Sunday, 23 Aug 2026 | 11:21 PM

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Indian Army BrahMos Missile Upgrade

Indian Army BrahMos Missile Upgrade

नई दिल्ली44 मिनट पहले कॉपी लिंक भारतीय सेना 800 किलोमीटर से ज्यादा रेंज वाली ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल खरीदने की तैयारी में है। फिलहाल सेना के पास 450 किलोमीटर तक मारक क्षमता वाली ब्रह्मोस मिसाइल मौजूद है। न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, रक्षा अधिकारियों ने बताया कि सेना इस नए वर्जन का बड़ा ऑर्डर देने की योजना बना रही है। इस प्रस्ताव को लेकर रक्षा मंत्रालय की उच्चस्तरीय बैठक में जल्द मंजूरी मिल सकती है। मई 2025 में भारत-पाकिस्तान जंग के दौरान ऑपरेशन सिंदूर में ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल किया गया था। भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान एयरफोर्स के कई ठिकानों को निशाना बनाया था। मिसाइल फोर्स और ड्रोन पर बढ़ रहा फोकस रक्षा बल एक समर्पित मिसाइल फोर्स बनाने और मिसाइलों की संख्या बढ़ाने पर काम कर रहे हैं। सेना अपने वर्कशॉप में ड्रोन का बड़े पैमाने पर निर्माण भी कर रही है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष ने लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों की अहमियत को और बढ़ा दिया है। नई पीढ़ी के युद्ध को देखते हुए सेना बड़े पैमाने पर ड्रोन और मिसाइल शामिल कर रही है। इसके तहत आर्टिलरी और इन्फैंट्री यूनिट्स में विशेष ड्रोन रेजिमेंट और प्लाटून बनाए जा रहे हैं। भारत-रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है ब्रह्मोस ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल भारत और रूस का संयुक्त प्रोजेक्ट है, जिसका अधिकांश हिस्सा अब स्वदेशी हो चुका है। यह मिसाइल तीनों सेनाओं के पास है और इसे हवा, समुद्र और जमीन से हमले के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ब्रह्मोस को भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और रूस के फेडरल स्टेट यूनिटरी इंटरप्राइज NPOM के बीच साझा समझौते के तहत विकसित किया गया है। ब्रह्मोस एक मध्यम श्रेणी की स्टील्थ रैमजेट सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है। इस मिसाइल को जहाज, पनडुब्बी, एयरक्राफ्ट या फिर धरती से लॉन्च किया जा सकता है। रक्षा विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, ब्रह्मोस का नाम भगवान ब्रह्मा के ताकतवर शस्त्र ब्रह्मास्त्र के नाम पर दिया गया। हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में ये भी दावा किया गया है कि इस मिसाइल का नाम दो नदियों भारत की ब्रह्मपुत्र और रूस की मोस्कवा नदी के नाम पर रखा गया है। ऐसा माना जाता है कि ये एंटी-शिप क्रूज मिसाइल के रूप में दुनिया में सबसे तेज है। ————— ये खबर भी पढ़ें… भारत बना रहा बेबी ब्रह्मोस, 20 गुना कम कीमत:भविष्य की जंग की तैयारी, सुरक्षा का नया फॉर्मूला सेना का फोकस अब केवल महंगी मिसाइलों पर नहीं, बल्कि इनके ‘मिनी मॉडल्स’ के बड़े भंडार पर है। हाल ही में पिनाका रॉकेट सिस्टम के ‘हवाई संस्करण’ के परीक्षण को इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। दरअसल, ब्रह्मोस जैसी अचूक सटीकता और मारक क्षमता के कारण इसे ‘बेबी ब्रह्मोस’ भी कहा जा रहा है। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

लैब में आर्टिफिशियल स्किन और कॉर्निया होंगी तैयार:एम्स भोपाल में एआई और इंटीग्रेटिव मेडिसिन पर फोकस

लैब में आर्टिफिशियल स्किन और कॉर्निया होंगी तैयार:एम्स भोपाल में एआई और इंटीग्रेटिव मेडिसिन पर फोकस

