राज्यसभा सीट पर कांग्रेस में कास्ट प्रेशर बढ़ा:दलित और ब्राह्मणों के बाद अब सिंधी समाज ने ठोकी दावेदारी

मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद खाली हुई सीट को लेकर कांग्रेस के भीतर खींचतान तेज हो गई है। पार्टी में जातीय समीकरणों को लेकर दबाव(कास्ट प्रेशर) लगातार बढ़ रहा है। जहां पहले दलित और फिर विंध्य के ब्राह्मणों की ओर से दावेदारी पेश की गई थी, वहीं अब इस रेस में सिंधी समाज की भी एंट्री हो गई है। सिंधी प्रतिनिधित्व की मांग उठी रीवा शहर कांग्रेस कमेटी के महामंत्री दिलीप ठारवानी ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पत्र लिखकर सिंधी समाज से राज्यसभा प्रतिनिधि भेजने की मांग उठाई है। ठारवानी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को संबोधित पत्र में लिखा है कि वे लंबे समय से कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं और उनका परिवार पीढ़ियों से पार्टी की विचारधारा से जुड़ा है। सिंधी समाज देशभर में कांग्रेस के प्रति अपनी आस्था और योगदान के लिए जाना जाता है। आगामी राज्यसभा चयन में सिंधी समाज से एक योग्य और समर्पित प्रतिनिधि के रूप में उनके नाम पर विचार किया जाए। इस पत्र की प्रतिलिपि मध्यप्रदेश कांग्रेस प्रभारी हरीश चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी को भी भेजी गई है। त्रिकोणीय हुआ जातीय समीकरण दलित वर्ग: दिग्विजय सिंह के राज्यसभा जाने से इनकार करने के बाद कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने दलित वर्ग के नेता को राज्यसभा भेजे जाने की मांग की थी। पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा भी इसका समर्थन कर चुके हैं। ब्राह्मण समाज: विंध्य क्षेत्र के ब्राह्मण नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में उमंग सिंघार और जीतू पटवारी से मुलाकात की थी। उनका तर्क है कि विंध्य में ब्राह्मण समाज का बड़ा प्रभाव है, जिसे राज्यसभा के जरिए प्रतिनिधित्व देना जरूरी है। सिंधी समाज: अब दिलीप ठारवानी की दावेदारी ने इस रेस को और दिलचस्प बना दिया है। ठारवानी का मानना है कि यदि उन्हें अवसर मिलता है, तो वे संसद में पार्टी की नीतियों और जनहित के मुद्दों को पूरी निष्ठा से उठाएंगे। प्रदेश भर में सिंधी समाज कांग्रेस से जुडे़गा।
Punjab Sacrilege Bill 2026 Debate LIVE Update; Bhagwant Mann Vs Congress

सेशन में बोलते हुए पंजाब सीएम भगवंत मान। पंजाब विधानसभा के स्पेशल सेशन में सोमवार को CM भगवंत मान ने जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) विधेयक-2026 पेश किया। इसे सर्वसम्मति से पास किया गया। उन्होंने कहा कि बेअदबी की सजा उम्र कैद टिल डेथ तक है। . वहीं, उन्होंने यह भी साफ किया कि यह विधेयक अभी केवल श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर ही लागू होगा। जबकि, गैर सिखों (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, आदि) के पवित्र ग्रंथों और धार्मिक स्थलों से छेड़छाड़ पर इस विधेयक के तहत फिलहाल कोई सजा का प्रावधान नहीं है। CM ने कहा कि अन्य धर्मों के लोगों से भी राय लेकर जल्द ही कानून बनाया जाएगा। विधानसभा में CM मान ने विपक्ष के नेताओं से कहा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूप की बेअदबी के बारे में विस्तार से बताया गया है। यह स्टेट एक्ट है। गवर्नर से साइन कराना हमारी ही नहीं आपकी भी जिम्मेदारी है। गवर्नर के पास मेरी शिकायत लेकर तीसरे दिन पहुंच जाते हो। कभी काम करवाने भी चले जाया करो। गवर्नर ने लेट किया तो दोनों साथ चलेंगे। स्पीकर साहब एक-आधा कौआ मारकर लटका दिया तो दोबारा पीढ़ियों तक कोई बेअदबी नहीं करेगा। नए बिल ये काम करने को बेअदबी माना जाएगा.. श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के ‘स्वरूप’ (पवित्र ग्रंथ) को जानबूझकर फाड़ना, जलाना या किसी भी तरह से खंडित करना। पवित्र ग्रंथ पर थूकना, उसे गंदे हाथों से छूना या किसी ऐसी जगह रखना जहां उनकी गरिमा भंग होती हो। गुरु साहिब के स्वरूप को सार्वजनिक रूप से फेंकना या गलियों/नालियों में लावारिस छोड़ देना। पवित्र स्वरूप को चोरी करना या उसे मर्यादा के विरुद्ध अपने पास रखना। