Avarapan 2 vs Bantwara 1947 Box Office Collection

10 मिनट पहले कॉपी लिंक सनी देओल स्टारर फिल्म ‘बंटवारा 1947’ को बॉक्स ऑफिस पर 14 अगस्त को रिलीज हुई ‘आवारापन 2’ से कड़ी टक्कर मिल रही है। सैकनिल्क के मुताबिक, ‘आवारापन 2’ ने रिलीज के दूसरे दिन ₹33.75 करोड़ नेट का कलेक्शन किया। इसके साथ भारत में फिल्म की कुल नेट कमाई ₹55.75 करोड़ और वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन ₹72.90 करोड़ पहुंच गया है। वहीं, ‘बंटवारा 1947’ ने दूसरे दिन ₹13.50 करोड़ नेट कमाए। फिल्म का भारत में कुल नेट कलेक्शन ₹19.25 करोड़ और वर्ल्डवाइड ग्रॉस कलेक्शन ₹26.41 करोड़ हो गया है। राजकुमार संतोषी के निर्देशन में बनी ‘बंटवारा 1947’ में सनी देओल के साथ प्रीति जिंटा, शबाना आजमी, अली फजल, करण देओल और अभिमन्यु सिंह अहम भूमिकाओं में हैं। फिल्म भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित है और इसे आमिर खान ने प्रोड्यूस किया है। ‘बंटवारा 1947’ फिल्म में सनी देओल ने सिकंदर मिर्जा का किरदार निभाया है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर फिल्म की कमाई में दूसरे दिन उछाल देखने को मिला। सैकनिल्क के अनुसार, फिल्म ने दूसरे दिन 8,071 शोज के दौरान ₹13.50 करोड़ नेट कमाए। भारत में फिल्म का ग्रॉस कलेक्शन ₹22.91 करोड़ और ओवरसीज ग्रॉस ₹3.50 करोड़ है। मुंबई में हुई स्पेशल स्क्रीनिंग इसी बीच शनिवार, 15 अगस्त को मुंबई में ‘बंटवारा 1947’ की स्पेशल स्क्रीनिंग रखी गई। फिल्म की स्क्रीनिंग में शरद शुक्ला, अभिमन्यु सिंह, मकरंद देशपांडे और परितोष त्रिपाठी समेत कई बॉलीवुड सेलेब्स नजर आए। ‘आवारापन 2’ में इमरान का पुराना किरदार नितिन कक्कड़ के निर्देशन और विशेष भट्ट के प्रोडक्शन में बनी ‘आवारापन 2’ में इमरान हाशमी ‘शिवम पंडित’ के अपने मशहूर किरदार में लौटे हैं। फिल्म में शबाना आजमी, दिशा पाटनी और सुविंदर विक्की भी अहम भूमिकाओं में हैं। ‘आवारापन 2’ इमरान हाशमी की साल 2007 की फ्लॉप लेकिन कल्ट क्लासिक फिल्म ‘आवारापन’ का आधिकारिक सीक्वल है। ‘आवारापन 3’ को लेकर इमरान हाशमी ने हिंट दिया वहीं, फिल्म के शानदार प्रदर्शन के बीच इमरान हाशमी ने ‘आवारापन 3’ के तीसरे पार्ट को लेकर हिंट दिया। शुक्रवार को इमरान एक थिएटर में पहुंचे और उन्होंने लोगों से कहा कि ये फिल्म आप लोगों की वजह से संभव हुई है। 19 साल में शिवम और ‘आवारापन’ को जो प्यार मिला है, यह फिल्म मेकर्स से ज्यादा फैन्स की है। उन्होंने आगे कहा कि इसलिए हम वापस आए भी और इस जर्नी को हमने और रोमांचक बनाया है। इसमें और एक्शन और इमोशंस जोड़े हैं। उम्मीद यही है कि आपको पूरी फिल्म पसंद आएगी और हां, उम्मीद है कि ‘आवारापन 3’ भी बहुत जल्द आएगी। धन्यवाद। ………….. यह खबर भी पढ़ें… मूवी रिव्यू; आवारापन 2:इमरान हाशमी की दमदार वापसी, दर्द और अधूरे इश्क की कहानी जो पुराने जख्म फिर ताजा कर दे 2007 की आवारापन अपने दर्द, मोहब्बत और संगीत की वजह से आज भी याद की जाती है। आवारापन 2 उसी भावनात्मक विरासत को आगे बढ़ाती है। इस बार शिवम की लड़ाई सिर्फ उसके अतीत से नहीं, बल्कि बच्चों की तस्करी के एक बड़े गिरोह से भी है। फिल्म में एक्शन और रोमांस है, लेकिन इसकी असली ताकत दर्द, रिश्तों और संगीत में है। पूरी खबर यहां पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔
कैम्ब्रिज के सबसे कम उम्र के ब्लैक प्रोफेसर की मौत:घर में बेहोश मिले, रिसर्च पर उठे सवालों के बाद यूनिवर्सिटी से इस्तीफा दिया था

इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर रहे जेसन अर्डे का 41 साल की उम्र में निधन हो गया। वे शिक्षा और समाज से जुड़े विषयों पर रिसर्च और अध्यापन करते थे। शुक्रवार दोपहर करीब 3 बजे उन्हें दक्षिण लंदन के बैटरसी स्थित उनके घर में बेहोश पाया गया। एंबुलेंस टीम ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उनकी मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, उनकी मौत अचानक हुई। अभी तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे मौत को संदिग्ध माना जाए। पुलिस परिवार के संपर्क में है और मामले की जांच कर रही है। मौत से कुछ दिन पहले ही कैम्ब्रिज से दिया था इस्तीफा जेसन अर्डे ने 5 अगस्त को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इस्तीफा दिया था। यह फैसला उनकी कुछ रिसर्च को लेकर उठे सवालों के बीच आया था। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने उनकी नियुक्ति और यूनिवर्सिटी में उनके कामकाज की जांच भी शुरू की थी। यूनिवर्सिटी यह पता लगा रही थी कि अर्डे को 2022 में प्रोफेसर की नौकरी कैसे मिली और उनके काम के दौरान क्या हुआ। इस्तीफा देने के बाद अर्डे ने कहा था कि लगातार लग रहे आरोपों और उनके बारे में सार्वजनिक रूप से की जा रही टिप्पणियों का उन पर बहुत गहरा असर पड़ा। रिसर्च के कुछ हिस्सों पर नकल के आरोप लगे थे अर्डे ने 2015 में ब्रिटेन की लिवरपूल जॉन मूर्स यूनिवर्सिटी से पीएचडी की थी। इस दौरान उन्होंने एक रिसर्च रिपोर्ट लिखी थी। बाद में उनकी रिसर्च के कुछ हिस्सों पर आरोप लगे कि उन्होंने दूसरे लोगों के लिखे काम को बिना उचित श्रेय दिए अपनी रिसर्च में इस्तेमाल किया। आसान भाषा में कहें तो उन पर रिसर्च में नकल करने का आरोप लगा था। अर्डे ने इन आरोपों को गलत बताया था। इसके बाद उनकी कुछ दूसरी रिसर्च में भी