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टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी | तमिलनाडु पावर गेम में विजय को बड़ी परीक्षा का सामना करना पड़ेगा

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Hindi News National Assam MLAs Bjp Congress Adr Report Property Criminal Cases Education Age 12 मिनट पहले कॉपी लिंक असम विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। 126 विधायकों में से 21 (17%) पर आपराधिक और 19 (15%) पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने ये रिपोर्ट जारी की है। 3 विधायकों ने खुद पर मर्डर की कोशिश और 2 ने महिलाओं के खिलाफ अत्याचार करने से जुड़ा केस होना बताया है। 2011 में गंभीर अपराध वाले विधायकों की संख्या 8 थी जो 2026 में बढ़कर 19 यानी करीब दोगुनी हो गई है। 107 (85%) विधायक करोड़पति हैं। 2011 में ये संख्या 47 (37%) थी। 25 विधायकों की संपत्ति ₹10 करोड़ से ज्यादा है। भाजपा के 74 विधायक करोड़पति हैं। AIUDF के मोहम्मद बदरुद्दीन अजमल की संपत्ति ₹226 करोड़ है। राज्य में इस बार 63 दोबारा चुने गए हैं। भाजपा ने 82 सीटों पर जीत हासिल की है। वहीं कांग्रेस ने 19, बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) और असम गण परिषद (AGP) को 10-10 सीटें मिली हैं। अन्य को 5 सीटें मिली हैं। पार्टी के हिसाब से देखें तो भाजपा के 82 में से 14 और कांग्रेस के 19 में से 16 विधायकों पर क्रिमिनल केस हैं। जबकि BPF के किसी भी विधायक पर आपराधिक केस नहीं है। गंभीर आपराधिक मामले: 5 साल या उससे ज्यादा की सजा वाले अपराध हत्या, अपहरण, बलात्कार चुनाव से जुड़े अपराध भ्रष्टाचार महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध सरकारी धन का नुकसान कांग्रेस के 14 विधायक करोड़पति 2026 में कुल 107 (85%) विधायक करोड़पति हैं। 2021 में ये संख्या 85 थी। भाजपा के 90% और कांग्रेस के 19 में से 14 विधायक करोड़पति हैं। 126 विधायकों की कुल संपत्ति 1112 करोड़ रुपए है। हर विधायक की औसत संपत्ति करीब 8.82 करोड़ रुपए है जो कि 2021 से दोगुनी है। भाजपा के 85 में से 74 विधायक करोड़पति हैं। 25 विधायकों की संपत्ति ₹10 करोड़ से ज्यादा, 32 के पास ₹5-10 करोड़ और 50 के पास ₹1-5 करोड़ संपत्ति है। 15 के पास ₹20 लाख-1 करोड़ और सिर्फ 4 के पास ₹20 लाख से कम संपत्ति है। असम विधायकों से जुड़े अन्य फैक्ट्स- असम में सबसे ज्यादा 51 60 साल के 54 विधायक जीते। वहीं 41 से 50 के 36, 61 से 70 के 24, 31 से 40 के 9, 25 से 30 के 2 और 71 से 75 का सिर्फ 1 उम्मीदवार है। 126 MLAs में 50 ग्रेजुएट हैं। 21 पोस्ट ग्रेजुएट, 12 प्रोफेशनल ग्रेजुएट, 6 डॉक्टरेट, 22 विधायक 12th और 14 दसवीं पास हैं। कुल 63 विधायक दोबारा चुने गए। उनकी औसत संपत्ति 2021 के ₹4.25 करोड़ से बढ़कर 2026 में ₹8.02 करोड़ हो गई, यानी करीब 88% बढ़ोतरी। 126 में 119 पुरुष (94%) और सिर्फ 7 महिलाएं (6%) जीतीं। विधानसभा में महिलाओं की भागीदारी अभी भी कम है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

असम-बंगाल में कांग्रेस के 21 में से 20 विधायक मुस्लिम:AIUDF बोली- कांग्रेस अब 'मुस्लिम लीग' बनी; भाजपा ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था

असम-बंगाल में कांग्रेस के 21 में से 20 विधायक मुस्लिम:AIUDF बोली- कांग्रेस अब 'मुस्लिम लीग' बनी; भाजपा ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम सीटों पर सबसे अलग ट्रेंड बंगाल में दिखा। यहां 142 मुस्लिम सीटों में से भाजपा ने 72, टीएमसी ने 64 सीटें और कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं। वहीं, असम की 22 मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस को 18, AIUDF को 2 सीटें मिलीं। केरलम की 44 मुस्लिम बहुल सीटों में IUML को 21 और कांग्रेस को 14 सीटें मिलीं। केरलम में कांग्रेस ने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा, इसमें 63 सीटें मिलीं। यहां उसके 8 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीते हैं। कांग्रेस ने बंगाल और असम में कुल 390 सीटों पर चुनाव लड़ा। 21 सीटों पर जीत दर्ज की, इनमें से 20 मुस्लिम विधायक हैं। इधर भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीवार को टिकट नहीं दिया। AIUDF के नेता बदरुद्दीन अजमल ने तंज कसते हुए कहा- ‘असम में कांग्रेस अब मुस्लिम लीग बन चुकी है।’ पहले AIUDF का कांग्रेस के साथ गठबंधन था। असम में कांग्रेस के 20 में से 18 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीते बंगाल में कांग्रेस ने TMC से ज्यादा मुसलमानों को टिकट दिया पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने 63 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया। वहीं, 15 साल से शासन कर रही TMC ने 47 मुस्लिम कैंडिडेट्स उतारे। कांग्रेस ने 2021 में भी 94 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। असम की कई सीटों पर कांग्रेस और उसके सहयोगियों के मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत की दर 80 प्रतिशत से भी ज्यादा रही है। कई सीटों पर तो कांग्रेस उम्मीदवारों ने 1 लाख से भी ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की है। पांचों राज्यों के रिजल्ट… ——————————————————– ये खबर भी पढ़ें… बंगाल- 10 साल में भाजपा 3 से 207 पर पहुंची:तमिलनाडु में विजय की 2 साल पुरानी पार्टी जीती; केरलम में कांग्रेस, असम में भाजपा सरकार पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के रिजल्ट सोमवार को आए। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरलम में सरकारें बदल गईं। असम और पुडुचेरी में एनडीए ने वापसी की। बंगाल में TMC को हराकर भाजपा पहली बार सत्ता में आई। पार्टी दस साल में 3 सीटों से 207 सीटों पर पहुंच गई है। पूरी खबर पढ़ें…

