Wednesday, 05 Aug 2026 | 08:14 AM

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कमीशन के लिए निवेश प्रोडक्ट प्रमोट करते हैं इन्फ्लुएंसर्स:आपकी कमाई बढ़े या न बढ़े; ये 5 आदतें बचत जरूर बढ़ा सकती हैं

कमीशन के लिए निवेश प्रोडक्ट प्रमोट करते हैं इन्फ्लुएंसर्स:आपकी कमाई बढ़े या न बढ़े; ये 5 आदतें बचत जरूर बढ़ा सकती हैं

पैसा बचाने और खर्च करने को लेकर सही आदतें आखिर कैसी होनी चाहिए? यूके यानी ब्रिटेन के सबसे बड़े बैंक लॉयड्स बैंकिंग ग्रुप के सीईओ चार्ली नन पांच सीधे-सरल टिप्स से सुलझा रहे हैं पैसों को लेकर आपकी उलझन… यूके के हर चार में से एक करंट अकाउंट लॉयड्स बैंकिंग ग्रुप में है। इसकी वजह से नन के पास ग्राहकों के खर्च, बचत और कर्ज लेने की आदतों की गहरी समझ है। नन ने बचत को ऑटोमैटिक बनाने, रिश्तों में पैसों पर खुलकर बातें करने, बच्चों को पॉकेट मनी देने, खरीदारी से पहले ठहरकर सोचने और सोशल मीडिया पर निवेश की सलाह देने वाले इन्फ्लुएंसर से सावधान रहने की सलाह दी है। ये पांचों टिप्स आम आदमी की रोजमर्रा की पैसों से जुड़ी उलझनें हल करने में मदद कर सकते हैं। ये जरूर करें – सैलरी अकाउंट से एक तय रकम अलग खाते में ऐसी जगह रखें जहां तक आसानी से आपके हाथ न पहुंचे, यह तरीका साल-दर-साल आपकी बचत बढ़ाता जाएगा 1. पति/पत्नी, बच्चों से पैसों की बात करें मैं और मेरी पत्नी एक साझा खाता चलाते हैं। पैसों के मामले में एक-दूसरे से पूरी पारदर्शिता रखते हैं। मेरा मानना है कि किसी रिश्ते में सबसे बड़ा खतरे का संकेत सामने वाले का पैसों को लेकर लापरवाह होना है। मैं हमेशा से पैसों को लेकर सतर्क रहा हूं। यह सोच बचपन से है। माता-पिता के तलाक के बाद मां ने अकेले चार बच्चों को पाला। इस वजह से घर में खर्च को लेकर सोच-समझकर फैसले लिए जाते थे, चाहे वो राशन के इंतजाम को लेकर हो या छुट्टियों की योजना बनाने के बारे में। 2. बच्चों को पॉकेट मनी देते रहिए हमारे बच्चे ‘पिता होने की वजह से’ मेरी सलाह ज्यादा नहीं सुनते। फिर भी मैंने बच्चों को पैसों की अहमियत समझाने की कोशिश की है। पॉकेट मनी देने से बच्चे बजट बनाना और अपनी सीमा में रहना सीखते हैं। मैं यह नहीं मानता कि युवा पीढ़ी पैसों को लेकर गैरजिम्मेदार है। असल में आजकल की पीढ़ी को ऑनलाइन दुनिया में सही, गलत जानकारियों और दबाव की भरमार का सामना करना पड़ता है। इससे बचने का तरीका यह है कि किसी भी लेन-देन को लेकर शक हो तो सवाल जरूर करें। 3. सेविंग को ऑटोमैटिक बनाएं, ताकि टाल न सकें बचत का सरल तरीका है इसे ऑटोमैटिक बना देना, ताकि हर महीने बचत एक फैसला या टालने वाला काम न बने। सैलरी से एक तय रकम अलग खाते में ऐसी जगह रखें जहां, तक आसानी से हाथ न पहुंचे। यही बचत की आदत डालने का सबसे आसान रास्ता है। 4. हर खरीदारी से पहले थोड़ा ठहरकर सोचें मेरी सबसे बड़ी चिंता धोखाधड़ी है। बहुत से लोग सोशल मीडिया और ऑनलाइन मार्केटप्लेस के जरिए निशाना बन रहे हैं। टेक्नोलॉजी में माहिर होने के बावजूद युवा स्कैम के प्रति बुजुर्गों के मुकाबले कहीं ज्यादा संवेदनशील हैं। हर खरीदारी से पहले थोड़ा ठहरकर सोचें। कहीं भी पैसे भेजने से पहले खुद से पूछें कि क्या सामने वाले पर भरोसा किया जा सकता है। जरा भी शक हो, तो जानकारी लेने के लिए उपलब्ध टूल्स इस्तेमाल करें या सीधे बैंक को कॉल करके पुष्टि करें। 5. फिनफ्लुएंसर्स से हमेशा सावधान रहें सोशल मीडिया पैसों की समझ बढ़ाने में मददगार हो सकता है, लेकिन फिनफ्लुएंसर्स को लेकर मुझे गहरी चिंता है, जो जोखिम भरे प्रोडक्ट्स को बढ़ावा देते हैं। इन्फ्लुएंसर्स को किसी खास क्रिप्टो कॉइन, मीम कॉइन या निवेश प्रोडक्ट को प्रमोट करने के पैसे मिलते हैं, न कि लोगों को सही निवेश विकल्प चुनने में मदद करने के लिए। जिनके पास ज्यादा पैसा नहीं है, उन्हें ऐसा जोखिम नहीं लेना चाहिए, जिसमें पैसा डूब सकता है। उन्हें सरल विकल्प अपनाने चाहिए। ये तरीके आजमा सकते हैं – स्टैंडिंग ऑर्डर (बैंक द्वारा तय तारीख पर अपने-आप पैसे ट्रांसफर करने की सुविधा) सेट कर सकते हैं। – पैसों को अलग-अलग लिफाफों में बांटा जा सकता है, या राउंड-अप टूल्स (खर्च के बाद बचे हुए छुट्टे पैसे अपने-आप बचत खाते में भेजने वाला टूल) इस्तेमाल किए जा सकते हैं। – थोड़ा बचाएं, जल्द बचाएं, नियमित बचाएं। मैं खुद बजट बनाना पसंद नहीं करता; वेतन आते ही अकाउंट देखकर तय कर लेता हूं कि कितनी रकम बचत में डालना है, और यह काम जल्द से जल्द निपटाता हूं। – इमरजेंसी फंड बनाएं- अचानक आने वाले खर्चों, मसलन गाड़ी या घर की मरम्मत के लिए हो सके तो एक से तीन महीने की सैलरी के बराबर एक फंड हमेशा अलग रखें। (साभार – बीबीसी वर्ल्ड)

चीन में फूड डिलीवरी ब्वॉय को सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान:खाना पहुंचाते समय लिखी कई कविताएं; 14 साल में पढ़ाई छूट गई थी

चीन में फूड डिलीवरी ब्वॉय को सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान:खाना पहुंचाते समय लिखी कई कविताएं; 14 साल में पढ़ाई छूट गई थी

