जापान की मशहूर गेमिंग कंपनी:घाटा हुआ तो कोर बिजनेस बेचा; अब प्रतिद्वंद्वी को ही सॉफ्टवेयर बेचती है गेमिंग कंपनी सेगा

1993, हार्वर्ड के कुछ वैज्ञानिकों ने मानव भ्रूण के विकास के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण जीन की खोज की और नाम रखा ‘सोनिक हेजगॉग’। यह नाम सेगा कॉमिक बुक के कैरेक्टर ‘सोनिक’ पर रखा गया था। यह वही जापानी गेम है, जिसकी 2024 तक 177 करोड़ से ज्यादा यूनिट्स बिक चुकी हैं। गेमिंग सॉफ्टवेयर के मामले में सेगा आज दुनिया की शीर्ष कंपनियों में शामिल है, लेकिन 1997 से 2001 के बीच एक ऐसा दौर भी आया जब सेगा का वजूद ही खत्म होने की कगार पर आ गया था। सेगा का कंसोल ‘सैटर्न’ सोनी के प्लेस्टेशन के सामने बुरी तरह पिट चुका था। फिर सेगा ने 1998 में पूरी ताकत झोंककर एक क्रांतिकारी कंसोल ‘सेगा ड्रीमकास्ट’ लॉन्च किया। यह दुनिया का पहला कंसोल था, जिसमें इंटरनेट और ऑनलाइन गेमिंग के लिए इन-बिल्ट मोडेम था, लेकिन साल 2000 में सोनी ने इन-बिल्ट डीवीडी प्लेयर के साथ ‘प्लेस्टेशन-2’ की घोषणा कर दी। इसने ड्रीमकास्ट के बाजार को पूरी तरह खत्म कर दिया। कंपनी पांच वर्षों तक भारी घाटे में डूबी रही। स्थिति इतनी बदतर हो गई कि जनवरी 2001 में सेगा को घोषणा करनी पड़ी कि वह गेमिंग हार्डवेयर (कंसोल) बनाने का काम हमेशा के लिए बंद कर रही हैं। कंपनी ने गेमिंग सॉफ्टवेयर बनाने शुरू किए। वर्तमान स्थिति- करीब 30 हजार करोड़ रु. की कंपनी है सेगा सेगा वर्तमान में करीब 30 हजार करोड़ रुपए की कंपनी है। सेगा ने 2023 में फिनलैंड की एंग्री बर्ड्स बनाने वाली कंपनी रोवियो का करीब 7 हजार करोड़ रुपए में अधिग्रहण किया, जिससे मोबाइल गेमिंग सेगमेंट में उसकी पकड़ मजबूत हुई। कंपनी अमेरिका और यूरोप में क्षेत्रीय मुख्यालयों-सेगा ऑफ अमेरिका और सेगा-यूरोप के जरिए अपना व्यापार चलाती है। कंपनी ने एनएसई में सूचीबद्ध कंपनी प्रमारा प्रमोशंस के साथ भारत में रणनीतिक साझेदारी की है। इसके तहत क्रेयान शिनचैन सहित सेगा के लाइसेंस्ड कैरेक्टर अब भारत में भी बनाए जांएगे। यूं संकट में फंसी थी… अनावश्यक प्रयोग – सफल कंसोल ‘सेगा जेनेसिस’ के बाद सेगा सीडी और 32एक्स जैसे महंगे पर कम गुणवत्ता वाले पेरिफेरल्स लॉन्च किए। इससे गेम डेवलपर्स नाराज हो गए। आम ग्राहक भी भ्रमित हुए। सैटर्न कंसोल का विनाशकारी लॉन्च – 1995 में कंसोल ‘सेगा सैटर्न’ को अचानक लॉन्च किया। रिटेलर्स के पास स्टॉक नहीं था। तभी सोनी ने प्लेस्टेशन की कीमत सेगा से 100 डॉलर कम कर दी। सोनी प्लेस्टेशन-2 की सुनामी भांपने में नाकामी – सोनी ने प्लेस्टेशन 2 में डीवीडी प्लेयर की सुविधा भी दी थी। ग्राहकों ने सेगा का ड्रीमकास्ट खरीदने के बजाय प्लेस्टेशन 2 को वरीयता दी। भयंकर वित्तीय घाटा और नकदी संकट – कंपनी को हर महीने करोड़ों डॉलर का नुकसान हो रहा था। कर्ज इतना हो गया कि दिवालिया होना तय माना जा रहा था। इस तरह की वापसी… प्योर सॉफ्टवेयर पब्लिशर मॉडल में बदलाव – सेगा ने खुद को एक थर्ड-पार्टी सॉफ्टवेयर पब्लिशर के रूप में स्थापित किया। इसका फायदा यह हुआ कि अब वह गेम्स को पूर्व प्रतिद्वंद्वियों