असम-बंगाल में कांग्रेस के 21 में से 20 विधायक मुस्लिम:AIUDF बोली- कांग्रेस 'मुस्लिम लीग' बनी; भाजपा ने किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था

असम-बंगाल में कांग्रेस के 21 में से 20 विधायक मुस्लिम:AIUDF बोली- कांग्रेस अब 'मुस्लिम लीग' बनी; भाजपा ने एक भी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया था

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम सीटों पर सबसे अलग ट्रेंड बंगाल में दिखा। यहां 142 मुस्लिम सीटों में से भाजपा ने 72, टीएमसी ने 64 सीटें और कांग्रेस को 2 सीटें मिलीं। वहीं, असम की 22 मुस्लिम बहुल सीटों पर कांग्रेस को 18, AIUDF को 2 सीटें मिलीं। केरलम की 44 मुस्लिम बहुल सीटों में IUML को 21 और कांग्रेस को 14 सीटें मिलीं। केरलम में कांग्रेस ने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा, इसमें 63 सीटें मिलीं। यहां उसके 8 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीते हैं। कांग्रेस ने बंगाल और असम में कुल 390 सीटों पर चुनाव लड़ा। 21 सीटों पर जीत दर्ज की, इनमें से 20 मुस्लिम विधायक हैं। इधर भाजपा ने एक भी मुस्लिम उम्मीवार को टिकट नहीं दिया। AIUDF के नेता बदरुद्दीन अजमल ने तंज कसते हुए कहा- ‘असम में कांग्रेस अब मुस्लिम लीग बन चुकी है।’ पहले AIUDF का कांग्रेस के साथ गठबंधन था। असम में कांग्रेस के 20 में से 18 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीते बंगाल में कांग्रेस ने TMC से ज्यादा मुसलमानों को टिकट दिया पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने 63 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया। वहीं, 15 साल से शासन कर रही TMC ने 47 मुस्लिम कैंडिडेट्स उतारे। कांग्रेस ने 2021 में भी 94 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। असम की कई सीटों पर कांग्रेस और उसके सहयोगियों के मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत की दर 80 प्रतिशत से भी ज्यादा रही है। कई सीटों पर तो कांग्रेस उम्मीदवारों ने 1 लाख से भी ज्यादा वोटों के अंतर से जीत हासिल की है। पांचों राज्यों के रिजल्ट… ——————————————————– ये खबर भी पढ़ें… बंगाल- 10 साल में भाजपा 3 से 207 पर पहुंची:तमिलनाडु में विजय की 2 साल पुरानी पार्टी जीती; केरलम में कांग्रेस, असम में भाजपा सरकार पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के रिजल्ट सोमवार को आए। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरलम में सरकारें बदल गईं। असम और पुडुचेरी में एनडीए ने वापसी की। बंगाल में TMC को हराकर भाजपा पहली बार सत्ता में आई। पार्टी दस साल में 3 सीटों से 207 सीटों पर पहुंच गई है। पूरी खबर पढ़ें…

