Friday, 02 Oct 2026 | 08:11 PM

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सीएम डॉ. यादव ने कान्हा में छोड़े 4 जंगली भैंसे:बालाघाट में 150 साल बाद हुई पुनर्बसाहट, जल्द लाए जाएंगे गैंडे भी

सीएम डॉ. यादव ने कान्हा में छोड़े 4 जंगली भैंसे:बालाघाट में 150 साल बाद हुई पुनर्बसाहट, जल्द लाए जाएंगे गैंडे भी

बालाघाट के कान्हा क्षेत्र स्थित सुपखार रेंज में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मंगलवार को चार जंगली भैंसों को बाड़े में छोड़ा। यह कार्यक्रम सुबह 9:30 बजे संपन्न हुआ। मुख्यमंत्री मोहन यादव 9:15 बजे सुपखार पहुंचे थे। दरअसल, मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से गढ़ी के टोपला पहुंचे थे। वहां से उनका काफिला सड़क मार्ग से बेड़ा स्थल पहुंचा, जहां उन्होंने औपचारिक रूप से इस पुनर्स्थापन योजना का शुभारंभ किया। असम के काजीरंगा से लाई गईं थीं 4 भैसें ये जंगली भैंसे असम के काजीरंगा से लगभग 2 हजार किलोमीटर का सफर तय करके कान्हा के सुपखार रेंज लाए गए हैं। सरकार का लक्ष्य है कि मध्य प्रदेश को बाघ राज्य के बाद ‘व्हाइट बफेलो स्टेट’ के रूप में भी पहचान मिले। भविष्य में कान्हा में गैंडे भी लाए जाने की योजना है। जैव विविधता से समृद्ध कान्हा में इन भैंसों के आगमन का वन्यजीव प्रेमियों ने स्वागत किया है। 150 साल बाद हुई पुनर्बसाहट जानकारी के अनुसार, 1960 और 1970 के दशक में जिले में जंगली भैंसे पाए जाते थे, लेकिन समय के साथ वे विलुप्त हो गए। सरकार की यह पुनर्स्थापन मुहिम जिले के पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है। यह कार्य वन विभाग की ‘कान्हा टाइगर रिजर्व में जंगली भैंसा पुनर्स्थापन योजना’ के तहत किया गया है। तस्वीरों में देखिए पुनर्स्थापन योजना का शुभारंभ… सीएम बोले-नए मेहमानों से इकोसिस्टम को मिलेगी मदद मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस अवसर को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि 150 साल बाद मध्य प्रदेश की धरती पर कान्हा अभयारण्य में जंगली भैंसों की पुनर्बसाहट की जा रही है। यह पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक अद्भुत अवसर है। उन्होंने कहा कि इन नए मेहमानों के आगमन से इकोसिस्टम को मदद मिलेगी, क्योंकि इसमें एक महत्वपूर्ण कड़ी गायब थी। मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में विलुप्तप्राय जानवरों को लाकर प्रदेश में बसाने का प्रयास किया जा रहा है। इससे न केवल प्रदेश का सौंदर्य बढ़ेगा, बल्कि पर्यटन क्षेत्रों की आकर्षण क्षमता और पर्यटन भी बढ़ेगा। लाए गए चार जंगली भैंसों में तीन मादा और एक नर किशोर शावक शामिल हैं।

एक्टर भरत कपूर का 80 साल की उम्र में निधन:आखिरी रास्ता और खुदा गवाह जैसी फिल्मों में दिखे थे

एक्टर भरत कपूर का 80 साल की उम्र में निधन:आखिरी रास्ता और खुदा गवाह जैसी फिल्मों में दिखे थे

