sunil pal react on huiliation claims on kapil sharma show, after samay raina jokes about his bad breath

3 मिनट पहले कॉपी लिंक इंडियाज गॉट लेटेंट कंट्रोवर्सी के बाद समय रैना और शो की जमकर निंदा करने के बाद कॉमेडियन सुनील पाल हाल ही में द ग्रेट इंडियन कपिल शो में पहुंचे, जहां समय रैना बतौर गेस्ट पहुंचे थे। शो में समय रैना ने सुनील पाल पर कई जोक्स किए और एक बार तो ये तक कह दिया कि आप ब्रश क्यों नहीं करते। इसके अलावा समय ने ये भी कहा कि उन्होंने सुनील पाल के सोशल मीडिया में कमेंट में पड़ने वाली गालियों से ही गाली सीखी है। शो के क्लिप्स सामने आने के बाद कई फैंस ने भी इसे सीनियर कॉमेडियन की बेइज्जती कहा। हालांकि अब सुनील पाल ने कहा है कि उन्हें इस पर कोई नाराजगी नहीं है। बेइज्जती होने के दावे को खारिज करते हुए सुनील पाल ने हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा है, ‘मैं उसको बेइज्जती नहीं मानता हूं क्योंकि वो कॉमेडी शओ है और कमेडी शो में टांग खिंचाई होती रहती है। अगर सामने आ जाए कोई तो ऐसे मारने काटने तो नहीं दोड़ेंगे, ऐसा तो कोई मन मुटाव नहीं है।’ आगे सुनील पाल ने कहा, ‘लोग एक-दूसरे पर जोक्स बनाते हैं। मैंने उस पर पंचलाइन बनाई और उसने भी वही किया। अगर कोई सीरियस सब्जेक्ट होता या ये कोई सीरियस शो होता, हमें शिकायत करने का हक भी होता। यहां तक कि शाहरुख खान जैसे भी ऐसे शोज में मजाक का मुद्दा बन जाते हैं। तो मुझे कोई शिकायत नहीं है।’ बता दें कि हाल ही में समय रैना और रणवीर अलाहाबादिया, द ग्रेट इंडियन कपिल शो में पहुंचे थे। शो के एक सेगमेंट में सुनील पाल को भी बुलाया गया था। सुनील के आते ही कपिल शर्मा ने कहा, ये जब भी आते हैं तो कहते हैं, मैं सुनील पाल, कॉमेडी का लाल और यह समय को कॉमेडी का आतंकवादी कहते हैं। ऐसा कौन सा आपने इनको मुंह से ग्रेनेड फेंकते देखा लिया है? कुछ विचार व्यक्त करें। इस पर सुनील पाल ने कहा, ‘कपिल भाई, अगर ये मुंह से ग्रेनेड मार देते तो अच्छा था, लेकिन जो ये मारते हैं वो सहा नहीं जाता। जो समझ में नहीं आता वो समाज में नहीं आता और जो समाज में नहीं आता, वो तो आतंकवादी ही होता है ना?’ जवाब देते हुए समय ने कहा, ‘इनको मुझसे इतनी ही दिक्कत है कि मैं क्या कहूं, मुंह से ग्रेनेड मारता हूं, मैं क्या बोलूं, बताइए जो भी दिक्कत है।’ समय ने आगे कहा, ‘मैं मेले में परफॉर्म नहीं करता हूं, मैं उल्टी-सीधी बातें करता हूं। मुझे आपसे कोई दिक्कत नहीं सर, बस एक ही है, आप ब्रश क्यों नहीं करते हो यार?’ इसके बाद सुनील ने भी उसी लहजे में जवाब देते हुए कहा कि ब्रश करने का जमाना चला गया, मैं पॉलिश करके आया हूं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
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25 मिनट पहले कॉपी लिंक इंडियाज गॉट लेटेंट कंट्रोवर्सी के बाद समय रैना और शो की जमकर निंदा करने के बाद कॉमेडियन सुनील पाल हाल ही में द ग्रेट इंडियन कपिल शो में पहुंचे, जहां समय रैना बतौर गेस्ट पहुंचे थे। शो में समय रैना ने सुनील पाल पर कई जोक्स किए और एक बार तो ये तक कह दिया कि आप ब्रश क्यों नहीं करते। इसके अलावा समय ने ये भी कहा कि उन्होंने सुनील पाल के सोशल मीडिया में कमेंट में पड़ने वाली गालियों से ही गाली सीखी है। शो के क्लिप्स सामने आने के बाद कई फैंस ने भी इसे सीनियर कॉमेडियन की बेइज्जती कहा। हालांकि अब सुनील पाल ने कहा है कि उन्हें इस पर कोई नाराजगी नहीं है। बेइज्जती होने के दावे को खारिज करते हुए सुनील पाल ने हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा है, ‘मैं उसको बेइज्जती नहीं मानता हूं क्योंकि वो कॉमेडी शओ है और कमेडी शो में टांग खिंचाई होती रहती है। अगर सामने आ जाए कोई तो ऐसे मारने काटने तो नहीं दोड़ेंगे, ऐसा तो कोई मन मुटाव नहीं है।’ आगे सुनील पाल ने कहा, ‘लोग एक-दूसरे पर जोक्स बनाते हैं। मैंने उस पर पंचलाइन बनाई और उसने भी वही किया। अगर कोई सीरियस सब्जेक्ट होता या ये कोई सीरियस शो होता, हमें शिकायत करने का हक भी होता। यहां तक कि शाहरुख खान जैसे भी ऐसे शोज में मजाक का मुद्दा बन जाते हैं। तो मुझे कोई शिकायत नहीं है।’ बता दें कि हाल ही में समय रैना और रणवीर अलाहाबादिया, द ग्रेट इंडियन कपिल शो में पहुंचे थे। शो के एक सेगमेंट में सुनील पाल को भी बुलाया गया था। सुनील के आते ही कपिल शर्मा ने कहा, ये जब भी आते हैं तो कहते हैं, मैं सुनील पाल, कॉमेडी का लाल और यह समय को कॉमेडी का आतंकवादी कहते हैं। ऐसा कौन सा आपने इनको मुंह से ग्रेनेड फेंकते देखा लिया है? कुछ विचार व्यक्त करें। इस पर सुनील पाल ने कहा, ‘कपिल भाई, अगर ये मुंह से ग्रेनेड मार देते तो अच्छा था, लेकिन जो ये मारते हैं वो सहा नहीं जाता। जो समझ में नहीं आता वो समाज में नहीं आता और जो समाज में नहीं आता, वो तो आतंकवादी ही होता है ना?’ जवाब देते हुए समय ने कहा, ‘इनको मुझसे इतनी ही दिक्कत है कि मैं क्या कहूं, मुंह से ग्रेनेड मारता हूं, मैं क्या बोलूं, बताइए जो भी दिक्कत है।’ समय ने आगे कहा, ‘मैं मेले में परफॉर्म नहीं करता हूं, मैं उल्टी-सीधी बातें करता हूं। मुझे आपसे कोई दिक्कत नहीं सर, बस एक ही है, आप ब्रश क्यों नहीं करते हो यार?’ इसके बाद सुनील ने भी उसी लहजे में जवाब देते हुए कहा कि ब्रश करने का जमाना चला गया, मैं पॉलिश करके आया हूं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