west bengal tamil nadu keralam assam puducherry election results

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कोलकाता/चेन्नई/गुवाहाटीकुछ ही क्षण पहले कॉपी लिंक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के रिजल्ट सोमवार को आए। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में सरकारें बदल गईं। असम और पुडुचेरी में एनडीए ने वापसी की। बंगाल में TMC को हराकर भाजपा पहली बार सत्ता में आई। पार्टी दस साल में 3 सीटों से 206 सीटों पर पहुंच गई है। तमिलनाडु में एक्टर थलपति विजय की पार्टी TVK ने सबसे ज्यादा सीटें लाकर चौंका दिया। 59 साल में पहली बार राज्य में ऐसी सरकार बनने जा रही है, जिसमें DMK या AIADMK नहीं होगी। दो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और एम के स्टालिन चुनाव हार गए। बंगाल में 15 साल बाद ममता का राज खत्म भाजपा को वोट शेयर 7.50% बढ़ा, TMC का इतना ही घटा बंगाल में 12 मंत्री हारे, भाजपा का 70% स्ट्राइक रेट महिला को मिल सकती है कमान: बंगाल में भाजपा ने बिना चेहरे के चुनाव लड़ा, इसलिए अब बड़ा सवाल यह है कि कौन मुख्यमंत्री होगा। संभावित नामों में सुवेंदु अधिकारी, सुकांत मजूमदार, दिलीप घोष और समिक भट्टाचार्य का नाम सबसे आगे है। पार्टी किसी महिला चेहरे को भी ला सकती है। भाजपा का 70% स्ट्राइक रेट: बंगाल में भाजपा ने 293 में से 206 सीटें जीतकर करीब 70% का स्ट्राइक रेट हासिल किया। वहीं, TMC 81 सीटों पर सिमट गई और उसका स्ट्राइक रेट करीब 27.6% रहा। ममता समेत 12 मंत्री हारे: सीएम ममता समेत 12 मंत्री चुनाव हार गए। ममता के पास होम मिनिस्ट्री समेत 7 महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी थी। महिला और बाल कल्याण मंत्री शशि पांजा, उदयन गुहा, ब्रत्य बसु, चंद्रिमा भट्टाचार्य, सुजीत बसु, सिद्दीकुल्लाह चौधरी, रथिन घोष, बेचाराम मन्ना, बिरबाहा हंसदा, मोलय घटक को हार का सामना करना पड़ा है। पहली बार राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार: 1972 के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में अब ऐसी पार्टी की सरकार होगी, जो केंद्र में भी सत्ता में है। 1972 में राज्य में कांग्रेस ने 216 सीटें जीतीं थीं और उस वक्त केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी। बांग्लादेश सीमा, घुसपैठ और प्रशासनिक नियंत्रण जैसे मुद्दों पर भी सख्ती हो सकती है। मोदी ने सोमवार को पार्टी मुख्यालय में इसका ऐलान भी किया। नॉर्थ से साउथ तक BJP: साउथ बंगाल पहले TMC का मजबूत गढ़ था, यहां BJP ने सबसे ज्यादा 33 सीटें जीतीं। नॉर्थ 24 परगना में BJP ने 18 सीटें जीत लीं। TMC को यहां 15 सीटें मिलीं। पूर्वी मेदिनीपुर में BJP ने 16 और हुगली में 15 सीटें जीतीं। नॉर्थ बंगाल की 54 सीटों में BJP ने 27 सीटें जीतीं। मालदा में BJP को 8 और TMC को 4 सीटें मिलीं। जंगलमहल में भाजपा ने पुरुलिया की 9, बांकुरा की 11 पश्चिम मेदिनीपुर 12 सीटें जीतीं। टीएमसी ने सबसे अधिक सीटें दक्षिणी बंगाल में जीतीं। सबसे छोटी और सबसे बड़ी जीत: बंगाल की सतगछिया सीट पर सबसे कम मार्जिन वाली जीत हुई। BJP के अग्निस्वर नास्कर ने TMC के सोमाश्री बेताल को 401 वोट से हराया है। माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी सीट पर जीत का मार्जिन सबसे बड़ा रहा। यहां BJP के आनंदमय बर्मन ने TMC के शंकर मलाकर को 1,04,265 वोट से हराया। मोदी का 242 सीट पर प्रचार, 184 में भाजपा जीती मोदी ने सोमवार शाम को भाजपा के दिल्ली मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। वे बंगाली कुर्ता-धोती पहनकर पहुंचे। मोदी ने अपनी जनसभाओं और रोड-शो के जरिए बंगाल की 294 में से 242 सीटें कवर कीं। इनमें से 184 सीटों पर भाजपा की जीत हुई। भाजपा ने राज्य में 208 सीटें जीतीं। जिन सीटों पर मोदी ने सभा या रोड-शो किया, वहां पार्टी का स्ट्राइक रेट 76% रहा। ममता भवानीपुर से चुनाव हारीं, सुवेंदु दोनों सीट पर जीते SIR से अनुपात में मुस्लिम वोटर्स के नाम ज्यादा कटे SIR के तहत बंगाल में वोटर लिस्ट से करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए। भाजपा को 2.89 और TMC को 2.57 करोड़ वोट मिले। दोनों पार्टियों के बीच 31 लाख 84 वोटों का अंतर रहा। SIR में 63% (लगभग 57.47 लाख) हिंदू और 34% (लगभग 31.1 लाख) मुस्लिमों के नाम कटे थे। सीधा मतलब है कि आबादी के अनुपात में मुस्लिम वोट ज्यादा कटे। जिन इलाकों में मुस्लिम वोटर निर्णायक हो सकते थे, वहां कमजोर हो गए। इसका फायदा भाजपा को हुआ। भाजपा की स्ट्रैटजी, शाह 15 दिन बंगाल में रहे शाह 15 दिन बंगाल में रहे। बंगाल में पहली बार ‘पन्ना प्रमुख’ स्ट्रैटजी पर काम किया। 44,000 से ज्यादा मतदान केंद्रों को ‘मजबूत’, ‘केंद्रित’ व ‘कमजोर’ श्रेणियों में बांटा। हर पन्ना प्रमुख को 30-60 मतदाताओं की सीधी जिम्मेदारी दी। उनका कार्य प्रचार करना और यह सुनिश्चित करना था कि उनके आवंटित वोटर मतदान केंद्र पहुंचें। टीएमसी की महिलाओं में ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी कल्याणकारी योजनाएं काफी लोकप्रिय हुईं। इसमें 1000-1200 रु. दिए जा रहे थे। भाजपा सबके लिए 3 हजार की योजना लाई। सुवेंदु अधिकारी और अमित शाह ने बार-बार मंचों से आश्वासन दिया कि भाजपा कोई मौजूदा योजना बंद नहीं करेगी, उनके लाभ और बढ़ाएगी। राज्य के कर्मियों के लिए 7वें केंद्रीय वेतन आयोग को तुरंत लागू करने और सभी बकाया वेतन विसंगतियों को दूर करने का प्रमुख वादा किया। तमिलनाडु में 2 साल पुरानी TVK ने 50+ साल पुरानी DMK-AIADMK को हराया एक्टर विजय की 2 साल पुरानी पार्टी TVK को 108 सीट पर जीत मिली है। ये DMK (59) और AIDMK (47) की कुल सीटों से ज्यादा है। TVK का उत्तर-मध्य में दबदबा, 46% स्ट्राइक रेट विजय की पार्टी TVK ने हर इलाके में सीटें जीतीं। सबसे अधिक दबदबा उत्तर और तटीय इलाकों में रहा। मध्य तमिलनाडु में भी उसे खूब सीटें मिलीं। DMK ने ज्यादातर सीटें दक्षिणी इलाकों में जीतीं। AIADMK को अधिकतर सीटें उत्तर-मध्य क्षेत्र में मिलीं। TVK ने 234 में से 108 सीटें जीतकर 46% के साथ सबसे ज्यादा स्ट्राइक रेट हासिल किया। DMK ने 164 में 59 सीटें जीतकर 36% और AIADMK ने 170 में 47 सीटों के साथ 27.6% स्ट्राइक रेट दर्ज किया। कांग्रेस 28 में 5 सीटें जीतकर 17.8% पर रही। BJP का प्रदर्शन सबसे कमजोर रहा। पार्टी 27 सीटों पर लड़कर सिर्फ 1 सीट जीत सकी और उसका स्ट्राइक रेट मात्र 3.4% रहा। सीएम स्टानिल 8795 वोट से हारे 59 साल बाद पहली बार गैर

