Tuesday, 22 Sep 2026 | 03:04 AM

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अमेरिका में 250 डॉलर के नोट पर ट्रम्प की तस्वीर:150 साल पुराना नियम बदलने की तैयारी, संसद की मंजूरी बाकी

अमेरिका में 250 डॉलर के नोट पर ट्रम्प की तस्वीर:150 साल पुराना नियम बदलने की तैयारी, संसद की मंजूरी बाकी

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की तस्वीर वाले 250 डॉलर के नोट को जारी करने की तैयारी शुरू हो गई है। ट्रम्प सरकार का कहना है कि अगर कांग्रेस (संसद) कानून बदल देती है, तो नया नोट छापने का रास्ता साफ हो जाएगा। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने बताया कि अभी अमेरिका में एक नियम है, जिसके तहत किसी जीवित व्यक्ति की तस्वीर नोट पर नहीं छापी जा सकती। इसी नियम में बदलाव की कोशिश चल रही है। अगर प्रस्ताव पास हो जाता है, तो ट्रम्प अमेरिकी नोट पर छपने वाले 150 साल से ज्यादा समय बाद पहले जीवित व्यक्ति होंगे। 2026 में अमेरिका की स्थापना के 250 साल पूरे रहे बेसेंट ने बताया कि 2026 में अमेरिका अपनी स्थापना के 250 साल पूरे करेगा। ऐसे मौके पर उस समय के राष्ट्रपति की तस्वीर वाला स्मारक नोट जारी करने में कुछ गलत नहीं है। हालांकि फिलहाल यह सिर्फ प्रस्ताव है और इसे लागू करने के लिए कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होगी। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिकी करेंसी छापने वाली एजेंसी ब्यूरो ऑफ इंग्रेविंग एंड प्रिंटिंग (BEP) को नए नोट का डिजाइन तैयार करने के निर्देश दिए हैं। प्रस्तावित डिजाइन में ट्रम्प की तस्वीर नोट के बीच में रखी गई है। रिपब्लिकन सांसद विल्सन ने पेश किया था बिल ट्रम्प की तस्वीर वाले 250 डॉलर के नोट का प्रस्ताव पिछले साल साउथ कैरोलिना के रिपब्लिकन सांसद जो विल्सन ने पेश किया था। फरवरी 2025 में इस बिल को हाउस फाइनेंशियल सर्विसेज कमेटी के पास भेजा गया था। अब इसे कानून बनने के लिए हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट दोनों से मंजूरी लेनी होगी। इससे पहले मार्च में अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने घोषणा की थी कि अमेरिकी नोटों पर ट्रम्प के हस्ताक्षर भी जोड़े जाएंगे। इसे अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ समारोह से जोड़कर देखा जा रहा है। ट्रेजरी विभाग के प्रवक्ता ने कहा कि अमेरिकी करेंसी छापने वाली एजेंसी ब्यूरो ऑफ इंग्रेविंग एंड प्रिंटिंग (BEP) इस प्रस्ताव को लेकर शुरुआती तैयारी और जांच कर रही है। विभाग का कहना है कि अगर कानून पास हो जाता है, तो अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर ट्रम्प की उपलब्धियों को सम्मान देने के लिए यह नोट जारी किया जाएगा। दावा- ट्रम्प ने खुद दिए डिजाइन के सुझाव 250 डॉलर के नोट का शुरुआती डिजाइन बनाने वाले ब्रिटिश कलाकार इयान एलेक्जेंडर ने दावा किया है कि डोनाल्ड ट्रम्प ने खुद इस डिजाइन को देखा और उसमें कुछ बदलाव सुझाए। एलेक्जेंडर के मुताबिक, ट्रम्प चाहते थे कि नोट में अमेरिकी झंडे के रंग और अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ का खास लोगो भी शामिल किया जाए। इस प्रस्ताव को लेकर अमेरिका में राजनीतिक और कानूनी बहस भी तेज हो सकती है। ट्रम्प समर्थक इसे अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ से जुड़ा खास सम्मान बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे परंपरा तोड़ने वाला कदम मान रहे हैं। नया नोट छापने में 6-8 साल लग सकते हैं ट्रम्प की तस्वीर वाला नया नोट जारी करना आसान नहीं होगा। इसे तैयार करने और बाजार में लाने में 6 से 8 साल तक लग सकते हैं। करेंसी छापने वाली एजेंसी ब्यूरो ऑफ इंग्रेविंग एंड प्रिंटिंग (BEP) के अधिकारियों के मुताबिक, नए हाई-वैल्यू नोट को जारी करने के रास्ते में कई कानूनी और तकनीकी चुनौतियां हैं। एजेंसी की पूर्व डायरेक्टर पैटी सोलिमेन ने अधिकारियों को बताया था कि किसी नए नोट के डिजाइन, मंजूरी और प्रिंटिंग की पूरी प्रक्रिया में आमतौर पर 6 से 8 साल लगते हैं। एक कर्मचारी के मुताबिक, अधिकारियों ने साफ कहा था कि फिलहाल ऐसे नोट को जारी करने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा इस मुद्दे पर सभी संबंधित सरकारी एजेंसियों के बीच औपचारिक बैठक भी अभी तक नहीं हुई है। रिपोर्ट में कहा गया कि सोलिमेन और उनकी टीम ने प्रशासन की एक दूसरी मांग मान ली थी, जिसके तहत ट्रम्प के हस्ताक्षर वाले 100 डॉलर नोट छापे जा रहे हैं। अगर ऐसा होता है तो अमेरिकी इतिहास में पहली बार किसी मौजूदा राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करेंसी पर होंगे। अमेरिकी करेंसी पर जीवित व्यक्ति की तस्वीर क्यों नहीं छपती?

