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लगान-गजनी फेम एक्टर प्रदीप रावत का निधन:74 साल के थे, दोबारा कैंसर हुआ था; महाभारत में अश्वत्थामा बने थे

लगान-गजनी फेम एक्टर प्रदीप रावत का निधन:74 साल के थे, दोबारा कैंसर हुआ था; महाभारत में अश्वत्थामा बने थे

लगान और गजनी समेत कई फिल्मों में नजर आने वाले अभिनेता प्रदीप रावत का 74 साल की उम्र में मंगलवार को निधन हो गया। उनके निधन की जानकारी लगान में उनके साथ काम करने वाले अभिनेता यशपाल शर्मा ने इंस्टाग्राम पर श्रद्धांजलि देते हुए शेयर की। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदीप रावत के मैनेजर सिद्धार्थ तिवारी ने उनके निधन की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि एक्टर कैंसर से पीड़ित थे और बीमारी दोबारा लौट आई थी। पिछले एक महीने से उनका अस्पताल में इलाज चल रहा था। महाभारत में अश्वत्थामा का रोल निभाया था प्रदीप रावत ने एक्टिंग करियर की शुरुआत बी.आर. चोपड़ा के टीवी शो महाभारत में अश्वत्थामा की भूमिका से की थी। इसके बाद उन्होंने हिंदी, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम, बंगाली और भोजपुरी फिल्मों में काम किया। हिंदी सिनेमा में उन्होंने लगान, सरफरोश, गजनी, बैजू बावरा, आवारापन और ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्मों में दिखाई दिए। वहीं, तेलुगु फिल्म सई (Sye) से उन्होंने दक्षिण भारतीय सिनेमा में कदम रखा और कई यादगार विलेन के किरदार निभाए। तमिल फिल्म गजनी (2005) में उनके डबल रोल को काफी पसंद किया गया। बाद में उन्होंने इसी भूमिका को हिंदी रीमेक गजनी में भी निभाया। इसके अलावा उन्होंने कन्नड़ फिल्म पैरोडी, मलयालम फिल्म ‘चाइना टाउन’, बंगाली फिल्म हीरो 420 और भोजपुरी फिल्म क्रैक फाइटर में भी एक्टिंग की थी। यह खबर हम लगातार अपडेट कर रहे हैं…

Sheikh Hasina Media Event | India Statement On Bangladesh Request

Sheikh Hasina Media Event | India Statement On Bangladesh Request

नई दिल्ली2 मिनट पहले कॉपी लिंक शेख हसीना 11 जनवरी 2024 को पांचवीं बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद संबोधित करतीं हुईं। भारत सरकार ने कहा है कि 5 अगस्त को बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के ऑनलाइन संबोधन से उसका कोई संबंध नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, यह कार्यक्रम एक निजी मीडिया संस्था आयोजित कर रही है। भारत सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है। इस मंच पर रखे जाने वाले किसी भी विचार का सरकार समर्थन भी नहीं करती। दरअसल, शेख हसीना ने ऐलान किया है कि वह 5 अगस्त को नई दिल्ली स्थित ‘फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया (FCCSA)’ के कार्यक्रम में वीडियो लिंक के जरिए शामिल होंगी। अगस्त 2024 में बांग्लादेश छोड़ने के बाद यह पहली बार होगा, जब वह किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नजर आएंगी। बांग्लादेश ने भारत से भाषण रोकने की अपील की थी फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स क्लब ऑफ साउथ एशिया (FCCSA) नई दिल्ली स्थित पत्रकारों का एक पेशेवर संगठन है। इसकी स्थापना 1958 में हुई थी। शेख हसीना इसी संगठन के कार्यक्रम में वीडियो लिंक के जरिए शामिल होंगी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह कार्यक्रम शाम 6 बजे से 7:30 बजे तक चलेगा। बांग्लादेश ने कल सोमवार को भारत से अपील की थी कि शेख हसीना या प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े किसी भी व्यक्ति को भारत की जमीन से राजनीतिक भाषण देने या ऐसी गतिविधियां करने की अनुमति न दी जाए, जिससे बांग्लादेश में अस्थिरता फैल सकती हो। यह मुद्दा सोमवार को बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के विदेश मामलों के सलाहकार हुमायूं कबीर और ढाका में भारत के उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी की मुलाकात के दौरान भी उठाया गया था। शेख हसीना ने 5 अगस्त का दिन ही क्यों चुना 5 अगस्त 2024 को ही छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। प्रदर्शनकारी उनके सरकारी आवास तक पहुंच गए थे। इसके बाद वह इस्तीफा देकर सेना के विमान से भारत आ गई थीं। यानी, जिस दिन उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी थी, उसी दिन वह दो साल बाद फिर लोगों के सामने आ रही हैं। माना जा रहा है कि वह इसी दिन अपनी राजनीतिक वापसी का संदेश देना चाहती हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

