Thursday, 24 Sep 2026 | 07:37 PM

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खुद की एयरलाइंस शुरू कर सकता है अडाणी ग्रुप:नागरिक उड्डयन मंत्रालय नियमों में ढील दे सकता है; अभी एयरपोर्ट ऑपरेशन संभालता है

खुद की एयरलाइंस शुरू कर सकता है अडाणी ग्रुप:नागरिक उड्डयन मंत्रालय नियमों में ढील दे सकता है; अभी एयरपोर्ट ऑपरेशन संभालता है

अडाणी ग्रुप भारत के एविएशन सेक्टर में अपनी उपस्थिति को और मजबूत करने के लिए खुद की एयरलाइन शुरू करने की योजना बना रहा है। इसके लिए ग्रुप ने सरकार से एक अनुकूल नीतिगत माहौल बनाने और मौजूदा पाबंदियों को हटाने की मांग की है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय (MoCA) ने अडाणी ग्रुप के इस प्रस्ताव के बाद एयरलाइन और एयरपोर्ट बिजनेस के बीच क्रॉस-ओनरशिप के नियमों को आसान बनाने पर आंतरिक चर्चा और कानूनी सलाह शुरू कर दी है। सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं कि अडाणी ग्रुप का यह प्लान क्या है? सवाल 1. अडाणी ग्रुप की नई योजना क्या है? जवाब: अडाणी ग्रुप भारत में अपनी खुद की एयरलाइन शुरू करने पर विचार कर रहा है। अब तक अडाणी ग्रुप एयरपोर्ट्स और उससे जुड़ी सेवाओं तक ही सीमित था और एयरलाइन बिजनेस से दूर रहता था, लेकिन अब उसने अपनी इस रणनीति में बड़ा बदलाव करने का फैसला किया है। अडाणी ग्रुप का एविएशन इकोसिस्टम सवाल 2. सरकार को इस नीति में बदलाव करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? जवाब: वर्तमान में भारतीय घरेलू एविएशन मार्केट में इंडिगो और एआर इंडिया ग्रुप का दबदबा है। ये दोनों कंपनियां मिलकर करीब 90% मार्केट शेयर को कंट्रोल करती हैं। सरकार इस मार्केट में कॉम्पिटिशन बढ़ाना चाहती है, ताकि यात्रियों को बेहतर सेवाएं और विकल्प मिल सकें। इसीलिए एयरपोर्ट ऑपरेटरों को भी एयरलाइन चलाने की अनुमति देने पर विचार किया जा रहा है। सवाल 3. मौजूदा नियम क्या हैं और अडाणी ग्रुप क्या बदलाव चाहता है? जवाब: दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट्स के मौजूदा नियमों के अनुसार, एयरपोर्ट ऑपरेटर किसी भी शेड्यूल्ड एयरलाइन में 10% से ज्यादा हिस्सेदारी नहीं रख सकते। अडाणी ग्रुप चाहता है कि इस 10% स्टेक वाली शर्त को पूरी तरह हटा दिया जाए। ग्रुप किसी एयरलाइन में माइनॉरिटी हिस्सेदार बनने के बजाय अपनी पूरी मालिकाना हक वाली एयरलाइन चलाना चाहता है। सवाल 4. यदि नियम बदलते हैं तो क्या एयरलाइंस भी एयरपोर्ट्स में हिस्सेदारी ले सकेंगी? जवाब: हां, अगर नागरिक उड्डयन मंत्रालय क्रॉस-ओनरशिप नियमों में ढील देता है, तो इससे दोतरफा रास्ता खुलेगा। जहां एक तरफ एयरपोर्ट चलाने वाली कंपनियां एयरलाइंस शुरू कर सकेंगी, वहीं दूसरी तरफ एयरलाइंस कंपनियां भी एयरपोर्ट्स में हिस्सेदारी खरीद सकेंगी। सवाल 5. पहले अडाणी ग्रुप एयरलाइन बिजनेस से दूर रहने की बात कर रहा था, अब यू-टर्न क्यों? जवाब: दिसंबर में नवी मुंबई एयरपोर्ट के लॉन्च से पहले जीत अडाणी ने कहा था कि एयरलाइन बिजनेस उनके हाई-मार्जिन एसेट मॉडल में फिट नहीं बैठता। लेकिन दो वजहों से यह सोच बदली है: सवाल 6. अडाणी ग्रुप का एविएशन सेक्टर में पहले से कितना दबदबा है? जवाब: अडाणी ग्रुप पहले से ही मुंबई समेत देश के 8 प्रमुख एयरपोर्ट्स का संचालन कर रहा है। इसके अलावा ग्राउंड हैंडलिंग, मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहाल (MRO) और पायलट ट्रेनिंग जैसे एविएशन सेगमेंट में भी अडाणी ग्रुप की मजबूत मौजूदगी है। सवाल 7. इस कदम का मौजूदा एयरलाइंस और इंडस्ट्री पर क्या असर पड़ेगा? जवाब: अगर अडाणी ग्रुप एयरलाइन शुरू करता है, तो हितों के टकराव का मुद्दा उठ सकता है। मौजूदा एयरलाइंस इसका विरोध कर सकती हैं। उन्हें डर हो सकता है कि अडाणी अपने एयरपोर्ट्स पर अपनी ही एयरलाइन को अच्छे फ्लाइट स्लॉट्स और पार्किंग में प्राथमिकता दे सकते हैं। सवाल 8. एक्सपर्ट्स का इस मामले पर क्या कहना है? जवाब: एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर सरकार एयरपोर्ट ऑपरेटरों को एयरलाइन चलाने की इजाजत देती है, तो कड़े नियम बनाने होंगे ताकि एयरपोर्ट और एयरलाइन का ऑपरेशन पूरी तरह से स्वतंत्र रहे। साथ ही, ग्लोबल सप्लाई चेन की समस्याओं और विमानों की डिलीवरी में देरी के कारण एक नई एयरलाइन को मार्केट में पूरी तरह जमने में कई सालों का समय लग सकता है। नॉलेज बॉक्स: क्या है ‘क्रॉस-ओनरशिप’ नियम? यह नियम एयरपोर्ट ऑपरेटर को किसी एयरलाइन में 10% से ज्यादा शेयर रखने से रोकता है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि एयरपोर्ट मालिक किसी खास एयरलाइन को फायदा न पहुंचाए और सभी एयरलाइंस को बराबर मौके मिलें।