अप्रैल में रसोई गैस की डिमांड 16% घटी:जेट फ्यूल की मांग भी कम हुई, अमेरिकी-इजराइल और ईरान जंग का असर

भारत में कुकिंग गैस (LPG) की मांग में अप्रैल में गिरावट आई है। अमेरिकी-इजराइल और ईरान में जारी संघर्ष और तनाव के कारण सप्लाई बाधित हुई है, जिसका सीधा असर भारतीय रसोई और कमर्शियल सेक्टर पर पड़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल में LPG की खपत 16.16% कम होकर 2.2 मिलियन टन रह गई है, जबकि पिछले साल इसी महीने में यह 2.62 मिलियन टन थी। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के डेटा के अनुसार, मार्च महीने (2.379 मिलियन टन) के मुकाबले भी अप्रैल में गैस की बिक्री में कमी आई है। सप्लाई कम होने के चलते सरकार को होटलों और इंडस्ट्रीज के लिए दी जाने वाली कमर्शियल सप्लाई में कटौती करनी पड़ी है ताकि घरों में रसोई गैस की कमी न हो। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से सप्लाई रुकी भारत अपनी जरूरत का करीब 60% LPG आयात करता है। इसका बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते भारत आता है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और अमेरिकी हमलों के बाद यह समुद्री रास्ता लगभग बंद हो गया है। घरों में दो रिफिल के बीच समय बढ़ाया गया इससे पहले सरकार ने घरेलू सिलेंडर की बुकिंग के लिए 25 दिन का लॉक-इन पीरियड किया था (यानी एक सिलेंडर मिलने के 21 दिन बाद ही दूसरा बुक होगा)। वहीं ग्रामीण इलाकों के लिए सिलेंडर बुकिंग का गैप बढ़ाकर 45 दिन किया गया। 1 मई को कॉमर्शियल सिलेंडर 994 रुपए तक महंगा किया इससे पहले 1 मई को कॉमर्शियल सिलेंडर 994 रुपए तक महंगा हो गया था। दिल्ली में ये 3071.50 रुपए में मिल रहा है। 5 किलो वाले फ्री ट्रेड एलपीजी (FTL) सिलेंडर की कीमतों में 261 रुपए का इजाफा किया गया था। इस बढ़ोतरी के बाद अब ‘छोटू’ सिलेंडर की रिफिल कीमत 813.50 रुपए हो गई है। हवाई ईंधन (ATF) की मांग में भी गिरावट खाड़ी देशों में युद्ध जैसे हालात के कारण कई देशों ने अपना एयरस्पेस (हवाई क्षेत्र) बंद कर दिया था। इसकी वजह से कई अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द हुईं या उनके रूट बदले गए। इसका सीधा असर एयर टर्बाइन फ्यूल (ATF) यानी जेट फ्यूल की खपत पर पड़ा। अप्रैल में जेट फ्यूल की मांग 1.37% गिरकर 761,000 टन रह गई, जो मार्च में 807,000 टन थी। डीजल-पेट्रोल मांग भी बढ़ी अप्रैल में डीजल की बिक्री में मामूली 0.25% की ही बढ़त हुई और यह 8.282 मिलियन टन रही। मार्च में डीजल की डिमांड 8.1% की रफ्तार से बढ़ी थी। वहीं, पेट्रोल की बिक्री में अप्रैल में 6.36% की ग्रोथ देखी गई, जो मार्च की 7.6% ग्रोथ से कम है।
Sabarimala Reference Women Entry LIVE Update; Muslim Dawoodi Bohra Parsi – Supreme Court

Hindi News National Sabarimala Reference Women Entry LIVE Update; Muslim Dawoodi Bohra Parsi Supreme Court | CJI Surya Kant नई दिल्ली11 मिनट पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (जनहित याचिका) अब प्राइवेट इंटरेस्ट और पब्लिसिटी इंटरेस्ट, पैसा इंटरेस्ट लिटिगेशन और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन बन गई हैं। यह कमेंट नौ जजों की संविधान बेंच ने केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान किया। कोर्ट ने इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन के 2006 के PIL के मकसद पर सवाल उठाया, जिसमें केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि PIL कानून की प्रोसेस का गलत इस्तेमाल है और एसोसिएशन को ऐसी PIL फाइल करने के बजाय बार और अपने युवा सदस्यों की भलाई के लिए काम करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक जगहों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और अलग-अलग धर्मों में धार्मिक आजादी के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर 11वें दिन की सुनवाई चल रही है। सितंबर 2018 में 5 जजों की संविधान बेंच ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए सबरीमाला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। तब कोर्ट ने कहा था कि सदियों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा गैर-कानूनी और असंवैधानिक है। जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के कमेंट एसोसिएशन