UP TGT PGT Recruitment New Syllabus

UP TGT PGT Recruitment New Syllabus

Hindi News Career UP TGT PGT Recruitment New Syllabus | Negative Marking & Exam Pattern 15 मिनट पहले कॉपी लिंक उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग ने TGT और PGT भर्तियों का नया सिलेबस अपनी ऑफिशियल वेबसाइट पर जारी कर दिया है। इस बार परीक्षा पैटर्न में कई अहम बदलाव किए गए हैं। आयोग जल्द ही जनरल नॉलेज का सिलेबस जारी करेगा जिससे उम्मीदवार अपनी तैयारी नई व्यवस्था के अनुसार कर सकेंगे। पहली बार नेगेटिव मार्किंग लागू इस बार सबसे बड़ा बदलाव यह है कि दोनों भर्ती परीक्षाओं में पहली बार नेगेटिव मार्किंग लागू की गई है। इससे पहले टीजीटी और पीजीटी परीक्षा में केवल विषय से जुड़े 125 प्रश्न पूछे जाते थे और हर प्रश्न चार अंक का होता था। जनरल नॉलेज का सिलेबस बैठक के बाद जारी आयोग ने अभी केवल सब्जेक्ट वाइज सिलेबस जारी किया है। जनरल नॉलेज का सिलेबस आयोग की बैठक के बाद अलग से जारी किया जाएगा। इसके अलावा अलग-अलग विषयों की एक जैसी डिग्रियों को लेकर माध्यमिक शिक्षा विभाग से भी स्पष्टीकरण मांगा गया है। संस्कृत विषय में बदलाव ज्यादातर विषयों के सिलेबस में बड़े बदलाव नहीं किए गए हैं, लेकिन संस्कृत विषय के सिलेबस में कुछ संशोधन किए गए हैं। उम्मीदवारों के अनुसार पीजीटी संस्कृत में वैदिक साहित्य से जुड़े कुछ नए भाग जोड़े गए हैं। वहीं टीजीटी संस्कृत में मेघदूतम् और नीति शतकम को हटाकर हितोपदेश, रघुवंश महाकाव्य का द्वितीय सर्ग तथा साहित्य दर्पण का प्रथम परिच्छेद शामिल किया गया है। एक लाख से ज्यादा पदों पर जल्द भर्ती की मांग नई प्राथमिक शिक्षक भर्ती की मांग को लेकर प्रतियोगी छात्रों ने मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा है। छात्रों का कहना है कि लंबे समय से नई भर्ती का इंतजार किया जा रहा है। वहीं रोजगार अधिकार अभियान से जुड़े प्रतिनिधियों ने भी विभिन्न सरकारी विभागों में खाली पड़े एक लाख से अधिक पदों पर जल्द भर्ती प्रक्रिया शुरू करने की मांग उठाई है। ये खबर भी पढ़ें रेलवे ग्रुप डी फिजिकल में 1,032 उम्मीदवार फेल:1000 मीटर की दौड़ सिलेक्शन की सबसे कठिन स्टेप, उमस भरे मौसम ने बढ़ाई परेशानी चिपचिपी गर्मी और उमस भरे मौसम में जहां ज्यादा देर चल पाना भी मुश्किल है। ऐसे मौसम में प्रयागराज के DSA ग्राउंड में 25 से 28 जुलाई तक रेलवे ग्रुप-डी PET परीक्षा की फिजिकल टेस्ट का आयोजन हुआ। इस टेस्ट के चलते 1,032 उम्मीदवार फेल हो गए। पांच दिनों तक चली फिजिकल टेस्ट उम्मीदवारों को भारी पड़ी। पूरी खबर यहां पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

