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Nepal Flood Vs China; Rainfall Glacial Collapse Early Warning – Data Sharing Row

Nepal Flood Vs China; Rainfall Glacial Collapse Early Warning - Data Sharing Row

26 अगस्त की सुबह नेपाल के रसुवा में आसमान साफ था। अचानक भोटेकोशी नदी में मलबा, पत्थर और पानी का ऐसा सैलाब आया कि सब बहता चला गया। 1300 से ज्यादा मौतें हुईं और 5 हजार से ज्यादा लोग लापता हैं। ये तबाही चीन की तरफ बनी झील फटने से हुई थी। सवाल उठा कि क्य

.

चीन के विदेश विभाग के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने दावा किया कि चीन ने नेपाल को समय-समय पर मौसम का डेटा और चेतावनियां दी थीं। ब्रिटिश न्यूज एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट में भी दावा किया गया कि आपदा से करीब 12 दिन पहले चीन ने नेपाल को ईमेल भेजकर भारी बारिश की जानकारी दी थी। इससे लगता है कि नेपाल के पास खबर थी कि तबाही हो सकती है, लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है। पढ़िए रिपोर्ट…

चीन-नेपाल के एक्सपर्ट चार महीने में तीन बार मिले अप्रैल से जुलाई के बीच चीन और नेपाल के पर्यावरण, मौसम और आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारी और वैज्ञानिक कम से कम तीन अलग-अलग मंचों पर मिले। इस दौरान ग्लेशियर, ग्लेशियल झील, जलवायु से जुड़े जोखिम और अर्ली वार्निंग पर बात हुई।

पहली बैठक: 22 अप्रैल–5 मई, बीजिंग चीन की नेशनल अकैडमी ऑफ फॉरेस्टी एंड ग्रासलैंड एडमिनिस्ट्रेशन ने पर्यावरण संरक्षण और ग्रीन ट्रांसफॉर्मेशन पर सेमिनार किया। नेपाल के प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया।

दूसरी बैठक: 27 मई, काठमांडू नेपाल के 10 और चीन-तिब्बत के 12 अधिकारियों के बीच बैठक हुई। इसमें ग्लेशियल झीलों की मैपिंग और ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी अचानक जलस्तर बढ़ने या ग्लेशियर झील फटने के खतरे को कम करने पर चर्चा हुई।

तीसरी बैठक: जुलाई, तिब्बत तिब्बत के निंगची में 5th ट्रांस हिमालय इंटरनेशनल कोऑपरेशन फोरम हुआ। इसमें 29 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। नेपाल भी इनमें शामिल था। इसी दौरान चीन ने अपना मल्टी हेजार्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम भी पेश किया।

12 दिन पहले चीन ने क्या चेतावनी दी थी रायटर्स के मुताबिक, 14 अगस्त के आसपास चीन के विश्व मौसम विज्ञान केंद्र ने नेपाल को ईमेल भेजा था। इसमें 14 से 19 अगस्त के बीच भारी बारिश और मानसूनी दबाव की आशंका जताई गई थी। हालांकि, यह भी 26 अगस्त के लिए नहीं था। यहां एक अहम फर्क है। भारी बारिश का पूर्वानुमान और किसी खास ग्लेशियर के टूटने की चेतावनी एक बात नहीं है।

बाढ़ आने के दो हफ्ते बाद भी घरों में घुसा मलबा साफ नहीं हो पाया है। लोग कैंपों में रह रहे हैं और दिन में घर की सफाई के लिए आ जाते हैं।

नेपाल के सबसे बड़े आपदा अधिकारी बोले- स्पेसिफिक वार्निंग नहीं मिली नेपाल की नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के कार्यकारी प्रमुख डॉ. धरम उप्रेती ने चीन के दावे पर सीधे आधिकारिक टिप्पणी करने से परहेज किया। उनके मुताबिक पानी इतनी तेजी से नीचे आया कि सीमा क्षेत्र में लगा रिवर मॉनिटरिंग सिस्टम भी प्रभावित हुआ। नीचे की तरफ अलर्ट जारी करने का समय मिला, लेकिन ऊपरी इलाके में लोगों के पास बचने के लिए पर्याप्त समय नहीं था।