चीन में फूड डिलीवरी का काम करने वाले 56 वर्षीय वांग जिबिंग को देश के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मानों में से एक लू शुन साहित्य पुरस्कार मिला है। उनकी कविता संग्रह ‘लो फ्लाइट’ को यह सम्मान दिया गया है। इस किताब की कई कविताएं उन्होंने फूड डिलीवरी के बीच मिले खाली समय में कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों पर लिखी थीं। वांग 2019 के आसपास फूड डिलीवरी राइडर बने थे। उनकी कविताएं सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हुए। उनकी नई किताब ‘लो फ्लाइट’ डिलीवरी राइडर्स की रोजमर्रा की परेशानियों, संघर्ष और जीवन पर आधारित है। यह किताब उन्होंने 2024 में प्रकाशित की थी। इसके लिए उन्होंने करीब 200 डिलीवरी राइडर्स से बातचीत की और उनके अनुभवों को अपनी कविताओं में दर्ज किया। उनकी एक कविता की पंक्ति है, “किसने कहा कि पंख फैलाने का मतलब सिर्फ ऊंची उड़ान भरना है? नीचे उड़ना भी उड़ान ही है।” वांग का जन्म चीन के जियांगसू प्रांत में हुआ था। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें 14 साल की उम्र में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने निर्माण मजदूर, कबाड़ बीनने वाले और सड़क किनारे सामान बेचने जैसे कई छोटे-मोटे काम किए। बाद में वे फूड डिलीवरी राइडर बन गए। हालांकि, पढ़ने-लिखने का उनका शौक कभी खत्म नहीं हुआ। एक कविता से मिली पहचान 2022 में उनकी कविता ‘मैन इन ए हरी’ सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी। यह कविता 2019 की एक घटना से प्रेरित थी। उस समय वह जियांगसू के कुनशान शहर में फूड डिलीवरी का काम कर रहे थे। एक ग्राहक ने गलत पता दर्ज कर दिया था। सही घर ढूंढने के लिए वांग को तीन रिहायशी इमारतों में भटकना पड़ा और 18 मंजिल तक सीढ़ियां चढ़नी पड़ीं। जब वह आखिरकार खाना लेकर पहुंचे तो ग्राहक ने देर होने पर उन्हें डांट दिया। घर लौटते समय उन्होंने अपनी नाराजगी और दर्द को शब्दों में ढाल दिया। इसी से उनकी कविता ‘मैन इन ए हरी’ जन्मी। यह कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। यही से उनके साहित्यिक सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद 2023 में उनका पहला कविता संग्रह ‘मैन इन ए हरी: पोएम्स ऑफ ए फूड डिलीवरी राइडर’ प्रकाशित हुआ। पुरस्कार मिलने के बाद भी नौकरी नहीं छोड़ेंगे पुरस्कार जीतने के बाद वांग ने सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स से कहा कि पुरस्कार मिलने की खबर आने तक वे बेहद घबराए हुए थे। उन्होंने बताया कि मीडिया का बढ़ता ध्यान उनके लिए मानसिक दबाव भी लेकर आया। उन्होंने साफ किया कि पुरस्कार मिलने के बावजूद वे अपनी नौकरी नहीं छोड़ेंगे। उनका कहना है कि वे 60 साल की उम्र तक फूड डिलीवरी का काम जारी रखना चाहते हैं। वांग ने कहा, अब मुझे जीवनयापन के लिए इस नौकरी की जरूरत नहीं है, लेकिन मुझे यह काम पसंद है। इससे मैं सक्रिय और फिट रहता हूं। मैं जमीन से जुड़ी जिंदगी जीना चाहता हूं और यह पुरस्कार मुझे नहीं बदलेगा। चीन में बढ़ रही है मजदूर लेखकों की पहचान वांग जिबिंग उन ब्लू-कॉलर कामगारों की नई पीढ़ी का हिस्सा हैं, जिन्हें हाल के कुछ साल में उनके साहित्यिक लेखन के लिए पहचान मिली है। उनकी रचनाएं चीन की तेजी से बढ़ती गिग इकोनॉमी में काम करने वाले लाखों लोगों के संघर्ष, दबाव और जीवन की सच्चाई को सामने लाती हैं। साल 2023 में पूर्व डिलीवरी कर्मी हू आनयान की आत्मकथा ‘आई डिलीवर पार्सल्स इन बीजिंग’ प्रकाशित हुई थी। यह किताब चीन में बेस्टसेलर बनी और विदेशों में भी चर्चा का विषय रही। पिछले साल इसका अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। इसी तरह 2017 में प्रवासी मजदूर फान यूसु का आत्मकथात्मक लेख ‘आई एम फान यूसु’ चीन में इंटरनेट पर जबरदस्त वायरल हुआ था। इसे इतनी बड़ी प्रतिक्रिया मिली कि लगातार मीडिया की भीड़ से बचने के लिए फान को कुछ समय के लिए अपना घर तक छोड़ना पड़ा। लू शुन पुरस्कार चीन का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान वांग जिबिंग को जिस लू शुन साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, उसका नाम चीन के महान साहित्यकार लू शुन के नाम पर रखा गया है। उन्हें 20वीं सदी के चीन का सबसे प्रभावशाली लेखक माना जाता है। उन्होंने अपने व्यंग्यात्मक उपन्यासों और कहानियों के जरिए पारंपरिक चीनी समाज की कमियों और सामाजिक बुराइयों पर हमला बोला। लू शुन साहित्य पुरस्कार का आयोजन चाइना राइटर्स एसोसिएशन करता है। यह पुरस्कार हर चार साल में दिया जाता है और इसे चीन के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मानों में गिना जाता है। इसकी शुरुआत समकालीन चीनी साहित्य की उत्कृष्ट रचनाओं को सम्मानित करने के लिए की गई थी। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, यह पुरस्कार लंबे समय से चीन के मुख्यधारा के साहित्य का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता रहा है और साहित्य जगत में इसका खास महत्व है।

चीन में फूड डिलीवरी ब्वॉय को सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान:खाना पहुंचाते समय लिखी कई कविताएं; 14 साल में पढ़ाई छूट गई थी

चीन में फूड डिलीवरी ब्वॉय को सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान:खाना पहुंचाते समय लिखी कई कविताएं; 14 साल में पढ़ाई छूट गई थी