वेटरन एक्टर भरत कपूर का सोमवार को निधन हो गया। वह 80 साल के थे। उन्होंने मुंबई में अपने घर पर अंतिम सांस ली। उन्होंने अपने लगभग चार दशकों के करियर में अमिताभ बच्चन स्टारर आखिरी रास्ता और खुदा गवाह समेत 200 से अधिक फिल्मों में काम किया था। उन्होंने नूरी, आखिरी रास्ता, बाजार, इनकार, राम बलराम और बरसात जैसी फिल्मों में नेगेटिव रोल निभाए थे। एक्टर अवतार गिल ने न्यूज एजेंसी ANI से भरत कपूर के निधन की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि भरत कपूर पिछले दो-तीन दिनों से बीमार थे। वह घर पर ही थे और सोमवार दोपहर करीब 3 बजे उनका निधन हुआ। आज तक की रिपोर्ट के अनुसार भरत कपूर का निधन मल्टीपल ऑर्गन फेलियर के कारण हुआ। अवतार गिल ने कहा कि उन्हें शाम करीब 4 से 4:30 बजे भरत कपूर के बेटे का फोन आया था। उन्होंने यह भी बताया कि भरत कपूर ने काफी समय पहले काम करना बंद कर दिया था। कल शाम को परिवार के सदस्यों और करीबी दोस्तों की मौजूदगी में उनका अंतिम संस्कार किया गया। नूरी जैसी कई फिल्मों में काम किया भरत कपूर ने 1972 में अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की थी। करीब चार दशक लंबे करियर में उन्होंने फिल्मों में मजबूत सपोर्टिंग रोल और विलेन के किरदार निभाकर पहचान बनाई। उन्होंने कई हिंदी फिल्मों में काम किया, जिनमें नूरी (1979), राम बलराम (1980), लव स्टोरी (1981), बाजार (1982), गुलामी (1985), आखिरी रास्ता (1986), सत्यमेव जयते (1987), स्वर्ग (1990), खुदा गवाह (1992) और रंग (1993) शामिल हैं। बाद में उन्होंने बरसात (1995), साजन चले ससुराल (1996) और मीनाक्षी: अ टेल ऑफ थ्री सिटीज (2004) जैसी फिल्मों में भी काम किया। फिल्मों के अलावा भरत कपूर ने टेलीविजन में भी काम किया। वह कैम्पस, परंपरा, राहत, सांस, अमानत, तारा, चुनौती और कहानी चंद्रकांता की जैसे शो में नजर आए।

शहडोल में एक साल के मासूम का अपहरण,:फूफा निकला आरोपी, बोला- मायके गई पत्नी वापस नहीं आ रही थी

शहडोल में एक साल के मासूम का अपहरण,:फूफा निकला आरोपी, बोला- मायके गई पत्नी वापस नहीं आ रही थी

शहडोल जिले के ब्यौहारी थाना क्षेत्र में एक साल के मासूम बच्चे के अपहरण का मामला सामने आया है। बच्चे का अपहरण उसके फूफा ने ही किया था। पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए कुछ ही घंटों में बच्चे को सकुशल बरामद कर लिया और आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। यह घटना मैर गांव की है। सोमवार रात करीब 9 बजे, बच्चे की मां संगीता देवी ब्यौहारी थाने पहुंचीं और बताया कि उनका एक साल का बेटा महेंद्र (पिता पुरन) लापता हो गया है। उन्होंने पुलिस को बताया कि बच्चे का फूफा उमेश सिंह उसे खिलाने के बहाने गोद में लेकर गया था, लेकिन काफी देर तक वापस नहीं लौटा। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल कार्रवाई शुरू की। थाना प्रभारी ने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी, जिसके बाद तीन विशेष टीमों का गठन किया गया। पुलिस ने रातभर संभावित ठिकानों पर छापेमारी की और करीब पांच स्थानों पर दबिश दी, लेकिन आरोपी हर जगह से फरार मिला। सुबह मिला सुराग सुबह होते-होते साइबर सेल और मुखबिरों से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस को अहम सुराग मिला। पता चला कि आरोपी उमेश सिंह अपने घर से लगभग 10 किलोमीटर दूर भमरहा के जंगल में एक झोपड़ी में छिपा हुआ है। पुलिस टीम ने तुरंत मौके पर पहुंचकर घेराबंदी की और आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। मासूम महेंद्र को उसके पास से सकुशल बरामद कर लिया गया। पत्नी वापस नहीं आ रही थी पुलिस पूछताछ में आरोपी उमेश सिंह ने अपहरण का चौंकाने वाला कारण बताया। उसने कहा कि उसकी पत्नी कुछ दिन पहले अपने मायके मैर गांव आ गई थी और वापस जाने से इनकार कर रही थी। साथ ही, उसने आरोपी को अपने बच्चों से मिलने भी नहीं दिया। इसी बात से नाराज होकर उसने अपने साले के बेटे का अपहरण कर लिया था। बच्चे को सीने लगा रो पड़ी मां मासूम को सकुशल वापस पाकर मां की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह बच्चे को सीने से लगाकर रो पड़ी। थाना प्रभारी जिया उल हक ने बताया कि पुलिस ने पूरी रात बिना रुके कार्रवाई की और गांव वालों की मदद से आरोपी तक पहुंचने में सफलता मिली। फिलहाल आरोपी के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है। इस कारवाही में थाना प्रभारी के साथ राजेंद्र द्विवेदी नरेंद्र उपाध्याय सुखेन्द्र और चित्रांशी शुक्ला सहित अन्य पुलिस कर्मियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