डॉ. उप्रेती बताते हैं कि नेपाल में नदियों पर रिवर गेज स्टेशन लगे हैं। पानी के तय सीमा से ऊपर जाते ही प्रभावित इलाकों में SMS अलर्ट भेजे जाते हैं। यह व्यवस्था 2015 से चल रहे फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम का हिस्सा है। नदी और जगह के हिसाब से सामान्य स्थिति में करीब 6 मिनट से 6 घंटे तक का लीड टाइम मिल सकता है। 26 अगस्त को खतरे की जानकारी मिलते ही 1-2 मिनट में निचले इलाकों के लिए SMS अलर्ट जारी किए गए।

पहला अलर्ट करीब 9:15 बजे और दूसरा 11:50 बजे भेजा गया। इसके बाद भी स्थिति के हिसाब से अलर्ट जारी होते रहे। सोशल मीडिया, टीवी और रेडियो से भी चेतावनी दी गई। डॉ. उप्रेती के मुताबिक करीब 4 हजार लोगों के फोन पर अलर्ट भेजा गया था। कितने लोगों ने उसे देखा, इसका डेटा नहीं है।

डॉ. उप्रेती के मुताबिक, पानी करीब 180 किमी प्रति घंटे या उससे ज्यादा की रफ्तार से नीचे आया। इससे अलर्ट जारी करने और उसके लोगों तक पहुंचने के बीच का समय बहुत कम रह गया।

‘सिर्फ ईमेल भेजना चेतावनी नहीं, सही एजेंसी को, सही वक्त पर मिलना जरूरी’

चीन की तरफ से भेजे गए ईमेल पर डॉ. उप्रेती कहते हैं, ‘मुझे नहीं पता कि 26 अगस्त से पहले किस अधिकारी को, कब और किस स्तर की चेतावनी भेजी गई थी। सिर्फ ईमेल भेज देना पर्याप्त नहीं है। सूचना सही एजेंसी तक सही समय पर पहुंचे और उस पर कार्रवाई हो, तभी वह वास्तविक चेतावनी बनती है।’

यहीं चीन के दावे पर सवाल खड़ा होता है। अगर 12 दिन पहले इतनी अहम जानकारी थी, तो वह नेपाल की किस एजेंसी तक पहुंची, किस अधिकारी ने उसे देखा और उसके आधार पर क्या कदम उठाए गए।

बैठकों में ग्लेशियर पर चर्चा हुई, लेकिन खास चेतावनी नहीं

डॉ. उप्रेती के मुताबिक, चीन और नेपाल के वैज्ञानिक हिमालय में बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और एवलॉन्च जैसे खतरों पर लगातार चर्चा करते रहे हैं। 27 मई की बैठक में भी इसके जोखिमों पर बात हुई थी। किसी खास ग्लेशियर के टूटने की स्पेसिफिक वार्निंग नहीं मिली थी।

दो अलग-अलग बातें हैं। पहली- हिमालय में ग्लेशियर और जलवायु परिवर्तन से खतरा बढ़ रहा है। दूसरी- किसी खास ग्लेशियर के टूटने और उससे अचानक बाढ़ आने की पहले से चेतावनी। दूसरी तरह की चेतावनी का कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया।

मौजूदा सिस्टम क्यों वॉर्निंग नहीं दे पाया

सामान्य GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड में ग्लेशियर के पास बनी झील का पानी अचानक बाहर निकलता है। 26 अगस्त की घटना में ग्लेशियल झील के फटने की प्रक्रिया सामने नहीं आई।

शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक, यहां मुख्य ट्रिगर रॉक-आइस एवलॉन्च और ग्लेशियर का हिस्सा टूटना था। यही सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती है। नदी का पानी बढ़ने पर गेज स्टेशन पकड़ सकता है। ग्लेशियल झील में पानी बढ़े, तो उसकी निगरानी की जा सकती है। पहाड़ पर ग्लेशियर का एक हिस्सा किस दिन, किस समय टूटेगा, इसे पहले से पकड़ना मुश्किल है।

