होने में समय लगेगा। इसका असर आने वाले हफ्तों में उनकी काम से जुड़ी जिम्मेदारियों पर भी पड़ सकता है। टीम ने सभी से उनकी निजता का सम्मान करने और उन्हें इलाज पर ध्यान देने देने की अपील की है। बता दें कि हादसे से करीब एक हफ्ते पहले नुसरत ने सोशल मीडिया पर छुट्टियों की कुछ तस्वीरें शेयर की थीं। टाइगर श्रॉफ की फिल्म में एंट्री नुसरत के टाइगर श्रॉफ की अगली फिल्म की कास्ट में शामिल होने की भी खबर है। यह टाइगर और नुसरत की पहली ऑन-स्क्रीन जोड़ी होगी। एक सूत्र ने पिंकविला को बताया, “टीम को ऐसी एक्ट्रेस चाहिए थी, जो कहानी में मजबूती और भावनात्मक गहराई ला सके। नुसरत हमेशा सबसे मजबूत विकल्पों में थीं।” फिल्म में पश्मीना रोशन, अभिषेक बनर्जी और एल्विश यादव भी अहम भूमिकाओं में हैं। शूटिंग के दौरान घायल हुई थीं नुसरत साल 2023 में नुसरत भरूचा के शूटिंग के दौरान घायल होने की दो घटनाएं सामने आई थीं। अप्रैल 2023 में फिल्म ‘अकेली’ की शूटिंग के दौरान भी नुसरत हादसे का शिकार हुई थीं। एक सीन में उन्हें भागते हुए दिखाया जाना था। इसी दौरान वह संगमरमर के फर्श पर सिर के बल गिर गई थीं। हादसे के बाद वह करीब आधे घंटे तक दर्द से रोती रहीं। डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें कुछ दिन आराम करने की सलाह दी थी। वहीं, जनवरी 2023 में फिल्म ‘छोरी 2’ की शूटिंग के दौरान एक एक्शन सीन करते समय उनके चेहरे पर चोट लग गई थी। चोट इतनी थी कि उन्हें चेहरे और भौंह के पास टांके लगवाने पड़े थे। इसके बाद उनका एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें वह टांके लगवाती नजर आई थीं। अगस्त 2021 में शूटिंग के दौरान तबीयत बिगड़ी थी इससे पहले अगस्त 2021 में नुसरत की शूटिंग के दौरान अचानक तबीयत बिगड़ गई थी। वह लव रंजन की फिल्म की शूटिंग कर रही थीं। करीब 23-24 दिनों से लगातार काम करने के कारण वह काफी थक गई थीं। घटना वाले दिन उन्हें तेज चक्कर आए और वह ठीक से खड़ी या बात नहीं कर पा रही थीं। इसके बाद उन्हें मुंबई के हिंदुजा अस्पताल ले जाया गया। वहां उनका ब्लड प्रेशर 65/55 तक गिर गया था। डॉक्टरों ने जांच के बाद इसे गंभीर वर्टिगो अटैक बताया था। इसकी वजह ज्यादा तनाव और थकान बताई गई थी। इलाज के बाद उन्हें घर भेज दिया गया। डॉक्टरों ने 15 दिन आराम की सलाह दी थी। उनकी वजह से फिल्म की शूटिंग भी रोक दी गई थी। मौलाना रजवी ने मंदिर जाने पर आपत्ति जताई थी नुसरत भरूचा पिछले साल उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर पहुंची थीं। उन्होंने महाकाल के दर्शन किए और भस्म आरती में भी शामिल हुईं। नुसरत ने मंदिर से अपनी तस्वीर भी शेयर की थी और लिखा था, ‘जय श्री महाकाल।’ इसके बाद ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने उनके मंदिर जाने और हिंदू रीति-रिवाजों का पालन करने पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने इसे शरिया कानून के खिलाफ बताते हुए ‘गुनाह-ए-अजीम’ (बड़ा पाप) कहा था और नुसरत को तौबा (माफी) करने व कलमा पढ़ने की सलाह दी थी। नुसरत मुस्लिम बोहरा परिवार से ताल्लुक रखती हैं। हालांकि, उन्होंने बताया था कि उनका परिवार बचपन से ही सभी धर्मों का सम्मान करता रहा है। नुसरत के मुताबिक, वह मंदिरों के अलावा गुरुद्वारे और चर्च भी जाती रही हैं। उन्होंने वैष्णो देवी और केदारनाथ के दर्शन भी किए हैं। साथ ही वह नमाज भी पढ़ती हैं।
मूवी रिव्यू- ‘प्रेम कीटाणु’:प्यार की तलाश में निकले वीर पहाड़िया की कहानी में है हंसी, उलझन और एक मजेदार ट्विस्ट; जानिए कैसी है फिल्म

