ट्रम्प के दामाद ने यूक्रेनी राष्ट्रपति से मुलाकात की:पुतिन से चर्चा के एक दिन बाद कीव पहुंचे; रूस से युद्ध खत्म कराने पर चर्चा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर और दूत स्टीव विटकॉफ ने रविवार को यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की से अहम बातचीत की। यह बातचीत रूस के साथ चल रहे युद्ध को खत्म कराने की अमेरिकी कोशिशों को आगे बढ़ाने के लिए हुई। दोनों की यह कीव की पहली यात्रा थी। इससे एक दिन पहले उन्होंने मॉस्को में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थी। बैठक के बाद विटकॉफ ने कहा, हमने बहुत सार्थक और महत्वपूर्ण बातचीत की। यह काफी गंभीर चर्चा थी। हम इससे बहुत उत्साहित हैं और जब तक जरूरत होगी, बातचीत जारी रखेंगे। कुशनर ने कहा कि इस यात्रा से अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल को काफी कुछ सीखने को मिला है। उम्मीद है कि इससे शांति की कोशिशों को आगे बढ़ाने के नए रास्ते मिलेंगे। खबर लगातार अपडेट हो रही है…
आज का एक्सप्लेनर:ट्रम्प के दामाद, दोस्त से लेकर CIA डायरेक्टर तक, मॉस्को क्यों जा रहे; क्या रूस-यूक्रेन जंग खत्म होने वाली है

25 अगस्त को अमेरिकी इंटेलिजेंस के मुखिया जॉन रैटक्लिफ ने मॉस्को की सीक्रेट विजिट की। 10 दिन बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के 2 भरोसेमंद दूत- जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ भी मॉस्को पहुंचे और रूसी राष्ट्रपति पुतिन से मिले। आखिर अमेरिकी अधिकारी एक के बाद एक मॉस्को क्यों जा रहे, बंद कमरों में क्या बात हो रही और क्या रूस-यूक्रेन जंग खत्म होने वाली है; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में… सवाल-1: बीते दिनों ट्रम्प के किन अधिकारियों ने रूस का दौरा किया? जवाब: पिछले 2 हफ्तों में ट्रम्प के 3 बड़े अधिकारी मॉस्को पहुंचे… जेरेड और स्टीव के दौरे से पहले रूस ने कीव पर 72 घंटे के लिए हमले रोकने का ऐलान किया था। यूक्रेन ने भी मॉस्को पर ड्रोन-मिसाइल हमले न करने की बात कही है। सवाल-2: CIA डायरेक्टर रास्ते बदल-बदलकर क्यों पहुंचे मॉस्को, हुआ क्या? जवाब: CIA डायरेक्टर जॉन रैटक्लिफ का मॉस्को दौर काफी सीक्रेट रहा। वे सामान्य प्लेन से सीधे मॉस्को नहीं पहुंचे, बल्कि उन्होंने अमेरिकी एयरफोर्स के C-17 ग्लोबमास्टर एयरक्राफ्ट से सफर किया। फ्लाइट-ट्रैकिंग डेटा से पता चला कि रैटक्लिफ के C-17 ने अमेरिका के मैरीलैंड के जॉइंट बेस एंड्रयूज से लातविया के रीगा के लिए उड़ान भरी। फिर वे 25 अगस्त को मॉस्को के व्नुकोवो एयरपोर्ट पहुंचे। सिर्फ 8 घंटे मॉस्को में रहे। क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने बताया कि रैटक्लिफ ने रूसी इंटेलिजेंस SVR के मुखिया सर्गेई नारिश्किन और घरेलू सुरक्षा एजेंसी FSB के चीफ अलेक्जेंडर बोर्तनिकोव से बात की। बाद में पुतिन को इसकी जानकारी दी गई। अमेरिकी न्यूज आउटलेट एक्सियोस, न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल ने सूत्रों के हवाले से लिखा… सवाल-3: ट्रम्प के दामाद और दोस्त ने पुतिन से क्या बात की? जवाब: गाजा-इजराइल और रूस-यूक्रेन जंग को अमेरिका की ओर से ट्रम्प के 2 भरोसेमंद दूत संभाल रहे हैं। एक तो हैं- ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर और दूसरे उनके 30 साल पुराने दोस्त स्टीव विटकॉफ हैं। जेरेड ट्रम्प की बेटी इवांका के पति और बिजनेसमैन हैं। वहीं स्टीव उनके रियल एस्टेट बिजनेस में पार्टनर हैं। जेरेड और स्टीव की जोड़ी मौजूदा डिप्लोमेसी की दुनिया में काफी मशहूर है। 5 सितंबर को ये जोड़ी मॉस्को पहुंची। एयरपोर्ट पर रूसी राष्ट्रपति के दूत किरिल दिमित्रीव ने उनकी अगवानी की। इसके बाद दोनों क्रेमलिन गए, जहां वे पुतिन से मिले। 3 घंटे 10 मिनट मीटिंग चली और फिर डिनर भी हुआ। रूसी राष्ट्रपति के विदेश नीति सलाहकार यूरी उशाकोव ने इस मीटिंग को पॉजिटिव, भरोसेमंद और नतीजा देने वाली बताया। बैठक में आर्थिक मुद्दों और रूस-अमेरिका के जॉइंट प्रोजेक्ट्स पर भी बात हुई। जेरेड और स्टीव के दौरे से पहले ट्रम्प ने कहा था कि दोनों जंग खत्म करने का नया प्रस्ताव लेकर जा रहे हैं और यह अच्छा मौका है कि हम यह कर पाएं। लेकिन दिमित्री पेस्कोव ने मीटिंग में कोई नई बात या चर्चा होने से इनकार किया। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि आने वाले हफ्तों में बड़ी बैठकें हो सकती हैं, जिनके अच्छे नतीजे होंगे। सवाल-4: अगर ट्रम्प, पुतिन और जेलेंस्की साथ बैठे तो क्या बात हो सकती है? जवाब: ऐसी चर्चा पहली बार नहीं हो रही है कि ट्रम्प, पुतिन और जेलेंस्की बातचीत की मेज पर एक साथ आएं। पहले भी ट्रम्प और जेलेंस्की इसके लिए राजी थे, लेकिन पुतिन इसे टालते रहे। अब रैटक्लिफ ने फिर से ये पेशकश की है। ऐसे में अगर तीनों के बीच बैठक हुई तो 4 बड़े मुद्दों पर चर्चा हो सकती है… सवाल-5: तो क्या जल्द ही रूस-यूक्रेन जंग रुकने वाली है? जवाब: खुद ईरान जंग में उलझा अमेरिका 8 महीने बाद फिर से रूस-यूक्रेन जंग रोकने के लिए लामबंदी कर रहा है। जेरेड और स्टीव पहली बार कीव भी जा रहे हैं, जो अब तक सिर्फ मॉस्को जाते रहे। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि जंग खत्म हो सकती है। पिछले महीने जेलेंस्की ने उम्मीद जताई थी कि सितंबर में बहुत कुछ बदल सकता है। अमेरिकी और रूसी अधिकारियों ने भी संभावना जताई है कि आने वाले दिनों पर सकारात्मक नतीजे मिल सकते हैं। 4 एक्सपर्ट्स से जानिए… ******* रिसर्च सहयोग- आदित्य रवि ———– ये भी खबर पढ़िए… क्या बांग्लादेश मक्का पैक्ट में शामिल होकर सऊदी-पाक-तुर्किये के साथ लड़ेगा; भारत के तीन तरफ से घिरने का खतरा हाल ही में सऊदी, तुर्किये और पाकिस्तान के बीच मक्का में एक डिफेंस एग्रीमेंट हुआ। इसमें NATO की तरह करार है कि तीनों में से किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। अब इसमें कुछ और इस्लामिक देशों के शामिल होने की अटकलें लग रही हैं। इनमें सबसे बड़ा नाम है भारत का पड़ोसी- बांग्लादेश। पूरी खबर पढ़िए…
महिला क्रिकेट लीग के लिए जयपुर पहुंचे अभिनेता मनोज जोशी:बोले- जयपुर आना हमेशा खास, महिलाओं का खेलों से जुड़ना बेहद जरूरी

बॉलीवुड और रंगमंच के दिग्गज अभिनेता मनोज जोशी रविवार को एयर इंडिया की उड़ान से जयपुर पहुंचे हैं। जयपुर एयरपोर्ट पर बेटी प्रीमियर लीग के आयोजकों की ओर से उनका स्वागत किया गया। जोशी जयपुर में आयोजित होने वाली महिला क्रिकेट लीग के प्रचार-प्रसार के सिलसिले में पहुंचे हैं। एयरपोर्ट पर मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने जयपुर से अपने पुराने जुड़ाव को याद किया और महिलाओं के खेलों से जुड़ने को महत्वपूर्ण बताया। मनोज जोशी ने कहा कि जयपुर आना हमेशा उनके लिए खास रहा है। इससे पहले भी वह शूटिंग और रंगमंच की प्रस्तुतियों के सिलसिले में जयपुर आते रहे हैं। उन्होंने कहा कि महिलाओं का खेलों से जुड़ना बेहद खास है और इसी पहल को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से वह जयपुर पहुंचे हैं। आत्मविश्वास, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता विकसित करने का माध्यम है खेल उन्होंने महिला खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने और उन्हें खेलों में आगे बढ़ने के अवसर देने की जरूरत पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि खेल केवल प्रतियोगिता का माध्यम नहीं है, बल्कि यह आत्मविश्वास, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता विकसित करने का भी माध्यम है। रंगमंच से शुरू हुआ अभिनय का सफर मनोज जोशी का अभिनय सफर रंगमंच से शुरू हुआ। उन्होंने मराठी रंगमंच के साथ-साथ गुजराती और हिंदी रंगमंच पर भी काम किया। इसके बाद उन्होंने टेलीविजन और फिल्मों की दुनिया में कदम रखा। उनकी शुरुआती चर्चित टेलीविजन भूमिकाओं में ‘चाणक्य’, ‘एक महल हो सपनों का’ और मराठी धारावाहिक ‘राऊ’ शामिल रहे। फिल्मों में उन्होंने ‘सरफरोश’ से अपनी पहचान बनानी शुरू की। इसके बाद ‘हंगामा’, ‘हलचल’, ‘धूम’, ‘फिर हेरा फेरी’, ‘चुप चुप के’, ‘भागम भाग’, ‘भूल भुलैया’ और ‘बिल्लू’ जैसी फिल्मों में उनके अलग-अलग किरदारों ने दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। ‘कचरा सेठ’ से मिली अलग पहचान मनोज जोशी को हास्य और चरित्र भूमिकाओं के लिए खास तौर पर जाना जाता है। ‘फिर हेरा फेरी’ में निभाया गया ‘कचरा सेठ’ का किरदार उनके सबसे लोकप्रिय किरदारों में शामिल है। इसके अलावा ‘हंगामा’, ‘भूल भुलैया’ और ‘ढोल’ जैसी फिल्मों में भी उनके अभिनय और हास्य अंदाज को दर्शकों ने पसंद किया। उन्होंने केवल हास्य भूमिकाओं तक खुद को सीमित नहीं रखा। गंभीर और ऐतिहासिक किरदारों में भी उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता दिखाई। टेलीविजन धारावाहिक ‘चक्रवर्ती सम्राट अशोक’ में उन्होंने चाणक्य की भूमिका निभाई, जिसके लिए उन्हें भारतीय टेलीविजन अकादमी पुरस्कार में सहायक अभिनेता का सम्मान मिला। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित मनोज जोशी को मराठी फिल्म ‘दशक्रिया’ में अभिनय के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान मिला। इसके अलावा उन्हें टेलीविजन और गुजराती सिनेमा के लिए भी पुरस्कार मिले हैं। वर्ष 2018 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। अभिनय के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान और रंगमंच, टेलीविजन और फिल्मों में उनकी सक्रियता ने उन्हें भारतीय मनोरंजन जगत में एक अलग पहचान दिलाई है। मनोज जोशी ने अभिनय के अलावा टेलीविजन पर एंकर के रूप में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। ‘स्वराज : भारत के स्वतंत्रता संग्राम की समग्र गाथा’ कार्यक्रम में उन्होंने एंकर की भूमिका निभाई और इसके लिए वर्ष 2023 में भारतीय टेली पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ एंकर का सम्मान प्राप्त किया।
अमेरिका में एआई से जॉब संकट टला:अगस्त में 1.62 लाख जॉब पैदा हुए, उम्मीद से तीन गुना ज्यादा बढ़ोतरी

एआई को लेकर लंबे समय से डर जताया जा रहा था कि यह तकनीक लाखों इंसानों की नौकरियां छीनकर उन्हें बेरोजगार बना देगी। हालांकि हालिया आंकड़े इस डर को पूरी तरह खारिज करते दिख रहे हैं। अमेरिका में 4 सितंबर को जारी ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स की रिपोर्ट के अनुसार अगस्त में 1,62,000 नई नौकरियां पैदा हुईं। ये अर्थशास्त्रियों के अनुमान से करीब 3 गुना ज्यादा हैं। अमेरिका में कुल बेरोजगारी दर गिरकर 4.1 फीसदी पर बनी हुई है। ये पिछले 50 वर्षों के लगभग 90 फीसदी महीनों की तुलना में सबसे कम है। जिन युवा श्रमिकों को एआई का पहला शिकार माना जा रहा था, उनका प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा है। अनुमान है कि अमेरिका में एआई ने अब तक करीब 10 लाख से ज्यादा नई नौकरियां पैदा की हैं। एआई में 40% ज्यादा सैलरी मिल रही कर्मचारियों की बढ़ती मांग का असर वेतन पर भी दिख रहा है। इनडीड के अनुसार, डेटा सेंटर्स में इंस्टॉलेशन और मेंटेनेंस की नौकरियों के लिए वेतन अन्य जगहों पर इसी तरह के काम की तुलना में लगभग 40% अधिक है। जून तक के आंकड़ों के मुताबिक इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट निर्माण में औसत प्रति घंटा आय में 13% से अधिक और विद्युत ठेकेदारों में लगभग 8% की वृद्धि हुई। भारत: आईटी सर्विसेज में एक्टिव जॉब ओपनिंग 18 माह के उच्चतम स्तर पर कई इंटरनेशनल रिसर्च और जॉब प्लेटफॉर्म के मुताबिक आई स्किल की मांग वाली नौकरियों की ग्रोथ सामान्य नौकरियों से 3.5 गुना तेज हो रही है। एआई से करीब 9.2 करोड़ पारंपरिक नौकरियां प्रभावित होंगी, लेकिन 17 करोड़ नई नौकरियां पैदा होंगी। एक्सफेनो के मुताबिक भारतीय आईटी सर्विसेज में एक्टिव जॉब ओपनिंग बढ़कर 57,000 तक पहुंच गईं। यह 18 माह का उच्चतम स्तर है।
अमेरिका- 10 लाख भारतवंशी वोटरों के नाम कटने का खतरा:ट्रम्प ने SIR जैसी वोटर लिस्ट जांच शुरू की, 125 करोड़ रुपए से डेटाबेस बनेगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) की तर्ज पर वोटर लिस्ट की जांच शुरू कर दी है। इसके लिए करीब 125 करोड़ रुपए का फंड जारी किया गया है। इस प्रक्रिया में वोटर लिस्ट की जांच कर नेशनल वोटर डेटाबेस तैयार किया जाएगा। इससे अमेरिका में मौजूद करीब 26 लाख भारतवंशी वोटरों में से लगभग 10 लाख के नाम कटने का खतरा बताया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले यह प्रक्रिया पूरी करने का है। ट्रम्प ने ICE को डेटाबेस की जिम्मेदारी दी ट्रम्प प्रशासन ने अपनी इमिग्रेशन एजेंसी ICE (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) को वोटर डेटाबेस की निगरानी की जिम्मेदारी दी है। सभी 50 राज्यों में वोटर लिस्ट की जांच और डेटाबेस अपडेट करने के लिए कंपनियों को काम सौंपा गया है। वोटरों की जानकारी को अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड से मिलाया जाएगा। घर-घर जाकर सर्वे नहीं होगा अमेरिका में भारत की तरह घर-घर जाकर वोटरों का सर्वे नहीं किया जा रहा है। वोटर लिस्ट को कंप्यूटर के जरिए इमिग्रेशन