Willie Walsh Appointed IndiGo CEO

Hindi News Career Willie Walsh Appointed IndiGo CEO | August 4 Current Affairs Update 27 मिनट पहले कॉपी लिंक आज के प्रमुख करेंट अफेयर्स, जो सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स के लिए जरूरी हैं- नेशनल (NATIONAL) 1. विली वॉल्श ने IndiGo के CEO का कार्यभार संभाला 3 अगस्त को विली वॉल्श ने IndiGo के नए चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) का पदभार संभाला। विली का पूरा नाम विलियम मैथ्यू वॉल्श है। वॉल्श मार्च में इंडिगो के CEO पीटर एल्बर्स के रिजाइन के बाद अपॉइंट किये गए हैं। वॉल्श ने 1979 में एर लिंगस में पायलट के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। वॉल्श 2005 से 2011 तक ब्रिटिश एयरवेज में रहे और बाद में ब्रिटिश एयरवेज के CEO बने। वॉल्श वर्तमान में इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) के डायरेक्टर जनरल थे। IAG के तहत आयरलैंड की एयरो लिंगस, स्पेन की आइबिरिया और ब्रिटिश की वीलिंग जैसी बड़ी एयरलाइंस आती हैं। IndiGo (इंडिगो) IndiGo भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन कंपनी है। IndiGo यानी InterGlobe Aviation भारत की सबसे बड़ी और सबसे व्यस्त एयरलाइन है। इसको 2006 में स्थापित किया गया था। IndiGo एक लो-कॉस्ट कैरियर ( LCC) है, यानी कम किराए में हवाई यात्रा की सुविधा प्रदान करती है। IndiGo का मुख्यालय गुरुग्राम, हरियाणा में है। इसके संस्थापक राहुल भाटिया और राकेश गंगवाल हैं। IndiGo ने 90 से ज्यादा घरेलू और 40 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों के लिए उड़ानें संचालित करती है। वॉल्श ब्रिटिश एयरबेस और इंटरनेशनल एयरलाइंस ग्रुप (IAG) के CEO रह चुके हैं। 2. उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्री बख्तियार सैदोव भारत यात्रा पर आए 3 अगस्त को उज्बेकिस्तान के विदेश मंत्री बख्तियार सैदोव भारत दौरे पर आए। सैदोव ने पहले दिन राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की। वे इस यात्रा के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ हैदराबाद हाउस में द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। वार्ता में व्यापार, निवेश, ऊर्जा, कनेक्टिविटी, शिक्षा, संस्कृति और क्षेत्रीय सुरक्षा सहित कई अहम विषयों पर चर्चा होने की संभावना है। सैदोव राजधानी में एक विशेष बिजनेस फोरम में भी हिस्सा लेंगे। वे इस यात्रा के दौरान हैदराबाद हाउस में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से भी मुलाकात करेंगे और द्विपक्षीय बैठक करेंगे। इसका उद्देश्य व्यापार, निवेश, ऊर्जा और सुरक्षा के क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करना है। भारत और उज्बेकिस्तान के बीच राजनयिक संबंधों की शुरुआत करने के प्रोटोकॉल पर 18 मार्च 1992 में साइन किये। भारत और उज्बेकिस्तान ने 27 मई को उज्बेकिस्तान के वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गनाइजेशन में शामिल होने के सिलसिले में बाइलेटरल मार्केट एक्सेस प्रोटोकॉल पर साइन किए थे। भारत और उज्बेकिस्तान ने 2011 में अपनी रणनीतिक साझेदारी शुरू की थी। फैसला (JUDGMENT) 3. लिव-इन पार्टनर को धारा 498A के तहत कानूनी सुरक्षा 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पार्टनर