EAT Lancet Diet Health Benefits; Chronic Kidney Disease

Hindi News Lifestyle EAT Lancet Diet Health Benefits; Chronic Kidney Disease | Plant Based Diet Advice 12 घंटे पहलेलेखक: अदिति ओझा कॉपी लिंक आजकल की बिजी लाइफस्टाइल में लोग फिट और हेल्दी रहने के लिए तरह-तरह की डाइट फॉलो करते हैं। इन्हीं में से एक है ‘EAT-Lancet डाइट’, जो न सिर्फ सेहत बल्कि पर्यावरण को भी ध्यान में रखकर बनाई गई है। ये डाइट कई गंभीर बीमारियों के रिस्क को कम करने में मदद करती है। कैनेडियन मेडिकल एसोसिएशन जर्नल में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, ये डाइट क्रॉनिक किडनी डिजीज के रिस्क को काफी हद तक कम कर सकती है। भारत में हार्ट डिजीज के बाद क्रॉनिक किडनी डिजीज दूसरी सबसे बड़ी बीमारी बन चुकी है। हेल्थ जर्नल ‘द लैंसेट’ में पब्लिश एक ग्लोबल स्टडी के मुताबिक, साल 2023 में भारत में करीब 13.8 करोड़ लोग क्रॉनिक किडनी डिजीज से पीड़ित थे। इसलिए आज जरूरत की खबर में इसी के बारे में बात जानेंगे साथ ही जानेंगे कि- EAT लैंसेट डाइट के हेल्थ बेनिफिट्स क्या हैं? ये डाइट लेते हुए किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अनु अग्रवाल, सीनियर क्लीनिकल डाइटिशियन, ‘वनडाइटटुडे’ की फाउंडर सवाल- EAT लैंसेट (EAT Lancet) डाइट क्या है? जवाब- EAT फोरम और द लैंसेट कमीशन ने मिलकर EAT–लैंसेट डाइट तैयार की है। यह एक तरह की फ्लेक्सिटेरियन डाइट है। यानी इसमें ज्यादातर खाना प्लांट-बेस्ड होता हैं, जैसे- दालें, अनाज, फल, सब्जियां और मेवे। एनिमल प्रोडक्ट्स की मात्रा बहुत कम रखी जाती है। इसे ‘प्लैनेटरी हेल्थ डाइट’ भी कहा जाता है। सवाल- EAT लैंटेस (EAT Lancet) डाइट की शुरुआत कब और कैसे हुई? जवाब- इसकी शुरुआत 17 जनवरी 2019 को ओस्लो, नॉर्वे में हुई। इसे 16 देशों के 37 साइंटिस्ट और हेल्थ एक्सपर्ट्स ने मिलकर तैयार किया था। इन विशेषज्ञों का मकसद सिर्फ एक डाइट चार्ट बनाना नहीं था, बल्कि ऐसा फूड मॉडल सुझाना था, जो हमारी सेहत के साथ साथ नेचर के भी अनुकूल रख सके। इससे पहले हेल्थ और पर्यावरण दोनों को बैलेंस करने वाली कोई ग्लोबल कंसेंसस डाइट मौजूद नहीं थी। ग्लोबल कंसेसस यानी- जो शरीर के लिए पोषणयुक्त हो। पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाए। सस्टेनेबल हो यानी भविष्य की पीढ़ियों के लिए टिकाऊ हो। सवाल- EAT लैंसेंट (EAT Lancet) डाइट पर हुई नई स्टडी क्या कहती है? जवाब- नई स्टडी के मुताबिक, प्लांट बेस्ड, बैलेंस और कम मीट वाली डाइट फॉलो करने से क्रॉनिक किडनी डिजीज का रिस्क काफी हद तक कम हो जाता है। यह डाइट प्लांट बेस्ड फूड पर फोकस्ड होती है। इसमें सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें, नट्स और हेल्दी ऑयल शामिल हैं। ये स्टडी ‘कैनेडियन मेडिकल एसोसिएशन जर्नल’ में पब्लिश हुई है। सवाल- EAT लैंसेंट (EAT Lancet) डाइट के हेल्थ बेनिफिट्स क्या हैं? जवाब- यह ऐसा बैलेंस्ड फूड मॉडल है, जो हार्ट डिजीज, डायबिटीज, मोटापा और सभी लाइफस्टाइल से जुड़ी डिजीज का रिस्क कम करता है। नीचे दिए ग्राफिक में इसके हेल्थ बेनिफिट्स देखिए- सवाल- इस स्टडी के मुताबिक EAT लैंटेस डाइट किडनी हेल्थ के लिए फायदेमंद है। लेकिन सवाल ये है कि ये डाइट किडनी के लिए अच्छी क्यों है? ये किडनी फंक्शन को कैसे सपोर्ट करती है? जवाब- EAT- लैंसेट डाइट किडनी फंक्शन को कई तरीकों से सपोर्ट करती है। इसमें मौजूद प्लांट बेस्ड प्रोटीन (दालें, नट्स, बीज) एनिमल प्रोटीन की तुलना में किडनी पर कम प्रेशर डालते हैं। हाई फाइबर फूड गट माइक्रोबायोम (आंतों में माइक्रोब्स का संतुलन) को बेहतर करता है। इससे ऐसे टॉक्सिन कम बनते हैं, जो ब्लड के जरिए किडनी तक पहुंचकर उसे नुकसान पहुंचाते हैं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सिडेंट्स और एंटी-इन्फ्लेमेटरी पोषक तत्व इंफ्लेमेशन कम करके किडनी टिश्यूज को डैमेज से बचाते हैं। सवाल- क्या यह डाइट किडनी स्टोन के जोखिम को भी कम करती है? जवाब- हां, इस डाइट में फल, सब्जियां, साबुत अनाज और दालें ज्यादा होती हैं। ये यूरिन में साइट्रेट की मात्रा बढ़ाती हैं। साइट्रेट एक ऐसा तत्व है, जिसमें कैल्शियम चिपक जाता है और पथरी बन जाती है। सवाल- EAT लैंसेट डाइट में कौन सा फूड कितनी मात्रा में खाना चाहिए? जवाब- EAT लैंसेट डाइट लगभग 2500 कैलोरी/दिन के औसत सेवन पर आधारित है। इसमें अलग-अलग फूड ग्रुप की सुझाई गई मात्रा (प्रतिदिन औसतन) ग्राफिक में देखें- सवाल- ये डाइट लेते हुए किन लोगों को थोड़ा सावधान रहने की जरूरत है? जवाब- यह डाइट आमतौर पर सुरक्षित मानी जाती है, लेकिन हर किसी के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होती। कुछ लोगों को यह डाइट लेने से पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए, पूरी लिस्ट ग्राफिक में देखिए- सवाल- इस डाइट को फॉलो करने के अलावा किडनी को हेल्दी रखने के लिए लाइफस्टाइल में और क्या सुधार करें? जवाब- हमारी रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें भी किडनी की सेहत पर बड़ा असर डालती हैं। इसलिए हेल्दी किडनी के लिए लाइफस्टाइल में कुछ जरूरी सुधार करने चाहिए, ग्राफिक में देखिए- कुल मिलाकर, किडनी को स्वस्थ रखने के लिए सिर्फ सही डाइट ही नहीं, बल्कि बैलेंस लाइफस्टाइल भी उतनी ही अहम भूमिका निभाती है। ………………….. ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर– सुबह उठकर खाली पेट पहले पानी पिएं:जानें इसके 11 हेल्थ बेनिफिट्स, पीने का सही तरीका, पीते हुए न करें ये 7 गलतियां हम हमेशा से ये सुनते आए हैं कि सुबह खाली पेट पानी पीना सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है। हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ये आदत बॉडी को रीस्टार्ट का मैसेज देती है। कुछ हेल्थ एक्सपर्ट्स इस आदत को ‘साइलेंट हीलर’ भी कहते हैं। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Phalsa Health Benefits: गर्मी में फालसा खाने के फायदे