खुद की एयरलाइंस शुरू कर सकता है अडाणी ग्रुप:नागरिक उड्डयन मंत्रालय नियमों में ढील दे सकता है; अभी एयरपोर्ट ऑपरेशन संभालता है

खुद की एयरलाइंस शुरू कर सकता है अडाणी ग्रुप:नागरिक उड्डयन मंत्रालय नियमों में ढील दे सकता है; अभी एयरपोर्ट ऑपरेशन संभालता है

अडाणी ग्रुप भारत के एविएशन सेक्टर में अपनी उपस्थिति को और मजबूत करने के लिए खुद की एयरलाइन शुरू करने की योजना बना रहा है। इसके लिए ग्रुप ने सरकार से एक अनुकूल नीतिगत माहौल बनाने और मौजूदा पाबंदियों को हटाने की मांग की है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने अडाणी ग्रुप के इस प्रस्ताव के बाद एयरलाइन और एयरपोर्ट बिजनेस के बीच क्रॉस-ओनरशिप के नियमों को आसान बनाने पर चर्चा और कानूनी सलाह शुरू कर दी है। सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं कि अडाणी ग्रुप का यह प्लान क्या है? सवाल 1. अडाणी ग्रुप की नई योजना क्या है? जवाब: अडाणी ग्रुप अपनी खुद की एयरलाइन शुरू करने पर विचार कर रहा है। अब तक यह ग्रुप एयरपोर्ट्स और उससे जुड़ी सेवाओं तक ही सीमित था और एयरलाइन बिजनेस से दूर रहता था, लेकिन अब उसने अपनी इस रणनीति में बड़ा बदलाव करने का फैसला किया है। अडाणी ग्रुप का एविएशन इकोसिस्टम सवाल 2. सरकार को इस नीति में बदलाव करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? जवाब: वर्तमान में भारतीय घरेलू एविएशन मार्केट में इंडिगो और एअर इंडिया का दबदबा है। दोनों कंपनियां मिलकर करीब 90% मार्केट शेयर कंट्रोल करती हैं। सरकार इस मार्केट में कॉम्पिटिशन बढ़ाना चाहती है, ताकि यात्रियों को बेहतर सेवाएं और विकल्प मिल सकें। इसीलिए एयरपोर्ट ऑपरेटरों को भी एयरलाइन चलाने की अनुमति देने पर विचार किया जा रहा है। सवाल 3. मौजूदा नियम क्या हैं और अडाणी ग्रुप क्या बदलाव चाहता है? जवाब: दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट्स के मौजूदा नियमों के अनुसार, एयरपोर्ट ऑपरेटर किसी भी शेड्यूल्ड एयरलाइन में 10% से ज्यादा हिस्सेदारी नहीं रख सकते। अडाणी ग्रुप चाहता है कि इस 10% स्टेक वाली शर्त को पूरी तरह हटा दिया जाए। ग्रुप किसी एयरलाइन में माइनॉरिटी हिस्सेदार बनने के बजाय अपनी पूरी मालिकाना हक वाली एयरलाइन चलाना चाहता है। सवाल 4. यदि नियम बदलते हैं तो क्या एयरलाइंस भी एयरपोर्ट्स में हिस्सेदारी ले सकेंगी? जवाब: हां, अगर नागरिक उड्डयन मंत्रालय क्रॉस-ओनरशिप नियमों में ढील देता है, तो इससे दोतरफा रास्ता खुलेगा। जहां एक तरफ एयरपोर्ट चलाने वाली कंपनियां एयरलाइंस शुरू कर सकेंगी, वहीं दूसरी तरफ एयरलाइंस कंपनियां भी एयरपोर्ट्स में हिस्सेदारी खरीद सकेंगी। सवाल 5. पहले अडाणी ग्रुप एयरलाइन बिजनेस से दूर रहने की बात कर रहा था, अब यू-टर्न क्यों? जवाब: नवी मुंबई एयरपोर्ट लॉन्च से पहले जीत अडाणी ने कहा था कि एयरलाइन बिजनेस उनके हाई-मार्जिन एसेट मॉडल में फिट नहीं बैठता। लेकिन दो वजहों से यह सोच बदली है: सवाल 6. अडाणी ग्रुप का एविएशन सेक्टर में पहले से कितना दबदबा है? जवाब: अडाणी ग्रुप पहले से ही मुंबई समेत देश के 8 प्रमुख एयरपोर्ट्स का संचालन कर रहा है। इसके अलावा ग्राउंड हैंडलिंग, मेंटेनेंस, रिपेयर एंड ओवरहाल (MRO) और पायलट ट्रेनिंग जैसे एविएशन सेगमेंट में भी अडाणी ग्रुप की मजबूत मौजूदगी है। सवाल 7. इस कदम का मौजूदा एयरलाइंस और इंडस्ट्री पर क्या असर पड़ेगा? जवाब: अगर अडाणी ग्रुप एयरलाइन शुरू करता है, तो हितों के टकराव का मुद्दा उठ सकता है। मौजूदा एयरलाइंस इसका विरोध कर सकती हैं। उन्हें डर हो सकता है कि अडाणी अपने एयरपोर्ट्स पर अपनी एयरलाइन को अच्छे फ्लाइट स्लॉट्स और पार्किंग में प्राथमिकता दे सकता हैं। सवाल 8. एक्सपर्ट्स का इस मामले पर क्या कहना है? जवाब: एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर सरकार एयरपोर्ट ऑपरेटरों को एयरलाइन चलाने की इजाजत देती है, तो कड़े नियम बनाने होंगे ताकि एयरपोर्ट और एयरलाइन का ऑपरेशन स्वतंत्र रहे। साथ ही, ग्लोबल सप्लाई चेन की समस्याओं और विमानों की डिलीवरी में देरी के कारण एक नई एयरलाइन को मार्केट में पूरी तरह जमने में कई सालों का समय लग सकता है। नॉलेज बॉक्स: क्या है ‘क्रॉस-ओनरशिप’ नियम? यह नियम एयरपोर्ट ऑपरेटर को किसी एयरलाइन में 10% से ज्यादा शेयर रखने से रोकता है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना होता है कि एयरपोर्ट मालिक किसी खास एयरलाइन को फायदा न पहुंचाए और सभी एयरलाइंस को बराबर मौके मिलें।

मूवी रिव्यू: उत्तर दा पुत्तर:वास्तु के बहाने बड़ा तंज कसती है फिल्म, क्या किस्मत सच में दिशाओं से बदलती है?