गलतियां होने के आरोप लगाए गए। नियुक्ति पर भी उठे थे सवाल अर्डे की कैम्ब्रिज में नियुक्ति को लेकर भी विवाद हुआ था। कुछ लोगों ने आरोप लगाया था कि उन्हें उनकी योग्यता के बजाय यूनिवर्सिटी की विविधता बढ़ाने वाली नीति के तहत नौकरी दी गई। इस तरह की नीतियों को आम तौर पर DEI कहा जाता है। इसका मतलब है कि अलग-अलग समुदायों और कम प्रतिनिधित्व वाले लोगों को संस्थानों में बराबर मौके दिए जाएं और उनकी भागीदारी बढ़ाई जाए। हालांकि, ब्रिटेन की शिक्षक यूनियन के नेता डेनियल कबेडे ने अर्डे का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि अर्डे को सार्वजनिक रूप से बहुत बुरी तरह निशाना बनाया गया। उन्होंने ब्रिटिश मीडिया और दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों के एक वर्ग पर अर्डे के खिलाफ नस्लवादी अभियान चलाने का आरोप लगाया था। परिवार बोला- गलत जानकारी के अभियान ने उन्हें बहुत परेशान किया अर्डे के परिवार ने उनके निधन पर गहरा दुख जताया। परिवार ने कहा कि जेसन के बारे में फैलाई जा रही गलत जानकारी के अभियान का उन पर बहुत बुरा असर पड़ा था। परिवार के मुताबिक, अर्डे शांत स्वभाव के व्यक्ति थे और हमेशा दूसरों में अच्छाई देखने की कोशिश करते थे। परिवार ने मीडिया से अपील की कि अब उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए। उन्होंने जेसन और उनके परिवार के खिलाफ लंबे समय से चल रहे उत्पीड़न को रोकने की भी अपील की। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की प्रमुख डेबोरा प्रेंटिस ने अर्डे की मौत पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि इस मुश्किल समय में उनकी संवेदनाएं अर्डे के परिवार और दोस्तों के साथ हैं। ब्रिटेन की शिक्षा मंत्री लूसी पॉवेल ने भी उनके निधन पर शोक जताया। 2022 में कैम्ब्रिज में बनाया था इतिहास जेसन अर्डे 2022 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शिक्षा विभाग में प्रोफेसर बने थे। वे यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर थे। कैम्ब्रिज में लंबे समय से अश्वेत लोगों की संख्या कम रही है। ऐसे में अर्डे की नियुक्ति को यूनिवर्सिटी के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया था। उनकी मौत ऐसे समय हुई है, जब उनकी नियुक्ति और रिसर्च को लेकर यूनिवर्सिटी में जांच चल रही थी।
कैम्ब्रिज के सबसे कम उम्र के ब्लैक प्रोफेसर की मौत:घर में बेहोश मिले, रिसर्च पर उठे सवालों के बाद यूनिवर्सिटी से इस्तीफा दिया था

इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर रहे जेसन अर्डे का 41 साल की उम्र में निधन हो गया। वे शिक्षा और समाज से जुड़े विषयों पर रिसर्च और अध्यापन करते थे। शुक्रवार दोपहर करीब 3 बजे उन्हें दक्षिण लंदन के बैटरसी स्थित उनके घर में बेहोश पाया गया। एंबुलेंस टीम ने उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उनकी मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, उनकी मौत अचानक हुई। अभी तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे मौत को संदिग्ध माना जाए। पुलिस परिवार के संपर्क में है और मामले की जांच कर रही है। मौत से कुछ दिन पहले ही कैम्ब्रिज से दिया था इस्तीफा जेसन अर्डे ने 5 अगस्त को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इस्तीफा दिया था। यह फैसला उनकी कुछ रिसर्च को लेकर उठे सवालों के बीच आया था। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने उनकी नियुक्ति और यूनिवर्सिटी में उनके कामकाज की जांच भी शुरू की थी। यूनिवर्सिटी यह पता लगा रही थी कि अर्डे को 2022 में प्रोफेसर की नौकरी कैसे मिली और उनके काम के दौरान क्या हुआ। इस्तीफा देने के बाद अर्डे ने कहा था कि लगातार लग रहे आरोपों और उनके बारे में सार्वजनिक रूप से की जा रही टिप्पणियों का उन पर बहुत गहरा असर पड़ा। रिसर्च के कुछ हिस्सों पर नकल के आरोप लगे थे अर्डे ने 2015 में ब्रिटेन की लिवरपूल जॉन मूर्स यूनिवर्सिटी से पीएचडी की थी। इस दौरान उन्होंने एक रिसर्च रिपोर्ट लिखी थी। बाद में उनकी रिसर्च के कुछ हिस्सों पर आरोप लगे कि उन्होंने दूसरे लोगों के लिखे काम को बिना उचित श्रेय दिए अपनी रिसर्च में इस्तेमाल किया। आसान भाषा में कहें तो उन पर रिसर्च में नकल करने का आरोप लगा था। अर्डे ने इन आरोपों को गलत बताया था। इसके बाद उनकी कुछ दूसरी रिसर्च में भी गलतियां होने के आरोप लगाए गए। नियुक्ति पर भी उठे थे सवाल अर्डे की कैम्ब्रिज में नियुक्ति को लेकर भी विवाद हुआ था। कुछ लोगों ने आरोप लगाया था कि उन्हें उनकी योग्यता के बजाय यूनिवर्सिटी की विविधता बढ़ाने वाली नीति के तहत नौकरी दी गई। इस तरह की नीतियों को आम तौर पर DEI कहा जाता है। इसका मतलब है कि अलग-अलग समुदायों और कम प्रतिनिधित्व वाले लोगों को संस्थानों में बराबर मौके दिए जाएं और उनकी भागीदारी बढ़ाई जाए। हालांकि, ब्रिटेन की शिक्षक यूनियन के नेता डेनियल कबेडे ने अर्डे का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि अर्डे को सार्वजनिक रूप से बहुत बुरी तरह निशाना बनाया गया। उन्होंने ब्रिटिश मीडिया और दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों के एक वर्ग पर अर्डे के खिलाफ नस्लवादी अभियान चलाने का आरोप लगाया था। परिवार बोला- गलत जानकारी के अभियान ने उन्हें बहुत परेशान किया अर्डे के परिवार ने उनके निधन पर गहरा दुख जताया। परिवार ने कहा कि जेसन के बारे में फैलाई जा रही गलत जानकारी के अभियान का उन पर बहुत बुरा असर पड़ा था। परिवार के मुताबिक, अर्डे शांत स्वभाव के व्यक्ति थे और हमेशा दूसरों में अच्छाई देखने की कोशिश करते थे। परिवार ने मीडिया से अपील की कि अब उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए। उन्होंने जेसन और उनके परिवार के खिलाफ लंबे समय से चल रहे उत्पीड़न को रोकने की भी अपील की। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की प्रमुख डेबोरा प्रेंटिस ने अर्डे की मौत पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि इस मुश्किल समय में उनकी संवेदनाएं अर्डे के परिवार और दोस्तों के साथ हैं। ब्रिटेन की शिक्षा मंत्री लूसी पॉवेल ने भी उनके निधन पर शोक जताया। 2022 में कैम्ब्रिज में बनाया था इतिहास जेसन अर्डे 2022 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के शिक्षा विभाग में प्रोफेसर बने थे। वे यूनिवर्सिटी के सबसे कम उम्र के अश्वेत प्रोफेसर थे। कैम्ब्रिज में लंबे समय से अश्वेत लोगों की संख्या कम रही है। ऐसे में अर्डे की नियुक्ति को यूनिवर्सिटी के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना गया था।
UPPSC & SBI Recruitment 2026

Hindi News Career UPPSC & SBI Recruitment 2026 | Latest Govt Jobs Vacancy List Apply Now 12 मिनट पहले कॉपी लिंक इस हफ्ते निकली हैं स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग सहित कई विभागों में 14,045 पदों पर नौकरियां। अगर आप भी इन पदों के लिए अप्लाई करना चाहते हैं, तो इन 6 नौकरियों की डिटेल्ड जानकारी 6 ग्राफिक्स के जरिए जानिए: ऑफिशियल नोटिफिकेशन लिंक ऑफिशियल नोटिफिकेशन लिंक ऑफिशियल नोटिफिकेशन लिंक ऑफिशियल नोटिफिकेशन लिंक ऑफिशियल नोटिफिकेशन लिंक ऑफिशियल नोटिफिकेशन लिंक . दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं… अग्निवीरों को फायर सर्विस, जेल विभाग भर्ती में 20% आरक्षण: उम्र सीमा और PET में छूट, CAPF में 50% आरक्षण पहले से घोषित जॉब – एजुकेशन कॉपी लिंक शेयर SBI में 9124 पदों पर निकली भर्ती: सैलरी 64 हजार के साथ अलाउंस भी मिलेंगे, ग्रेजुएट्स करें अप्लाई जॉब – एजुकेशन कॉपी लिंक शेयर JNU में उमर खालिद की किताब पर बवाल: ऑडिटोरियम की बुकिंग रद्द, दूसरे कैंपस में आयोजन, विरोधी छात्रों ने खूब लगाए नारे जॉब – एजुकेशन कॉपी लिंक शेयर
Israel Election 2026 | PM Netanyahu Faces Challenge From Gadi Eizenkot

तेल अवीव2 मिनट पहले कॉपी लिंक इजराइल में 27 अक्टूबर को होने वाले चुनाव से पहले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट से बड़ी चुनौती मिलती दिख रही है। गुरुवार को सामने आए जमान इजराइल के नए सर्वे में आइजेनकोट की विपक्षी पार्टी यशार को 25 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। वहीं नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 21 सीटों पर सिमट सकती है। यानी यशार ने लिकुड पर 4 सीट की बढ़त बना ली है। पिछले कुछ हफ्तों के ज्यादातर सर्वे में भी यशार आगे रही है, लेकिन अंतर बहुत कम था। कई सर्वे में लिकुड बराबरी पर थी या सिर्फ 1-2 सीट पीछे थी। नए सर्वे में यह अंतर बढ़कर 4 सीट हो गया है। 120 सीटों वाली संसद में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी यशार के सबसे बड़ी पार्टी बनने के बावजूद चुनाव के बाद सरकार बनना आसान नहीं होगा। इजराइल की संसद नेसेट में कुल 120 सीटें हैं और बहुमत के लिए कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है। सर्वे में नेतन्याहू विरोधी दलों के ‘चेंज ब्लॉक’ को 58 सीटें मिलने का अनुमान है। यानी यह गठबंधन बहुमत से सिर्फ 3 सीट दूर नजर आ रहा है। दूसरी ओर नेतन्याहू के समर्थक दलों को कुल 50 सीटें मिलने का अनुमान है। अरब पार्टियों को 12 सीटें मिल सकती हैं। इनमें राम पार्टी और हदाश-ताल को 6-6 सीटें मिलने का अनुमान है। इसका मतलब है कि चुनाव से पहले किसी भी बड़े खेमे के पास सरकार बनाने लायक साफ बहुमत नहीं है। आइजेनकोट बोले- सबसे बड़ी पार्टी के नेता को मौका मिलना चाहिए आइजेनकोट की बढ़त के बीच नेतन्याहू विरोधी खेमे के विपक्षी नेता याइर लैपिड की पार्टी बीयाचद ने कहा है कि वह विपक्षी सरकार बनने के रास्ते में रुकावट नहीं डालेगी। लेकिन जब लैपिड से पूछा गया कि क्या उनकी पार्टी आइजेनकोट को प्रधानमंत्री बनाने का समर्थन करेगी, तो उन्होंने सीधा जवाब नहीं दिया। बीयाचद में लैपिड दूसरे नंबर के नेता हैं। पार्टी का नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट के हाथ में है। वह खुद भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर सामने आते रहे हैं। आइजेनकोट ने इससे पहले कहा था कि अगला प्रधानमंत्री उसी व्यक्ति को होना चाहिए जो नेतन्याहू विरोधी गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी का नेता हो। उनका यह बयान 2021 से 2022 तक प्रधानमंत्री रहे नफ्ताली बेनेट के कार्यकाल की ओर भी इशारा करता है। उस समय बेनेट की पार्टी के पास नेसेट में सिर्फ 7 सीटें थीं। इसके बावजूद गठबंधन के जरिए वह प्रधानमंत्री बने थे। इसी वजह से उनके प्रधानमंत्री बनने को लेकर उस समय काफी बहस हुई थी। विपक्षी यशार पार्टी के नेता गादी आइजेनकोट। (फाइल फोटो) रिपोर्ट- ईरान इजराइली नेताओं को नुकसान पहुंचा सकता है चैनल 12 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की ओर से इजराइली नेताओं को नुकसान पहुंचाने की कोशिशों के संकेत मिले हैं। पीएम नेतन्याहू के पास सराकरी सुरक्षा है लेकिन आइजेनकोट को फिलहाल सरकारी सुरक्षा का औपचारिक अधिकार नहीं है। इसी वजह से आइजेनकोट की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। उनकी बढ़ती राजनीतिक ताकत के बीच भी उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता सामने आई है। चुनाव अभियान तेज होने के साथ इजराइल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी ‘शिन बेट’ उन्हें हथियारबंद सुरक्षा देने पर विचार कर रही है। दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔ खबरें और भी हैं…