Last Updated:March 06, 2026, 23:22 IST Phalsa Health Benefits: गर्मियों में फालसा का सेवन न सिर्फ लू और गर्मी से बचाता है, बल्कि पाचन, डायबिटीज, दिल की सेहत और इम्युनिटी को भी मजबूत बनाता है. इसे आप ताजा खा सकते है या इसका जूस बनाकर भी पी सकते हैं. ख़बरें फटाफट गर्मी के मौसम में सबसे बड़ी समस्या लो एनर्जी और डिहाइड्रेशन की होती है. इसलिए ऐसे फलों और सब्जियों को खाना जरूरी हो जाता है, जो शरीर को ठंडक और एनर्जी देने के साथ-साथ कई बीमारियों से बचाव में भी मददगार हो. फालसा ऐसा ही एक फल है. फालसा का सेवन न सिर्फ लू और गर्मी से बचाता है, बल्कि पाचन, डायबिटीज, दिल की सेहत और इम्युनिटी को भी मजबूत बनाता है. फालसा का वैज्ञानिक नाम ग्रेविया एशियाटिका है. यह भारत के शुष्क और अर्द्धशुष्क इलाकों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है. फालसा में पोषक तत्वअमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ साइंस के अनुसार, फालसा में विटामिन ए, विटामिन सी, कैल्शियम, फॉस्फोरस, आयरन और भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है. इसमें कैलोरी और फैट बहुत कम होते हैं. मैग्नीशियम, पोटेशियम, सोडियम और प्रोटीन भी मौजूद रहते हैं. ये सभी तत्व मिलकर फालसा को एक शक्तिशाली इम्युनिटी बूस्टर बनाते हैं. फालसा के फायदे गर्मियों में फालसा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह शरीर को अंदर से ठंडक देता है, लू लगने से बचाता है और पसीने के कारण होने वाली कमजोरी को दूर करता है. इसका रस एक प्राकृतिक टॉनिक की तरह काम करता है. आयुर्वेद के अनुसार, खून की कमी या एनीमिया में पके फालसे का सेवन लाभकारी है. त्वचा की जलन, पेट में जलन, पित्त विकार, हाई ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और पाचन संबंधी समस्याओं में भी यह रामबाण साबित होता है. फालसा पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है, कब्ज और दस्त दोनों को नियंत्रित करता है. यह तन मन दोनों के लिए फायदेमंद माना जाता है. एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होने के कारण यह कई गंभीर रोगों से बचाव में भी सहायक होता है. कैसे करें सेवनखास बात है कि फालसा को ताजा खाया जा सकता है, इसका जूस बनाया जा सकता है या चाट-सलाद में भी डाला जा सकता है. इसका स्वाद खट्टा-मीठा होता है, इसलिए कुछ लोगों को ज्यादा मात्रा में खाने से एलर्जी या पेट की हल्की परेशानी हो सकती है. इसलिए पहले थोड़ी मात्रा में आजमाएं और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या पोषण विशेषज्ञ से सलाह लें. About the Author शारदा सिंहSenior Sub Editor शारदा सिंह बतौर सीनियर सब एडिटर News18 Hindi से जुड़ी हैं. वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्यू पर आधारित रिपोर्ट्स बनाने में एक्सपर्ट हैं. शारदा पिछले 5 सालों से मीडिया …और पढ़ें First Published : March 06, 2026, 23:22 IST Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.
Curd Health Benefits; Blood Pressure Gut Microbiome

28 मिनट पहलेलेखक: अदिति ओझा कॉपी लिंक दही सेहत का खजाना है। इसमें एक साथ प्रोटीन, शुगर, गुड फैट और प्रोबायोटिक, सबकुछ मिल जाता है। स्वाद के साथ यह गट हेल्थ, इम्यूनिटी और मेटाबॉलिज्म को भी रीसेट करता है। इतने सारे गुणों से भरपूर होने के कारण इसे सुपरफूड भी कहते हैं। ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, नियमित दही खाने से हाई ब्लड प्रेशर का रिस्क 16-20% तक कम हो सकता है। साथ ही अगर हफ्ते में 5 या उससे ज्यादा बार बैलेंस डाइट के साथ दही खाई जाए तो ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में समझेंगे कि दही कैसे ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करती है। साथ ही जानेंगे कि- दही किन-किन बीमारियों में फायदेमंद है? यह गट माइक्रोबायोम को कैसे प्रभावित करती है? एक्सपर्ट- डॉ. संचयन रॉय, सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, दिल्ली सवाल- क्या दही बीमारियों से लड़ने में मददगार है? जवाब- हां, इसमें मौजूद जिंक, सेलेनियम और विटामिन D जैसे न्यूट्रिएंट्स संक्रमण पैदा करने वाले वायरस और बैक्टीरिया के खिलाफ सुरक्षा कवच का काम करते हैं। दही खाने से इम्यूनिटी मजबूत होती है। इसके नियमित सेवन से न केवल डाइजेस्टिव सिस्टम दुरुस्त रहता है, बल्कि यह शरीर में इंफ्लेमेशन को कम करके सर्दी-जुकाम से लेकर गंभीर बीमारियों के जोखिम को भी कम करता है। सवाल- दही का हार्ट हेल्थ से क्या कनेक्शन है? जवाब- दही में पोटेशियम और मैग्नीशियम जैसे मिनरल्स होते हैं। ये शरीर से एक्स्ट्रा सोडियम को बाहर निकालने में मदद करते हैं। इससे ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रहता है। साथ ही दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स (गुड बैक्टीरिया) शरीर का इंफ्लेमेशन कम करने में मदद करते हैं। दही में मौजूद बैक्टीरिया बैड कोलेस्ट्रॉल (LDL) को कम करने में भी मदद करते हैं। इंफ्लेमेशन और बैड कोलेस्ट्रॉल (LDL) कार्डियोवस्कुलर डिजीज का सबसे बड़ा कारण हैं। अगर खाने में नियमित रूप से दही शामिल की जाए तो हार्ट डिजीज का रिस्क कम हो सकता है। सवाल- दही ब्लड प्रेशर को कम करने में कैसे मदद करती है? जवाब- ब्लड प्रेशर बढ़ने की बड़ी वजह शरीर में सोडियम की अधिक मात्रा है। दही में मौजूद पोटेशियम इस अतिरिक्त सोडियम को शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है। दही में मौजूद कुछ बायोएक्टिव पेप्टाइड्स ब्लड प्रेशर बढ़ाने के लिए जिम्मेदार एंजाइम्स की एक्टिविटी को कम करके ब्लड वेसल्स को रिलैक्स करते हैं। इससे ब्लड प्रेशर कम होता है और फ्लो बेहतर होता है। सवाल- क्या दही का प्रभाव उम्र, जेंडर या BMI के अनुसार ब्लड प्रेशर पर अलग-अलग होता है? जवाब- हां, नियमित दही खाने से हार्ट हेल्थ बेहतर रहती है। खासतौर पर मिड एज की महिलाओं में यह ज्यादा प्रभावशाली है। वहीं जिन लोगों का BMI अधिक है, उन्हें सादा दही खाने से वजन और इंफ्लेमेशन को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। हालांकि, इसका