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मुस्लिम सीटों पर बीजेपी की जीत: बंगाल में काबा-काली और बाबरी मस्जिद जैसी मुस्लिम सीटों पर गर्म रही बीजेपी! फिर 45% मुस्लिम कमल पर कैसे?

मुस्लिम सीटों पर बीजेपी की जीत: बंगाल में काबा-काली और बाबरी मस्जिद जैसी मुस्लिम सीटों पर गर्म रही बीजेपी! फिर 45% मुस्लिम कमल पर कैसे?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के सुझाव ने सभी राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है। बीजेपी ने 294 रिजर्व वाली विधानसभा में 206 रिजर्व पर कब्जा कर राज्य के 15 साल के राजनीतिक इतिहास को पलट दिया। लेकिन इसके अलावा भी बड़ा कॉर्पोरेट पार्टी ने वहां दिखाया, जिसे ममता का अभेद्य किला माना जाता था, बंगाल की 115 मुस्लिम बहुल आबादी। इन प्रस्तावों पर जहां मुस्लिम धर्मावलंबियों की आबादी 30 प्रतिशत या उससे भी अधिक है, बीजेपी ने अपना पोर्टफोलियो वोट बैंक न होने के बावजूद 39 पर कब्जा जमाया। आख़िरकार यह कैसे हुआ?

टीएमसी के ‘अभेद’ मुस्लिम वोट बैंक का सबसे पहला और सबसे अहम कारण

ममता बनर्जी की कैथोलिक कांग्रेस (टीएमसी) पिछले दशक से वोट बैंक पर एकाधिकार जमाए हुई थी। 2021 में टीएमसी ने 44 मुस्लिम रिवर्सल से 43 पर जीत हासिल की। लेकिन इस बार टीएमसी का यह वोट बैंक कांग्रेस, लेफ्ट और हुमायूं कबीर की नई पार्टी आम जनता पार्टी (एजेयूपी) के बीच बंटवारा हो गया है।

मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तरी डायनाजपुर की 43 में से 2021 में बीजेपी को सिर्फ 8 सीटें मिलीं, जो 2026 में 19 में बनीं। इस रिवर्सफर की सबसे बड़ी वजह मुस्लिम सेक्टर का बिखराव है, न कि बीजेपी की ओर से उनका जमावड़ा। उदाहरण के लिए, मुर्शिदाबाद के रानीनगर में कांग्रेस 79,423 वोटर्स से वोट मिला, जबकि टीएमसी (76,722) और वाम दल (48,587) के बीच वोट बंटने से बीजेपी को बढ़त हासिल हुई।

काबा-काली और बाबरी मस्जिद के ‘गर्म’ मस्जिद का डबल गेम

भाजपा ने बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के तहत अपने-अपने पक्ष में अपनी चुनावी रणनीति बनाई। टीएमसी सांसद सयानी घोष के एक वीडियो में ‘मेरे दिल में है काबा’ गाने के बाद बीजेपी नेताओं ने इसे ‘काली बनाम काबा’ की लड़ाई बना दिया। शाह अमित और योगी आदित्यनाथ ने नैरेटिव गढ़ा कि बंगाल की आत्मा में सिर्फ मां काली और दुर्गा बस्ती हैं। वहीं दूसरी ओर बीजेपी ने ‘जय मां काली’ की जगह ‘जय श्री राम’ का नारा अपनाकर बंगाली अस्मिता से सीधा साधा बनाया।

बाबरी मस्जिद विवाद ने मुस्लिम वोट बैंक में डकैती का काम किया। टीएमसी के सहायक विधायक हुमायूँ कबीर ने मुर्शिदाबाद के रेजीनगर में दूसरी बार बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा की और अपनी पार्टी एजेयूपी बना ली। बीजेपी ने इस मुद्दे को ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ को सही ठहराते हुए हिंदू धर्म को ध्रुवीकरण का हथियार बनाया. गृह मंत्री अमित शाह ने साफा से कहा, ‘बंगाल में बाबरी मस्जिद नहीं बनेंगे’