चीन में फूड डिलीवरी का काम करने वाले 56 वर्षीय वांग जिबिंग को देश के सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मानों में से एक लू शुन साहित्य पुरस्कार मिला है। उनकी कविता संग्रह ‘लो फ्लाइट’ को यह सम्मान दिया गया है। इस किताब की कई कविताएं उन्होंने फूड डिलीवरी के बीच मिले खाली समय में कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों पर लिखी थीं। वांग 2019 के आसपास फूड डिलीवरी राइडर बने थे। उनकी कविताएं सोशल मीडिया पर काफी लोकप्रिय हुए। उनकी नई किताब ‘लो फ्लाइट’ डिलीवरी राइडर्स की रोजमर्रा की परेशानियों, संघर्ष और जीवन पर आधारित है। यह किताब उन्होंने 2024 में प्रकाशित की थी। इसके लिए उन्होंने करीब 200 डिलीवरी राइडर्स से बातचीत की और उनके अनुभवों को अपनी कविताओं में दर्ज किया। उनकी एक कविता की पंक्ति है, “किसने कहा कि पंख फैलाने का मतलब सिर्फ ऊंची उड़ान भरना है? नीचे उड़ना भी उड़ान ही है।” वांग का जन्म चीन के जियांगसू प्रांत में हुआ था। आर्थिक तंगी के कारण उन्हें 14 साल की उम्र में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी। इसके बाद उन्होंने निर्माण मजदूर, कबाड़ बीनने वाले और सड़क किनारे सामान बेचने जैसे कई छोटे-मोटे काम किए। बाद में वे फूड डिलीवरी राइडर बन गए। हालांकि, पढ़ने-लिखने का उनका शौक कभी खत्म नहीं हुआ। एक कविता से मिली पहचान 2022 में उनकी कविता ‘मैन इन ए हरी’ सोशल मीडिया पर वायरल हो गई थी। यह कविता 2019 की एक घटना से प्रेरित थी। उस समय वह जियांगसू के कुनशान शहर में फूड डिलीवरी का काम कर रहे थे। एक ग्राहक ने गलत पता दर्ज कर दिया था। सही घर ढूंढने के लिए वांग को तीन रिहायशी इमारतों में भटकना पड़ा और 18 मंजिल तक सीढ़ियां चढ़नी पड़ीं। जब वह आखिरकार खाना लेकर पहुंचे तो ग्राहक ने देर होने पर उन्हें डांट दिया। घर लौटते समय उन्होंने अपनी नाराजगी और दर्द को शब्दों में ढाल दिया। इसी से उनकी कविता ‘मैन इन ए हरी’ जन्मी। यह कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। यही से उनके साहित्यिक सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद 2023 में उनका पहला कविता संग्रह ‘मैन इन ए हरी: पोएम्स ऑफ ए फूड डिलीवरी राइडर’ प्रकाशित हुआ। इस किताब की एक कविता में वह लिखते हैं, सड़क पर दौड़ता हर आम इंसान अपने हाथ में एक छोटी-सी रोशनी लिए चलता है। यही रोशनी पहले हमें रास्ता दिखाती है और फिर धीरे-धीरे पूरी दुनिया को रोशन कर देती है। 6 हजार से ज्यादा कविताएं लिख चुके वांग अब तक वह 6 हजार से अधिक कविताएं लिख चुके हैं। उनकी कई रचनाएं प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। वांग कहते हैं, “लोग शायद मुझे याद न रखें, लेकिन उन्हें तेज रफ्तार से गुजरता एक फूड डिलीवरी राइडर जरूर याद रहता है।” यही सोच उन्हें लाखों डिलीवरी कर्मियों की जिंदगी पर किताब लिखने की प्रेरणा बनी। वांग का कहना है, मैं चाहता हूं कि इस किताब को पढ़ने के बाद लोग डिलीवरी राइडर्स के प्रति ज्यादा समझदारी और धैर्य दिखाएं, ताकि उनके साथ होने वाले विवाद कम हों। पुरस्कार मिलने के बाद भी नौकरी नहीं छोड़ेंगे पुरस्कार जीतने के बाद वांग ने सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स से कहा कि पुरस्कार मिलने की खबर आने तक वे बेहद घबराए हुए थे। उन्होंने बताया कि मीडिया का बढ़ता ध्यान उनके लिए मानसिक दबाव भी लेकर आया। उन्होंने साफ किया कि पुरस्कार मिलने के बावजूद वे अपनी नौकरी नहीं छोड़ेंगे। उनका कहना है कि वे 60 साल की उम्र तक फूड डिलीवरी का काम जारी रखना चाहते हैं। वांग ने कहा, अब मुझे जीवनयापन के लिए इस नौकरी की जरूरत नहीं है, लेकिन मुझे यह काम पसंद है। इससे मैं सक्रिय और फिट रहता हूं। मैं जमीन से जुड़ी जिंदगी जीना चाहता हूं और यह पुरस्कार मुझे नहीं बदलेगा। चीन में बढ़ रही है मजदूर लेखकों की पहचान वांग जिबिंग उन ब्लू-कॉलर कामगारों की नई पीढ़ी का हिस्सा हैं, जिन्हें हाल के कुछ साल में उनके साहित्यिक लेखन के लिए पहचान मिली है। उनकी रचनाएं चीन की तेजी से बढ़ती गिग इकोनॉमी में काम करने वाले लाखों लोगों के संघर्ष, दबाव और जीवन की सच्चाई को सामने लाती हैं। साल 2023 में पूर्व डिलीवरी कर्मी हू आनयान की आत्मकथा ‘आई डिलीवर पार्सल्स इन बीजिंग’ प्रकाशित हुई थी। यह किताब चीन में बेस्टसेलर बनी और विदेशों में भी चर्चा का विषय रही। पिछले साल इसका अंग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ। इसी तरह 2017 में प्रवासी मजदूर फान यूसु का आत्मकथात्मक लेख ‘आई एम फान यूसु’ चीन में इंटरनेट पर जबरदस्त वायरल हुआ था। इसे इतनी बड़ी प्रतिक्रिया मिली कि लगातार मीडिया की भीड़ से बचने के लिए फान को कुछ समय के लिए अपना घर तक छोड़ना पड़ा। लू शुन चीन का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान वांग जिबिंग को जिस लू शुन साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, उसका नाम चीन के महान साहित्यकार लू शुन के नाम पर रखा गया है। उन्हें 20वीं सदी के चीन का सबसे प्रभावशाली लेखक माना जाता है। उन्होंने अपने व्यंग्यात्मक उपन्यासों और कहानियों के जरिए पारंपरिक चीनी समाज की कमियों और सामाजिक बुराइयों पर हमला बोला। लू शुन साहित्य पुरस्कार का आयोजन चाइना राइटर्स एसोसिएशन करता है। यह पुरस्कार हर चार साल में दिया जाता है और इसे चीन के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मानों में गिना जाता है। इसकी शुरुआत समकालीन चीनी साहित्य की उत्कृष्ट रचनाओं को सम्मानित करने के लिए की गई थी। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, यह पुरस्कार लंबे समय से चीन के मुख्यधारा के साहित्य का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता रहा है और साहित्य जगत में इसका खास महत्व है।

अर्जुन कपूर और साहिबा बाली भारत-इंग्लैंड का मैच देखने पहुंचे:डेटिंग की खबरों पर एक्ट्रेस ने दिया रिएक्शन, अनुष्का शर्मा समझ बैठे थे लोग

अर्जुन कपूर और साहिबा बाली भारत-इंग्लैंड का मैच देखने पहुंचे:डेटिंग की खबरों पर एक्ट्रेस ने दिया रिएक्शन, अनुष्का शर्मा समझ बैठे थे लोग

बॉलीवुड एक्टर अर्जुन कपूर और एक्ट्रेस साहिबा बाली रविवार को लंदन के लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड में एक साथ देखा गया। दोनों वहां भारत और इंग्लैंड के बीच खेले जा रहे तीसरे वनडे मैच को देखने पहुंचे थे। स्टेडियम से दोनों की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर उनके डेटिंग की चर्चा शुरू हो गई। अब साहिबा बाली ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अर्जुन कपूर के साथ एक फोटो शेयर करते हुए इन अफवाहों पर प्रतिक्रिया दी है। साहिबा ने एक मैसेज लिखकर फैंस से ऐसी खबरों पर भरोसा न करने की बात कही है। स्टोरी पर लिखा- ‘हर बात पर भरोसा मत करो’ साहिबा बाली ने अपने इंस्टाग्राम स्टोरीज पर लॉर्ड्स स्टेडियम की एक तस्वीर शेयर की है, जिसमें वे अर्जुन कपूर के साथ पोज देती नजर आ रही हैं। इस तस्वीर के साथ साहिबा ने सीधे तौर पर अफेयर की खबरों को खारिज नहीं किया, बल्कि एक अलग अंदाज में लिखा, ‘डोंट बिलीव एवरीथिंग पार्ट 2’ (हर बात पर भरोसा मत करो)। साहिबा की इस पोस्ट से साफ है कि वे अपने और अर्जुन के रिश्ते को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहे दावों को गलत बता रही हैं। अनुष्का शर्मा समझ बैठे थे लोग साहिबा ने अपनी पोस्ट में ‘पार्ट 2’ लिखने की वजह भी साफ की है। दरअसल, अर्जुन कपूर के साथ फोटो शेयर करने से ठीक पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट का स्क्रीनशॉट शेयर किया था। उस पोस्ट में किसी यूजर ने साहिबा को भूल से विराट कोहली की पत्नी और एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा समझ लिया था। इस गलती पर रिएक्शन देते हुए साहिबा ने पहले लिखा था, ‘डोंट बिलीव एवरीथिंग पार्ट 1’। इसके तुरंत बाद उन्होंने अर्जुन के साथ वाली फोटो पोस्ट की और उसे पार्ट 2 नाम दिया। इम्तियाज अली की फिल्म से किया था डेब्यू साहिबा बाली ने साल 2018 में इम्तियाज अली की रोमांटिक ड्रामा फिल्म ‘लैला मजनू’ से बॉलीवुड में अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद वे ‘बार्ड ऑफ ब्लड’, ‘अमर सिंह चमकीला’ और ‘तनाव’ जैसी चर्चित वेब सीरीज और फिल्मों में नजर आ चुकी हैं। एक्टिंग के अलावा साहिबा सोशल मीडिया पर कंटेंट क्रिएशन, पॉडकास्ट और ब्रैंड एंडोर्समेंट के लिए भी जानी जाती हैं, जहां उनकी अच्छी खासी फैन फॉलोइंग है। मलाइका अरोड़ा से 2024 में अलग हुए थे अर्जुन कपूर अर्जुन कपूर के पर्सनल लाइफ की बात करें तो वे लंबे समय तक मलाइका अरोड़ा के साथ रिलेशनशिप में थे। दोनों ने साल 2018 में एक-दूसरे को डेट करना शुरू किया था। वे बॉलीवुड के सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले कपल्स में से एक थे। करीब 6 साल तक साथ रहने के बाद साल 2024 में दोनों के अलग होने की खबरें सामने आई थीं। इसके बाद से अर्जुन कपूर का नाम किसी के साथ नहीं जुड़ा था, लेकिन लंदन में साहिबा के साथ दिखने पर फिर से कयास लगाए जाने लगे। हाल ही में फिल्म ‘मेरे हस्बैंड की बीवी’ में आए नजर वर्कफ्रंट पर अर्जुन कपूर को आखिरी बार साल 2025 में रिलीज हुई रोमांटिक कॉमेडी फिल्म ‘मेरे हस्बैंड की बीवी’ में देखा गया था। मुदस्सर अजीज के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म में उनके साथ भूमि पेडनेकर और रकुल प्रीत सिंह मुख्य भूमिकाओं में थीं। अर्जुन ने अभी अपने किसी नए प्रोजेक्ट की घोषणा नहीं की है।