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के सीनियर रिसोर्स एसोसिएट श्रवण स्विफ्ट बताते हैं, ‘यह नहीं कहा जा सकता कि चीन ने कोई जानकारी दी ही नहीं थी। घटना के समय हमारी टीम चीन के वैज्ञानिकों के संपर्क में थी और दोनों पक्षों ने सूचनाएं साझा की थीं।’

हालांकि, वे स्पष्ट नहीं कर सके कि 26 अगस्त से पहले नेपाल को किसी खास ग्लेशियर के टूटने या बाढ़ की स्पेसिफिक चेतावनी दी गई थी या नहीं। उनके मुताबिक उस इलाके में ग्लेशियर की निगरानी के लिए कोई स्टेशन नहीं था।

हाईरिस्क कंसोर्टियम की रिपोर्ट के मुताबिक, 26 अगस्त की सुबह लांगटांग लिरुंग इलाके में ग्लेशियर और उसके नीचे की चट्टान का हिस्सा टूट गया। इससे पहले इसके संकेत मिलने लगे थे। ग्लेशियर की सतह की गति बढ़ गई थी और 24 अगस्त तक पिघला पानी भूरा दिखाई देने लगा। ग्लेशियर और चट्टानों के टूटने से 5.2 तीव्रता का भूकंप दर्ज हुआ, लेकिन इन संकेतों को चेतावनी में बदलने वाला सिस्टम मौजूद नहीं था।

टूरिज्म बोर्ड का दावा- हमें कोई अलर्ट नहीं मिला

इस आपदा में विदेशी नागरिकों की भी मौत हुई है। नेपाल सरकार के 6 सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक करीब 600 विदेशी नागरिक अब भी लापता हैं। इनमें 35 देशों के नागरिक शामिल हैं। हमने नेपाल टूरिज्म बोर्ड से पूछा कि क्या पर्यटकों को कोई चेतावनी मिली थी?

बोर्ड के प्रवक्ता सुनील शर्मा ने जवाब दिया-

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26 अगस्त से पहले चीन की ओर से बोर्ड को ऐसा कोई अलर्ट नहीं मिला, जिसे पर्यटकों के लिए चेतावनी के तौर पर जारी किया जा सके। इसलिए बोर्ड ने भी पर्यटकों के लिए कोई अलर्ट जारी नहीं किया। उन्हें चीन की चेतावनी के बारे में जानकारी बाद में मीडिया से मिली।

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सुनील शर्मा उनके मुताबिक घटना इतनी तेजी से हुई कि पर्यटकों को अलर्ट करने या उन्हें निकालने का समय ही नहीं मिला। नेपाल में मौसम और जलस्तर बढ़ने की चेतावनी देने वाला सिस्टम है, लेकिन इस पैमाने की आपदा के सामने बेबस साबित हुआ।

चश्मदीदों तक चीन का अलर्ट तो दूर, सरकारी SMS भी नहीं पहुंचा

भास्कर की टीम त्रिशूली घाटी के प्रभावित इलाकों में पहुंची। चश्मदीदों से पूछा कि बाढ़ आने से पहले आपको अलर्ट मिला था? ज्यादातर लोगों ने कहा कि मैसेज नहीं आया, पुलिस के सायरन या चेतावनी से खतरे की जानकारी मिली। त्रिशूली बाजार में मिले दुकानदार सुजन ने बताया कि पुलिस लोगों से सुरक्षित जगह जाने के लिए कह रही थी। ज्यादातर लोगों ने यही बात कही।

सिर्फ एक केस: स्विट्जरलैंड में समय रहते गांव खाली कराया ग्लेशियर के टूटने की अर्ली वार्निंग का सिर्फ एक प्रमाण 2025 में मिलता है। स्विट्जरलैंड के आल्प्स में ग्लेशियर की गतिविधियों पर एक रिसर्च टीम की समय रहते नजर पड़ गई थी। इसके बाद ब्लाटेन गांव को खाली कराया गया और बड़े एवलॉन्च से पहले लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया।