मूवी रिव्यू: उत्तर दा पुत्तर:वास्तु के बहाने बड़ा तंज कसती है फिल्म, क्या किस्मत सच में दिशाओं से बदलती है?

वास्तु, किस्मत और अंधविश्वास जैसे विषयों पर कई बार बहस होती है, लेकिन फिल्मों में इसे हल्के फुल्के और मनोरंजक अंदाज में कम ही दिखाया जाता है। ‘उत्तर दा पुत्तर’ इसी कोशिश के साथ आती है। फिल्म हंसाती है, व्यंग्य करती है और आखिर में एक ऐसा सवाल छोड़ जाती है, जो शायद थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी आपके साथ चलता है। हालांकि कुछ कमियां इसे और बेहतर बनने से रोकती हैं। इस फिल्म की लेंथ 1 घंटा 43 मिनट है। इस फिल्म को दैनिक भास्कर ने 5 में से 3 स्टार रेटिंग दी है। फिल्म की कहानी कैसी है? फिल्म की कहानी फिजिक्स के प्रोफेसर साईं राम टुटेजा (अन्नू कपूर) की है। विज्ञान पढ़ाने वाले टुटेजा खुद वास्तु पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। उनकी जिद है कि वह तभी अपना घर बनाएंगे, जब उसे उत्तर दिशा की ओर फेस करने वाली परफेक्ट जमीन मिले। इसी वजह से सालों तक किराए के घर में रहते हैं। जब आखिरकार उन्हें मनचाही जमीन मिलती है और सपनों का घर बनाने का सफर शुरू होता है, तब किस्मत उनके सामने एक के बाद एक मुश्किलें खड़ी कर देती है। इंटरवल के बाद कहानी दिलचस्प मोड़ लेती है, जब टुटेजा समझते हैं कि जिंदगी सिर्फ दिशा नहीं, बल्कि अपने फैसलों और मेहनत से बदलती है। इस सफर में उनका छात्र ज्ञान चंद उर्फ जीसी (सुमित गुलाटी) उनका सबसे बड़ा सहारा बनता है। फिल्म कॉमेडी और व्यंग्य के जरिए वास्तु और अंधविश्वास पर सवाल भी उठाती है। कई जगह इसकी झलक ‘खोसला का घोंसला’ की याद दिलाती है। स्टारकास्ट की एक्टिंग कैसी है? अन्नू कपूर पूरी फिल्म की जान हैं। साईं राम टुटेजा के किरदार में उनका अभिनय इतना सहज है कि कई बार लगता है जैसे यह किरदार उन्हीं के लिए लिखा गया हो। कॉमेडी, इमोशन और टाइमिंग, हर जगह वह फिल्म को अपने कंधों पर संभाल लेते हैं। सुमित गुलाटी (ज्ञान चंद उर्फ जीसी) दूसरे हिस्से में कहानी का मजबूत आधार बनते हैं और अपने किरदार में ईमानदार नजर आते हैं। रुखसार रहमान (गिन्नी) सधी हुई एक्टिंग करती हैं। राजेंद्र सेठी (आनंद राज आनंद) कम स्क्रीन टाइम में भी असर छोड़ते हैं। बृजेंद्र काला, पवन मल्होत्रा, इश्तियाक खान और नितिन अरोड़ा जैसे कलाकार अपनी मौजूदगी से फिल्म को और मनोरंजक बनाते हैं। डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष डायरेक्टर रविंदर सिवाच ने एक अच्छे आइडिया को मनोरंजक तरीके से पेश किया है। फिल्म का मैसेज साफ है और वह बिना भाषण दिए अपनी बात कह जाती है। हालांकि कुछ सीन जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं और एडिटिंग थोड़ी टाइट होती तो फिल्म का असर और बढ़ सकता था। कास्टिंग में भी एक बात खटकती है। नासिर अब्दुल्ला, जो गिन्नी के पिता बने हैं, पर्दे पर अन्नू कपूर से उम्र में छोटे नजर आते हैं। ऐसे में उनका अन्नू कपूर के ससुर वाला किरदार पूरी तरह विश्वसनीय नहीं लगता। कैमरा वर्क और बाकी टेक्निकल पहलू कहानी के हिसाब से ठीक हैं। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? फिल्म का म्यूजिक कहानी के साथ चलता है। गाने सीन के हिसाब से अच्छे लगते हैं, लेकिन थिएटर से बाहर निकलने के बाद बहुत ज्यादा याद नहीं रहते। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के मूड को सपोर्ट करता है। फाइनल वर्डिक्ट: देखें या नहीं? ‘उत्तर दा पुत्तर’ कोई बड़ी या भव्य फिल्म नहीं है, लेकिन एक अच्छे विषय को ईमानदारी और हल्के फुल्के अंदाज में पेश करती है। अन्नू कपूर का शानदार अभिनय, बाकी कलाकारों का साथ और व्यंग्य से भरी कहानी इसे एक बार देखने लायक बनाती है। अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जो हंसाने के साथ सोचने पर भी मजबूर करें, तो ‘उत्तर दा पुत्तर’ आपको निराश नहीं करेगी। हालांकि थोड़ी टाइट एडिटिंग और कुछ बेहतर कास्टिंग फैसले इसे और मजबूत बना सकते थे।

पंजाबी युवती की कनाडा में हत्या:लिव-इन पार्टनर ने गला घोंटा, लुधियाना की रहने वाली; 5 साल पहले कर्ज लेकर विदेश गई थी

पंजाबी युवती की कनाडा में हत्या:लिव-इन पार्टनर ने गला घोंटा, लुधियाना की रहने वाली; 5 साल पहले कर्ज लेकर विदेश गई थी