कॉलेज में किसी पर दिल आ जाए तो लगता है कहानी बस इतनी सी है, लेकिन कभी प्यार पूरा होने से पहले ही कोई नया मोड़ आ जाता है और फिर वही कहानी चार साल बाद एक बिल्कुल अलग दुनिया में लौटती है। फिल्म ‘प्रेम कीटाणु’ इसी प्यार, दोस्ती और जिंदगी के बदलते रंगों को हल्के फुल्के अंदाज में लेकर चलती है। फिल्म हंसाती है, रिलेट करती है और बीच बीच में जिंदगी की थोड़ी सी कड़वी सच्चाई भी दिखा देती है। फिल्म की कहानी कैसी है कहानी बनारस के इंजीनियरिंग कॉलेज से शुरू होती है। एडमिशन के दौरान विशाल ठाकुर (वीर पहाड़िया) और सुहानी (आफिया सैयद) पहली बार आमने सामने आते हैं। पहली मुलाकात नोकझोंक में बदलती है और दोनों एक दूसरे को श्राप दे बैठते हैं कि चार साल तक विशाल की कोई गर्लफ्रेंड नहीं बनेगी और सुहानी का कोई बॉयफ्रेंड नहीं होगा। इसके बाद दोनों अलग अलग कॉलेज चले जाते हैं। चार साल की कॉलेज लाइफ में विशाल की जिंदगी में प्यार की दस्तक तो होती है, लेकिन बात मुकम्मल नहीं हो पाती। उधर सुहानी अपनी पढ़ाई और फिर करियर की तरफ बढ़ती है। चार साल बाद दोनों की जिंदगी कॉलेज से निकलकर नौकरी की दुनिया में पहुंच चुकी है। सुहानी को अच्छी नौकरी मिलती है, जबकि विशाल को करियर और जिंदगी की अपनी जद्दोजहद से गुजरना पड़ता है। फिर दोनों की मुलाकात होती है और यहीं से पुरानी कहानी नए हालात में दोबारा खुलती है। फिल्म सिर्फ यह नहीं पूछती कि दोनों प्यार में पड़ेंगे या नहीं, बल्कि यह भी देखती है कि वक्त के साथ बदले दो लोग एक दूसरे की जिंदगी में फिर जगह बना पाएंगे या नहीं। इसी के साथ दोस्ती, परिवार और जिम्मेदारियां कहानी को थोड़ा और बड़ा बनाती हैं। फिल्म में एक्टिंग कैसी है वीर पहाड़िया विशाल के किरदार में सहज हैं। कॉलेज के मस्तमौला लड़के से लेकर जिंदगी की परेशानियों से जूझते युवा तक वह किरदार के बदलाव को स्वाभाविक रखते हैं। आफिया सैयद की यह पहली फिल्म है और वह सुहानी के किरदार में फ्रेश लगती हैं। वीर के साथ उनकी नोकझोंक और केमिस्ट्री फिल्म के रोमांटिक हिस्सों में अच्छी लगती है। निखिल विजय फिल्म की जान हैं। मगन अरोड़ा बनकर उनकी कॉमिक टाइमिंग, पंच और वीर के साथ झगड़बंदी कई जगह जबरदस्त मजा देती है। कहानी जहां थोड़ी धीमी पड़ती है, निखिल वहां माहौल फिर से गर्म कर देते हैं। अपारशक्ति खुराना ने अपने किरदार को पूरे अंदाज में निभाया है और उसे इंटरेस्टिंग रखा है। हां, किरदार की लिखावट थोड़ी और मजबूत होती तो उनकी परफॉर्मेंस का असर और बढ़ सकता था। फिल्म का डायरेक्शन कैसा है? अपूर्व सिंह कार्की ने फिल्म को हल्का और यूथफुल रखा है। कॉलेज की मस्ती से लेकर नौकरी और जिम्मेदारियों वाली जिंदगी तक टोन बदलता है, लेकिन फिल्म जरूरत से ज्यादा भारी नहीं होती। राइटर दीपक किंगरानी, जिन्हें सिर्फ एक बंदा काफी है के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिल चुका है, ने रिश्तों, दोस्ती और कॉमेडी को सहज अंदाज में पिरोया है। स्क्रीनप्ले की अच्छी बात यह है कि कहानी सिर्फ रोमांस पर नहीं टिकी। परिवार और दोस्ती को भी जगह मिलती है। हां, बीच में रफ्तार थोड़ी ढीली पड़ती है और कुछ मोड़ पहले से भांपे जा सकते हैं। इमोशनल हिस्सों में थोड़ा और ठहराव होता तो कहानी का असर और बढ़ता। तकनीकी तौर पर फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट रंगीन और यूथफुल है। कॉलेज और बनारस का माहौल कहानी को अपनी अलग फील देता है। फिल्म का म्यूजिक कैसा है ‘कहो तो’, ‘तू मेरा रइयो’ और ‘इश्क का गुलाम’ फिल्म के रोमांटिक और यूथफुल मूड को अच्छे से सपोर्ट करते हैं। गाने कहानी से अलग नहीं लगते और फिल्म की फील को बनाए रखते हैं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट प्यार की मस्ती, दोस्ती की शरारत और जिंदगी की थोड़ी सी कड़वी मिठास, ‘प्रेम कीटाणु’ इन तीनों का अच्छा कॉम्बिनेशन है। निखिल विजय खूब हंसाते हैं, वीर और आफिया की जोड़ी जमती है। थोड़ी कसावट की कमी जरूर है, लेकिन ये फिल्म मुस्कुराने और पुराने कॉलेज वाले दिनों को याद करने का अच्छा बहाना है।
मूवी रिव्यू- ‘प्रेम कीटाणु’:प्यार की तलाश में निकले वीर पहाड़िया की कहानी में है हंसी, उलझन और एक मजेदार ट्विस्ट; जानिए कैसी है फिल्म