वर्जीनिया टेक के भू-विज्ञानी फिलिप प्रिंस के मुताबिक आल्प्स जैसी व्यवस्था हिमालय में लागू करना बहुत मुश्किल है। आल्प्स के कई इलाकों में आसानी से पहुंचा जा सकता। हिमालय बहुत बड़ा, ऊंचा और दुर्गम है। सैकड़ों ऐसी जगहें हो सकती हैं, जहां ग्लेशियर या चट्टान टूटने का खतरा हो। हर जगह लगातार निगरानी के लिए जरूरी सेंसर, तकनीकी टीम और संचार व्यवस्था खड़ी करना बड़ी चुनौती है।

नेपाल से ग्राउंड रिपोर्ट यहां पढ़ें…

1. सायरन बजा, बचने के लिए मिले सिर्फ 30 मिनट

‘पानी आया, और सब ले गया, अब और क्या बोलूं।’

नेपाल के त्रिशूली में रहने वाले सुजन की इस एक लाइन में तबाही, बर्बादी और बेबसी की पूरी कहानी है। 26 अगस्त को ग्लेशियर टूटने के बाद अचानक आई बाढ़ से तबाह होने वाली बस्तियों में नुवाकोट जिले का त्रिशूली सबसे प्रमुख है। पढ़िए पूरी खबर…

2. बाढ़ आई… बाढ़ आई, जान बचाकर दोबारा भागे लोग

30 अगस्त की सुबह हम नेपाल के देवीघाट पहुंचे। हर तरफ मलबा था, जिसमें लोग सामान और अपनों को तलाशते मिले। सब सामान्य था, तभी अचानक बाढ़ का अलर्ट आया और हड़कंप मच गया। लोग बदहवास होकर सेफ जगह तलाशने के लिए भागने लगे। कुछ ही मिनट में कस्बा खाली हो गया। देवीघाट नेपाल के नुवाकोट जिले में त्रिशूली और ताड़ी नदी के संगम पर बसा है। पढ़िए पूरी खबर…

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राजनीति

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26 अगस्त की सुबह नेपाल के रसुवा में आसमान साफ था। अचानक भोटेकोशी नदी में मलबा, पत्थर और पानी का ऐसा सैलाब आया कि सब बहता चला गया। 1300 से ज्यादा मौतें हुईं और 5 हजार से ज्यादा लोग लापता हैं। ये तबाही चीन की तरफ बनी झील फटने से हुई थी। सवाल उठा कि क्य

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चीन के विदेश विभाग के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने दावा किया कि चीन ने नेपाल को समय-समय पर मौसम का डेटा और चेतावनियां दी थीं। ब्रिटिश न्यूज एजेंसी रायटर्स की रिपोर्ट में भी दावा किया गया कि आपदा से करीब 12 दिन पहले चीन ने नेपाल को ईमेल भेजकर भारी बारिश की जानकारी दी थी। इससे लगता है कि नेपाल के पास खबर थी कि तबाही हो सकती है, लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है। पढ़िए रिपोर्ट…

चीन-नेपाल के एक्सपर्ट चार महीने में तीन बार मिले अप्रैल से जुलाई के बीच चीन और नेपाल के पर्यावरण, मौसम और आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारी और वैज्ञानिक कम से कम तीन अलग-अलग मंचों पर मिले। इस दौरान ग्लेशियर, ग्लेशियल झील, जलवायु से जुड़े जोखिम और अर्ली वार्निंग पर बात हुई।

पहली बैठक: 22 अप्रैल–5 मई, बीजिंग चीन की नेशनल अकैडमी ऑफ फॉरेस्टी एंड ग्रासलैंड एडमिनिस्ट्रेशन ने पर्यावरण संरक्षण और ग्रीन ट्रांसफॉर्मेशन पर सेमिनार किया। नेपाल के प्रतिनिधियों ने इसमें हिस्सा लिया।