E20 के बाद E85 फ्लेक्स-फ्यूल की तैयारी में भारत:माइलेज 30% तक कम हो सकता है; कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य

E20 के बाद E85 फ्लेक्स-फ्यूल की तैयारी में भारत:माइलेज 30% तक कम हो सकता है; कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने का लक्ष्य

ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच कच्चे तेल के सप्लाई संकट को देखते हुए भारत सरकार अब E85 फ्लेक्स-फ्यूल की ओर कदम बढ़ा रही है। सरकार जल्द ही E85 फ्यूल की मंजूरी के लिए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर सकती है, जिसके लिए मार्केट में आम सहमति बन चुकी है। खाड़ी देशों पर निर्भरता कम करना लक्ष्य भारत अपनी जरूरत का 90% कच्चा तेल आयात करता है। इसमें से 50% से ज्यादा हिस्सा पश्चिम एशियाई देशों से आता है जो हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरकर पहुंचता है। ईरान-अमेरिका तनाव की वजह से ये रूट बंद है, जिससे कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर के पार पहुंच गए हैं। कच्चे तेल का महंगा होना न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ है, बल्कि आत्मनिर्भरता के लिए भी चुनौती है। इसी वजह से सरकार अब इथेनॉल वाले ईंधन पर फोकस कर रही है। अभी 20% एथेनॉल वाले पेट्रोल की बिक्री हो रही E85 फ्यूल में 85% एथेनॉल और 15% पेट्रोल होता है। अभी देशभर में E20 फ्यूल की बिक्री अनिवार्य है। इथेनॉल को गन्ने के रस, मक्का और सड़े हुए अनाज जैसे कृषि उत्पादों से बनाया जाता है। ये फ्यूल पर्यावरण में कार्बन उत्सर्जन को कम करने में भी मदद करता है। ऑटो इंडस्ट्री तैयार, नोटिफिकेशन का इंतजार ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री ने फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक को लेकर अपनी तैयारी पहले ही दिखा दी है। टोयोटा किर्लोस्कर मोटर के कंट्री हेड विक्रम गुलाटी के मुताबिक, फ्लेक्स-फ्यूल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि एक देश के तौर पर हम आयात पर निर्भर नहीं रहेंगे। सरकार अब E85 को रेगुलेटेड फ्यूल के रूप में अनिवार्य करने की जगह फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने की नीति पर काम कर रही है। इन 4 मोर्चों पर चुनौतियों से निपटना होगा SP ग्लोबल के डायरेक्टर पुनीत गुप्ता का कहना है कि E85 को अपनाने के लिए बड़े इकोसिस्टम की जरूरत होगी। इसमें 4 मुख्य चुनौतियां हैं: माइलेज और कीमत बन सकती है रुकावट एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तकनीक से ज्यादा बड़ी चुनौती फ्यूल की कीमत और माइलेज है। इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी कम होने के कारण फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों का माइलेज 20 से 30% तक गिर सकता है। इस कमी की भरपाई के लिए फ्यूल की कीमत कम रखनी होगी । टोयोटा, मारुति इथेनॉल वाले वाहन पेश कर चुके टोयोटा और मारुति सुजुकी जैसी कंपनियां पहले ही हाई इथेनॉल ब्लेंड से चलने वाले वाहन पेश कर चुकी हैं। टीवीएस मोटर के चेयरमैन सुदर्शन वेणु ने भी संकेत दिए हैं कि कंपनी अपाचे सहित अपने कई सेगमेंट में इथेनॉल से चलने वाले वाहन लाने की योजना बना रही है। टैक्स बेनेफिट्स पर जोर देने की जरूरत विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को सब्सिडी देने के बजाय पॉलिसी इनेबलर के रूप में काम करना चाहिए। इसमें FFV (फ्लेक्स फ्यूल व्हीकल) पर कम टैक्स, पेट्रोल के मुकाबले इथेनॉल के दामों में बड़ा अंतर और इथेनॉल को कार्बन-न्यूट्रल मानकर क्रेडिट देना शामिल है। नॉलेज पार्ट: क्या होता है फ्लेक्स-फ्यूल इंजन? यह एक ऐसा इंजन है जो एक से ज्यादा तरह के ईंधन (जैसे शुद्ध पेट्रोल या पेट्रोल-इथेनॉल का कोई भी मिश्रण) पर चल सकता है। इसमें सेंसर लगे होते हैं जो ईंधन के मिश्रण को पहचानकर इंजन की सेटिंग्स को अपने आप एडजस्ट कर लेते हैं।