SEBI Closing Auction Session | Nifty Volatility & Market Manipulation

SEBI Closing Auction Session | Nifty Volatility & Market Manipulation

20 मिनट पहले कॉपी लिंक शेयर बाजार में SEBI का नया नियम CAS लागू होने के बाद लगातार दूसरे दिन क्लोजिंग टाइम पर बड़ा उछाल आया। इस उछाल से रिटेल ट्रेडर्स के बीच काफी कंफ्यूजन पैदा हो गया है। 3 अगस्त को 3:15 बजे के बाद निफ्टी अचानक 185 अंक उछलकर 24,770 के पार बंद हुआ। ठीक वैसा ही वर्टिकल स्पाइक आज 4 अगस्त को भी दिखा। निफ्टी 24,465 से उछलकर 24,614 पर बंद हुआ। इस स्टोरी में जानेंगे कि सेबी ने ये नियम लागू क्यों किया। इस नियम से आखिरी 15 मिनटों में बाजार में अचानक उछाल क्यों आ रहा है। रिटेल ट्रेडर्स को क्या सावधानियां रखनी चाहिए। शेयर बाजार में क्लोजिंग प्राइस तय करने का नया नियम अब पुराने एवरेज फार्मूले के बजाय ‘क्लोजिंग ऑक्शन सेशन’ यानी CAS के जरिए क्लोजिंग प्राइस निकाली जा रही। फेज-1 में यह नियम केवल फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस में शामिल शेयरों पर लागू किया गया है। अन्य साधारण शेयरों में ट्रेडिंग पहले की तरह ही 3:30 बजे तक चल रही है। पहले कैसे तय होता था क्लोजिंग प्राइस? 3 अगस्त से पहले तक एक्सचेंज आखिरी 30 मिनट यानी दोपहर 3:00 से 3:30 बजे के ट्रेड्स का VWAP यानी वॉल्यूम वेटेड एवरेज प्राइस निकालता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि कोई आखिरी मिनट में छोटा ट्रेड करके शेयर की कीमत में हेरफेर न कर सके। उदाहरण के लिए, अगर कोई शेयर पूरे दिन ₹1,000 से ₹1,010 के बीच ट्रेड हुआ और 3:29 बजे सिर्फ 1 शेयर का ट्रेड ₹980 पर हो गया, तो ₹980 को क्लोजिंग प्राइस नहीं माना जाता था। क्या है नया क्लोजिंग ऑक्शन सेशन CAS? अब VWAP की जगह CAS का इस्तेमाल हो रहा है। इसमें आखिरी 30 मिनट के ट्रेड्स के एवरेज के बजाय, दिन के अंत में सभी बाय और सेल ऑर्डर्स एक जगह इकट्ठा किए जाते हैं। इसके बाद एक्सचेंज एक ऐसी सिंगल प्राइस तय करता है, जिस पर सबसे ज्यादा शेयरों का सौदा हो सके। F&O शेयरों के लिए आखिरी 30 मिनट का नया टाइमटेबल 3:00 से 3:15 बजे तक: नॉर्मल ट्रेडिंग। 15 मिनट के VWAP से एक ‘रेफरेंस प्राइस’ निकलती है। 3:15 से 3:20 बजे तक: FNO स्टॉक्स में रेगुलर ट्रेडिंग रुक जाती है और कोई नया ऑर्डर स्वीकार नहीं किया जाता। हालांकि, इन स्टॉक्स के F&O कॉन्ट्रैक्ट्स शाम 3:40 बजे तक नॉर्मल ट्रेड होते हैं। ओपन ऑर्डर्स आगे कैरी फॉरवर्ड हो जाते हैं। इसमें स्टॉप-लॉस ऑर्डर्स, आइसबर्ग ऑर्डर्स और रेफरेंस प्राइस से 3% के बैंड (ऊपर या नीचे) के बाहर वाले ऑर्डर्स शामिल नहीं। 3:20 से 3:25 बजे तक (ऑर्डर एंट्री सेशन 1): मार्केट और लिमिट दोनों तरह के ऑर्डर्स प्लेस कर सकते हैं। इस दौरान एक्सचेंज संभावित क्लोजिंग प्राइस, कुल बाय/सेल क्वांटिटी और मार्केट इम्बैलेंस (खरीदार ज्यादा हैं या बिकवाल) की जानकारी शेयर करता है। 3:25 से 3:30 बजे तक (ऑर्डर एंट्री सेशन 2): इस दौरान केवल लिमिट ऑर्डर्स ही प्लेस कर सकते हैं। मार्केट ऑर्डर्स को मॉडिफाई या कैंसिल नहीं किया जा सकता। यह सेशन शाम 3:28 से 3:30 बजे के बीच कभी भी रैंडमली बंद हो सकता है, ताकि आखिरी मिनट में ऑर्डर्स की भीड़ से बचा जा सके। इसके बाद, एक्सचेंज सबसे ज्यादा शेयर्स मैच होने वाली एक सिंगल प्राइस पर ऑर्डर्स मैच करता है, जो ऑफिशियल क्लोजिंग प्राइस बन जाती है। 3:30 से 3:35 बजे तक: यह समय क्लोजिंग ऑक्शन का वह चरण है जहां कोई नया ऑर्डर लिए बिना, सभी जमा ऑर्डर्स को ‘इक्विलिब्रियम प्राइस’ पर मैच किया जाता है। इसमें सबसे पहले मार्केट ऑर्डर्स और फिर ‘टाइम प्रायोरिटी’ के आधार पर लिमिट ऑर्डर्स मैच होते हैं; सौदे पूरे होते ही वही भाव ऑफिशियल क्लोजिंग प्राइस बन जाता है, जिससे 3:40 PM तक खुले ऑप्शन प्रीमियम में अचानक बड़े उछाल या गिरावट देखने को मिलते हैं। उदाहरण से जानिए कैसे निकलती है फाइनल क्लोजिंग प्राइस मान लीजिए ऑक्शन के दौरान मार्केट डेप्थ इस प्रकार है: प्राइस (₹) क्युमुलेटिव बाय क्युमुलेटिव सेल एग्जीक्यूटेबल वॉल्यूम (मैच होने वाले शेयर) 1,000 1,200 200 200 1,002 1,000 500 500 1,005 900 1,100 900 (अधिकतम) 1,008 800 1,400 800 1,010 500 1,800 500 इस डेटा में ₹1,005 वह कीमत है, जिस पर सबसे ज्यादा (900 शेयर) ट्रेड हो सकते हैं। इसलिए ₹1,005 को ‘इक्विलिब्रियम प्राइस’ माना जाएगा और यही उस दिन की ऑफिशियल क्लोजिंग प्राइस बनेगी। निवेशकों के लिए मुख्य बातें FNO स्टॉक्स में नॉर्मल ट्रेडिंग 3:15 PM पर बंद हो जाएगी, इसलिए इंट्राडे पोजीशंस पहले ही काट लें। ऑक्शन विंडो के दौरान प्राइस प्रेडिक्ट करना मुश्किल होगा, इसलिए नए सौदे लेने से बचें। ऑक्शन रिजल्ट आते ही ऑप्शन प्रीमियम में अचानक 200%-400% तक की स्पाइक आ सकती है। अब कुछ जरूरी सवालों के जवाब सवाल 1: निफ्टी में 3 अगस्त और 4 अगस्त दोनों दिन क्लोजिंग टाइम पर क्या दिखा? जवाब: 3 अगस्त को पूरे दिन सीमित दायरे के बाद क्लोजिंग विंडो में निफ्टी 24,589 से सीधा 24,774 पर बंद हुआ (लगभग 185 अंक की तेजी)। वहीं 4 अगस्त को दिनभर गिरावट रहने के बाद 24,465 के निचले स्तर से आखिरी कैंडल में जबरदस्त खरीदारी की ऑक्शन मैचिंग हुई और निफ्टी +151.95 अंक (+0.62%) की बढ़त के साथ 24,614.90 पर बंद हुआ। सवाल 2: पुरानी क्लोजिंग प्रणाली में क्या कमी थी जिसे बदलने के लिए नया नियम लाना पड़ा? जवाब: पुराने सिस्टम में दोपहर 3:00 से 3:30 बजे के आखिरी 30 मिनट के सौदों का वॉल्यूम-वेटेड एवरेज (VWAP) निकाला जाता था। इसमें कई बार बड़े ट्रेडर्स आखिरी सेकंड में छोटे वॉल्यूम के सौदे करके क्लोजिंग प्राइस को अपने हिसाब से मैनिप्युलेट कर लेते थे। नए ऑक्शन नियम में न्यूयॉर्क और लंदन की तर्ज पर सभी ऑर्डर्स को एक पूल में मैच करके पारदर्शी क्लोजिंग प्राइस निकाला जाता है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