कॉलेज में किसी पर दिल आ जाए तो लगता है कहानी बस इतनी सी है, लेकिन कभी प्यार पूरा होने से पहले ही कोई नया मोड़ आ जाता है और फिर वही कहानी चार साल बाद एक बिल्कुल अलग दुनिया में लौटती है। फिल्म ‘प्रेम कीटाणु’ इसी प्यार, दोस्ती और जिंदगी के बदलते रंगों को हल्के फुल्के अंदाज में लेकर चलती है। फिल्म हंसाती है, रिलेट करती है और बीच बीच में जिंदगी की थोड़ी सी कड़वी सच्चाई भी दिखा देती है। फिल्म की कहानी कैसी है कहानी बनारस के इंजीनियरिंग कॉलेज से शुरू होती है। एडमिशन के दौरान विशाल ठाकुर (वीर पहाड़िया) और सुहानी (आफिया सैयद) पहली बार आमने सामने आते हैं। पहली मुलाकात नोकझोंक में बदलती है और दोनों एक दूसरे को श्राप दे बैठते हैं कि चार साल तक विशाल की कोई गर्लफ्रेंड नहीं बनेगी और सुहानी का कोई बॉयफ्रेंड नहीं होगा। इसके बाद दोनों अलग अलग कॉलेज चले जाते हैं। चार साल की कॉलेज लाइफ में विशाल की जिंदगी में प्यार की दस्तक तो होती है, लेकिन बात मुकम्मल नहीं हो पाती। उधर सुहानी अपनी पढ़ाई और फिर करियर की तरफ बढ़ती है। चार साल बाद दोनों की जिंदगी कॉलेज से निकलकर नौकरी की दुनिया में पहुंच चुकी है। सुहानी को अच्छी नौकरी मिलती है, जबकि विशाल को करियर और जिंदगी की अपनी जद्दोजहद से गुजरना पड़ता है। फिर दोनों की मुलाकात होती है और यहीं से पुरानी कहानी नए हालात में दोबारा खुलती है। फिल्म सिर्फ यह नहीं पूछती कि दोनों प्यार में पड़ेंगे या नहीं, बल्कि यह भी देखती है कि वक्त के साथ बदले दो लोग एक दूसरे की जिंदगी में फिर जगह बना पाएंगे या नहीं। इसी के साथ दोस्ती, परिवार और जिम्मेदारियां कहानी को थोड़ा और बड़ा बनाती हैं। फिल्म में एक्टिंग कैसी है वीर पहाड़िया विशाल के किरदार में सहज हैं। कॉलेज के मस्तमौला लड़के से लेकर जिंदगी की परेशानियों से जूझते युवा तक वह किरदार के बदलाव को स्वाभाविक रखते हैं। आफिया सैयद की यह पहली फिल्म है और वह सुहानी के किरदार में फ्रेश लगती हैं। वीर के साथ उनकी नोकझोंक और केमिस्ट्री फिल्म के रोमांटिक हिस्सों में अच्छी लगती है। निखिल विजय फिल्म की जान हैं। मगन अरोड़ा बनकर उनकी कॉमिक टाइमिंग, पंच और वीर के साथ झगड़बंदी कई जगह जबरदस्त मजा देती है। कहानी जहां थोड़ी धीमी पड़ती है, निखिल वहां माहौल फिर से गर्म कर देते हैं। अपारशक्ति खुराना ने अपने किरदार को पूरे अंदाज में निभाया है और उसे इंटरेस्टिंग रखा है। हां, किरदार की लिखावट थोड़ी और मजबूत होती तो उनकी परफॉर्मेंस का असर और बढ़ सकता था। फिल्म का डायरेक्शन कैसा है? अपूर्व सिंह कार्की ने फिल्म को हल्का और यूथफुल रखा है। कॉलेज की मस्ती से लेकर नौकरी और जिम्मेदारियों वाली जिंदगी तक टोन बदलता है, लेकिन फिल्म जरूरत से ज्यादा भारी नहीं होती। राइटर दीपक किंगरानी, जिन्हें सिर्फ एक बंदा काफी है के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिल चुका है, ने रिश्तों, दोस्ती और कॉमेडी को सहज अंदाज में पिरोया है। स्क्रीनप्ले की अच्छी बात यह है कि कहानी सिर्फ रोमांस पर नहीं टिकी। परिवार और दोस्ती को भी जगह मिलती है। हां, बीच में रफ्तार थोड़ी ढीली पड़ती है और कुछ मोड़ पहले से भांपे जा सकते हैं। इमोशनल हिस्सों में थोड़ा और ठहराव होता तो कहानी का असर और बढ़ता। तकनीकी तौर पर फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट रंगीन और यूथफुल है। कॉलेज और बनारस का माहौल कहानी को अपनी अलग फील देता है। फिल्म का म्यूजिक कैसा है ‘कहो तो’, ‘तू मेरा रइयो’ और ‘इश्क का गुलाम’ फिल्म के रोमांटिक और यूथफुल मूड को अच्छे से सपोर्ट करते हैं। गाने कहानी से अलग नहीं लगते और फिल्म की फील को बनाए रखते हैं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट प्यार की मस्ती, दोस्ती की शरारत और जिंदगी की थोड़ी सी कड़वी मिठास, ‘प्रेम कीटाणु’ इन तीनों का अच्छा कॉम्बिनेशन है। निखिल विजय खूब हंसाते हैं, वीर और आफिया की जोड़ी जमती है। थोड़ी कसावट की कमी जरूर है, लेकिन ये फिल्म मुस्कुराने और पुराने कॉलेज वाले दिनों को याद करने का अच्छा बहाना है।
मूवी रिव्यू-‘दृश्यम 3’:2 अक्टूबर का राज सब जानते हैं, असली खेल अब 23 जुलाई का, अजय देवगन की विजय वाली बाजी इस बार कितनी भारी पड़ी?