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की उपस्थिति में शराब, तंबाकू या किसी भी नशीले पदार्थ का सेवन करना या लेकर जाना। सोशल मीडिया या किसी अन्य माध्यम से पवित्र बाणी या गुरु साहिब के प्रति अभद्र टिप्पणी या अपमानजनक फोटो-वीडियो बनाना। स्पीकर कुलतार सिंह संधवां ने कहा कि नकोदर कांड की जांच अब सेलेक्ट कमेटी करेगी। नेता विपक्ष विधानसभा में स्पीकर और CM से भिड़े बेअदबी बिल पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा और स्पीकर कुलतार सिंह संधवां के बीच बहस हुई। बाजवा ने कहा कि हम इस बिल का समर्थन करते हैं, लेकिन मैं गुजारिश करूंगा कि जो इस मामले में कमेटी बनी थी, उसने विभिन्न वर्ग के लोगों से बातचीत की थी, उसकी रिपोर्ट निज्जर साहिब को हाउस में पेश करनी चाहिए। स्पीकर ने कहा कि कमेटी अपनी रिपोर्ट पेश कर देगी। वहीं, नकोदर कांड की जांच भी वह कमेटी करेगी। बाजवा ने कहा कि केजरीवाल और भगवंत मान ने कहा था कि कुंवर प्रताप सिंह की रिपोर्ट के आधार पर 48 घंटे में दोषियों को सलाखों के पीछे पहुंचा देंगे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि स्पीकर साहब वह हलका आपका था। इस पर स्पीकर ने कहा कि आपकी जानकारी उचित नहीं है। मौजूदा सरकार ने सबूतों से छेड़छाड़ की, जिससे आरोपियों को जमानत मिली, लेकिन हमने चालान पेश किया। आज सख्त कानून बनाने के लिए सेशन बुलाया है। बाजवा ने कहा कि उस समय के 5 केस शहर से बाहर चले गए। सरकार ने विरोध नहीं किया। कुंवर विजय प्रताप सिंह पोस्टर बॉय था, वह पार्टी से बाहर है। मैं आपकी सरकार की इंटेंट जाना चाहता हूं। मान साहब दिल बड़ा कर इन पुलिस अफसरों पर कार्रवाई करो। इसके जवाब में CM भगवंत मान ने कहा कि आपका खजाना मंत्री व मुख्यमंत्री पार्टी से बाहर हैं। किसको मंत्री बनाना है या नहीं बनाना यह हमारा फैसला है। आपसे 4 साल बाद प्रधानगी छीन ली है। किसी मौके पर तो कोई शर्म रख लिया करो। आज यह मौका नहीं है। इस पर बाजवा ने कहा आपसे लोग जवाब मांगते हैं। सीएम बताएं कि पंजाब पुलिस के कितने अफसरों पर केस दर्ज हुए। उन पर क्या कार्रवाई हुई। उन्होंने कहा कि हम पांचवीं बार कानून बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इसको लेकर हमने कानून माहिरों से बात की है। पहले की तरह इस बिल की स्थिति न हो। हम कानून का समर्थन करते हैं। हम लोागें के बीच ही रहे हैं। 25 साल आपको राज नहीं मिलना है। पंजाब में बेअदबी बड़ा मुद्दा क्यों है? अकाली दल सत्ता से बाहर हुआ, विपक्ष तक की हैसियत नहीं बची: अकाली दल ने पूर्व CM स्वर्गीय प्रकाश सिंह बादल की अगुआई में 2007 से 2017 तक BJP के साथ मिलकर लगातार 2 टर्म पंजाब में सरकार चलाई। उनके कार्यकाल के दौरान 2015 में बरगाड़ी बेअदबी और उससे जुड़ी घटनाएं हुईं। इसका असर ये हुआ कि 2017 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल सत्ता से बाहर हो गया। पार्टी का प्रदर्शन लगातार गिरता गया। कुल 117 विधानसभा सीटों में से 2017 में 15 सीटें और 2022 में 3 सीटें मिलीं। अकालियों की विपक्षी दल तक की हैसियत नहीं बची। कांग्रेस भी सत्ता से बाहर हुई: कांग्रेस ने 2017 के चुनाव में कहा था कि अगर सरकार बनी तो बेअदबी मामलों में इंसाफ दिलाया जाएगा। इसके बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुआई में 117 में से 77 सीटें जीतकर सरकार बना ली। हालांकि बेअदबी के इंसाफ के मामले में SIT बनाई। लेकिन दोषियों को कोई सजा नहीं मिली। 2022 में कांग्रेस भी सत्ता से बाहर हो गई और सिर्फ 18 सीटें ही जीत सकीं। AAP भी संकट में फंसी हुई: AAP ने 2022 के चुनाव में कहा था कि बेअदबी मामलों की जांच दोबारा खोली जाएगी और दोषियों को सख्त सजा दिलाई जाएगी। CM भगवंत मान सरकार ने जांच प्रक्रिया को एक्टिव कर SIT को नए सिरे से बनाया। जांच और चार्जशीट आगे बढ़ी। लेकिन अभी कोर्ट में ट्रायल चल रहा है। अभी तक किसी दोषी को सजा नहीं मिली। हाल ही में कोटकपूरा गोलीकांड की सुनवाई फरीदकोट कोर्ट से चंडीगढ़ शिफ्ट हो गई। ऐसे में AAP भी बेअदबी को लेकर निशाने पर है। सेशन के पल-पल के अपडेट के लिए ब्लॉग से गुजर जाइए…
Karnataka Congress Cabinet Reshuffle Demand | dk shivakumar

Hindi News National Karnataka Congress Cabinet Reshuffle Demand | Dk Shivakumar | Siddaramaiah बेंगलुरु/नई दिल्ली4 मिनट पहले कॉपी लिंक कर्नाटक कांग्रेस में कैबिनेट फेरबदल की मांग कर रहे 40 सीनियर विधायकों में 30 विधायक रविवार को दिल्ली पहुंचे। यहां वे पार्टी हाईकमान से मिलकर मंत्रिमंडल में फेरबदल और नए चेहरों को मौका देने की मांग करेंगे। तीन से ज्यादा बार विधायक बन चुके करीब 40 विधायकों की मांग है कि मौजूदा मंत्रियों को लगभग तीन साल का समय मिल चुका है, इसलिए अब सीनियर विधायकों को मौका दिया जाए। दूसरी ओर पहली बार चुने गए विधायकों ने भी दबाव बढ़ाते हुए मंत्री बनाने की मांग दोहराई है। कर्नाटक कांग्रेस के विधायक अशोक पट्टन ने कहा कि पोर्टफोलियो बांटते समय रणदीप सुरजेवाला ने भरोसा दिया था कि सभी को मौका मिलेगा, लेकिन वही लोग बार-बार चौथी बार भी उन्हीं मंत्रालयों में नियुक्त