अर्जुन कपूर और साहिबा बाली भारत-इंग्लैंड का मैच देखने पहुंचे:डेटिंग की खबरों पर एक्ट्रेस ने दिया रिएक्शन, अनुष्का शर्मा समझ बैठे थे लोग

अर्जुन कपूर और साहिबा बाली भारत-इंग्लैंड का मैच देखने पहुंचे:डेटिंग की खबरों पर एक्ट्रेस ने दिया रिएक्शन, अनुष्का शर्मा समझ बैठे थे लोग

बॉलीवुड एक्टर अर्जुन कपूर और एक्ट्रेस साहिबा बाली रविवार को लंदन के लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड में एक साथ देखा गया। दोनों वहां भारत और इंग्लैंड के बीच खेले जा रहे तीसरे वनडे मैच को देखने पहुंचे थे। स्टेडियम से दोनों की तस्वीरें सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर उनके डेटिंग की चर्चा शुरू हो गई। अब साहिबा बाली ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर अर्जुन कपूर के साथ एक फोटो शेयर करते हुए इन अफवाहों पर प्रतिक्रिया दी है। साहिबा ने एक मैसेज लिखकर फैंस से ऐसी खबरों पर भरोसा न करने की बात कही है। स्टोरी पर लिखा- ‘हर बात पर भरोसा मत करो’ साहिबा बाली ने अपने इंस्टाग्राम स्टोरीज पर लॉर्ड्स स्टेडियम की एक तस्वीर शेयर की है, जिसमें वे अर्जुन कपूर के साथ पोज देती नजर आ रही हैं। इस तस्वीर के साथ साहिबा ने सीधे तौर पर अफेयर की खबरों को खारिज नहीं किया, बल्कि एक अलग अंदाज में लिखा, ‘डोंट बिलीव एवरीथिंग पार्ट 2’ (हर बात पर भरोसा मत करो)। साहिबा की इस पोस्ट से साफ है कि वे अपने और अर्जुन के रिश्ते को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहे दावों को गलत बता रही हैं। अनुष्का शर्मा समझ बैठे थे लोग साहिबा ने अपनी पोस्ट में ‘पार्ट 2’ लिखने की वजह भी साफ की है। दरअसल, अर्जुन कपूर के साथ फोटो शेयर करने से ठीक पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट का स्क्रीनशॉट शेयर किया था। उस पोस्ट में किसी यूजर ने साहिबा को भूल से विराट कोहली की पत्नी और एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा समझ लिया था। इस गलती पर रिएक्शन देते हुए साहिबा ने पहले लिखा था, ‘डोंट बिलीव एवरीथिंग पार्ट 1’। इसके तुरंत बाद उन्होंने अर्जुन के साथ वाली फोटो पोस्ट की और उसे पार्ट 2 नाम दिया। इम्तियाज अली की फिल्म से किया था डेब्यू साहिबा बाली ने साल 2018 में इम्तियाज अली की रोमांटिक ड्रामा फिल्म ‘लैला मजनू’ से बॉलीवुड में अपने एक्टिंग करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद वे ‘बार्ड ऑफ ब्लड’, ‘अमर सिंह चमकीला’ और ‘तनाव’ जैसी चर्चित वेब सीरीज और फिल्मों में नजर आ चुकी हैं। एक्टिंग के अलावा साहिबा सोशल मीडिया पर कंटेंट क्रिएशन, पॉडकास्ट और ब्रैंड एंडोर्समेंट के लिए भी जानी जाती हैं, जहां उनकी अच्छी खासी फैन फॉलोइंग है। मलाइका अरोड़ा से 2024 में अलग हुए थे अर्जुन कपूर अर्जुन कपूर के पर्सनल लाइफ की बात करें तो वे लंबे समय तक मलाइका अरोड़ा के साथ रिलेशनशिप में थे। दोनों ने साल 2018 में एक-दूसरे को डेट करना शुरू किया था। वे बॉलीवुड के सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले कपल्स में से एक थे। करीब 6 साल तक साथ रहने के बाद साल 2024 में दोनों के अलग होने की खबरें सामने आई थीं। इसके बाद से अर्जुन कपूर का नाम किसी के साथ नहीं जुड़ा था, लेकिन लंदन में साहिबा के साथ दिखने पर फिर से कयास लगाए जाने लगे। हाल ही में फिल्म ‘मेरे हस्बैंड की बीवी’ में आए नजर वर्कफ्रंट पर अर्जुन कपूर को आखिरी बार साल 2025 में रिलीज हुई रोमांटिक कॉमेडी फिल्म ‘मेरे हस्बैंड की बीवी’ में देखा गया था। मुदस्सर अजीज के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म में उनके साथ भूमि पेडनेकर और रकुल प्रीत सिंह मुख्य भूमिकाओं में थीं। अर्जुन ने अभी अपने किसी नए प्रोजेक्ट की घोषणा नहीं की है।

'पाकिस्तान में घिर गए थे शायर निदा फाजली':कहा गया- बच्चे को अल्लाह से बड़ा बता रहे हो? अतुल गंगवार ने बताया क्या था जवाब

'पाकिस्तान में घिर गए थे शायर निदा फाजली':कहा गया- बच्चे को अल्लाह से बड़ा बता रहे हो? अतुल गंगवार ने बताया क्या था जवाब