कबीर की पार्टी ने टीएमसी के मुस्लिम वोट बैंक को काटने का काम किया. नतीजा, कबीर ने खुद रेजिनगर और नोएडा विजिट लीं, जिससे टीएमसी को करारा झटका लगा। मुस्लिम वोट बीजेपी को नहीं मिले, लेकिन टीएमसी की जीत की राह में बँटने से बड़ी बाधा बन गई।

साहब का ‘गुपचुप’ असर और 91 लाख का लाजवाब खेल

चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत करीब 91 लाख लाख के नाम सूची को हटा दिया, जिससे कुल 7.66 करोड़ से अधिक की संख्या 6.75 करोड़ रह गई। इसका सबसे ज्यादा असर मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तरी 24 परगना जैसे अल्पसंख्यक बहुल पुर्तगाल में हुआ। समर्थकों का मानना ​​है कि एसआईआर ने मुस्लिम विचारधारा को एकजुट कर टीएमसी के पक्ष में वोट देने के बजाय अन्य पार्टियों में शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया।

‘शून्य’ मुस्लिम मुद्दा, लेकिन हर जगह जीत का परचम

बीजेपी ने 2021 में 8 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी नहीं जीत सका. इस बार पार्टी ने एक भी मुस्लिम मुस्लिम को टिकट नहीं दिया और पूरी तरह से हिंदू चर्च के ध्रुवीकरण पर दांव लगाया। यह अनुमान सिद्ध हुआ। जहां टीएमसी सिर्फ 30 मुस्लिम मुस्लिमों पर आगे रही और 12 पर बढ़त बनाई गई। बीजेपी ने यह संदेश दिया कि ‘वोट विकास से मिलें, विशेष समुदाय से नहीं।’

बीजेपी की यह ऐतिहासिक जीत का फॉर्मूला बेहद साफ है। 45% मुस्लिम वोट बहुमत भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया, क्योंकि मुस्लिम वोट तीन या चार आश्रमों में बंट गया, जबकि हिंदू वोट एकजुट भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया। जहां टीएमसी का वोट शेयर 40.80% रहा, वहीं बीजेपी का वोट शेयर सिर्फ 5% ज्यादा (45.64%) रहा, बाकी के अंतर में भारी बढ़त हुई।

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के सुझाव ने सभी राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है। बीजेपी ने 294 रिजर्व वाली विधानसभा में 206 रिजर्व पर कब्जा कर राज्य के 15 साल के राजनीतिक इतिहास को पलट दिया। लेकिन इसके अलावा भी बड़ा कॉर्पोरेट पार्टी ने वहां दिखाया, जिसे ममता का अभेद्य किला माना जाता था, बंगाल की 115 मुस्लिम बहुल आबादी। इन प्रस्तावों पर जहां मुस्लिम धर्मावलंबियों की आबादी 30 प्रतिशत या उससे भी अधिक है, बीजेपी ने अपना पोर्टफोलियो वोट बैंक न होने के बावजूद 39 पर कब्जा जमाया। आख़िरकार यह कैसे हुआ?

टीएमसी के ‘अभेद’ मुस्लिम वोट बैंक का सबसे पहला और सबसे अहम कारण

ममता बनर्जी की कैथोलिक कांग्रेस (टीएमसी) पिछले दशक से वोट बैंक पर एकाधिकार जमाए हुई थी। 2021 में टीएमसी ने 44 मुस्लिम रिवर्सल से 43 पर जीत हासिल की। लेकिन इस बार टीएमसी का यह वोट बैंक कांग्रेस, लेफ्ट और हुमायूं कबीर की नई पार्टी आम जनता पार्टी (एजेयूपी) के बीच बंटवारा हो गया है।

मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तरी डायनाजपुर की 43 में से 2021 में बीजेपी को सिर्फ 8 सीटें मिलीं, जो 2026 में 19 में बनीं। इस रिवर्सफर की सबसे बड़ी वजह मुस्लिम सेक्टर का बिखराव है, न कि बीजेपी की ओर से उनका जमावड़ा। उदाहरण के लिए, मुर्शिदाबाद के रानीनगर में कांग्रेस 79,423 वोटर्स से वोट मिला, जबकि टीएमसी (76,722) और वाम दल (48,587) के बीच वोट बंटने से बीजेपी को बढ़त हासिल हुई।