2 अक्टूबर का सच ‘दृश्यम’ के हर फैन को पता है। पाव भाजी, सत्संग, फिल्म और फिर विजय सलगांवकर का वो खेल, जिसने पुलिस को सालों तक उलझाए रखा। लेकिन इस बार कहानी सिर्फ 2 अक्टूबर पर नहीं रुकी है। अब एक और तारीख सामने है- 23 जुलाई। आखिर उस दिन विजय कहां था? क्या हुआ था? और क्या इस तारीख के जरिए पुलिस विजय की बनाई पूरी कहानी को पलट सकती है? यहीं से फिल्म अपना असली खेल शुरू करती है। सामने हैं पुलिस अधीक्षक राजवीर सिंह तोमर, जिनके पास सवाल भी हैं और विजय को घेरने का इरादा भी। दूसरी तरफ विजय है, जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसका दिमाग है। फिल्म कई बार आपको यकीन दिलाती है कि इस बार विजय फंस गया। फिर विजय चुप हो जाता है। आप सोचने लगते हैं कि उसके दिमाग में आखिर क्या चल रहा है? यही फिल्म का मजा है। हालांकि हर चाल उतनी दमदार नहीं है और कुछ जगह कहानी थोड़ी आसान लगती है। कहानी सलगांवकर परिवार अपनी पुरानी जिंदगी में लौटने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सैम देशमुख की मौत का दर्द मीरा देशमुख के अंदर अब भी जिंदा है। मीरा और महेश देशमुख के लिए मामला खत्म नहीं हुआ। केस दोबारा खुलता है और पुलिस अधीक्षक राजवीर सिंह तोमर की एंट्री होती है। राजवीर पुराने सबूतों को नए नजरिए से देखता है। विजय सलगांवकर फिर पुलिस की नजर में आ जाता है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि विजय ने 2 अक्टूबर को क्या किया था। सवाल यह भी है कि 23 जुलाई को विजय कहां था और इस तारीख का पुराने केस से क्या संबंध है? वकील इंद्रजीत शेट्टी भी इस खेल में उतरते हैं। इंस्पेक्टर गायतोंडे अपने पुराने अंदाज में केस को थोड़ा हल्का रखते हैं। इसके बाद शुरू होती है विजय और राजवीर की दिमागी टक्कर। एक तरफ कानून है। दूसरी तरफ विजय है, जो कानून की किताबें नहीं पढ़ता, लेकिन कानून को अपने हिसाब से घुमाना जानता है। अभिनय फिल्म की सबसे बड़ी ताकत अजय देवगन और जयदीप अहलावत की टक्कर है। अजय देवगन का विजय अब सिर्फ एक किरदार नहीं रहा। चेहरे पर ज्यादा हलचल नहीं है। आवाज में भी ज्यादा बदलाव नहीं है। लेकिन उनकी आंखें बहुत कुछ कहती हैं। आप विजय को देखते हैं और सोचते हैं कि आखिर वह इतना शांत क्यों है? यही शांति कहानी का रोमांच बढ़ाती है। दूसरी तरफ जयदीप अहलावत हैं। राजवीर के रूप में उनका अंदाज शांत है। वह धीरे-धीरे विजय के करीब आते हैं। यही उनका सबसे बड़ा हथियार है। शुरुआत में दोनों की टक्कर फिल्म को बांधे रखती है। कुछ जगह फिल्म धीमी पड़ती है। लेकिन अजय और जयदीप के आमने-सामने आते ही रोमांच फिर बढ़ जाता है। प्रकाश राज भी अपने किरदार में शानदार हैं। उनके संवाद और अंदाज कोर्ट के सीन को मजबूत बनाते हैं। श्रेया सरन को इस बार पहले दोनों हिस्सों के मुकाबले कम जगह मिली है। हालांकि उनके भावनात्मक सीन असर छोड़ते हैं। तब्बू और रजत कपूर अपने बेटे को खोने का दर्द लेकर लौटे हैं। दोनों के किरदारों में बेचैनी साफ नजर आती है। फिर आते हैं गायतोंडे। गंभीर कहानी के बीच यह किरदार हंसी का मौका देता है। 2 अक्टूबर के मीम्स, पाव भाजी और अपनी पुलिसिया परेशानियों के साथ गायतोंडे फिल्म का तनाव हल्का करते हैं। निर्देशन अभिषेक पाठक की अच्छी बात यह है कि उन्होंने तीसरे हिस्से को पहले दो हिस्सों की नकल नहीं बनाया। कहानी में नए सवाल जोड़े गए हैं। इनमें 23 जुलाई वाली कड़ी सबसे दिलचस्प है। फिल्म जल्दी कहानी में उतर जाती है। ज्यादा समय यह बताने में नहीं लगाया गया कि कौन कौन है। दर्शक पहले से विजय की दुनिया जानता है। इसलिए फिल्म सीधे खेल शुरू करती है। लेकिन यही इसकी कमजोरी भी है। विजय और उसके परिवार के बीच का भावनात्मक रिश्ता पहले दो हिस्सों में ज्यादा मजबूत था। इस बार कहानी ज्यादा इस बात पर टिकी है कि विजय अगली चाल क्या चलेगा। रोमांच बढ़ा है। परिवार वाला भाव थोड़ा कम हुआ है। कहानी और पटकथा पटकथा की सबसे बड़ी ताकत यह है कि फिल्म जवाब देने के बजाय लगातार नए सवाल खड़े करती है। 