Left Govt Ends, Congress Returns

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2 मिनट पहलेलेखक: ऐश्वर्य राज कॉपी लिंक केरलम विधानसभा चुनाव में पिनराई विजयन की अगुवाई वाले लेफ्ट एलायंस LDF को हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस की अगुवाई वाली UDF ने 140 में से 90 से ज्यादा सीटें जीतकर 10 साल बाद सत्ता में वापसी कर ली है। केरलम में इस हार के बाद 49 साल में यह पहली होने जा रहा है जब देश के किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं है। जानते हैं देश में वामपंथ के विस्तार, जीत और हार से जुड़ी प्रमुख बातें… इससे पहले जानिए लेफ्ट यानी कम्युनिस्ट विचारधारा के बारे में। 1947 में मिली आजादी को मानने से इंकार किया भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने 1947 में भारत को मिली आजादी को असली आजादी मानने से इंकार कर दिया था। उस वक्त पार्टी का कहना था कि यह आजादी अधूरी और समझौतों का परिणाम है, जिसे उन्होंने ‘झूठी आजादी’ का नाम दिया। इस हकीकत को पूरी तरह स्वीकार करने में पार्टी को 5 साल से ज्यादा का समय लग गया। मार्च 1948 में पार्टी के भीतर एक बड़ा बदलाव हुआ। पीसी. जोशी की जगह बीटी. रणदिवे (BTR) नए जनरल सेक्रेटरी बने। उनके आते ही पार्टी में ‘रणदिवे लाइन’ लागू हुई, जो बेहद कट्टर और आक्रामक थी। इसी सोच के तहत जनवरी 1950 में संविधान लागू होने से पहले ही CPI ने इसका विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि कांग्रेस के नेता भारतीय जनता पर ‘गुलामी का संविधान’ थोप रहे हैं। लेफ्ट पार्टी ने नेहरू सरकार को हिंसक तरीके से उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। 1948 और 1949 के दौरान यह नीति पूरी तरह विफल रही। इसके बाद मई-जून 1950 में बीटी. रणदिवे को पद से हटा दिया गया। पार्टी की सेंट्रल कमेटी ने यह स्वीकार किया कि बिना सोचे-समझे 9 मार्च 1949 को देशव्यापी हड़ताल और विद्रोह का जो आह्वान किया गया था, वह बड़ी भूल थी। करीब 6 साल के बाद CPI अपनी कट्टर विचारधारा छोड़कर देश की आजादी की सच्चाई स्वीकार करने के लिए मजबूर हुई। दुनिया की पहली चुनी हुई लोकतांत्रिक लेफ्ट सरकार 5 अप्रैल 1957, केरल के पहले सीएम के रूप में शपथ लेते हुए ईएमएस नंबूदरिपाद । 1956 में त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार को मिलाकर एक नया राज्य केरलम बना। मार्च 1957 में यहां पहली बार विधानसभा चुनाव हुए। 126 सीटों वालीं विधानसभा में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI को 60 सीट मिलीं। 5 निर्दलीय को मिलाकर उसने सरकार बना ली। ये दुनिया में लेफ्ट की पहली चुनी हुई सरकार थी। ईएमएस नंबूदरीपाद ने मुख्यमंत्री बनने के एक हफ्ते बाद ही दो बड़े कानून लागू किए। पहला- भूमि सुधार कानून और दूसरा- शिक्षा में सुधार को लेकर। भूमि सुधार कानून के बाद बटाईदार किसानों को जमीन खरीदने की छूट मिल गई। लैंडहोल्डिंग की लिमिट तय हो गई। वहीं, एजुकेशन बिल के जरिए प्राइवेट संस्थानों को रेगुलेट करने के लिए सख्त नियम बना दिए। 2 फरवरी 1959 को इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। इसके बाद वो केरलम गईं। वहां से लौटने के बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री नेहरू को सौंप दी। 31 जुलाई 1959 को केरलम सरकार बर्खास्त कर दी गई। गांधी की तस्वीरें हटाईं, माओ–स्टालिन की लगाईं इसी बीच केरलम के स्कूल-कॉलेजों से गांधी की तस्वीर हटाकर माओ और स्टालिन की तस्वीर लगाई जाने लगीं। कहा जाने लगा कि नंबूदरीपाद की सरकार बनाने के लिए कम्युनिस्ट देशों ने फंड भेजे हैं। इसके विरोध में केरलम के गांधी कहे जाने वाले मन्नथ पिल्लई की अगुआई में लाखों लोग सड़कों पर उतर गए। हजारों लोग जेल में डाल दिए गए। आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इसमें मछुआरे कम्युनिटी की एक प्रेग्नेंट महिला की जान चली गई। आंदोलन और भड़क उठा। जगह-जगह हिंसा होने लगीं। चीन युद्ध पर सरकार से अलग रुख के कारण दूसरा बड़ा विभाजन 1962 के भारत–चीन युद्ध ने CPI के भीतर वैचारिक दरार बढ़ा दिया। पार्टी का एक धड़ा नेहरू सरकार के समर्थन में था। दूसरा धड़ा चीन को आक्रमणकारी मानने को तैयार नहीं था। ‘राष्ट्रवाद बनाम अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद’ की इस बहस के बीच, चीन समर्थक माने जाने वाले नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इसी तनाव ने पार्टी के आधार को हिला दिया और कम्युनिस्ट आंदोलन दो फाड़ हो गया। युद्ध के दो साल बाद, 1964 में मतभेद इतने बढ़ गए कि कम्युनिस्ट पार्टी आधिकारिक रूप से विभाजित हो गई। सोवियत संघ की नरम नीति के समर्थक CPI में रहे, जबकि क्रांतिकारी रुख अपनाने वाले नेताओं ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) का गठन किया। साल 1964, CPI (M) की स्थापना के दौरान बाएं से दूसरे नंबर पर ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम) और दूसरी पंक्ति में बाएं से तीसरे नंबर पर केरल के पहले सीएम ईएमएस नंबूदिरीपाद। बंगाल में 1967 में लेफ्ट पश्चिम बंगाल में पहली बार लेफ्ट ने 1967 में ‘यूनाइटेड फ्रंट’ गठबंधन के जरिए सरकार में आई। उस समय अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने थे और ज्योति बसु डिप्टी सीएम थे। हालांकि, सरकार बहुत अस्थिर रही। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई, तो CPI ने शुरुआत में इंदिरा गांधी और इमरजेंसी का समर्थन किया था, जबकि CPI(M) ने इसका विरोध किया था और उनके कई नेता जेल भी गए थे। 1977 के विधानसभा चुनावों में लेफ्ट को बंगाल में भारी बहुमत मिला और यहीं से राज्य में कम्युनिस्टों के लंबे शासन की असली शुरुआत हुई। ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने और लगातार 2000 तक राज्य के सीएम रहे। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने राज्य में उद्योगों को लाने की कोशिश की। लेकिन सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि अधिग्रहण विवादों के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने 2011 में कम्युनिस्टों के 34 साल पुराने शासन को खत्म कर दिया। उस वक्त के सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य खुद अपना चुनाव हार गए। 90 के दशक में ज्योति बसु को 3 बार PM बनाने का मौका CBI के पूर्व डायरेक्टर अरुण प्रसाद मुखर्जी ने अपनी किताब ‘राजीव गांधी, ज्योति बसु, इंद्रजीत गुप्त के अनछुए पहलू’ में बताया है कि 1990 और 1991 के उथल-पुथल भरे दौर में राजीव गांधी चाहते थे कि ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बनें। पहली बार अक्टूबर 1990 में राजीव गांधी ने ज्योति बसु

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Left Govt Ends, Congress Returns