रिकॉर्ड समेत दूसरे रिकॉर्ड से मिलाया जाएगा। रिकॉर्ड में नाम या जानकारी का मिलान नहीं होने पर संबंधित वोटर की जानकारी की दोबारा जांच हो सकती है और नाम हटाए जाने का खतरा रहेगा। भारतवंशी वोटरों पर ज्यादा असर की आशंका क्यों? अमेरिका में करीब 26 लाख भारतवंशी वोटर हैं। न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में इनकी संख्या और राजनीतिक प्रभाव काफी अहम माना जाता है। इन राज्यों में वोटर पहचान और रजिस्ट्रेशन के नियम अलग-अलग हैं। नई जांच प्रक्रिया में रिकॉर्ड का मिलान होने से भारतवंशी वोटरों के नाम भी जांच के दायरे में आएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतवंशी मतदाताओं के वोटिंग पैटर्न पर भी नजर रखी जा सकती है। हालांकि, कितने लोगों के नाम वास्तव में हटेंगे, यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही साफ होगा। अमेरिका में चुनाव भारत से अलग तरीके से होते हैं अमेरिका में भारत के चुनाव आयोग जैसी एक केंद्रीय संस्था पूरे देश के चुनाव नहीं कराती। वहां चुनाव की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य और स्थानीय प्रशासन संभालते हैं। इसी वजह से अलग-अलग राज्यों में वोटर रजिस्ट्रेशन और पहचान के नियम भी अलग हैं। अमेरिका में वोटर पहचान के नियम राज्य के हिसाब से अलग-अलग हैं। कई राज्यों में वोटर से अपनी पहचान की घोषणा कराना ही पर्याप्त होता है, जबकि कुछ राज्यों में पहचान के दस्तावेज जरूरी होते हैं। 12 राज्यों में पासपोर्ट या जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। कैलिफोर्निया में वोटर के हस्ताक्षर का मिलान किया जाता है। टेक्सास में पहले भी नाम हटाने पर विवाद हुआ टेक्सास में करीब 24 हजार लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने के बाद मामला अदालत पहुंचा था। फेडरल कोर्ट से इस मामले में राहत मिली थी और संबंधित मामला अभी लंबित है। इसी वजह से ट्रम्प प्रशासन की नई वोटर लिस्ट जांच को लेकर भी अदालत में चुनौती मिलने की संभावना है। ट्रम्प वोटर आईडी के भी समर्थक ट्रम्प अमेरिका में वोटिंग के लिए फोटो आईडी अनिवार्य करने की मांग का समर्थन करते रहे हैं। उनका कहना है कि इससे चुनाव में गड़बड़ी रोकने में मदद मिलेगी। अब वोटर लिस्ट की देशभर में जांच और एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने की कोशिश को लेकर अमेरिका में राजनीतिक विवाद बढ़ सकता है। खासकर उन राज्यों में इसका असर महत्वपूर्ण होगा, जहां भारतवंशी और दूसरे प्रवासी वोटर चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाते हैं।
अमेरिका- 10 लाख भारतवंशी वोटरों के नाम कटने का खतरा:ट्रम्प ने SIR जैसी वोटर लिस्ट जांच शुरू की, 125 करोड़ रुपए से डेटाबेस बनेगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) की तर्ज पर वोटर लिस्ट की जांच शुरू कर दी है। इसके लिए करीब 125 करोड़ रुपए का फंड जारी किया गया है। इस प्रक्रिया में वोटर लिस्ट की जांच कर नेशनल वोटर डेटाबेस तैयार किया जाएगा। इससे अमेरिका में मौजूद करीब 26 लाख भारतवंशी वोटरों में से लगभग 10 लाख के नाम कटने का खतरा बताया जा रहा है। सरकार का लक्ष्य नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव से पहले यह प्रक्रिया पूरी करने का है। ट्रम्प ने ICE को डेटाबेस की जिम्मेदारी दी ट्रम्प प्रशासन ने अपनी इमिग्रेशन एजेंसी ICE (इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट) को वोटर डेटाबेस की निगरानी की जिम्मेदारी दी है। सभी 50 राज्यों में वोटर लिस्ट की जांच और डेटाबेस अपडेट करने के लिए कंपनियों को काम सौंपा गया है। वोटरों की जानकारी को अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड से मिलाया जाएगा। घर-घर जाकर सर्वे नहीं होगा अमेरिका में भारत की तरह घर-घर जाकर वोटरों का सर्वे नहीं किया जा रहा है। वोटर लिस्ट को कंप्यूटर के जरिए इमिग्रेशन रिकॉर्ड समेत दूसरे रिकॉर्ड से मिलाया जाएगा। रिकॉर्ड में नाम या जानकारी का मिलान नहीं होने पर संबंधित वोटर की जानकारी की दोबारा जांच हो सकती है और नाम हटाए जाने का खतरा रहेगा। भारतवंशी वोटरों पर ज्यादा असर की आशंका क्यों? अमेरिका में करीब 26 लाख भारतवंशी वोटर हैं। न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे राज्यों में इनकी संख्या और राजनीतिक प्रभाव काफी अहम माना जाता है। इन राज्यों में वोटर पहचान और रजिस्ट्रेशन के नियम अलग-अलग हैं। नई जांच प्रक्रिया में रिकॉर्ड का मिलान होने से भारतवंशी वोटरों के नाम भी जांच के दायरे में आएंगे। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतवंशी मतदाताओं के वोटिंग पैटर्न पर भी नजर रखी जा सकती है। हालांकि, कितने लोगों के नाम वास्तव में हटेंगे, यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही साफ होगा। अमेरिका में चुनाव भारत से अलग तरीके से होते हैं अमेरिका में भारत के चुनाव आयोग जैसी एक केंद्रीय संस्था पूरे देश के चुनाव नहीं कराती। वहां चुनाव की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य और स्थानीय प्रशासन संभालते हैं। इसी वजह से अलग-अलग राज्यों में वोटर रजिस्ट्रेशन और पहचान के नियम भी अलग हैं। अमेरिका में वोटर पहचान के नियम राज्य के हिसाब से अलग-अलग हैं। कई राज्यों में वोटर से अपनी पहचान की घोषणा कराना ही पर्याप्त होता है, जबकि कुछ राज्यों में पहचान के दस्तावेज जरूरी होते हैं। 12 राज्यों में पासपोर्ट या जन्म प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। कैलिफोर्निया में वोटर के हस्ताक्षर का मिलान किया जाता है। टेक्सास में पहले भी नाम हटाने पर विवाद हुआ टेक्सास में करीब 24 हजार लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने के बाद मामला अदालत पहुंचा था। फेडरल कोर्ट से इस मामले में राहत मिली थी और संबंधित मामला अभी लंबित है। इसी वजह से ट्रम्प प्रशासन की नई वोटर लिस्ट जांच को लेकर भी अदालत में चुनौती मिलने की संभावना है। ट्रम्प वोटर आईडी के भी समर्थक ट्रम्प अमेरिका में वोटिंग के लिए फोटो आईडी अनिवार्य करने की मांग का समर्थन करते रहे हैं। उनका कहना है कि इससे चुनाव में गड़बड़ी रोकने में मदद मिलेगी। अब वोटर लिस्ट की देशभर में जांच और एक राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने की कोशिश को लेकर अमेरिका में राजनीतिक विवाद बढ़ सकता है। खासकर उन राज्यों में इसका असर महत्वपूर्ण होगा, जहां भारतवंशी और दूसरे प्रवासी वोटर चुनावी नतीजों में अहम भूमिका निभाते हैं।
नेपाल बाढ़ से 400 अरब रुपये का नुकसान:5 हजार लोग लापता, 1,344 शव मिले; पीक सीजन में बुकिंग रद्द कर रहे टूरिस्ट

नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ से करीब 400 अरब नेपाली रुपये के नुकसान का शुरुआती अनुमान है। हादसे में अब तक 1,344 शव मिल चुके हैं, जबकि करीब 5 हजार लोग अब भी लापता हैं। बाढ़ का असर अब नेपाल के पर्यटन कारोबार पर भी दिख रहा है। सितंबर से नवंबर के पीक टूरिस्ट सीजन में होटल और ट्रैवल कंपनियों की बुकिंग रद्द होने लगी हैं। काठमांडू के एक होटल की करीब 20% बुकिंग कैंसिल हो चुकी हैं। होटल के मैनेजिंग डायरेक्टर के मुताबिक, बाढ़ के बाद एक हफ्ते में खासकर ऑनलाइन बुकिंग में तेजी से कैंसिलेशन हुआ। खबर से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
नेपाल बाढ़ से 400 अरब रुपये का नुकसान:5 हजार लोग लापता, 1,344 शव मिले; पीक सीजन में बुकिंग रद्द कर रहे टूरिस्ट

नेपाल में 26 अगस्त को आई बाढ़ से करीब 400 अरब नेपाली रुपये के नुकसान का शुरुआती अनुमान है। हादसे में अब तक 1,344 शव मिल चुके हैं, जबकि करीब 5 हजार लोग अब भी लापता हैं। बाढ़ का असर अब नेपाल के पर्यटन कारोबार पर भी दिख रहा है। सितंबर से नवंबर के पीक टूरिस्ट सीजन में होटल और ट्रैवल कंपनियों की बुकिंग रद्द होने लगी हैं। काठमांडू के एक होटल की करीब 20% बुकिंग कैंसिल हो चुकी हैं। होटल के मैनेजिंग डायरेक्टर के मुताबिक, बाढ़ के बाद एक हफ्ते में खासकर ऑनलाइन बुकिंग में तेजी से कैंसिलेशन हुआ। नेपाल बाढ़ से जुड़ी तस्वीरें… खबर से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…
अमित दुबे की साइबर कहानियां पहुंचीं हिरानी-नीरज पांडे तक:बोले- क्रिमिनल डिवाइस नहीं, पहले इंसान को हैक करता है, ऐसे बचें साइबर ठगी से