के प्लेटफॉर्म पर बेचने लगी। सेगा-सैमी का ऐतिहासिक विलय – 2004 में सेगा ने जापानी गेमिंग और पैचिनको जायंट ‘सैमी कॉर्पोरेशन’ के साथ मर्जर कर लिया। सैमी के पास नकदी का भारी भंडार था। इसने कर्ज के बोझ को खत्म कर दिया। चेयरमैन ओकावा का बलिदान – जब 2001 में सेगा डूब रही थी, तब तत्कालीन चेयरमैन इसाओ ओकावा ने कंपनी को दिया गया करीब 3200 करोड़ रु. का व्यक्तिगत कर्ज माफ कर दिया। शेयर दान कर दिए। ग्लोबल स्टूडियोज का अधिग्रहण – सेगा ने केवल ‘सोनिक’ पर निर्भर रहने के बजाय दुनिया भर के बेहतरीन गेमिंग स्टूडियोज को खरीदा। पहुंच बढ़ाई। शुरुआत – अमेरिकी व्यवसायियों ने रखी थी इस गेमिंग कंपनी की नींव 1940 में होनोलूलू, अमेरिका में 3 अमेरिकी व्यवसायियों-मार्टिन ब्रोमली, इरविंग ब्रॉम्बर्ग और जेम्स हम्पर्ट ने ‘स्टैंडर्ड गेम्स’ के रूप में नींव रखी। उद्देश्य अमेरिकी सैनिकों के मनोरंजन के लिए सिक्कों से चलने वाली स्लॉट मशीनें उपलब्ध कराना था। 1951 में, जब इन मशीनों पर पाबंदी लगी तो संस्थापकों ने बिजनेस टोक्यो शिफ्ट कर दिया। विरासत – पारंपरिक प्रीमियम कंसोल को ही बढ़ाने की तैयारी कंपनी का पूरा फोकस पारंपरिक प्रीमियम कंसोल को ही आगे बढ़ाने पर है। इसी के तहत मई 2026 में सेगा ने बहुप्रतीक्षित एक अरब डॉलर की ‘सुपर गेम’ परियोजना को रद्द कर दिया है। साथ ही प्रीमियम कंसोल-पीसी गेम्स पर फोकस लौटाने का ऐलान किया है। वित्त वर्ष 2026-27 में 30 हजार करोड़ रु. से अधिक की बिक्री का अनुमान है। ऐसे पड़ा नाम – जापान पहुंचने पर इसका नाम servic games of Japan पड़ा। फिर सर्विस और गेम्स के दो-दो शब्द मिलाकर नाम SEGA कर दिया गया। सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी – गेमिंग इतिहास में इसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी निनटेंडो रहा है। सोनी के प्ले स्टेशन ने भी सेगा सैटर्न और ड्रीमकास्ट को बाजार से बाहर किया।
जापान की मशहूर गेमिंग कंपनी:घाटा हुआ तो कोर बिजनेस बेचा; अब प्रतिद्वंद्वी को ही सॉफ्टवेयर बेचती है गेमिंग कंपनी सेगा

1993, हार्वर्ड के कुछ वैज्ञानिकों ने मानव भ्रूण के विकास के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण जीन की खोज की और नाम रखा ‘सोनिक हेजगॉग’। यह नाम सेगा कॉमिक बुक के कैरेक्टर ‘सोनिक’ पर रखा गया था। यह वही जापानी गेम है, जिसकी 2024 तक 177 करोड़ से ज्यादा यूनिट्स बिक चुकी हैं। गेमिंग सॉफ्टवेयर के मामले में सेगा आज दुनिया की शीर्ष कंपनियों में शामिल है, लेकिन 1997 से 2001 के बीच एक ऐसा दौर भी आया जब सेगा का वजूद ही खत्म होने की कगार पर आ गया था। सेगा का कंसोल ‘सैटर्न’ सोनी के प्लेस्टेशन के सामने बुरी तरह पिट चुका था। फिर सेगा ने 1998 में पूरी ताकत झोंककर एक क्रांतिकारी कंसोल ‘सेगा ड्रीमकास्ट’ लॉन्च किया। यह दुनिया का पहला कंसोल था, जिसमें इंटरनेट और ऑनलाइन गेमिंग के लिए इन-बिल्ट मोडेम था, लेकिन साल 2000 में सोनी ने इन-बिल्ट डीवीडी प्लेयर के साथ ‘प्लेस्टेशन-2’ की घोषणा कर दी। इसने ड्रीमकास्ट के बाजार को पूरी तरह खत्म कर दिया। कंपनी पांच वर्षों तक भारी घाटे में