को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं/पूर्व IPC की धारा 498A के तहत कानूनी संरक्षण का अधिकार होगा। दरअसल धारा 498A विवाहित महिला को पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता से कानूनी सुरक्षा देता है। कोर्ट ने कहा है कि क्रूरता से बचाव का अधिकार सभी को मिलना चाहिए इसे शादी तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। आर्टिकल 498A के मुताबिक, लिव इन में रहने वाले किसी भी पार्टनर को चाहे वो पुरुष हो या महिला सुरक्षा का पूरा अधिकार होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को भी घरेलू हिंसा और क्रूरता से संरक्षण मिल सकता है, बस इसमें ये देखना होगा कि मामला कानूनी मानदंडों पर सही हो। हालांकि कोर्ट ने ये साफ किया है कि इसमें सिर्फ रिश्ते का नाम नहीं, बल्कि उसकी परिस्थितियों को भी देखा जाएगा। हर लिव-इन को रिश्ते की तरह नहीं माना जा सकता। ये तय करने के लिए कि सुरक्षा मिलेगी या नहीं, अदालत संबंध की प्रकृति, समय, साथ रहने की स्थिति और अन्य तथ्यों पर विचार करेगी। आर्टिकल 498A (पूर्व IPC) आर्टिकल 498A का उद्देश्य विवाहित महिला को पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता (Cruelty) से कानूनी सुरक्षा देना था। भारतीय दंड संहिता (IPC) की जगह पर अब भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 लागू है, लेकिन ऐसे मामलों में न्यायालय पूर्व कानूनी सिद्धांतों का भी संदर्भ ले सकता है। इनमें मारपीट या मानसिक उत्पीड़न, ऐसा व्यवहार जिससे महिला आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाए या उसके जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को गंभीर खतरा हो में इस कानून का उपयोग होगा। आर्टिकल 498A के तहत अधिकतम 3 साल की सजा और साथ में जुर्माना भी लगाया जा सकता था। परस्थितियों को देखते हुए समझौता न होने योग्य स्थिति में गैर जमानती वारंट भी जारी किया जा सकता है। स्पोर्ट्स (SPORTS) 4. ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत चौथे नंबर पर 3 अगस्त को ग्लासगो में चल रहा कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 खत्म हुआ। भारत ने 13 गोल्ड, 17 सिल्वर और 9 ब्रॉन्ज समेत कुल 39 मेडल जीते। भारत मेडल टैली में चौथे नंबर पर रहा। वहीं ऑस्ट्रेलिया 70 गोल्ड समेत 171 मेडल के साथ पहले नंबर पर आया। इंग्लैंड ने कुल 110 मेडल जीते और कनाडा 62 मेडल के साथ तीसरे नंबर पर रहा। भारत के 39 पदकों में सबसे बड़ा योगदान बॉक्सिंग का रहा। मुक्केबाजों ने 7 गोल्ड और 3 सिल्वर समेत कुल 10 मेडल जीते। इसका मतलब हर चार में से एक मेडल बॉक्सिंग से आया। एथलेटिक्स में 10 मेडल आए, लेकिन इसमें गोल्ड नहीं मिला। वेटलिफ्टिंग से 8, पैरा एथलेटिक्स से 6, जूडो से 4 और पैरा पावरलिफ्टिंग से 1 मेडल मिला। कुल मिलाकर 39 में से 37 पदक सिर्फ पांच खेलों से आए। रविवार रात को इसकी क्लोजिंग सेरेमनी हुई। उसके बाद कॉमनवेल्थ स्पोर्ट्स के प्रेसिडेंट डॉ. डोनाल्ड रुका ने 2030 गेम्स के मेजबान भारत को मशाल सौंपी। इस दौरान नीरज चोपड़ा, इंडियन ओलिंपिक एसोसिएशन की प्रेसिडेंट पीटी ऊषा और गुजरात के डिप्टी सीएम हर्ष संघवी मौजूद रहे। इस बार ग्लासगो में सिर्फ 10 खेल शामिल थे, जबकि बर्मिंघम में 19 खेल खेले गए थे। बैडमिंटन, कुश्ती, शूटिंग, हॉकी, टेबल टेनिस और क्रिकेट जैसे खेल ग्लासगो गेम्स का हिस्सा नहीं थे, जिनसे 2022 में भारत को 30 पदक मिले थे। इसके अलावा भारत ने 210 खिलाड़ियों की जगह सिर्फ 123 खिलाड़ियों का