कंगना रनोट के 2 साल में सिर्फ 16 काम पूरे:वर्क कंप्लीशन रेट सबसे कम; अनुराग ठाकुर समेत हिमाचल के चारों सांसदों का रिपोर्ट कार्ड जानिए

हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट की जनता ने बेहतर विकास की उम्मीद में कांग्रेस सरकार के PWD मंत्री विक्रमादित्य सिंह को हराकर सेलिब्रिटी कंगना रनोट को संसद भेजा। मगर, कंगना का 2 साल से अधिक का ‘रिपोर्ट कार्ड’ हिमाचल के चारों सांसदों में सबसे निराशाजनक रहा है। मिनिस्ट्री ऑफ स्टेटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन (MoSPI) के अनुसार, कंगना के चुनाव क्षेत्र में कुल 314 काम चल रहे हैं। दो साल बीतने पर भी महज 16 काम ही पूरे हुए हैं। कंगना की वर्क कम्पलीशन रेट चारों सांसदों में सबसे कम 5.1% है। कंगना को अब तक सांसद निधि के ₹14.7 करोड़ मिले हैं। इसमें से कंगना 11 अगस्त तक मात्र ₹4.1 करोड़ खर्च कर पाई हैं। कंगना की फंड यूटिलाइजेशन दर 27.6% है, जबकि राष्ट्रीय औसत 32.9% है। अनुराग ठाकुर भी कंगना से बेहतर नहीं हमीरपुर के सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का ‘रिपोर्ट कार्ड’ भी कंगना से बेहतर नहीं है। अनुराग ₹15 करोड़ में से दो साल में मात्र ₹1.7 करोड़ खर्च कर पाए हैं, जबकि ₹13.2 करोड़ अनस्पेंट है। अनुराग का चारों सांसदों में सबसे ज्यादा अनस्पेंट बजट है। फंड यूटिलाइजेशन में शिमला के सांसद सुरेश कश्यप और वर्क कम्पलीशन में कांगड़ा के सांसद राजीव भारद्वाज आगे जरूर हैं, लेकिन राष्ट्रीय औसत से दोनों पीछे हैं। कंगना समेत चारों सांसदों का रिपोर्ट कार्ड… सांसदों को MPLADS में कितना पैसा मिलता है? हर सांसद को सालाना ₹5 करोड़ का MPLADS फंड मिलता है। यह पैसा सांसद के खाते में सीधे नहीं आता। सांसद अपने क्षेत्र में विकास कार्यों की सिफारिश करते हैं, जबकि राशि जिला प्राधिकरण को जारी होती है और संबंधित सरकारी एजेंसी काम करवाती है। फंड खर्च करने में फिसड्डी क्यों? बेशक, MPLADS का पैसा सांसद खुद खर्च नहीं करते। फिर भी सांसदों की जिम्मेदारी बनती है कि उनके क्षेत्र में विकास कार्य समय पर पूरे हो सकें। वे जरूरी कामों की पहचान, उनकी प्राथमिकता तय करने और उनकी प्रगति की निगरानी कर सकते हैं। खासकर जब बड़ी संख्या में काम स्वीकृत या अनुशंसित हों, तो सांसद कार्यालय की ओर से जिला प्रशासन और संबंधित एजेंसियों के साथ नियमित फॉलोअप महत्वपूर्ण हो जाता है।
हाथ फ्रैक्चर था, अगले दिन विराट कोहली के साथ शूट:मिहिर आहूजा बोले- शाहरुख की तारीफ से लगा, मेहनत सही दिशा में जा रही है

जमशेदपुर से मुंबई आए मिहिर आहूजा ने एक्टिंग के लिए करीब चार साल तक ऑडिशन दिए। सुपर 30 से फिल्मी सफर शुरू हुआ, द आर्चीज से पहचान मिली और अब ऑपरेशन सफेद सागर में एयरफोर्स ऑफिसर के किरदार में नजर आ रहे हैं। दैनिक भास्कर से बातचीत में मिहिर ने संघर्ष, रिजेक्शन, शाहरुख खान से मुलाकात और प्यार पैसा प्राफिट को लेकर हुई चर्चा पर बात की। सवाल: जमशेदपुर में रहते हुए एक्टिंग की तरफ आपका झुकाव कैसे हुआ? जवाब: मुझे याद नहीं कि मैंने कभी एक्टिंग के अलावा कुछ और करने के बारे में सोचा हो। सातवीं-आठवीं क्लास में ही तय कर लिया था कि मुझे एक्टर बनना है। घर के फंक्शन में मैं रिश्तेदारों की मिमिक्री करता था। लोग खुश होते थे और मुझे भी परफॉर्म करने में मजा आता था। वहीं से लगा कि मुझे यही करना है। सवाल: स्कूल के दिनों में जब आप एक्टिंग को लेकर इतने सीरियस थे, तो क्या लोगों ने आपका मजाक भी उड़ाया? जवाब: जमशेदपुर में मैंने एक छोटी-सी शॉर्ट फिल्म की थी। उसके बाद स्कूल में चर्चा होने लगी कि मैं फिल्म शूट करके आया हूं। उसी दौरान 10वीं में एक दिन मैं नोटबुक नहीं लेकर आया। टीचर ने मेरी नोटबुक डस्टबिन में फेंकते हुए कहा, ‘तुम खुद को सुपरस्टार समझते हो? तुम सुपरस्टार नहीं हो और कभी बन भी नहीं पाओगे।’ मैंने उसी दिन उनकी ये बात लिखकर रख ली थी। आज भी वो कागज मेरे पास है। उस दिन उन्होंने जो पत्थर मुझ पर फेंका था, मैंने उसी से अपनी इमारत बनाना सीख लिया। मैंने इंडिया गॉट टैलेंट में भी कोशिश की थी, लेकिन वहां से रिजेक्ट हो गया। उस समय दुख हुआ, लेकिन बाद में समझ आया कि रिजेक्शन इस फील्ड का हिस्सा है। सवाल: फिर मुंबई आने का फैसला कब किया? जवाब: 2017 में मैं मुंबई आया। हालांकि उससे पहले 10वीं के बाद छुट्टियों में भी मुंबई आया था। परिवार के साथ आकर देखा कि ऑडिशन कहां होते हैं। मैंने कई जगह अपना परिचय दिया। जमशेदपुर लौटने के बाद भी एड्स के लिए ऑडिशन आने लगे। इससे भरोसा बढ़ा कि अगर कोशिश करता रहूंगा तो कुछ न कुछ जरूर होगा। सवाल: मुंबई आने के बाद आपने पढ़ाई और ऑडिशन दोनों कैसे संभाले? जवाब: मैं कॉलेज के लिए मुंबई आया था, इसलिए रूटीन बन गया था- सुबह कॉलेज और शाम को ऑडिशन। यही मेरे लिए अच्छा रहा। अगर मैं सिर्फ एक्टिंग के लिए आता और काम नहीं मिलता तो शायद बहुत मुश्किल होती। मैंने ऑडिशन देने के अपने तरीके भी निकाल लिए थे। कई बार दोस्तों या आसपास के लोगों को नहीं बताता था कि एक्टर बनने आया हूं। ऑडिशन के कपड़े बैग में रखता और कह देता था कि ट्यूशन के लिए जा रहा हूं। सवाल: इतने साल ऑडिशन देने के बाद पहला बड़ा मौका कैसे मिला? जवाब: करीब चार साल तक ऑडिशन देने के बाद मुझे विराट कोहली के साथ कोलगेट का एड मिला। लेकिन शूट से एक दिन पहले मेरा एक्सीडेंट हो गया। बाइक ने मुझे टक्कर मार दी और मेरा हाथ फ्रैक्चर हो गया। अस्पताल पहुंचा तो डॉक्टर ने आराम करने को कहा। लेकिन मेरे दिमाग में सिर्फ यही था कि अगले दिन मेरा पहला बड़ा शूट है, वह भी विराट कोहली के साथ। मैंने डॉक्टर से कहा कि प्लास्टर मत कीजिए, मुझे शूट करना है। पेनकिलर लेकर अगले दिन शूट पर चला गया। सवाल: उसके बाद फिल्म में पहला मौका कब मिला? जवाब: सुपर 30 से मेरा फिल्मी सफर शुरू हुआ। ऋतिक रोशन के साथ काम करने का मौका मिला। हालांकि फिल्म में मेरा रोल छोटा रह गया और मेरे हिस्से का काफी काम एडिट हो गया। लेकिन मेरे लिए वह बड़ा अनुभव था। सवाल: सुपर 30 के बाद भी आपको पहचान मिलने में समय लगा? जवाब: हां, मैंने उसके बाद भी काम किया। मेड इन हेवन, फील्स लाइक इश्क और दूसरे प्रोजेक्ट किए। लेकिन द आर्चीज के बाद चीजें बदलीं। फिल्म में मुझे जुगहेड जोन्स का किरदार मिला और लोगों ने मुझे नोटिस किया। सवाल: द आर्चीज के दौरान शाहरुख खान से मुलाकात का मौका भी मिला? जवाब: हां, वह मेरे लिए खास अनुभव था। शाहरुख सर से मिलना अपने आप में बड़ी बात थी। मैं उन्हें देखकर बड़ा हुआ हूं। द आर्चीज के प्रीमियर में उनसे मिलने और बात करने का मौका मिला। उन्होंने मेरे काम को लेकर जो बातें कहीं, वह मेरे लिए बहुत मायने रखती हैं। उन्होंने कहा था- बेटा, बस अच्छा काम करते रहो, यही मैंने भी किया है।ऐसे पलों से आपको लगता है कि आपकी मेहनत सही दिशा में जा रही है। सवाल: इसके बाद प्यार पैसा प्राफिट में महवश के साथ काम किया। इस शो को लेकर काफी बातें हुईं, खासकर इंटिमेट सीन को लेकर, क्या कहना चाहोगे? जवाब: वह बात काफी बढ़ा-चढ़ाकर कही गई। शो में ऐसा कोई इंटिमेट सीन नहीं था, जैसा सोशल मीडिया के कुछ थंबनेल में दिखाया गया। एक किसिंग सीन भी था, जिसे हमने चीट करके शूट किया था। असल में कहानी अच्छी थी और मुझे अपना किरदार पसंद आया, इसलिए मैंने शो किया। कुछ लोगों ने सिर्फ व्यूज के लिए चीजों को अलग तरह से पेश किया। सवाल: इसी शो के दौरान आपको ऑपरेशन सफेद सागर का ऑफर मिला? जवाब: हां। जब प्यार पैसा प्राफिट की शूटिंग चल रही थी, उसी दौरान मुझे ऑपरेशन सफेद सागर के ऑडिशन का फोन आया। पहले मुझसे मूंछों में तस्वीरें मांगी गईं। मैंने मूंछ रखकर फोटो भेजी और सोचा कि पता नहीं कैसा किरदार होगा। बाद में पता चला कि एयरफोर्स ऑफिसर का रोल है। स्क्रिप्ट पढ़ी तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। यह कारगिल युद्ध और एयरफोर्स की एक सच्ची कहानी से जुड़ी है। मुझे लगा कि ऐसा किरदार करने का मौका छोड़ना नहीं चाहिए। सवाल: एयरफोर्स ऑफिसर बनने के लिए सबसे अलग अनुभव क्या रहा? जवाब: असली एयरफोर्स स्टेशन पर शूट करना। फाइटर जेट के सामने खड़े होना और कॉकपिट में बैठना मेरे लिए अविश्वसनीय था। कॉकपिट में इतने कंट्रोल थे कि मैं सोच रहा था कि पायलट इन्हें याद कैसे रखते हैं। जिस मिग में मैं बैठा, वह कारगिल युद्ध के समय इस्तेमाल हुआ था। उसे देखकर एहसास होता
Saif Ali Khan Birthday: Interesting Facts

21 मिनट पहलेलेखक: अभय पांडेय कॉपी लिंक अक्टूबर 2011 में ‘पगड़ी रस्म’ के जरिए सैफ अली खान को हरियाणा की पटौदी रियासत का 10वां नवाब घोषित किया गया था। 90 का दशक था। मुंबई की सड़क पर दो गाड़ियां अचानक आमने-सामने आ गईं। एक कार में एक युवा एक्टर अपनी पार्टनर और दोस्त के साथ बैठा था। तभी दूसरी कार के ड्राइवर ने अचानक गलत मोड़ ले लिया। एक्टर ने उसे गुस्से में इशारा किया। बात इतनी बढ़ी कि दोनों गाड़ियों के लोग सड़क पर उतर आए। कुछ ही देर में सड़क पर हाथापाई शुरू हो गई। लड़ाई के दौरान दोनों ने गुस्से में एक-दूसरे को दांतों से काट लिया, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था। कुछ देर पहले तक एक-दूसरे से भिड़ रहे दोनों लोग अचानक हंसने लगे और फिर एक-दूसरे को गले लगा लिया। यह युवा एक्टर कोई और नहीं, बल्कि सैफ अली खान थे। आज उनके 56वें जन्मदिन पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ ऐसे अनसुने किस्से… मां शूटिंग में व्यस्त थीं, पड़ोसन बनीं ‘दूसरी मां’ सैफ अली खान का बचपन किसी आम स्टारकिड जैसा नहीं था। पिता मंसूर अली खान पटौदी भारतीय क्रिकेट के बड़े नाम थे और मां शर्मिला टैगोर हिंदी सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री, लेकिन सैफ के बचपन का एक ऐसा दौर भी रहा, जब उनकी मां चाहकर भी उनके साथ उतना वक्त नहीं बिता पाती थीं, जितना एक मां अपने बच्चे के साथ बिताना चाहती है। सैफ के जन्म के बाद के कुछ सालों में शर्मिला अपने करियर के बेहद व्यस्त दौर में थीं। वह दिन में दो-दो शिफ्ट में काम