असर व्यक्ति की डाइट और लाइफस्टाइल पर भी निर्भर करता है। सवाल- दही का रोजाना सेवन बीपी के अलावा और किन बीमारियों के रिस्क को कम करने में मदद करता है? जवाब- दही सिर्फ ब्लड प्रेशर ही नहीं, बल्कि कई दूसरी समस्याओं के जोखिम को भी कम करने में मददगार है। इसे ग्राफिक में देखिए- सवाल- दही के हेल्थ बेनिफिट्स क्या हैं? जवाब- आमतौर पर लोग यह जानते हैं कि दही खाने से पाचन आसान हो जाता है। इसमें मौजूद बैक्टीरिया हमारे गट में मौजूद गुड बैक्टीरिया की संख्या में इजाफा करते हैं। इससे पाचन तंत्र सुधरता है और इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है। यह हमारे दांत और हड्डियों की सेहत के लिए भी जरूरी है। ग्राफिक में सभी फायदे देखिए- सवाल- दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स गट माइक्रोबायोम को कैसे प्रभावित करते हैं? जवाब- दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स गट माइक्रोबायोम का संतुलन सुधारते हैं। प्रोबायोटिक्स माइक्रोबायोम को ऐसे प्रभावित करते हैं- बैड बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकते हैं। गैस, ब्लोटिंग, कब्ज या इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) जैसी समस्याओं में राहत देते हैं। इम्यून सिस्टम मजबूत करते हैं। हेल्दी गट माइक्रोबायोम गट-ब्रेन एक्सिस (गट और ब्रेन के बीच कम्युनिकेशन) को भी प्रभावित करते हैं। ये सेरोटोनिन जैसे ‘फील-गुड’ हॉर्मोन्स बढ़ाते हैं, जिससे मूड बेहतर रहता है। सवाल- दही खाने का सही समय क्या है? क्या रात में दही खाना सुरक्षित है? जवाब- दही खाने का सही समय व्यक्ति की सेहत, मौसम और पाचन क्षमता पर निर्भर करता है। आमतौर पर दोपहर का समय बेहतर माना जाता है, क्योंकि इस समय डाइजेस्टिव कैपेसिटी सबसे मजबूत होती है और दही आसानी से पच जाता है। सवाल- क्या दवाओं के बिना, सिर्फ दही खाने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल किया जा सकता है? जवाब- नहीं, दही खाने से ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने में मदद जरूर मिलती है, लेकिन यह दवाओं का विकल्प नहीं हो सकता है। ब्लड प्रेशर मैनेज करने के लिए दही के साथ हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाना जरूरी है। सवाल- ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने के लिए लाइफस्टाइल में क्या बदलाव जरूरी हैं? जवाब- इसके लिए अपनी रोजमर्रा की आदतों में कुछ जरूरी बदलाव करके ब्लड प्रेशर को काफी हद तक संतुलित रखा जा सकता है। सभी जरूरी बदलाव ग्राफिक में देखिए- दही से जुड़े कुछ कॉमन सवाल-जवाब सवाल- क्या खाली पेट दही खाना सही है? जवाब- खाली पेट दही खाने से पेट में एसिड बढ़ सकता है, जिससे गैस या बेचैनी महसूस हो सकती है। इसे हमेशा मेन कोर्स (दलिया या रोटी) के साथ एक ‘साइड डिश’ की तरह खाएं, ताकि पाचन तंत्र पर बुरा असर न पड़े। सवाल- क्या मीठा या फ्लेवर्ड दही भी उतना ही फायदेमंद है? जवाब- नहीं, इसमें एक्स्ट्रा शुगर और प्रिजर्वेटिव्स होते हैं। ज्यादा शुगर से वजन और ब्लड शुगर बढ़ने का खतरा रहता है। स्वाद के लिए सादे दही में ताजे फल या थोड़ा सा शहद मिलाया जा सकता है। सवाल- स्किन और बालों के लिए दही कितना फायदेमंद है? जवाब- दही नेचुरल मॉइश्चराइजर की तरह काम करता है। इसमें मौजूद लैक्टिक एसिड और प्रोटीन स्किन की रंगत सुधारते हैं। साथ ही स्किन में मॉइश्चर और बालों की जड़ों को मजबूती व चमक प्रदान करते हैं। सवाल- किन परिस्थितियों में दही खाने से बचना चाहिए? जवाब- आमतौर पर दही सभी के लिए सेहतमंद है, लेकिन कुछ स्वास्थ्य समस्याओं में इससे
Lemon grass benefits: लेमन ग्रास के फायदे जान होंगे हैरान, डाइट में करें शामिल

Lemon grass health benefits: आयुर्वेद में औषधीय पौधों का इस्तेमाल कई तरह के रोगों को दूर करने के लिए किया जाता है. इसी में से एक है लेमन ग्रास, जो देखने में बिल्कुल घास जैसा होता है. क्या आप जानते हैं कि लेमन ग्रास कोई घास नहीं, बल्कि एक बेहद ही हेल्दी हरा पत्ता है, जिसका इस्तेमाल सेलिब्रिटीज से लेकर फिटनेस से जुड़े लोग भी कर रहे हैं. आजकल लोग लेमन ग्रास को नया समझकर इस्तेमाल करना शुरू किए हैं, लेकिन ये सदियों से आयुर्वेद का हिस्सा रहा है और कई रोगों के उपचार में उपयोग में लाया जाता रहा है. लेमन ग्रास के फायदे -लेमन ग्रास में कई तरह के औषधीय गुण मौजूद होते हैं. आयुर्वेद में लेमन ग्रास को ‘भूस्तृण’ कहते हैं. इसका इस्तेमाल वात, पित्त और कफ दोषों को संतुलित करने में मदद करता है. जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द से राहत दिलाता है. -स्वाद में थोड़ा कड़वा-तीखा, लेकिन इसकी तासीर ठंडी होती है. इसके सेवन से नसों की समस्या शांत होती है. तंत्रिका तंत्र मजबूत करता है. मस्तिष्क को हेल्दी रखता है. -लेमन ग्रास खांसी, बुखार, तपेदिक, कुष्ठ रोग, फाइलेरिया, मलेरिया, आंखों की सूजन, मसूड़ों की सूजन, निमोनिया और रक्त की अशुद्धि से जुड़े विकारों में भी काम आता है. -लेमनग्रास का तेल पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है. मतली, उल्टी, पीरियड्स से संबंधित समस्याओं और सिरदर्द से राहत देता है. लेमनग्रास का लेप त्वचा संबंधी परेशानियों में बेहद कारगर होता है. कैसे करें लेमन ग्रास का इस्तेमाल आप हर दिन लेमन ग्रास का ताजा जूस पी सकते हैं. इससे शरीर के अंदर मौजूद टॉक्सिन पदार्थों से छुटकारा मिलता है. शरीर अंदर से साफ और हेल्दी बनता है. आप चाहें तो इसकी चाय बनाकर भी पी सकते हैं. कैफीन की जगह आप लेमन ग्रास टी का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह स्वाद और सेहत दोनों में बेहतर है. आप लेमनग्रास ऑयल का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. नींद की परेशानी और तनाव दूर करने में कारगर साबित हो सकता है लेमनग्रास का तेल. इसे आप सिर में लगाकर मालिश कर सकते हैं. सिरदर्द में आराम महसूस होगा. साथ ही स्किन पर भी लेमनग्रास ऑयल लगा सकते हैं. ड्राइनेस दूर होगी. स्किन हेल्दी रहेगी.