किए जा रहे हैं। विधायक किसी को ब्लैकमेल नहीं कर रहे, बल्कि पार्टी नेतृत्व को सिर्फ उसका पुराना वादा याद दिलाने आए हैं। पहली बार चुने गए 38 MLA ने भी मंत्री पद मांगा कैबिनेट फेरबदल की मांग सिर्फ सीनियर विधायकों तक सीमित नहीं है। पहली बार विधायक बने 38 कांग्रेस MLA भी लामबंद हो गए हैं। इन विधायकों ने हाल ही में पार्टी नेतृत्व को पत्र लिखकर मांग की है कि फेरबदल के दौरान उनमें से कम से कम 5 को मंत्री बनाया जाए। मांड्या से पहली बार विधायक बने रविकुमार गौड़ा (रवि गनीगा) ने कहा कि मंत्री बनने की इच्छा हर विधायक की होती है और नए चेहरों को भी मौका मिलना चाहिए। उन्होंने कहा, “हमारी मांग है कि पहली बार चुने गए विधायकों में से कम से कम पांच लोगों को कैबिनेट में शामिल किया जाए। मांग करना गलत नहीं है।” उन्होंने कुछ मौजूदा मंत्रियों के कामकाज पर भी सवाल उठाए और कहा कि कुछ मंत्री न तो उपलब्ध रहते हैं और न ही काम ठीक से हो रहा है। 2 कैबिनेट पद पहले से खाली कर्नाटक में मुख्यमंत्री समेत कुल 34 मंत्रियों की मंजूरी है। फिलहाल दो मंत्री पद पहले से खाली हैं। इनमें एक पद बी नागेंद्र के इस्तीफे के बाद खाली हुआ, जिन पर कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि एसटी डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन में गबन के आरोप लगे थे। दूसरा पद पार्टी हाईकमान के निर्देश पर केएन राजन्ना को हटाए जाने के बाद खाली हुआ। ऐसे में विधायकों की मांग है कि इन पदों को भरने के साथ व्यापक फेरबदल किया जाए। दिल्ली पहुंचे नेताओं में टीबी जयचंद्र, अशोक पट्टन, एसएन नारायणस्वामी, के. शदाक्षरी, एआर कृष्णमूर्ति, पुट्टारंगा शेट्टी और बेलूर गोपाल कृष्ण समेत कई विधायक शामिल हैं। ये नेता कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, रणदीप सिंह सुरजेवाला और संभव हो तो राहुल गांधी से भी मुलाकात करेंगे। वरिष्ठ विधायक टीबी जयचंद्र ने कहा कि यह एक नियमित राजनीतिक प्रक्रिया है और उनका मुख्य एजेंडा सिर्फ कैबिनेट फेरबदल है। उन्होंने साफ किया कि नेतृत्व परिवर्तन का मुद्दा उनके एजेंडे में नहीं है। उन्होंने कहा, “सरकार को तीन साल पूरे हो चुके हैं और अब केवल दो साल का कार्यकाल बचा है। ऐसे में वरिष्ठ विधायकों को भी मंत्री बनने का अवसर मिलना चाहिए।” फेरबदल के पीछे नेतृत्व की खींचतान भी कर्नाटक कांग्रेस में यह हलचल ऐसे समय तेज हुई है, जब पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर भी खींचतान जारी है। 2023 में सरकार बनने के समय मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी CM डीके शिवकुमार के बीच कथित पावर-शेयरिंग फॉर्मूले की चर्चा रही थी। अब सरकार अपने कार्यकाल के मध्य चरण में पहुंच रही है, जिसके बाद नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें भी तेज हो गई हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सिद्धारमैया कैबिनेट फेरबदल के पक्ष में हैं, जबकि शिवकुमार चाहते हैं कि पहले नेतृत्व परिवर्तन पर फैसला हो। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि हाईकमान कैबिनेट फेरबदल को मंजूरी देता है, तो इसका संकेत यह माना जा सकता है कि सिद्धारमैया पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। इससे शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है। शिवकुमार ने कहा था- सब मंत्री या मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं इस बीच डिप्टी CM डीके शिवकुमार ने भी गुरुवार को कहा था कि यदि मुख्यमंत्री ने फेरबदल के संकेत दिए हैं तो हर विधायक का मंत्री या मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा था- इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हर कोई कोशिश कर सकता है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
Karnataka Congress Cabinet Reshuffle Demand | dk shivakumar

Hindi News National Karnataka Congress Cabinet Reshuffle Demand | Dk Shivakumar | Siddaramaiah बेंगलुरु/नई दिल्ली5 घंटे पहले कॉपी लिंक कर्नाटक कांग्रेस में कैबिनेट फेरबदल की मांग कर रहे 40 सीनियर विधायकों में 30 विधायक रविवार को दिल्ली पहुंचे। यहां वे पार्टी हाईकमान से मिलकर मंत्रिमंडल में फेरबदल और नए चेहरों को मौका देने की मांग करेंगे। तीन से ज्यादा बार विधायक बन चुके करीब 40 विधायकों की मांग है कि मौजूदा मंत्रियों को लगभग तीन साल का समय मिल चुका है, इसलिए अब सीनियर विधायकों को मौका दिया जाए। वहीं पहली बार चुने गए 38 कांग्रेस विधायक भी सक्रिय हो गए हैं। उन्होंने पार्टी नेतृत्व को पत्र लिखकर कम से कम 5 नए विधायकों को मंत्री बनाने की मांग की है। मांड्या विधायक रविकुमार गौड़ा ने कहा कि नए चेहरों को भी मौका मिलना चाहिए। 