रेसलर विनेश फोगाट को मिली सुप्रीम कोर्ट से राहत:एशियन गेम्स के लिए ट्रायल दे सकेंगी; WFI ने शीर्षकोर्ट में दी थी चुनौती

रेसलर विनेश फोगाट को मिली सुप्रीम कोर्ट से राहत:एशियन गेम्स के लिए ट्रायल दे सकेंगी; WFI ने शीर्षकोर्ट में दी थी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट ने ओलिंपियन रेसलर विनेश फोगाट को एशियन गेम्स के ट्रायल की अनुमति दे दी है। कल यानी 28 मई WFI (रेसलिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया) ने ट्रायल रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई थी, जिसे जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच ने ठुकरा दिया। ये ट्रायल 30 व 31 मई को दिल्ली में होने हैं। इन ट्रायल में प्रदर्शन के आधार पर सितंबर में जापान में होने वाले एशियन गेम्स में खिलाड़ियों का चयन होगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 मई को दिए आदेश में विनेश फोगाट को 30-31 मई को होने वाले चयन ट्रायल में भाग लेने की अनुमति दी थी। इसी फैसले को WFI ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था- ट्रायल की पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग कराई जाए। इसे पारदर्शी बनाने के लिए भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) द्वारा नियुक्त स्वतंत्र पर्यवेक्षकों की निगरानी में कराया जाए। दिल्ली हाईकोर्ट से मिली थी विनेश फोगाट को राहत इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीजन बेंच ने विनेश के पक्ष में फैसला सुनाया था। कोर्ट विनेश फोगाट की उस अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उन्होंने सिंगल बेंच के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी। सिंगल जज बेंच ने उनकी याचिका पर अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया था। विनेश फोगाट ने अपनी याचिका में WFI की चयन नीति और उन्हें जारी किए गए शो-कॉज नोटिस को चुनौती दी थी। पेरिस ओलिंपिक में खेला आखिरी मुकाबला विनेश फोगाट ने 2024 में पेरिस ओलिंपिक में अपना आखिरी कुश्ती मैच खेला था। विनेश ने 50 किलोग्राम वेट कैटेगरी में 6 अगस्त 2024 को एक ही दिन में 3 मैच खेले थे। सेमीफाइनल में क्यूबा की रेसलर को पटखनी दी। फाइनल खेलने से पहले वजन की जांच की गई तो उनका वजन 100 ग्राम ज्यादा निकला। इसके बाद उन्हें अयोग्य करार दे दिया गया। विनेश फोगाट ने 8 अगस्त 2024 को कुश्ती से संन्यास लेने का ऐलान कर दिया। 12 दिसंबर 2025 को विनेश ने संन्यास वापस लेने का ऐलान करते हुए कहा था कि वह 2028 में लॉस एंजिलिस ओलिंपिक में हिस्सा लेना चाहती हैं। विनेश हरियाणा के जींद जिले की जुलाना सीट से कांग्रेस की विधायक हैं। सिलसिलेवार ढंग से जानिए पूरा विवाद क्या… डब्ल्यूएफआई ने एंटी-डोपिंग नियमों के तहत संन्यास से वापसी करने वाले एथलीटों के लिए अनिवार्य छह महीने की नोटिस अवधि का हवाला देते हुए फोगाट को 26 जून, 2026 तक घरेलू प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। अनुशासनहीनता और एंटी-डोपिंग नियमों के उल्लंघन के आरोप में कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था। कुश्ती महासंघ ने लिखा था- विनेश ने संन्यास से वापसी के लिए छह महीने पहले सूचना नहीं दी। इससे WFI संविधान, यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग (UWW) नियमों तथा एंटी-डोपिंग प्रावधानों का उल्लंघन हुआ। WFI ने आगे कहा- उनके व्यवहार से भारतीय कुश्ती की छवि को नुकसान पहुंचा और राष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी हुई। साथ ही विनेश से चार प्रमुख आरोपों पर जवाब मांगा था। साथ ही पूछा था कि कार्रवाई क्यों नहीं की जाए। WFI के बैन लगाने पर विनेश की वीडियो पोस्ट कर ये बातें कही थीं… पिछले डेढ़ साल से रेसलिंग मैट से दूर थी विनेश ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा- आप सब को नमस्कार। जैसा की सभी को पता है कि पिछले डेढ़ साल से मैं रेसलिंग मैट से काफी दूर थी। लेकिन अब कुछ महीनों से मैं रेसलिंग की तैयारियां कर रह रही हूं। बड़ी मेहनत और ईमानदारी से मेहनत कर रही हूं। जैसे मैंने पहले देश के लिए मेडल जीते, परमात्मा के आशीर्वाद से, आप सबके सहयोग से फिर से रेसलिंग मैट पर जाऊं और देश के लिए ढेर सारे मेडल जीतूं और देश के तिरंगे का मान बनाए रखूं। एक महीने पहले कॉम्पिटीशन अनाउंस हुआ विनेश ने आगे कहा कि मैं आप सबके साथ वीडियो के माध्यम से कुछ बातें साझा करना चाहती हूं। आज से करीब एक महीना पहले रेसलिंग फेडरेशन ने एक कॉम्पिटीशन का अनाउंसमेंट किया गया। यह टूर्नामेंट जहां पर ऑर्गनाइज करवाया जा रहा है, वो गोंडा यूपी है। जहां बृजभूषण का घर है। वहां उसका प्राइवेट कॉलेज है। वहां पर मेहनत करने वाले हर खिलाड़ी को उसका हक मिलेगा, यह बड़ा नामुमकिन और बहुत इम्पॉसिबल चीज है। सरकार ने सब बृजभूषण के सहारे छोड़ा विनेश ने कहा, कौन रेफरी, किसके मैच में जाएगा। कौन रेफरी कितने पॉइंट देगा, कौन मैच चेयरमैन कहां पर बैठेगा, किसको जितवाना है, किसको हरवाना है। ये सब बृजभूषण और उसके लोगों द्वारा कंट्रोल किया जाएगा। सरकार और हमारा खेल मंत्रालय मूक दर्शक बनकर इस चीज को देख रहा है। कोई खिलाड़ियों की मदद के लिए आगे नहीं आ रहा, मानो बृजभूषण को फ्री हैंड दिया हुआ है कि तुम जो मर्जी करो। चाहे तुम महिला पहलवानों के साथ कुछ करो या तुम कुश्ती जगत के साथ कुछ भी करो। हम तुम्हारे साथ में खड़े हैं। सभी मेहनती खिलाड़ियों का वजन सही से चेक किया जाएगा, उनकी मेहनत का असल रिजल्ट मैट पर निकलकर आएगा, ऐसा मुझे नहीं लगता। तीन साल से केस कोर्ट में पेंडिंग है विनेश ने कहा कि आज से तीन साल पहले हमने सेक्सुअल हैरेसमेंट के खिलाफ भी आवाज उठाई थी। उससे संबंधित केस कोर्ट में पेंडिंग है। 6 महिला खिलाड़ियों ने उसमें शिकायत और गवाही दी थी, उस केस में गवाहियां चल रही है। सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन है कि किसी भी पीड़ित की पहचान को सार्वजनिक न किया जाए, क्योंकि उनकी गरिमा और मान सम्मान की बात होती है। आज कुछ मजबूरियां ऐसी है कि मैं आप सभी को कुछ बताना चाहती हूं। मैं अभी नहीं बोलना चाहती थी, क्योंकि कोर्ट में केस पेडिंग है। देश के सामने सब सच्चाई सामने आ जाएगी। मैं बताना चाहती हूं कि उन 6 में से एक विक्टिम मैं खुद हूं, जिन्होंने शिकायत दी थी। अब जानिए क्या है यौन उत्पीड़न का पूरा मामला… बृजभूषण पर लगाए थे यौन उत्पीड़न के आरोप 18 जनवरी 2023 को रेसलर विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना देकर