India Government Summons Meta Global Team Over Content Control Issues

India Government Summons Meta Global Team Over Content Control Issues

2 मिनट पहले कॉपी लिंक पीएम मोदी ने 23 जुलाई को पेपर लीक को गंभीर विषय बताते हुए एक वीडियो जारी किया था। इसे मेटा ने रात 12:30 बजे से सुबह 5:00 बजे तक हटा दिया था। भारत सरकार और मेटा की ग्लोबल टीम के बीच 5 और 6 अगस्त को एक अहम बैठक होने जा रही है। केंद्र सरकार ने फेसबुक और इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा के प्रतिनिधियों को समन भेजकर तलब किया है। केंद्र सरकार इस बैठक में चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मटीरियल यानी CSAM पर लगाम लगाने में हुई चूक, फर्जी/सिंथेटिक एआई कंटेंट और बड़े नेताओं के वेरिफाइड अकाउंट्स पर गलत कार्रवाई जैसे संवेदनशील मुद्दों को उठाएगी। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय ने मेटा द्वारा अब तक दिए गए जवाबों को नाकाफी माना है। पीएम मोदी की पोस्ट हटने के बाद बढ़ी सख्ती यह बैठक हाल ही में फेसबुक पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक वीडियो पोस्ट के कुछ समय के लिए हट जाने के विवाद के बाद तय की गई है। इस घटना के बाद सरकार ने मेटा के प्लेटफॉर्म्स की कंटेंट मॉडरेशन नीतियों, ऑटोमेटेड सिस्टम और बिग-टेक कंपनियों की जवाबदेही पर निगरानी सख्त कर दी है। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक मेटा ने पीएम मोदी के वीडियो के हटने पर खेद व्यक्त किया है और वह इसके लिए औपचारिक माफी मांगने को भी तैयार है। दरअसल, पीएम मोदी ने 23 जुलाई को पेपर लीक को गंभीर विषय बताते हुए एक वीडियो जारी किया था। इसे मेटा ने रात 12:30 बजे से सुबह 5:00 बजे तक हटा दिया था। लेकिन बाद में उसे रिस्टोर कर दिया गया। मेटा ने अपनी सफाई में कहा कि दरअसल, यह एक टेक्निकल एरर था। इंस्टाग्राम विज्ञापनों में CSAM का मुद्दा भी उठा मेटा केवल VIP पोस्ट हटाने के मामले में ही नहीं, बल्कि सुरक्षा संबंधी अन्य गंभीर मामलों में भी जांच के दायरे में है। इससे पहले इंस्टाग्राम पर पेड एड्स यानी प्रायोजित विज्ञापनों के जरिए चाइल्ड CSAM के प्रचार-प्रसार को लेकर सरकार ने मेटा को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। 5-6 अगस्त की बैठक में सरकार यह भी समीक्षा करेगी कि उस नोटिस के बाद कंपनी ने क्या सुधारात्मक कदम उठाए हैं। BBC रिपोर्ट- Meta पर यौन शोषण से जुड़ा कंटेंट सस्ता मिल रहा BBC की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इंस्टाग्राम पर चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज मेटेरियल मौजूद हैं। भारत में इंस्टाग्राम पर ऐसे पेड विज्ञापन चल रहे थे, जिनमें ‘रेप वीडियो’ और ‘चाइल्ड वीडियो’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। इन विज्ञापनों पर क्लिक करने के बाद यूजर्स को टेलीग्राम चैनलों पर भेजा जाता था, जहां कथित तौर पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ा कंटेंट बेहद कम कीमत 99 रुपए में बेचा जा रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, इंस्टाग्राम पर दिखने वाले सभी विज्ञापन पहले Meta के मॉडरेशन सिस्टम से मंजूरी मिलने के बाद ही लाइव होते हैं। BBC ने जब ऐसे ही एक विज्ञापन की शिकायत इंस्टाग्राम से की, तो करीब 24 घंटे बाद कंपनी ने जवाब दिया कि यह पोस्ट उसकी कम्यूनिटी गाइडलाइन का उल्लंघन नहीं है। इसके बाद BBC ने मेटा से इस मामले पर जवाब मांगा। तब कंपनी ने कहा कि उसने कई विज्ञापनों को हटा दिया है, संबंधित अकाउंट्स को सस्पेंड किया है और उन URL को हटा देने का दावा किया। Meta ने यह भी माना कि कोई भी मॉडरेशन सिस्टम पूरी तरह परफेक्ट नहीं होता और रिव्यू प्रोसेस हर नियम उल्लंघन की पहचान नहीं कर पाती। भास्कर नॉलेज: भारत में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का बनाना, रखना अपराध सवाल 1: भारत में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री पर क्या कानून है? जवाब: बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को बनाना, रखना, देखना, शेयर करना, बेचना या प्रसारित करना अपराध है। सवाल 2: IT Act की धारा 67B में क्या सजा है? जवाब: पहली बार दोषी पाए जाने पर 5 साल तक की जेल और 10 लाख रुपए तक जुर्माना। दोबारा अपराध करने पर 7 साल तक की जेल और जुर्माना। सवाल 3: सोशल मीडिया कंपनियों की क्या जिम्मेदारी है? जवाब: भारत के आईटी, 2021 के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अवैध कंटेंट हटाने के लिए त्वरित कार्रवाई करनी होती है। जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करना होता है। बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट की पहचान और रोकथाम के लिए उचित तकनीकी उपाय करने होते हैं। सवाल 4: अगर कोई ऐसा कंटेंट दिखे तो क्या करें? जवाब: उसे डाउनलोड, शेयर या फॉरवर्ड न करें। संबंधित प्लेटफॉर्म पर तुरंत रिपोर्ट करें। राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें। जरूरत पड़ने पर स्थानीय पुलिस या साइबर सेल को सूचना दें। सवाल 5: सरकार इस मामले में क्या कर सकती है? जवाब: सोशल मीडिया कंपनी से जवाब मांग सकती है। प्लेटफॉर्म से कंटेंट हटाने का निर्देश दे सकती है। जांच एजेंसियों के जरिए आपराधिक जांच शुरू कर सकती है। नियमों के उल्लंघन पर आईटी कानूनों के तहत कार्रवाई कर सकती है। सवाल 6: क्या सिर्फ प्लेटफॉर्म ही जिम्मेदार होता है? जवाब: नहीं। ऐसे कंटेंट को अपलोड करने, खरीदने, बेचने, शेयर करने या जानबूझकर प्रसारित करने वाले व्यक्ति भी भारतीय कानून के तहत आपराधिक कार्रवाई के दायरे में आते हैं। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔

Prayagraj Law University Rejects PhD Applications Due To AI Content Usage

Prayagraj Law University Rejects PhD Applications Due To AI Content Usage

Hindi News Career Prayagraj Law University Rejects PhD Applications Due To AI Content Usage 22 मिनट पहले कॉपी लिंक प्रयागराज स्थित डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय ने पीएचडी की 5 सीटों के लिए आए 22 आवेदनों की जांच के बाद आठ आवेदन रद्द कर दिए। जांच में पता चला कि कई उम्मीदवारों की रिसर्च सिनॉप्सिस में एआई से तैयार मटेरियल का ज्यादा उपयोग किया गया था। विश्वविद्यालय ने यूजीसी के दिशानिर्देशों के अनुसार एआई इंडेक्स और सिमिलैरिटी की सीमा तय कर रखी थी। निर्धारित सीमा से ज्यादा पाए जाने पर आवेदन अयोग्य घोषित कर दिए गए। जांच में 36% आवेदन खारिज विश्वविद्यालय प्रशासन ने सभी सिनॉप्सिस की जांच टर्निटिन सॉफ्टवेयर के माध्यम से कराई। इस प्रक्रिया में एआई इंडेक्स और सिमिलैरिटी इंडेक्स दोनों की जांच की गई। कई आवेदनों में एआई से तैयार मटेरियल का स्तर 80% तक पाया गया, जबकि कुछ में सिमिलैरिटी इंडेक्स भी तय सीमा से काफी अधिक था। अब शेष 14 उम्मीदवारों को 12 अगस्त को इंटरव्यू के लिए बुलाया गया है, जहां उनकी विषय की समझ, रिसर्च की मौलिकता और रिसर्च कैपेसिटी चेक की जाएगी। 6 महीने के अंदर दोबारा जमा करना होगी रिसर्च रिसर्च में एआई के बढ़ते उपयोग और साहित्यिक चोरी को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार अगर किसी थीसिस में 10 से 40% तक प्लेजरिज्म मिलता है तो उसे करेक्शन के लिए वापस भेजा जाएगा और रिसर्चर छह महीने के अंदर सुधार कर दोबारा जमा कर सकेगा। एआई का उपयोग थीसिस में करना जरूरी यूजीसी ने यह भी स्पष्ट किया है कि एआई का सीमित उपयोग किया जा सकता है, लेकिन इसका उल्लेख थीसिस में करना अनिवार्य होगा। सभी विश्वविद्यालयों को इन नियमों की जानकारी शोधार्थियों तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं। प्लेजरिज्म क्या है? पीएचडी रिसर्च में प्लेजरिज्म का अर्थ है किसी दूसरे व्यक्ति के विचार, रिसर्च, आर्टिकल, डाटा, फोटो या शब्दों को बिना उचित स्रोत दिए अपना बताकर प्रस्तुत करना। यह शैक्षणिक ईमानदारी का उल्लंघन है। इसके शोध की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। डिग्री रद्द हो सकती है। शोध-पत्र वापस (Retract) किए जा सकते हैं। यहां तक कि विश्वविद्यालय अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है। —————————————————— ये खबर भी पढ़ें रेलवे ग्रुप डी फिजिकल में 1,032 उम्मीदवार फेल:1000 मीटर की दौड़ सिलेक्शन की सबसे कठिन स्टेप, उमस भरे मौसम ने बढ़ाई परेशानी चिपचिपी गर्मी और उमस भरे मौसम में जहां ज्यादा देर चल पाना भी मुश्किल है। ऐसे मौसम में प्रयागराज के DSA ग्राउंड में 25 से 28 जुलाई तक रेलवे ग्रुप-डी PET परीक्षा की फिजिकल टेस्ट का आयोजन हुआ। इस टेस्ट के चलते 1,032 उम्मीदवार फेल हो गए। पांच दिनों तक चली फिजिकल टेस्ट उम्मीदवारों को भारी पड़ी। पूरी खबर यहां पढ़ें दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…

दुनियाभर में फूड कंपनियों की मुकदमेबाजी में लगे 600 साल:डब्ल्यूएचओ का आरोप; अदालती चक्करों में फंसाकर मोटापे की मुहिम कमजोर कर रहे ब्रांड्स

दुनियाभर में फूड कंपनियों की मुकदमेबाजी में लगे 600 साल:डब्ल्यूएचओ का आरोप; अदालती चक्करों में फंसाकर मोटापे की मुहिम कमजोर कर रहे ब्रांड्स

दुनिया की सबसे बड़ी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (पैकेज्ड चिप्स, नम्कीन, क्रिस्प्स) कंपनियां सेहतमंद खान-पान को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों को अदालतों में घसीटकर मोटापे के खिलाफ वैश्विक मुहिम को कमजोर कर रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम गेब्रेयेसस का तो कम से कम यही मानना है। उनका कहना है कि इन कंपनियों की मुकदमेबाजी की वजह से देशों को स्वास्थ्य और कानूनी खर्च के मद में हजारों करोड़ रुपए गंवाने पड़ रहे हैं। दिलचस्प यह है कि ज्यादातर मुकदमे कंपनियां हार जाती हैं। फिर भी मुकदमा ठोकना नहीं छोड़तीं। एक नई मल्टी-कंट्री (कई देश) जांच के मुताबिक, जितने भी मुकदमों का फैसला आ चुका है, उनमें से तीन-चौथाई में सरकारों की ही जीत हुई। लेकिन गेब्रेयेसस के मुताबिक, हारी हुई कंपनियां भी असल में बड़ा दांव जीत जाती हैं क्योंकि मुकदमा लड़ते-लड़ते ही नीति वर्षों तक अटकी रहती है। जांच में सामने आया कि दुनियाभर में इस तरह की मुकदमेबाजी में अब तक 600 साल लग हो चुके हैं, यानी हर मुकदमे में औसतन ढाई साल लग रहे हैं। यह जांच ‘द गार्जियन’ ने रॉबर्ट एंड एथेल कैनेडी ह्यूमन राइट्स सेंटर, सिडनी यूनिवर्सिटी, साओ पाउलो यूनिवर्सिटी और काल्डास यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर की। जांच के मुताबिक, पैकेट के आगे लगने वाले वॉर्निंग लेबल पर सबसे ज्यादा, फिर जंक फूड पर टैक्स और इसके बाद विज्ञापन-मार्केटिंग पर लगी पाबंदियों को लेकर कंपनियों ने सबसे ज्यादा सरकारों को अदालत तक घसीटा। गेब्रेयेसस ने कहा, ‘अगर कंपनियां सच में मोटापे से लड़ने में मदद करना चाहती हैं, तो उन्हें मुकदमेबाजी छोड़नी होगी।’ 2024 में दुनियाभर में करीब 1 अरब लोग, यानी हर सातवां इंसान, मोटापे का शिकार था। गेब्रेयेसस के मुताबिक, जिन देशों ने वॉर्निंग लेबल, टैक्स और विज्ञापन पाबंदी जैसी नीतियां लागू कीं, वहां नतीजे बेहतर मिले हैं। 38% मुकदमे कोका-कोला, पेप्सिको जैसी सिर्फ 8 कंपनियों ने किए जिन मुकदमों में कंपनी की पहचान जाहिर हुई, उनमें से 38% सिर्फ आठ बड़ी पैरेंट कंपनियों से जुड़े थे। कोका-कोला, पेप्सिको, मोंडेलेज, केलॉग्स, डैनोन, फेरेरो, जिग्नक्स और हार्टलैंड फूड प्रोडक्ट्स ग्रुप इनमें शामिल हैं। यानी दुनिया की मुट्ठीभर बड़ी फूड कंपनियां ही सरकारों के खिलाफ सबसे ज्यादा कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। इनमें से कुछ कंपनियों ने तो अदालत से अपनी पहचान गुप्त रखने की गुजारिश भी की, ताकि जनता को यह पता ही न चले कि मुकदमा किसने दायर किया है।