Soya Chunks Health Benefits Explained; Protein – Nutritional Value

Hindi News Lifestyle Soya Chunks Health Benefits Explained; Protein Nutritional Value | Side Effects 28 मिनट पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल कॉपी लिंक सोया चंक्स शाकाहारी लोगों के लिए प्रोटीन का बेहतरीन सोर्स है। इसमें प्रोटीन के साथ फाइबर, कैल्शियम और आयरन जैसे कई जरूरी पोषक तत्व भी होते हैं। ये मसल्स और हड्डियों को मजबूत रखने व शरीर की इम्यूनिटी को सपोर्ट करने में मदद करता है। ‘नेशनल सेंटर फॉर कॉम्प्लिमेंटरी एंड इंटीग्रेटिव हेल्थ (NCCIH)’ के मुताबिक, सोया चंक्स कोलेस्ट्रॉल लेवल कम करने में मददगार हैं। इससे महिलाओं में मेनोपॉज के दौरान होने वाले हॉट फ्लैशेज (अचानक तेज गर्मी महसूस होना) से भी राहत मिलती है। कुछ स्टडीज में पता चला है कि इससे ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क भी कम हो सकता है। साथ ही यह हड्डियों को मजबूत रखने और ब्लड प्रेशर को संतुलित करने में भी मददगार है। हालांकि, हर व्यक्ति में इसका प्रभाव अलग हो सकता है। फिर भी संतुलित मात्रा में सोया चंक्स आमतौर पर सेहत के लिए फायदेमंद है। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में हम सोया चंक्स की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- सोया चंक्स में कौन-कौन से न्यूट्रिएंट्स पाए जाते हैं? क्या ज्यादा सोया चंक्स खाने के कोई साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं? किन लोगों को सोया चंक्स नहीं खाना चाहिए? एक्सपर्ट: डॉ. अनु अग्रवाल, सीनियर क्लीनिकल डाइटीशियन, फाउंडर- ‘वनडाइडटुडे’ सवाल- सोया चंक्स में कौन-कौन से पोषक तत्व पाए जाते हैं? जवाब- ‘यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (USDA)’ के मुताबिक, 100 ग्राम सोया चंक्स में लगभग 50 ग्राम प्रोटीन होता है, जो मसल बिल्डिंग और रिकवरी के लिए बेहद फायदेमंद है। सोया चंक्स वेजिटेरियन और वीगन लोगों के लिए प्रोटीन का एक बेहतरीन सोर्स है। इसमें कैल्शियम, आयरन और मैग्नीशियम जैसे कई जरूरी मिनरल्स भी पाए जाते हैं। नीचे दिए ग्राफिक में पानी में भिगोए हुए 100 ग्राम सोया चंक्स की न्यूट्रिशनल वैल्यू देखिए- सवाल- सोया चंक्स कैसे तैयार किए जाते हैं? जवाब- सोयाबीन से तेल निकालने के बाद बचे हुए हिस्से काे बारीक पीस लिया जाता है। फिर इसे प्रोसेस करके ‘सोया चंक्स’ बनाए जाते हैं। इसे बनाने की प्रक्रिया समझिए- कच्चे सोयाबीन से तेल निकालकर बचे हुए ‘डी-फैटेड सोया फ्लोर’ को पानी के साथ मिक्सर में मिलाया जाता है, जिससे गाढ़ी स्लरी बनती है। यह स्लरी सोया नगेट ‘एक्सट्रूडर कुकिंग मशीन’ में डाली जाती है। इसके अंदर स्लरी को हाई टेम्परेचर और प्रेशर पर पकाया जाता है। मशीन पके हुए सोया पेस्ट को कटर की मदद से छोटे-छोटे टुकड़ों में काट देती है। यह प्रक्रिया हाई प्रेशर में होती है, जिससे सोया चंक्स को स्पंजी टेक्सचर मिलता है। इन छोटे-छोटे टुकड़ों को ड्रायर में सुखा लिया जाता है। इनकी क्वालिटी जांचकर अंत में पैक करके बाजार में भेज दिया जाता है। सवाल- सोया चंक्स हमारी सेहत के लिए कितने फायदेमंद हैं? जवाब- सोया चंक्स एक हाई-प्रोटीन, लो-फैट और फाइबर से भरपूर फूड है, जो शरीर की कई जरूरतों को पूरा करता है। जैसेकि- सोया चंक्स में लगभग 52% प्रोटीन होता है, जो मसल्स ग्रोथ और रिपेयर में मदद करता है। हाई फाइबर और लो फैट होने के कारण इससे पेट देर तक भरा रहता है। यह वेट मैनेजमेंट में सपोर्ट करता है। बैड कोलेस्ट्रॉल (LDL) कम करके हार्ट हेल्थ को सपोर्ट करता है। कैल्शियम और फॉस्फोरस से भरपूर होने के कारण हड्डियों और दांतों को मजबूती देता है। आयरन से भरपूर होने के कारण हीमोग्लोबिन लेवल सुधारने में मदद करता है। इसमें मौजूद डाइटरी फाइबर पाचन बेहतर करता है। यह ब्लड शुगर कंट्रोल करने में भी मदद करता है। सोया चंक्स में पौधे में पाया जाने वाला ‘आइसोफ्लेवोन्स’ कंपाउंड होता है। ये मेनोपॉज से गुजर रही महिलाओं में हॉट फ्लैशेज जैसी समस्याओं को कम करता है। इसमें मौजूद फॉस्फोरस ब्रेन फंक्शन और मेमोरी को सपोर्ट करता है। नीचे दिए ग्राफिक में इसके हेल्थ बेनिफिट्स देखिए- सवाल- सोया चंक्स को अपनी डाइट में कैसे शामिल कर सकते हैं? जवाब- इसे अपनी रोजमर्रा की डाइट में आसानी से शामिल कर सकते हैं। जैसेकि- इसे सब्जी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। चावल से बने व्यंजन जैसे, पुलाव या फ्राइड राइस में इस्तेमाल हो सकता है। इसे सूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। सोया चंक्स को उबालकर सलाद में मिला सकते हैं। इसे सब्जियों के साथ हल्का सा भूनकर भी खा सकते हैं। सवाल- क्या सोया चंक्स के ज्यादा सेवन से कोई साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं? जवाब- हां, इसके ज्यादा सेवन के कुछ साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। जैसेकि- गैस सूजन अपच दस्त कुछ लोगों में सोया से एलर्जी भी होती है, जिससे खुजली, रैशेज या सांस लेने में परेशानी हो सकती है। सोया में मौजूद ‘फाइटोएस्ट्रोजेन थायरॉइड’ से पीड़ित लोगों में हाॅर्मोनल असंतुलन हो सकता है। सवाल- एक दिन में कितना सोया चंक्स खाना सुरक्षित है? जवाब- सीनियर डाइटीशियन डाॅ. अनु अग्रवाल बताती हैं कि आमतौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए एक दिन में 25 से 30 ग्राम सोया चंक्स सुरक्षित है। पकाने के बाद यह मात्रा लगभग ½ से 1 कटोरी हो जाती है। सवाल- क्या डायबिटिक लोग सोया चंक्स खा सकते हैं? जवाब- हां, इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स लो होता है। इसलिए यह ब्लड शुगर धीरे-धीरे बढ़ाता है। यह डायबिटिक लोगों के लिए बेहतर विकल्प है। सवाल- क्या बच्चों को सोया चंक्स देना