2 कैबिनेट पद पहले से खाली कर्नाटक में मुख्यमंत्री समेत कुल 34 मंत्रियों की मंजूरी है। फिलहाल दो मंत्री पद पहले से खाली हैं। इनमें एक पद बी नागेंद्र के इस्तीफे के बाद खाली हुआ, जिन पर कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि एसटी डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन में गबन के आरोप लगे थे। दूसरा पद पार्टी हाईकमान के निर्देश पर केएन राजन्ना को हटाए जाने के बाद खाली हुआ। ऐसे में विधायकों की मांग है कि इन पदों को भरने के साथ व्यापक फेरबदल किया जाए। दिल्ली पहुंचे नेताओं में टीबी जयचंद्र, अशोक पट्टन, एसएन नारायणस्वामी, पुट्टारंगा शेट्टी और बेलूर गोपाल कृष्ण समेत कई विधायक शामिल हैं। ये नेता कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, केसी वेणुगोपाल, रणदीप सिंह सुरजेवाला और संभव हो तो राहुल गांधी से मुलाकात करेंगे। कर्नाटक कांग्रेस विधायक अशोक पट्टन ने कहा कि पोर्टफोलियो बंटवारे के समय रणदीप सुरजेवाला ने सभी को मौका देने का भरोसा दिया था, लेकिन कुछ लोग चौथी बार भी मंत्री बने। विधायक किसी को ब्लैकमेल नहीं कर रहे, बल्कि पार्टी नेतृत्व को उसका पुराना वादा याद दिला रहे हैं। शिवकुमार ने कहा था- सब मंत्री या मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं इस बीच डिप्टी CM डीके शिवकुमार ने भी गुरुवार को कहा था कि यदि मुख्यमंत्री ने फेरबदल के संकेत दिए हैं तो हर विधायक का मंत्री या मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखना स्वाभाविक है। उन्होंने कहा था- इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हर कोई कोशिश कर सकता है। फेरबदल के पीछे नेतृत्व की खींचतान भी कर्नाटक कांग्रेस में यह हलचल ऐसे समय तेज हुई है, जब पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर भी खींचतान जारी है। 2023 में सरकार बनने के समय मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डिप्टी CM डीके शिवकुमार के बीच कथित पावर-शेयरिंग फॉर्मूले की चर्चा रही थी। अब सरकार अपने कार्यकाल के मध्य चरण में पहुंच रही है, जिसके बाद नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें भी तेज हो गई हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, सिद्धारमैया कैबिनेट फेरबदल के पक्ष में हैं, जबकि शिवकुमार चाहते हैं कि पहले नेतृत्व परिवर्तन पर फैसला हो। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि हाईकमान कैबिनेट फेरबदल को मंजूरी देता है, तो इसका संकेत यह माना जा सकता है कि सिद्धारमैया पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। इससे शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है। क्या है रोटेशन फॉर्मूला? 2023 विधानसभा चुनाव के बाद दोनों नेताओं में तीखी प्रतिस्पर्धा थी। उस समय ढाई-ढाई साल के रोटेशन फॉर्मूले की चर्चा थी, जिसके मुताबिक शिवकुमार 2.5 साल बाद CM बन सकते थे, लेकिन कांग्रेस ने इसे कभी आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है। 2 दिसंबर: सिद्धारमैया ने कहा था- जब हाईकमान कहेगा डीके शिवकुमार CM होंगे, हमारे बीच मतभेद नहीं कर्नाटक CM सिद्धारमैया ने कहा कि जब हाईकमान कहेगा, तब डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। उन्होंने यह बात ‘शिवकुमार को कब CM बनाया जाएगा’ से जुड़े सवाल पर कही। सिद्धारमैया ने कहा कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं है और दोनों राज्य सरकार को एकजुट होकर चला रहे हैं। पूरी खबर पढ़ें… ———————————– ये खबर भी पढ़ें… सिद्धारमैया कर्नाटक के सबसे लंबे कार्यकाल वाले सीएम बनेंगे, देवराज उर्स के कार्यकाल की बराबरी की कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया राज्य के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता बनने जा रहे हैं। वे 7 जनवरी को यह रिकॉर्ड अपने नाम कर लेंगे। उन्होंने मंगलवार को मुख्यमंत्री पद पर 2,792 दिन पूरे कर लिए हैं। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
राजगढ़ में स्विमिंग पूल उद्घाटन पर शुल्क विवाद:कांग्रेस ने कहा- पहले मुफ्त था, अब 200 रुपए रोज; विभाग बोला- ₹50 प्रति घंटा ही वास्तविक चार्ज