करती थीं। एक शिफ्ट सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक और दूसरी दोपहर 2 बजे से रात 10 बजे तक चलती थी। लेकिन शर्मिला यह भी मानती हैं कि सैफ की परवरिश में वह अकेली नहीं थीं। उनके पति मंसूर अली खान पटौदी और आसपास के लोगों ने इस दौरान उनका साथ दिया। इसी दौरान सैफ की जिंदगी में एक ऐसी महिला आईं, जिन्होंने मां की गैरमौजूदगी को काफी हद तक पूरा किया। उनका नाम था सुनीता गोस्वामी। सुनीता सिर्फ सैफ की पड़ोसी ही नहीं थीं, बल्कि वह उनके स्कूल में पढ़ाती भी थीं। शर्मिला ने DNA को दिए इंटरव्यू में बताया था कि सुनीता उस समय सैफ के स्कूल ‘सैफी महल’ में टीचर थीं। सुनीता अपने पति जतिन गोस्वामी के साथ सैफ का खूब ख्याल रखती थीं। शर्मिला ने बताया था कि वह सैफ की जिंदगी के जरूरी पड़ावों पर मौजूद रहती थीं, लेकिन बच्चे की रोजमर्रा की जरूरतों और छोटी-छोटी चीजों के लिए वह सुनीता और उनके परिवार की मदद पर काफी निर्भर थीं। इसी वजह से शर्मिला ने सुनीता को सिर्फ पड़ोसी या स्कूल टीचर नहीं माना, बल्कि सैफ की ‘दूसरी मां’ तक कहा। शर्मिला टैगोर ने बताया था कि सैफ के बचपन के शुरुआती सालों में वह उनके लिए उतनी मौजूद नहीं रह पाईं, जितनी बाद में अपनी बेटियों सोहा और सबा के लिए थीं। नवाब खानदान के सैफ DTC बस पकड़कर ऑफिस जाते थे सैफ अली खान का जन्म भले ही पटौदी के नवाब खानदान में हुआ था, लेकिन फिल्मों में आने से पहले उनकी जिंदगी किसी शाही राजकुमार जैसी नहीं थी। स्कूल खत्म करने के बाद सैफ ने दिल्ली की एक विज्ञापन एजेंसी में करीब दो महीने काम किया। दिलचस्प बात यह थी कि उस वक्त सैफ के पिता मंसूर अली खान पटौदी उन्हें शाही ठाठ-बाट में ऑफिस भेजने के बजाय DTC बस से काम पर जाने देते थे। इंडिया टुडे की पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, सैफ के पिता उन्हें बस से ऑफिस भेजते थे और खर्च के लिए सिर्फ 200 रुपए हफ्ते की पॉकेट मनी देते थे। सैफ अली खान के पिता मंसूर अली खान पटौदी (‘टाइगर’ पटौदी) ने अपने अंतरराष्ट्रीय टेस्ट करियर में कुल 46 टेस्ट मैच खेले थे। सैफ अली खान जब दिल्ली में विज्ञापन एजेंसी में काम कर रहे थे। इसी दौरान एक फैमिली फ्रेंड ने उन्हें ‘ग्वालियर सूटिंग्स’ के एक टीवी विज्ञापन में काम करने का सुझाव दिया। सैफ ने विज्ञापन किया। विज्ञापन में सैफ के लुक और व्यक्तित्व ने निर्देशक आनंद महेंद्रू का ध्यान खींचा। उन्होंने सैफ को अपनी फिल्म में मुख्य भूमिका देने का फैसला किया। फिल्म में काम करने का मौका मिलने के बाद उन्होंने दिल्ली छोड़कर मुंबई जाने का फैसला कर लिया। उन्हें लगा कि अब शायद फिल्मों में अपना करियर शुरू करने का रास्ता मिल गया है। लेकिन मुंबई पहुंचने के बाद कहानी ने अचानक करवट ले ली। जिस फिल्म के लिए सैफ को साइन किया गया था, वह बन ही नहीं पाई और प्रोजेक्ट बंद हो गया। फिल्म ‘बेखुदी’ से सैफ को निकाला गया था आनंद महेंद्रू की फिल्म बंद होने के बाद सैफ अली खान को राहुल रवैल की फिल्म ‘बेखुदी’ से लॉन्च किया जाना था। फिल्म में उनके साथ काजोल थीं, लेकिन फिल्म पूरी होने से पहले ही सैफ को प्रोजेक्ट से हटा दिया गया था। सैफ ने कई इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें अपनी पर्सनल लाइफ और फिल्म के बीच चुनना था। इस घटना के बाद लंबे समय तक यह चर्चा रही कि सैफ को उनकी गर्लफ्रेंड अमृता सिंह की वजह से फिल्म से निकाला गया था। हालांकि, 2026 में डायरेक्टर राहुल रवैल ने इस बात को गलत बताया। उनके मुताबिक, सैफ को फिल्म से अमृता सिंह की वजह से नहीं, बल्कि शूटिंग के प्रति उनके डिसिप्लिन और सीरियसनेस की कमी की वजह से हटाया गया था। रवैल ने कहा कि सैफ शूटिंग के लिए टाइम पर नहीं आते थे और उनके कमिटमेंट में दिक्कतें थीं। फिल्म ‘बेखुदी’ में सैफ अली खान को एक्टर कमल सदाना को रिप्लेस किया था। ‘ओमकारा’ में न्यूड होकर सीन करने को कहा गया था सैफ अली खान के करियर में ‘ओमकारा’ बहुत खास फिल्म थी। एक एक्टर के तौर पर उनकी एक्टिंग की तारीफ भी हुई। सैफ ने इस किरदार के लिए मेहनत भी की थी, क्योंकि इस रोल के लिए उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बोली सीखनी थी। शूटिंग से पहले उन्होंने भाषा पर मेहनत की। यहां तक कि उस समय जब वह छुट्टी मनाने मालदीव गए थे, तब छुट्टी के दौरान
हाथ फ्रैक्चर था, अगले दिन विराट कोहली के साथ शूट:मिहिर आहूजा बोले- शाहरुख की तारीफ से लगा, मेहनत सही दिशा में जा रही है

जमशेदपुर से मुंबई आए मिहिर आहूजा ने एक्टिंग के लिए करीब चार साल तक ऑडिशन दिए। सुपर 30 से फिल्मी सफर शुरू हुआ, द आर्चीज से पहचान मिली और अब ऑपरेशन सफेद सागर में एयरफोर्स ऑफिसर के किरदार में नजर आ रहे हैं। दैनिक भास्कर से बातचीत में मिहिर ने संघर्ष, रिजेक्शन, शाहरुख खान से मुलाकात और प्यार पैसा प्राफिट को लेकर हुई चर्चा पर बात की। सवाल: जमशेदपुर में रहते हुए एक्टिंग की तरफ आपका झुकाव कैसे हुआ? जवाब: मुझे याद नहीं कि मैंने कभी एक्टिंग के अलावा कुछ और करने के बारे में सोचा हो। सातवीं-आठवीं क्लास में ही तय कर लिया था कि मुझे एक्टर बनना है। घर के फंक्शन में मैं रिश्तेदारों की मिमिक्री करता था। लोग खुश होते थे और मुझे भी परफॉर्म करने में मजा आता था। वहीं से लगा कि मुझे यही करना है। सवाल: स्कूल के दिनों में जब आप एक्टिंग को लेकर इतने सीरियस थे, तो क्या लोगों ने आपका मजाक भी उड़ाया? जवाब: जमशेदपुर में मैंने एक छोटी-सी शॉर्ट फिल्म की थी। उसके बाद स्कूल में चर्चा होने लगी कि मैं फिल्म शूट करके आया हूं। उसी दौरान 10वीं में एक दिन मैं नोटबुक नहीं लेकर आया। टीचर ने मेरी नोटबुक डस्टबिन में फेंकते हुए कहा, ‘तुम खुद को सुपरस्टार समझते हो? तुम सुपरस्टार नहीं हो और कभी बन भी नहीं पाओगे।’ मैंने उसी दिन उनकी ये बात लिखकर रख ली थी। आज भी वो कागज मेरे पास है। उस दिन उन्होंने जो पत्थर मुझ पर फेंका था, मैंने उसी से अपनी इमारत बनाना सीख लिया। मैंने इंडिया गॉट टैलेंट में भी कोशिश की थी, लेकिन वहां से रिजेक्ट हो गया। उस समय दुख हुआ, लेकिन बाद में समझ आया कि रिजेक्शन इस फील्ड का हिस्सा है। सवाल: फिर मुंबई आने का फैसला कब किया? जवाब: 2017 में मैं मुंबई आया। हालांकि उससे पहले 10वीं के बाद छुट्टियों में भी मुंबई आया था। परिवार के साथ आकर देखा कि ऑडिशन कहां होते हैं। मैंने कई जगह अपना परिचय दिया। जमशेदपुर लौटने के बाद भी एड्स के लिए ऑडिशन आने लगे। इससे भरोसा बढ़ा कि अगर कोशिश करता रहूंगा तो कुछ न कुछ जरूर होगा। सवाल: मुंबई आने के बाद आपने पढ़ाई और ऑडिशन दोनों कैसे संभाले? जवाब: मैं कॉलेज के लिए मुंबई आया था, इसलिए रूटीन बन गया था- सुबह कॉलेज और शाम को ऑडिशन। यही मेरे लिए अच्छा रहा। अगर मैं सिर्फ एक्टिंग के लिए आता और काम नहीं मिलता तो शायद बहुत मुश्किल होती। मैंने ऑडिशन देने के अपने तरीके भी निकाल लिए थे। कई बार दोस्तों या आसपास के लोगों को नहीं बताता था कि एक्टर बनने आया हूं। ऑडिशन के कपड़े बैग में रखता और कह देता था कि ट्यूशन के लिए जा रहा हूं। सवाल: इतने साल ऑडिशन देने के बाद पहला बड़ा मौका कैसे मिला? जवाब: करीब चार साल तक ऑडिशन देने के बाद मुझे विराट कोहली के साथ कोलगेट का एड मिला। लेकिन शूट से एक दिन पहले मेरा एक्सीडेंट हो गया। बाइक ने मुझे टक्कर मार दी और मेरा हाथ फ्रैक्चर हो गया। अस्पताल पहुंचा तो डॉक्टर ने आराम करने को कहा। लेकिन मेरे दिमाग में सिर्फ यही था कि अगले दिन मेरा पहला बड़ा शूट है, वह भी विराट कोहली के साथ। मैंने डॉक्टर से कहा कि प्लास्टर मत कीजिए, मुझे शूट करना है। पेनकिलर लेकर अगले दिन शूट पर चला गया। सवाल: उसके बाद फिल्म में पहला मौका कब मिला? जवाब: सुपर 30 से मेरा फिल्मी सफर शुरू हुआ। ऋतिक रोशन के साथ काम करने का मौका मिला। हालांकि फिल्म में मेरा रोल छोटा रह गया और मेरे हिस्से का काफी काम एडिट हो गया। लेकिन मेरे लिए वह बड़ा अनुभव था। सवाल: सुपर 30 के बाद भी आपको पहचान मिलने में समय लगा? जवाब: हां, मैंने उसके बाद भी काम किया। मेड इन हेवन, फील्स लाइक इश्क और दूसरे प्रोजेक्ट किए। लेकिन द आर्चीज के बाद चीजें बदलीं। फिल्म में मुझे जुगहेड जोन्स का किरदार मिला और लोगों ने मुझे नोटिस किया। सवाल: द आर्चीज के दौरान शाहरुख खान से मुलाकात का मौका भी मिला? जवाब: हां, वह मेरे लिए खास अनुभव था। शाहरुख सर से मिलना अपने आप में बड़ी बात थी। मैं उन्हें देखकर बड़ा हुआ हूं। द आर्चीज के प्रीमियर में उनसे मिलने और बात करने का मौका मिला। उन्होंने मेरे काम को लेकर जो बातें कहीं, वह मेरे लिए बहुत मायने रखती हैं। उन्होंने कहा था- बेटा, बस अच्छा काम करते रहो, यही मैंने भी किया है।ऐसे पलों से आपको लगता है कि आपकी मेहनत सही दिशा में जा रही है। सवाल: इसके बाद प्यार पैसा प्राफिट में महवश के साथ काम किया। इस शो को लेकर काफी बातें हुईं, खासकर इंटिमेट सीन को लेकर, क्या कहना चाहोगे? जवाब: वह बात काफी बढ़ा-चढ़ाकर कही गई। शो में ऐसा कोई इंटिमेट सीन नहीं था, जैसा सोशल मीडिया के कुछ थंबनेल में दिखाया गया। एक किसिंग सीन भी था, जिसे हमने चीट करके शूट किया था। असल में कहानी अच्छी थी और मुझे अपना किरदार पसंद आया, इसलिए मैंने शो किया। कुछ लोगों ने सिर्फ व्यूज के लिए चीजों को अलग तरह से पेश किया। सवाल: इसी शो के दौरान आपको ऑपरेशन सफेद सागर का ऑफर मिला? जवाब: हां। जब प्यार पैसा प्राफिट की शूटिंग चल रही थी, उसी दौरान मुझे ऑपरेशन सफेद सागर के ऑडिशन का फोन आया। पहले मुझसे मूंछों में तस्वीरें मांगी गईं। मैंने मूंछ रखकर फोटो भेजी और सोचा कि पता नहीं कैसा किरदार होगा। बाद में पता चला कि एयरफोर्स ऑफिसर का रोल है। स्क्रिप्ट पढ़ी तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए। यह कारगिल युद्ध और एयरफोर्स की एक सच्ची कहानी से जुड़ी है। मुझे लगा कि ऐसा किरदार करने का मौका छोड़ना नहीं चाहिए। सवाल: एयरफोर्स ऑफिसर बनने के लिए सबसे अलग अनुभव क्या रहा? जवाब: असली एयरफोर्स स्टेशन पर शूट करना। फाइटर जेट के सामने खड़े होना और कॉकपिट में बैठना मेरे लिए अविश्वसनीय था। कॉकपिट में इतने कंट्रोल थे कि मैं सोच रहा था कि पायलट इन्हें याद कैसे रखते हैं। जिस मिग में मैं बैठा, वह कारगिल युद्ध के समय इस्तेमाल हुआ था। उसे देखकर एहसास होता
Saif Ali Khan Birthday: Interesting Facts