भारत-न्यूजीलैंड में FTA से सेब बागवान चिंतित:राठौर बोले-इम्पोर्ट ड्यूटी 25% की; हिमाचल, कश्मीर-उत्तराखंड के किसानों पर पड़ेगी मार

भारत-न्यूजीलैंड में FTA से सेब बागवान चिंतित:राठौर बोले-इम्पोर्ट ड्यूटी 25% की; हिमाचल, कश्मीर-उत्तराखंड के किसानों पर पड़ेगी मार

भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच बीते कल दिल्ली में हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) ने हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड में सेब बागवानों की चिंताएं बढ़ा दी है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता एवं ठियोग के विधायक कुलदीप राठौर ने कहा कि इस एग्रीमेंट के बाद न्यूजीलैंड के सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी 50 फीसदी से घटाकर 25 प्रतिशत रह जाएगी। राठौर ने कहा- बेशक पहले साल में यह कोटा 32,500 मीट्रिक टन (लगभग 20 kg के 16,25,000 बॉक्स) से शुरू होता है, लेकिन छठे साल तक यह बढ़कर 45,000 मीट्रिक टन (लगभग 22,50,000 बॉक्स) हो जाएगा। यह सेब अप्रैल से अगस्त दौरान भारत के बाजार में आएगा। इसकी मार पहले निचले क्षेत्रों के सेब बागवानों को पड़ेगी। सीजन की शुरुआत से पहले ही विदेशी सेब के आने से बाजार गिर जाएगा और इसका असर पूरे सीजन पर रहेगा। राठौर ने कहा- न्यूज़ीलैंड की सेब इंडस्ट्री में प्रोडक्टिविटी बहुत ज्यादा है, मॉडर्न बागों में प्रति हेक्टेयर 50-70 टन (लगभग 2,500 से 3,500 बॉक्स प्रति हेक्टेयर) पैदावार होती है, जबकि हिमाचल प्रदेश में एवरेज प्रोडक्टिविटी मात्र 7-8 टन प्रति हेक्टेयर (लगभग 350 से 400 बॉक्स प्रति हेक्टेयर) है। इस वजह से हिमाचल में इनपुट कॉस्ट न्यूजीलैंड समेत दूसरे देशों से भी कहीं ज्यादा है। ऐसे में विदेशी सेब के भारतीय बाजार में आने से राज्य के बागवानों को उचित दाम नहीं मिलेगे। 2.5 लाख परिवार सेब पर डिपेंडेंट: राठौर कुलदीप राठौर ने कहा- भारत का सेब सेक्टर, जो हिमालयी बेल्ट में फैला हुआ है, बड़ी ग्रामीण इकॉनमी को सपोर्ट करता है। जम्मू और कश्मीर लगभग 76-77% प्रोडक्शन के साथ सबसे आगे है, उसके बाद हिमाचल प्रदेश लगभग 21-22% के साथ दूसरे नंबर पर है। अकेले हिमाचल में 1 लाख 15 हजार हेक्टेयर से ज़्यादा ज़मीन पर सेब की खेती होती है और लगभग 2.5 लाख परिवार इस पर डिपेंडेंट हैं। केंद्र की किसान विरोधी नीतियों से किसान परेशान सेब राज्य की हॉर्टिकल्चर इनकम का लगभग 80% हिस्सा देते हैं। मगर केंद्र की किसान विरोधी नीतियों ने सेब उत्पादकों को चिंताएं बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी 150 फीसदी करने का भरोसा हिमाचल के बागवानों को दिया था। पीएम ने अब तक इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाने का वादा पूरा तो नहीं किया, लेकिन इसे कम जरूर किया है। CA स्टोर में रखे सेब पर भी मार पड़ेगी राठौर ने कहा कि न्यूजीलैंड के सेब की ज्यादा मार CA (वातानुकुलित) स्टोरेज से निकलने वाले सेब पर पड़ने वाली है। उन्होंने बताया कि यह एग्रीमेंट स्वदेसी सेब की इंडस्ट्री को तबाह करेगा। उन्होंने केंद्र सरकार से इम्पोर्ट कोटा और कीमतों की कड़ी निगरानी करने, कोल्ड स्टोरेज, ग्रेडिंग और ट्रांसपोर्ट सिस्टम को बेहतर बनाने, किसानों को मॉडर्न टेक्नोलॉजी मुहैया कराने और आगे कोई भी बदलाव करने से पहले किसानों से सलाह लेने की मांग की है।