दिल्ली में एब्सोल्यूट वोदका-शिवास रीगल की बिक्री पर रोक बरकरार:पेरनोड रिकार्ड पर ₹3,000 करोड़ का टैक्स बकाया; ED के आरोपों के बाद लाइसेंस रद्द

दिल्ली में एब्सोल्यूट वोदका-शिवास रीगल की बिक्री पर रोक बरकरार:पेरनोड रिकार्ड पर ₹3,000 करोड़ का टैक्स बकाया; ED के आरोपों के बाद लाइसेंस रद्द

दिल्ली में एब्सोल्यूट वोदका और शिवास रीगल जैसी शराब की बिक्री पर रोक बरकरार है। दिल्ली हाई कोर्ट ने फ्रांस की दिग्गज शराब कंपनी पेरनोड रिकार्ड की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें कंपनी ने दिल्ली में अपने प्रोडक्ट्स बेचने की इजाजत मांगी थी। कंपनी साल 2021 की दिल्ली लिकर पॉलिसी (शराब नीति) जांच में आरोपी होने के कारण साल 2023 से ही दिल्ली के मार्केट से बाहर है। ED के गंभीर आरोप, रिटेलर्स के साथ मिलीभगत का मामला दिल्ली के अधिकारियों ने पेरनोड रिकार्ड के लिकर लाइसेंस आवेदन को खारिज कर दिया है। इसकी वजह प्रवर्तन निदेशालय (ED) के लगाए गए वे गंभीर आरोप हैं, जिसमें कहा गया है कि कंपनी ने साल 2021 में अवैध रूप से अपना मार्केट शेयर बढ़ाने के लिए रिटेलर्स (शराब विक्रेताओं) के साथ मिलीभगत की थी। अब पूरा विवाद इस बात पर टिका है कि जांच के दायरे में आई इस कंपनी को दिल्ली में दोबारा कारोबार करने की अनुमति दी जा सकती है या नहीं। इस अदालती फैसले पर पेरनोड रिकार्ड की तरफ से फिलहाल कोई रिएक्शन सामने नहीं आया है। व्हिस्की की सही उम्र छुपाई, ₹2,996 करोड़ का टैक्स बकाया शराब नीति विवाद के अलावा पेरनोड रिकार्ड भारतीय टैक्स अधिकारियों के साथ भी बड़े कानूनी विवाद में फंसी है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय जांचकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि कंपनी ने अपने स्कॉच व्हिस्की इम्पोर्ट (आयात) की सही उम्र और कंपोजिशन (मिश्रण की जानकारी) को जानबूझकर छुपाया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि आयातित माल की असली कीमत को कम दिखाया जा सके और कम कस्टम ड्यूटी (टैरिफ) चुकानी पड़े। इस खुलासे के बाद फ्रांस की इस कंपनी को 314 मिलियन डॉलर यानी करीब ₹2,996 करोड़ का पिछला बकाया टैक्स चुकाने के लिए कहा गया है। कोडनेम का इस्तेमाल कर कस्टम अधिकारियों को उलझाया अदालती दस्तावेजों और जांच रिपोर्टों से सामने आया है कि पेर्नोड ने पिछले साल सितंबर में पूरी हुई जांच के दौरान जानबूझकर अपनी जानकारियों को उलझाया था। कंपनी ने इंटरनल माल्ट के लिए नए कोडनेम पेश किए, जिससे कस्टम अधिकारियों के लिए इस इम्पोर्ट की तुलना कॉम्पिटिटर्स कंपनियों के सामान से करना बेहद मुश्किल हो गया। जांचकर्ताओं की रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी ने इम्पोर्टेड माल्ट की सही डीटेल्स (सटीक कंपोजिशन और उम्र) नहीं बताई, जिसका मकसद टैक्स चोरी और असली वैल्यू को छुपाना था। हालांकि, पेरनोड इंडिया ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि उसने सभी नियमों का पालन किया है और वह कानूनी माध्यमों से इसका जवाब दे रही है। 150% टैरिफ से बचने के लिए 67.49% कम दिखाई वैल्यू पेरनोड को केस हारने पर ₹5,725 करोड़ पेनल्टी देनी होगी वॉल्यूम (बिक्री की मात्रा) के मामले में पेरनोड के लिए भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है। इस विवाद से पहले कंपनी की कुल भारतीय बिक्री का लगभग 5% हिस्सा अकेले दिल्ली से आता था। वर्तमान में अदालती रिकॉर्ड के अनुसार कंपनी पर करीब ₹3,000 करोड़ की टैक्स लायबिलिटी है। लेकिन अगर कंपनी यह कानूनी लड़ाई हार जाती है, तो नियमानुसार पेनल्टी (जुर्माने) के साथ कुल भुगतान 600 मिलियन डॉलर यानी करीब ₹5,725 करोड़ से ज्यादा हो सकता है। यह भारी-भरकम रकम कंपनी के पिछले साल के भारतीय रेवेन्यू (2.9 बिलियन डॉलर या करीब ₹27,676 करोड़) का पांचवां हिस्सा और उसके कुल मुनाफे का तीन गुना है। कैसे बनती है व्हिस्की? पेरनोड रिकार्ड जैसी कंपनियां विदेशों से ‘बल्क स्कॉच कंसंट्रेट’ भारत में इम्पोर्ट करती हैं। इसके बाद इस गाढ़े मटीरियल में तय मात्रा में पानी, न्यूट्रल स्प्रिट और कैरामेल जैसी अन्य सामग्रियां मिलाकर भारत में ‘रॉयल स्टैग’ जैसे पॉपुलर ब्रांड्स तैयार किए जाते हैं। इस कंसंट्रेट के आयात पर भारत में 150% तक का भारी कस्टम टैरिफ लागू होता है।