कनाडा के एडमिंटन शहर में पंजाबी युवती की लिव-इन पार्टनर ने हत्या कर दी। झगड़े के दौरान लिव-इन पार्टनर ने उसका गला घोंटा। कॉल के बाद मौके पर पहुंची पुलिस उसे अस्पताल लेकर गई। यहां उसकी मौत हो गई। पुलिस ने आरोपी लिव-इन पार्टनर को गिरफ्तार कर लिया है। मृतका की पहचान दमनप्रीत कौर (23) के तौर पर हुई है। वह लुधियाना के समराला की रहने वाली थी। वहीं आरोपी रितेश (22) दिल्ली का रहने वाला है। उस पर सेकेंड डिग्री मर्डर के जार्ज लगाए गए हैं। परिवार ने 5 साल पहले कर्ज लेकर दमनप्रीत को कनाडा भेजा था। अब सिलसिलेवार पूरा मामला पढ़िए… पढ़ाई के दौरान युवक से हुई मुलाकात दमनप्रीत कौर करीब 5 साल पहले स्टडी वीजा पर कनाडा गई थी। वहीं पढ़ाई के दौरान उसकी मुलाकात रितेश से हुई। दोनों के बीच दोस्ती हुई और बाद में वे लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे। हालांकि, दोनों कब से साथ रह रहे थे, इसकी जानकारी फिलहाल सामने नहीं आई है। 3 दिन इलाज के बाद अस्पताल में तोड़ा था दम 9 जुलाई की शाम 6 बजकर 44 मिनट पर एडमिंटन पुलिस को दक्षिण-पूर्वी शहर के सिल्वरबेरी इलाके में स्थित एक मकान से इमरजेंसी फोन आया। जब पुलिस और पैरामेडिकल टीम वहां पहुंची तो उन्हें दमनप्रीत बेहोशी की हालत में मिली पुलिस ने दमनप्रीत को तुरंत स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया, जहां 12 जुलाई को उसने अंतिम सांस ली। 14 जुलाई को मेडिकल एग्जामिनर द्वारा की गई पोस्टमॉर्टम जांच में यह साफ हो गया कि दमनप्रीत की मौत प्राकृतिक नहीं बल्कि गला घोंटने के कारण हुई थी। 22 जुलाई को आरोपी को अरेस्ट कर चार्ज लगाए एडमिंटर पुलिस सर्विस की होमिसाइड यूनिट ने 22 जुलाई को आरोपी रितेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस का कहना है कि यह मामला घरेलू हिंसा या पार्टनर हिंसा (इंटिमेट पार्टनर होमीसाइड) का है। पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि वे इस मामले में किसी अन्य संदिग्ध की तलाश नहीं कर रहे हैं। कोर्ट की आगामी सुनवाइयों में आरोपी के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। पुलिस ने आरोपी की गिरफ्तारी की जानकारी 23 जुलाई को साझा की। दोनों के बीच विवाद किस बात को लेकर हुआ, इसका खुलासा अभी तक नहीं हो पाया है। डेडबॉडी पंजाब लाई जाएगी दमनप्रीत कौर एडमिंटन में रहती थी। वह पढ़ाई के बाद अब नौकरी कर रही थी। कनाडाई मीडिया के अनुसार, दमनप्रीत के शव को भारत में उनके परिवार के पास भेजने और अंतिम संस्कार के कागजी कार्यों का खर्च उठाने के लिए एक गो-फंड-मी अभियान भी शुरू किया गया है। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। शव कब भारत पहुंचेगा, अभी इसकी कोई तारीख तय नहीं है। बताया जा रहा है कि रितेश भी पढ़ाई के बाद यहां जॉब कर रहा था। वहीं, अब तक भारत सरकार या भारतीय दूतावास की ओर से परिवार को किसी तरह की सहायता नहीं मिली है। ————– ये खबर भी पढ़ें… कनाडा में पंजाबी युवक की गोलियां मारकर हत्या, ऑफिस में घुसकर फायरिंग की कनाडा में ऑफिस में काम कर रहे पंजाबी युवक की गोलियां मारकर हत्या कर दी गई। हमलावर सरे के 76 एवेन्यू बिल्डिंग की दूसरी मंजिल में घुसे और लॉबी से निकल रहे युवक पर फायरिंग कर दी। फायरिंग के कारण आसपास बैठे लोग घबरा गए और उन्होंने तुरंत पुलिस को फोन किया। (पढ़ें पूरी खबर)

ईरान पर सबसे बड़े हमले की तैयारी में अमेरिका:ट्रम्प बोले- फैसला लेना बाकी; ईरान ने कहा- इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी

ईरान पर सबसे बड़े हमले की तैयारी में अमेरिका:ट्रम्प बोले- फैसला लेना बाकी; ईरान ने कहा- इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि अमेरिका ईरान पर सबसे बड़ा हमला करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा, “तैयारी पूरी है, अब सिर्फ फैसला लेना बाकी है।” ट्रम्प का यह भी कहना है कि ईरान ने अभी तक “पर्याप्त दर्द नहीं झेला है।” ट्रम्प के बयान के बाद ईरान ने भी तुरंत जवाब दिया। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि अगर अमेरिका ने हमले जारी रखे तो उसे इसकी “और भारी कीमत” चुकानी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि युद्ध खत्म करने का रास्ता बातचीत है, नए हमले नहीं। इधर, ब्रिटेन ने भी अपनी सेना को अलर्ट पर रखा है। ब्रिटिश सरकार का कहना है कि जरूरत पड़ने पर उसकी सेना देश की सुरक्षा के लिए तैयार है। इससे पहले ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) ने चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका ने ब्रिटेन के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल किया तो उन्हें भी निशाना बनाया जा सकता है। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. सऊदी के दो जहाजों पर हमला: यमन के हूती विद्रोहियों ने रेड सी में सऊदी अरब के दो तेल टैंकर एन्सेलिया और लैला पर बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और ड्रोन से हमला किया। संगठन का कहना है कि दोनों जहाजों में आग लग गई। 2. हूती विद्रोहियों के डर से 10 जहाजों ने रास्ता बदला: बाब अल-मंदेब स्ट्रेट पार करने की कोशिश कर रहे कम से कम 10 जहाजों को अपना रास्ता बदलना पड़ा है। अब ये जहाज अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा सफर तय कर रहे हैं। 3. ब्रिटेन ने अमेरिका को सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की मंजूरी दी: ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने ईरान के खिलाफ अमेरिका को ब्रिटिश सैन्य अड्डों के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है। हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया और ग्लॉस्टरशायर का फेयरफोर्ड एयरबेस अमेरिकी विमानों के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध रहेंगे। 4. भारत की अब तक 26,000 उड़ानें रद्द: अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण 20 जुलाई तक भारतीय एयरलाइंस को करीब 26 हजार अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। इसके अलावा कई उड़ानों का रास्ता बदला गया और उनमें देरी भी हुई। 5. ट्रम्प का 95 अरब डॉलर का रक्षा बजट पास: ट्रम्प को ईरान युद्ध के बीच बड़ी राजनीतिक जीत मिली है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 95 अरब डॉलर का रक्षा बजट प्रस्ताव 216-214 वोटों से मंजूर कर दिया।अब इसे मंजूरी के लिए सीनेट में जाएगा। इससे ईरान युद्ध और अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरतों के लिए अतिरिक्त फंड मिलेगा। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