दिवंगत शायर निदा फाजली के जीवन पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘मैं निदा’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में ‘बेस्ट आर्ट्स एंड कल्चर फिल्म’ का पुरस्कार मिला है। इस डॉक्यूमेंट्री के निर्माता अतुल गंगवार पिछले करीब ढाई दशक तक निदा फाजली के बेहद करीब रहे। उन्होंने सिर्फ उनके साथ काम ही नहीं किया, बल्कि उनकी निजी जिंदगी, संघर्ष, रिश्तों और सोच को भी बहुत करीब से देखा। दैनिक भास्कर से बातचीत में अतुल गंगवार ने निदा फाजली की निजी जिंदगी, पाकिस्तान में बसे परिवार, पिता से जुड़ा दर्द, जगजीत सिंह के साथ उनकी दोस्ती और उनकी जिंदगी के कई अनसुने किस्से शेयर किए। सवाल: निदा फाजली से आपकी पहली मुलाकात कब हुई थी? जवाब: पहली मुलाकात 1998 में हुई थी। हम ‘अदबी कॉकटेल’ नाम का एक शो बना रहे थे और उसके लेखक निदा साहब थे। उसी दौरान उन्होंने हमारी मुलाकात तलत अजीज साहब, मुकरी साहब (मोहम्मद उमर मुकरी) और कई बड़े कलाकारों से कराई। वहीं से हमारा रिश्ता शुरू हुआ, जो सालों तक चलता रहा। सवाल: आखिर कब लगा कि निदा फाजली की जिंदगी पर डॉक्यूमेंट्री बननी चाहिए? जवाब: उनके साथ काम करते-करते एहसास हुआ कि वह सिर्फ बड़े शायर नहीं, बल्कि बहुत बड़े इंसान भी थे। उनके जरिए मैं जॉनी वॉकर, टुनटुन, हसन कमाल, जावेद सिद्दीकी, राकेश बेदी और कई दिग्गजों से मिला। उन्होंने मुझे जिंदगी को देखने का नजरिया दिया। तभी लगा कि उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचनी चाहिए। सवाल: निदा फाजली के परिवार का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया था। क्या वह इस दर्द के बारे में आपसे बात करते थे? जवाब: निजी तौर पर वह इस बारे में बहुत कम बात करते थे, लेकिन जो कहना होता था, वह अपनी शायरी में कह देते थे। अपने पिता के इंतकाल के बाद, जब वह उनके जनाजे में शामिल नहीं हो पाए, तब उन्होंने मशहूर नज्म ‘तुम्हारी कब्र पर मैं फातिहा पढ़ने नहीं आया’ लिखी। उसमें उनका पूरा दर्द दिखाई देता है। सवाल: निदा फाजली अपनी मां और पिता को किस तरह याद करते थे? जवाब: मां के लिए उन्होंने लिखा- ‘बेसन की सोंधी रोटी पे खट्टी चटनी जैसी मां।’ पिता के लिए उनकी नज्म आज भी पढ़िए तो आंखें नम हो जाती हैं, लेकिन बातचीत में वह कभी अतीत में नहीं जीते थे। उनका पूरा ध्यान वर्तमान और भविष्य पर रहता था। सवाल: निदा फाजली के साथ जुड़ा कोई ऐसा किस्सा जो आज भी याद हो? जवाब: एक बार मैं उनके घर गया तो उनके हाथ में चोट लगी थी। मैंने पूछा, “क्या हुआ?” हंसते हुए बोले, “मुशायरे में थक गया था। मंच पर पीछे टेंट समझकर टिक गया। पता चला पीछे कुछ नहीं था और सीधे नीचे गिर गया।” सबसे बड़ी बात यह थी कि वह खुद पर भी खुलकर हंस सकते थे। सवाल: निदा फाजली और जगजीत सिंह से जुड़ा कोई खास किस्सा जो आपको आज भी याद हो? जवाब: एक बार मुझे किसी बच्ची के लिए रिकमेंडेशन लेटर चाहिए था। निदा साहब ने एयरपोर्ट बुलाया। वहां जगजीत सिंह और के एस चित्रा भी मौजूद थे। मेरे पास खाली कागज था। निदा साहब ने वहीं तुरंत अपने हाथ से रिकमेंडेशन लिख दिया और जगजीत सिंह से उस पर साइन करवा दिए। उनकी हाजिरजवाबी और समझ कमाल की थी। एक बार का किस्सा मुझे बहुत अच्छे से याद है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के मेरे एक प्रोफेसर थे। उनकी भतीजी के कुछ डॉक्यूमेंट्स पर साइन कराने थे। एक तरह का एप्रिसिएशन उनके लिए कि वो बच्ची बहुत अच्छा गाती है। तो मैंने निदा साहब से बात की। वो बोले, “मैं दिल्ली आ रहा हूं, तो तुम एयरपोर्ट मुझसे मिलने आ जाओ।” मैं वहां पहुंचा तो देखा कि साथ में जगजीत सिंह जी, चित्रा जी और निदा साहब तो थे ही। मैंने उनसे कहा, “जी, वो चिट्ठी चाहिए आपसे।” वो बोले, “लाओ।” मैं वहीं पास के एक काउंटर से कागज लेकर आया। उनके पास पहुंचा तो फिर उन्होंने जगजीत सिंह जी से कहा, “चलो, इस पर साइन कर दो।” कागज ब्लैंक था। चित्रा जी पीछे खड़ी थीं। जगजीत सिंह जी ने पीछे मुड़कर देखा तो चित्रा जी देख रही थीं कि भई, ये ब्लैंक पेपर पर साइन तो नहीं कर रहे। ब्लैंक पेपर पर साइन करना बड़ी बात है। निदा साहब समझ गए। उन्होंने खट से अपने हाथ से एक एप्रिसिएशन लेटर लिखा और फिर उस पर जगजीत सिंह जी के साइन करवा दिए। सवाल: निदा फाजली और जगजीत सिंह की दोस्ती कैसी थी? जवाब: दोनों का रिश्ता सिर्फ प्रोफेशनल नहीं, बहुत व्यक्तिगत भी था। जगजीत सिंह की सबसे चर्चित एल्बम ‘इनसाइट’ में निदा साहब की लिखी गजलें थीं। दोनों अक्सर साथ बैठते थे। हारमोनियम निकलता था और वहीं बैठकर नई गजलें तैयार होती थीं। सवाल: क्या निदा फाजली और जगजीत सिंह के बीच कभी मजेदार नोकझोंक भी होती थी? जवाब: एक बार हमारे एक परिचित को जगजीत सिंह का शो कराना था। मैंने निदा साहब से कहा कि आप बात कर देंगे तो शायद फीस कम हो जाएगी। उन्होंने हंसते हुए कहा, “मेरा नाम मत लेना। अगर मेरा नाम लिया तो वो तुम्हें डिस्काउंट नहीं देगा, उल्टा मुझे किसी मुशायरे में मुफ्त में पढ़ने बुला लेगा।” बाद में हुआ यह कि जगजीत सिंह ने अपनी फीस तो पूरी रखी, लेकिन पूरे शो की स्पॉन्सरशिप ही करवा दी। यानी आयोजकों पर कोई बोझ नहीं पड़ा। यही दोनों की दोस्ती थी। सवाल: डॉक्यूमेंट्री बनाने में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही? जवाब: सबसे बड़ी चुनौती थी सालों की यादों और फुटेज को समेटना। दूसरी चुनौती यह थी कि लेखकों को फिल्म इंडस्ट्री उतना याद नहीं रखती, जितना अभिनेता या निर्देशक को रखती है। लेकिन जिन लोगों ने सच में निदा साहब को जाना था, उन्होंने हमारी हर संभव मदद की। सवाल: क्या किसी कलाकार ने भी इस सफर में मदद की? जवाब: जी हां। सिंगर शान ने बिना किसी हिचकिचाहट के इंटरव्यू दिया। उनके पिता मानस मुखर्जी, निदा साहब के बहुत अच्छे दोस्त थे। उन्होंने अपने पिता और निदा साहब के रिश्ते पर खुलकर बात की। इससे डॉक्यूमेंट्री और समृद्ध हुई। सवाल: पाकिस्तान में निदा फाजली की एक शायरी पर काफी विवाद हुआ था। जवाब: जी। उन्होंने पढ़ा था- ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें,

'पाकिस्तान में घिर गए थे शायर निदा फाजली':कहा गया- बच्चे को अल्लाह से बड़ा बता रहे हो? अतुल गंगवार ने बताया क्या था जवाब

'पाकिस्तान में घिर गए थे शायर निदा फाजली':कहा गया- बच्चे को अल्लाह से बड़ा बता रहे हो? अतुल गंगवार ने बताया क्या था जवाब