के वकील ने दलील दी कि PIL जून 2006 में छपे चार अखबारों के आर्टिकल पर आधारित थी। इस पर CJI ने कहा- इसे सीधे खारिज कर देना चाहिए था। यह आर्टिकल जनहित याचिका फाइल करने का कारण कैसे बताता है। PIL फाइल करने के लिए आर्टिकल लिखवाना आसान है। पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन अब प्राइवेट इंटरेस्ट लिटिगेशन, पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन, पैसा इंटरेस्ट लिटिगेशन और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन बन गई हैं। सभी को PIL कहा जाता है, लेकिन हम सिर्फ असली PIL पर ही सुनवाई करते हैं। CJI को रोज सैकड़ों चिट्ठियां मिलती हैं, जिनमें सवाल किया जाता है कि क्या उन सभी को PIL में बदला जा सकता है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Sabarimala Reference Women Entry LIVE Update; Muslim Dawoodi Bohra Parsi – Supreme Court

Hindi News National Sabarimala Reference Women Entry LIVE Update; Muslim Dawoodi Bohra Parsi Supreme Court | CJI Surya Kant नई दिल्ली32 मिनट पहले कॉपी लिंक सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (जनहित याचिका) अब प्राइवेट इंटरेस्ट और पब्लिसिटी इंटरेस्ट, पैसा इंटरेस्ट लिटिगेशन और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन बन गई हैं। यह कमेंट नौ जजों की संविधान बेंच ने केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान किया। कोर्ट ने इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन के 2006 के PIL के मकसद पर सवाल उठाया, जिसमें केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि PIL कानून की प्रोसेस का गलत इस्तेमाल है और एसोसिएशन को ऐसी PIL फाइल करने के बजाय बार और अपने युवा सदस्यों की भलाई के लिए काम करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में धार्मिक जगहों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और अलग-अलग धर्मों में धार्मिक आजादी के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर 11वें दिन की सुनवाई चल रही है। सितंबर 2018 में 5 जजों की संविधान बेंच ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए सबरीमाला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। तब कोर्ट ने कहा था कि सदियों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा गैर-कानूनी और असंवैधानिक है। जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के कमेंट एसोसिएशन के वकील ने दलील दी कि PIL जून 2006 में छपे चार अखबारों के आर्टिकल पर आधारित थी। इस पर CJI ने कहा- इसे सीधे खारिज कर देना चाहिए था। यह आर्टिकल जनहित याचिका फाइल करने का कारण कैसे बताता है। PIL फाइल करने के लिए आर्टिकल लिखवाना आसान है। पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन अब प्राइवेट इंटरेस्ट लिटिगेशन, पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन, पैसा इंटरेस्ट लिटिगेशन और पॉलिटिकल इंटरेस्ट लिटिगेशन बन गई हैं। सभी को PIL कहा जाता है, लेकिन हम सिर्फ असली PIL पर ही सुनवाई करते हैं। CJI को रोज सैकड़ों चिट्ठियां मिलती हैं, जिनमें सवाल किया जाता है कि क्या उन सभी को PIL में बदला जा सकता है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
Donald Trump Presidency Plan Video; White House Speech

वॉशिंगटन डीसी8 मिनट पहले कॉपी लिंक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर से राष्ट्रपति बनने की इच्छा जताई है। व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने कहा कि वे 8-9 साल बाद पद छोड़ेंगे। यह सुनकर वहां मौजूद लोग हंसने लगे तो ट्रम्प ने कहा कि वह मजाक नहीं कर रहे। उन्हें काम करना पसंद है। ट्रम्प ने यह भी कहा कि अभी उनके कार्यकाल की शुरुआत ही है और बहुत काम बाकी है। ट्रम्प अगले महीने 80 साल के हो जाएंगे। उन्होंने अपनी उम्र को लेकर भी मजाक किया। उन्होंने कहा, “मैं बुजुर्ग नहीं हूं; मैं बुजुर्ग से कहीं ज्यादा जवान हूं। मुझे आज भी वैसा ही महसूस होता है जैसा 50 साल पहले होता था।” इससे पहले भी ट्रम्प कई बार तीसरे टर्म का संकेत दे चुके हैं। ट्रम्प को तीसरी बार राष्ट्रपति बनाने का बिल पेश, फिर आगे नहीं बढ़ पाया इससे पहले एंडी ओगल्स ने 23 जनवरी 2025 को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में एक बिल पेश किया था। इस बिल का मकसद अमेरिकी संविधान में बदलाव करके डोनाल्ड ट्रम्प के लिए तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता खोलना था। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि जो व्यक्ति लगातार दो बार राष्ट्रपति नहीं रहा है, वह तीसरी बार चुनाव लड़ सके। चूंकि ट्रम्प 2020 में चुनाव हार गए थे, इसलिए इस बदलाव के बाद वे फिर से राष्ट्रपति बनने के लिए योग्य हो सकते थे। हालांकि यह बिल आगे नहीं बढ़ पाया और हाउस में वोटिंग तक भी नहीं पहुंच सका। दरअसल, अमेरिका में संविधान बदलना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए हाउस और सीनेट दोनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है। मौजूदा हालात में रिपब्लिकन पार्टी के पास इतना बहुमत नहीं है। इसके अलावा, ऐसे बदलाव को लागू करने के लिए 50 में से कम से कम 38 राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होती है। अभी कई राज्यों में विपक्षी डेमोक्रेट पार्टी की सरकार है, इसलिए इस तरह का प्रस्ताव पास होना बहुत मुश्किल माना जाता है। 73 साल पहले 2 बार राष्ट्रपति बनने का नियम बना अमेरिका में पहले किसी व्यक्ति के सिर्फ 2 ही बार राष्ट्रपति बनने को लेकर कोई प्रावधान नहीं था। 1951 में संविधान में 22 संशोधन किया गया। इसके तहत ये नियम बनाया गया कि अमेरिका में कोई शख्स सिर्फ 2 बार ही राष्ट्रपति बन सकता है। दरअसल, अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने दो टर्म के बाद रिटायरमेंट ले लिया था। उसके बाद से राष्ट्रपति के दो टर्म से ज्यादा सेवाएं न देने का अनौपचारिक नियम ही बन गया। इसके बाद अमेरिका में यह प्रथा बन गई। 31 अमेरिकी राष्ट्रपतियों में से किसी भी राष्ट्रपति ने इस प्रथा को नहीं तोड़ा, लेकिन फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट के दौर में यह नियम टूट गया। वे 1933 से 1945 चार बार राष्ट्रपति चुनकर आए। क्या ट्रम्प संविधान बदल सकते हैं? ट्रम्प को तीसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव के लिए उतरना है तो उन्हें अमेरिकी संविधान में बदलाव करना होगा, जो इतना आसान नहीं है। ट्रम्प को इसके लिए अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव दोनों में दो-तिहाई बहुमत से एक बिल पास कराना होगा। ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास दोनों सदनों में इतने सदस्य नहीं हैं। सीनेट में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास 100 में से 52 सीनेटर है। वहीं, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में 435 में से 220 सदस्य हैं। ये संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो तिहाई यानी 67% बहुमत से काफी कम है। अगर ट्रम्प ये बहुमत हासिल कर लेते हैं तब भी उनके लिए संविधान में संशोधन करना इतना आसान नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों से बिल पास होने के बाद इस संशोधन के लिए राज्यों से मंजूरी लेनी होती है। इसके लिए तीन चौथाई राज्यों का बहुमत मिलन के बाद ही संविधान में संशोधन हो सकता है। यानी 50 अमेरिकी राज्यों में से अगर 38 संविधान में बदलाव के लिए राजी हो जाए तो ही नियम बदल सकते हैं। पुतिन की स्ट्रैटजी अपना सकते हैं ट्रम्प ट्रम्प खुद भी कई बार कह चुके हैं कि वो दो कार्यकाल के बाद भी सत्ता में बने रहना चाहते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ट्रम्प को तीसरा कार्यकाल नहीं मिलता तो वे सत्ता में बने रहने के लिए दूसरे तरीके अपना सकते हैं। हैमिल्टन कॉलेज के प्रोफेसर फिलिप क्लिंकनर ने मुताबिक ट्रम्प 2028 में उपराष्ट्रपति बन सकते हैं और जेडी वेंस या किसी और को नाममात्र का राष्ट्रपति बना सकते हैं। ऐसा ही कुछ पुतिन ने रूस में किया था। इसके अलावा वो अपने परिवार के किसी सदस्य को राष्ट्रपति बना सकते हैं, ताकि पर्दे के पीछे से सरकार पर उनका कंट्रोल बना रहे। पुतिन 2000 से 2008 तक लगातार 2 बार रूस के राष्ट्रपति रह चुके थे। रूस के संविधान के मुताबिक वे लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे। ऐसे में उन्होंने अपने खास दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बना दिया था। इस दौरान पुतिन उपराष्ट्रपति के पद पर रहे थे। ———————— यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प के बाद कौन संभालेगा अमेरिका: पहले उपराष्ट्रपति वेंस आगे थे, वेनेजुएला पर हमले के बाद विदेश मंत्री रूबियो का रुतबा बढ़ा अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के अगले अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं अचानक काफी बढ़ गई हैं। ब्रिटिश अखबार द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह वेनेजुएला पर की गई अमेरिकी कार्रवाई है। अमेरिकी सेना ने 3 जनवरी की रात वेनेजुएला पर हमला किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा कर अमेरिका लेकर आ गए। यह मिलिट्री एक्शन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मंजूरी से हुआ। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
