BRICS Summit Security Arrangements 2026; Vladimir Putin Xi Jinping Hotels – NSG Commando

12-13 सितंबर को BRICS समिट के लिए दिल्ली में 20 से ज्यादा देशों के नेता होंगे। इनमें जिनपिंग, पुतिन, पजशकियान जैसे बड़े खतरे वाले नेता शामिल हैं। इनके लिए दिल्ली की किलेबंदी की गई है। . आसमान से सड़क तक, होटल से भारत मंडपम तक; दुनिया के ताकतवर नेताओं के सुरक्षा इंतजामों की पूरी कहानी… ******** रिपोर्टर्स इनपुटः सुनील मौर्य, उदय भटनागर ग्राफिक्सः गौतम रजक, दृगचंद्र भुर्जी ———— ये खबर भी पढ़िए… BRICS में जिनपिंग-पुतिन दोनों आएंगे: चीनी राष्ट्रपति का गलवान झड़प के बाद पहला भारत दौरा, PM मोदी से बैठक संभव BRICS समिट में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन दोनों भारत आएंगे। चीन के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को जिनपिंग के भारत दौरे की पुष्टि की। इससे दो दिन पहले रूस ने भी पुतिन के भारत आने की पुष्टि की थी। पूरी खबर पढ़िए…
Nepal Flood Vs China; Rainfall Glacial Collapse Early Warning – Data Sharing Row

26 अगस्त की सुबह नेपाल के रसुवा में आसमान साफ था। अचानक भोटेकोशी नदी में मलबा, पत्थर और पानी का ऐसा सैलाब आया कि सब बहता चला गया। 1300 से ज्यादा मौतें हुईं और 5 हजार से ज्यादा लोग लापता हैं। ये तबाही चीन की तरफ बनी झील फटने से हुई थी। सवाल उठा कि क्य . चीन के विदेश विभाग के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने दावा किया कि चीन ने नेपाल को समय-समय पर मौसम का डेटा और चेतावनियां दी थीं। ब्रिटिश न्यूज एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट में भी दावा किया गया कि आपदा से करीब 12 दिन पहले चीन ने नेपाल को ईमेल भेजकर भारी बारिश की जानकारी दी थी। इससे लगता है कि नेपाल के पास खबर थी कि तबाही हो सकती है, लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है। पढ़िए रिपोर्ट… चीन-नेपाल के एक्सपर्ट चार महीने में तीन बार मिले अप्रैल से जुलाई के बीच चीन और नेपाल के पर्यावरण, मौसम और आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारी और वैज्ञानिक कम से कम तीन अलग-अलग मंचों पर मिले। इस दौरान ग्लेशियर, ग्लेशियल झील, जलवायु से जुड़े जोखिम और अर्ली वार्निंग पर बात हुई। पहली बैठक: 22 अप्रैल–5 मई, बीजिंग चीन की नेशनल अकैडमी ऑफ फॉरेस्टी एंड ग्रासलैंड एडमिनिस्ट्रेशन ने पर्यावरण संरक्षण और ग्रीन ट्रांसफॉर्मेशन पर सेमिनार किया। नेपाल के प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया। दूसरी बैठक: 27 मई, काठमांडू नेपाल के 10 और चीन-तिब्बत के 12 अधिकारियों के बीच बैठक हुई। इसमें ग्लेशियल झीलों की मैपिंग और ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी अचानक जलस्तर बढ़ने या ग्लेशियर झील फटने के खतरे को कम करने पर चर्चा हुई। तीसरी बैठक: जुलाई, तिब्बत तिब्बत के निंगची में 5th ट्रांस हिमालय इंटरनेशनल कोऑपरेशन फोरम हुआ। इसमें 29 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। नेपाल भी इनमें शामिल था। इसी दौरान चीन ने अपना मल्टी हेजार्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम भी पेश किया। 