2 घंटे पहलेलेखक: अभय पांडेय कॉपी लिंक अक्टूबर 2011 में ‘पगड़ी रस्म’ के जरिए सैफ अली खान को हरियाणा की पटौदी रियासत का 10वां नवाब घोषित किया गया था। 90 का दशक था। मुंबई की सड़क पर दो गाड़ियां अचानक आमने-सामने आ गईं। एक कार में एक युवा एक्टर अपनी पार्टनर और दोस्त के साथ बैठा था। तभी दूसरी कार के ड्राइवर ने अचानक गलत मोड़ ले लिया। एक्टर ने उसे गुस्से में इशारा किया। बात इतनी बढ़ी कि दोनों गाड़ियों के लोग सड़क पर उतर आए। कुछ ही देर में सड़क पर हाथापाई शुरू हो गई। लड़ाई के दौरान दोनों ने गुस्से में एक-दूसरे को दांतों से काट लिया, लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था। कुछ देर पहले तक एक-दूसरे से भिड़ रहे दोनों लोग अचानक हंसने लगे और फिर एक-दूसरे को गले लगा लिया। यह युवा एक्टर कोई और नहीं, बल्कि सैफ अली खान थे। आज उनके 56वें जन्मदिन पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ ऐसे अनसुने किस्से… मां शूटिंग में व्यस्त थीं, पड़ोसन बनीं ‘दूसरी मां’ सैफ अली खान का बचपन किसी आम स्टारकिड जैसा नहीं था। पिता मंसूर अली खान पटौदी भारतीय क्रिकेट के बड़े नाम थे और मां शर्मिला टैगोर हिंदी सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री, लेकिन सैफ के बचपन का एक ऐसा दौर भी रहा, जब उनकी मां चाहकर भी उनके साथ उतना वक्त नहीं बिता पाती थीं, जितना एक मां अपने बच्चे के साथ बिताना चाहती है। सैफ के जन्म के बाद के कुछ सालों में शर्मिला अपने करियर के बेहद व्यस्त दौर में थीं। वह दिन में दो-दो शिफ्ट में काम करती थीं। एक शिफ्ट सुबह 7 बजे से दोपहर 2 बजे तक और दूसरी दोपहर 2 बजे से रात 10 बजे तक चलती थी। लेकिन शर्मिला यह भी मानती हैं कि सैफ की परवरिश में वह अकेली नहीं थीं। उनके पति मंसूर अली खान पटौदी और आसपास के लोगों ने इस दौरान उनका साथ दिया। इसी दौरान सैफ की जिंदगी में एक ऐसी महिला आईं, जिन्होंने मां की गैरमौजूदगी को काफी हद तक पूरा किया। उनका नाम था सुनीता गोस्वामी। सुनीता सिर्फ सैफ की पड़ोसी ही नहीं थीं, बल्कि वह उनके स्कूल में पढ़ाती भी थीं। शर्मिला ने DNA को दिए इंटरव्यू में बताया था कि सुनीता उस समय सैफ के स्कूल ‘सैफी महल’ में टीचर थीं। सुनीता अपने पति जतिन गोस्वामी के साथ सैफ का खूब ख्याल रखती थीं। शर्मिला ने बताया था कि वह सैफ की जिंदगी के जरूरी पड़ावों पर मौजूद रहती थीं, लेकिन बच्चे की रोजमर्रा की जरूरतों और छोटी-छोटी चीजों के लिए वह सुनीता और उनके परिवार की मदद पर काफी निर्भर थीं। इसी वजह से शर्मिला ने सुनीता को सिर्फ पड़ोसी या स्कूल टीचर नहीं माना, बल्कि सैफ की ‘दूसरी मां’ तक कहा। शर्मिला टैगोर ने बताया था कि सैफ के बचपन के शुरुआती सालों में वह उनके लिए उतनी मौजूद नहीं रह पाईं, जितनी बाद में अपनी बेटियों सोहा और सबा के लिए थीं। नवाब खानदान के सैफ DTC बस पकड़कर ऑफिस जाते थे सैफ अली खान का जन्म भले ही पटौदी के नवाब खानदान में हुआ था, लेकिन फिल्मों में आने से पहले उनकी जिंदगी किसी शाही राजकुमार जैसी नहीं थी। स्कूल खत्म करने के बाद सैफ ने दिल्ली की एक विज्ञापन एजेंसी में करीब दो महीने काम किया। दिलचस्प बात यह थी कि उस वक्त सैफ के पिता मंसूर अली खान पटौदी उन्हें शाही ठाठ-बाट में ऑफिस भेजने के बजाय DTC बस से काम पर जाने देते थे। इंडिया टुडे की पुरानी रिपोर्ट के अनुसार, सैफ के पिता उन्हें बस से ऑफिस भेजते थे और खर्च के लिए सिर्फ 200 रुपए हफ्ते की पॉकेट मनी देते थे। सैफ अली खान के पिता मंसूर अली खान पटौदी (‘टाइगर’ पटौदी) ने अपने अंतरराष्ट्रीय टेस्ट करियर में कुल 46 टेस्ट मैच खेले थे। सैफ अली खान जब दिल्ली में विज्ञापन एजेंसी में काम कर रहे थे। इसी दौरान एक फैमिली फ्रेंड ने उन्हें ‘ग्वालियर सूटिंग्स’ के एक टीवी विज्ञापन में काम करने का सुझाव दिया। सैफ ने विज्ञापन किया। विज्ञापन में सैफ के लुक और व्यक्तित्व ने निर्देशक आनंद महेंद्रू का ध्यान खींचा। उन्होंने सैफ को अपनी फिल्म में मुख्य भूमिका देने का फैसला किया। फिल्म में काम करने का मौका मिलने के बाद उन्होंने दिल्ली छोड़कर मुंबई जाने का फैसला कर लिया। उन्हें लगा कि अब शायद फिल्मों में अपना करियर शुरू करने का रास्ता मिल गया है। लेकिन मुंबई पहुंचने के बाद कहानी ने अचानक करवट ले ली। जिस फिल्म के लिए सैफ को साइन किया गया था, वह बन ही नहीं पाई और प्रोजेक्ट बंद हो गया। फिल्म ‘बेखुदी’ से सैफ को निकाला गया था आनंद महेंद्रू की फिल्म बंद होने के बाद सैफ अली खान को राहुल रवैल की फिल्म ‘बेखुदी’ से लॉन्च किया जाना था। फिल्म में उनके साथ काजोल थीं, लेकिन फिल्म पूरी होने से पहले ही सैफ को प्रोजेक्ट से हटा दिया गया था। सैफ ने कई इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें अपनी पर्सनल लाइफ और फिल्म के बीच चुनना था। इस घटना के बाद लंबे समय तक यह चर्चा रही कि सैफ को उनकी गर्लफ्रेंड अमृता सिंह की वजह से फिल्म से निकाला गया था। हालांकि, 2026 में डायरेक्टर राहुल रवैल ने इस बात को गलत बताया। उनके मुताबिक, सैफ को फिल्म से अमृता सिंह की वजह से नहीं, बल्कि शूटिंग के प्रति उनके डिसिप्लिन और सीरियसनेस की कमी की वजह से हटाया गया था। रवैल ने कहा कि सैफ शूटिंग के लिए टाइम पर नहीं आते थे और उनके कमिटमेंट में दिक्कतें थीं। फिल्म ‘बेखुदी’ में सैफ अली खान को एक्टर कमल सदाना को रिप्लेस किया था। ‘ओमकारा’ में न्यूड होकर सीन करने को कहा गया था सैफ अली खान के करियर में ‘ओमकारा’ बहुत खास फिल्म थी। एक एक्टर के तौर पर उनकी एक्टिंग की तारीफ भी हुई। सैफ ने इस किरदार के लिए मेहनत भी की थी, क्योंकि इस रोल के लिए उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बोली सीखनी थी। शूटिंग से पहले उन्होंने भाषा पर मेहनत की। यहां तक कि उस समय जब वह छुट्टी मनाने मालदीव गए थे, तब छुट्टी के दौरान