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वॉशिंगटन डीसी1 घंटे पहले कॉपी लिंक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर से राष्ट्रपति बनने की इच्छा जताई है। व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रम्प ने कहा कि वे 8-9 साल बाद पद छोड़ेंगे। यह सुनकर वहां मौजूद लोग हंसने लगे तो ट्रम्प ने कहा कि वह मजाक नहीं कर रहे। उन्हें काम करना पसंद है। ट्रम्प ने यह भी कहा कि अभी उनके कार्यकाल की शुरुआत ही है और बहुत काम बाकी है। ट्रम्प अगले महीने 80 साल के हो जाएंगे। उन्होंने अपनी उम्र को लेकर भी मजाक किया। उन्होंने कहा, “मैं बुजुर्ग नहीं हूं; मैं बुजुर्ग से कहीं ज्यादा जवान हूं। मुझे आज भी वैसा ही महसूस होता है जैसा 50 साल पहले होता था।” इससे पहले भी ट्रम्प कई बार तीसरे टर्म का संकेत दे चुके हैं। ट्रम्प को तीसरी बार राष्ट्रपति बनाने का बिल पेश, फिर आगे नहीं बढ़ पाया इससे पहले एंडी ओगल्स ने 23 जनवरी 2025 को हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में एक बिल पेश किया था। इस बिल का मकसद अमेरिकी संविधान में बदलाव करके डोनाल्ड ट्रम्प के लिए तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का रास्ता खोलना था। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि जो व्यक्ति लगातार दो बार राष्ट्रपति नहीं रहा है, वह तीसरी बार चुनाव लड़ सके। चूंकि ट्रम्प 2020 में चुनाव हार गए थे, इसलिए इस बदलाव के बाद वे फिर से राष्ट्रपति बनने के लिए योग्य हो सकते थे। हालांकि यह बिल आगे नहीं बढ़ पाया और हाउस में वोटिंग तक भी नहीं पहुंच सका। दरअसल, अमेरिका में संविधान बदलना बहुत मुश्किल होता है। इसके लिए हाउस और सीनेट दोनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए होता है। मौजूदा हालात में रिपब्लिकन पार्टी के पास इतना बहुमत नहीं है। इसके अलावा, ऐसे बदलाव को लागू करने के लिए 50 में से कम से कम 38 राज्यों की मंजूरी भी जरूरी होती है। अभी कई राज्यों में विपक्षी डेमोक्रेट पार्टी की सरकार है, इसलिए इस तरह का प्रस्ताव पास होना बहुत मुश्किल माना जाता है। 73 साल पहले 2 बार राष्ट्रपति बनने का नियम बना अमेरिका में पहले किसी व्यक्ति के सिर्फ 2 ही बार राष्ट्रपति बनने को लेकर कोई प्रावधान नहीं था। 1951 में संविधान में 22 संशोधन किया गया। इसके तहत ये नियम बनाया गया कि अमेरिका में कोई शख्स सिर्फ 2 बार ही राष्ट्रपति बन सकता है। दरअसल, अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वॉशिंगटन ने दो टर्म के बाद रिटायरमेंट ले लिया था। उसके बाद से राष्ट्रपति के दो टर्म से ज्यादा सेवाएं न देने का अनौपचारिक नियम ही बन गया। इसके बाद अमेरिका में यह प्रथा बन गई। 31 अमेरिकी राष्ट्रपतियों में से किसी भी राष्ट्रपति ने इस प्रथा को नहीं तोड़ा, लेकिन फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट के दौर में यह नियम टूट गया। वे 1933 से 1945 चार बार राष्ट्रपति चुनकर आए। क्या ट्रम्प संविधान बदल सकते हैं? ट्रम्प को तीसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव के लिए उतरना है तो उन्हें अमेरिकी संविधान में बदलाव करना होगा, जो इतना आसान नहीं है। ट्रम्प को इसके लिए अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव दोनों में दो-तिहाई बहुमत से एक बिल पास कराना होगा। ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास दोनों सदनों में इतने सदस्य नहीं हैं। सीनेट में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के पास 100 में से 52 सीनेटर है। वहीं, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में 435 में से 220 सदस्य हैं। ये संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो तिहाई यानी 67% बहुमत से काफी कम है। अगर ट्रम्प ये बहुमत हासिल कर लेते हैं तब भी उनके लिए संविधान में संशोधन करना इतना आसान नहीं होगा। अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों से बिल पास होने के बाद इस संशोधन के लिए राज्यों से मंजूरी लेनी होती है। इसके लिए तीन चौथाई राज्यों का बहुमत मिलन के बाद ही संविधान में संशोधन हो सकता है। यानी 50 अमेरिकी राज्यों में से अगर 38 संविधान में बदलाव के लिए राजी हो जाए तो ही नियम बदल सकते हैं। पुतिन की स्ट्रैटजी अपना सकते हैं ट्रम्प ट्रम्प खुद भी कई बार कह चुके हैं कि वो दो कार्यकाल के बाद भी सत्ता में बने रहना चाहते हैं। हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर ट्रम्प को तीसरा कार्यकाल नहीं मिलता तो वे सत्ता में बने रहने के लिए दूसरे तरीके अपना सकते हैं। हैमिल्टन कॉलेज के प्रोफेसर फिलिप क्लिंकनर ने मुताबिक ट्रम्प 2028 में उपराष्ट्रपति बन सकते हैं और जेडी वेंस या किसी और को नाममात्र का राष्ट्रपति बना सकते हैं। ऐसा ही कुछ पुतिन ने रूस में किया था। इसके अलावा वो अपने परिवार के किसी सदस्य को राष्ट्रपति बना सकते हैं, ताकि पर्दे के पीछे से सरकार पर उनका कंट्रोल बना रहे। पुतिन 2000 से 2008 तक लगातार 2 बार रूस के राष्ट्रपति रह चुके थे। रूस के संविधान के मुताबिक वे लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे। ऐसे