सिनेमा में कई हीरो आए, कई सुपरस्टार बने, लेकिन एक अभिनेता ऐसा भी था जिसने पर्दे पर उपकार, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों के जरिए देशभक्ति को जिया। उनका नाम था मनोज कुमार। देशप्रम ही वो वजह था कि लोग उनका असली नाम भूलने लगे और उन्हें सिर्फ एक नाम से पुकारने लगे ‘भारत कुमार’। उनकी फिल्मों में दिखने वाला जज्बा, जुनून और दर्द सिर्फ अभिनय नहीं था। उन्होंने खुद 10 साल की उम्र में भारत-पाक के बंटवारे से उठी चीखें सुनी और कई जाने जाते देखीं। बीमार मां को दर्द से कराहते देखा और छोटे भाई को दम तोड़ते भी। सिर पर छत नहीं थी, भविष्य का कोई भरोसा नहीं था और उम्मीद भी टूटने लगी, लेकिन किसे पता था कि पाकिस्तान से भागा वो बच्चा, देशभक्ति की ऐसी मिसाल बनेगा कि हर कोई उन्हें असल नाम से ज्यादा भारत कुमार के नाम से पहचानेगा। आज मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार की बर्थ एनिवर्सरी है। अप्रैल 2025 में उनका निधन हो गया है, लेकिन अगर आज वो होते तो 88 साल के हो जाते। उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए, विभाजन के दर्द से निकलकर देश का हीरो बनने की कहानी- किस्सा- 1 दंगों में भाई की मौत हुई, यमुना में शव बहाया; इलाज न करने वाले डॉक्टर्स को लाठी से पीटा 24 जुलाई 1937 ब्रिटिश इंडिया के अबोटाबाद के पंजाबी हिंदू परिवार में हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी का जन्म हुआ, जो बाद में मनोज कुमार नाम से जाने गए। वो हिस्सा जहां उनका जन्म हुआ वो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा में आता है। मनोज कुमार महज 10 साल के थे, जब अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद बंटवारा शुरू हुआ। दंगे भड़के और जान बचाते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली के हडसन लाइन रिफ्यूजी कैंप में आकर रहने लगा। छोटा भाई कुक्कू महज 2 माह का था। पैदाइश से ही उसकी तबीयत खराब रहती थी और मां भी बीमार चल रही थी। दंगों के बीच डॉक्टर्स भी जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे, तभी भाई की सही इलाज न मिल पाने से मौत हो गई। बचपन का वो दर्द याद कर मनोज कुमार ने संसद टीवी के शो गुफ्तगू में कहा- वो रोता हुआ बचपन, जो लाहौर से बिछड़ गया, जो अबोटाबाद से बिछड़ गया। बहुत रोता हुआ बचपन था वो, आज भी सोचता हूं तो आंखे भले ही संभाल लूं, लेकिन दिल रोता है। दिल का रोना बहुत भयानक होता है। सबसे बड़ा मैं, मुझसे छोटी बहन ललिता। जब बंटवारा हुआ तो मां ने छोटे भाई को जन्म दिया। कुक्कू नाम था उसका, बीमार, मां भी बीमार। हम रिफ्यूजी कैंप में थे। मां को दिल्ली के तीस हजारी अस्पताल में रखा गया। जब सायरन बजता था, तो डॉक्टर-नर्स अंडरग्राउंड चले जाते थे। मां मेरी तड़प रही थी, भाई तड़प रहा था। मां चीख रही थी कि डॉक्टर को बुलाओ। वो सब अंडरग्राउंड थे। मां चीख मारी, मेरा भाई कुक्कू चला गया था। मैं गुस्से में था। मैं लाठी लेकर अंडरग्राउंड गया। डॉक्टर्स को भी मारा, नर्स को भी मारा। पिता जी आए, उन्होंने संभाला। दूसरे दिन उस 2 महीने के बच्चे को जमुना जी में बहा दिया, जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, वैसे-वैसे लगता था कि मैं डूब रहा हूं। फिर पिता जी ने रात को अपने सिर पर हाथ रखकर कसम खिलवाई कि जिंदगी में दंगा, मारपीट नहीं करना। आखिर में मनोज कुमार ने रुंहासी आवाज में कहा, जिसका बचपन मर गया, समझो वो आदमी ही मर गया। भाई की मौत के बाद भी मनोज कुमार, 2 महीने तक रिफ्यूजी कैंप में ही रहे और हालात बेहतर होने के बाद परिवार दिल्ली में ही बस गया। पिता स्टील की फैक्ट्री में काम करते थे, लेकिन साथ ही वो शायर थे। जब मनोज कुमार के पिता 5वीं में थे, तो लामा इकबाल ने उनकी नजम सुनकर उन्हें खिज्र का तकाजा दिया था। जब उनका कलाम छपा, तो महाराष्ट्र उर्दू एकेडमी से उन्हें सिमरन अवॉर्ड मिला। किस्सा- 2 दिलीप कुमार को फिल्मों में मरता देख मान लिया फरिश्ता, सोचा- मैं भी फरिश्ता बनूंगा दिल्ली में ही मनोज कुमार की पढ़ाई हुई। वह कम उम्र के थे, जब मामा उन्हें अक्सर फिल्में दिखाने ले जाते थे। तब दिलीप कुमार स्टार बन चुके थे, जिनकी फिल्में अक्सर सिनेमाघरों में लगती थीं। मनोज कुमार ने सबसे पहले दिलीप कुमार की 1947 में आई फिल्म जुगनू देखी, जिसमें उनके किरदार की मौत हो जाती है। तब तक मनोज कुमार नहीं जानते थे कि सिनेमा क्या होता है। कुछ समय बाद उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म शहीद (1948) देखी। उसमें भी दिलीप कुमार को मरता हुआ दिखाया गया। मनोज कुमार फिल्म देखकर घर लौटे, तो देर तक सोए ही नहीं। मन में बस एक ही ख्याल था कि जब वो शख्स एक साल पहले (फिल्म जुगनू में) मर चुके हैं, तो दोबारा (फिल्म शहीद में) कैसे मर सकते हैं। मां ने उन्हें जागते देखा, तो पूछ लिया- सोते क्यों नहीं हो? मनोज कुमार ने मासूम आवाज में कहा- बीजी (जैसा वो मां को पुकारते थे), आदमी कितनी बार मरता है? मां ने जवाब दिया- एक बार। मनोज कुमार ने फिर कहा- और जो 2-3 बार मरे? मां ने कहा- वो तो फरिश्ता ही होगा। उस दिन मनोज कुमार ने ठान लिया कि मैं भी बड़ा होकर फरिश्ता ही बनूंगा। किस्सा- 3 कजन का खत मिलने पर बॉम्बे पहुंचे, सेट पर सामान ढोने का काम मिला बढ़ती उम्र के साथ मनोज कुमार हीरो बनने का ख्याल पक्का करने लगे। उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। मनोज कुमार के कजन लेखराज भाकरी भी हिंदी सिनेमा से जुड़ चुके थे। एक दिन जब मनोज कुमार की लेखराज से मुलाकात हुई, तो उन्होंने मनोज को देखते ही कहा- तू तो हीरो लगता है। मनोज सुनकर खड़े हुए और झट से कहा- तो बना दीजिए। लेखराज ने जब फिल्में डायरेक्ट करना शुरू किया, तो उन्हें मनोज की कही वो बात याद रही। 1956 में उन्होंने मनोज के परिवार को खत लिखकर उन्हें बॉम्बे भेजने को कहा। माता-पिता की रजामंदी के बाद मनोज बॉम्बे पहुंचे और चाचा-चाची के घर में रहने लगे। लेखराज ने शुरुआत