Kishore Kumar Birth Anniversary; Car Buried Story

1 घंटे पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र कॉपी लिंक किशोर कुमार का बचपन का नाम आभास कुमार गांगुली था। हिंदी सिनेमा के सबसे बहुमुखी कलाकारों में किशोर कुमार का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। उन्होंने अभिनय, संगीत, निर्देशन और फिल्म निर्माण किया, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी आवाज बनी। चार दशक तक उन्होंने मोहम्मद रफी, मुकेश और मन्ना डे जैसे दिग्गजों के बीच अपनी अलग जगह बनाई। जितने शानदार वे गायक थे, उतनी ही रहस्यमयी उनकी निजी जिंदगी थी। कोई उन्हें सनकी कहता था, कोई जीनियस, तो कोई उनकी संवेदनशीलता का कायल था। उनके व्यक्तित्व के कई रंग थे, जिन्हें सिर्फ करीबी लोग ही समझ पाए। 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा में जन्मे किशोर कुमार की 97वीं बर्थ एनिवर्सरी पर पढ़िए उनकी जिंदगी के कुछ दिलचस्प किस्से, जो बताते हैं कि पर्दे पर लोगों को हंसाने वाला यह कलाकार असल जिंदगी में कितना अलग था। बचपन की एक चोट और उससे जुड़ा उनकी आवाज का सबसे चर्चित किस्सा किशोर कुमार की आवाज दुनिया की सबसे अलग आवाजों में गिनी जाती है। उनके सुरों के खुरदरेपन, लचक और सहजता से जुड़ा एक पारिवारिक संस्मरण चर्चित है। बड़े भाई अशोक कुमार ने कई इंटरव्यू में बताया था कि बचपन में किशोर के पैर में गहरी चोट लगी थी। दर्द इतना था कि वे घंटों रोते रहे। परिवार का मानना था कि लंबे समय तक रोने से उनकी आवाज का टेक्सचर बदल गया और वही आगे चलकर उनकी पहचान बना। कॉलेज की कैंटीन का उधार, जिसने ‘पांच रुपैया बारह आना’ को जन्म दिया इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान किशोर कुमार की शरारतें मशहूर थीं। वे अक्सर कैंटीन में उधार पर पोहा और जलेबी खाते थे। धीरे-धीरे उधार पांच रुपया बारह आना हो गया। कैंटीन मालिक पैसे मांगता, तो किशोर कुमार गाकर उसे टालने की कोशिश करते। वर्षों बाद फिल्म चलती का नाम गाड़ी के ‘पांच रुपैया बारह आना’ गीत ने धूम मचाई। माना जाता है कि इस गाने की प्रेरणा उसी उधार से मिली थी। मुंबई आए तो अभिनेता नहीं, सिर्फ गायक बनने का सपना था किशोर कुमार अभिनेता नहीं, गायक बनना चाहते थे। वे मुंबई अपने आदर्श के.एल. सहगल की तरह गायक बनने आए थे। बड़े भाई अशोक कुमार के स्टार होने के कारण उन्हें अभिनय के प्रस्ताव मिलने लगे। शुरुआती दिनों में उन्होंने परिवार और निर्माताओं की इच्छा पर कई फिल्में कीं। बाद में उनकी कॉमिक टाइमिंग ने उन्हें सफल अभिनेता बनाया, लेकिन उन्होंने माना कि उनका पहला प्यार हमेशा गायकी ही रही। ‘आनंद’ पहले किशोर कुमार को ऑफर हुई थी, लेकिन एक गलतफहमी ने बदल दिया हिंदी सिनेमा का इतिहास 1971 में रिलीज हुई ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद भारतीय सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में गिनी जाती है। टाइटल रोल के लिए राजेश खन्ना पहली पसंद नहीं थे। गीतकार-लेखक गुलजार ने अपनी संस्मरण पुस्तक Actually… I Met Them में लिखा है कि ऋषिकेश मुखर्जी इस फिल्म