काबा-काली और बाबरी मस्जिद के ‘गर्म’ मस्जिद का डबल गेम

भाजपा ने बंगाल की सांस्कृतिक पहचान के तहत अपने-अपने पक्ष में अपनी चुनावी रणनीति बनाई। टीएमसी सांसद सयानी घोष के एक वीडियो में ‘मेरे दिल में है काबा’ गाने के बाद बीजेपी नेताओं ने इसे ‘काली बनाम काबा’ की लड़ाई बना दिया। शाह अमित और योगी आदित्यनाथ ने नैरेटिव गढ़ा कि बंगाल की आत्मा में सिर्फ मां काली और दुर्गा बस्ती हैं। वहीं दूसरी ओर बीजेपी ने ‘जय मां काली’ की जगह ‘जय श्री राम’ का नारा अपनाकर बंगाली अस्मिता से सीधा साधा बनाया।

बाबरी मस्जिद विवाद ने मुस्लिम वोट बैंक में डकैती का काम किया। टीएमसी के सहायक विधायक हुमायूँ कबीर ने मुर्शिदाबाद के रेजीनगर में दूसरी बार बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा की और अपनी पार्टी एजेयूपी बना ली। बीजेपी ने इस मुद्दे को ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ को सही ठहराते हुए हिंदू धर्म को ध्रुवीकरण का हथियार बनाया. गृह मंत्री अमित शाह ने साफा से कहा, ‘बंगाल में बाबरी मस्जिद नहीं बनेंगे’

कबीर की पार्टी ने टीएमसी के मुस्लिम वोट बैंक को काटने का काम किया. नतीजा, कबीर ने खुद रेजिनगर और नोएडा विजिट लीं, जिससे टीएमसी को करारा झटका लगा। मुस्लिम वोट बीजेपी को नहीं मिले, लेकिन टीएमसी की जीत की राह में बँटने से बड़ी बाधा बन गई।

साहब का ‘गुपचुप’ असर और 91 लाख का लाजवाब खेल

चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत करीब 91 लाख लाख के नाम सूची को हटा दिया, जिससे कुल 7.66 करोड़ से अधिक की संख्या 6.75 करोड़ रह गई। इसका सबसे ज्यादा असर मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तरी 24 परगना जैसे अल्पसंख्यक बहुल पुर्तगाल में हुआ। समर्थकों का मानना ​​है कि एसआईआर ने मुस्लिम विचारधारा को एकजुट कर टीएमसी के पक्ष में वोट देने के बजाय अन्य पार्टियों में शामिल होने के लिए मजबूर कर दिया।

‘शून्य’ मुस्लिम मुद्दा, लेकिन हर जगह जीत का परचम

बीजेपी ने 2021 में 8 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी नहीं जीत सका. इस बार पार्टी ने एक भी मुस्लिम मुस्लिम को टिकट नहीं दिया और पूरी तरह से हिंदू चर्च के ध्रुवीकरण पर दांव लगाया। यह अनुमान सिद्ध हुआ। जहां टीएमसी सिर्फ 30 मुस्लिम मुस्लिमों पर आगे रही और 12 पर बढ़त बनाई गई। बीजेपी ने यह संदेश दिया कि ‘वोट विकास से मिलें, विशेष समुदाय से नहीं।’

बीजेपी की यह ऐतिहासिक जीत का फॉर्मूला बेहद साफ है। 45% मुस्लिम वोट बहुमत भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया, क्योंकि मुस्लिम वोट तीन या चार आश्रमों में बंट गया, जबकि हिंदू वोट एकजुट भाजपा के पक्ष में खड़ा हो गया। जहां टीएमसी का वोट शेयर 40.80% रहा, वहीं बीजेपी का वोट शेयर सिर्फ 5% ज्यादा (45.64%) रहा, बाकी के अंतर में भारी बढ़त हुई।

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