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

सिनेमा में कई हीरो आए, कई सुपरस्टार बने, लेकिन एक अभिनेता ऐसा भी था जिसने पर्दे पर उपकार, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों के जरिए देशभक्ति को जिया। उनका नाम था मनोज कुमार। देशप्रम ही वो वजह था कि लोग उनका असली नाम भूलने लगे और उन्हें सिर्फ एक नाम से पुकारने लगे ‘भारत कुमार’। उनकी फिल्मों में दिखने वाला जज्बा, जुनून और दर्द सिर्फ अभिनय नहीं था। उन्होंने खुद 10 साल की उम्र में भारत-पाक के बंटवारे से उठी चीखें सुनी और कई जाने जाते देखीं। बीमार मां को दर्द से कराहते देखा और छोटे भाई को दम तोड़ते भी। सिर पर छत नहीं थी, भविष्य का कोई भरोसा नहीं था और उम्मीद भी टूटने लगी, लेकिन किसे पता था कि पाकिस्तान से भागा वो बच्चा, देशभक्ति की ऐसी मिसाल बनेगा कि हर कोई उन्हें असल नाम से ज्यादा भारत कुमार के नाम से पहचानेगा। आज मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार की बर्थ एनिवर्सरी है। अप्रैल 2025 में उनका निधन हो गया है, लेकिन अगर आज वो होते तो 88 साल के हो जाते। उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए, विभाजन के दर्द से निकलकर देश का हीरो बनने की कहानी- किस्सा- 1 दंगों में भाई की मौत हुई, यमुना में शव बहाया; इलाज न करने वाले डॉक्टर्स को लाठी से पीटा 24 जुलाई 1937 ब्रिटिश इंडिया के अबोटाबाद के पंजाबी हिंदू परिवार में हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी का जन्म हुआ, जो बाद में मनोज कुमार नाम से जाने गए। वो हिस्सा जहां उनका जन्म हुआ वो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा में आता है। मनोज कुमार महज 10 साल के थे, जब अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद बंटवारा शुरू हुआ। दंगे भड़के और जान बचाते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली के हडसन लाइन रिफ्यूजी कैंप में आकर रहने लगा। छोटा भाई कुक्कू महज 2 माह का था। पैदाइश से ही उसकी तबीयत खराब रहती थी और मां भी बीमार चल रही थी। दंगों के बीच डॉक्टर्स भी जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे, तभी भाई की सही इलाज न मिल पाने से मौत हो गई। बचपन का वो दर्द याद कर मनोज कुमार ने संसद टीवी के शो गुफ्तगू में कहा- वो रोता हुआ बचपन, जो लाहौर से बिछड़ गया, जो अबोटाबाद से बिछड़ गया। बहुत रोता हुआ बचपन था वो, आज भी सोचता हूं तो आंखे भले ही संभाल लूं, लेकिन दिल रोता है। दिल का रोना बहुत भयानक होता है। सबसे बड़ा मैं, मुझसे छोटी बहन ललिता। जब बंटवारा हुआ तो मां ने छोटे भाई को जन्म दिया। कुक्कू नाम था उसका, बीमार, मां भी बीमार। हम रिफ्यूजी कैंप में थे। मां को दिल्ली के तीस हजारी अस्पताल में रखा गया। जब सायरन बजता था, तो डॉक्टर-नर्स अंडरग्राउंड चले जाते थे। मां मेरी तड़प रही थी, भाई तड़प रहा था। मां चीख रही थी कि डॉक्टर को बुलाओ। वो सब अंडरग्राउंड थे। मां चीख मारी, मेरा भाई कुक्कू चला गया था। मैं गुस्से में था। मैं लाठी लेकर अंडरग्राउंड गया। डॉक्टर्स को भी मारा, नर्स को भी मारा। पिता जी आए, उन्होंने संभाला। दूसरे दिन उस 2 महीने के बच्चे को जमुना जी में बहा दिया, जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, वैसे-वैसे लगता था कि मैं डूब रहा हूं। फिर पिता जी ने रात को अपने सिर पर हाथ रखकर कसम खिलवाई कि जिंदगी में दंगा, मारपीट नहीं करना। आखिर में मनोज कुमार ने रुंहासी आवाज में कहा, जिसका बचपन मर गया, समझो वो आदमी ही मर गया। भाई की मौत के बाद भी मनोज कुमार, 2 महीने तक रिफ्यूजी कैंप में ही रहे और हालात बेहतर होने के बाद परिवार दिल्ली में ही बस गया। पिता स्टील की फैक्ट्री में काम करते थे, लेकिन साथ ही वो शायर थे। जब मनोज कुमार के पिता 5वीं में थे, तो लामा इकबाल ने उनकी नजम सुनकर उन्हें खिज्र का तकाजा दिया था। जब उनका कलाम छपा, तो महाराष्ट्र उर्दू एकेडमी से उन्हें सिमरन अवॉर्ड मिला। किस्सा- 2 दिलीप कुमार को फिल्मों में मरता देख मान लिया फरिश्ता, सोचा- मैं भी फरिश्ता बनूंगा दिल्ली में ही मनोज कुमार की पढ़ाई हुई। वह कम उम्र के थे, जब मामा उन्हें अक्सर फिल्में दिखाने ले जाते थे। तब दिलीप कुमार स्टार बन चुके थे, जिनकी फिल्में अक्सर सिनेमाघरों में लगती थीं। मनोज कुमार ने सबसे पहले दिलीप कुमार की 1947 में आई फिल्म जुगनू देखी, जिसमें उनके किरदार की मौत हो जाती है। तब तक मनोज कुमार नहीं जानते थे कि सिनेमा क्या होता है। कुछ समय बाद उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म शहीद (1948) देखी। उसमें भी दिलीप कुमार को मरता हुआ दिखाया गया। मनोज कुमार फिल्म देखकर घर लौटे, तो देर तक सोए ही नहीं। मन में बस एक ही ख्याल था कि जब वो शख्स एक साल पहले (फिल्म जुगनू में) मर चुके हैं, तो दोबारा (फिल्म शहीद में) कैसे मर सकते हैं। मां ने उन्हें जागते देखा, तो पूछ लिया- सोते क्यों नहीं हो? मनोज कुमार ने मासूम आवाज में कहा- बीजी (जैसा वो मां को पुकारते थे), आदमी कितनी बार मरता है? मां ने जवाब दिया- एक बार। मनोज कुमार ने फिर कहा- और जो 2-3 बार मरे? मां ने कहा- वो तो फरिश्ता ही होगा। उस दिन मनोज कुमार ने ठान लिया कि मैं भी बड़ा होकर फरिश्ता ही बनूंगा। किस्सा- 3 कजन का खत मिलने पर बॉम्बे पहुंचे, सेट पर सामान ढोने का काम मिला बढ़ती उम्र के साथ मनोज कुमार हीरो बनने का ख्याल पक्का करने लगे। उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। मनोज कुमार के कजन लेखराज भाकरी भी हिंदी सिनेमा से जुड़ चुके थे। एक दिन जब मनोज कुमार की लेखराज से मुलाकात हुई, तो उन्होंने मनोज को देखते ही कहा- तू तो हीरो लगता है। मनोज सुनकर खड़े हुए और झट से कहा- तो बना दीजिए। लेखराज ने जब फिल्में डायरेक्ट करना शुरू किया, तो उन्हें मनोज की कही वो बात याद रही। 1956 में उन्होंने मनोज के परिवार को खत लिखकर उन्हें बॉम्बे भेजने को कहा। माता-पिता की रजामंदी के बाद मनोज बॉम्बे पहुंचे और चाचा-चाची के घर में रहने लगे। लेखराज ने शुरुआत