डूबी रही। स्थिति इतनी बदतर हो गई कि जनवरी 2001 में सेगा को घोषणा करनी पड़ी कि वह गेमिंग हार्डवेयर (कंसोल) बनाने का काम हमेशा के लिए बंद कर रही हैं। कंपनी ने गेमिंग सॉफ्टवेयर बनाने शुरू किए। वर्तमान स्थिति- करीब 30 हजार करोड़ रु. की कंपनी है सेगा सेगा वर्तमान में करीब 30 हजार करोड़ रुपए की कंपनी है। सेगा ने 2023 में फिनलैंड की एंग्री बर्ड्स बनाने वाली कंपनी रोवियो का करीब 7 हजार करोड़ रुपए में अधिग्रहण किया, जिससे मोबाइल गेमिंग सेगमेंट में उसकी पकड़ मजबूत हुई। कंपनी अमेरिका और यूरोप में क्षेत्रीय मुख्यालयों-सेगा ऑफ अमेरिका और सेगा-यूरोप के जरिए अपना व्यापार चलाती है। कंपनी ने एनएसई में सूचीबद्ध कंपनी प्रमारा प्रमोशंस के साथ भारत में रणनीतिक साझेदारी की है। इसके तहत क्रेयान शिनचैन सहित सेगा के लाइसेंस्ड कैरेक्टर अब भारत में भी बनाए जांएगे। यूं संकट में फंसी थी… अनावश्यक प्रयोग – सफल कंसोल ‘सेगा जेनेसिस’ के बाद सेगा सीडी और 32एक्स जैसे महंगे पर कम गुणवत्ता वाले पेरिफेरल्स लॉन्च किए। इससे गेम डेवलपर्स नाराज हो गए। आम ग्राहक भी भ्रमित हुए। सैटर्न कंसोल का विनाशकारी लॉन्च – 1995 में कंसोल ‘सेगा सैटर्न’ को अचानक लॉन्च किया। रिटेलर्स के पास स्टॉक नहीं था। तभी सोनी ने प्लेस्टेशन की कीमत सेगा से 100 डॉलर कम कर दी। सोनी प्लेस्टेशन-2 की सुनामी भांपने में नाकामी – सोनी ने प्लेस्टेशन 2 में डीवीडी प्लेयर की सुविधा भी दी थी। ग्राहकों ने सेगा का ड्रीमकास्ट खरीदने के बजाय प्लेस्टेशन 2 को वरीयता दी। भयंकर वित्तीय घाटा और नकदी संकट – कंपनी को हर महीने करोड़ों डॉलर का नुकसान हो रहा था। कर्ज इतना हो गया कि दिवालिया होना तय माना जा रहा था। इस तरह की वापसी… प्योर सॉफ्टवेयर पब्लिशर मॉडल में बदलाव – सेगा ने खुद को एक थर्ड-पार्टी सॉफ्टवेयर पब्लिशर के रूप में स्थापित किया। इसका फायदा यह हुआ कि अब वह गेम्स को पूर्व प्रतिद्वंद्वियों के प्लेटफॉर्म पर बेचने लगी। सेगा-सैमी का ऐतिहासिक विलय – 2004 में सेगा ने जापानी गेमिंग और पैचिनको जायंट ‘सैमी कॉर्पोरेशन’ के साथ मर्जर कर लिया। सैमी के पास नकदी का भारी भंडार था। इसने कर्ज के बोझ को खत्म कर दिया। चेयरमैन ओकावा का बलिदान – जब 2001 में सेगा डूब रही थी, तब तत्कालीन चेयरमैन इसाओ ओकावा ने कंपनी को दिया गया करीब 3200 करोड़ रु. का व्यक्तिगत कर्ज माफ कर दिया। शेयर दान कर दिए। ग्लोबल स्टूडियोज का अधिग्रहण – सेगा ने केवल ‘सोनिक’ पर निर्भर रहने के बजाय दुनिया भर के बेहतरीन गेमिंग स्टूडियोज को खरीदा। पहुंच बढ़ाई। शुरुआत – अमेरिकी व्यवसायियों ने रखी थी इस गेमिंग कंपनी की नींव 1940 में होनोलूलू, अमेरिका में 3 अमेरिकी व्यवसायियों-मार्टिन ब्रोमली, इरविंग ब्रॉम्बर्ग और जेम्स हम्पर्ट ने ‘स्टैंडर्ड गेम्स’ के रूप में नींव रखी। उद्देश्य अमेरिकी सैनिकों के मनोरंजन के लिए सिक्कों से चलने वाली स्लॉट मशीनें उपलब्ध कराना था। 