23 जुलाई क्या है? राजवीर के पास ऐसा क्या है, जिससे विजय परेशान है? विजय इतना शांत क्यों है? और सबसे बड़ा सवाल- क्या इस बार उसकी कोई चाल काम नहीं करेगी? यही सवाल आपको आगे ले जाते हैं। इंटरवल के आसपास फिल्म अच्छी पकड़ बनाती है। दूसरे हिस्से में विजय की योजना सामने आने लगती है। लेकिन कुछ मोड़ ऐसे हैं, जहां आपको लगेगा- यह इतनी आसानी से कैसे हो गया? पहले दो हिस्सों में विजय की योजनाएं बहुत मजबूत लगती थीं। इस बार कुछ जगह कहानी को आगे बढ़ाने के लिए आसान रास्ता लिया गया है। तकनीकी पक्ष गोवा इस बार भी कहानी का हिस्सा लगता है। यह सिर्फ खूबसूरत जगह दिखाने के लिए नहीं है। कैमरे का काम रोमांच वाला माहौल बनाए रखता है। फिल्म की कटिंग भी ज्यादातर जगह तेज है। ढाई घंटे की फिल्म होने के बावजूद यह बेवजह लंबी नहीं लगती। हालांकि बीच के कुछ सीन और छोटे किए जा सकते थे। संगीत और पार्श्व संगीत फिल्म में गानों की जरूरत कम है। अच्छी बात है कि कहानी पर गानों का बोझ नहीं डाला गया। अमर मोहिले का पार्श्व संगीत फिल्म की बड़ी ताकत है। जैसे-जैसे विजय की योजनाएं सामने आती हैं, संगीत रोमांच बढ़ाता है। कई सीन में आपको पता होता है कि कुछ होने वाला है। फिर भी संगीत बेचैनी बढ़ा देता है। ‘मुस्कुरा दो’ भावनात्मक हिस्सों को सहारा देता है। लेकिन फिल्म की असली ताकत पार्श्व संगीत ही है। अंतिम राय ‘दृश्यम द कॉन्क्लूजन’ में कई शानदार रोमांचक पल हैं। हालांकि हर जगह पहले दोनों हिस्सों जैसा असर नहीं बन पाता। अजय देवगन और जयदीप अहलावत की टक्कर फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। गायतोंडे तनाव के बीच हंसी देते हैं। अमर मोहिले का पार्श्व संगीत माहौल बनाए रखता है। बीच में रफ्तार थोड़ी गिरती है। कुछ योजनाएं जरूरत से ज्यादा आसान लगती हैं। लेकिन 23 जुलाई का सवाल और विजय के दिमाग में चल रहा खेल इतना मजबूत
मूवी रिव्यू-‘दृश्यम 3’:2 अक्टूबर का राज सब जानते हैं, असली खेल अब 23 जुलाई का, अजय देवगन की विजय वाली बाजी इस बार कितनी भारी पड़ी?

2 अक्टूबर का सच ‘दृश्यम’ के हर फैन को पता है। पाव भाजी, सत्संग, फिल्म और फिर विजय सलगांवकर का वो खेल, जिसने पुलिस को सालों तक उलझाए रखा, लेकिन इस बार कहानी सिर्फ 2 अक्टूबर पर नहीं रुकी है। अब एक और तारीख सामने है- 23 जुलाई। आखिर उस दिन विजय कहां था? क्या हुआ था? और क्या इस तारीख के जरिए पुलिस विजय की बनाई पूरी कहानी को पलट सकती है? यहीं से फिल्म अपना असली खेल शुरू करती है। सामने हैं पुलिस अधीक्षक राजवीर सिंह तोमर, जिनके पास सवाल भी हैं और विजय को घेरने का इरादा भी। दूसरी तरफ विजय है, जिसकी सबसे बड़ी ताकत उसका दिमाग है। फिल्म कई बार आपको यकीन दिलाती है कि इस बार विजय फंस गया। फिर विजय चुप हो जाता है। आप सोचने लगते हैं कि उसके दिमाग में आखिर क्या चल रहा है? यही फिल्म का मजा है। हालांकि हर चाल उतनी दमदार नहीं है और कुछ जगह कहानी थोड़ी आसान लगती है। फिल्म की कहानी कैसी है सलगांवकर परिवार अपनी पुरानी जिंदगी में लौटने की कोशिश कर रहा है, लेकिन सैम देशमुख की मौत का दर्द मीरा देशमुख के अंदर अब भी जिंदा है। मीरा और महेश देशमुख के लिए मामला खत्म नहीं हुआ। केस दोबारा खुलता है और पुलिस अधीक्षक राजवीर सिंह तोमर की एंट्री होती है। राजवीर पुराने सबूतों को नए नजरिए से देखता है। विजय सलगांवकर फिर पुलिस की नजर में आ जाता है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि विजय ने 2 अक्टूबर को क्या किया था। सवाल यह भी है कि 23 जुलाई को विजय कहां था और इस तारीख का पुराने केस से क्या संबंध है? वकील इंद्रजीत शेट्टी भी इस खेल में उतरते हैं। इंस्पेक्टर गायतोंडे अपने पुराने अंदाज में केस को थोड़ा हल्का रखते हैं। इसके बाद शुरू होती है विजय और राजवीर की दिमागी टक्कर। एक तरफ कानून है। दूसरी तरफ विजय है, जो कानून की किताबें नहीं पढ़ता, लेकिन कानून को अपने हिसाब से घुमाना जानता है। फिल्म में एक्टिंग कैसी है फिल्म की सबसे बड़ी ताकत अजय देवगन और जयदीप अहलावत की टक्कर है। अजय देवगन का विजय अब सिर्फ एक किरदार नहीं रहा। चेहरे पर ज्यादा हलचल नहीं है। आवाज में भी ज्यादा बदलाव नहीं है, लेकिन उनकी आंखें बहुत कुछ कहती हैं। आप विजय को देखते हैं और सोचते हैं कि आखिर वह