सही है? जवाब- हां, सीमित मात्रा में बच्चों को सोया चंक्स दिया जा सकता है। ये उनकी ग्रोथ, मसल डेवलपमेंट और हड्डियों को मजबूत बनाने में मदद करता है। अगर बच्चे को कोई हेल्थ कंडीशन है तो पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें। सवाल- किन लोगों को सोया चंक्स नहीं खाना चाहिए? जवाब- डॉ. अनु अग्रवाल बताती हैं कि कुछ लोगों के लिए सोया चंक्स नुकसानदायक हो सकते हैं। इसे नीचे दिए ग्राफिक में देखिए- सवाल- मार्केट से सोया चंक्स खरीदते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? जवाब- सोया चंक्स खरीदते समय उनकी क्वालिटी पर ध्यान देना जरूरी है। इसके लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखें। जैसेकि- पैकेट पर FSSAI नंबर जरूर देखें। मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी डेट भी चेक करें। देखें कि पैकेट सील्ड है या नहीं। अजीब गंध वाले सोया चंक्स न खरीदें। ब्रांडेड और भरोसेमंद कंपनी के सोया चंक्स चुनें। इंग्रीडिएंट लिस्ट देखें। चेक करें कि इसमें अनावश्यक
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Last Updated:February 26, 2026, 15:57 IST Ayurvedic Upay for Piles: डॉ विपिन सिंह के मुताबिक, नागदोन के पत्ते पाइल्स के इलाज में काफी कारगर माने जाते हैं. अगर इसके पांच ताजे पत्ते लगातार तीन दिनों तक चबाए जाएं, तो शुरुआती अवस्था की पाइल्स में राहत मिल सकती है. सीधी. मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में पाए जाने वाले औषधीय पौधों में नागदोन का विशेष महत्व माना जाता है. आयुर्वेद में इसका उपयोग वर्षों से विभिन्न रोगों के उपचार के लिए किया जाता रहा है. नागदोन की पत्तियां, डंठल और जड़ें औषधीय गुणों से भरपूर मानी जाती हैं और यह पौधा प्राकृतिक रूप से ग्रामीण इलाकों में आसानी से मिल जाता है. सीधी के आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी डॉ विपिन सिंह ने लोकल 18 को जानकारी देते हुए बताया कि आज के समय में बड़ी संख्या में लोग पाइल्स की समस्या से जूझ रहे हैं. युवाओं में भी यह परेशानी तेजी से बढ़ रही है. पाइल्स को बवासीर या हेमोरॉइड्स भी कहा जाता है, जिसमें मलद्वार के आसपास की नसों में सूजन आ जाती है. इस कारण मल त्याग के दौरान दर्द, जलन और कई बार खून आने जैसी समस्या भी हो सकती है, जिसे खूनी बवासीर कहा जाता है. डॉक्टर के अनुसार, कब्ज, लंबे समय तक बैठकर काम करना, फाइबर युक्त आहार की कमी और लगातार तनाव इसके प्रमुख कारण हैं. समय पर इलाज न मिलने पर स्थिति गंभीर रूप ले सकती है. ऐसे में आयुर्वेदिक उपचार राहत देने में सहायक साबित हो सकते हैं. डॉ सिंह के मुताबिक, नागदोन के पत्ते पाइल्स में काफी कारगर माने जाते हैं. यदि नागदोन के पांच ताजे पत्ते सुबह खाली पेट लगातार तीन दिनों तक चबाए जाएं, तो शुरुआती अवस्था की बीमारी में राहत मिल सकती है. उन्होंने बताया कि इन पत्तों में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल और दर्द निवारक गुण पाए जाते हैं, जो सूजन, जलन और दर्द को कम करने में मदद करते हैं. खूनी बवासीर की स्थिति में भी इससे ब्लीडिंग में कमी आ सकती है. सूजी हुई नसों को शांत करने में सहायकउन्होंने आगे बताया कि नागदोन मलद्वार की सूजी हुई नसों को शांत करने में सहायक होता है और धीरे-धीरे सूजन कम करता है. नियमित उपयोग से कुछ ही दिनों में फर्क महसूस होने लगता है. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि हर व्यक्ति की शारीरिक प्रकृति अलग होती है, इसलिए किसी भी घरेलू या आयुर्वेदिक उपचार को अपनाने से पहले डॉक्टर या आयुर्वेदाचार्य से सलाह जरूर लेनी चाहिए. इसके अलावा संतुलित आहार, पर्याप्त पानी का सेवन और फाइबर युक्त भोजन भी बवासीर से बचाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. पुरानी या गंभीर समस्या होने पर स्वयं उपचार करने के बजाय चिकित्सकीय परामर्श लेना जरूरी है. नागदोन एक सस्ता और प्राकृतिक विकल्प जरूर है लेकिन सही जीवनशैली और चिकित्सकीय सलाह के साथ ही इसका उपयोग बेहतर परिणाम दे सकता है. About the Author Rahul Singh राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं. Location : Sidhi,Madhya Pradesh First Published : February 26, 2026, 11:07 IST
Pine Fruit Benefits | Pine seed ke fayde | Bageshwar news

Last Updated:February 25, 2026, 17:00 IST चीड़ के फल को ‘स्यूत ठिट’ और बीज को ‘स्यूत’ भी कहते हैं. यह बीज खाने में इतना स्वादिष्ट होता है कि इसकी तुलना सीधा काजू-बादाम से की जाती है. लोकल 18 से बात करते हुए बागेश्वर के किसान रमेश पांडे बताते हैं कि ये हमें बचपन की याद दिलाता है. चीड़ का फल पहले हरा होता है फिर धीरे-धीरे समय के साथ भूरा हो जाता है. इसमें ही बीज बनते हैं, जिसे स्यूत कहा जाता है. खाने में इनका स्वाद हल्का मीठा होता है. मूंगफली की तरह छीलकर खाया जाता है. आयुष चिकित्सक डॉ. एजेल पटेल बताते हैं कि शरीर की कमजोरी को दूर करते हैं. सूजन कम करने में मददगार हैं. बागेश्वर. अगर आप कभी उत्तराखंड आए हैं, तो रास्ते में बहुत सारे चीड़ के पेड़ जरूर देखे होंगे. लेकिन क्या आपको पता है कि चीड़ का बीज कितना स्वादिष्ट होता है. उत्तराखंड की लोकल लैंग्वेज में चीड़ के फल को ‘स्यूत ठिट’ और बीज को ‘स्यूत’ बोला जाता है. यह बीज खाने में इतना स्वादिष्ट होता है कि इसकी तुलना काजू-बादाम से की जाती है. बागेश्वर के किसान रमेश पांडे लोकल 18 से बताते हैं कि बताया कि बचपन में जब वे गांव में रहा करते थे, तो वे इन बीजों को खूब खाते थे. चीड़ का फल पहले हरा होता है, धीरे-धीरे समय के साथ यह भूरा हो जाता है, और इसके अंदर चीड़ के बीज बनते हैं, जिसे स्यूत कहा जाता है. जब पतझड़ का मौसम आता है, तो इसका फल खुद जमीन पर गिरता