1951 में, जब इन मशीनों पर पाबंदी लगी तो संस्थापकों ने बिजनेस टोक्यो शिफ्ट कर दिया। विरासत – पारंपरिक प्रीमियम कंसोल को ही बढ़ाने की तैयारी कंपनी का पूरा फोकस पारंपरिक प्रीमियम कंसोल को ही आगे बढ़ाने पर है। इसी के तहत मई 2026 में सेगा ने बहुप्रतीक्षित एक अरब डॉलर की ‘सुपर गेम’ परियोजना को रद्द कर दिया है। साथ ही प्रीमियम कंसोल-पीसी गेम्स पर फोकस लौटाने का ऐलान किया है। वित्त वर्ष 2026-27 में 30 हजार करोड़ रु. से अधिक की बिक्री का अनुमान है। ऐसे पड़ा नाम – जापान पहुंचने पर इसका नाम servic games of Japan पड़ा। फिर सर्विस और गेम्स के दो-दो शब्द मिलाकर नाम SEGA कर दिया गया। सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी – गेमिंग इतिहास में इसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी निनटेंडो रहा है। सोनी के प्ले स्टेशन ने भी सेगा सैटर्न और ड्रीमकास्ट को बाजार से बाहर किया।
जापान में 780 साल पुराना पारंपरिक उत्सव:1 हजार किलो की झांकी उठाकर दौड़े युवा; 10 लाख पर्यटक जुटे

जापान के फुकुओका शहर में महामारियों से बचाव के लिए ‘हाकाता गियन यामाकासा’ उत्सव हुआ। इसकी शुरुआत 1241 में मानी जाती है। मान्यता है कि महामारी के दौरान बौद्ध भिक्षु शूइची कोकुशी (एन्नी) ने पूरे शहर में पवित्र जल का छिड़काव किया, जिसके बाद बीमारी थम गई। उसी घटना की स्मृति में यह परंपरा शुरू हुई। यह उत्सव यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज है। इसे देखने के लिए करीब 10 लाख पर्यटक जुटे। उत्सव में दो तरह की झांकियां होती हैं। काजारीयामा करीब 10 मीटर ऊंचे, भव्य और सजावटी झांकी होती हैं, जिन्हें केवल प्रदर्शन के लिए रखा जाता है। वहीं काकियामा करीब 1 टन वजन की झांकी होती है, जिन्हें पुरुषों के समूह कंधों पर उठाकर शहर की सड़कों पर दौड़ते हैं। इन्हें बनाने में 55 लाख से 2 करोड़ रुपए तक खर्च होते हैं। इसके अलावा पारंपरिक पोशाक और अन्य व्यवस्थाओं पर भी लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। गर्मी की वजह से रास्ते में खड़े लोग धावकों पर ठंडा पानी डालते हैं। इससे शरीर ठंडा रहता है और धावकों का उत्साह भी बढ़ता है। दौड़ में हिस्सा लेने वाले पुरुष केवल पारंपरिक सूती जैकेट (मिजू-हैप्पी) और शिमेकोमी नामक विशेष लंगोट पहनते हैं। ऐसा इसलिए ताकि पानी पड़ने के बाद कपड़े भारी न हों और दौड़ने में आसानी रहे।
जापान में 780 साल पुराना पारंपरिक उत्सव:1 हजार किलो की झांकी उठाकर दौड़े युवा; 10 लाख पर्यटक जुटे

जापान के फुकुओका शहर में महामारियों से बचाव के लिए ‘हाकाता गियन यामाकासा’ उत्सव हुआ। इसकी शुरुआत 1241 में मानी जाती है। मान्यता है कि महामारी के दौरान बौद्ध भिक्षु शूइची कोकुशी (एन्नी) ने पूरे शहर में पवित्र जल का छिड़काव किया, जिसके बाद बीमारी थम गई। उसी घटना की स्मृति में यह परंपरा शुरू हुई। यह उत्सव यूनेस्को की सांस्कृतिक विरासत सूची में दर्ज है। इसे देखने के लिए करीब 10 लाख पर्यटक जुटे। उत्सव में दो तरह की झांकियां होती हैं। काजारीयामा करीब 10 मीटर ऊंचे, भव्य और सजावटी झांकी होती हैं, जिन्हें केवल प्रदर्शन के लिए रखा जाता है। वहीं काकियामा करीब 1 टन वजन की झांकी होती है, जिन्हें पुरुषों के समूह कंधों पर उठाकर शहर की सड़कों पर दौड़ते हैं। इन्हें बनाने में 