इतना शांत क्यों है? यही शांति कहानी का रोमांच बढ़ाती है। दूसरी तरफ जयदीप अहलावत हैं। राजवीर के रूप में उनका अंदाज शांत है। वह धीरे-धीरे विजय के करीब आते हैं। यही उनका सबसे बड़ा हथियार है। शुरुआत में दोनों की टक्कर फिल्म को बांधे रखती है। कुछ जगह फिल्म धीमी पड़ती है, लेकिन अजय और जयदीप के आमने-सामने आते ही रोमांच फिर बढ़ जाता है। प्रकाश राज भी अपने किरदार में शानदार हैं। उनके डायलॉग्स और अंदाज कोर्ट के सीन को मजबूत बनाते हैं। श्रेया सरन को इस बार पहले दोनों हिस्सों के मुकाबले कम जगह मिली है। हालांकि, उनके इमोशनल सीन असर छोड़ते हैं। तब्बू और रजत कपूर अपने बेटे को खोने का दर्द लेकर लौटे हैं। दोनों के किरदारों में बेचैनी साफ नजर आती है। फिर आते हैं गायतोंडे। सीरियस कहानी के बीच यह किरदार हंसी का मौका देता है। 2 अक्टूबर के मीम्स, पाव भाजी और अपनी पुलिसिया परेशानियों के साथ गायतोंडे फिल्म का तनाव हल्का करते हैं। फिल्म का डायरेक्शन कैसा है? अभिषेक पाठक की अच्छी बात यह है कि उन्होंने तीसरे हिस्से को पहले दो हिस्सों की नकल नहीं बनाया। कहानी में नए सवाल जोड़े गए हैं। इनमें 23 जुलाई वाली कड़ी सबसे दिलचस्प है। फिल्म जल्दी कहानी में उतर जाती है। ज्यादा समय यह बताने में नहीं लगाया गया कि कौन कौन है। दर्शक पहले से विजय की दुनिया जानता है। इसलिए फिल्म सीधे खेल शुरू करती है। लेकिन यही इसकी कमजोरी भी है। विजय और उसके परिवार के बीच का इमोशनल रिश्ता पहले दो हिस्सों में ज्यादा मजबूत था। इस बार कहानी ज्यादा इस बात पर टिकी है कि विजय अगली चाल क्या चलेगा। रोमांच बढ़ा है। परिवार वाला भाव थोड़ा कम हुआ है। फिल्म की कहानी और स्क्रीनप्ले कैसा है स्क्रीनप्ले की सबसे बड़ी ताकत यह है कि फिल्म जवाब देने के बजाय लगातार नए सवाल खड़े करती है। 23 जुलाई क्या है? राजवीर के पास ऐसा क्या है, जिससे विजय परेशान है? विजय इतना शांत क्यों है? और सबसे बड़ा सवाल- क्या इस बार उसकी कोई चाल काम नहीं करेगी? यही सवाल आपको आगे ले जाते हैं। इंटरवल के आसपास फिल्म अच्छी पकड़ बनाती है। दूसरे हिस्से में विजय की योजना सामने आने लगती है। लेकिन कुछ मोड़ ऐसे हैं, जहां आपको लगेगा- यह इतनी आसानी से कैसे हो गया? पहले दो हिस्सों में विजय की योजनाएं बहुत मजबूत लगती थीं। इस बार कुछ जगह कहानी को आगे बढ़ाने के लिए आसान रास्ता लिया गया है। फिल्म का तकनीकी पक्ष कैसा है गोवा इस बार भी कहानी का हिस्सा लगता है। यह सिर्फ खूबसूरत जगह दिखाने के लिए नहीं है। कैमरे का काम रोमांच वाला माहौल बनाए रखता है। फिल्म की कटिंग भी ज्यादातर जगह तेज है। ढाई घंटे की फिल्म होने के बावजूद यह बेवजह लंबी नहीं लगती। हालांकि बीच के कुछ सीन और छोटे किए जा सकते थे। फिल्म का म्यूजिक कैसा है फिल्म में गानों की जरूरत कम है। अच्छी बात है कि कहानी पर गानों का बोझ नहीं डाला गया। अमर मोहिले का बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म की बड़ी ताकत है। जैसे-जैसे विजय की योजनाएं सामने आती हैं, संगीत रोमांच बढ़ाता है। कई सीन में आपको पता होता है कि कुछ होने वाला है। फिर भी संगीत बेचैनी बढ़ा देता है। ‘मुस्कुरा दो’ भावनात्मक हिस्सों को सहारा देता है। लेकिन फिल्म की असली ताकत बैकग्राउंड म्यूजिक ही है। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘दृश्यम द कॉन्क्लूजन’ में कई शानदार रोमांचक पल हैं। हालांकि हर जगह पहले दोनों हिस्सों जैसा असर नहीं बन पाता। अजय देवगन और जयदीप अहलावत की टक्कर फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। गायतोंडे तनाव के बीच हंसी देते हैं। अमर मोहिले का पार्श्व संगीत माहौल बनाए रखता है। बीच में रफ्तार थोड़ी गिरती
प्रेम कीटाणु की स्क्रीनिंग में पहुंचे सलमान:एक्ट्रेस के लिए रेड कार्पेट पर पोज देने के लिए किया इंतजार, वीर पहाड़िया के गले मिले