साइबर क्राइम एक्सपर्ट और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अमित दुबे ने करियर में ऐसे कई मामलों की जांच की है, जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थे। उनकी वास्तविक इन्वेस्टिगेशन की कहानियां राजकुमार हिरानी की वेब सीरीज ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ और नीरज पांडे की ‘हैक क्राइम्स ऑनलाइन’ तक पहुंचीं। एटीएम चोरी, किडनैपिंग और एक एक्ट्रेस के इंस्टाग्राम अकाउंट से फॉलोअर्स गायब होने जैसे मामलों से अमित ने साइबर क्राइम की बदलती दुनिया को करीब से देखा है। उनका कहना है कि अपराधी हर बार डिवाइस को हैक नहीं करता, कई बार पहले इंसान के भरोसे को हैक करता है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में अमित ने साइबर क्राइम की अपनी इन्वेस्टिगेशन, फिल्ममेकर्स के साथ काम करने के अनुभव और आम लोगों के लिए जरूरी सावधानियों पर खुलकर बात की। सवाल: आपकी वास्तविक साइबर इन्वेस्टिगेशन राजकुमार हिरानी की वेब सीरीज तक पहुंची। उनसे यह कनेक्शन कैसे बना? जवाब: कोविड के दौरान राजू सर से मेरा कनेक्शन हुआ। उस समय साइबर क्राइम को लेकर हमारी बातचीत शुरू हुई और फिर वीडियो कॉल पर कई बार चर्चा हुई। मैंने उन्हें अपने काम और अलग-अलग इन्वेस्टिगेशन से जुड़ी कहानियां बताईं। उन्हें लगा कि इन केसों में सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि इंसानी व्यवहार और भावनाओं की भी काफी संभावनाएं हैं। इसके बाद हमने इन कहानियों पर काम करना शुरू किया। यह कोई छोटा प्रोसेस नहीं था। 6 साल तक कहानी और स्क्रिप्ट पर काम हुआ, कई ड्राफ्ट तैयार हुए और चीजों को लगातार बेहतर किया गया। सवाल: ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ में एटीएम चोरी वाला सीन भी है। क्या यह आपके किसी वास्तविक केस से जुड़ा है? जवाब: हां, एटीएम चोरी का मामला मेरे वास्तविक अनुभवों से जुड़ा है। साइबर क्राइम की इन्वेस्टिगेशन में कई बार कोई केस शुरुआत में बहुत जटिल दिखाई देता है। आपको लगता है कि इसके पीछे बहुत हाईटेक तरीका होगा, लेकिन जब आप घटनाओं के पैटर्न और डिजिटल फुटप्रिंट को जोड़ते हैं तो तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगती है। यही चीज इस केस में भी थी। वास्तविक घटना को स्क्रीन पर उसी रूप में रखना संभव नहीं होता, इसलिए कहानी के हिसाब से उसमें बदलाव किए जाते हैं, लेकिन उसका बेस और इन्वेस्टिगेशन का अनुभव वास्तविक होता है। सवाल: इस केस से आम लोगों के लिए भी एक सीख निकलती है कि साइबर क्राइम हमेशा बहुत हाईटेक नहीं होता, क्या कहना चाहेंगे? जवाब: बिल्कुल। हम अक्सर मान लेते हैं कि साइबर क्रिमिनल कोई बहुत बड़ा कंप्यूटर एक्सपर्ट होगा और वह ऐसी तकनीक इस्तेमाल करेगा, जिसे समझना हमारे लिए मुश्किल है। जबकि कई मामलों में अपराध बहुत साधारण तरीके से शुरू होता है। छोटी-सी लापरवाही, किसी व्यक्ति पर भरोसा या जानकारी शेयर करना आगे चलकर बड़ी समस्या बन सकता है। इन्वेस्टिगेशन में भी कई बार बड़ी सफलता किसी बहुत बड़े सुराग से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी चीजों को जोड़ने से मिलती है। सवाल: राजकुमार हिरानी के बाद आपका जुड़ाव नीरज पांडे से भी हुआ। दोनों के काम करने के तरीके में क्या अंतर महसूस किया? जवाब: दोनों की अपनी अलग स्टोरीटेलिंग लैंग्वेज है। नीरज सर थ्रिल और सस्पेंस को बहुत मजबूत तरीके से बिल्ड करते हैं। उनके साथ काम करते हुए यह ध्यान रहता है कि दर्शक लगातार अगला मोड़ जानना चाहे। राजू सर का तरीका थोड़ा अलग है। वे गंभीर विषय में भी ह्यूमन इमोशन, ह्यूमर और रिश्तों की परतें तलाशते हैं। लेकिन एक चीज दोनों में समान है- दोनों कहानी को विश्वसनीय बनाना चाहते हैं। खासकर जब विषय साइबर क्राइम हो तो तकनीकी चीजें सही होना बहुत जरूरी है। सवाल: नीरज पांडे की ‘हैक क्राइम्स ऑनलाइन’ में साइबर क्राइम को पर्दे पर उतारना कितना चुनौतीपूर्ण था? जवाब: सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि साइबर क्राइम को बहुत तकनीकी भी न बना दें और इतना सरल भी न कर दें कि वह अविश्वसनीय लगे। अगर आप सिर्फ कंप्यूटर स्क्रीन, कोड या टेक्निकल शब्द दिखाएंगे तो आम दर्शक कहानी से जुड़ नहीं पाएगा। इसलिए यह जरूरी है कि टेक्नोलॉजी के साथ इंसान की कहानी भी दिखाई जाए- अपराधी ऐसा क्यों कर रहा है, पीड़ित कैसे फंसता है और जांच करने वाला किस तरह चीजों को जोड़ता है। यही संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है। सवाल: आपकी इन्वेस्टिगेशन में ऐसा कौन-सा केस रहा, जो आपको आज भी याद है? जवाब: किडनैपिंग का एक केस काफी दिलचस्प था। उसमें डिजिटल लोकेशन और दूसरी ऑनलाइन जानकारियों को जोड़कर पुलिस उस व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी। बीच में लोकेशन से