55 लाख से 2 करोड़ रुपए तक खर्च होते हैं। इसके अलावा पारंपरिक पोशाक और अन्य व्यवस्थाओं पर भी लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। गर्मी की वजह से रास्ते में खड़े लोग धावकों पर ठंडा पानी डालते हैं। इससे शरीर ठंडा रहता है और धावकों का उत्साह भी बढ़ता है। दौड़ में हिस्सा लेने वाले पुरुष केवल पारंपरिक सूती जैकेट (मिजू-हैप्पी) और शिमेकोमी नामक विशेष लंगोट पहनते हैं। ऐसा इसलिए ताकि पानी पड़ने के बाद कपड़े भारी न हों और दौड़ने में आसानी रहे।
दावा- BLA ने पाकिस्तान के 45 सैनिकों को मारा:बलूचिस्तान में काफिले को बनाया निशाना, क्वेटा-कराची हाइवे से गुजर रहे थे

बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने दावा किया है कि उसने मस्तुंग जिले में पाकिस्तान सेना के एक काफिले पर हमला किया है। इस हमले में 45 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है, जबकि दर्जनों जवान घायल हुए हैं। यह घटना गुरुवार को क्वेटा-कराची हाइवे पर खदकुचा के पास हुई। पाकिस्तान सेना ने काफिले पर हमले की पुष्टि की है, लेकिन हताहत हुए जवानों की संख्या पर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी है। BLA प्रवक्ता जियांद बलूच ने बयान जारी कर बताया कि इस हमले में काफिले, सुरक्षा टीम और बाद में पहुंची सेना की टुकड़ियों को निशाना बनाया गया। BLA ने इस हमले को ‘फतेह स्क्वाड’ द्वारा अंजाम दिया गया एक सुनियोजित और जबरदस्त हमला बताया है।
दावा- BLA ने पाकिस्तान के 45 सैनिकों को मारा:बलूचिस्तान में काफिले को बनाया निशाना, बचाव में पहुंची टुकड़ी पर भी अटैक

बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने दावा किया है कि उसने मस्तुंग जिले में पाकिस्तान सेना के एक काफिले पर हमला किया है। इस हमले में 45 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने की खबर है, जबकि दर्जनों जवान घायल हुए हैं। यह घटना गुरुवार को क्वेटा-कराची हाइवे पर खदकुचा के पास हुई। पाकिस्तान सेना ने काफिले पर हमले की पुष्टि की है, लेकिन हताहत हुए जवानों की संख्या पर कोई आधिकारिक जानकारी नहीं दी है। BLA प्रवक्ता जियांद बलूच ने बयान जारी कर बताया कि इस हमले में काफिले, सुरक्षा टीम और बाद में पहुंची सेना की टुकड़ियों को निशाना बनाया गया। BLA ने इस हमले को ‘फतेह स्क्वाड’ द्वारा अंजाम दिया गया एक सुनियोजित और जबरदस्त हमला बताया है। बचाव के लिए पहुंचे सैनिकों पर भी हमला BLA का दावा है कि हमले में सैनिकों को ले जा रही बसों के काफिले को निशाना बनाया गया। इसके अलावा काफिले की सुरक्षा में तैनात सैनिकों और बाद में मौके पर पहुंची अतिरिक्त सैन्य टुकड़ी पर भी हमला किया गया। संगठन के मुताबिक, इसके बाद इलाके में काफी देर तक मुठभेड़ चली। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह हाल के वर्षों में बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना पर हुए सबसे घातक हमलों में से एक माना जाएगा। सीमित रास्तों का उठाता है BLA फायदा बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा, लेकिन सबसे कम आबादी वाला प्रांत है। यहां रेगिस्तान और पहाड़ों के बीच सेना की आवाजाही के लिए गिनी-चुनी मुख्य सड़कें ही हैं। ऐसे में सैनिकों के काफिलों को बार-बार उन्हीं रास्तों से गुजरना पड़ता है। इसका फायदा उठाकर उग्रवादी पहले से उनकी गतिविधियों पर नजर रखते हैं और ऐसे स्थान चुनते हैं, जहां घात लगाकर हमला करना आसान हो और सेना के लिए जवाबी कार्रवाई करना मुश्किल हो।