पलानीस्वामी के लिए बड़ा झटका, 300 से अधिक अन्नाद्रमुक सदस्य विजय-एलईडी टीवीके में शामिल हुए | भारत समाचार

People show their identity cards as they wait in a queue at a polling station to cast their votes during the Municipal Corporation elections, in Amritsar. (Source: PTI)

आखरी अपडेट:29 मई, 2026, 12:49 IST यह घटनाक्रम तमिलनाडु में जारी राजनीतिक मंथन के बीच आया है, जहां टीवीके अपने संगठनात्मक आधार का विस्तार करने और प्रतिद्वंद्वी दलों के नेताओं को आकर्षित करने का प्रयास कर रहा है। चेन्नई में 300 से अधिक अन्नाद्रमुक सदस्य टीवीके में शामिल हुए अन्नाद्रमुक दलबदल: एडप्पादी पलानीस्वामी के लिए एक बड़े झटके में, एआईएडीएमके के 300 से अधिक नेता और सदस्य गुरुवार को चेन्नई के पास पनियूर में पार्टी मुख्यालय में विजय के नेतृत्व वाली टीवीके में शामिल हो गए। विजय के नेतृत्व वाली पार्टी में शामिल होने वालों में अन्नाद्रमुक के पूर्व मंत्री वेल्लामंडी नटराजन, पूर्व विधायक साधन प्रभाकर, मायलापुर के पूर्व विधायक नटराज, अन्ना ट्रेड यूनियन फेडरेशन के राज्य सचिव कमलाक्कन्नन, तिरुपथुर शहर के सचिव डीटी कुमार और कई अन्य पार्टी पदाधिकारी शामिल थे। प्रेरण कार्यक्रम में टीवीके महासचिव एन आनंद, राजस्व और आपदा प्रबंधन मंत्री सेनगोट्टैयन और लोक निर्माण मंत्री आधव अर्जुन ने भाग लिया। यह घटनाक्रम तमिलनाडु में जारी राजनीतिक मंथन के बीच आया है, जहां टीवीके अपने संगठनात्मक आधार का विस्तार करने और प्रतिद्वंद्वी दलों के नेताओं को आकर्षित करने का प्रयास कर रहा है। टीवीके के वरिष्ठ नेताओं ने दावा किया कि नवीनतम प्रेरण उनके पूर्व संगठन की दिशा से असंतुष्ट अन्नाद्रमुक कार्यकर्ताओं के एक वर्ग के बीच पार्टी के लिए बढ़ते समर्थन को दर्शाता है। पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए सेनगोट्टैयन ने टीवीके के उत्थान की सराहना की और इसे एक ऐसा आंदोलन बताया जिसने कम समय में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के लोगों ने स्वच्छ शासन प्रदान करने में सक्षम नेतृत्व को स्वीकार कर लिया है और कहा कि पार्टी संस्थापक विजय आने वाले वर्षों में भी राज्य के नेता बने रहेंगे। अपने राजनीतिक अनुभव का लाभ उठाते हुए, सेनगोट्टैयन ने कहा कि उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्रियों एमजी रामचंद्रन और जे जयललिता के साथ काम किया है और टीवीके के भविष्य में विश्वास व्यक्त किया है। आधव अर्जुन ने तमिलनाडु की राजनीति में टीवीके के उदय का बचाव किया और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अन्नाद्रमुक दोनों की आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि चुनावी हार के बाद पार्टी नेतृत्व द्वारा लिए गए फैसलों के बाद अन्नाद्रमुक के भीतर बढ़ते असंतोष ने कई कार्यकर्ताओं को टीवीके की ओर धकेल दिया है। अर्जुन ने यह भी आरोप लगाया कि कई अन्नाद्रमुक कैडर अभी भी पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं और अब टीवीके की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि आने वाले हफ्तों में अन्नाद्रमुक के और पदाधिकारियों के पार्टी में शामिल होने की संभावना है। टीवीके नेताओं ने इन आरोपों से इनकार किया कि पार्टी ने प्रतिद्वंद्वी संगठनों के नेताओं को लालच दिया था और कहा कि सभी नए प्रवेशकों का एक परिवार के सदस्यों के रूप में स्वागत किया जा रहा है। सभा को संबोधित करते हुए एन आनंद ने नए सदस्यों को आश्वासन दिया कि उन्हें पार्टी के भीतर सम्मान और अवसर मिलेंगे। उन्होंने आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में टीवीके के प्रदर्शन के बारे में भी विश्वास व्यक्त किया और कहा कि पार्टी भ्रष्टाचार के बिना काम करना जारी रखेगी। यह आयोजन टीवीके में अन्नाद्रमुक नेताओं और कैडरों के हालिया सबसे बड़े शामिल होने में से एक है, पार्टी नेताओं ने इसे तमिलनाडु की राजनीति में संगठन के बढ़ते प्रभाव के संकेत के रूप में पेश किया। (एजेंसियों से इनपुट के साथ) चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया पलानीस्वामी के लिए बड़ा झटका, 300 से अधिक एआईएडीएमके सदस्य विजय के नेतृत्व वाले टीवीके में शामिल हुए अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें

कॉफी अब सबसे महंगी आदतों में से एक:2020 में 4.3 डॉलर में मिलने वाला कॉफी पैकेट 9.6 डॉलर पहुंचा, पर मांग ठंडी नहीं पड़ी

कॉफी अब सबसे महंगी आदतों में से एक:2020 में 4.3 डॉलर में मिलने वाला कॉफी पैकेट 9.6 डॉलर पहुंचा, पर मांग ठंडी नहीं पड़ी