गंभीर बीमारियों के इलाज में अब बड़ा बदलाव आने के संकेत मिल रहे हैं। एक ओर डीआरडीओ की लैब में आर्टिफिशियल स्किन और कॉर्निया तैयार करने पर तेजी से काम चल रहा है, वहीं एम्स भोपाल में इंटीग्रेटिव मेडिसिन और एडवांस ट्रीटमेंट मॉडल पर रिसर्च इसे जमीन पर उतारने की दिशा में बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह तकनीक क्लिनिकल स्तर पर सफल होती है, तो बर्न केस, गंभीर घाव और आंखों की रोशनी खो चुके मरीजों के इलाज में बड़ा सुधार देखने को मिलेगा। इससे अंगों की कमी से जूझ रहे हजारों मरीजों को नई उम्मीद मिल सकती है। एम्स में आोजित कार्यक्रम के दौरान रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की लैब में आर्टिफिशियल स्किन, बोन और कॉर्निया तैयार करने पर काम तेज हो गया है। इसमें पशुओं के कोलेजन का उपयोग किया जा रहा है। बर्न केस में सबसे बड़ी समस्या स्किन ग्राफ्ट की कमी होती है, जिससे मरीजों में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। आर्टिफिशियल स्किन इस चुनौती को काफी हद तक कम कर सकती है। वहीं, कॉर्निया की कमी से जूझ रहे मरीजों के लिए यह तकनीक नई रोशनी साबित हो सकती है। एम्स भोपाल में एआई और इंटीग्रेटिव मेडिसिन पर फोकस एम्स भोपाल में चिकित्सा शिक्षा और नवाचार को बढ़ावा देते हुए नेशनल एकेडमी ऑफ मेडिकल साइंसेज (एनएएमएस) के सहयोग से अंग प्रत्यारोपण और स्वास्थ्य सेवाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर पहली रीजनल सीएमई आयोजित की गई। इस कार्यक्रम में देशभर से आए विशेषज्ञों ने बताया कि भविष्य में आर्टिफिशियल ऑर्गन और इंटीग्रेटिव मेडिसिन मिलकर इलाज को अधिक प्रभावी बनाएंगे। स्वास्थ्य सूत्रों के अनुसार, एम्स भोपाल जैसे संस्थान आने वाले समय में इन तकनीकों के ट्रायल और क्लिनिकल उपयोग के प्रमुख केंद्र बन सकते हैं। अंगों की कमी के बीच नई उम्मीद भारत में हर साल हजारों मरीज अंगों की कमी के कारण समय पर इलाज नहीं करा पाते। ऐसे में आर्टिफिशियल स्किन और कॉर्निया जैसी तकनीकें गेम-चेंजर साबित हो सकती हैं। इससे न केवल इलाज की उपलब्धता बढ़ेगी, बल्कि मरीजों के ठीक होने की संभावना भी बेहतर होगी। ट्रांसप्लांट को-ऑर्डिनेटर की अहम भूमिका अंगदान और प्रत्यारोपण की पूरी प्रक्रिया में ट्रांसप्लांट को-ऑर्डिनेटर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। वे मरीजों के परिजनों को संवेदनशील तरीके से समझाते हैं, उनकी सहमति सुनिश्चित करते हैं और पूरी प्रक्रिया को सुचारू रूप से संचालित करते हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखते हैं कि अंगदान के बाद पार्थिव शरीर पूरे सम्मान के साथ परिवार को सौंपा जाए। अंगदान का एक प्रेरणादायक पहलू सेना से जुड़ा अंगदान को लेकर लोगों में कई तरह की आशंकाएं रहती हैं, लेकिन विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि यह पूरी तरह कानूनी और पारदर्शी प्रक्रिया है। इसमें किसी भी तरह का दबाव या जबरदस्ती नहीं होती। अंगदान का एक प्रेरणादायक पहलू सेना से जुड़ा भी सामने आया है, जहां शहीद सैनिकों के परिजनों ने अंगदान कर कई लोगों को नई जिंदगी दी। इन उदाहरणों ने अंगदान को चिकित्सा से आगे बढ़ाकर राष्ट्रसेवा से जोड़ दिया है।