में उन्होंने अपने खास दिमित्री मेदवेदेव को राष्ट्रपति बना दिया था। इस दौरान पुतिन उपराष्ट्रपति के पद पर रहे थे। ———————— यह खबर भी पढ़ें… ट्रम्प के बाद कौन संभालेगा अमेरिका: पहले उपराष्ट्रपति वेंस आगे थे, वेनेजुएला पर हमले के बाद विदेश मंत्री रूबियो का रुतबा बढ़ा अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के अगले अमेरिकी राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं अचानक काफी बढ़ गई हैं। ब्रिटिश अखबार द इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह वेनेजुएला पर की गई अमेरिकी कार्रवाई है। अमेरिकी सेना ने 3 जनवरी की रात वेनेजुएला पर हमला किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को अगवा कर अमेरिका लेकर आ गए। यह मिलिट्री एक्शन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मंजूरी से हुआ। पूरी खबर पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
डार्क या लाइट ग्रीन कौन सी सब्जियां हैं सेहत के लिये ज्यादा फायदेमंद? जानिये

सब्जियों का रंग सिर्फ देखने में सुंदर नहीं होता, बल्कि वह उनके पोषण मूल्य (Nutrition) का भी संकेत देता है. अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि डार्क ग्रीन (गहरे हरे रंग की) सब्जियां ज्यादा फायदेमंद होती हैं या लाइट ग्रीन (हल्के हरे रंग की). एक्सपर्ट्स के अनुसार, दोनों ही प्रकार की सब्जियां जरूरी हैं, लेकिन उनके पोषक तत्वों में फर्क होता है. आइए इसे आसान उदाहरणों से समझने की कोशिश करते हैं. डार्क ग्रीन सब्जियां क्या होती हैं?डार्क ग्रीन सब्जियां वे होती हैं जिनका रंग गहरा हरा होता है, क्योंकि उनमें क्लोरोफिल, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा ज्यादा होती है. उदाहरण:पालकमेथीसरसों का सागब्रोकलीहरी पत्तेदार सब्जियां डार्क ग्रीन सब्जियों के फायदेआयरन से भरपूर, खून की कमी में लाभकारी.कैल्शियम और विटामिन K ज्यादा, हड्डियों के लिए अच्छे.मजबूत एंटीऑक्सीडेंट, इम्युनिटी बढ़ाते हैं.दिल की बीमारियों और कैंसर के खतरे को कम करते हैं.डिटॉक्स में मददगार. निष्कर्ष: डार्क ग्रीन सब्जियां “पावरहाउस ऑफ न्यूट्रिशन” मानी जाती हैं. लाइट ग्रीन सब्जियां क्या होती हैं?लाइट ग्रीन सब्जियां हल्के हरे रंग की होती हैं और आमतौर पर पानी और फाइबर से भरपूर होती हैं. उदाहरण:लौकीतोरईटिंडाखीरापत्ता गोभी लाइट ग्रीन सब्जियों के फायदेशरीर को ठंडक देती हैं.पाचन तंत्र सुधारती हैं.वजन घटाने में सहायक.डिहाइड्रेशन से बचाती हैं.पेट हल्का रखती हैं. निष्कर्ष: लाइट ग्रीन सब्जियां शरीर को क्लींज और हाइड्रेट करती हैं. डार्क vs लाइट ग्रीन: मुख्य अंतरपोषण घनत्व:डार्क ग्रीन > लाइट ग्रीन फाइबर और पानी:लाइट ग्रीन ज्यादा आयरन और कैल्शियम:डार्क ग्रीन ज्यादा डाइटिंग / गर्मी में:लाइट ग्रीन बेहतर कौन‑सी ज्यादा फायदेमंद है?सच यह है कि कोई एक ज्यादा और दूसरी कम फायदेमंद नहीं. अगर आप एनीमिया, कमजोरी या इम्युनिटी पर ध्यान दे रहे हैं → डार्क ग्रीन सब्जियां.अगर आप वजन घटाना, पाचन या गर्मी में हल्का खाना चाहते हैं → लाइट ग्रीन सब्जियां. एक्सपर्ट की सलाहसबसे अच्छा तरीका है “रंगीन थाली”, जहां डार्क और लाइट दोनों तरह की सब्जियां शामिल हों. निष्कर्षडार्क ग्रीन सब्जियां पोषण में भारी होती हैं, जबकि लाइट ग्रीन सब्जियां शरीर को हल्का और संतुलित रखती हैं. सेहतमंद रहने के लिए किसी एक को चुनने की बजाय दोनों का संतुलित सेवन करना ही सबसे सही और फायदेमंद तरीका है.
महिलाओं की समस्याओं को ना करें नजरअंदाज, इस खामोश बीमारी का बढ़ रहा खतरा, डॉक्टरों ने जारी की चेतावनी

होमताजा खबरlifestyle महिलाओं की समस्याओं को ना करें नजरअंदाज, इस खामोश बीमारी का बढ़ रहा खतरा Last Updated:May 05, 2026, 13:55 IST Ambala News: अक्सर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की बीमारियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिससे उनमें गंभीर बीमारी बढ़ती जाती है. इसी कारण महिलाओं में एक शांत बीमारी तेजी से फैल रही है, जो लंबे समय तक शरीर में रहने के बाद कैंसर का रूप ले सकता है. शुरुआत में महिला को कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती, लेकिन समय बीतने के साथ असामान्य ब्लीडिंग, पीरियड्स के बीच खून आना या मेनोपॉज़ के बाद दोबारा रक्तस्राव जैसे संकेत सामने आने लगते हैं. आइए एक्सपर्ट से इसके बारे में सबकुछ जानते हैं. अंबाला: भारत में गांव हो या शहर, कई जगह पर आज भी महिलाओं की सेहत अक्सर नजरअंदाज हो जाती है. इसी लापरवाही का फायदा उठाकर Cervical Cancer जैसी खामोश बीमारी धीरे-धीरे अपनी जड़ें मजबूत कर लेती है. दरअसल डॉक्टरों के मुताबिक, भारत में यह कैंसर महिलाओं में तेजी से बढ़ रहा है और चिंता की बात यह है कि इसके शुरुआती लक्षण अक्सर नजर ही नहीं आते हैं. बता दें कि यह बीमारी