हेयरफॉल: बालों की झड़ी से परेशान हैं तो मेथी में फैले ये 4 कपड़े, 2 सप्ताह में शानदार दिखते हैं

हेयरफॉल: बालों की झड़ी से परेशान हैं तो मेथी में फैले ये 4 कपड़े, 2 सप्ताह में शानदार दिखते हैं

इस भाग में भारी जिंदगी, प्रदूषण, तनाव और गलत भाषा का सबसे पहला असर हमारे बालों पर पड़ता है। बालों का स्टाइल एक ऐसी समस्या बन गई है, जिससे हर दूसरा व्यक्ति परेशान है। बाजार में कई तरह के हेयर केयर उत्पाद मौजूद हैं, लेकिन उनमें मौजूद केमिकल कई बार बालों को नुकसान पहुंचाते हैं। अगर आप भी बालों से परेशान हैं और कोई प्रभावशाली प्राकृतिक उपाय ढूंढ रहे हैं, तो मेथी दाना आपके लिए वरदान साबित हो सकता है। मेथी में प्रोटीन, निकोटिनिक एसिड और फोलिक एसिड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो बालों के प्रोटीन को मजबूत बनाते हैं। नारियल तेल बाले को गहराई से पोषण आहार के लिए जाना जाता है। जब इसे मेथी के साथ शामिल किया जाता है, तो यह बालों के झड़ने की समस्या को जड़ से ख़त्म करने में मदद करता है। 2 लार्ज मेथी दाना और लें उसे नारियल तेल में कैनवास पेंटिंग गर्म कर लें। जब तेल गुनगुना हो जाए, तो इससे स्कैल्प की मालिश करें। इसे हर हफ्ते 2 बार खरीदें। डैंड्रफ और ड्राय स्कैल्प भी बाल स्कैल्प का एक बड़ा कारण होते हैं। दही में मौजूद लैक्टिक एसिड स्कैल्प को साफ और वर्गीकृत किया गया है। रातभर भीगे हुए मेथी दानों को पीसकर पेस्ट बना लें। अब इसमें 3-4 बड़े ताज़ा डेयरी रेवेअर शामिल हैं। इस पैक को बालों की जड़ों से सिरों तक और 30 मिनट बाद किसी भी फफूंदी से धो लें। एलोवेरा जेल बाल प्राकृतिक रूप से चमकदार और मजबूत बनते हैं। इसमें मौजूद एंजाइम एंजाइम को बढ़ावा दिया जाता है। मेथी के पेस्ट में 2 माइक्रो ताज़ा एलोवेरा जेल पकड़े। इस मिक्सचर को स्कैल्प पर अच्छी तरह से सजाया गया है। यह बालों के झड़ने को तुरंत नियंत्रित करने में मदद करता है और बालों को स्थापित करता है। प्याज के रस में प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा होती है, जो नए बाल ओबने और स्कैल्प के ब्लड सर्कोलन को बेहतर बनाने में सहायक होता है। मेथी के पाउडर या पेस्ट में 2 प्याज का रस मिला लें। इसे अपने नाम की मदद से स्कैल्प पर लगाएं। 20 से 25 मिनट बाद बालों को धो लें।

दांतों में सूजन और त्वचा पर खुजली हो सकती है किडनी रोग होने के लक्षण, भूलकर भी न करें

दांतों में सूजन और त्वचा पर खुजली हो सकती है किडनी रोग होने के लक्षण, भूलकर भी न करें