राजगढ़ में प्रदेश सरकार के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) कौशल विकास एवं रोजगार विभाग गौतम टेटवाल ने रविवार को जिला मुख्यालय स्थित शासकीय स्विमिंग पूल का विधिवत शुभारंभ किया। इस कार्यक्रम के बाद मंत्री द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी के बाद पूल के शुल्क को लेकर विवाद खड़ा हो गया। यह स्विमिंग पूल नया नहीं है, बल्कि लगभग 10 साल पुराना है और इसे हर साल गर्मियों में चालू किया जाता रहा है। इस बार प्रशासन ने औपचारिक रूप से मंत्री से इसका उद्घाटन करवाया। मंत्री टेटवाल ने अपने संबोधन में कहा कि जिले में खेल सुविधाओं का विस्तार युवाओं के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए आवश्यक है, जिससे उन्हें तैराकी जैसी गतिविधियों में आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। शुल्क बढ़ने पर मंत्री से हस्तक्षेप की मांग हालांकि, मंत्री की सोशल मीडिया पोस्ट पर कांग्रेस नेता एहेतेशाम सिद्धीकी ने शुल्क वृद्धि पर सवाल उठाए। उन्होंने टिप्पणी की कि यह पूल पहले निःशुल्क था, फिर 10 रुपए प्रति व्यक्ति शुल्क लिया जाने लगा और अब इसे बढ़ाकर 200 रुपए प्रतिदिन कर दिया गया है। सिद्धीकी के अनुसार, इस हिसाब से मासिक खर्च लगभग 6,000 रुपए होता है, जो आम जनता की पहुंच से बाहर है। उन्होंने मंत्री से हस्तक्षेप कर छात्रों और आम लोगों को राहत प्रदान करने की मांग की। वास्तविक शुल्क 50 रुपए प्रति घंटा : विभाग इस संबंध में, खेल एवं युवक कल्याण विभाग की जिला संयोजक शर्मिला डाबर ने स्पष्ट किया कि वास्तविक शुल्क 50 रुपए प्रति घंटा है। उन्होंने बताया कि मासिक शुल्क लगभग 1,500 रुपए है और एक घंटे से अधिक समय तक रुकने पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाता है। उद्घाटन कार्यक्रम में कलेक्टर डॉ. गिरीश कुमार मिश्रा, पुलिस अधीक्षक अमित तोलानी सहित अन्य अधिकारी और नागरिक उपस्थित रहे।
कांग्रेस बोली-सरकार जाति जनगणना को ठंडे बस्ते में डालना चाहती:जयराम रमेश ने कहा- महिला आरक्षण में बदलाव से देश को गुमराह किया जा रहा

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने रविवार को कहा कि केंद्र सरकार जाति जनगणना को ठंडे बस्ते में डालना चाहती है। साथ ही महिला आरक्षण कानून में बदलाव के जरिए देश को गुमराह कर रही है। जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा- सरकार अनुच्छेद 334-A में संशोधन की बात कर रही है। यह तर्क दे रही है कि जाति जनगणना के नतीजे आने में समय लगेगा। लेकिन बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों ने 6 महीने से कम समय में जाति सर्वे पूरा किया है। उन्होंने कहा कि ये सरकार का छिपा हुई एजेंडा है। सरकार का असल मकसद जाति जनगणना नहीं कराना है। अनुच्छेद 334-A में महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने को जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया है। सरकार अब इसे अलग करने की कोशिश कर रही है, ताकि इसे जल्द लागू किया जा सके। जयराम रमेश ने पोस्ट में चार मुख्य सवाल उठाए… महिला आरक्षण बिल के लिए 3 दिन का विशेष सत्र जयराम रमेश का बयान ऐसे समय आया है, जब 16 से 18 अप्रैल के बीच संसद का विशेष सत्र प्रस्तावित है। इसमें महिला आरक्षण कानून लागू करने और लोकसभा सीटें बढ़ाने से जुड़े बिल लाए जा सकते हैं। संसद से मंजूरी मिलने के बाद यह कानून 31 मार्च 2029 से लागू होगा और उसी साल होने वाले लोकसभा चुनाव में पहली बार प्रभावी होगा। 1 अप्रैल से जनगणना का पहला फेज शुरू हुआ जनगणना 2027 का पहला फेज 1 अप्रैल से शुरू हुआ। यह 30 सितंबर 2026 तक चलेगा। जनगणना के पहले फेज में ‘हाउस लिस्टिंग’ यानी मकानों की गिनती की जा रही है। दूसरा फेज ‘जनसंख्या गणना’ फरवरी 2027 में होगा। इसमें लोगों से उनकी जाति पूछी जाएगी। आजादी के बाद पहली बार जाति का डेटा जुटाया जाएगा। इससे पहले 1931 में ऐसा हुआ था। पहली बार जनगणना पूरी तरह से डिजिटल माध्यम से होगी। कर्मचारी मोबाइल ऐप के जरिए डेटा सीधे अपने स्मार्टफोन पर कलेक्ट करेंगे। जनगणना करने वाले आपसे कुल 33 सवाल पूछेंगे। ————- ये खबर भी पढ़ें… BJP ने सांसदों के लिए व्हिप जारी किया:16-18 अप्रैल तक संसद में मौजूद रहना होगा; महिला आरक्षण के लिए विशेष सत्र; PM ने पत्र लिखा BJP ने लोकसभा और राज्यसभा के सभी सांसदों को 3 लाइन का व्हिप जारी कर 16 से 18 अप्रैल तक संसद में मौजूद रहने को कहा है। इस दौरान किसी को भी छुट्टी नहीं दी जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को हुई कैबिनेट बैठक में नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के ड्राफ्ट बिल को मंजूरी दे दी गई थी। पूरी खबर पढ़ें…
मैहर में कांग्रेस का संविधान लीडरशिप प्रोग्राम पर जोर:राष्ट्रीय प्रवक्ता बोले- लोकतंत्र और संविधान पर बढ़ रहा है दबाव