दूसरी बैठक: 27 मई, काठमांडू नेपाल के 10 और चीन-तिब्बत के 12 अधिकारियों के बीच बैठक हुई। इसमें ग्लेशियल झीलों की मैपिंग और ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी अचानक जलस्तर बढ़ने या ग्लेशियर झील फटने के खतरे को कम करने पर चर्चा हुई।

तीसरी बैठक: जुलाई, तिब्बत तिब्बत के निंगची में 5th ट्रांस हिमालय इंटरनेशनल कोऑपरेशन फोरम हुआ। इसमें 29 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। नेपाल भी इनमें शामिल था। इसी दौरान चीन ने अपना मल्टी हेजार्ड अर्ली वार्निंग सिस्टम भी पेश किया।

12 दिन पहले चीन ने क्या चेतावनी दी थी रायटर्स के मुताबिक, 14 अगस्त के आसपास चीन के विश्व मौसम विज्ञान केंद्र ने नेपाल को ईमेल भेजा था। इसमें 14 से 19 अगस्त के बीच भारी बारिश और मानसूनी दबाव की आशंका जताई गई थी। हालांकि, यह भी 26 अगस्त के लिए नहीं था। यहां एक अहम फर्क है। भारी बारिश का पूर्वानुमान और किसी खास ग्लेशियर के टूटने की चेतावनी एक बात नहीं है।

बाढ़ आने के दो हफ्ते बाद भी घरों में घुसा मलबा साफ नहीं हो पाया है। लोग कैंपों में रह रहे हैं और दिन में घर की सफाई के लिए आ जाते हैं।

नेपाल के सबसे बड़े आपदा अधिकारी बोले- स्पेसिफिक वार्निंग नहीं मिली नेपाल की नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी के कार्यकारी प्रमुख डॉ. धरम उप्रेती ने चीन के दावे पर सीधे आधिकारिक टिप्पणी करने से परहेज किया। उनके मुताबिक पानी इतनी तेजी से नीचे आया कि सीमा क्षेत्र में लगा रिवर मॉनिटरिंग सिस्टम भी प्रभावित हुआ। नीचे की तरफ अलर्ट जारी करने का समय मिला, लेकिन ऊपरी इलाके में लोगों के पास बचने के लिए पर्याप्त समय नहीं था।

डॉ. उप्रेती बताते हैं कि नेपाल में नदियों पर रिवर गेज स्टेशन लगे हैं। पानी के तय सीमा से ऊपर जाते ही प्रभावित इलाकों में SMS अलर्ट भेजे जाते हैं। यह व्यवस्था 2015 से चल रहे फ्लड अर्ली वार्निंग सिस्टम का हिस्सा है। नदी और जगह के हिसाब से सामान्य स्थिति में करीब 6 मिनट से 6 घंटे तक का लीड टाइम मिल सकता है। 26 अगस्त को खतरे की जानकारी मिलते ही 1-2 मिनट में निचले इलाकों के लिए SMS अलर्ट जारी किए गए।

पहला अलर्ट करीब 9:15 बजे और दूसरा 11:50 बजे भेजा गया। इसके बाद भी स्थिति के हिसाब से अलर्ट जारी होते रहे। सोशल मीडिया, टीवी और रेडियो से भी चेतावनी दी गई। डॉ. उप्रेती के मुताबिक करीब 4 हजार लोगों के फोन पर अलर्ट भेजा गया था। कितने लोगों ने उसे देखा, इसका डेटा नहीं है।

डॉ. उप्रेती के मुताबिक, पानी करीब 180 किमी प्रति घंटे या उससे ज्यादा की रफ्तार से नीचे आया। इससे अलर्ट जारी करने और उसके लोगों तक पहुंचने के बीच का समय बहुत कम रह गया।

‘सिर्फ ईमेल भेजना चेतावनी नहीं, सही एजेंसी को, सही वक्त पर मिलना जरूरी’

चीन की तरफ से भेजे गए ईमेल पर डॉ. उप्रेती कहते हैं, ‘मुझे नहीं पता कि 26 अगस्त से पहले किस अधिकारी को, कब और किस स्तर की चेतावनी भेजी गई थी। सिर्फ ईमेल भेज देना पर्याप्त नहीं है। सूचना सही एजेंसी तक सही समय पर पहुंचे और उस पर कार्रवाई हो, तभी वह वास्तविक चेतावनी बनती है।’