12 दिन पहले चीन ने क्या चेतावनी दी थी रायटर्स के मुताबिक, 14 अगस्त के आसपास चीन के विश्व मौसम विज्ञान केंद्र ने नेपाल को ईमेल भेजा था। इसमें 14 से 19 अगस्त के बीच भारी बारिश और मानसूनी दबाव की आशंका जताई गई थी। हालांकि, यह भी 26 अगस्त के लिए नहीं था। यहां एक अहम फर्क है। भारी बारिश का पूर्वानुमान और किसी खास ग्लेशियर के टूटने की चेतावनी एक बात नहीं है। बाढ़ आने के दो हफ्ते बाद भी घरों में घुसा मलबा साफ नहीं हो पाया है। लोग कैंपों में रह रहे हैं और दिन में घर की सफाई के लिए आ जाते हैं। नेपाल के सबसे बड़े आपदा अधिकारी बोले- स्पेसिफिक वार्निंग नहीं मिली नेपाल की नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के कार्यकारी प्रमुख डॉ. धरम उप्रेती ने चीन के दावे पर सीधे आधिकारिक टिप्पणी करने से परहेज किया। उनके मुताबिक पानी इतनी तेजी से नीचे आया कि सीमा क्षेत्र में लगा रिवर मॉनिटरिंग सिस्टम भी प्रभावित हुआ। नीचे की तरफ अलर्ट जारी करने का समय मिला, लेकिन ऊपरी इलाके में लोगों के पास बचने के लिए पर्याप्त समय नहीं था। डॉ. उप्रेती बताते हैं कि नेपाल में नदियों पर रिवर गेज स्टेशन लगे हैं। पानी के तय सीमा से ऊपर जाते ही प्रभावित इलाकों में SMS अलर्ट भेजे जाते हैं। यह व्यवस्था 2015 से चल रहे फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम का हिस्सा है। नदी और जगह के हिसाब से सामान्य स्थिति में करीब 6 मिनट से 6 घंटे तक का लीड टाइम मिल सकता है। 26 अगस्त को खतरे की जानकारी मिलते ही 1-2 मिनट में निचले इलाकों के लिए SMS अलर्ट जारी किए गए। पहला अलर्ट करीब 9:15 बजे और दूसरा 11:50 बजे भेजा गया। इसके बाद भी स्थिति के हिसाब से अलर्ट जारी होते रहे। सोशल मीडिया, टीवी और रेडियो से भी चेतावनी दी गई। डॉ. उप्रेती के मुताबिक करीब 4 हजार लोगों के फोन पर अलर्ट भेजा गया था। कितने लोगों ने उसे देखा, इसका डेटा नहीं है। डॉ. उप्रेती के मुताबिक, पानी करीब 180 किमी प्रति घंटे या उससे ज्यादा की रफ्तार से नीचे आया। इससे अलर्ट जारी करने और उसके लोगों तक पहुंचने के बीच का समय बहुत कम रह गया। ‘सिर्फ ईमेल भेजना चेतावनी नहीं, सही एजेंसी को, सही वक्त पर मिलना जरूरी’ चीन की तरफ से भेजे गए ईमेल पर डॉ. उप्रेती कहते हैं, ‘मुझे नहीं पता कि 26 अगस्त से पहले किस अधिकारी को, कब और किस स्तर की चेतावनी भेजी गई थी। सिर्फ ईमेल भेज देना पर्याप्त नहीं है। सूचना सही एजेंसी तक सही समय पर पहुंचे और उस पर कार्रवाई हो, तभी वह वास्तविक चेतावनी बनती है।’ यहीं चीन के दावे पर सवाल खड़ा होता है। अगर 12 दिन पहले इतनी अहम जानकारी थी, तो वह नेपाल की किस एजेंसी तक पहुंची, किस अधिकारी ने उसे देखा और उसके आधार पर क्या कदम उठाए गए। बैठकों में ग्लेशियर पर चर्चा हुई, लेकिन खास चेतावनी नहीं डॉ. उप्रेती के मुताबिक, चीन और नेपाल के वैज्ञानिक हिमालय में बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और एवलॉन्च जैसे खतरों पर लगातार चर्चा करते रहे हैं। 27 मई की बैठक में भी इसके जोखिमों पर बात हुई थी। किसी खास ग्लेशियर के टूटने की स्पेसिफिक वार्निंग नहीं मिली थी। दो अलग-अलग बातें हैं। पहली- हिमालय में ग्लेशियर और जलवायु परिवर्तन से खतरा बढ़ रहा है। दूसरी- किसी खास ग्लेशियर के टूटने और उससे अचानक बाढ़ आने की पहले से चेतावनी। दूसरी तरह की चेतावनी का कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया। मौजूदा सिस्टम क्यों वॉर्निंग नहीं दे पाया सामान्य GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड में ग्लेशियर के पास बनी झील का पानी अचानक बाहर निकलता है। 26 अगस्त की घटना में ग्लेशियल झील के फटने की प्रक्रिया सामने नहीं आई। शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक, यहां मुख्य ट्रिगर रॉक-आइस एवलॉन्च और ग्लेशियर का हिस्सा टूटना था। यही सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती है। नदी का पानी बढ़ने पर गेज स्टेशन पकड़ सकता है। ग्लेशियल झील में पानी बढ़े, तो उसकी निगरानी की जा सकती है। पहाड़ पर ग्लेशियर का एक हिस्सा किस दिन, किस समय टूटेगा, इसे पहले से पकड़ना मुश्किल है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के सीनियर रिसोर्स एसोसिएट श्रवण स्विफ्ट बताते हैं, ‘यह नहीं कहा जा सकता कि चीन ने कोई जानकारी दी