दिवंगत शायर निदा फाजली के जीवन पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘मैं निदा’ को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में ‘बेस्ट आर्ट्स एंड कल्चर फिल्म’ का पुरस्कार मिला है। इस डॉक्यूमेंट्री के निर्माता अतुल गंगवार पिछले करीब ढाई दशक तक निदा फाजली के बेहद करीब रहे। उन्होंने सिर्फ उनके साथ काम ही नहीं किया, बल्कि उनकी निजी जिंदगी, संघर्ष, रिश्तों और सोच को भी बहुत करीब से देखा। दैनिक भास्कर से बातचीत में अतुल गंगवार ने निदा फाजली की निजी जिंदगी, पाकिस्तान में बसे परिवार, पिता से जुड़ा दर्द, जगजीत सिंह के साथ उनकी दोस्ती और उनकी जिंदगी के कई अनसुने किस्से शेयर किए। सवाल: निदा फाजली से आपकी पहली मुलाकात कब हुई थी? जवाब: पहली मुलाकात 1998 में हुई थी। हम ‘अदबी कॉकटेल’ नाम का एक शो बना रहे थे और उसके लेखक निदा साहब थे। उसी दौरान उन्होंने हमारी मुलाकात तलत अजीज साहब, मुकरी साहब (मोहम्मद उमर मुकरी) और कई बड़े कलाकारों से कराई। वहीं से हमारा रिश्ता शुरू हुआ, जो सालों तक चलता रहा। सवाल: आखिर कब लगा कि निदा फाजली की जिंदगी पर डॉक्यूमेंट्री बननी चाहिए? जवाब: उनके साथ काम करते-करते एहसास हुआ कि वह सिर्फ बड़े शायर नहीं, बल्कि बहुत बड़े इंसान भी थे। उनके जरिए मैं जॉनी वॉकर, टुनटुन, हसन कमाल, जावेद सिद्दीकी, राकेश बेदी और कई दिग्गजों से मिला। उन्होंने मुझे जिंदगी को देखने का नजरिया दिया। तभी लगा कि उनकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचनी चाहिए। सवाल: निदा फाजली के परिवार का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया था। क्या वह इस दर्द के बारे में आपसे बात करते थे? जवाब: निजी तौर पर वह इस बारे में बहुत कम बात करते थे, लेकिन जो कहना होता था, वह अपनी शायरी में कह देते थे। अपने पिता के इंतकाल के बाद, जब वह उनके जनाजे में शामिल नहीं हो पाए, तब उन्होंने मशहूर नज्म ‘तुम्हारी कब्र पर मैं फातिहा पढ़ने नहीं आया’ लिखी। उसमें उनका पूरा दर्द दिखाई देता है। सवाल: निदा फाजली अपनी मां और पिता को किस तरह याद करते थे? जवाब: मां के लिए उन्होंने लिखा- ‘बेसन की सोंधी रोटी पे खट्टी चटनी जैसी मां।’ पिता के लिए उनकी नज्म आज भी पढ़िए तो आंखें नम हो जाती हैं, लेकिन बातचीत में वह कभी अतीत में नहीं जीते थे। उनका पूरा ध्यान वर्तमान और भविष्य पर रहता था। सवाल: निदा फाजली के साथ जुड़ा कोई ऐसा किस्सा जो आज भी याद हो? जवाब: एक बार मैं उनके घर गया तो उनके हाथ में चोट लगी थी। मैंने पूछा, “क्या हुआ?” हंसते हुए बोले, “मुशायरे में थक गया था। मंच पर पीछे टेंट समझकर टिक गया। पता चला पीछे कुछ नहीं था और सीधे नीचे गिर गया।” सबसे बड़ी बात यह थी कि वह खुद पर भी खुलकर हंस सकते थे। सवाल: निदा फाजली और जगजीत सिंह से जुड़ा कोई खास किस्सा जो आपको आज भी याद हो? जवाब: एक बार मुझे किसी बच्ची के लिए रिकमेंडेशन लेटर चाहिए था। निदा साहब ने एयरपोर्ट बुलाया। वहां जगजीत सिंह और के एस चित्रा भी मौजूद थे। मेरे पास खाली कागज था। निदा साहब ने वहीं तुरंत अपने हाथ से रिकमेंडेशन लिख दिया और जगजीत सिंह से उस पर साइन करवा दिए। उनकी हाजिरजवाबी और समझ कमाल की थी। एक बार का किस्सा मुझे बहुत अच्छे से याद है। दिल्ली यूनिवर्सिटी के मेरे एक प्रोफेसर थे। उनकी भतीजी के कुछ डॉक्यूमेंट्स पर साइन कराने थे। एक तरह का एप्रिसिएशन उनके लिए कि वो बच्ची बहुत अच्छा गाती है। तो मैंने निदा साहब से बात की। वो बोले, “मैं दिल्ली आ रहा हूं, तो तुम एयरपोर्ट मुझसे मिलने आ जाओ।” मैं वहां पहुंचा तो देखा कि साथ में जगजीत सिंह जी, चित्रा जी और निदा साहब तो थे ही। मैंने उनसे कहा, “जी, वो चिट्ठी चाहिए आपसे।” वो बोले, “लाओ।” मैं वहीं पास के एक काउंटर से कागज लेकर आया। उनके पास पहुंचा तो फिर उन्होंने जगजीत सिंह जी से कहा, “चलो, इस पर साइन कर दो।” कागज ब्लैंक था। चित्रा जी पीछे खड़ी थीं। जगजीत सिंह जी ने पीछे मुड़कर देखा तो चित्रा जी देख रही थीं कि भई, ये ब्लैंक पेपर पर साइन तो नहीं कर रहे। ब्लैंक पेपर पर साइन करना बड़ी बात है। निदा साहब समझ गए। उन्होंने खट से अपने हाथ से एक एप्रिसिएशन लेटर लिखा और फिर उस पर जगजीत सिंह जी के साइन करवा दिए। सवाल: निदा फाजली और जगजीत सिंह की दोस्ती कैसी थी? जवाब: दोनों का रिश्ता सिर्फ प्रोफेशनल नहीं, बहुत व्यक्तिगत भी था। जगजीत सिंह की सबसे चर्चित एल्बम ‘इनसाइट’ में निदा साहब की लिखी गजलें थीं। दोनों अक्सर साथ बैठते थे। हारमोनियम निकलता था और वहीं बैठकर नई गजलें तैयार होती थीं। सवाल: क्या निदा फाजली और जगजीत सिंह के बीच कभी मजेदार नोकझोंक भी होती थी? जवाब: एक बार हमारे एक परिचित को जगजीत सिंह का शो कराना था। मैंने निदा साहब से कहा कि आप बात कर देंगे तो शायद फीस कम हो जाएगी। उन्होंने हंसते हुए कहा, “मेरा नाम मत लेना। अगर मेरा नाम लिया तो वो तुम्हें डिस्काउंट नहीं देगा, उल्टा मुझे किसी मुशायरे में मुफ्त में पढ़ने बुला लेगा।” बाद में हुआ यह कि जगजीत सिंह ने अपनी फीस तो पूरी रखी, लेकिन पूरे शो की स्पॉन्सरशिप ही करवा दी। यानी आयोजकों पर कोई बोझ नहीं पड़ा। यही दोनों की दोस्ती थी। सवाल: डॉक्यूमेंट्री बनाने में सबसे बड़ी चुनौती क्या रही? जवाब: सबसे बड़ी चुनौती थी सालों की यादों और फुटेज को समेटना। दूसरी चुनौती यह थी कि लेखकों को फिल्म इंडस्ट्री उतना याद नहीं रखती, जितना अभिनेता या निर्देशक को रखती है। लेकिन जिन लोगों ने सच में निदा साहब को जाना था, उन्होंने हमारी हर संभव मदद की। सवाल: क्या किसी कलाकार ने भी इस सफर में मदद की? जवाब: जी हां। सिंगर शान ने बिना किसी हिचकिचाहट के इंटरव्यू दिया। उनके पिता मानस मुखर्जी, निदा साहब के बहुत अच्छे दोस्त थे। उन्होंने अपने पिता और निदा साहब के रिश्ते पर खुलकर बात की। इससे डॉक्यूमेंट्री और समृद्ध हुई। सवाल: पाकिस्तान में निदा फाजली की एक शायरी पर काफी विवाद हुआ था। जवाब: जी। उन्होंने पढ़ा था- ‘घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूं कर लें,

जेडी वेंस उपराष्ट्रपति रहते हुए चौथे बच्चे के पिता बने:अमेरिका में 150 साल में पहली बार ऐसा; ज्यादा बच्चों के पक्षधर रहे हैं जेडी वेंस