है. इससे चीड़ का बीज निकलता है. उत्तराखंड में गांव के बच्चे आज भी इन बीजों को इकट्ठा करते हैं और इसे खाते हैं. इन बीजों से आज भी बचपन की यादें जुड़ी हैं. खाने में इनका स्वाद हल्का मीठा होता है. इन्हें मूंगफली की तरह छीलकर खाना पड़ता है. चीड़ के बीजों को इकट्ठा करना बड़ी मेहनत का काम है. इसलिए यह स्वादिष्ट और पौष्टिक के साथ-साथ आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर होने के बावजूद भी बाजार में अपनी अच्छी पकड़ नहीं बन पाया है, क्योंकि इसे इकट्ठा करना बेहद ही मुश्किल का काम है. इसका बनना और बिगड़ना पूरी तरीके से नेचर पर डिपेंड रहता है. जिस कारण इसे जरूरत के हिसाब से इकट्ठा नहीं किया जा सकता है. चीड़ के फल में बीज लंबे समय तक भी कम टिक पाता है. कितने फायदे आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. एजेल पटेल बताते हैं कि चीड़ के बीजों में विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर की कमजोरी को दूर करते हैं, सूजन कम करने में मददगार होते हैं. कफ कोल्ड से राहत देते हैं. इम्युनिटी को बढ़ाते हैं, इनमें एंटीसेप्टिक गुण होते हैं. इनका इस्तेमाल पारंपरिक रूप से घाव, त्वचा संक्रमण और दर्द में किया जाता है. About the Author Priyanshu Gupta Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें Location : Bageshwar,Bageshwar,Uttarakhand First Published : February 25, 2026, 17:00 IST
Why Laser Is Used in Surgery Medical Science Explained Benefits | सर्जरी में लेजर का इस्तेमाल क्यों होता है जानें वैज्ञानिक कारण

Last Updated:February 25, 2026, 11:41 IST Laser Surgery Benefits for Surgery: आजकल अधिकतर सर्जरी लेजर के जरिए की जा रही हैं. एक्सपर्ट्स की मानें तो लेजर सर्जरी बेहद सटीक होती है और इसमें कम ब्लीडिंग होती है. इस तकनीक से मरीजों की रिकवरी भी तेजी से होती है. यही वजह है कि सर्जरी में लेजर लाइट का इस्तेमाल होता है. यह तकनीक कई प्रक्रियाओं को ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी बना सकती है. ख़बरें फटाफट लेजर सर्जरी को ज्यादा सुरक्षित माना जाता है. Why Laser Light Good for Surgery: मेडिकल साइंस में लगातार नए बदलाव हो रहे हैं और इलाज के लिए एडवांस टेक्नोलॉजी सामने आ रही हैं. कई दशक पहले जहां अधिकतर सर्जरी सर्जिकल ब्लेड से चीरा लगाकर की जाती थीं, लेकिन अब ज्यादातर सर्जरी लेजर के जरिए की जा रही हैं. आज आंख, स्किन, पेट, किडनी, दांत और कुछ कैंसर संबंधी ऑपरेशन भी लेजर की मदद से किए जा रहे हैं. अक्सर लोगों के मन में सवाल यह उठता है कि आखिर सर्जरी में लेजर लाइट का ही इस्तेमाल क्यों किया जाता है? अगर आप भी इसका जवाब जानना चाहते हैं, तो इस पूरी खबर को पढ़ लीजिए. अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ की रिपोर्ट के मुताबिक लेजर का पूरा नाम लाइट एंप्लिफिकेशन बाइ स्टिम्युलेटेड एमिशन ऑफ रेडिएशन (LASER) है. लेजर लाइट फोकस्ड, एक दिशा में जाने वाली और हाई एनर्जी वाली वाली होती है. यही विशेषताएं इसे सर्जरी के लिए उपयुक्त बनाती हैं. लेजर की सबसे बड़ी खासियत उसकी सटीकता (precision) है. पारंपरिक सर्जिकल ब्लेड की तुलना में लेजर लाइट बहुत ही कंट्रोल तरीके से टिश्यूज को काट सकती है. लेजर सर्जरी में आसपास के स्वस्थ टिश्यूज को कम से कम नुकसान पहुंचता है, क्योंकि डॉक्टर बहुत छोटे और सटीक क्षेत्र पर एनर्जी केंद्रित कर सकते हैं. इससे ऑपरेशन के दौरान अनावश्यक कटाव और चोट की संभावना घट जाती है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. US फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट बताती है कि लेजर लाइट जब टिश्यूज को काटती है, तब वह सी समय छोटे ब्लड वेसल्स को सील भी कर देती है. इस प्रोसेस को मेडिकल साइंस में कोएगुलेशन कहा जाता है. इससे खून बहना कम होता है और सर्जरी ज्यादा सुरक्षित बनती है. पारंपरिक सर्जरी में ब्लीडिंग बहुत ज्यादा होती थी, लेकिन लेजर में ब्लीडिंग कम होती है. यही वजह है कि कई कॉस्मेटिक और डर्मेटोलॉजी प्रक्रियाओं में लेजर को प्राथमिकता दी जाती है. आजकल आंखों की अधिकतर सर्जरी लेजर लाइट से की जाती हैं, क्योंकि इससे कई तरह के खतरे कम हो जाते हैं. मेडिकल एक्सपर्ट्स की मानें तो लेजर का उपयोग इंफेक्शन के जोखिम को भी कम कर सकता है. लेजर सर्जरी में ब्लेड की तरह बॉडी से डायरेक्ट संपर्क नहीं होता है. इसलिए बैक्टीरिया के फैलने का खतरा घटता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) के अनुसार सर्जरी के बाद इंफेक्शन दुनियाभर में एक बड़ी चुनौती है. लेजर तकनीक इस इंफेक्शन को कम करती है और मरीज की रिकवरी को बेहतर बना सकती हैं. हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि संक्रमण की रोकथाम केवल लेजर पर निर्भर नहीं करती, बल्कि प्रॉपर प्रोटोकॉल पर आधारित होती है. लेजर सर्जरी का एक बड़ा फायदा फास्ट रिकवरी है. कम कट और कम ब्लीडिंग के कारण सूजन और दर्द भी कम होता है. आई डिजीज जैसे मोतियाबिंद या रेटिना संबंधी प्रक्रियाओं में लेजर का खूब इस्तेमाल किया जाता है. अमेरिकन एकेडमी ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी के अनुसार आंखों की कई बीमारियों में लेजर ट्रीटमेंट असरदार और अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है. हालांकि इस तरह की सर्जरी हमेशा क्वालिफाइड एक्सपर्ट से ही करानी चाहिए. लेजर हर सर्जरी के लिए उपयुक्त नहीं है. इसकी कुछ लिमिटेशंस भी होती हैं. कुछ जटिल या गहरे आंतरिक ऑपरेशन में पारंपरिक सर्जिकल तकनीक ज्यादा प्रभावी हो सकती है. इसके अलावा लेजर उपकरण महंगे होते हैं और इनके लिए स्पेशल ट्रेनिंग की भी जरूरत होती है. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें First Published : February 25, 2026, 11:41 IST