फिल्म ‘प्रेम कीटाणु’ की स्टार-स्टडेड स्क्रीनिंग गुरुवार को मुंबई में आयोजित हुई। स्क्रीनिंग में सलमान खान पहुंचे और वह फिल्म के लीड एक्टर वीर पहाड़िया के साथ नजर आए। वहीं, इवेंट में जैकलीन फर्नांडिस, करण जौहर, सारा तेंदुलकर, जरीन खान और एल्विश यादव भी आए। स्क्रीनिंग के दौरान सलमान खान का एक वीडियो चर्चा में आया। फिल्म ‘प्रेम कीटाणु’ की स्पेशल स्क्रीनिंग के दौरान सलमान खान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। स्क्रीनिंग में सलमान जब पहुंचे तो मीडिया और पैपराजी ने उन्हें रेड कार्पेट पर आकर तस्वीरें देने के लिए कहा। हालांकि, उसी समय मॉडल और एक्ट्रेस साक्षी मलिक कैमरों के सामने पोज दे रही थीं। सलमान खान ने तुरंत रेड कार्पेट पर पहुंचने के बजाय इंतजार किया। वह कुछ देर पीछे खड़े रहे और साक्षी मलिक को अपने पोज पूरे करने का मौका दिया। साक्षी मलिक के पोज देने के बाद सलमान खान रेड कार्पेट पर पहुंचे और पोज दिए। वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर सलमान के इस व्यवहार की तारीफ हो रही है। ‘प्रेम कीटाणु’ एक हिंदी रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म है, जिसमें वीर पहाड़िया, आफिया सैयद और अपारशक्ति खुराना मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म का रनटाइम करीब 2 घंटे 18 मिनट है। फिल्म की कहानी रोमांस और कॉमेडी के इर्द-गिर्द बुनी गई है।
प्रेम कीटाणु की स्क्रीनिंग में पहुंचे सलमान:एक्ट्रेस के लिए रेड कार्पेट पर पोज देने के लिए किया इंतजार, वीर पहाड़िया के गले मिले

फिल्म ‘प्रेम कीटाणु’ की स्टार-स्टडेड स्क्रीनिंग गुरुवार को मुंबई में आयोजित हुई। स्क्रीनिंग में सलमान खान पहुंचे और वह फिल्म के लीड एक्टर वीर पहाड़िया के साथ नजर आए। वहीं, इवेंट में जैकलीन फर्नांडिस, करण जौहर, सारा तेंदुलकर, जरीन खान और एल्विश यादव भी आए। स्क्रीनिंग के दौरान सलमान खान का एक वीडियो चर्चा में आया। फिल्म ‘प्रेम कीटाणु’ की स्पेशल स्क्रीनिंग के दौरान सलमान खान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में है। स्क्रीनिंग में सलमान जब पहुंचे तो मीडिया और पैपराजी ने उन्हें रेड कार्पेट पर आकर तस्वीरें देने के लिए कहा। हालांकि, उसी समय मॉडल और एक्ट्रेस साक्षी मलिक कैमरों के सामने पोज दे रही थीं। सलमान खान ने तुरंत रेड कार्पेट पर पहुंचने के बजाय इंतजार किया। वह कुछ देर पीछे खड़े रहे और साक्षी मलिक को अपने पोज पूरे करने का मौका दिया। साक्षी मलिक के पोज देने के बाद सलमान खान रेड कार्पेट पर पहुंचे और पोज दिए। वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर सलमान के इस व्यवहार की तारीफ हो रही है। ‘प्रेम कीटाणु’ एक हिंदी रोमांटिक-कॉमेडी फिल्म है, जिसमें वीर पहाड़िया, आफिया सैयद और अपारशक्ति खुराना मुख्य भूमिकाओं में हैं। फिल्म का रनटाइम करीब 2 घंटे 18 मिनट है। फिल्म की कहानी रोमांस और कॉमेडी के इर्द-गिर्द बुनी गई है।
'छठी मैया' गाने की शूटिंग में इमोशनल हुईं तमन्ना:बोलीं- 4 साल पहले रोल मिलता तो नहीं कर पाती; थिएटर्स के बाहर जूते-चप्पल उतारकर जा रहे लोग

एक्ट्रेस तमन्ना भाटिया इन दिनों अपनी नई फिल्म ‘द वन’ को लेकर काफी सुर्खियों में हैं। फिल्म में उनका किरदार और खासतौर पर ‘छठी मैया’ गाना चर्चा में है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में तमन्ना ने छठ महापर्व से अपने भावनात्मक जुड़ाव, स्पिरिचुअलिटी और सनातन पर खुलकर बात की। तमन्ना ने बताया कि सिनेमाघरों में दर्शक इस फिल्म को सिर्फ मनोरंजन के तौर पर नहीं, बल्कि एक पर्व की तरह देख रहे हैं; लोग थिएटर में पॉपकॉर्न छोड़कर ठेकुआ बांट रहे हैं और जूते-चप्पल बाहर उतारकर हॉल में जा रहे हैं। सवाल: ‘द वन’ की स्क्रिप्ट जब पहली बार आपके पास आई, तो आपने इसमें काम करने के लिए ‘हां’ क्यों कहा? जवाब: मुझे लगा कि यह बहुत ही दिलचस्प कॉन्सेप्ट है, जो लोककथा, फैंटेसी और आस्था को एक साथ लेकर आता है। हमारे देश में ऐसी कई कथाएं हैं जो अब तक आम लोगों तक नहीं पहुंची हैं। छठ महापर्व को करीब 30 से 40 करोड़ लोग मनाते हैं। हमने होली-दिवाली तो फिल्मों में बहुत देखी है, लेकिन छठ जैसे महापर्व को पहली बार इतने बड़े पैमाने पर बड़े पर्दे पर दिखाया गया है। साथ ही, इस एक्शन फिल्म के केंद्र में एक गहरा इमोशन है। मुझे बचपन से ही ‘द ममी’ जैसी फिल्में पसंद रही हैं, जिनमें मैजिक और फोकलोर होता