मैहर जिले के कटनी रोड स्थित ब्लॉक कांग्रेस कार्यालय में संविधान लीडरशिप प्रोग्राम विषय पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। इस दौरान युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पंकज मिश्रा ने केंद्र और राज्य की नीतियों पर सवाल उठाते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चिंता व्यक्त की। पंकज मिश्रा ने कहा कि वर्तमान समय में लोकतंत्र के मूल मूल्यों पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता के विरोध में उठने वाली आवाजों को दबाने की कोशिश की जा रही है और सच को सामने लाने वालों पर कई प्रकार के दबाव बनाए जा रहे हैं। मिश्रा ने इसे संविधान की मूल भावना पर सीधा आघात बताया। मिश्रा ने संविधान लीडरशिप प्रोग्राम के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह पहल युवाओं और डिजिटल माध्यमों से जुड़े इन्फ्लुएंसर्स को सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि उन्हें जमीनी स्तर पर सक्रिय नेतृत्वकर्ता के रूप में तैयार करेगी। कंटेंट क्रिएटर्स का एक मजबूत नेटवर्क तैयार करेंगे उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से देशभर में युवाओं और कंटेंट क्रिएटर्स का एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया जाएगा। यह नेटवर्क सामाजिक न्याय, समानता और लोकतांत्रिक मूल्यों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य करेगा। मिश्रा ने बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों पर युवाओं की भागीदारी को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम के तहत प्रतिभागियों को तकनीकी प्रशिक्षण, कानूनी सहयोग और संगठनात्मक मार्गदर्शन भी दिया जाएगा। इस अवसर पर जिला कांग्रेस अध्यक्ष धर्मेश घई, नगर अध्यक्ष प्रभात द्विवेदी सहित कई अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे।
‘अगर बीजेपी असम हार जाती है’: हिमंत की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं और पीएम मोदी की पूर्वोत्तर रणनीति के लिए इसका क्या मतलब होगा? | चुनाव समाचार

आखरी अपडेट:11 अप्रैल, 2026, 18:06 IST असम विधानसभा चुनाव के लिए मतदान 9 अप्रैल को हुआ, जिसमें भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए राज्य की सभी 126 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है। असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा के साथ पीएम नरेंद्र मोदी। फ़ाइल छवि: एक्स 2026 असम विधान सभा चुनावों के लिए वोटों की गिनती 4 मई को होने वाली है, 9 अप्रैल को एक उच्च-स्तरीय मतदान के बाद, जिसमें रिकॉर्ड तोड़ मतदान हुआ था। जबकि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सत्ता समर्थक लहर में विश्वास व्यक्त किया है, राजनीतिक परिदृश्य चाकू की धार पर बना हुआ है। इस प्रवेश द्वार राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए संभावित हार एक स्थानीय झटके से कहीं अधिक होगी; यह मूल रूप से इसके सबसे मुखर क्षेत्रीय नेता के करियर पथ को बदल देगा और प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के “एक्ट ईस्ट” सिद्धांत के पूर्ण पुनर्मूल्यांकन को मजबूर करेगा। हिमंत बिस्वा सरमा की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के लिए असम की हार का क्या मतलब होगा? हिमंत बिस्वा सरमा ने खुद को पूरे पूर्वोत्तर में भाजपा के लिए अपरिहार्य “संकटमोचक” के रूप में स्थापित किया है, जो मुख्यमंत्री के रूप में अपनी भूमिका से आगे बढ़कर एक राष्ट्रीय वैचारिक शुभंकर बन गए हैं। पहचान की राजनीति, समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और अवैध आप्रवासियों का पता लगाने पर अपने आक्रामक रुख के लिए जाने जाने वाले सरमा ने एक ऐसा ब्रांड बनाया है जो गुवाहाटी से परे पार्टी के मूल आधार के साथ प्रतिध्वनित होता है। उनके घरेलू मैदान पर हार अनिवार्य रूप से “अजेयता” की कहानी को खत्म कर देगी जिसने उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को बढ़ावा दिया है। भाजपा के आंतरिक पदानुक्रम के भीतर, एक हार संभवतः सरमा के एक हाई-प्रोफाइल केंद्रीय मंत्रिमंडल की भूमिका या एक केंद्रीय संगठनात्मक पद पर परिवर्तन को रोक देगी। एक ऐसे नेता के लिए जो नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (एनईडीए) के प्राथमिक वास्तुकार रहे हैं, असम – जो इस क्षेत्र का मुकुट रत्न है – को खोने से पार्टी के “नॉर्थ ईस्ट वायसराय” के रूप में उनका प्रभाव कम हो जाएगा। यह उनके विरोधियों को यह तर्क देने का अवसर प्रदान करेगा कि उनकी अति-ध्रुवीकरण वाली बयानबाजी चरम पर पहुंच गई है, जो संभावित रूप से अधिक संयमित, विकास-केंद्रित नेतृत्व शैली की ओर लौटने को मजबूर कर रही है। हार का प्रधानमंत्री मोदी की पूर्वोत्तर रणनीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा? प्रधान मंत्री मोदी के लिए, असम “अष्टलक्ष्मी” दृष्टिकोण का आधार है – यह विचार कि पूर्वोत्तर के आठ राज्य भारत के भविष्य के विकास के स्तंभ हैं। 