खुम्बु आइसफॉल पर रुका एवरेस्ट पर्वता​रोहियों का मिशन:गाइड्स को एयरलिफ्ट कराने की तैयारी; ‘एवरेस्ट की सेहत’ सुधारने में जुटे आइसफॉल डॉक्टर

खुम्बु आइसफॉल पर रुका एवरेस्ट पर्वता​रोहियों का मिशन:गाइड्स को एयरलिफ्ट कराने की तैयारी; ‘एवरेस्ट की सेहत’ सुधारने में जुटे आइसफॉल डॉक्टर

समुद्र तल से 17 हजार फीट की ऊंचाई, एवरेस्ट की कठिन डगर और चारों तरफ पसरा मौत सा सन्नाटा… यहां हवा की एक सरसराहट भी दिल की धड़कनें बढ़ा देती है, क्योंकि एक जरा सी चूक सीधे गहरी खाई या बर्फ की कब्र में ले जा सकती है। इसी बर्फीले नर्क के बीच खड़ा है एक शख्स, जिसे दुनिया ‘आइसफॉल डॉक्टर’ कहती है। दावा जांगबू शेर्पा के लिए माउंट एवरेस्ट सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि ‘मरीज’ है, जिसकी सांसों की नब्ज वह हर दिन टटोलता है। पर इस हफ्ते, खुम्बु आइसफॉल के उस दो मील के खतरनाक हिस्से ने दावा और उनकी 11 सदस्यीय विशिष्ट टीम को भी खौफ में डाल दिया है। भारी बर्फबारी के कारण बहुत बड़ी नीलीस-सफेद बर्फ की दीवार (सेराक) रास्ते में खड़ी हो गई है। यह दीवार इतनी विशाल है कि इसे पार करना बेहद खतरनाक है। फिलहाल ग्राउंड जीरो पर कोशिशों में जुटे जागंबू बताते हैं,‘रास्ते हर साल बंद होते हैं, पर मैंने अपनी जिंदगी में बर्फ का ऐसा पहाड़ रास्ते के बीच कभी नहीं देखा। हमने ड्रोन उड़ाकर देखा है, इसे पार करना अभी नामुमकिन है।’ यह मामूली रुकावट नहीं है, बल्कि एक ऐसी मौत की दीवार है जिसने सैकड़ों पर्वतारोहियों के सपनों को बेस कैंप में ही कैद कर दिया है।’ जांगबू कहते हैं ‘बेस कैंप अब एक तंबू के शहर में तब्दील हो चुका है, जहां 400 से ज्यादा पर्वतारोही टकटकी लगाए उस दीवार के पिघलने का इंतजार कर रहे हैं। चढ़ाई का समय तेजी से खत्म हो रहा है। नेपाल सरकार के लिए यह बड़ा राजस्व का मामला है, इसलिए विचार किया जा रहा है कि अगर एक-दो दिन में दीवार नहीं पिघली, तो गाइड्स को एयरलिफ्ट कर ऊपर पहुं‍चाया जाए। पहाड़ पर तीन बार फतह हासिल कर चुके दावा जांगबू जानते हैं कि रास्ता खुलने के बाद भी चुनौती कम नहीं होगी। सैकड़ों लोगों का एक साथ उस संकरे रास्ते से गुजरना एक नई मुसीबत को दावत देगा। जांगबू की नजरें अभी भी उस सफेद दीवार पर टिकी हैं- उन्हें इंतजार है कि कब उनका ‘मरीज’ उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता देगा। क्योंकि एवरेस्ट पर, आखिरी फैसला हमेशा पहाड़ का ही होता है। खतरा, इसी जगह पर 2014 में 16 गाइड्स की मौत हुई थी आइसफॉल डॉक्टर्स का काम दुनिया के सबसे खतरनाक पेशों में गिना जाता है। ये जांबाज उस वक्त पहाड़ पर चढ़ते हैं जब कोई और वहां जाने की सोच भी नहीं सकता। दरकते ग्लेशियरों के बीच रस्सियां बांधना और रसातल जैसी गहरी दरारों पर एल्युमीनियम की सीढ़ियां टिकाना बड़ी चुनौती रहती है। पर इस साल, खतरा पहले से कहीं ज्यादा है। अप्रैल 2014 की घटना इन शेरपाओं के जेहन में अब भी ताजा है, जब इसी जगह बर्फ की दीवार गिरने से 16 गाइड्स की मौत हो गई थी। वह एवरेस्ट के इतिहास का सबसे भीषण दिन था। स्थिति वैसी ही है और सुरक्षा से समझौता करना खुदकुशी के बराबर है।