ज्यादातर Human Papillomavirus (एचपीवी) नाम के वायरस के कारण होती है, जो लंबे समय तक शरीर में रहने के बाद कैंसर का रूप ले सकता है. शुरुआत में महिला को कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती, लेकिन समय बीतने के साथ असामान्य ब्लीडिंग, पीरियड्स के बीच खून आना या मेनोपॉज के बाद दोबारा रक्तस्राव जैसे संकेत सामने आने लगते हैं. महिलाओं की बीमारी को किया जाता है नजरअंदाजवहीं इस बारे में लोकल 18 को ज्यादा जानकारी देते हुए अंबाला शहर नागरिक अस्पताल की आरएमओ डॉ. अदिति गौतम बताती हैं कि अक्सर महिलाएं इन लक्षणों को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, जो आगे चलकर खतरनाक साबित हो सकता है. उनका कहना है कि जागरूकता की कमी के कारण कई मामलों में बीमारी आखिरी स्टेज में जाकर पकड़ में आती है. इसी बीच राहत की खबर यह है कि अब इस सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए देश में ही बनी HPV वैक्सीन उपलब्ध है. उन्होंने बताया कि यह वैक्सीन 14 साल की बच्चियों के लिए सबसे ज्यादा प्रभावी है, लेकिन 45 साल तक की महिलाएं भी इसे लगवा सकती हैं. उन्होंने कहा कि नागरिक अस्पताल अंबाला में 14 से 15 साल की बच्चियां कोई हैं, तो उन्हें HPV वैक्सीन बिल्कुल नि:शुल्क रूप से लगाई जा रही है और माता-पिता को भी इस वैक्सीन के फायदे के बारे में बताया जा रहा है, ताकि वह ये वैक्सीन अपनी बच्चियों को लगवाएं. सोशल मीडिया पर इस वैक्सीन को लेकर काफी ज्यादा भ्रामक खबरें फैलाई जा रही हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की गाइडलाइंस के अनुसार यह वैक्सीन महिलाओं के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद है. इन बीमारियो का हो सकती हैं शिकारउन्होंने बताया कि अगर किसी भी महिलाओं को इस वैक्सीन के बारे में जानकारी लेनी है, तो वह नागरिक अस्पताल में आकर जानकारी ले सकते हैं. इसके साथ ही अभी तक नागरिक अस्पताल में कई बच्चियों ने यह वैक्सीन लगवाई है, जो बिल्कुल स्वस्थ है. उन्होंने बताया कि सर्वाइकल कैंसर गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर होता है, जिसके शुरुआती चरणों में अक्सर कोई लक्षण नहीं दिखते हैं, लेकिन बढ़ने पर अनियमित ब्लीडिंग (दो पीरियड्स के बीच, संभोग के बाद या मेनोपॉज के बाद), असामान्य गंध वाला गाढ़ा या खूनी डिस्चार्ज, पेल्विक दर्द और यौन संबंध के दौरान दर्द जैसी गंभीर परेशानियां शुरू हो सकती हैं. टीकाकरण से होगा फायदाउन्होंने कहा कि यह टीकाकरण अंबाला जिले के नागरिक अस्पताल और सीएचसी, पीएचसी सभी जगह पर उपलब्ध हैं. वैसे निजी अस्पतालों में यह टीका लगभग 12000 रुपए में लगता है, जो काफी महंगा होता है. सरकारी कार्यक्रम के तहत यह सभी पात्र किशोरियों को निःशुल्क लगाया जा रहा है. अगले तीन महीनों तक चलने वाले इस अभियान में प्रत्येक पात्र किशोरी को टीके की केवल एक ही खुराक दी जाएगी. यह एक टीका जहां सर्वाइकल कैंसर से किशोरियों की रक्षा करेगा, तो वहीं इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है. वहीं मिली जानकारी के अनुसार, टीकाकरण के लिए OTP आधारित सहमति या अभिभावकों की लिखित सहमति अनिवार्य है. टीकाकरण के बाद लाभार्थी की जानकारी ऑनलाइन U-WIN पोर्टल पर दर्ज की जाएगी और पंजीकृत मोबाइल नंबर पर एक लिंक भेजा जाएगा, जिससे डिजिटल प्रमाण पत्र डाउनलोड किया जा सकेगा. About the Author आर्यन सेठ आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए. News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्टोरीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्स में सबमिट करें Disclaimer: इस खबर में दी गई दवा/औषधि और स्वास्थ्य से जुड़ी सलाह, एक्सपर्ट्स से की गई बातचीत के आधार पर है. यह सामान्य जानकारी है, व्यक्तिगत सलाह नहीं. इसलिए डॉक्टर्स से परामर्श के बाद ही कोई चीज उपयोग करें. Local-18 किसी भी उपयोग से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदार नहीं होगा.
स्ट्रोक के बाद पूरी तरह ठीक क्यों नहीं होता मरीज, क्या होती है गोल्डन विंडो? डॉक्टर ने बताई बेहद जरूरी बात

भीषण गर्मी में अक्सर हीट स्ट्रोक के मामले देखने को मिलते हैं, इसके अलावा ब्रेन स्ट्रोक के केसेज भी आए दिन सामने आ रहे हैं. हालांकि भारत में स्ट्रोक के इलाज में पिछले कुछ साल में जबर्दस्त सुधार हुआ है. बेहतर इमरजेंसी केयर, तेज डायग्नोसिस और बेहतरीन मेडिकल सुविधाओं की वजह से अब पहले से कहीं अधिक मरीज स्ट्रोक से बच रहे हैं लेकिन इसके बावजूद एक ऐसी दिक्कत सामने आ रही है जो काफी गंभीर है. डॉक्टरों की मानें तो स्ट्रोक के इलाज के बाद मरीज जिंदा तो बच जाते हैं, लेकिन वे पूरी तरह ठीक नहीं हो पाते और उन्हें लंबे समय तक विकलांगता के साथ जीवन जीना पड़ता है. सबसे बड़ा सवाल है कि क्या स्ट्रोक दो-चार दिन में ठीक हो जाता है? स्ट्रोक के बाद कौन सी बड़ी दिक्कतें मरीजों में देखने को मिलती हैं? स्ट्रोक में गोल्डन विंडो क्या होती है? आइए इन सभी सवालों पर एचसीएएच के को फाउंडर डॉक्टर गौरव ठुकराल से जानते हैं. डॉक्टर ठुकराल कहते हैं, ‘आज भारत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम सिर्फ इलाज कर रहे हैं, या सच में मरीजों को ठीक भी कर पा रहे हैं. अस्पतालों में स्ट्रोक का इलाज हो रहा है, जानें भी बच रही हैं लेकिन क्या रिकवरी उतनी ही मजबूत हो रही है? यही वह अंतर है जो भारत को अब समझना और भरना होगा.’ वे कहते हैं, ‘हमें स्ट्रोक के इलाज को सिर्फ जान बचाने तक सीमित नहीं रखना चाहिए. सबसे जरूरी है कि स्ट्रोक के बाद रिकवरी कितनी जल्दी, कितनी संरचित और कितनी प्रभावी तरीके से शुरू होती है?’ डॉक्टर ठुकराल आगे कहते हैं कि स्ट्रोक के इलाज के बावजूद कुछ ऐसी बीमारियां हैं जो शरीर में बहुत तेजी से बढ़ती हैं. यही वजह है कि स्ट्रोक आने के बाद मरीज 2-4 दिन में सही नहीं होता बल्कि उसे पूरी तरह रिकवर होने में पूरे 3 महीने लग सकते हैं. वे बताते हैं कि स्ट्रोक के बाद मरीजों को हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और बैठकर रहने वाली जीवनशैली की समस्याएं सबसे ज्यादा होती हैं जो उनकी क्ववालिटी लाइफ को पूरी तरह खराब कर देती हैं. स्ट्रोक के बाद के हफ्ते बेहद अहम डॉक्टर ठुकराल कहते हैं कि स्ट्रोक के बाद शुरुआती कुछ हफ्ते बेहद अहम होते हैं.इस दौरान दिमाग न्यूरोप्लास्टिसिटी की अवस्था में होता है, जहां वह खुद को फिर से व्यवस्थित करने और नई क्षमताएं विकसित करने में सक्षम होता है. अगर इस समय सही और लगातार रिहेबिलिटेट किया जाए, तो मरीज दोबारा चलना, बोलना और अपनी स्वतंत्रता वापस पा सकता है.’ गोल्डन विंडो का केयरटेकर भी रखें ध्यान मरीज की रिकवरी का यह समय सीमित होता है. आमतौर पर यह अवधि कुछ हफ्तों से लेकर तीन महीने तक की होती है. अगर इस ‘गोल्डन विंडो’ को खो दिया जाए, तो रिकवरी की गति और प्रभाव दोनों ही काफी कम हो जाते हैं. जो सुधार कुछ हफ्तों में संभव था, वह महीनों में भी अधूरा रह सकता है या कभी पूरी तरह वापस नहीं आता.वे कहते हैं कि आज भारत में स्ट्रोक का इलाज मजबूत हो चुका है, लेकिन रिकवरी अभी भी कमजोर कड़ी बनी हुई है. देश को अब एक ऐसे हेल्थकेयर मॉडल की जरूरत है जहां रिकवरी को उतनी ही प्राथमिकता दी जाए जितनी इलाज को दी जाती है. रिकवरी कोई हल्की या कभी-कभार होने वाली प्रक्रिया नहीं है. यह एक गहन, अनुशासित और समयबद्ध उपचार है, जिसमें रोजाना कई बार थेरेपी की जरूरत होती है और यह कई हफ्तों तक लगातार चलती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शुरुआती चरण में गहन और बार-बार होने वाली थेरेपी को ही बेहतर परिणामों की कुंजी माना जाता है. इसका ध्यान स्ट्रोक के पेशेंट के साथ रहने वाले अटेंडेंट और केयरटेकर को भी रखना चाहिए. क्या कहते हैं आंकड़े आंकड़े बताते हैं कि भारत में 6.3 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी प्रकार की विकलांगता के साथ जीवन जी रहे हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस बोझ का बड़ा हिस्सा समय पर और सही पुनर्वास के जरिए कम किया जा सकता है. इसके बावजूद, देश में पुनर्वास सेवाओं का ढांचा बेहद सीमित है. पूरे देश में लगभग 1,251 स्ट्रोक रिहैबिलिटेशन सेंटर ही मौजूद हैं, जो आबादी के अनुपात में बेहद कम हैं. इसका सीधा असर यह होता है कि लाखों मरीज समय पर और सही और पूरे उपचार से वंचित रह जाते हैं. इस वजह से हो रहा नुकसान डॉ. ठुकराल आगे कहते हैं कि समस्या सिर्फ सुविधाओं की नहीं है, बल्कि सोच और सिस्टम दोनों की है. अस्पतालों में डिस्चार्ज के समय मरीजों को स्पष्ट रिकवरी रोडमैप नहीं दिया जाता. न ही यह बताया जाता है कि शुरुआती 6 से 8 हफ्तों में गहन और निरंतर थेरेपी कितनी जरूरी है. परिणामस्वरूप, परिवार अक्सर इसे वैकल्पिक मानकर टाल देते हैं. आर्थिक पहलू इस चुनौती को और जटिल बना देता है. पुनर्वास सेवाएं अभी भी बीमा कवरेज के दायरे में पूरी तरह शामिल नहीं हैं. ऐसे में परिवार इसे एक अतिरिक्त खर्च के रूप में देखते हैं, जबकि वास्तव में यह एक दीर्घकालिक निवेश है. जब मरीज पूरी तरह रिकवर नहीं कर पाता, तो इसका असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता. उसकी काम करने की क्षमता प्रभावित होती है, परिवार पर देखभाल का दबाव बढ़ता है और धीरे-धीरे यह एक सामाजिक और आर्थिक बोझ में बदल जाता है. कोविड-19 महामारी ने इन खामियों को और उजागर किया. इलाज में आई रुकावटों और सेवाओं की कमी ने कई मरीजों की रिकवरी को प्रभावित किया और विकलांगता का बोझ बढ़ा दिया. तेजी से रिकवरी है जरूरी डॉक्टर कहते हैं कि तेजी से रिकवरी कोई विकल्प नहीं है, बल्कि जरूरत है. अगर हमें देश में विकलांगता का बोझ कम करना है, तो पुनर्वास को इलाज की निरंतर और अनिवार्य कड़ी के रूप में देखना होगा.