लंदन के कू ब्रिज पर विंटेज इतालवी कॉफी कार्ट के बाहर लंबी कतार है। दौड़ लगाने वाले, पर्यटक और डॉग वॉकर, सभी हाथ में कॉफी लिए दिन शुरू करना चाहते हैं। लेकिन कार्ट चलाने वाले एंथनी डकवर्थ की नजर ग्राहकों से ज्यादा कीमतों पर टिकी है। उनके यहां आइस्ड लाते 4.5 पाउंड (580 रुपए) में मिलती है। उनकी चिंता है कि कीमत 5 पाउंड (644 रुपए) न पहुंच जाए। यह चिंता पूरे वैश्विक अर्थव्यवस्था की है। आज एक कप कॉफी में जलवायु संकट, ट्रेड वॉर और बदलती उपभोक्ता संस्कृति सब दिखाई देने लगे हैं। दुनिया की कॉफी मुख्य रूप से दो बीन्स पर टिकी है- अरेबिका और रोबस्टा। अरेबिका ब्राजील, इथियोपिया और केन्या की ठंडी पहाड़ियों में उगती है, जबकि कैफीन से भरपूर रोबस्टा पर वियतनाम का दबदबा है। लेकिन पिछले दो वर्षों में मौसम ने दोनों फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। नतीजतन अरेबिका बीन्स की कीमत औसत 1.2 डॉलर प्रति पाउंड से 4 डॉलर (384 रुपए) से ऊपर निकल गई। कॉफी उद्योग के दिग्गज गुइसेप्पे लावाज्जा मानते हैं कि राहत जल्द मिलने वाली नहीं है। इस बीच, अमेरिकी टैरिफ ने संकट और गहरा दिया। ट्रम्प प्रशासन ने वियतनाम पर 46%, इंडोनेशिया पर 32% और ब्राजील पर 50% तक टैरिफ लगा दिया। अमेरिका में पिसी कॉफी की कीमत 17% और इंस्टेंट कॉफी 25% तक महंगी हो गई। आखिरकार बढ़ती नाराजगी के बाद कॉफी को टैरिफ से राहत देनी पड़ी। लेकिन मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। लाल सागर में हूती हमलों के कारण वियतनाम से यूरोप जाने वाले जहाज अब अफ्रीका का लंबा चक्कर लगा रहे हैं। यात्रा 4,000 मील बढ़ गई। ऊपर से यूरोप के नए नियमों के तहत कॉफी किसानों को यह साबित करना होगा कि काफी जंगल काटकर नहीं उगाई गई। कीमत बढ़ने पर भी खरीदारी, इसीलिए दाम नीचे नहीं आते दिलचस्प है महंगी होने के बावजूद कॉफी की मांग कम नहीं हुई। तस्वीर साफ है- सप्लाई चेन संकट में है, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति कीमतें बढ़ा रहे हैं, लेकिन दुनिया का कॉफी प्रेम अडिग है। अब कॉफी सिर्फ ड्रिंक नहीं, बल्कि ‘एक्सपीरियंस’ बन चुकी है। चीनी कंपनी कॉफी डेटा और टेक्नोलॉजी के दम पर स्टारबक्स को चुनौती दे रही है, जबकि ब्रिटेन की ग्रेग्स ऑटोमेशन के जरिए सस्ती कॉफी बेचकर सबसे बड़ा कॉफी विक्रेता बन चुकी है।

कॉफी अब सबसे महंगी आदतों में से एक:2020 में 4.3 डॉलर में मिलने वाला कॉफी पैकेट 9.6 डॉलर पहुंचा, पर मांग ठंडी नहीं पड़ी

कॉफी अब सबसे महंगी आदतों में से एक:2020 में 4.3 डॉलर में मिलने वाला कॉफी पैकेट 9.6 डॉलर पहुंचा, पर मांग ठंडी नहीं पड़ी

लंदन के कू ब्रिज पर विंटेज इतालवी कॉफी कार्ट के बाहर लंबी कतार है। दौड़ लगाने वाले, पर्यटक और डॉग वॉकर, सभी हाथ में कॉफी लिए दिन शुरू करना चाहते हैं। लेकिन कार्ट चलाने वाले एंथनी डकवर्थ की नजर ग्राहकों से ज्यादा कीमतों पर टिकी है। उनके यहां आइस्ड लाते 4.5 पाउंड (580 रुपए) में मिलती है। उनकी चिंता है कि कीमत 5 पाउंड (644 रुपए) न पहुंच जाए। यह चिंता पूरे वैश्विक अर्थव्यवस्था की है। आज एक कप कॉफी में जलवायु संकट, ट्रेड वॉर और बदलती उपभोक्ता संस्कृति सब दिखाई देने लगे हैं। दुनिया की कॉफी मुख्य रूप से दो बीन्स पर टिकी है- अरेबिका और रोबस्टा। अरेबिका ब्राजील, इथियोपिया और केन्या की ठंडी पहाड़ियों में उगती है, जबकि कैफीन से भरपूर रोबस्टा पर वियतनाम का दबदबा है। लेकिन पिछले दो वर्षों में मौसम ने दोनों फसलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। नतीजतन अरेबिका बीन्स की कीमत औसत 1.2 डॉलर प्रति पाउंड से 4 डॉलर (384 रुपए) से ऊपर निकल गई। कॉफी उद्योग के दिग्गज गुइसेप्पे लावाज्जा मानते हैं कि राहत जल्द मिलने वाली नहीं है। इस बीच, अमेरिकी टैरिफ ने संकट और गहरा दिया। ट्रम्प प्रशासन ने वियतनाम पर 46%, इंडोनेशिया पर 32% और ब्राजील पर 50% तक टैरिफ लगा दिया। अमेरिका में पिसी कॉफी की कीमत 17% और इंस्टेंट कॉफी 25% तक महंगी हो गई। आखिरकार बढ़ती नाराजगी के बाद कॉफी को टैरिफ से राहत देनी पड़ी। लेकिन मुसीबत यहीं खत्म नहीं हुई। लाल सागर में हूती हमलों के कारण वियतनाम से यूरोप जाने वाले जहाज अब अफ्रीका का लंबा चक्कर लगा रहे हैं। यात्रा 4,000 मील बढ़ गई। ऊपर से यूरोप के नए नियमों के तहत कॉफी किसानों को यह साबित करना होगा कि काफी जंगल काटकर नहीं उगाई गई। कीमत बढ़ने पर भी खरीदारी, इसीलिए दाम नीचे नहीं आते दिलचस्प है महंगी होने के बावजूद कॉफी की मांग कम नहीं हुई। तस्वीर साफ है- सप्लाई चेन संकट में है, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीति कीमतें बढ़ा रहे हैं, लेकिन दुनिया का कॉफी प्रेम अडिग है। अब कॉफी सिर्फ ड्रिंक नहीं, बल्कि ‘एक्सपीरियंस’ बन चुकी है। चीनी कंपनी कॉफी डेटा और टेक्नोलॉजी के दम पर स्टारबक्स को चुनौती दे रही है, जबकि ब्रिटेन की ग्रेग्स ऑटोमेशन के जरिए सस्ती कॉफी बेचकर सबसे बड़ा कॉफी विक्रेता बन चुकी है।