दुनियाभर में फूड कंपनियों की मुकदमेबाजी में लगे 600 साल:डब्ल्यूएचओ का आरोप; अदालती चक्करों में फंसाकर मोटापे की मुहिम कमजोर कर रहे ब्रांड्स

दुनियाभर में फूड कंपनियों की मुकदमेबाजी में लगे 600 साल:डब्ल्यूएचओ का आरोप; अदालती चक्करों में फंसाकर मोटापे की मुहिम कमजोर कर रहे ब्रांड्स

दुनिया की सबसे बड़ी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (पैकेज्ड चिप्स, नम्कीन, क्रिस्प्स) कंपनियां सेहतमंद खान-पान को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों को अदालतों में घसीटकर मोटापे के खिलाफ वैश्विक मुहिम को कमजोर कर रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम गेब्रेयेसस का तो कम से कम यही मानना है। उनका कहना है कि इन कंपनियों की मुकदमेबाजी की वजह से देशों को स्वास्थ्य और कानूनी खर्च के मद में हजारों करोड़ रुपए गंवाने पड़ रहे हैं। दिलचस्प यह है कि ज्यादातर मुकदमे कंपनियां हार जाती हैं। फिर भी मुकदमा ठोकना नहीं छोड़तीं। एक नई मल्टी-कंट्री (कई देश) जांच के मुताबिक, जितने भी मुकदमों का फैसला आ चुका है, उनमें से तीन-चौथाई में सरकारों की ही जीत हुई। लेकिन गेब्रेयेसस के मुताबिक, हारी हुई कंपनियां भी असल में बड़ा दांव जीत जाती हैं क्योंकि मुकदमा लड़ते-लड़ते ही नीति वर्षों तक अटकी रहती है। जांच में सामने आया कि दुनियाभर में इस तरह की मुकदमेबाजी में अब तक 600 साल लग हो चुके हैं, यानी हर मुकदमे में औसतन ढाई साल लग रहे हैं। यह जांच ‘द गार्जियन’ ने रॉबर्ट एंड एथेल कैनेडी ह्यूमन राइट्स सेंटर, सिडनी यूनिवर्सिटी, साओ पाउलो यूनिवर्सिटी और काल्डास यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर की। जांच के मुताबिक, पैकेट के आगे लगने वाले वॉर्निंग लेबल पर सबसे ज्यादा, फिर जंक फूड पर टैक्स और इसके बाद विज्ञापन-मार्केटिंग पर लगी पाबंदियों को लेकर कंपनियों ने सबसे ज्यादा सरकारों को अदालत तक घसीटा। गेब्रेयेसस ने कहा, ‘अगर कंपनियां सच में मोटापे से लड़ने में मदद करना चाहती हैं, तो उन्हें मुकदमेबाजी छोड़नी होगी।’ 2024 में दुनियाभर में करीब 1 अरब लोग, यानी हर सातवां इंसान, मोटापे का शिकार था। गेब्रेयेसस के मुताबिक, जिन देशों ने वॉर्निंग लेबल, टैक्स और विज्ञापन पाबंदी जैसी नीतियां लागू कीं, वहां नतीजे बेहतर मिले हैं। 38% मुकदमे कोका-कोला, पेप्सिको जैसी सिर्फ 8 कंपनियों ने किए जिन मुकदमों में कंपनी की पहचान जाहिर हुई, उनमें से 38% सिर्फ आठ बड़ी पैरेंट कंपनियों से जुड़े थे। कोका-कोला, पेप्सिको, मोंडेलेज, केलॉग्स, डैनोन, फेरेरो, जिग्नक्स और हार्टलैंड फूड प्रोडक्ट्स ग्रुप इनमें शामिल हैं। यानी दुनिया की मुट्ठीभर बड़ी फूड कंपनियां ही सरकारों के खिलाफ सबसे ज्यादा कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। इनमें से कुछ कंपनियों ने तो अदालत से अपनी पहचान गुप्त रखने की गुजारिश भी की, ताकि जनता को यह पता ही न चले कि मुकदमा किसने दायर किया है।