जेडी वेंस उपराष्ट्रपति रहते हुए चौथे बच्चे के पिता बने:अमेरिका में 150 साल में पहली बार ऐसा; ज्यादा बच्चों के पक्षधर रहे हैं जेडी वेंस

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और उनकी पत्नी उषा वेंस के घर चौथे बच्चे का जन्म हुआ है। 19 जुलाई की सुबह उनके बेटे एलेक नील वेंस का जन्म हुआ। इसके साथ ही 150 साल से ज्यादा पुराना एक रिकॉर्ड भी टूट गया। वेंस 1870 के बाद ऐसे पहले मौजूदा अमेरिकी उपराष्ट्रपति बन गए हैं, जिनके कार्यकाल के दौरान उनके घर बच्चे का जन्म हुआ है। टाइम मैगजीन के मुताबिक, इससे पहले ऐसा 1870 में हुआ था। उस समय राष्ट्रपति यूलिसिस एस. ग्रांट के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति शायलर कोलफैक्स की पत्नी एलेन कोलफैक्स ने बेटे शायलर कोलफैक्स को जन्म दिया था। जेडी वेंस ने सोशल मीडिया पर चौथे बच्चे की खुशखबरी साझा करते हुए लिखा, उषा और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं। हमारे तीनों बच्चे अपने छोटे भाई से मिलकर बेहद खुश हैं। एलेक नील वेंस, जेडी और उषा वेंस की चौथी संतान हैं। उनसे पहले उनके तीन बच्चे इवान (9 वर्ष), विवेक (6 वर्ष) और मिराबेल (4 वर्ष) हैं। भारतीय मूल की हैं उषा वेंस उषा वेंस का जन्म और पालन-पोषण कैलिफोर्निया के सैन डिएगो में हुआ। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका जाकर बसे थे। उनके पिता मैकेनिकल इंजीनियर हैं, जबकि मां मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट हैं। उषा और जेडी वेंस की मुलाकात 2010 में येल लॉ स्कूल में पढ़ाई के दौरान हुई थी। बाद में दोनों ने शादी की। ज्यादा बच्चों के पक्षधर रहे हैं वेंस जेडी वेंस ट्रम्प सरकार के उन प्रमुख नेताओं में रहे हैं, जो अमेरिका में जन्मदर बढ़ाने की वकालत करते रहे हैं। अपनी हाल ही में प्रकाशित किताब में उन्होंने लिखा है कि उषा शुरुआत में चौथा बच्चा नहीं चाहती थीं, लेकिन बाद में उन्होंने अपना फैसला बदल लिया।

जेडी वेंस उपराष्ट्रपति रहते हुए चौथे बच्चे के पिता बने:अमेरिका में 150 साल में पहली बार ऐसा हुआ; ज्यादा बच्चों के पक्षधर हैं वेंस

जेडी वेंस उपराष्ट्रपति रहते हुए चौथे बच्चे के पिता बने:अमेरिका में 150 साल में पहली बार ऐसा; ज्यादा बच्चों के पक्षधर रहे हैं जेडी वेंस

अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और उनकी पत्नी उषा वेंस के घर चौथे बच्चे का जन्म हुआ है। 19 जुलाई की सुबह उनके बेटे एलेक नील वेंस का जन्म हुआ। 150 साल से ज्यादा समय बाद ऐसा पहली बार हुआ है, जब किसी मौजूदा अमेरिकी उपराष्ट्रपति के कार्यकाल के दौरान उनके घर बच्चे का जन्म हुआ है। टाइम मैगजीन के मुताबिक, इससे पहले ऐसा 1870 में हुआ था। उस समय राष्ट्रपति यूलिसिस एस. ग्रांट के कार्यकाल में उपराष्ट्रपति शायलर कोलफैक्स की पत्नी एलेन कोलफैक्स ने बेटे शायलर कोलफैक्स को जन्म दिया था। जेडी वेंस ने सोशल मीडिया पर चौथे बच्चे की खुशखबरी साझा करते हुए लिखा, उषा और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं। हमारे तीनों बच्चे अपने छोटे भाई से मिलकर बेहद खुश हैं। एलेक नील वेंस, जेडी और उषा वेंस की चौथी संतान हैं। उनसे पहले उनके तीन बच्चे इवान (9 वर्ष), विवेक (6 वर्ष) और मिराबेल (4 वर्ष) हैं। भारतीय मूल की हैं उषा वेंस उषा वेंस का जन्म और पालन-पोषण कैलिफोर्निया के सैन डिएगो में हुआ। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका जाकर बसे थे। उनके पिता मैकेनिकल इंजीनियर हैं, जबकि मां मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट हैं। उषा और जेडी वेंस की मुलाकात 2010 में येल लॉ स्कूल में पढ़ाई के दौरान हुई थी। बाद में दोनों ने शादी की। ज्यादा बच्चों के पक्षधर रहे हैं वेंस जेडी वेंस ट्रम्प सरकार के उन प्रमुख नेताओं में रहे हैं, जो अमेरिका में जन्मदर बढ़ाने की वकालत करते रहे हैं। उनका मानना है कि अमेरिका में गिरती जन्मदर भविष्य के लिए बड़ी चुनौती है। इसी वजह से उन्होंने टैक्स छूट, परिवारों के लिए आर्थिक मदद और बच्चों वाले परिवारों को अधिक समर्थन देने जैसी नीतियों की पैरवी की है। अपनी हाल ही में रिलीज हुई किताब कम्युनियन में वेंस ने अपनी निजी जिंदगी का भी जिक्र किया है। उन्होंने लिखा कि वे कई साल से पत्नी उषा वेंस से चौथा बच्चा करने की बात कहते रहे, लेकिन उषा का मानना था कि तीन बच्चों के बाद उनका परिवार पूरा हो चुका है। सार्वजनिक जीवन में आने के बाद वह चौथा बच्चा नहीं चाहती थीं। चौथे बच्चे के लिए उषा को मनाया इस साल मिशिगन में व्हाइट हाउस के एक कार्यक्रम में जेडी वेंस ने मजाकिया अंदाज में बताया था कि उन्होंने उषा को चौथे बच्चे के लिए कैसे राजी किया। उन्होंने कहा कि उपराष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने से पहले उन्होंने उषा से कहा था, “मैं चौथा बच्चा चाहता हूं।” इस पर उषा ने जवाब दिया, “ठीक है, लेकिन तुम्हें अमेरिका का उपराष्ट्रपति बनना है या चौथा बच्चा चाहिए, दोनों एक साथ नहीं मिल सकते।” वेंस ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं अपनी बात मनवाने में काफी अच्छा हूं, क्योंकि आज मेरे पास दोनों हैं।” वेंस के मुताबिक, यह सोच तब बदली जब 2025 में उनके करीबी दोस्त और एक्टिविस्ट चार्ली किर्क की हत्या हो गई। अंतिम संस्कार के दौरान उषा की मुलाकात चार्ली किर्क की पत्नी एरिका किर्क से हुई। वेंस लिखते हैं कि एरिका ने रोते हुए उषा से कहा कि उन्हें अफसोस है कि उनके और चार्ली के केवल दो ही बच्चे थे। इस बातचीत का उषा पर गहरा असर पड़ा और कुछ समय बाद उन्होंने चौथे बच्चे के लिए हामी भर दी। भारतीय मूल के ससुराल वालों की कर चुके हैं तारीफ जेडी वेंस कई बार अपने भारतीय मूल के ससुराल वालों की खुलकर तारीफ कर चुके हैं। इस साल एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि उनके सास-ससुर इस बात का उदाहरण हैं कि प्रवासियों ने अमेरिका को किस तरह समृद्ध बनाया है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि अमेरिकी नागरिक बनने के बाद देश के हितों को सबसे पहले रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी होती है। उन्होंने कहा था, “मैं भारत से आए प्रवासियों की बेटी से विवाहित हूं। मुझे अपने सास-ससुर से बहुत प्यार है। वे शानदार लोग हैं और उन्होंने अमेरिका के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।”