Ravi Kishan Struggle Success Story; Laapataa Ladies Tere Naam | Hindi Bhojpuri Movies

8 मिनट पहलेलेखक: वीरेंद्र मिश्र कॉपी लिंक जिस सफर की शुरुआत गरीबी और पैदल मुंबई नापने से हुई, वही आज 750+ फिल्मों और संसद तक पहुंच चुका है। एक मिट्टी के घर से निकला लड़का, परिवार पर जिम्मेदारियों का बोझ, खेत गिरवी और पेट भरने के लिए 12 लोगों के बीच एक खिचड़ी। फिर मुंबई का सफर, जहां वड़ा पाव और चाय के सहारे दिन गुजरे और 15 साल तक काम के बदले सम्मानजनक पैसे नहीं मिले। यही रवि किशन की उस जिंदगी की तस्वीर है, जिसे वे आज भी भूल नहीं पाए हैं। कभी काम पाने के लिए संघर्ष करने वाले रवि किशन ने भोजपुरी सिनेमा में स्टारडम हासिल किया, हिंदी फिल्मों और OTT में पहचान बनाई और अब राजनीति में भी सक्रिय हैं। 750 से ज्यादा फिल्मों का सफर तय कर चुके रवि किशन आज गोरखपुर से दूसरी बार लोकसभा सांसद हैं। आज की सक्सेस स्टोरी में रवि किशन के जीवन और करियर से जुड़ी कुछ और खास बातें। मिट्टी के घर से शुरू हुई कहानी रवि किशन का जन्म 17 जुलाई 1969 को मुंबई (तब बॉम्बे) में हुआ, लेकिन आर्थिक परिस्थितियों के कारण उनका बचपन उत्तर प्रदेश के जौनपुर में बीता। परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहा था। खेत गिरवी था और घर की जिम्मेदारियां बढ़ती जा रही थीं। बाद में अभिनय को अपना सपना बनाकर उन्होंने मुंबई का रुख किया। रवि किशन ने अपने संघर्ष को याद करते हुए बताया है कि उनका परिवार बेहद गरीबी में रहा। एक समय ऐसा था जब 12 लोगों के लिए एक ही खिचड़ी बनती थी और उसमें पेट भरने के लिए पानी मिला दिया जाता था। शुभांकर मिश्रा से बातचीत में रवि किशन ने कहा था- घनघोर गरीबी देखी। हम लोग घनघोर गरीबी वाले। एक ही खिचड़ी बन रही है, उसमें 12 लोग खा रहे हैं, पानी भर के।” उनके मुताबिक गरीबी सिर्फ आर्थिक स्थिति नहीं थी, बल्कि वह अनुभव उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया। 17 साल की उम्र में मुंबई पहुंचे रवि किशन को बचपन से एक्टिंग का शौक था। गांव में रामलीला में वो मां सीता का रोल निभाते थे और इसके लिए मां की साड़ी पहनते थे। जब उनके पुजारी पिता ने उन्हें सीता के रोल में देखा तो बेल्ट से बहुत मारा, जिससे उनकी चमड़ी छिल गई। इसके बाद मां ने डरकर 500 रुपए दिए और कहा कि बेटा भाग जा, नहीं तो आज मारा जाएगा। अपनी जान बचाने के लिए वो घर से भागे और ट्रेन पकड़कर मुंबई पहुंच गए। उस समय रवि 17 साल के थे। ‘लोग चलकर आते हैं, मैं रेंग कर आया हूं’ मुंबई में फिल्म इंडस्ट्री की चमक के पीछे का संघर्ष उन्होंने करीब से देखा। यहां न कोई बड़ा फिल्मी बैकग्राउंड था, न मजबूत आर्थिक सहारा और न ही इंडस्ट्री में पहचान। रवि किशन कहते हैं- लोग चलकर आते हैं, मैं रेंगकर आया हूं। जब मैं मुंबई आया था, तब ये बंबई हुआ करता था। पापा मेरे ऐक्टिंग करियर के खिलाफ थे। वे कहते थे- ‘नचनिया बनबे का रे’। वे चाहते थे कि मैं खेती करूं, सरकारी नौकरी करूं या दूध बेचूं। लेकिन मुझे इन चीजों में