में किशोर कुमार को लेना चाहते थे। अमित कुमार ने भी एक इंटरव्यू में कहा कि उनके पिता को सबसे पहले इस फिल्म का प्रस्ताव मिला था। इस किस्से का सबसे चर्चित हिस्सा एक गलतफहमी से जुड़ा है। बताया जाता है कि एक बंगाली आयोजक से भुगतान विवाद के बाद किशोर कुमार ने दरबान से कह रखा था कि वह व्यक्ति दोबारा आए तो उसे अंदर न आने दिया जाए। संयोग से ऋषिकेश मुखर्जी कहानी सुनाने पहुंचे, तो दरबान ने उन्हें भी वही व्यक्ति समझकर लौटा दिया। इससे ऋषिकेश मुखर्जी आहत हो गए और उन्होंने किशोर कुमार के साथ फिल्म बनाने का विचार छोड़ दिया। बाद में आनंद का रोल राजेश खन्ना को मिला, जो उनके करियर की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हुई। हालांकि, इस कहानी का दूसरा पक्ष भी है। गुलजार ने अपनी किताब में लिखा है कि फिल्म शुरू होने से कुछ दिन पहले किशोर कुमार सिर मुंडवाकर ऋषिकेश मुखर्जी के सामने पहुंचे और मजाक में गाने लगे, “अब क्या करोगे, ऋषि?” इसके बाद फिल्म के लिए नए अभिनेता की तलाश शुरू हुई। इसलिए फिल्म छूटने की असली वजह को लेकर आज भी अलग-अलग दावे किए जाते हैं। किशोर कुमार, के.एल. सहगल के गानों से प्रभावित थे और उन्हीं की तरह गायक बनना चाहते थे। सहगल से मिलने की चाह में 18 साल की उम्र में मुंबई पहुंचे, लेकिन उनकी इच्छा पूरी नहीं हो पाई। मुंबई में भी मजाक नहीं छोड़ा, बना लिया अपना रेट कार्ड संगीत के प्रति जितना जुनून था, हास्यबोध भी उतना ही गजब का था। फिल्म पत्रकारों और संस्मरणों के मुताबिक, शुरुआती दिनों में दोस्तों की महफिल में किशोर कुमार मजाक में अपना रेट कार्ड बताते थे। कहते थे- अगर अशोक कुमार का गाना सुनना है तो 25 पैसे, किसी और का 50 पैसे और के.एल. सहगल का गीत सुनना है तो एक रुपया देना पड़ेगा। के.एल. सहगल उनके सबसे बड़े आदर्श थे और वे उन्हें अपना गुरु मानते थे। इसलिए एचएमवी ने जब सहगल के गीतों का एल्बम रिकॉर्ड करने का प्रस्ताव दिया, तो उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि लोग यह न कहें कि उन्होंने अपने गुरु से बेहतर गाया। शास्त्रीय संगीत नहीं सीखा, फिर भी बने भारतीय सिनेमा की सबसे अलग आवाज किशोर कुमार ने कभी शास्त्रीय संगीत की औपचारिक शिक्षा नहीं ली। इसके बावजूद उन्होंने सुरों पर ऐसी पकड़ बनाई, जो आज भी संगीत विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का विषय है। सचिन देव बर्मन ने उनकी प्राकृतिक प्रतिभा पहचानी और मौलिक शैली बनाए रखने की सलाह दी। बाद में आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी और बप्पी लाहिड़ी समेत लगभग हर बड़े संगीतकार ने उनकी नैसर्गिक गायकी का भरपूर इस्तेमाल किया। चार राष्ट्रीय और आठ फिल्मफेयर पुरस्कार जीतने वाले किशोर कुमार बिना औपचारिक प्रशिक्षण के भी गायकी की परिभाषा बदलने वाले गायक माने जाते हैं। सचिन देव बर्मन ने पहचानी आवाज, फिर शुरू हुआ सुनहरे दौर का सफर गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे किशोर कुमार को शुरुआती दौर में पहचान बनाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। उस समय फिल्म इंडस्ट्री पर मोहम्मद रफी, तलत महमूद और मुकेश का दबदबा था। इसी बीच एस.डी. बर्मन ने उनकी नैसर्गिक गायकी पहचानी। आर.डी. बर्मन और फिल्म इतिहासकारों के मुताबिक, एस.डी. बर्मन उन्हें किसी की नकल न