PoK Protest | Pakistan Reserved Seats Controversy & Government Stand

PoK Protest | Pakistan Reserved Seats Controversy & Government Stand

मुजफ्फराबाद10 मिनट पहले कॉपी लिंक पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर को लेकर कई बार युद्ध हो चुका है। दोनों देश इस हिमालयी इलाके पर अपना दावा करते हैं। भारत के साथ कश्मीर विवाद पर पाकिस्तान का पूरा ध्यान रहा। इसलिए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के लोगों की अपनी राजनीतिक समस्याएं लंबे समय तक दबकर रह गईं। लेकिन अब वहां हालात ऐसे हो गए हैं कि पाकिस्तान सरकार के लिए उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है। महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल चुका है। इसे कई वर्षों में पाकिस्तान सरकार के सामने PoK से उठी सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। पिछले सप्ताह मुजफ्फराबाद में सुरक्षा बल गश्त करते हुए दिखाई दिए। PoK में आंदोलन की कमान किसके हाथ में है? PoK में आंदोलन का नेतृत्व जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है। इसका गठन 2023 में हुआ था। इसमें व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय राजनीतिक नेता शामिल हैं। शुरुआत में संगठन ने महंगी बिजली और आटे की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। 2024 और 2025 में हुए प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने बिजली की दरें कम कीं और आटे पर सब्सिडी दी। इसके बाद PoK में आटा पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों की तुलना में काफी सस्ता मिलने लगा। 12 रिजर्व सीटें रद्द करने की मांग पर आंदोलन आंदोलनों के सफल होने से JAAC का जनाधार बढ़ा। अब संगठन महंगाई के मुद्दे से आगे बढ़कर PoK को ज्यादा स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकार देने की मांग कर रहा है। सबसे बड़ी मांग PoK विधानसभा की 45 सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की है। ये सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहते हैं। JAAC का कहना है कि जो लोग पाकिस्तान के दूसरे शहरों में रहते हैं, उन्हें PoK की सरकार बनाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। JAAC के मुताबिक इन 12 सीटों की वजह से स्थानीय मतदाताओं की राय का असर कम हो जाता है और अक्सर केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी को फायदा मिलता है। लॉन्ग मार्च पर रोक, कई नेता गिरफ्तार हुए जून की शुरुआत में JAAC ने 9 जून को रावलकोट से राजधानी मुजफ्फराबाद तक लॉन्ग मार्च का ऐलान किया। रावलकोट को JAAC का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। यह जगह LoC से करीब 20 मील दूर है। लॉन्ग मार्च शुरू होने से पहले ही 5 जून को पाकिस्तान सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर प्रतिबंध लगा दिया। कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद आंदोलन नहीं रुका। रावलकोट में समर्थकों ने कई हफ्तों तक धरना जारी रखा, जबकि दूसरी तरफ सरकार और आंदोलन के बीच बातचीत भी चलती रही। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक जून की शुरुआत से 27 जुलाई तक प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों समेत कम से कम 30 लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार ने LoC को दुनिया के बाकी हिस्से से काटा न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर जब पिछले सप्ताह इलाके में पहुंचे तो उन्होंने पाया कि पाकिस्तान सरकार ने PoK के कई हिस्सों को लगभग बाहरी दुनिया से काट दिया है। पूरे इलाके में कई हफ्तों से इंटरनेट सेवा बंद थी। इसका असर सिर्फ मोबाइल और सोशल मीडिया पर नहीं पड़ा, बल्कि बैंक और ATM सेवाएं भी प्रभावित हुईं। मुजफ्फराबाद जाने वाली सड़कों पर जगह-जगह पुलिस की चौकियां बनाई गई थीं। नीलम और झेलम नदी के आसपास की ठंडी और हरी-भरी घाटियां, जहां आमतौर पर गर्मियों में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं, इस बार लगभग खाली दिखाई दीं। पाकिस्तान के सामने कई संकट PoK में उठा यह आंदोलन ऐसे समय में हो रहा है, जब पाकिस्तान पहले से कई मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सेना लंबे समय से उग्रवादी संगठनों के खिलाफ अभियान चला रही है, जिसमें हाल के वर्षों में हजारों सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर अब तक अपेक्षाकृत शांत माना जाता था। लेकिन JAAC के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन ने इस धारणा को बदल दिया है। अब पहली बार पाकिस्तान को उसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिसे वह लंबे समय से स्थिर और शांत बताता रहा है। आंदोलनकारियों और सरकार के बीच बातचीत बेनतीजा सरकार और आंदोलन के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका। अब पाकिस्तान सरकार ने आंदोलन के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का फैसला किया है। पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी का कहना है कि सरकार ने संगठन की लगभग सभी मांगें मान ली थीं। सिर्फ संवैधानिक बदलाव की मांग स्वीकार नहीं की गई। उन्होंने कहा, “अब यह विरोध प्रदर्शन नहीं रहा। ये लोग अब प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि दंगाई हैं।” दूसरी तरफ पाकिस्तान सरकार का कहना है कि PoK की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव करने से भारत के साथ कश्मीर विवाद पर उसकी कूटनीतिक स्थिति कमजोर हो जाएगी। सरकार का मानना है कि अगर विधानसभा की 12 आरक्षित सीटें खत्म कर दी गईं, तो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी इस प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे। इससे कश्मीर पर उसके दावे को नुकसान पहुंच सकता है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) की राजधानी मुजफ्फराबाद में पिछले सप्ताह प्रमुख राजनीतिक दलों के चुनावी बैनर लगे दिखाई दिए। भारत के फैसले के बाद बढ़ा PoK में तनाव एक्सपर्ट्स का मानना है कि PoK में चल रहे आंदोलन की शुरुआत 2019 की घटनाओं के बाद हुई। उसी साल भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था। इसके विरोध में PoK में भी प्रदर्शन हुए और लोग नियंत्रण रेखा (LoC) के उस पार रहने वाले कश्मीरियों के समर्थन में सड़कों पर उतरे। मुजफ्फराबाद के राजनीतिक कार्यकर्ता जाहिद अमीन का कहना है कि लोगों की नाराजगी सिर्फ भारत के फैसले से नहीं थी। उन्हें इस बात का भी गुस्सा था कि भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यही से पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ लोगों में नाराजगी बढ़नी शुरू हुई। JAAC बोली- पाकिस्तान