खुम्बु आइसफॉल पर रुका एवरेस्ट पर्वता​रोहियों का मिशन:गाइड्स को एयरलिफ्ट कराने की तैयारी; ‘एवरेस्ट की सेहत’ सुधारने में जुटे आइसफॉल डॉक्टर

खुम्बु आइसफॉल पर रुका एवरेस्ट पर्वता​रोहियों का मिशन:गाइड्स को एयरलिफ्ट कराने की तैयारी; ‘एवरेस्ट की सेहत’ सुधारने में जुटे आइसफॉल डॉक्टर

समुद्र तल से 17 हजार फीट की ऊंचाई, एवरेस्ट की कठिन डगर और चारों तरफ पसरा मौत सा सन्नाटा… यहां हवा की एक सरसराहट भी दिल की धड़कनें बढ़ा देती है, क्योंकि एक जरा सी चूक सीधे गहरी खाई या बर्फ की कब्र में ले जा सकती है। इसी बर्फीले नर्क के बीच खड़ा है एक शख्स, जिसे दुनिया ‘आइसफॉल डॉक्टर’ कहती है। दावा जांगबू शेर्पा के लिए माउंट एवरेस्ट सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि ‘मरीज’ है, जिसकी सांसों की नब्ज वह हर दिन टटोलता है। पर इस हफ्ते, खुम्बु आइसफॉल के उस दो मील के खतरनाक हिस्से ने दावा और उनकी 11 सदस्यीय विशिष्ट टीम को भी खौफ में डाल दिया है। भारी बर्फबारी के कारण बहुत बड़ी नीलीस-सफेद बर्फ की दीवार (सेराक) रास्ते में खड़ी हो गई है। यह दीवार इतनी विशाल है कि इसे पार करना बेहद खतरनाक है। फिलहाल ग्राउंड जीरो पर कोशिशों में जुटे जागंबू बताते हैं,‘रास्ते हर साल बंद होते हैं, पर मैंने अपनी जिंदगी में बर्फ का ऐसा पहाड़ रास्ते के बीच कभी नहीं देखा। हमने ड्रोन उड़ाकर देखा है, इसे पार करना अभी नामुमकिन है।’ यह मामूली रुकावट नहीं है, बल्कि एक ऐसी मौत की दीवार है जिसने सैकड़ों पर्वतारोहियों के सपनों को बेस कैंप में ही कैद कर दिया है।’ जांगबू कहते हैं ‘बेस कैंप अब एक तंबू के शहर में तब्दील हो चुका है, जहां 400 से ज्यादा पर्वतारोही टकटकी लगाए उस दीवार के पिघलने का इंतजार कर रहे हैं। चढ़ाई का समय तेजी से खत्म हो रहा है। नेपाल सरकार के लिए यह बड़ा राजस्व का मामला है, इसलिए विचार किया जा रहा है कि अगर एक-दो दिन में दीवार नहीं पिघली, तो गाइड्स को एयरलिफ्ट कर ऊपर पहुं‍चाया जाए। पहाड़ पर तीन बार फतह हासिल कर चुके दावा जांगबू जानते हैं कि रास्ता खुलने के बाद भी चुनौती कम नहीं होगी। सैकड़ों लोगों का एक साथ उस संकरे रास्ते से गुजरना एक नई मुसीबत को दावत देगा। जांगबू की नजरें अभी भी उस सफेद दीवार पर टिकी हैं- उन्हें इंतजार है कि कब उनका ‘मरीज’ उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता देगा। क्योंकि एवरेस्ट पर, आखिरी फैसला हमेशा पहाड़ का ही होता है। खतरा, इसी जगह पर 2014 में 16 गाइड्स की मौत हुई थी आइसफॉल डॉक्टर्स का काम दुनिया के सबसे खतरनाक पेशों में गिना जाता है। ये जांबाज उस वक्त पहाड़ पर चढ़ते हैं जब कोई और वहां जाने की सोच भी नहीं सकता। दरकते ग्लेशियरों के बीच रस्सियां बांधना और रसातल जैसी गहरी दरारों पर एल्युमीनियम की सीढ़ियां टिकाना बड़ी चुनौती रहती है। पर इस साल, खतरा पहले से कहीं ज्यादा है। अप्रैल 2014 की घटना इन शेरपाओं के जेहन में अब भी ताजा है, जब इसी जगह बर्फ की दीवार गिरने से 16 गाइड्स की मौत हो गई थी। वह एवरेस्ट के इतिहास का सबसे भीषण दिन था। स्थिति वैसी ही है और सुरक्षा से समझौता करना खुदकुशी के बराबर है।