2014 के बाद से, भाजपा ने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय मुख्यधारा के साथ एकीकृत करने के लिए बोगीबील ब्रिज से लेकर क्षेत्रीय हवाई अड्डे के विस्तार तक बुनियादी ढांचे में भारी निवेश किया है। यदि भाजपा गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन से असम हार जाती है, तो यह केंद्र के विकासात्मक प्रयासों और पहचान और परिसीमन पर स्थानीय चिंताओं के बीच एक बड़े “असंतुलन” का संकेत होगा। हार से छोटे पड़ोसी राज्यों पर भाजपा की पकड़ भी ख़तरे में पड़ जाएगी जहां वह गठबंधन बनाए रखने के लिए असम की साजो-सामान और राजनीतिक मशीनरी पर निर्भर है। “एक्ट ईस्ट” नीति, जो पूर्वोत्तर को दक्षिण पूर्व एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में देखती है, के लिए दिसपुर में एक स्थिर, वैचारिक रूप से संरेखित सरकार की आवश्यकता है। सत्ता में बदलाव से क्षेत्रीय दलों को बढ़ावा मिलेगा और संभावित रूप से “सेवन सिस्टर्स” में सत्ता विरोधी लहर का पुनरुत्थान होगा, जिससे पीएमओ को राजनीतिक साझेदारी की तुलना में नौकरशाही हस्तक्षेप पर अधिक भरोसा करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। क्या भाजपा ‘स्वदेशी पहचान’ की कहानी में बदलाव से बच सकती है? 2026 का चुनाव बड़े पैमाने पर स्वदेशी समुदायों के अस्तित्व और भविष्य पर लड़ा गया था। सरमा का अभियान पहचान के लिए “लोकतांत्रिक लड़ाई” पर केंद्रित था, जो उनके “संकल्प पत्र” की तुलना छह समुदायों के लिए सामाजिक न्याय और अनुसूचित जनजाति के दर्जे के कांग्रेस के वादों से करता था। यदि मतदाता बाद वाले को चुनते हैं, तो यह अधिक पारंपरिक जातीय और जाति-आधारित गठबंधनों के पक्ष में भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विशिष्ट ब्रांड की अस्वीकृति का प्रतीक होगा। हार से पता चलता है कि यूसीसी और एनआरसी (नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर) ढांचे के माध्यम से “स्वदेशी असमिया” वोट को मजबूत करने की भाजपा की कोशिश स्थानीय आर्थिक दबावों और कांग्रेस की “गारंटियों” के सामने विफल हो गई है। मोदी और सरमा के लिए, नतीजे के लिए गहन आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता होगी: चाहे वैचारिक “अधिकतम दबाव” को दोगुना करना हो या समावेशी “सबका साथ, सबका विकास” मॉडल पर वापस लौटना हो, जिसने मूल रूप से उन्हें 2016 में पूर्वोत्तर किले को तोड़ने में मदद की थी। चुनी हुई कहानियाँ, आपके इनबॉक्स में हमारी सर्वोत्तम पत्रकारिता वाला एक न्यूज़लेटर जमा करना पहले प्रकाशित: 11 अप्रैल, 2026, 18:06 IST समाचार चुनाव ‘अगर बीजेपी असम हार जाती है’: हिमंत की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं और पीएम मोदी की पूर्वोत्तर रणनीति के लिए इसका क्या मतलब होगा? अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)असम चुनाव(टी)बीजेपी(टी)कांग्रेस(टी)असम चुनाव(टी)हिमंत बिस्वा सरमा(टी)नरेंद्र मोदी(टी)विधानसभा चुनाव
केरल चुनाव 2026 | सुमंत रमन: पिनाराई ने शानदार प्रदर्शन किया है, यह देखते हुए कि उनके पास 2 कार्यकाल हैं

सीएनएन नाम, लोगो और सभी संबंधित तत्व ® और © 2026 केबल न्यूज नेटवर्क एलपी, एलएलएलपी। एक टाइम वार्नर कंपनी। सर्वाधिकार सुरक्षित। सीएनएन और सीएनएन लोगो केबल न्यूज नेटवर्क, एलपी एलएलएलपी के पंजीकृत चिह्न हैं, जिन्हें अनुमति के साथ प्रदर्शित किया गया है। NEWS18.com पर या उसके हिस्से के रूप में CNN नाम और/या लोगो का उपयोग उनके संबंध में केबल न्यूज नेटवर्क के बौद्धिक संपदा अधिकारों का हनन नहीं करता है। © कॉपीराइट नेटवर्क18 मीडिया एंड इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड 2026। सर्वाधिकार सुरक्षित। (टैग्सटूट्रांसलेट)असम चुनाव(टी)विधानसभा चुनाव(टी)बीजेपी(टी)ब्रेकिंग न्यूज भारत(टी)कांग्रेस(टी)चुनाव आयोग(टी)हिमंत बिस्वा सरमा(टी)भारतीय लोकतंत्र(टी)केरल चुनाव(टी)एलडीएफ(टी)एनडीए(टी)पिनाराई विजयन(टी)पुडुचेरी चुनाव(टी)यूडीएफ(टी)मतदाता मतदान
सिर्फ सीटों से कहीं अधिक: बड़े दांव वाले आमना-सामना जो असम की राजनीतिक आत्मा को परिभाषित करेंगे | चुनाव समाचार