दिल नहीं लगता था। मुझे बस डांस में मजा आता था। ये मेरा गॉड गिफ्ट था। मैं इसी राह पर चलता गया। इसमें बहुत वक्त लगा। हिंदी सिनेमा में काम मिला, लेकिन पहचान नहीं रवि किशन ने 1990 के दशक में हिंदी फिल्मों से अभिनय करियर की शुरुआत की। ‘पीतांबर’ आग का तूफान’, ‘रानी और महारानी’, ‘जख्मी दिल’, ‘उधार की जिंदगी,’ आतंक, कोई किसी से कम नहीं, अग्नि मोर्चा जैसी फिल्में कीं। लेकिन इन फिल्मों से न तो खास पहचान मिली, न सम्मानजनक मेहनताना। रवि किशन के मुताबिक, फिल्म इंडस्ट्री में करीब 15 साल तक उन्हें काम के बदले वह पैसा नहीं मिला, जिसे वे सम्मानजनक मेहनताना मानते थे। फिल्म ‘तेरे नाम’ से रवि किशन को मिली पहचान हिंदी फिल्मों में रवि किशन ने दर्शकों का ध्यान तब खींचा, जब वो फिल्म ‘तेरे नाम’ में पंडित रमेश्वर के रोल में नजर आए थे। रवि किशन ने बताया था कि यह फिल्म उन्हें कैसे मिली। एक बार वे नितिन मनमोहन के ऑफिस में डायरेक्टर सतीश कौशिक से मिले। सतीश कौशिक ने कहा था कि उन्हें ऐसा लड़का चाहिए जो पंडित का किरदार निभाए और भूमिका चावला का मंगेतर बने। रवि किशन ने बिना देर किए हामी भर दी। उन्होंने बताया था कि सतीश कौशिक ने बाल कटवाने को कहा तो भी वे तुरंत तैयार हो गए। ‘तेरे नाम’ के लिए रवि किशन को नेशनल अवॉर्ड का नॉमिनेशन मिला था। बार-बार अपमानित होना पड़ता था लेकिन लगातार काम मिलने के बावजूद रवि किशन को वह पहचान नहीं मिल रही थी, जिसकी उन्हें तलाश थी। यही वह दौर था जब एक अभिनेता के तौर पर खुद को साबित करने के साथ-साथ उन्हें समझना पड़ा कि इंडस्ट्री में टिके रहने के लिए सिर्फ प्रतिभा काफी नहीं होती। भाषा, बैकग्राउंड, पहचान और मौके भी मायने रखते हैं। रवि किशन ने अपने अनुभवों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने हजारों बार अपमान झेला है। रवि किशन कहते हैं- “लोग एक-दो बार ह्यूमिलिएट होते हैं, मैं हजारों बार हुआ हूं। ये सब अद्भुत है जीवन का रंग। भोजपुरी सिनेमा ने बदल दी जिंदगी हिंदी फिल्मों में लंबे संघर्ष के बाद रवि किशन को भोजपुरी सिनेमा में बड़ा मौका मिला। 2003 में उन्होंने मोहनजी प्रसाद की फिल्म ‘सैयां हमार’ से भोजपुरी सिनेमा में कदम रखा। हालांकि, शुरुआत में वे इस इंडस्ट्री को लेकर आश्वस्त नहीं थे, लेकिन परिवार के प्रोत्साहन ने उन्हें भोजपुरी फिल्मों की ओर जाने के लिए तैयार किया। यही फैसला उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बना। भोजपुरी सिनेमा में उन्हें ऐसा दर्शक मिला, जिसने उन्हें स्टार बना दिया। वे लगातार फिल्मों में नजर आने लगे और उनकी लोकप्रियता उत्तर भारत के बड़े हिस्से तक पहुंच गई। खुद रवि किशन के मुताबिक, एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें लगातार फिल्मों के ऑफर मिलने लगे और वे एक दिन में कई फिल्मों की शूटिंग तक करते थे। जिस अभिनेता को हिंदी सिनेमा में लंबे समय तक पहचान के लिए इंतजार करना पड़ा था, वही भोजपुरी सिनेमा में बड़ा नाम बन गया। यहीं से
India-Russia BRICS Summit | PM Modi Putin Su-57 Brahmos Defense Deal