जुड़ी जानकारी बदलती रही, जिससे जांच मुश्किल हुई। लेकिन अलग-अलग डिजिटल संकेतों को जोड़ते हुए पुलिस आगे बढ़ती रही। आखिरकार उस व्यक्ति को सुरक्षित बरामद किया गया। इस तरह के मामलों में टेक्नोलॉजी अकेले काम नहीं करती। टेक्नोलॉजी से मिले संकेतों को सही तरीके से समझना और उन्हें ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन से जोड़ना भी उतना ही जरूरी है। सवाल: यानी अपराधी अपनी डिजिटल मौजूदगी छिपाने की कोशिश करे, फिर भी कुछ न कुछ सुराग बच जाता है? जवाब: डिजिटल दुनिया में पूरी तरह गायब होना आसान नहीं है। हम फोन, ईमेल, सोशल मीडिया, क्लाउड और कई दूसरी सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। इन सबके बीच कहीं न कहीं डिजिटल फुटप्रिंट बनते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर केस तुरंत सुलझ जाएगा। कई बार एक सुराग दूसरे सुराग से जुड़ता है और फिर धीरे-धीरे पूरी तस्वीर सामने आती है। इन्वेस्टिगेशन में धैर्य बहुत जरूरी है। सवाल: एक्ट्रेस के इंस्टाग्राम अकाउंट से फॉलोअर्स गायब होने वाला मामला भी काफी अलग था। आखिर उसमें क्या हुआ? जवाब : उस एक्ट्रेस की डिजिटल पहचान के साथ छेड़छाड़ हुई थी। अकाउंट का नाम और पहचान बदलने के बाद स्थिति ऐसी बन गई कि पुराना अकाउंट अलग रूप में दिखाई देने लगा। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि उनके पुराने फॉलोअर्स उसी डिजिटल पहचान से जुड़े हुए थे। हमने अलग-अलग डिजिटल सुरागों और अकाउंट से जुड़ी जानकारियों को जोड़कर पुराने अकाउंट तक पहुंचने का रास्ता निकाला। इस केस से यह समझ आता है कि सोशल मीडिया अकाउंट सिर्फ एक यूजरनेम और पासवर्ड नहीं है। उसके पीछे आपकी पूरी डिजिटल पहचान और वर्षों की मेहनत जुड़ी होती है। सवाल: क्या सेलिब्रिटी के सोशल मीडिया अकाउंट पर आम यूजर के मुकाबले ज्यादा खतरा रहता है? जवाब: खतरा इसलिए ज्यादा
अमित दुबे की साइबर कहानियां पहुंचीं हिरानी-नीरज पांडे तक:बोले- क्रिमिनल डिवाइस नहीं, पहले इंसान को हैक करता है, ऐसे बचें साइबर ठगी से

साइबर क्राइम एक्सपर्ट और नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अमित दुबे ने करियर में ऐसे कई मामलों की जांच की है, जो किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थे। उनकी वास्तविक इन्वेस्टिगेशन की कहानियां राजकुमार हिरानी की वेब सीरीज ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ और नीरज पांडे की ‘हैक क्राइम्स ऑनलाइन’ तक पहुंचीं। एटीएम चोरी, किडनैपिंग और एक एक्ट्रेस के इंस्टाग्राम अकाउंट से फॉलोअर्स गायब होने जैसे मामलों से अमित ने साइबर क्राइम की बदलती दुनिया को करीब से देखा है। उनका कहना है कि अपराधी हर बार डिवाइस को हैक नहीं करता, कई बार पहले इंसान के भरोसे को हैक करता है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में अमित ने साइबर क्राइम की अपनी इन्वेस्टिगेशन, फिल्ममेकर्स के साथ काम करने के अनुभव और आम लोगों के लिए जरूरी सावधानियों पर खुलकर बात की। सवाल: आपकी वास्तविक साइबर इन्वेस्टिगेशन राजकुमार हिरानी की वेब सीरीज तक पहुंची। उनसे यह कनेक्शन कैसे बना? जवाब: कोविड के दौरान राजू सर से मेरा कनेक्शन हुआ। उस समय साइबर क्राइम को लेकर हमारी बातचीत शुरू हुई और फिर वीडियो कॉल पर कई बार चर्चा हुई। मैंने उन्हें अपने काम और अलग-अलग इन्वेस्टिगेशन से जुड़ी कहानियां बताईं। उन्हें लगा कि इन केसों में सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि इंसानी व्यवहार और भावनाओं की भी काफी संभावनाएं हैं। इसके बाद हमने इन कहानियों पर काम करना शुरू किया। यह कोई छोटा प्रोसेस नहीं था। 6 साल तक कहानी और स्क्रिप्ट पर काम हुआ, कई ड्राफ्ट तैयार हुए और चीजों को लगातार बेहतर किया गया। सवाल: ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ में एटीएम चोरी वाला सीन भी है। क्या यह आपके किसी वास्तविक केस से जुड़ा है? जवाब: हां, एटीएम चोरी का मामला मेरे वास्तविक अनुभवों से जुड़ा है। साइबर क्राइम की इन्वेस्टिगेशन में कई बार कोई केस शुरुआत में बहुत जटिल दिखाई देता है। आपको लगता है कि इसके पीछे बहुत हाईटेक तरीका होगा, लेकिन जब आप घटनाओं के पैटर्न और डिजिटल फुटप्रिंट को जोड़ते हैं तो तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगती है। यही चीज इस केस में भी थी। वास्तविक घटना को स्क्रीन