नेतन्याहू का गाजा के 70% हिस्से पर कब्जे का आदेश:इजराइली PM बोले- धीरे-धीरे कंट्रोल में लेंगे; पहले 50% नियंत्रण था, अब 60% हुआ

नेतन्याहू का गाजा के 70% हिस्से पर कब्जे का आदेश:इजराइली PM बोले- धीरे-धीरे कंट्रोल में लेंगे; पहले 50% नियंत्रण था, अब 60% हुआ

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने गाजा पट्टी के 70% हिस्से पर सैन्य नियंत्रण लेने का आदेश दिया है। वेस्ट बैंक में गुरुवार को एक कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा, “हम इस समय हमास को दबा रहे हैं। अब हम गाजा पट्टी के 60% इलाके को कंट्रोल करते हैं। पहले हम 50% पर थे, फिर 60% पर पहुंचे। मैंने आदेश दिया है कि इसे बढ़ाकर…” तभी भीड़ में से किसी ने चिल्लाकर कहा, “100%।” इस पर नेतन्याहू ने कहा, “एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं। पहले 70% तक पहुंचते हैं। फिलहाल वहीं से शुरुआत करते हैं। हम हर तरफ से उन पर दबाव बना रहे हैं और बाकी बचे लोगों से भी निपटेंगे।” इजराइल का एक्शन सीजफायर शर्तों के खिलाफ यह कदम अक्टूबर 2025 में हुए युद्धविराम समझौते की शर्तों के विपरीत माना जा रहा है। समझौते के तहत इजराइली सेना को एक तय ‘येलो लाइन’ के पीछे हटना था। इस लाइन के बाद गाजा का करीब 53% हिस्सा इजराइल के नियंत्रण में था। हमास का आरोप है कि इजराइल चुपचाप इस सीमा को और अंदर खिसका रहा है। अब कई रिपोर्टों के मुताबिक गाजा के करीब 60 से 64% इलाके पर इजराइल का नियंत्रण है। इजराइल-हमास के बीच शांति योजना के अगले चरण में हमास के हथियार छोड़ने और इजराइली सेना की वापसी का प्रस्ताव है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच बातचीत फिलहाल ठप पड़ी हुई है। 22 लाख लोगों को एक-तिहाई हिस्से में रहना पड़ सकता पहले से ही युद्ध, बमबारी और लगातार विस्थापन की वजह से गाजा के ज्यादातर इलाके तबाह हो चुके हैं। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इजराइल 70% इलाके पर कब्जा कर लेता है, तो गाजा के करीब 22 लाख लोगों को कुल जमीन के एक-तिहाई से भी कम हिस्से में रहना पड़ेगा। यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के विजिटिंग फेलो मुहम्मद शेहादा ने कहा कि हालात पहले ही बेहद खराब हैं। उनके मुताबिक, “हर खाली जगह पर विस्थापित परिवारों के टेंट लगे हैं। अगर इलाका और छोटा हुआ, तो बड़ी संख्या में लोगों के पास रहने की जगह ही नहीं बचेगी।” सीजफायर के 900 फिलिस्तीनियों की मौत इजराइल-हमास के बीच अक्टूबर 2025 में सीजफायर का ऐलान हुआ था। 7 महीने बीतने के बाद भी इजराइली सेना गाजा में हमले कर रही है। गाजा के स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि सीजफायर लागू होने के बाद से अब तक करीब 900 फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। इजराइली सेना ने ‘येलो लाइन’ के आसपास बड़े इलाके को नो-मैन्स-लैंड घोषित कर दिया है। यहां किसी भी गतिविधि को खतरा मानकर कार्रवाई की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की हालिया ब्रीफिंग में भी बताया गया कि उत्तरी गाजा के जबालिया इलाके में टैंकों की आवाजाही लगातार बढ़ रही है और ड्रोन किसी भी हलचल को निशाना बना रहे हैं।

नेतन्याहू का गाजा के 70% हिस्से पर कब्जे का आदेश:इजराइली PM बोले- धीरे-धीरे कंट्रोल में लेंगे; पहले 50% नियंत्रण था, अब 60% हुआ

नेतन्याहू का गाजा के 70% हिस्से पर कब्जे का आदेश:इजराइली PM बोले- धीरे-धीरे कंट्रोल में लेंगे; पहले 50% नियंत्रण था, अब 60% हुआ

इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने गाजा पट्टी के 70% हिस्से पर सैन्य नियंत्रण लेने का आदेश दिया है। वेस्ट बैंक में गुरुवार को एक कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा, “हम इस समय हमास को दबा रहे हैं। अब हम गाजा पट्टी के 60% इलाके को कंट्रोल करते हैं। पहले हम 50% पर थे, फिर 60% पर पहुंचे। मैंने आदेश दिया है कि इसे बढ़ाकर…” तभी भीड़ में से किसी ने चिल्लाकर कहा, “100%।” इस पर नेतन्याहू ने कहा, “एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं। पहले 70% तक पहुंचते हैं। फिलहाल वहीं से शुरुआत करते हैं। हम हर तरफ से उन पर दबाव बना रहे हैं और बाकी बचे लोगों से भी निपटेंगे।” इजराइल का एक्शन सीजफायर शर्तों के खिलाफ यह कदम अक्टूबर 2025 में हुए युद्धविराम समझौते की शर्तों के विपरीत माना जा रहा है। समझौते के तहत इजराइली सेना को एक तय ‘येलो लाइन’ के पीछे हटना था। इस लाइन के बाद गाजा का करीब 53% हिस्सा इजराइल के नियंत्रण में था। हमास का आरोप है कि इजराइल चुपचाप इस सीमा को और अंदर खिसका रहा है। अब कई रिपोर्टों के मुताबिक गाजा के करीब 60 से 64% इलाके पर इजराइल का नियंत्रण है। इजराइल-हमास के बीच शांति योजना के अगले चरण में हमास के हथियार छोड़ने और इजराइली सेना की वापसी का प्रस्ताव है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच बातचीत फिलहाल ठप पड़ी हुई है। 22 लाख लोगों को एक-तिहाई हिस्से में रहना पड़ सकता पहले से ही युद्ध, बमबारी और लगातार विस्थापन की वजह से गाजा के ज्यादातर इलाके तबाह हो चुके हैं। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इजराइल 70% इलाके पर कब्जा कर लेता है, तो गाजा के करीब 22 लाख लोगों को कुल जमीन के एक-तिहाई से भी कम हिस्से में रहना पड़ेगा। यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के विजिटिंग फेलो मुहम्मद शेहादा ने कहा कि हालात पहले ही बेहद खराब हैं। उनके मुताबिक, “हर खाली जगह पर विस्थापित परिवारों के टेंट लगे हैं। अगर इलाका और छोटा हुआ, तो बड़ी संख्या में लोगों के पास रहने की जगह ही नहीं बचेगी।” सीजफायर के बावजूद 900 फिलिस्तीनियों की मौत इजराइल-हमास के बीच अक्टूबर 2025 में सीजफायर का ऐलान हुआ था। 7 महीने बीतने के बाद भी इजराइली सेना गाजा में हमले कर रही है। गाजा के स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि सीजफायर लागू होने के बाद से अब तक करीब 900 फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। इजराइली सेना ने ‘येलो लाइन’ के आसपास बड़े इलाके को नो-मैन्स-लैंड घोषित कर दिया है। यहां किसी भी गतिविधि को खतरा मानकर कार्रवाई की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र की हालिया ब्रीफिंग में भी बताया गया कि उत्तरी गाजा के जबालिया इलाके में टैंकों की आवाजाही लगातार बढ़ रही है और ड्रोन किसी भी हलचल को निशाना बना रहे हैं।