23 मिनट पहलेलेखक: ऐश्वर्य राज कॉपी लिंक केरलम विधानसभा चुनाव में पिनराई विजयन की अगुवाई वाले लेफ्ट एलायंस LDF को हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस की अगुवाई वाली UDF ने 140 में से 90 से ज्यादा सीटें जीतकर 10 साल बाद सत्ता में वापसी कर ली है। केरलम में इस हार के बाद 49 साल में यह पहली होने जा रहा है जब देश के किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं है। जानते हैं देश में वामपंथ के विस्तार, जीत और हार से जुड़ी प्रमुख बातें… इससे पहले जानिए लेफ्ट यानी कम्युनिस्ट विचारधारा के बारे में। 1947 में मिली आजादी को मानने से इंकार किया भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने 1947 में भारत को मिली आजादी को असली आजादी मानने से इंकार कर दिया था। उस वक्त पार्टी का कहना था कि यह आजादी अधूरी और समझौतों का परिणाम है, जिसे उन्होंने ‘झूठी आजादी’ का नाम दिया। इस हकीकत को पूरी तरह स्वीकार करने में पार्टी को 5 साल से ज्यादा का समय लग गया। मार्च 1948 में पार्टी के भीतर एक बड़ा बदलाव हुआ। पीसी. जोशी की जगह बीटी. रणदिवे (BTR) नए जनरल सेक्रेटरी बने। उनके आते ही पार्टी में ‘रणदिवे लाइन’ लागू हुई, जो बेहद कट्टर और आक्रामक थी। इसी सोच के तहत जनवरी 1950 में संविधान लागू होने से पहले ही CPI ने इसका विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि कांग्रेस के नेता भारतीय जनता पर ‘गुलामी का संविधान’ थोप रहे हैं। लेफ्ट पार्टी ने नेहरू सरकार को हिंसक तरीके से उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। 1948 और 1949 के दौरान यह नीति पूरी तरह विफल रही। इसके बाद मई-जून 1950 में बीटी. रणदिवे को पद से हटा दिया गया। पार्टी की सेंट्रल कमेटी ने यह स्वीकार किया कि बिना सोचे-समझे 9 मार्च 1949 को देशव्यापी हड़ताल और विद्रोह का जो आह्वान किया गया था, वह बड़ी भूल थी। करीब 6 साल के बाद CPI अपनी कट्टर विचारधारा छोड़कर देश की आजादी की सच्चाई स्वीकार करने के लिए मजबूर हुई। दुनिया की पहली चुनी हुई लोकतांत्रिक लेफ्ट सरकार 5 अप्रैल 1957, केरल के पहले सीएम के रूप में शपथ लेते हुए ईएमएस नंबूदरीपाद। 1956 में त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार को मिलाकर एक नया राज्य केरलम बना। मार्च 1957 में यहां पहली बार विधानसभा चुनाव हुए। 126 सीटों वालीं विधानसभा में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI को 60 सीट मिलीं। 5 निर्दलीय को मिलाकर उसने सरकार बना ली। ये दुनिया में लेफ्ट की पहली चुनी हुई सरकार थी। ईएमएस नंबूदरीपाद ने मुख्यमंत्री बनने के एक हफ्ते बाद ही दो बड़े कानून लागू किए। पहला- भूमि सुधार कानून और दूसरा- शिक्षा में सुधार को लेकर। भूमि सुधार कानून के बाद बटाईदार किसानों को जमीन खरीदने की छूट मिल गई। लैंडहोल्डिंग की लिमिट तय हो गई। वहीं, एजुकेशन बिल के जरिए प्राइवेट संस्थानों को रेगुलेट करने के लिए सख्त नियम बना दिए। 2 फरवरी 1959 को इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। इसके बाद वो केरलम गईं। वहां से लौटने के बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री नेहरू को सौंप दी। 31 जुलाई 1959 को केरलम सरकार बर्खास्त कर दी गई। गांधी की तस्वीरें हटाईं, माओ–स्टालिन की लगाईं इसी बीच केरलम के स्कूल-कॉलेजों से गांधी की तस्वीर हटाकर माओ और स्टालिन की तस्वीर लगाई जाने लगीं। कहा जाने लगा कि नंबूदरीपाद की सरकार बनाने के लिए कम्युनिस्ट देशों ने फंड भेजे हैं। इसके विरोध में केरलम के गांधी कहे जाने वाले मन्नथ पिल्लई की अगुआई में लाखों लोग सड़कों पर उतर गए। हजारों लोग जेल में डाल दिए गए। आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इसमें मछुआरे कम्युनिटी की एक प्रेग्नेंट महिला की जान चली गई। आंदोलन और भड़क उठा। जगह-जगह हिंसा होने लगीं। चीन युद्ध पर सरकार से अलग रुख के कारण दूसरा बड़ा विभाजन 1962 के भारत–चीन युद्ध ने CPI के भीतर वैचारिक दरार बढ़ा दिया। पार्टी का एक धड़ा नेहरू सरकार के समर्थन में था। दूसरा धड़ा चीन को आक्रमणकारी मानने को तैयार नहीं था। ‘राष्ट्रवाद बनाम अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद’ की इस बहस के बीच, चीन समर्थक माने जाने वाले नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इसी तनाव ने पार्टी के आधार को हिला दिया और कम्युनिस्ट आंदोलन दो फाड़ हो गया। युद्ध के दो साल बाद, 1964 में मतभेद इतने बढ़ गए कि कम्युनिस्ट पार्टी आधिकारिक रूप से विभाजित हो गई। सोवियत संघ की नरम नीति के समर्थक CPI में रहे, जबकि क्रांतिकारी रुख अपनाने वाले नेताओं ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) का गठन किया। साल 1964, CPI (M) की स्थापना के दौरान बाएं से दूसरे नंबर पर ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम) और दूसरी पंक्ति में बाएं से तीसरे नंबर पर केरल के पहले सीएम ईएमएस नंबूदिरीपाद। बंगाल में 1967 में लेफ्ट पश्चिम बंगाल में पहली बार लेफ्ट ने 1967 में ‘यूनाइटेड फ्रंट’ गठबंधन के जरिए सरकार में आई। उस समय अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने थे और ज्योति बसु डिप्टी सीएम थे। हालांकि, सरकार बहुत अस्थिर रही। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई, तो CPI ने शुरुआत में इंदिरा गांधी और इमरजेंसी का समर्थन किया था, जबकि CPI(M) ने इसका विरोध किया था और उनके कई नेता जेल भी गए थे। 1977 के विधानसभा चुनावों में लेफ्ट को बंगाल में भारी बहुमत मिला और यहीं से राज्य में कम्युनिस्टों के लंबे शासन की असली शुरुआत हुई। ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने और लगातार 2000 तक राज्य के सीएम रहे। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने राज्य में उद्योगों को लाने की कोशिश की। लेकिन सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि अधिग्रहण विवादों के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने 2011 में कम्युनिस्टों के 34 साल पुराने शासन को खत्म कर दिया। उस वक्त के सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य खुद अपना चुनाव हार गए। 90 के दशक में ज्योति बसु को 3 बार PM बनाने का मौका CBI के पूर्व डायरेक्टर अरुण प्रसाद मुखर्जी ने अपनी किताब ‘राजीव गांधी, ज्योति बसु, इंद्रजीत गुप्त के अनछुए पहलू’ में बताया है कि 1990 और 1991 के उथल-पुथल भरे दौर में राजीव गांधी चाहते थे कि ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बनें। पहली बार अक्टूबर 1990 में राजीव गांधी ने ज्योति बसु से

