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दुनियाभर में फूड कंपनियों की मुकदमेबाजी में लगे 600 साल:डब्ल्यूएचओ का आरोप; अदालती चक्करों में फंसाकर मोटापे की मुहिम कमजोर कर रहे ब्रांड्स

दुनियाभर में फूड कंपनियों की मुकदमेबाजी में लगे 600 साल:डब्ल्यूएचओ का आरोप; अदालती चक्करों में फंसाकर मोटापे की मुहिम कमजोर कर रहे ब्रांड्स

दुनिया की सबसे बड़ी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (पैकेज्ड चिप्स, नम्कीन, क्रिस्प्स) कंपनियां सेहतमंद खान-पान को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों को अदालतों में घसीटकर मोटापे के खिलाफ वैश्विक मुहिम को कमजोर कर रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम गेब्रेयेसस का तो कम से कम यही मानना है। उनका कहना है कि इन कंपनियों की मुकदमेबाजी की वजह से देशों को स्वास्थ्य और कानूनी खर्च के मद में हजारों करोड़ रुपए गंवाने पड़ रहे हैं। दिलचस्प यह है कि ज्यादातर मुकदमे कंपनियां हार जाती हैं। फिर भी मुकदमा ठोकना नहीं छोड़तीं। एक नई मल्टी-कंट्री (कई देश) जांच के मुताबिक, जितने भी मुकदमों का फैसला आ चुका है, उनमें से तीन-चौथाई में सरकारों की ही जीत हुई। लेकिन गेब्रेयेसस के मुताबिक, हारी हुई कंपनियां भी असल में बड़ा दांव जीत जाती हैं क्योंकि मुकदमा लड़ते-लड़ते ही नीति वर्षों तक अटकी रहती है। जांच में सामने आया कि दुनियाभर में इस तरह की मुकदमेबाजी में अब तक 600 साल लग हो चुके हैं, यानी हर मुकदमे में औसतन ढाई साल लग रहे हैं। यह जांच ‘द गार्जियन’ ने रॉबर्ट एंड एथेल कैनेडी ह्यूमन राइट्स सेंटर, सिडनी यूनिवर्सिटी, साओ पाउलो यूनिवर्सिटी और काल्डास यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर की। जांच के मुताबिक, पैकेट के आगे लगने वाले वॉर्निंग लेबल पर सबसे ज्यादा, फिर जंक फूड पर टैक्स और इसके बाद विज्ञापन-मार्केटिंग पर लगी पाबंदियों को लेकर कंपनियों ने सबसे ज्यादा सरकारों को अदालत तक घसीटा। गेब्रेयेसस ने कहा, ‘अगर कंपनियां सच में मोटापे से लड़ने में मदद करना चाहती हैं, तो उन्हें मुकदमेबाजी छोड़नी होगी।’ 2024 में दुनियाभर में करीब 1 अरब लोग, यानी हर सातवां इंसान, मोटापे का शिकार था। गेब्रेयेसस के मुताबिक, जिन देशों ने वॉर्निंग लेबल, टैक्स और विज्ञापन पाबंदी जैसी नीतियां लागू कीं, वहां नतीजे बेहतर मिले हैं। 38% मुकदमे कोका-कोला, पेप्सिको जैसी सिर्फ 8 कंपनियों ने किए जिन मुकदमों में कंपनी की पहचान जाहिर हुई, उनमें से 38% सिर्फ आठ बड़ी पैरेंट कंपनियों से जुड़े थे। कोका-कोला, पेप्सिको, मोंडेलेज, केलॉग्स, डैनोन, फेरेरो, जिग्नक्स और हार्टलैंड फूड प्रोडक्ट्स ग्रुप इनमें शामिल हैं। यानी दुनिया की मुट्ठीभर बड़ी फूड कंपनियां ही सरकारों के खिलाफ सबसे ज्यादा कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। इनमें से कुछ कंपनियों ने तो अदालत से अपनी पहचान गुप्त रखने की गुजारिश भी की, ताकि जनता को यह पता ही न चले कि मुकदमा किसने दायर किया है।

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