ढकी हुई नेमप्लेट, गायब सरकारी प्रतीक: क्या सतीश जारकीहोली कर्नाटक कांग्रेस में बड़ी भूमिका के लिए तैयार हैं? | भारत समाचार

People show their identity cards as they wait in a queue at a polling station to cast their votes during the Municipal Corporation elections, in Amritsar. (Source: PTI)

आखरी अपडेट:29 मई, 2026, 11:32 IST जैसे ही डीके शिवकुमार कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में सिद्धारमैया की जगह लेने की तैयारी कर रहे हैं, सतीश जारकीहोली केपीसीसी अध्यक्ष पद के लिए प्रमुख दावेदार के रूप में उभरे हैं। सतीश जारकीहोली ने कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन के दौरान कैबिनेट में जगह, केपीसीसी में भूमिका मांगी कर्नाटक नेतृत्व परिवर्तन: जैसा कि कर्नाटक राजनीतिक परिवर्तन की तैयारी कर रहा है और डीके शिवकुमार सिद्धारमैया से मुख्यमंत्री पद लेने वाले हैं, ध्यान सतीश जारकीहोली पर केंद्रित हो गया जब उनके आवास के बाहर नेमप्लेट कागज से ढकी हुई पाई गई, जबकि कर्नाटक सरकार का प्रतीक भी अब उनकी आधिकारिक कार पर दिखाई नहीं दे रहा था। यह घटनाक्रम सिद्धारमैया के कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से हटने के एक दिन बाद आया है। उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है और कांग्रेस सरकार में संभावित नेतृत्व परिवर्तन से पहले राज्य मंत्रिमंडल को भंग कर दिया गया है। #देखें | कर्नाटक: सतीश जारकीहोली के आवास के बाहर नेम प्लेट को कागज से ढक दिया गया; उनकी कार पर अब कर्नाटक सरकार का प्रतीक चिह्न नहीं दिख रहा है। सिद्धारमैया ने कल राज्य के सीएम पद से इस्तीफा दे दिया और उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया है। राज्य मंत्रिमंडल… pic.twitter.com/Y8dfx24OAH – एएनआई (@ANI) 29 मई, 2026 जारकीहोली निवर्तमान सिद्धारमैया कैबिनेट में लोक निर्माण मंत्री के रूप में कार्यरत थे। पार्टी सूत्रों ने बताया सीएनएन-न्यूज18 जारकीहोली ने पार्टी आलाकमान को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) के अध्यक्ष पद के साथ-साथ कैबिनेट में जगह पाने की अपनी इच्छा से अवगत कराया है। हालांकि, बेलगावी स्थित कांग्रेस नेता के करीबी सूत्रों ने कहा कि अभी तक कोई चर्चा नहीं हुई है। चूंकि उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के सिद्धारमैया का उत्तराधिकारी बनने की उम्मीद है, इसलिए ध्यान केपीसीसी प्रमुख पद की दौड़ पर केंद्रित हो गया है, जिसमें जारकीहोली एक मजबूत दावेदार के रूप में उभर रहे हैं। कौन हैं सतीश जारकीहोली? उत्तरी कर्नाटक के एक शक्तिशाली जमीनी नेता और कांग्रेस के भीतर एक अनुभवी संगठनात्मक हाथ, जारकीहोली ने राष्ट्रीय सुर्खियों से दूर चुपचाप प्रभाव बनाने में वर्षों बिताए हैं। आक्रामक सार्वजनिक स्थिति पर भरोसा करने वाले कई नेताओं के विपरीत, उनका उदय काफी हद तक धैर्यवान नेटवर्किंग, निर्वाचन क्षेत्र पर नियंत्रण और कई राजनीतिक चरणों के माध्यम से प्रासंगिक बने रहने की क्षमता से हुआ है। यदि उन्हें केपीसीसी प्रमुख नियुक्त किया जाता है, तो यह उनके राजनीतिक करियर की अब तक की सबसे बड़ी संगठनात्मक उन्नति होगी और उन्हें भविष्य की चुनावी लड़ाई से पहले कर्नाटक में कांग्रेस की रणनीति के केंद्र में स्थापित करेगी। उन्होंने 2008 से यमकनमर्दी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया है और पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने उत्पाद शुल्क, वन और पर्यावरण और लोक निर्माण सहित कई प्रमुख विभागों को संभाला है। पार्टी नेताओं का मानना ​​है कि कर्नाटक कांग्रेस के भीतर विभिन्न गुटों के बीच संबंध बनाए रखने की उनकी क्षमता उनके पक्ष में काम कर सकती है क्योंकि पार्टी एक नए राजनीतिक चरण की तैयारी कर रही है। यदि उन्हें केपीसीसी अध्यक्ष नियुक्त किया जाता है, तो यह जारकीहोली के राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी संगठनात्मक भूमिका होगी और उन्हें भविष्य के चुनावों से पहले कर्नाटक में कांग्रेस की रणनीति के केंद्र में स्थापित करेगी। (एजेंसियों से इनपुट के साथ) चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया ढकी हुई नेमप्लेट, गायब सरकारी प्रतीक: क्या सतीश जारकीहोली कर्नाटक कांग्रेस में बड़ी भूमिका के लिए तैयार हैं? अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)कर्नाटक नेतृत्व परिवर्तन(टी)डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री(टी)सिद्धारमैया का इस्तीफा(टी)सतीश जारकीहोली केपीसीसी प्रमुख(टी)कर्नाटक कांग्रेस की राजनीति(टी)केपीसीसी अध्यक्ष पद की दौड़(टी)कर्नाटक कैबिनेट विघटन(टी)कांग्रेस सरकार कर्नाटक