Tamil Nadu Election Result 2026 LIVE Updates: Assam Kerala Puducherry BJP DMK Congress UDF TVK Winner Candidates List

Tamil Nadu Election Result 2026 LIVE Updates: Assam Kerala Puducherry BJP DMK Congress UDF TVK Winner Candidates List

Hindi News National Tamil Nadu Election Result 2026 LIVE Updates: Assam Kerala Puducherry BJP DMK Congress UDF TVK Winner Candidates List | MK Stalin Vijay Himanta Biswa Sarma Gaurav Gogoi गुवाहाटी/तिरुवनंतपुरम/पुडुचेरी5 मिनट पहले कॉपी लिंक असम, तमिलनाडु, केरलम और पुडुचेरी विधानसभा चुनाव के नतीजे आज आ जाएंगे। वोटों की गिनती सुबह 8 बजे शुरू होगी। पहले डाक मत पत्र गिने जाएंगे, घंटेभर बाद खुलेंगी ईवीएम। नतीजों से पहले आए एग्जिट पोल्स में असम में फिर हिमंता सरकार बनने का अनुमान है। तमिलनाडु में DMK की वापसी के आसार हैं, तो केरलम में कांग्रेस की अगुआई वाले UDF को बढ़त है। पुडुचेरी में NDA गठबंधन की वापसी दिखाई दे रही है। काउंटिंग के रुझान और नतीजे दैनिक भास्कर एप पर Live टैली में देख सकते हैं, 4 राज्यों के चुनावी नतीजों से जुड़ी पल-पल की अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाएं… लाइव अपडेट्स 5 मिनट पहले कॉपी लिंक तमिनलाडु: चेन्नई में DMK मुख्यालय की सुरक्षा बढ़ी तमिलनाडु के चेन्नई में DMK मुख्यालय के बाहर सुरक्षा बढ़ाई गई है। आज तमिलनाडु विधानसभा चुनाव का रिजल्ट आना है। 11 मिनट पहले कॉपी लिंक तमिलनाडु: 10 एग्जिट पोल- 6 में DMK+ की वापसी संभव 15 मिनट पहले कॉपी लिंक तमिलनाडु में अब तक का सबसे ज्यादा मतदान तमिलनाडु की 234 सीटों पर 23 अप्रैल को वोटिंग हुई थी। इस बार अब तक का सबसे ज्यादा 85.10% मतदान हुआ। इससे पहले सबसे ज्यादा मतदान 2011 में 78.29% हुआ था। 16 मिनट पहले कॉपी लिंक 2026 में महिलाओं ने पुरुषों से 2% ज्यादा वोटिंग की इस चुनाव में वोट डालने में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा रही। कुल 2.52 करोड़ महिलाओं ने वोट डाला, जबकि पुरुषों की संख्या 2.35 करोड़ रही। महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों की तुलना में 2.1% ज्यादा दर्ज किया गया। 16 मिनट पहले कॉपी लिंक पिछली बार DMK को AIADMK से 6% ज्यादा वोट, सरकार बदली 1952 से अब तक तमिलनाडु में कांग्रेस, DMK, AIADMK की सरकार रही है। 1967 से DMK और AIADMK बारी-बारी से सत्ता में आती रहीं। हालांकि, 2011 से ट्रेंड बदला। 2011 और 2016 में लगातार दो बार AIADMK सत्ता में आई। 2021 में DMK ने वापसी की। वोट शेयर के लिहाज से देखें तो 2021 में DMK ने AIADMK से 5.7% ज्यादा वोट हासिल किए। 17 मिनट पहले कॉपी लिंक तमिलनाडु: भाजपा 46 साल में सिर्फ 2 बार 4-4 सीटें जीत पाई भाजपा तमिलनाडु में 1980 से चुनाव लड़ रही है, लेकिन अब तक 2001 और 2021 में उसे 4-4 सीटें ही मिल सकी हैं। यहां भाजपा AIADMK और PMK के साथ गठबंधन में है। 19 मिनट पहले कॉपी लिंक असम: 12 एग्जिट पोल- सभी में भाजपा की वापसी 19 मिनट पहले कॉपी लिंक असम के 26 जिलों में 80% से ज्यादा मतदान असम के 74 साल के इतिहास में इस बार सबसे ज्यादा 85.91% वोटिंग हुई। 35 जिलों में से 26 में 80% से ज्यादा मतदान हुआ। साउथ सलमारा मनकचर जिले में सबसे ज्यादा 95.56% और वेस्ट कार्बी आंगलॉन्ग में सबसे कम 75.25% वोटिंग हुई। 20 मिनट पहले कॉपी लिंक पिछले 3 चुनावों में महिलाओं ने पुरुषों से ज्यादा वोटिंग की असम में पिछले तीन चुनावों में महिलाओं का वोटिंग परसेंट पुरुषों से ज्यादा रहा है। महिलाओं ने 2016 में 1.69%, 2021 में 0.41% और 2016 में 1.56% ज्यादा वोट डाले। 21 मिनट पहले कॉपी लिंक भाजपा 10 साल से सत्ता में, वोट शेयर 48.03% बढ़ा 2011 में भाजपा को असम में सिर्फ 11.5% वोट मिले थे। 2021 में पार्टी का वोट शेयर 59.5% हो गया। यानी पिछले 10 साल में भाजपा का वोट शेयर करीब 48.03% बढ़ा, कांग्रेस का वोट शेयर करीब 10% गिर गया। 24 मिनट पहले कॉपी लिंक असम में 76 साल में 15 सीएम, 51 साल कांग्रेस सरकार असम में 76 साल में 15 मुख्यमंत्री बन चुके हैं। करीब 51 साल कांग्रेस के 10 मुख्यमंत्रियों ने सत्ता संभाली। 1978 में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। जनता पार्टी के गोलाप बोरबोरा पहले गैर-कांग्रेसी सीएम बने, लेकिन 2 साल बाद कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी। 2016 में पूरे नॉर्थ-ईस्ट में असम ऐसा राज्य बना, जहां बीजेपी ने पहली बार सरकार बनाई। सर्बानंद सोनोवाल सीएम बने। 2021 में लगातार दूसरी बार बीजेपी ने बहुमत हासिल किया। हिमंता बिस्व सरमा ने सत्ता संभाली। यहां कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ 6 पार्टियों से गठबंधन किया है। 25 मिनट पहले कॉपी लिंक केरलम के 8 एग्जिट पोल में से 7 में UDF सरकार 25 मिनट पहले कॉपी लिंक केरलम में पिछली बार से 4.27% ज्यादा वोटिंग केरलम में 39 साल बाद सबसे ज्यादा 78.27% वोटिंग हुई। इससे पहले 1987 में 80.54% वोटिंग हुई थी। 14 जिलों में से दो में 80% से ज्यादा और 10 जिलों में 70% से ज्यादा वोटिंग हुई। कोझिकोड में सबसे ज्यादा 81.32% और पथनमथिट्टा में सबसे कम 70.76% मतदान हुआ। राज्य की कुल 140 सीटों पर 9 अप्रैल को सिंगल फेज की वोटिंग में 2.6 करोड़ वोटर्स ने वोट दिया 28 मिनट पहले कॉपी लिंक पुरुषों के मुकाबले 5% ज्यादा महिलाओं ने वोट डाले केरलम में इस बार के चुनाव में पुरुषों की तुलना में 5% ज्यादा महिलाओं ने वोटिंग की। कुल मतदान 78.27% हुआ, जिसमें 75.01% वोटिंग पुरुष और 80.86% महिलाओं ने वोट किया। 29 मिनट पहले कॉपी लिंक LDF और UDF के वोट शेयर में 3-4% अंतर का ट्रेंड केरलम में LDF और UDF के वोट शेयर में लगभग 3-4% का अंतर रहता आया है। हालांकि 2011 की तुलना में 2021 में LDF के वोट शेयर में करीब 4% की गिरावट आई थी, फिर भी सरकार LDF की बनी थी। 30 मिनट पहले कॉपी लिंक पिनाराई विजयन लगातार 2 बार सीएम बनने वाले इकलौते राजनेता 1956 में केरलम के गठन के बाद से अब तक राज्य में 12 मुख्यमंत्री बन चुके हैं। इनमें से 6 सीएम लेफ्ट के रहे, जिन्होंने 39 साल सत्ता संभाली। वहीं, 4 सीएम कांग्रेस के बने, जिन्होंने 28 साल सरकार चलाई। CPI(M) के ई.के. नयनार सबसे लंबे समय तक 11 साल सीएम रहे। उन्होंने 3 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन लगातार कभी कुर्सी नहीं संभाली। यहां पी विजयन लगातार 2 बार सीएम बनने वाले इकलौते राजनेता हैं। 30 मिनट पहले कॉपी लिंक