नई दिल्ली4 मिनट पहले कॉपी लिंक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 31 अगस्त को बिश्केक में SCO समिट के दौरान मुलाकात की थी। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन BRICS समिट में शामिल होने के लिए भारत पहुंच गए हैं। पुतिन का प्लेन रात करीब 3 बजे नई दिल्ली पहुंचा। ब्रिक्स समिट से पहले प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन की बैठक होगी। इसमें Su-57 फाइटर जेट और अपडेटेड ब्रह्मोस समेत कई डिफेंस डील पर चर्चा हो सकती है। रूस भारत को विमान की बिक्री के साथ भारत में इसका उत्पादन और जरूरी तकनीक साझा करने की पेशकश पहले ही कर चुका है। भारत चाहता है कि इस डील से उसे ऐसी तकनीक मिले, जिसका इस्तेमाल आगे स्वदेशी लड़ाकू विमान बनाने में भी किया जा सके। इससे पहले, रूस की दूसरी Il-96 स्पेशल फ्लाइट राजनयिकों के साथ दिल्ली पहुंच गई है। पहले डिप्टी PM डेनिस मंतुरोव भी भारत पहुंच चुके हैं। पुतिन के भारत दौरे से पहले गुरुवार को नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर रूस के 3 सैन्य विमान उतरे। इनमें रूस का भारी मिलिट्री ट्रांसपोर्ट विमान IL-76 भी शामिल है। S-400 की बाकी खेप और रखरखाव पर भी बात भारत, S-400 की बाकी खेप की आपूर्ति और उसके रखरखाव से जुड़े मुद्दों पर रूस से बात कर सकता है। इसके अलावा SU-30MKI लड़ाकू विमानों को अपग्रेड करने पर भी बात हो सकती है। ‘सुपर सुखोई’ योजना के तहत इनमें बेहतर रडार और नए हथियार लगाए जाएंगे। ब्रह्मोस को लेकर दोनों देश इसके नए और हल्के संस्करण पर मिलकर काम बढ़ाने की तैयारी में हैं। इसमें ब्रह्मोस-NG अहम है। यह मौजूदा ब्रह्मोस से हल्की होगी और इसे तेजस जैसे लड़ाकू विमानों से भी दागा जा सकेगा। रक्षा के बाद परमाणु बिजली पर फोकस रक्षा के अलावा परमाणु बिजली के क्षेत्र में भी भारत और रूस के बीच बातचीत हो सकती है। रूस की सरकारी कंपनी रोसाटॉम भारत में कुडनकुलम परमाणु बिजली संयंत्र पर काम कर रही है। अब भारत में रूसी तकनीक से नए परमाणु बिजली संयंत्र लगाने पर भी चर्चा हो सकती है। दोनों देश छोटे आकार के परमाणु रिएक्टर बनाने में भी साथ काम करने की संभावनाएं तलाश सकते हैं। ये रिएक्टर बड़े परमाणु बिजली संयंत्रों के मुकाबले छोटे होते हैं। रुपए-रूबल में कारोबार बढ़ाने की कोशिश भारत और रूस डॉलर की जगह रुपये और रूबल में कारोबार बढ़ाना चाहते हैं। इससे दोनों देशों के बीच भुगतान अपनी-अपनी करेंसी में हो सकेगा। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा था कि रूस डॉलर हटाने की कोशिश नहीं कर रहा, बल्कि भुगतान के आसान तरीकों के लिए तैयार है। उन्होंने बताया कि BRICS देशों के साथ रूस का करीब 90% कारोबार स्थानीय करेंसी में हो रहा है। दोनों देशों के पास एक-दूसरे की करेंसी भी जमा हो गई है। अब इन पैसों को कारोबार और निवेश में इस्तेमाल करने और रुपये-रूबल में भुगतान आसान बनाने पर बातचीत हो सकती है। रूस तक पहुंचने के रास्ते होंगे आसान दोनों देश व्यापार बढ़ाने के लिए इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) और चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग को आगे बढ़ाने पर भी बात कर सकते हैं। INSTC भारत को ईरान के रास्ते रूस से जोड़ता है। वहीं चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री मार्ग से भारत और रूस के पूर्वी हिस्से के बीच सामान पहुंचाने का समय करीब 40 दिन से घटकर 20-22 दिन हो सकता है। ————————— यह खबर भी पढ़ें… BRICS समिट में भारत नहीं आएंगे बांग्लादेशी PM रहमान:बांग्लादेश बोला- प्रधानमंत्री के तौर पर न्योता नहीं मिला था; दूसरी बार भारत यात्रा टली बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान BRICS समिट में शामिल होने भारत नहीं आएंगे। विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने इसकी पुष्टि की है। पूरी खबर यहां पढ़ें… दैनिक भास्कर को Google पर पसंदीदा सोर्स बनाएं ➔