कर्नाटक में केरल मॉडल? कांग्रेस नए मंत्रिमंडल के लिए युवा और अनुभवी चेहरों के मिश्रण पर विचार कर रही है | भारत समाचार

People show their identity cards as they wait in a queue at a polling station to cast their votes during the Municipal Corporation elections, in Amritsar. (Source: PTI)

आखरी अपडेट:29 मई, 2026, 10:42 IST कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद सहित 34 कैबिनेट पद हैं। दो इस्तीफों और एक मंत्री की मृत्यु के बाद वर्तमान में तीन सीटें खाली हैं। सिद्धारमैया की जगह डीके शिवकुमार सीएम बन सकते हैं। कर्नाटक नेतृत्व परिवर्तन: केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ प्रयोग के साथ समानताएं बनाते हुए, कांग्रेस आलाकमान कथित तौर पर सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कर्नाटक के लिए एक युवा और नए मंत्रिमंडल पर विचार कर रहा है। सूत्रों के हवाले से टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्तावित कैबिनेट फेरबदल में युवा और अनुभवी नेताओं का मिश्रण होगा, जो वीडी सतीशन के नेतृत्व वाले केरल कैबिनेट में निहित एक मॉडल है। वर्तमान कर्नाटक कैबिनेट में कई वरिष्ठ मंत्रियों को नई सरकार में शायद सिद्धारमैया के डिप्टी डीके शिवकुमार के बाद जगह नहीं मिल पाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें कथित तौर पर समाज कल्याण मंत्री एचसी महादेवप्पा, ऊर्जा मंत्री केजे जॉर्ज और गृह मंत्री जी परमेश्वर शामिल हैं। माना जाता है कि सिद्धारमैया के करीबी माने जाने वाले मंत्रियों में बिरथी सुरेश, संतोष लाड, दिनेश गुंडू राव और बीजेड ज़मीर अहमद खान भी जांच के दायरे में हैं। पार्टी सूत्रों का हवाला देते हुए रिपोर्ट के अनुसार, उनका यह कदम कांग्रेस सरकारों में युवा नेताओं के अधिक प्रतिनिधित्व के लिए राहुल गांधी के प्रयास के अनुरूप है। हालाँकि, वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने कहा है कि नए कर्नाटक मंत्रिमंडल पर अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है, उन्होंने कहा कि मंत्रियों के चयन में अनुभव एक महत्वपूर्ण कारक रहेगा। रिपोर्ट के अनुसार, आलाकमान वरिष्ठ और युवा नेताओं के संतुलित मिश्रण को चुन सकता है। वर्तमान सिद्धारमैया सरकार के लगभग 15 मौजूदा मंत्रियों और पांच युवा चेहरों को बरकरार रखा जा सकता है, जबकि शेष पद नए मुख्यमंत्री द्वारा चुने गए नए लोगों को दिए जा सकते हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद सहित 34 कैबिनेट पद हैं, केएन राजन्ना और बी नागेंद्र के इस्तीफे और डी सुधाकर की मृत्यु के बाद वर्तमान में तीन रिक्तियां हैं। सूत्रों ने यह भी कहा कि राहुल गांधी ने पहले सिद्धारमैया को अपने मंत्रिमंडल में 50 वर्ष से कम उम्र के अधिक विधायकों को शामिल करने की सलाह दी थी और इस बार भी इसी तरह का दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है। हालाँकि, पूर्व मंत्री आरवी देशपांडे ने अनुभवी नेताओं को पूरी तरह से हटाने के खिलाफ चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि कोई सरकार केवल नए चेहरों के साथ काम नहीं कर सकती और स्थिरता और निरंतरता के लिए अनुभवी मंत्रियों की जरूरत होती है। देशपांडे ने यह भी कहा कि वह कैबिनेट पद की मांग नहीं कर रहे हैं, लेकिन अगर पेशकश की गई तो इस पर विचार करेंगे। 79 वर्षीय डेसफांडे ने टीओआई से कहा, ”हमने अब तक नई कैबिनेट के बारे में कुछ नहीं सुना है, लेकिन अगर सरकार चलानी है तो केवल नए चेहरे ही नहीं हो सकते हैं।” उन्होंने आगे कहा, ”हालांकि नए चेहरों का स्वागत है, लेकिन निरंतरता की जरूरत है और सरकार को काम करने के लिए अनुभवी हाथों की जरूरत है।” यूडीएफ कैबिनेट ने एक कैबिनेट की शुरुआत की जिसमें प्रमुख युवा कांग्रेस नेता और अनुभवी राजनेता शामिल थे। उल्लेखनीय शख्सियतों में कुंदरा का प्रतिनिधित्व करने वाले पीसी विष्णुनाथ थे, जो लंबे समय से कांग्रेस में सक्रिय हैं और केपीसीसी के कार्यकारी अध्यक्ष सहित विभिन्न भूमिकाओं में कार्यरत हैं। यूडीएफ का एक और नया चेहरा रोजी एम जॉन ने अपनी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और नेतृत्व अनुभव के साथ वादा निभाया। विविधता को शामिल करते हुए कैबिनेट में बिंदू कृष्णा और केए तुलसी जैसे नेता भी शामिल हैं, जो हाशिए पर रहने वाले समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना न्यूज़ इंडिया कर्नाटक में केरल मॉडल? कांग्रेस नए मंत्रिमंडल के लिए युवा और अनुभवी चेहरों के मिश्रण पर विचार कर रही है अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)कर्नाटक कैबिनेट में फेरबदल(टी)कर्नाटक नेतृत्व परिवर्तन(टी)कांग्रेस आलाकमान(टी)सिद्धारमैया बाहर निकलना(टी)डीके शिवकुमार(टी)युवा नेता कांग्रेस(टी)वरिष्ठ मंत्री कर्नाटक(टी)राहुल गांधी धक्का