यहीं चीन के दावे पर सवाल खड़ा होता है। अगर 12 दिन पहले इतनी अहम जानकारी थी, तो वह नेपाल की किस एजेंसी तक पहुंची, किस अधिकारी ने उसे देखा और उसके आधार पर क्या कदम उठाए गए।

बैठकों में ग्लेशियर पर चर्चा हुई, लेकिन खास चेतावनी नहीं

डॉ. उप्रेती के मुताबिक, चीन और नेपाल के वैज्ञानिक हिमालय में बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पिघलने और एवलॉन्च जैसे खतरों पर लगातार चर्चा करते रहे हैं। 27 मई की बैठक में भी इसके जोखिमों पर बात हुई थी। किसी खास ग्लेशियर के टूटने की स्पेसिफिक वार्निंग नहीं मिली थी।

दो अलग-अलग बातें हैं। पहली- हिमालय में ग्लेशियर और जलवायु परिवर्तन से खतरा बढ़ रहा है। दूसरी- किसी खास ग्लेशियर के टूटने और उससे अचानक बाढ़ आने की पहले से चेतावनी। दूसरी तरह की चेतावनी का कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आया।

मौजूदा सिस्टम क्यों वॉर्निंग नहीं दे पाया

सामान्य GLOF यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड में ग्लेशियर के पास बनी झील का पानी अचानक बाहर निकलता है। 26 अगस्त की घटना में ग्लेशियल झील के फटने की प्रक्रिया सामने नहीं आई।

शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक, यहां मुख्य ट्रिगर रॉक-आइस एवलॉन्च और ग्लेशियर का हिस्सा टूटना था। यही सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती है। नदी का पानी बढ़ने पर गेज स्टेशन पकड़ सकता है। ग्लेशियल झील में पानी बढ़े, तो उसकी निगरानी की जा सकती है। पहाड़ पर ग्लेशियर का एक हिस्सा किस दिन, किस समय टूटेगा, इसे पहले से पकड़ना मुश्किल है।

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के सीनियर रिसोर्स एसोसिएट श्रवण स्विफ्ट बताते हैं, ‘यह नहीं कहा जा सकता कि चीन ने कोई जानकारी दी ही नहीं थी। घटना के समय हमारी टीम चीन के वैज्ञानिकों के संपर्क में थी और दोनों पक्षों ने सूचनाएं साझा की थीं।’

हालांकि, वे स्पष्ट नहीं कर सके कि 26 अगस्त से पहले नेपाल को किसी खास ग्लेशियर के टूटने या बाढ़ की स्पेसिफिक चेतावनी दी गई थी या नहीं। उनके मुताबिक उस इलाके में ग्लेशियर की निगरानी के लिए कोई स्टेशन नहीं था।

हाईरिस्क कंसोर्टियम की रिपोर्ट के मुताबिक, 26 अगस्त की सुबह लांगटांग लिरुंग इलाके में ग्लेशियर और उसके नीचे की चट्टान का हिस्सा टूट गया। इससे पहले इसके संकेत मिलने लगे थे। ग्लेशियर की सतह की गति बढ़ गई थी और 24 अगस्त तक पिघला पानी भूरा दिखाई देने लगा। ग्लेशियर और चट्टानों के टूटने से 5.2 तीव्रता का भूकंप दर्ज हुआ, लेकिन इन संकेतों को चेतावनी में बदलने वाला सिस्टम मौजूद नहीं था।

टूरिज्म बोर्ड का दावा- हमें कोई अलर्ट नहीं मिला

इस आपदा में विदेशी नागरिकों की भी मौत हुई है। नेपाल सरकार के 6 सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक करीब 600 विदेशी नागरिक अब भी लापता हैं। इनमें 35 देशों के नागरिक शामिल हैं। हमने नेपाल टूरिज्म बोर्ड से पूछा कि क्या पर्यटकों को कोई चेतावनी मिली थी?