है। इसलिए मुझे लगा कि यह एक ऐसी फिल्म है जिसे पूरी फैमिली साथ बैठकर देख सकती है। सवाल: फिल्म में ‘छठी मैया’ का गाना करते समय आप इमोशनल हो गईं थी। आपके अंदर क्या भावनात्मक और आध्यात्मिक बदलाव आए? जवाब: जब मैंने पहली बार विशाल मिश्रा की आवाज में यह गाना सुना, तो लगा कि यह हर भक्त की अंदरूनी भावना है। शूटिंग के दौरान जब मैं सूर्य देव को अर्घ्य देने का रिचुअल कर रही थी, तब मुझे एक बहुत बड़ी बात समझ में आई, जिस चीज का अस्त होता है, उसका उदय भी निश्चित है। हम जिंदगी में कई बार उतार-चढ़ाव देखकर निराश हो जाते हैं, लेकिन छठ महापर्व हमें सिखाता है कि डूबते सूरज के बाद उगता सूरज जरूर आता है। इस गाने ने मुझे ग्रेटिट्यूड का गहरा भाव महसूस कराया। सवाल: थिएटर से दर्शकों का किस तरह का रिएक्शन मिल रहा है, क्या आपने इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद की थी? जवाब: सच कहूं तो हमने फिल्म बनाते समय ऐसा बिल्कुल नहीं सोचा था। लेकिन अब जब मैं रील्स और वीडियो देख रही हूं, तो लोग सिनेमाघर के बाहर अपने जूते-चप्पल उतारकर अंदर जा रहे हैं। लोग हॉल में पॉपकॉर्न छोड़ ठेकुआ बांट रहे हैं। बिहार, पटना और झारखंड से जिस तरह का प्यार मिल रहा है, वैसा मैंने लंबे समय से किसी फिल्म के लिए नहीं देखा। कई लोग थिएटर में भावुक होकर रो रहे हैं, क्योंकि यह उनकी आस्था से जुड़ा है। यह देखना मेरे लिए बहुत मैजिकल है। सवाल: आप खुद शिव भक्त हैं और स्पिरिचुअल हैं। क्या इस जुड़ाव ने आपको इस रोल को निभाने में मदद की? जवाब: बिल्कुल। करीब चार साल पहले जब मैं अपने गुरु से मिली, तब मेरी असल स्पिरिचुअल जर्नी शुरू हुई। मुझे लगता है कि अगर यह फिल्म मुझे 4 साल पहले ऑफर होती, तो शायद मैं इसे उस तरह नहीं कर पाती। क्योंकि भक्ति एक ऐसा भाव है जिसमें आप कोई मिलावट या झूठी एक्टिंग नहीं कर सकते। अगर आपके अंदर वह भाव सच्चा नहीं है, तो दर्शक तुरंत पकड़ लेते हैं। पटना में एक स्टूडेंट ने मुझसे कहा था कि आप यह गाना इसलिए कर पाईं क्योंकि ऊपर वाले ने आपको इसके लिए चुना है। सवाल: आजकल सनातन और भारतीय संस्कृति पर आधारित फिल्मों को दर्शकों का काफी प्यार मिल रहा है। इस दौर को आप कैसे देखती हैं? जवाब: यह बहुत जरूरी दौर है, खासकर अर्बन इंडिया के लिए। हम हर चीज को लॉजिक और सबूत से तौलने की कोशिश करते हैं। सनातन संस्कृति में जो बातें कही गई हैं, वे जितनी स्पिरिचुअल हैं, उतनी ही साइंटिफिक भी हैं। स्पिरिचुअलिटी कहती है कि आप पहले विश्वास कीजिए, अनुभव अपने आप मिल जाएगा। आज लोग अपनी संस्कृति के बारे में और जानना चाहते हैं, इसलिए जब उन्हें ऐसी सच्ची कहानियां मिलती हैं, तो फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बेहतरीन प्रदर्शन करती हैं। सवाल: फिल्मों में सिनेमैटिक लिबर्टी और कल्चरल ऑथेंटिसिटी के बीच संतुलन बनाना कितना मुश्किल होता है? जवाब: आपका इरादा सही होना चाहिए। जब हमने छठ का पूरा सीक्वेंस शूट किया, तो सभी नियमों और प्रोटोकॉल का पूरा ध्यान रखा। हमारे डायरेक्टर दीपक यूपी-बिहार बेल्ट से हैं, इसलिए वे बहुत पर्टिकुलर थे। हम कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं बना रहे थे, बल्कि एक कहानी के जरिए छठ की आस्था और इमोशन को लोगों तक पहुंचा रहे थे। उस इमोशन को फील कराने के लिए थोड़ी सिनेमैटिक लिबर्टी लेनी पड़ती है, ताकि दर्शक उस श्रद्धा को गहराई से महसूस कर सकें। ‘वन – फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन फिल्म ‘वन – फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ ने अपनी रिलीज के छठे दिन 7,070 शो के जरिए ₹4.25 करोड़ का नेट कलेक्शन दर्ज किया है। इस कमाई के साथ भारत में फिल्म का कुल नेट कलेक्शन ₹49.10 करोड़ और कुल ग्रॉस कलेक्शन ₹58.42 करोड़ तक पहुंच गया है। ओवरसीज मार्केट की बात करें तो फिल्म ने छठे दिन ₹0.50 करोड़ की कमाई की, जिससे इसका कुल ओवरसीज ग्रॉस कलेक्शन ₹5.00 करोड़ हो गया है। इन आंकड़ों को मिलाकर फिल्म का वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन अब ₹63.42 करोड़ हो चुका है। फिल्म 25 सितंबर को रिलीज हुई थी।