एंडी बर्नहैम ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बने:10 साल में सातवें PM बने; पाकिस्तानी मूल की शबाना महमूद वित्त मंत्री बन सकती हैं

एंडी बर्नहैम ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बने:10 साल में सातवें PM बने; पाकिस्तानी मूल की शबाना महमूद वित्त मंत्री बन सकती हैं

ब्रिटेन में सोमवार को एंडी बर्नहैम ने नए प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाल लिया। वह पिछले 10 साल में ब्रिटेन के सातवें प्रधानमंत्री बने हैं। उन्होंने देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े बदलाव का वादा करते हुए कहा है कि उनकी सरकार लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं, जैसे महंगाई और खराब सार्वजनिक सेवाओं, पर सबसे ज्यादा ध्यान देगी। पूर्व प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर विदाई भाषण देने के बाद किंग चार्ल्स को अपना इस्तीफा सौंपा। इसके बाद ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व मेयर एंडी बर्नहैम ने किंग से मुलाकात की और औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली। 56 वर्षीय बर्नहैम ऐसे समय सत्ता में आए हैं, जब ब्रिटेन कई चुनौतियों से जूझ रहा है। इनमें धीमी आर्थिक वृद्धि, खराब प्रदर्शन करने वाली सार्वजनिक सेवाएं और बुनियादी सुविधाओं की समस्याएं प्रमुख हैं। सरकार संभालने के साथ ही उन्हें अपनी नई कैबिनेट का भी गठन करना है। नई कैबिनेट पहली चुनौती होगी प्रधानमंत्री बनने के बाद बर्नहैम की पहली बड़ी चुनौती अपनी कैबिनेट का गठन होगी। खास तौर पर वित्त मंत्री की नियुक्ति पर सभी की नजर रहेगी, क्योंकि पहले भी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के बीच मतभेद कई सरकारों के लिए मुश्किल बने हैं। ऊर्जा सुरक्षा मंत्री एड मिलिबैंड को पहले इस पद का मजबूत दावेदार माना जा रहा था, लेकिन अब गृह मंत्री शबाना महमूद का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है। शबाना पाकिस्तानी मूल की नेता हैं। हालांकि बर्नहैम ने कहा है कि उन्होंने अभी अपनी टीम पर अंतिम फैसला नहीं लिया है और अटकलों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। पहला फैसला- डिजिटल पहचान पत्र लागू करने का फैसला रद्द किया बर्नहैम सरकार के शुरुआती फैसलों पर भी सबकी नजर रहेगी। सरकार ने पहले ही एक अहम कदम उठाते हुए सभी कर्मचारियों के लिए डिजिटल पहचान पत्र लागू करने की योजना रद्द कर दी है। इस की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर सरकार ने सितंबर 2025 में की थी। इसका मकसद यह था कि देश में काम करने वाले हर कर्मचारी की पहचान और उसके काम करने के कानूनी अधिकार की डिजिटल तरीके से पुष्टि की जा सके। सरकार का मानना था कि इससे फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल कम होगा और अवैध प्रवासन पर रोक लगाने में मदद मिलेगी। हालांकि इस योजना का शुरुआत से ही विरोध होने लगा। आलोचकों का कहना था कि इससे सरकार नागरिकों की निजी जानकारी पर जरूरत से ज्यादा कंट्रोल हासिल कर सकती है। डेटा सुरक्षा और निजता को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए। बर्नहैम के सामने 5 बड़ी चुनौतियां 1. सुस्त अर्थव्यवस्था को रफ्तार देना ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था पिछले कई वर्षों से कमजोर बनी हुई है। 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी, ब्रेक्जिट और कोविड-19 महामारी के कारण लोगों का जीवन स्तर लगातार प्रभावित हुआ है। बर्नहैम ने वादा किया है कि वह आम लोगों की जिंदगी में वास्तविक सुधार लाएंगे। उन्होंने टैक्स न बढ़ाने का भी वादा किया है। 2. यूक्रेन, मिडिल ईस्ट और अमेरिका के साथ रिश्तों में संतुलन बर्नहैम घरेलू मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देना चाहते हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय हालात उन्हें ऐसा करने की पूरी छूट नहीं देंगे। यूक्रेन युद्ध अभी जारी है और मिडिल ईस्ट में भी तनाव बढ़ा हुआ है। माना जा रहा है कि इन दोनों मुद्दों पर ब्रिटेन की विदेश नीति में बहुत बड़ा बदलाव नहीं होगा, क्योंकि NSA जोनाथन पॉवेल अपने पद पर बने रह सकते हैं। साथ ही अमेरिका के साथ ब्रिटेन के रिश्ते भी नई सरकार के लिए अहम होंगे। पूर्व प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ अच्छे संबंध बनाने की कोशिश की थी, लेकिन ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों का खुलकर समर्थन नहीं करने के कारण दोनों नेताओं के बीच तनाव पैदा हो गया था। 3. रक्षा बजट बढ़ाना और उसके लिए पैसा जुटाना रक्षा खर्च बढ़ाने को लेकर मतभेद की वजह से पिछले महीने कीर स्टार्मर सरकार के रक्षा मंत्री जॉन हीली ने इस्तीफा दे दिया था। उनका कहना था कि सेना के लिए प्रस्तावित बजट बढ़ोतरी पर्याप्त नहीं है। इसके कुछ हफ्तों बाद स्टार्मर ने अगले चार वर्षों में रक्षा बजट में 15 अरब पाउंड (करीब 1.9 लाख करोड़ रुपए) की बढ़ोतरी का ऐलान किया। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि एक्स्ट्रा पैसा कहां से आएगा और किन सरकारी विभागों के बजट में कटौती कर इसकी भरपाई की जाएगी। 4. इमिग्रेशन पर सख्त नीति और राजनीतिक संतुलन हाल के वर्षों में ब्रिटेन में शुद्ध प्रवासन (नेट माइग्रेशन) में काफी गिरावट आई है। इसकी वजह पिछली कंजर्वेटिव सरकार द्वारा लागू की गई सख्त इमिग्रेशन नीतियां हैं। इसे लेबर सरकार ने भी जारी रखा है। मई में एंडी बर्नहैम ने माना था कि इमिग्रेशन में कमी आई है, लेकिन उन्होंने कहा कि इसे और कम करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि वह पूर्व गृह मंत्री शबाना महमूद की सख्त इमिग्रेशन नीति को बड़े पैमाने पर जारी रखेंगे। हालांकि लेबर पार्टी के कई सांसद और उदारवादी समर्थक इसका विरोध करते रहे हैं। ऐसे में बर्नहैम के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी के भीतर विरोध के बीच संतुलन बनाना होगी। 5. बढ़ता कल्याण और पेंशन खर्च ब्रिटेन में सरकार का सामाजिक कल्याण (वेलफेयर) पर खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसकी एक बड़ी वजह कामकाजी उम्र के उन लोगों की बढ़ती संख्या है, जो मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के आधार पर सरकारी सहायता ले रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या युवाओं की है, जो बेरोजगार हैं। हालांकि सामाजिक सुरक्षा पर होने वाले कुल सरकारी खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा सेवानिवृत्त लोगों पर जाता है। सरकारी पेंशन और दूसरी सहायता योजनाओं पर कुल सामाजिक सुरक्षा बजट का आधे से ज्यादा हिस्सा खर्च होता है। अगर बर्नहैम इस खर्च को नियंत्रित कर पाते हैं, तो उनके पास सामाजिक आवास जैसी दूसरी योजनाओं पर ज्यादा पैसा खर्च करने का मौका मिलेगा। लेकिन यह आसान नहीं होगा। कीर स्टार्मर ने भी वेलफेयर खर्च घटाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी ही पार्टी के सांसदों के विरोध के बाद उन्हें अपने फैसले वापस लेने पड़े थे। यही वजह है कि बर्नहैम के लिए यह आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी सबसे कठिन चुनौतियों में से एक होगी।