आखरी अपडेट:09 अप्रैल, 2026, 05:43 IST आज असम का नक्शा कई ‘प्रतिष्ठा की लड़ाइयों’ से भरा पड़ा है, जहां मार्जिन बेहद कम होने की उम्मीद है असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा (बाएं) और कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई। (फ़ाइल छवि: पीटीआई) जैसे ही असम में गुरुवार को मतदान होने जा रहा है, राजनीतिक माहौल ऐतिहासिक परिणाम की भावना से भर गया है। 25 मिलियन से अधिक मतदाता एक एकल, उच्च जोखिम वाले चरण में 126 निर्वाचन क्षेत्रों में अपने मत डालने के पात्र हैं। जहां सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का लक्ष्य मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में अपने एक दशक पुराने प्रभुत्व को मजबूत करना है, वहीं नव सक्रिय विपक्ष, कांग्रेस पार्टी के गौरव गोगोई के नेतृत्व वाला असम सोनमिलिटो मोर्चा अपने पारंपरिक गढ़ को फिर से हासिल करने के लिए लड़ रहा है। आज असम का नक्शा कई “प्रतिष्ठा की लड़ाइयों” से भरा पड़ा है, जहां मार्जिन बेहद कम होने की उम्मीद है। क्या जोरहाट की लड़ाई सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई है? दिन की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली प्रतियोगिता निस्संदेह ऊपरी असम के जोरहाट में है। यह सीट बीजेपी के दिग्गज नेता हितेंद्र नाथ गोस्वामी और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई के बीच बेहद प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गई है. गोगोई के लिए, यह चुनाव एक तरह से घर वापसी है और उस क्षेत्र में उनके परिवार की विरासत की परीक्षा है, जिस पर कभी उनके पिता, दिवंगत तरुण गोगोई का प्रभुत्व था। हालाँकि, भाजपा ने जोरहाट को बरकरार रखने के लिए अपनी पूरी संगठनात्मक ताकत लगा दी है, और प्रतियोगिता को अपने “डबल-इंजन” विकास मॉडल और जिसे वे “वंशवादी राजनीति” कहते हैं, के बीच एक विकल्प के रूप में तैयार किया है। दोनों पक्ष जोरहाट को ऊपरी असम के चाय-बेल्ट में मूड के लिए बैरोमीटर के रूप में मान रहे हैं, यहां का परिणाम संभवतः संकेत देगा कि पूरे राज्य के लिए हवा किस तरफ बह रही है। क्या मुख्यमंत्री जालुकबारी में अपना किला बरकरार रख सकते हैं? निचले असम में, सभी की निगाहें जलुकबरी पर हैं, जो निर्वाचन क्षेत्र मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का पर्याय बन गया है। 2001 से इस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे सरमा का मुकाबला कांग्रेस की प्रतिद्वंद्वी बिदिशा निओग से है। जबकि सरमा एक ऐसे नेता के विश्वास के साथ मैदान में उतरे हैं, जिन्होंने असमिया राजनीति को मौलिक रूप से नया आकार दिया है, विपक्ष ने अपने अभियान को प्रशासनिक पारदर्शिता और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) कथा के “अधूरे वादों” के मुद्दों पर केंद्रित किया है। प्रतियोगिता को “असम की आत्मा” की लड़ाई के रूप में चित्रित करने के विपक्ष के प्रयासों के बावजूद, जालुकबारी भाजपा के लिए एक दुर्जेय किला बना हुआ है। यहां सरमा का प्रदर्शन सिर्फ एक सीट के बारे में नहीं है; यह पूरे पूर्वोत्तर में एनडीए के विस्तार के प्राथमिक वास्तुकार के रूप में उनके अधिकार के बारे में है। नाज़िरा और शिवसागर में मुकाबला इतना महत्वपूर्ण क्यों है? राज्य के ऐतिहासिक हृदय की ओर बढ़ते हुए, नाज़िरा और शिवसागर में झड़पें हो रही हैं जो क्षेत्रीय राजनीतिक परिदृश्य को फिर से परिभाषित कर सकती हैं। नाज़िरा में, विपक्ष के नेता, देबब्रत सैकिया, भाजपा के मयूर बोरगोहेन के खिलाफ फिर से कड़ी चुनावी लड़ाई लड़ रहे हैं। यह सीट दशकों से कांग्रेस का गढ़ रही है और यहां हार पार्टी के मनोबल के लिए एक विनाशकारी झटका होगी। इस बीच, शिवसागर में, रायजोर दल के फायरब्रांड नेता, अखिल गोगोई, असम गण परिषद (एजीपी) और भाजपा गठबंधन के ठोस दबाव के खिलाफ अपनी सीट का बचाव कर रहे हैं। ये निर्वाचन क्षेत्र स्वदेशी राजनीति के केंद्र हैं, जहां भूमि अधिकारों और पहचान पर बहस अक्सर राष्ट्रीय आख्यानों पर भारी पड़ती है। जैसे-जैसे दिन चढ़ेगा, इन प्रमुख क्षेत्रों में मतदान यह निर्धारित करेगा कि क्या विपक्ष का “संयुक्त मोर्चा” वास्तव में भाजपा की मजबूत चुनावी मशीनरी को नुकसान पहुंचा सकता है। पहले प्रकाशित: 09 अप्रैल, 2026, 05:43 IST समाचार चुनाव केवल सीटों से कहीं अधिक: बड़े दांवों का आमना-सामना जो असम की राजनीतिक आत्मा को परिभाषित करेगा अस्वीकरण: टिप्पणियाँ उपयोगकर्ताओं के विचार दर्शाती हैं, News18 के नहीं। कृपया चर्चाएँ सम्मानजनक और रचनात्मक रखें। अपमानजनक, मानहानिकारक, या अवैध टिप्पणियाँ हटा दी जाएंगी। News18 अपने विवेक से किसी भी टिप्पणी को अक्षम कर सकता है. पोस्ट करके, आप हमारी उपयोग की शर्तों और गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं। और पढ़ें (टैग्सटूट्रांसलेट)असम चुनाव(टी)बीजेपी(टी)कांग्रेस(टी)असम चुनाव(टी)हिमंत बिस्वा सरमा(टी)गौरव गोगोई(टी)विधानसभा चुनाव