PoK Protest | Pakistan Reserved Seats Controversy & Government Stand

PoK Protest | Pakistan Reserved Seats Controversy & Government Stand

मुजफ्फराबाद2 मिनट पहले कॉपी लिंक पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर को लेकर कई बार युद्ध हो चुका है। दोनों देश इस हिमालयी इलाके पर अपना दावा करते हैं। भारत के साथ कश्मीर विवाद पर पाकिस्तान का पूरा ध्यान रहा। इसलिए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के लोगों की अपनी राजनीतिक समस्याएं लंबे समय तक दबकर रह गईं। लेकिन अब वहां हालात ऐसे हो गए हैं कि पाकिस्तान सरकार के लिए उन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल होता जा रहा है। महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब एक बड़े राजनीतिक आंदोलन में बदल चुका है। इसे कई वर्षों में पाकिस्तान सरकार के सामने PoK से उठी सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है। PoK में 3 चरणों में चुनाव हो रहे हैं। इस दौरान राजधानी मुजफ्फराबाद में सिक्योरिटी फोर्स गश्त करते हुए दिखाई दिए। PoK में आंदोलन की कमान किसके हाथ में है? PoK में आंदोलन का नेतृत्व जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) कर रही है। इसका गठन 2023 में हुआ था। इसमें व्यापारी, सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय राजनीतिक नेता शामिल हैं। शुरुआत में संगठन ने महंगी बिजली और आटे की बढ़ती कीमतों के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। 2024 और 2025 में हुए प्रदर्शनों के बाद पाकिस्तान सरकार को झुकना पड़ा। सरकार ने बिजली की दरें कम कीं और आटे पर सब्सिडी दी। इसके बाद PoK में आटा पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों की तुलना में काफी सस्ता मिलने लगा। 12 रिजर्व सीटें रद्द करने की मांग पर आंदोलन आंदोलनों के सफल होने से JAAC का जनाधार बढ़ा। अब संगठन महंगाई के मुद्दे से आगे बढ़कर PoK को ज्यादा स्वायत्तता और राजनीतिक अधिकार देने की मांग कर रहा है। सबसे बड़ी मांग PoK विधानसभा की 45 सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की है। ये सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहते हैं। JAAC का कहना है कि जो लोग पाकिस्तान के दूसरे शहरों में रहते हैं, उन्हें PoK की सरकार बनाने का अधिकार नहीं होना चाहिए। JAAC के मुताबिक इन 12 सीटों की वजह से स्थानीय मतदाताओं की राय का असर कम हो जाता है और अक्सर केंद्र की सत्ता में बैठी पार्टी को फायदा मिलता है। लॉन्ग मार्च पर रोक, कई नेता गिरफ्तार हुए JAAC ने 9 जून को रावलकोट से राजधानी मुजफ्फराबाद तक लॉन्ग मार्च का ऐलान किया। रावलकोट को JAAC का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। यह जगह LoC से करीब 20 मील दूर है। लॉन्ग मार्च होने से पहले ही 5 जून को पाकिस्तान सरकार ने आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी पर प्रतिबंध लगा दिया। कई प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बावजूद आंदोलन नहीं रुका। रावलकोट में समर्थकों ने कई हफ्तों तक धरना जारी रखा, जबकि दूसरी तरफ सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत भी चलती रही। स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक जून की शुरुआत से 27 जुलाई तक प्रदर्शनकारियों, पुलिसकर्मियों और आम नागरिकों समेत कम से कम 30 लोगों की मौत हो चुकी है। सरकार ने LoC को दुनिया के बाकी हिस्से से काटा न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टर जब पिछले सप्ताह इलाके में पहुंचे तो उन्होंने पाया कि पाकिस्तान सरकार ने PoK के कई हिस्सों को लगभग बाहरी दुनिया से काट दिया है। पूरे इलाके में कई हफ्तों से इंटरनेट सेवा बंद थी। इसका असर सिर्फ मोबाइल और सोशल मीडिया पर नहीं पड़ा, बल्कि बैंक और ATM सेवाएं भी प्रभावित हुईं। मुजफ्फराबाद जाने वाली सड़कों पर जगह-जगह पुलिस की चौकियां बनाई गई थीं। नीलम और झेलम नदी के आसपास की ठंडी और हरी-भरी घाटियां, जहां आमतौर पर गर्मियों में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं, इस बार लगभग खाली दिखाई दीं। पाकिस्तान के सामने कई संकट PoK में उठा यह आंदोलन ऐसे समय में हो रहा है, जब पाकिस्तान पहले से कई मोर्चों पर सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सेना लंबे समय से उग्रवादी संगठनों के खिलाफ अभियान चला रही है, जिसमें हाल के वर्षों में हजारों सुरक्षाकर्मी मारे जा चुके हैं। ऐसे माहौल में पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर अब तक तुलना में शांत माना जाता था। लेकिन JAAC के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन ने इस धारणा को बदल दिया है। अब पहली बार पाकिस्तान को उसी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जिसे वह लंबे समय से स्थिर और शांत बताता रहा है। आंदोलनकारियों और सरकार के बीच बातचीत बेनतीजा सरकार और आंदोलनकारियों के बीच कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका। अब पाकिस्तान सरकार ने आंदोलन के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का फैसला किया है। पाकिस्तान के गृह राज्य मंत्री तलाल चौधरी का कहना है कि सरकार ने संगठन की लगभग सभी मांगें मान ली थीं। सिर्फ संवैधानिक बदलाव की मांग स्वीकार नहीं की गई। उन्होंने कहा, “अब यह विरोध प्रदर्शन नहीं रहा। ये लोग अब प्रदर्शनकारी नहीं, बल्कि दंगाई हैं।” पाकिस्तान सरकार का कहना है कि PoK की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव करने से भारत के साथ कश्मीर विवाद पर उसकी कूटनीतिक स्थिति कमजोर हो जाएगी। सरकार का मानना है कि अगर विधानसभा की 12 आरक्षित सीटें खत्म कर दी गईं, तो पाकिस्तान के दूसरे हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी इस प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे। इससे कश्मीर पर उसके दावे को नुकसान पहुंच सकता है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) की राजधानी मुजफ्फराबाद में पिछले सप्ताह प्रमुख राजनीतिक दलों के चुनावी बैनर लगे दिखाई दिए। भारत के फैसले के बाद बढ़ा PoK में तनाव एक्सपर्ट्स का मानना है कि PoK में चल रहे आंदोलन की शुरुआत 2019 की घटनाओं के बाद हुई। उसी साल भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था। इसके विरोध में PoK में भी प्रदर्शन हुए और लोग नियंत्रण रेखा (LoC) के उस पार रहने वाले कश्मीरियों के समर्थन में सड़कों पर उतरे। मुजफ्फराबाद के राजनीतिक कार्यकर्ता जाहिद अमीन का कहना है कि लोगों की नाराजगी सिर्फ भारत के फैसले से नहीं थी। उन्हें इस बात का भी गुस्सा था कि भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यही से पाकिस्तानी नेताओं के खिलाफ लोगों में नाराजगी बढ़नी शुरू