पांच दिन में 41 से 45 डिग्री पहुंचा तापमान:श्योपुर में भीषण गर्मी से दोपहर में बाजार में सन्नाटा, मौसम विशेषज्ञ बोले- बढ़ सकता है टेम्प्रेचर

पांच दिन में 41 से 45 डिग्री पहुंचा तापमान:श्योपुर में भीषण गर्मी से दोपहर में बाजार में सन्नाटा, मौसम विशेषज्ञ बोले- बढ़ सकता है टेम्प्रेचर

श्योपुर जिले में गर्मी का प्रकोप जारी है, जिससे जनजीवन प्रभावित हुआ है। पिछले पांच दिनों से लगातार तापमान में वृद्धि दर्ज की जा रही है। अप्रैल के अंतिम हफ्ते में अधिकतम तापमान 41 डिग्री से बढ़कर 44.8 डिग्री तक पहुंच गया है, जबकि न्यूनतम तापमान 23 से 27 डिग्री के बीच बना हुआ है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 27 अप्रैल को अधिकतम तापमान 44.8 डिग्री और न्यूनतम 27.4 डिग्री दर्ज किया गया। 26 अप्रैल को अधिकतम 44.2 डिग्री और न्यूनतम 27.6 डिग्री रहा। इससे पहले 25 और 24 अप्रैल को भी तापमान 42 डिग्री से ऊपर बना रहा था, जबकि 23 अप्रैल को अधिकतम तापमान 41 डिग्री दर्ज किया गया था। दोपहर के समय शहर के बाजारों में सन्नाटा तेज धूप और गर्म हवाओं के चलते दोपहर के समय शहर के बाजारों में सन्नाटा छाया रहता है। लोग केवल आवश्यक कार्य होने पर ही घरों से बाहर निकल रहे हैं। जो लोग बाहर निकलते हैं, वे गर्मी से बचाव के लिए अपने चेहरे को कपड़े से ढंककर और सिर पर गमछा या टोपी लगाकर ही निकलते हैं। डॉक्टों ने इस भीषण गर्मी में सावधानी बरतने की सलाह दी है। उनके अनुसार, दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक धूप में निकलने से बचना चाहिए। लू और डिहाइड्रेशन से बचाव के लिए अधिक से अधिक पानी पीना, हल्का भोजन करना और शरीर को हाइड्रेट रखना आवश्यक है। आगामी दिनों में तापमान बढ़ने की संभावना मौसम विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले दिनों में तापमान में और वृद्धि हो सकती है। इसे देखते हुए लोगों को विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता है। प्रशासन ने भी आमजन से अपील की है कि वे अनावश्यक रूप से धूप में बाहर न निकलें और गर्मी से बचाव के सभी उपायों का पालन करें। पिछले पांच दिनों को तापमान… 27- अप्रैल अधिकतम 44.8 न्यूनतम 27.4 26- अप्रैल अधिकतम 44.2 न्यूनतम 27.6 25 अप्रैल अधिकतम 42.2 न्यूनतम 26.6 24 अप्रैल अधिकतम 42.2 न्यूनतम 23.8 23 अप्रैल अधिकतम 41 न्यूनतम 23

एमजी रोड पर धंसी सड़क, फलों से भरा पिकअप फंसा:बड़वानी में घटिया सीवरेज कार्य से लगा जाम, रहवासी बोले-सही तरीके से नहीं हो रहा काम

एमजी रोड पर धंसी सड़क, फलों से भरा पिकअप फंसा:बड़वानी में घटिया सीवरेज कार्य से लगा जाम, रहवासी बोले-सही तरीके से नहीं हो रहा काम