Antioxidant Rich Foods List; Heart Health Benefits

Hindi News Lifestyle Antioxidant Rich Foods List; Heart Health Benefits | Dark Chocolate Green Tea 1 घंटे पहलेलेखक: अदिति ओझा कॉपी लिंक एक मशहूर कहावत है- ‘ईट द रेनबो।’ इसका मतलब है, अपनी थाली में अलग-अलग रंगों वाले नेचुरल फूड शामिल करिए। ये सिर्फ कहावत नहीं बल्कि साइंटिफिक एडवाइज भी है। दरअसल, रेड स्ट्रॉबेरी, बैंगनी प्लम, हरी पत्तेदार सब्जियां और नीली ब्लूबेरी जैसे रंगीन फूड्स में पावरफुल एंटीऑक्सिडेंट ‘पॉलीफेनॉल्स’ होते हैं। ‘लंदन के किंग्स कॉलेज’ की हालिया स्टडी के मुताबिक, लंबे समय तक पॉलीफेनॉल रिच डाइट लेने से हार्ट हेल्दी रहता है। ये स्टडी पीयर रिव्यू मेडिकल जर्नल ‘BMC मेडिसिन’ में पब्लिश हुई है। इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में जानेंगे कि- एंटीऑक्सिडेंट-रिच फूड हार्ट हेल्थ के लिए क्यों जरूरी हैं? क्या ऐसे फूड एजिंग की रफ्तार को धीमा कर सकते हैं? रोजाना कितनी मात्रा में एंटीऑक्सिडेंट लेना पर्याप्त है? एक्सपर्ट: डॉ. पूनम तिवारी, सीनियर डाइटीशियन, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ सवाल- एंटीऑक्सिडेंट फूड क्या होते हैं? जवाब- एंटीऑक्सिडेंट फूड को समझने के लिए पहले हमें दो बातें समझनी होंगी– एंटीऑक्सिडेंट फ्री रेडिकल्स फ्री रेडिकल्स क्या है? फ्री रेडिकल्स यानी ऐसे अनस्टेबल मॉलिक्यूल, जो शरीर की कोशिकाओं को डैमेज करते हैं। आसान भाषा में इसे ऐसे समझें कि हमारे शरीर की सारी कोशिकाएं ऑक्सीजन की मदद से ऊर्जा बनाती हैं। इस प्रोसेस में कुछ इलेक्ट्रॉन छूटकर बाहर चले जाते हैं और शरीर को डैमेज करते हैं। ये जो छूटे हुए आवारा इलेक्ट्रॉन हैं, इन्हें ही फ्री रेडिकल्स कहते हैं। और ये शरीर को जो नुकसान पहुंचाते हैं, उसे ही ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस कहते हैं। एंटीऑक्सिडेंट क्या है? ऊपर हमने समझा कि फ्री रेडिकल्स हमारे दुश्मन हैं। अब जो दोस्त हमें इन दुश्मनों से बचाता है, वो एंटीऑक्सिडेंट है। बेसिकली एंटीऑक्सिडेंट्स ऐसे कंपाउंड होते हैं, जो इन फ्री रेडिकल्स को मारते हैं और शरीर को ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस से बचाते हैं। ये कुछ हद तक तो शरीर में बनते हैं, लेकिन बड़ी मात्रा में फूड से ही प्राप्त होते हैं। जिन फूड्स में ये भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, उन्हें एंटीऑक्सिडेंट फूड कहते हैं। एंटीऑक्सिडेंट रिच फूड में विटामिन A, C, E, बीटा-कैरोटीन, लाइकोपीन, ल्यूटिन, सेलेनियम और पॉलीफेनॉल जैसे तत्व होते हैं। सवाल- एंटीऑक्सिडेंट फूड शरीर में जाकर क्या काम करते हैं? यह हेल्थ के लिए क्यों जरूरी हैं? जवाब- एंटीऑक्सिडेंट फूड सेल्स को सुरक्षित रखने में मदद करते हैं। ये लंबे समय तक सेहत की सुरक्षा करने वाली ढाल की तरह काम करते हैं। पॉइंटर्स से समझते हैं कि ये शरीर में क्या काम करते हैं- ये इंफ्लेमेशन को कंट्रोल करते हैं। ब्लड वेसल्स को हेल्दी रखते हैं। ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस को कम करते हैं। सेल्स को डैमेज होने से बचाते हैं। जब शरीर में एंटीऑक्सिडेंट का स्तर बैलेंस्ड रहता है, तो इम्यून सिस्टम भी ज्यादा प्रभावी ढंग से काम करता है। सवाल- कौन–कौन से फूड एंटीऑक्सिडेंट रिच होते हैं? जवाब- आइए ग्राफिक से जानते हैं कि किन फूड्स में एंटीऑक्सिडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। सवाल- एंटीऑक्सिडेंट फूड हार्ट हेल्थ के लिए क्यों जरूरी है? जवाब- हार्ट डिजीज की शुरुआत अक्सर आर्टरीज में इंफ्लेमेशन और अंदरूनी डैमेज से होती है। जब शरीर में मौजूद LDL (बैड कोलेस्ट्रॉल) ऑक्सिडाइज्ड हो जाता है, तो वह आर्टरीज की वॉल्स पर जमा होने लगता है। समय के साथ यही जमाव प्लाक बनाता है, जिससे ब्लड फ्लो प्रभावित होता है। इसके कारण हार्ट अटैक का रिस्क बढ़ जाता है। एंटीऑक्सिडेंट फूड इस पूरे प्रोसेस को कंट्रोल करने में मदद करते हैं। इससे ब्लड फ्लो बेहतर रहता है और दिल पर दबाव कम पड़ता है। सवाल- क्या एंटीऑक्सिडेंट रिच फूड इम्यूनिटी बढ़ाते हैं? जवाब- हां, विटामिन C, E और बीटा-कैरोटीन जैसे तत्व संक्रमण से लड़ने वाली इम्यून सेल्स को मजबूत बनाते हैं। सवाल- क्या एंटीऑक्सिडेंट्स रिच फूड एजिंग स्पीड को कम करते हैं? जवाब- हां, एजिंग की मुख्य वजह ऑक्सिडेटिव डैमेज होती है। जब सेल्स बार-बार फ्री रेडिकल्स के संपर्क में आती हैं, तो उनके डीएनए, प्रोटीन और लिपिड्स (बॉडी फैट, जो एनर्जी स्टोर करने और शरीर के सही कामकाज में मदद करते हैं।) डैमेज होते हैं। इससे उम्र बढ़ने की प्रक्रिया तेज होती है। एंटीऑक्सिडेंट रिच फूड इस डैमेज को कम करके सेल्स की उम्र बढ़ाने में मदद करते हैं। इससे एजिंग स्पीड कम होती है। सवाल- एंटीऑक्सिडेंट्स सप्लीमेंट्स की जरूरत कब पड़ती है? जवाब- अगर आप बैलेंस्ड डाइट लेते हैं तो आमतौर पर सप्लीमेंट की जरूरत नहीं पड़ती है। फिर भी कुछ लोगों को डॉक्टर सप्लीमेंट की सलाह दे सकते हैं। जैसे- जो प्रदूषित इलाके में रहते हैं। जो स्मोकिंग करते हैं। जिन्हें क्रॉनिक स्ट्रेस है। जिन्हें बार-बार इंफेक्शन होता है। जिनका इम्यून सिस्टम कमजोर है। जिन्हें क्रॉनिक डिजीज है। जिनकी कोई दवा चल रही है। जो बुजुर्ग हैं। सवाल- रोजाना कितनी मात्रा में एंटीऑक्सिडेंट फूड लेना पर्याप्त है? जवाब- एंटीऑक्सिडेंट की कोई तय मात्रा निर्धारित नहीं है। इन्हें संतुलित डाइट से लेना बेहतर माना जाता है। पर्याप्त एंटीऑक्सिडेंट्स के लिए रोज कम-से-कम 4–5 सर्विंग फल और सब्जियां लेना पर्याप्त है। सवाल- क्या ज्यादा एंटीऑक्सिडेंट लेने से हेल्थ को कोई नुकसान भी हो सकता है? जवाब- एंटीऑक्सिडेंट्स शरीर के लिए फायदेमंद जरूर हैं, लेकिन हर चीज की तरह