डीपसीक के सीईओ बने सबसे अमीर एआई स्टार्टअप फाउंडर:8वीं में कॉलेज मैथ्स सुलझाने वाले लियांग अब 3.47 लाख करोड़ के मालिक हैं

चीन की एआई कंपनी डीपसीक के संस्थापक और सीईओ लियांग वेनफेंग (41) दुनिया के सबसे अमीर एआई स्टार्टअप फाउंडर बन गए हैं। ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के अनुसार, कंपनी के नए फंडिंग राउंड के बाद उनकी नेटवर्थ करीब 3.47 लाख करोड़ रुपए पहुंच गई है, जो पहले 1.61 लाख करोड़ रुपए थी। इस बढ़ोतरी के साथ वे ओपनएआई के को-फाउंडर ग्रैग ब्रोकमैन और एंथ्रोपिक के फाउंडर व सीईओ डारियो अमोदेई से आगे निकल गए हैं। पढ़िए लियांग के जीवन से जुड़े किस्से… लगन- एआई मॉडल में इतना डूबे कि अधूरे घर में टेंट लगाकर रहने लगे थे लियांग हर मशीन को समझने की जिद लियांग बचपन से जिज्ञासु थे। स्कूल में जो भी कंप्यूटर या इलेक्ट्रॉनिक मशीन हाथ लगती, उसे खोलकर ठीक करने लगते। कई बार पुर्जे निकालने और उसे ठीक करने के चक्कर में घरवालों और शिक्षकों की डांट भी खाई, लेकिन आदत नहीं बदली। यही जिद आगे एआई चिप बनाने में उनके काम आई। स्कूल में बन गए मैथ जीनियस वे आठवीं में ही कॉलेज स्तर का गणित पढ़ने लगे। एक बार शिक्षक ने कॉलेज लेवल का सवाल देकर परखा, लेकिन लियांग ने कुछ मिनटों में उसका हल निकाल दिया। इसके बाद उन्हें स्कूल में ‘मैथ जीनियस’ कहा जाने लगा। इसमें माता-पिता का काफी रोल है। पेशे से शिक्षक लियांग के माता-पिता ने कभी बेटे के रिजल्ट या रैंक पर ज्यादा जोर नहीं दिया। वे बस यही पूछते ‘आज क्या नया सीखा?’ या ‘कौन-सी नई समस्या हल की?’ वे जवाब याद करने से ज्यादा सवालों के हल खोजते थे। चिप्स पर लगाया दांव 2019 में जब कंपनियां एआई को गंभीरता से नहीं ले रही थीं, तब लियांग ने एआई मॉडल बनाने के लिए 10 हजार चिप खरीदी। लोगों ने इसे मूर्ख व फिजूलखर्ची बताया। लियांग ने कहा, ‘एआई के दौर में चिप्स नहीं मिलेंगी।’ बाद में लोगों को यह बात समझ आई। एआई मॉडल में इतना डूबे कि अधूरे घर में टेंट लगाकर रहते थे इंजीनियरिंग में मास्टर्स लियांग काम को लेकर इतने जुनूनी थे कि नया घर खरीदने के बाद भी उसे पूरा नहीं कराया। उनका पूरा ध्यान कोड और एआई मॉडल बनाने पर था। रहने के लिए उन्होंने अधूरे मकान के अंदर ही एक टेंट लगा लिया और वहीं रातें बिताने लगे। कुछ साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। 2025 में डीपसीक की सफलता के बाद चीनी नववर्ष पर उनके गांव मिलिलिंग में स्वागत के पोस्टर लग गए। तब लियांग नहीं मिले तो लोग उनके दादा के साथ ही फोटो खिंचवाकर लौट जाते।
डीपसीक के सीईओ बने सबसे अमीर एआई स्टार्टअप फाउंडर:8वीं में कॉलेज मैथ्स सुलझाने वाले लियांग अब 3.47 लाख करोड़ के मालिक हैं