पर उसी रूप में रखना संभव नहीं होता, इसलिए कहानी के हिसाब से उसमें बदलाव किए जाते हैं, लेकिन उसका बेस और इन्वेस्टिगेशन का अनुभव वास्तविक होता है। सवाल: इस केस से आम लोगों के लिए भी एक सीख निकलती है कि साइबर क्राइम हमेशा बहुत हाईटेक नहीं होता, क्या कहना चाहेंगे? जवाब: बिल्कुल। हम अक्सर मान लेते हैं कि साइबर क्रिमिनल कोई बहुत बड़ा कंप्यूटर एक्सपर्ट होगा और वह ऐसी तकनीक इस्तेमाल करेगा, जिसे समझना हमारे लिए मुश्किल है। जबकि कई मामलों में अपराध बहुत साधारण तरीके से शुरू होता है। छोटी-सी लापरवाही, किसी व्यक्ति पर भरोसा या जानकारी शेयर करना आगे चलकर बड़ी समस्या बन सकता है। इन्वेस्टिगेशन में भी कई बार बड़ी सफलता किसी बहुत बड़े सुराग से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी चीजों को जोड़ने से मिलती है। सवाल: राजकुमार हिरानी के बाद आपका जुड़ाव नीरज पांडे से भी हुआ। दोनों के काम करने के तरीके में क्या अंतर महसूस किया? जवाब: दोनों की अपनी अलग स्टोरीटेलिंग लैंग्वेज है। नीरज सर थ्रिल और सस्पेंस को बहुत मजबूत तरीके से बिल्ड करते हैं। उनके साथ काम करते हुए यह ध्यान रहता है कि दर्शक लगातार अगला मोड़ जानना चाहे। राजू सर का तरीका थोड़ा अलग है। वे गंभीर विषय में भी ह्यूमन इमोशन, ह्यूमर और रिश्तों की परतें तलाशते हैं। लेकिन एक चीज दोनों में समान है- दोनों कहानी को विश्वसनीय बनाना चाहते हैं। खासकर जब विषय साइबर क्राइम हो तो तकनीकी चीजें सही होना बहुत जरूरी है। सवाल: नीरज पांडे की ‘हैक क्राइम्स ऑनलाइन’ में साइबर क्राइम को पर्दे पर उतारना कितना चुनौतीपूर्ण था? जवाब: सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि साइबर क्राइम को बहुत तकनीकी भी न बना दें और इतना सरल भी न कर दें कि वह अविश्वसनीय लगे। अगर आप सिर्फ कंप्यूटर स्क्रीन, कोड या टेक्निकल शब्द दिखाएंगे तो आम दर्शक कहानी से जुड़ नहीं पाएगा। इसलिए यह जरूरी है कि टेक्नोलॉजी के साथ इंसान की कहानी भी दिखाई जाए- अपराधी ऐसा क्यों कर रहा है, पीड़ित कैसे फंसता है और जांच करने वाला किस तरह चीजों को जोड़ता है। यही संतुलन सबसे महत्वपूर्ण है। सवाल: आपकी इन्वेस्टिगेशन में ऐसा कौन-सा केस रहा, जो आपको आज भी याद है? जवाब: किडनैपिंग का एक केस काफी दिलचस्प था। उसमें डिजिटल लोकेशन और दूसरी ऑनलाइन जानकारियों को जोड़कर पुलिस उस व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी। बीच में लोकेशन से जुड़ी जानकारी बदलती रही, जिससे जांच मुश्किल हुई। लेकिन अलग-अलग डिजिटल संकेतों को जोड़ते हुए पुलिस आगे बढ़ती रही। आखिरकार उस व्यक्ति को सुरक्षित बरामद किया गया। इस तरह के मामलों में टेक्नोलॉजी अकेले काम नहीं करती। टेक्नोलॉजी से मिले संकेतों को सही तरीके से समझना और उन्हें ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन से जोड़ना भी उतना ही जरूरी है। सवाल: यानी अपराधी अपनी डिजिटल मौजूदगी छिपाने की कोशिश करे, फिर भी कुछ न कुछ सुराग बच जाता है? जवाब: डिजिटल दुनिया में पूरी तरह गायब होना आसान नहीं है। हम फोन, ईमेल, सोशल मीडिया, क्लाउड और कई दूसरी सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। इन सबके बीच कहीं न कहीं डिजिटल फुटप्रिंट बनते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर केस तुरंत सुलझ जाएगा। कई बार एक सुराग दूसरे सुराग से जुड़ता है और फिर धीरे-धीरे पूरी तस्वीर सामने आती है। इन्वेस्टिगेशन में धैर्य बहुत जरूरी है। सवाल: एक्ट्रेस के इंस्टाग्राम अकाउंट से फॉलोअर्स गायब होने वाला मामला भी काफी अलग था। आखिर उसमें क्या हुआ? जवाब : उस एक्ट्रेस की डिजिटल पहचान के साथ छेड़छाड़ हुई थी। अकाउंट का नाम और पहचान बदलने के बाद स्थिति ऐसी बन गई कि पुराना अकाउंट अलग रूप में दिखाई देने लगा। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि उनके पुराने फॉलोअर्स उसी डिजिटल पहचान से जुड़े हुए थे। हमने अलग-अलग डिजिटल सुरागों और अकाउंट से जुड़ी जानकारियों को जोड़कर पुराने अकाउंट तक पहुंचने का रास्ता निकाला। इस केस से यह समझ आता है कि सोशल मीडिया अकाउंट सिर्फ एक यूजरनेम और पासवर्ड नहीं है। उसके पीछे आपकी पूरी डिजिटल पहचान और वर्षों की मेहनत जुड़ी होती है। सवाल: क्या सेलिब्रिटी के सोशल मीडिया अकाउंट पर आम यूजर के मुकाबले ज्यादा खतरा रहता है? जवाब: खतरा इसलिए ज्यादा