गुर्दा रोग: शरीर को स्वस्थ और डिटॉक्स रखने में हमारी किडनी की बेहद अहम भूमिका है। यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है। हालाँकि, जब किडनी के कार्य करने की क्षमता प्रभावित होती है, तो शरीर कई तरह के प्रारंभिक संकेत देना शुरू कर देता है। बार-बार लोग इन योग्यताओं को सामान्य समझकर अंतिम कर देते हैं, जो आगे चलकर किडनी फेलियर या गंभीर किडनी रोग का कारण बन सकते हैं। अगर आपके दांतों या पंजों में किसी बाहरी चोट के कारण सूजन आ रही है, तो यह किडनी की बीमारी का बड़ा संकेत हो सकता है। किडनी जब ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर से पसीना और अतिरिक्त पानी बाहर नहीं निकलता है। यह तरल पदार्थ स्टाइरीन और ऑर्थोडॉक्स ऑर्गेनाइजेशन में जमा होने लगता है, जिससे सूजन दिखाई देती है। त्वचा पर अधिक खुजली और रूखापन होना त्वचा में लगातार खुजली होना सिर्फ एलर्जी या त्वचा संक्रमण ही नहीं है, बल्कि किडनी की मांसपेशियों की ओर भी संकेत होता है। खून में टॉक्सिन्स का होना, पदार्थ का स्तर बढ़ना, त्वचा पर गंभीर खुजली, रूखापन और रैशेज शामिल हैं। बार-बार पेशाब आना या पेशाब में खून आना। खून में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी और विषाक्त पदार्थों के जमाव के कारण होते हैं। सुबह-सुबह नज़र के नीचे सूजन दिखाई देती है। यदि आपके शरीर में यह लक्षण 4-5 दिन से अधिक समय तक लगातार दिखाई देता है, तो बिना किसी देरी के डॉक्टर से संपर्क करें। आप तुरंत केएफटी (किडनी फंक्शन टेस्ट), यूरिन टेस्ट और ब्लड डॉक्युमेंट की जांच करें। पर्याप्त पानी पिएं, नमक का सेवन नियंत्रित करें, और डॉक्टर की सलाह के बिना पेनकिलर खाने से सलाह लें।

आशीष कुमार दश होंगे इंफोसिस के नए CEO:पहली तिमाही में मुनाफा 12.2% बढ़कर ₹7,769 करोड़ रहा, रेवेन्यू 14% उछलकर ₹48,211 करोड़ पहुंचा

आशीष कुमार दश होंगे इंफोसिस के नए CEO:पहली तिमाही में मुनाफा 12.2% बढ़कर ₹7,769 करोड़ रहा, रेवेन्यू 14% उछलकर ₹48,211 करोड़ पहुंचा

देश की दूसरी सबसे बड़ी IT सर्विसेज कंपनी इंफोसिस ने आशीष कुमार दश को अपना नया CEO नियुक्त किया है। 23 जुलाई 2026 को पहली तिमाही के नतीजों के साथ कंपनी ने इस लीडरशिप बदलाव का ऐलान किया। वे मौजूदा CEO और MD सलिल पारिख की जगह लेंगे। वे 1 अप्रैल 2027 से चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर और मैनेजिंग डायरेक्ट के रूप में पदभार संभालेंगे। उनका कार्यकाल 5 साल के लिए होगा, जो 31 मार्च 2032 तक चलेगा। कंपनी का मुनाफा 12.2% बढ़कर 7,769 करोड़ रुपए रहा जून तिमाही में कंपनी का कंसॉलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 12.2% बढ़कर 7,769 करोड़ रुपए रहा, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में 6,921 करोड़ रुपए था। पिछली तिमाही के 8,501 करोड़ रुपए के मुकाबले कंपनी के नेट प्रॉफिट में 8.6% की गिरावट आई है। रेवेन्यू 14% बढ़कर ₹48,211 करोड़ हुआ इंफोसिस का रेवेन्यू सालाना आधार पर 14% बढ़कर 48,211 करोड़ रुपए हो गया है। एक साल पहले की समान अवधि में कंपनी ने 42,279 करोड़ रुपए का रेवेन्यू हासिल किया था। तिमाहगी आधार (QoQ) पर देखें तो कंपनी के रेवेन्यू में 4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बीते वित्त वर्ष की चौथी तिमाही (मार्च तिमाही) में कंपनी का रेवेन्यू 46,402 करोड़ रुपए रहा था। सलिल पारेख बोले- 8 साल में कंपनी की कमाई दोगुनी अपना पद छोड़ रहे MD और CEO सलिल पारेख ने कहा कि पिछले आठ साल में इंफोसिस का नेतृत्व करना उनके लिए बहुत सम्मान की बात रही है। इस दौरान कंपनी का रेवेन्यू 10 अरब डॉलर से बढ़कर दोगुना यानी 20 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया है। सलिल पारेख ने आगे कहा कि हमने डिजिटल बदलावों के क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की है और AI बदलाव के लिए एक अलग रणनीति तैयार की है। आशीष के साथ कई साल तक काम करने के कारण मैंने उनकी ईमानदारी, ग्राहकों के प्रति सोच और बदलाव के दौर में नेतृत्व करने की क्षमता को बहुत करीब से देखा है। उन्हें हमारे ग्राहकों, व्यापार और कर्मचारियों की गहरी समझ है। मुझे पूरा भरोसा है कि वे इंफोसिस को बदलाव के अगले चरण में सफलतापूर्वक ले जाएंगे। आशीष कुमार बोले- इंफोसिस नए दौर की शुरुआत मजबूती से कर रही नई जिम्मेदारी मिलने पर आशीष कुमार दश ने कहा कि तकनीक अब एक नए युग में प्रवेश कर रही है, जहां एआई व्यापार करने और वैल्यू बनाने के तरीकों को पूरी तरह बदल रहा है। इंफोसिस इस नए दौर की शुरुआत बहुत मजबूती के साथ कर रही है। हमारे पास स्पष्ट एआई रणनीति, बेहतरीन प्रतिभा, ग्राहकों के साथ गहरे संबंध और ऐसे मूल्य हैं जिन्होंने दुनिया भर में विश्वास जीता है। मेरा संकल्प इन ताकतों को और मजबूत करने, नए प्रयोगों को तेज करने, क्षमताओं को बढ़ाने और ग्राहकों को एआई-संचालित दुनिया में सफल बनाने का है।