चीन की एआई कंपनी डीपसीक के संस्थापक और सीईओ लियांग वेनफेंग (41) दुनिया के सबसे अमीर एआई स्टार्टअप फाउंडर बन गए हैं। ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के अनुसार, कंपनी के नए फंडिंग राउंड के बाद उनकी नेटवर्थ करीब 3.47 लाख करोड़ रुपए पहुंच गई है, जो पहले 1.61 लाख करोड़ रुपए थी। इस बढ़ोतरी के साथ वे ओपनएआई के को-फाउंडर ग्रैग ब्रोकमैन और एंथ्रोपिक के फाउंडर व सीईओ डारियो अमोदेई से आगे निकल गए हैं। पढ़िए लियांग के जीवन से जुड़े किस्से… लगन- एआई मॉडल में इतना डूबे कि अधूरे घर में टेंट लगाकर रहने लगे थे लियांग हर मशीन को समझने की जिद लियांग बचपन से जिज्ञासु थे। स्कूल में जो भी कंप्यूटर या इलेक्ट्रॉनिक मशीन हाथ लगती, उसे खोलकर ठीक करने लगते। कई बार पुर्जे निकालने और उसे ठीक करने के चक्कर में घरवालों और शिक्षकों की डांट भी खाई, लेकिन आदत नहीं बदली। यही जिद आगे एआई चिप बनाने में उनके काम आई। स्कूल में बन गए मैथ जीनियस वे आठवीं में ही कॉलेज स्तर का गणित पढ़ने लगे। एक बार शिक्षक ने कॉलेज लेवल का सवाल देकर परखा, लेकिन लियांग ने कुछ मिनटों में उसका हल निकाल दिया। इसके बाद उन्हें स्कूल में ‘मैथ जीनियस’ कहा जाने लगा। इसमें माता-पिता का काफी रोल है। पेशे से शिक्षक लियांग के माता-पिता ने कभी बेटे के रिजल्ट या रैंक पर ज्यादा जोर नहीं दिया। वे बस यही पूछते ‘आज क्या नया सीखा?’ या ‘कौन-सी नई समस्या हल की?’ वे जवाब याद करने से ज्यादा सवालों के हल खोजते थे। चिप्स पर लगाया दांव 2019 में जब कंपनियां एआई को गंभीरता से नहीं ले रही थीं, तब लियांग ने एआई मॉडल बनाने के लिए 10 हजार चिप खरीदी। लोगों ने इसे मूर्ख व फिजूलखर्ची बताया। लियांग ने कहा, ‘एआई के दौर में चिप्स नहीं मिलेंगी।’ बाद में लोगों को यह बात समझ आई। एआई मॉडल में इतना डूबे कि अधूरे घर में टेंट लगाकर रहते थे इंजीनियरिंग में मास्टर्स लियांग काम को लेकर इतने जुनूनी थे कि नया घर खरीदने के बाद भी उसे पूरा नहीं कराया। उनका पूरा ध्यान कोड और एआई मॉडल बनाने पर था। रहने के लिए उन्होंने अधूरे मकान के अंदर ही एक टेंट लगा लिया और वहीं रातें बिताने लगे। कुछ साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। 2025 में डीपसीक की सफलता के बाद चीनी नववर्ष पर उनके गांव मिलिलिंग में स्वागत के पोस्टर लग गए। तब लियांग नहीं मिले तो लोग उनके दादा के साथ ही फोटो खिंचवाकर लौट जाते।
वर्ल्ड अपडेट्स:जापान के पूर्व मंत्री बोले- भारत के रवैये से बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट लेट हुआ; वादे नहीं निभाए, बार-बार फैसला बदला

भारत-जापान के बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर जापान के पूर्व मंत्री हिदेकी माकिहारा ने भारतीय पक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। X पर की गई पोस्ट में उन्होंने लिखा कि प्रोजेक्ट के लेट होने की सबसे बड़ी वजह भारत का रवैया रहा। माकिहारा ने कहा कि वे खुद इस प्रोजेक्ट से जुड़े रहे हैं। उनके मुताबिक, भारतीय पक्ष ने कई बार किए वादे पूरे नहीं किए। समझौते किए, फिर उनसे पीछे हट