इनकी भी एक सीमा है। खासकर जब इन्हें हाई-डोज सप्लीमेंट्स के रूप में लिया जाता है, तो यह उल्टा असर डाल सकते हैं। शरीर में फ्री रेडिकल्स पूरी तरह ‘दुश्मन’ नहीं होते, उनका एक नेचुरल बैलेंस भी जरूरी होता है। इसलिए– जरूरत से ज्यादा एंटीऑक्सिडेंट इस संतुलन को बिगाड़ सकते हैं। इससे मेटाबॉलिक प्रोसेस प्रभावित हो सकता है। इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया असंतुलित हो सकती है। कुछ मामलों में टॉक्सिसिटी का जोखिम भी बढ़ सकता है। सवाल- एंटीऑक्सिडेंट फूड को अपनी डाइट में कैसे शामिल करें? जवाब- इसके लिए किसी खास या महंगे डाइट प्लान की जरूरत नहीं होती। कोशिश करें कि आपकी थाली में अलग-अलग रंग के फल और सब्जियां शामिल हों और प्रोसेस्ड स्नैक्स की जगह नेचुरल ऑप्शन चुनें। कुल मिलाकर, एंटीऑक्सिडेंट रिच फूड कोई ट्रेंड नहीं, बल्कि साइंस-बेस्ड हेल्थ स्ट्रैटेजी है। हार्ट हेल्थ बेहतर रखनी हो, इम्यूनिटी मजबूत करनी हो या उम्र बढ़ने की रफ्तार को संतुलित रखना हो, तो रंगीन और नेचुरल डाइट अहम भूमिका निभाती है। यह डाइट न सिर्फ शरीर को जरूरी पोषण देती है, बल्कि लंबे
Marjariasana for Back Pain and Spinal Flexibility | Cat Pose Health Benefits | मार्जरी आसन ऑफिस वर्क से होने वाले कमर और गर्दन दर्द का अचूक उपाय

Last Updated:February 24, 2026, 18:27 IST Marjariasana Health Benefits: घंटों डेस्क जॉब के कारण युवाओं को कमर, गर्दन और पीठ के दर्द का सामना करना पड़ता है. अगर आप रोज कुछ मिनट मार्जरी आसन का अभ्यास करें, तो गर्दन और पीठ दर्द से राहत मिल सकती है. आयुष मंत्रालय के अनुसार यह आसन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाने, तनाव कम करने और पाचन में सुधार करने में सहायक है. यह सर्वाइकल, सायटिका और स्पॉन्डिलाइटिस जैसी समस्याओं में राहत प्रदान करता है और मानसिक शांति भी देता है. ख़बरें फटाफट मार्जरी आसन सर्वाइकल के दर्द से भी राहत दिला सकता है. Healing Benefits of Cat Pose: दुनियाभर में कॉरपोरेट कल्चर कल्चर तेजी से बढ़ रहा है और भारत भी इससे अछूता नहीं है. देश में करोड़ों की संख्या में लोग घंटों एक जगह बैठकर काम करते हैं. अक्सर इसे डेस्क जॉब कहा जाता है. यह नौकरी दिखने में आसान है, लेकिन एक ही जगह घंटों बैठने से सेहत से जुड़ी कई समस्याएं पैदा हो जाती हैं. ऑफिस में घंटों कुर्सी पर बैठे रहना और लगातार कंप्यूटर स्क्रीन की ओर झुककर काम करना हमारी रीढ़ की हड्डी, गर्दन और कमर के लिए शत्रु के समान है. इस लापरवाही का परिणाम पीठ में अकड़न, कमर दर्द और गर्दन की जकड़न के रूप में सामने आता है. हालांकि योग विज्ञान में इसका एक बहुत ही सरल और प्रभावी समाधान मार्जरी आसन है. इसे कैट काउ पोज भी कहा जाता है. आयुष मंत्रालय और हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार यह आसन डेस्क जॉब करने वालों के लिए एक सुरक्षा कवच है. एक्सपर्ट्स के अनुसार मार्जरी आसन दो शब्दों मार्जरी और आसन के मेल से बना है. मार्जरी का अर्थ बिल्ली और आसन का अर्थ मुद्रा है. इस योगासन के अभ्यास के दौरान शरीर की आकृति एक खिंचाव लेती हुई बिल्ली के समान हो जाती है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो यह आसन रीढ़ की हड्डी (Spine) को लहर की तरह आगे-पीधे गति प्रदान करता है, जिससे वर्टिब्रा के बीच का तनाव कम होता है. यह आसन मुख्य रूप से हमारी रीढ़ की मांसपेशियों को सक्रिय करता है और वहां रक्त के संचार को बढ़ाता है, जिससे दिन भर की थकान और जकड़न मिनटों में दूर हो जाती है. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. ऑफिस में गलत पोस्चर में बैठने के कारण अक्सर सर्वाइकल और स्पॉन्डिलाइटिस जैसी समस्याएं घेर लेती हैं. मार्जरी आसन इन समस्याओं में रामबाण की तरह काम करता है. यह गर्दन और कंधों की मांसपेशियों को स्ट्रेच कर उनकी जकड़न को खत्म करता है. नियमित अभ्यास से रीढ़ की हड्डी इतनी लचीली हो जाती है कि सायटिका और कमर के निचले हिस्से का दर्द में भी काफी सुधार देखने को मिलता है. यह शरीर के ऊपरी और निचले हिस्से के बीच एक बेहतर समन्वय स्थापित करता है, जिससे बैठने का तरीका सुधरता है. अगर आपका पोश्चर सुधर जाएगा, तो कई समस्याओं से राहत मिल जाएगी. मार्जरी आसन का लाभ केवल हड्डियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे आंतरिक अंगों की कार्यप्रणाली को भी बेहतर बनाता है. इस आसन के दौरान जब पेट की मांसपेशियों में खिंचाव और संकुचन होता है, तो इससे पाचन तंत्र की मालिश होती है, जिससे कब्ज और गैस जैसी समस्याओं से राहत मिलती है. आयुर्वेद के अनुसार यह थायराइड ग्रंथि को सक्रिय करने और फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ाने में भी सहायक है. यह फेफड़ों को पूरी तरह खुलने का अवसर देता है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह बेहतर होता है और आप अधिक एक्टिव महसूस करते हैं. मार्जरी आसन मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत लाभकारी है. गहरी सांसों के साथ इस आसन का अभ्यास करने से तंत्रिका तंत्र शांत होता है, जिससे तनाव, चिंता और चिड़चिड़ापन कम होता है. विशेषज्ञों का मानना है कि जो लोग रात को सोने से पहले या दिन के अंत में इसका अभ्यास करते हैं, उन्हें नींद की गुणवत्ता में सुधार महसूस होता है. यह मस्तिष्क तक जाने वाली नसों को आराम पहुंचाता है, जिससे मानसिक थकान कम होती है और एकाग्रता बढ़ती है. अगर आपको पहले से कोई बीमारी है, तो इस आसन को करने से पहले एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें. About the Author अमित उपाध्याय अमित उपाध्याय News18 Hindi की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें First Published : February 24, 2026, 18:27 IST