बड़वानी जिला मुख्यालय के एमजी रोड पर मंगलवार सुबह एक फलों से भरा पिकअप वाहन सड़क में धंस गया। घटना के बाद कुछ समय तक रास्ते पर जाम की स्थिति बन गई और यातायात प्रभावित रहा। सीवरेज काम के बाद ठीक से नहीं बनी सड़क जानकारी के अनुसार, एमजी रोड पर सीवरेज लाइन बिछाने के बाद सड़क की मरम्मत ठीक से नहीं की गई थी। इसी कारण सड़क का एक हिस्सा अचानक धंस गया और मंडी जा रहा पिकअप वाहन उसमें फंस गया। इस मार्ग पर पहले भी भारी वाहनों के फंसने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। रहवासियों ने जताई नाराजगी स्थानीय निवासी उदित ने बताया कि सीवरेज काम के बाद सड़क को सही तरीके से नहीं भरा जा रहा है। इसी वजह से आए दिन वाहन फंस रहे हैं और हादसे का खतरा बना रहता है। वहीं, राजेश गुप्ता ने कहा कि इस घटना में बड़ा हादसा टल गया, क्योंकि अगर वाहन पलट जाता तो नुकसान हो सकता था। ठेकेदार पर कार्रवाई की मांग क्षेत्र के लोगों ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए जिम्मेदार ठेकेदार के भुगतान पर रोक लगाने की मांग की है। उनका कहना है कि अगर समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो आगे बड़ी घटना हो सकती है। नगर पालिका ने दिए जांच के निर्देश नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिनिधि निक्कू चौहान ने बताया कि एमजी रोड के निर्माण को लेकर शिकायतें मिली हैं। उन्होंने संबंधित ठेकेदार को गुणवत्ता के साथ जल्द काम पूरा करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कहा कि लापरवाही पाए जाने पर भुगतान रोका जाएगा और नियम के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

सीहोर-श्यामपुर मार्ग पर डामर पिघला:जिले में तापमान 44.5 डिग्री सेल्सियस पहुंचा; अस्पतालों में बनी हीट स्ट्रोक यूनिट

सीहोर-श्यामपुर मार्ग पर डामर पिघला:जिले में तापमान 44.5 डिग्री सेल्सियस पहुंचा; अस्पतालों में बनी हीट स्ट्रोक यूनिट

सीहोर जिले में भीषण गर्मी और राजस्थान से आ रही गर्म हवाओं के कारण अधिकतम तापमान 44.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है। मंगलवार को तेज गर्मी के चलते सीहोर-श्यामपुर मार्ग पर सड़क का डामर पिघलना शुरू हो गया है। अप्रैल महीने में पिछले दो दिनों से पारा 44 डिग्री के पार बना हुआ है, जिसने गर्मी के कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। लू और हीट स्ट्रोक से बचाव के लिए स्वास्थ्य विभाग ने एडवाइजरी जारी करते हुए जिले के सभी अस्पतालों में ‘हीट स्ट्रोक मैनेजमेंट यूनिट’ और ओआरएस (ORS) कॉर्नर स्थापित कर दिए हैं। मई 2024 के बाद अप्रैल में टूटा गर्मी का रिकॉर्ड जिले में इस साल अप्रैल माह में ही गर्मी ने पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इससे पहले 23 मई 2024 को सीहोर शहर का अधिकतम तापमान 44.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था, लेकिन अप्रैल के महीने में ऐसी भीषण गर्मी पहले कभी रिकॉर्ड नहीं की गई। तेज धूप के कारण दोपहर के समय शहर की अधिकांश सड़कें सुनसान नजर आ रही हैं। लोग केवल बहुत जरूरी काम होने पर ही खुद को कपड़े से ढककर घरों से बाहर निकल रहे हैं। CMHO ने दिए सतत निगरानी और उपचार के निर्देश बढ़ते तापमान के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को देखते हुए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) डॉ. सुधीर कुमार डेहरिया ने अलर्ट जारी किया है। उन्होंने जिले की सभी स्वास्थ्य संस्थाओं के प्रभारी अधिकारियों को सतत निगरानी और उपचार के निर्देश दिए हैं। मरीजों को बेहतर इलाज मिल सके, इसके लिए अस्पतालों में पदस्थ स्वास्थ्य कर्मियों का उन्मुखीकरण (Orientation) भी किया जा रहा है। अस्पतालों में ठंडे पानी, पंखे और ओआरएस कॉर्नर की व्यवस्था स्वास्थ्य संस्थाओं को आने वाले मरीजों में लू के लक्षणों की तुरंत जांच करने और उचित प्रबंधन के निर्देश दिए गए हैं। वार्डों में मरीजों के लिए ठंडे पेयजल और पंखों की व्यवस्था की गई है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, तेज धूप में ज्यादा देर तक रहना लू लगने का प्रमुख कारण है, जिससे शरीर में पानी की कमी और इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन हो सकता है। गर्मी से संबंधित बीमारियों से बचाव के लिए सभी संस्थाओं में पर्याप्त दवाइयां उपलब्ध कराई गई हैं और ओआरएस (ORS) कॉर्नर स्थापित किए गए हैं।