गया। आखिरी समय तक अपने हिसाब से शर्तें बदलता रहा। उन्होंने यह भी लिखा कि इसी वजह से बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया। माकिहारा के मुताबिक, जापानी टीम ने पूरी मेहनत से काम किया, लेकिन उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं मिले। पूर्व मंत्री ने अपनी पोस्ट में टॉयो केइजाई ऑनलाइन की एक रिपोर्ट भी शेयर की। इसमें दावा किया गया है कि बुलेट ट्रेन के सबसे अहम सेफ्टी सिस्टम (सिग्नलिंग सिस्टम) में जापान को शामिल नहीं किया गया। हालांकि, ये आरोप हिदेकी माकिहारा की X पोस्ट और उनके साझा किए गए लेख पर आधारित हैं। भारत सरकार या मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों की ओर से फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
वर्ल्ड अपडेट्स:जापान के पूर्व मंत्री बोले- भारत के रवैये से बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट लेट हुआ; वादे नहीं निभाए, बार-बार फैसला बदला

भारत-जापान के बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लेकर जापान के पूर्व मंत्री हिदेकी माकिहारा ने भारतीय पक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। X पर की गई पोस्ट में उन्होंने लिखा कि प्रोजेक्ट के लेट होने की सबसे बड़ी वजह भारत का रवैया रहा। माकिहारा ने कहा कि वे खुद इस प्रोजेक्ट से जुड़े रहे हैं। उनके मुताबिक, भारतीय पक्ष ने कई बार किए वादे पूरे नहीं किए। समझौते किए, फिर उनसे पीछे हट गया। आखिरी समय तक अपने हिसाब से शर्तें बदलता रहा। उन्होंने यह भी लिखा कि इसी वजह से बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट आगे नहीं बढ़ पाया। माकिहारा के मुताबिक, जापानी टीम ने पूरी मेहनत से काम किया, लेकिन उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं मिले। पूर्व मंत्री ने अपनी पोस्ट में टॉयो केइजाई ऑनलाइन की एक रिपोर्ट भी शेयर की। इसमें दावा किया गया है कि बुलेट ट्रेन के सबसे अहम सेफ्टी सिस्टम (सिग्नलिंग सिस्टम) में जापान को शामिल नहीं किया गया। हालांकि, ये आरोप हिदेकी माकिहारा की X पोस्ट और उनके साझा किए गए लेख पर आधारित हैं। भारत सरकार या मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों की ओर से फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। अंतरराष्ट्रीय मामलों से जुड़ी अन्य बड़ी खबरें… युगांडा में स्कूल बस हादसा, 20 बच्चों समेत 21 की मौत; एजुकेशनल टूर से लौट रहे थे छात्र पूर्वी अफ्रीकी देश युगांडा में एक स्कूल बस हादसे में 20 बच्चों समेत एक शख्स की मौत हो गई। AP के मुताबिक, यह हादसा गुरुवार रात पूर्वी युगांडा के कपचोरवा जिले में हुआ। पुलिस के मुताबिक, सभी छात्र एजुकेशनल टूर के तहत सिपी फॉल्स घूमकर लौट रहे थे। शुरुआती जांच में सामने आया है कि चालक ने बस से नियंत्रण खो दिया। इसके बाद बस सड़क से उतरकर एक चट्टान से टकराई और पलट गई। हादसे में कई बच्चों समेत 3 लोग घायल भी हुए हैं। घायलों को पास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। पुलिस ने फिलहाल घायलों की सटीक संख्या नहीं बताई है।