Mamata Banerjee; West Bengal Election Result 2026 LIVE Update: BJP TMC Congress Winner Candidates List | Suvendu Adhikari Adhir Ranjan

Mamata Banerjee; West Bengal Election Result 2026 LIVE Update: BJP TMC Congress Winner Candidates List | Suvendu Adhikari Adhir Ranjan

12:41 AM4 मई 2026 कॉपी लिंक बंगाल चुनाव में 5 बड़े मुद्दे SIR में वोट कटना: पश्चिम बंगाल में कुल रजिस्टर्ड वोटर्स की संख्या 7.66 करोड़ थी। चुनाव से पहले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) हुआ, जिसमें 91 लाख नाम हटाए गए। अब वोटर्स की संख्या घटकर 6.75 करोड़ रह गई, यानी 11.8% की कमी। सुप्रीम कोर्ट ने SIR पर वोटर्स की आपत्तियां सुनने के लिए 19 ट्रिब्यूनल नियुक्त किए थे। पिछले महीने से, जब ये ट्रिब्यूनल बने, तब से उनके पास 34 लाख से ज्यादा अपीलें दायर की गईं। यह साफ नहीं है कि इनमें से कितनी अपीलें सुनी गईं। पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने 28 अप्रैल कहा कि उनके पास निपटाए गए मामलों का आंकड़ा नहीं है। अवैध घुसपैठियों का मुद्दा: 2021 के बंगाल चुनाव में 140 से अधिक सीटों पर जीत का अंतर 1000 से 5000 के बीच था। कई सीटों पर इस अंतर से ज्यादा वोट कट गए हैं। बीजेपी ने वोटर लिस्ट से हटाए गए करीब 91 लाख नामों को ‘अवैध घुसपैठियों’ और ‘ब्लैक वोट्स’ कहा। महिलाओं से जुड़ी योजनाएं: पिछले 3 चुनाव में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा वोट कर रही हैं। इस बार तो यह अंतर डेढ़ फीसदी तक बढ़ा है। जानकार इसकी वजह ममता सरकार की महिलाओं से जुड़ी 3 बड़ी योजनाएं- लक्ष्मीर भंडार, कन्याश्री और रूपश्री प्रकल्प को बताते हैं। भाजपा ने भी इस बार प्रधानमंत्री उज्जवला योजना, पीएम आवास योजना, शौचालय और महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाया। घोषणा पत्र में गरीब महिलाओं को हर महीने 3 हजार रुपए देने का वादा किया। महिला आरक्षण का मुद्दा: चुनाव से ठीक पहले सरकार संसद में परिसीमन से जुड़ा बिल लाई। टीएमसी ने इसका विरोध किया। इसके बाद PM मोदी से लेकर शाह और बाकी बड़े नेताओं ने हर रैली में कहा गढ़ा कि ममता महिलाओं को सत्ता में 33% हिस्सेदारी नहीं देना चाहती हैं। एंटी इनकंबेंसी: TMC 2011 के बाद लगातार 15 साल से सत्ता में है। उसके नेताओं पर राशन घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला जैसे आरोप लगे हैं। अगर भाजपा टीएमसी के वोट शेयर में 3 से 5% की सेंध लगा देती है, तो बढ़त ले लेगी।

जोरहाट में मौलिक की तैयारी पूरी: 4 मई को होगी गणना की गणना, सुरक्षा के लिए तैयारी

जोरहाट में मौलिक की तैयारी पूरी: 4 मई को होगी गणना की गणना, सुरक्षा के लिए तैयारी