बोर्ड के प्रवक्ता सुनील शर्मा ने जवाब दिया-

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26 अगस्त से पहले चीन की ओर से बोर्ड को ऐसा कोई अलर्ट नहीं मिला, जिसे पर्यटकों के लिए चेतावनी के तौर पर जारी किया जा सके। इसलिए बोर्ड ने भी पर्यटकों के लिए कोई अलर्ट जारी नहीं किया। उन्हें चीन की चेतावनी के बारे में जानकारी बाद में मीडिया से मिली।

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सुनील शर्मा उनके मुताबिक घटना इतनी तेजी से हुई कि पर्यटकों को अलर्ट करने या उन्हें निकालने का समय ही नहीं मिला। नेपाल में मौसम और जलस्तर बढ़ने की चेतावनी देने वाला सिस्टम है, लेकिन इस पैमाने की आपदा के सामने बेबस साबित हुआ।

चश्मदीदों तक चीन का अलर्ट तो दूर, सरकारी SMS भी नहीं पहुंचा

भास्कर की टीम त्रिशूली घाटी के प्रभावित इलाकों में पहुंची। चश्मदीदों से पूछा कि बाढ़ आने से पहले आपको अलर्ट मिला था? ज्यादातर लोगों ने कहा कि मैसेज नहीं आया, पुलिस के सायरन या चेतावनी से खतरे की जानकारी मिली। त्रिशूली बाजार में मिले दुकानदार सुजन ने बताया कि पुलिस लोगों से सुरक्षित जगह जाने के लिए कह रही थी। ज्यादातर लोगों ने यही बात कही।

सिर्फ एक केस: स्विट्जरलैंड में समय रहते गांव खाली कराया ग्लेशियर के टूटने की अर्ली वार्निंग का सिर्फ एक प्रमाण 2025 में मिलता है। स्विट्जरलैंड के आल्प्स में ग्लेशियर की गतिविधियों पर एक रिसर्च टीम की समय रहते नजर पड़ गई थी। इसके बाद ब्लाटेन गांव को खाली कराया गया और बड़े एवलॉन्च से पहले लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया।

वर्जीनिया टेक के भू-विज्ञानी फिलिप प्रिंस के मुताबिक आल्प्स जैसी व्यवस्था हिमालय में लागू करना बहुत मुश्किल है। आल्प्स के कई इलाकों में आसानी से पहुंचा जा सकता। हिमालय बहुत बड़ा, ऊंचा और दुर्गम है। सैकड़ों ऐसी जगहें हो सकती हैं, जहां ग्लेशियर या चट्टान टूटने का खतरा हो। हर जगह लगातार निगरानी के लिए जरूरी सेंसर, तकनीकी टीम और संचार व्यवस्था खड़ी करना बड़ी चुनौती है।

नेपाल से ग्राउंड रिपोर्ट यहां पढ़ें…

1. सायरन बजा, बचने के लिए मिले सिर्फ 30 मिनट

‘पानी आया, और सब ले गया, अब और क्या बोलूं।’

नेपाल के त्रिशूली में रहने वाले सुजन की इस एक लाइन में तबाही, बर्बादी और बेबसी की पूरी कहानी है। 26 अगस्त को ग्लेशियर टूटने के बाद अचानक आई बाढ़ से तबाह होने वाली बस्तियों में नुवाकोट जिले का त्रिशूली सबसे प्रमुख है। पढ़िए पूरी खबर…

2. बाढ़ आई… बाढ़ आई, जान बचाकर दोबारा भागे लोग

30 अगस्त की सुबह हम नेपाल के देवीघाट पहुंचे। हर तरफ मलबा था, जिसमें लोग सामान और अपनों को तलाशते मिले। सब सामान्य था, तभी अचानक बाढ़ का अलर्ट आया और हड़कंप मच गया। लोग बदहवास होकर सेफ जगह तलाशने के लिए भागने लगे। कुछ ही मिनट में कस्बा खाली हो गया। देवीघाट नेपाल के नुवाकोट जिले में त्रिशूली और ताड़ी नदी के संगम पर बसा है। पढ़िए पूरी खबर…

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