त्वरित पढ़ें दिखाएँ एआई द्वारा उत्पन्न मुख्य बिंदु, न्यूज़ रूम द्वारा सत्यापित सीसीटीवी निगरानी, ​​वीवीपीएटी और मिलान मीडिया के लिए विशेष सुविधाएँ उपलब्ध हैं। असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों की घड़ी के करीब आते ही जोरहाट जिला प्रशासन ने प्राथमिक के लिए सभी दल पूरी तरह से कर ली हैं। जिला (डीसी) जय शिवानी ने बताया कि प्राथमिक सोमवार (4 मई, 2026) को सुबह 8:00 बजे से शुरू होगी। उन्होंने सिद्धांत दिया कि साधारण प्रक्रिया के लिए साधारण, सरल और सरल उपकरणों के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए गए हैं। उन्होंने कहा कि ज़ोराहाट इलेक्ट्रॉनिक्स जिले के अंतर्गत आने वाले चार विधानसभा क्षेत्र, जिनमें 99-टियोक, 100-जोरहाट, 101-मरियानी और 102-टीटाबोर शामिल हैं, इस महीने की शुरुआत में 9 अप्रैल को सहज से बाढ़ आ गई थी। वोटों की गिनती के लिए दो क्षेत्रीय केंद्र बनाए गए डीसी जय शिवानी ने कहा कि सोमवार (4 मई, 2026) को होने वाली वोटिंग गणना के लिए दो केंद्र बनाए गए हैं। इसमें पहला जोरहाट गर्ल्स एचएस और एमपी स्कूल है, जहां 99-टायोक विधानसभा क्षेत्र में आने वाले पोलिंग बूथों पर वोटों की गिनती होगी। जबकि दूसरा गिनती केंद्र जोरहाट बॉयज एचएस और एमपी स्कूल है, जहां 100-जोरहाट, 101-मरियानी और 102-टिटाबोर विधानसभा क्षेत्र के लिए प्राथमिक की जाएगी। यह भी पढ़ें: ‘200 से ज्यादा पारियां जीतेंगे’, ममता बनर्जी ने टीएमसी की जीत का दावा किया, एलेक्टिट पोल को बताया गलत वोट गिनती के लिए क्या-क्या की व्यवस्था है? अल्लाह शिवानी ने बताया कि तीन के लिए सभी स्थापित केंद्रों पर सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं। इसमें टियोक विधानसभा क्षेत्र – दो वोट गिनती हॉल, 17 स्टॉक टेबल, 4 पोस्टल बैलेट टेबल, कुल 15 राउंड। जोरहाट क्षेत्र – एक प्रारंभिक हॉल, 13 स्टॉक टेबल, 3 पोस्टल बैलेट टेबल, कुल 14 राउंड। मरियानी विधानसभा क्षेत्र – एक मातृभाषा हॉल, 14 संग्रहालय टेबल, 3 पोस्टल बैलेट टेबल, कुल 15 राउंड। तिताबोर विधानसभा क्षेत्र – दो माध्यमिक हॉल, 20 मठ टेबल, 3 पोस्टल बैलेट टेबल, कुल 13 राउंड। उन्होंने कहा कि गणित की हर दौर की गिनती पूरी होने के बाद नतीजों की घोषणा की जाएगी और मीडिया कक्ष उपलब्ध कराया जाएगा। सुरक्षा की दृष्टि से क्या किये गये हैं सुशील? उन्होंने आगे कहा कि मौलिक को सुरक्षित और व्यावहारिक से लेकर त्रि-स्तरीय व्यवस्था सुरक्षा लागू की गई है। पहला घेरा (100 मीटर मीटर): जिला पुलिस सुरक्षा, यह क्षेत्र पैदल क्षेत्र घोषित रहेगा और किसी भी तरह के वाहनों की अनुमति नहीं होगी। दूसरा घेरा (प्रवेश द्वार): राज्य सशस्त्र पुलिस द्वारा पर्यवेक्षण, जहां माइक्रोस्कोपी ली जाएगी। मोबाइल, लैपटॉप, कैमरा, मशीन, हथियार और अन्य प्रतिबंधित सामग्री को अंदर ले जाना पूरी तरह से अनुचित होगा। तीसरा घेरा (मतगणना हॉल): केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) द्वारा सुरक्षा, जहां अतिरिक्त जांच की जाएगी। इस दौरान केवल विशिष्ट पहचान पत्र या पास रखने वाले व्यक्तियों को ही प्रवेश की अनुमति होगी। क्या है प्रतिबंधात्मक आदेश? जिला जय शिवानी ने कहा कि जिस दिन टिकटों की गिनती होगी, उस दिन सुबह 6 बजे केंद्र के 100 मीटर के खंड में बीएनएसएस 2023 की धारा 163 लागू रहेगी। बिना अनुमति के किसी भी प्रकार की भीड़ या गतिविधि प्रतिबंधित रहेगी। वोट गिनती हॉल के अंदर फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी पर रोक रहेगी, हालांकि अधिकृत मीडिया वोटिंग को हैंडहेल्ड कैमरा ले जाने की सुविधा होगी। मित्र और पर्यवेक्षक उन्होंने कहा कि पूरी वोट गिनती प्रक्रिया की 100 प्रतिशत सीसीटीवी निगरानी और वीडियोग्राफी की जाएगी। केवल अधिकृत लेखांकन कंपनी को प्रवेश मिलेगा। हर टेबल पर माइक्रो-ऑब्जर्वर और इलेक्ट्रॉनिक्स कमीशन की तरफ से नियुक्त ऑब्जर्वर की निगरानी करेंगे। मसौदे की गिनती के बाद वीवीपैट पर्चियों का मिलान अनिवार्य रूप से किया जाएगा। मीडिया के लिए अन्य सुरक्षा उपकरण के अंदर एक विशेष मीडिया सेंटर स्थापित किया गया है, जहां एलईडी स्क्रीन, इंटरनेट और सार्वजनिक एड्रेस सिस्टम की सुविधा होगी। इसके अलावा, अन्य संरचनाओं पर बात करें, तो मेडिकल टीम और स्पीकर की व्यवस्था की गई है, फायर ब्रिगेड की आर्किटेक्चर होगी और बिजली के लिए डीजी सेट के माध्यम से आर्किटेक्चर की व्यवस्था भी की गई है। यह भी पढ़ें: बंगाल का ‘काउंटिंगबोट’ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, टीएमसी का खारिज, एआईयूडीएफ बोला- चुनाव आयोग पर अब भरोसा नहीं (टैग्सटूट्रांसलेट)असम विधानसभा चुनाव 2026(टी)जोरहाट(टी)असम(टी)हिमंत बिस्वा सरमा(टी)गौरव गोगोई(टी)बीजेपी(टी)कांग्रेस(टी)असम विधानसभा चुनाव 2026(टी)जोरहाट(टी)असम(टी)हिमंत बिस्वा सरमा(टी)गौरव गोगोई(टी)भाजपा(टी)कांग्रेस