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बशीर बद्र ने गजल को आम आदमी की जुबान बनाया:कुमार विश्वास बोले- वे जहां खड़े होते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था

बशीर बद्र ने गजल को आम आदमी की जुबान बनाया:कुमार विश्वास बोले- वे जहां खड़े होते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था

उर्दू शायरी को आम लोगों की जुबान तक पहुंचाने वाले मशहूर शायर बशीर बद्र का गुरुवार दोपहर 12 बजकर 35 मिनट पर भोपाल स्थित घर पर निधन हो गया। 91 वर्षीय बशीर लंबे समय से बीमार थे और याददाश्त भी खो चुके थे। शाम को बड़ा बाग कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया। पद्मश्री और साहित्य अकादमी सम्मान से नवाजे गए बशीर ने करीब 700 गजलें और नज्में जबकि 4 हजार से ज्यादा शेर लिखे थे। 1987 के मेरठ दंगों में बशीर साहब का घर जला दिया गया था। इसमें सालों की जमा-पूंजी, डिग्रियां, किताबें और यादें राख हो गईं। इसके बाद वे भोपाल में आकर बस गए। इस गहरे सदमे में शायरी कही- लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में। वे जहां खड़े होते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था बशीर बद्र के निधन पर देश-प्रदेश के शायर और कवियों ने दुख जताया है। कुमार विश्वास ने दैनिक भास्कर से बात करते हुए कहा- मैं बहुत कम लोगों के लिए यह कहता हूं कि उन्होंने भाषा को बदल दिया। बशीर बद्र साहब उन गिने-चुने लोगों में थे। उन्होंने सिर्फ गजल नहीं लिखी, उन्होंने गजल को ड्रॉइंगरूम से निकालकर आम आदमी की जुबान बना दिया। उन्होंने कहा- बशीर साहब से मेरा रिश्ता तीन दशक से ज्यादा का था। पहले मैं उन्हें एक श्रोता की तरह सुनता था, फिर एक साथी कवि की तरह उनके साथ मंच साझा करने लगा। हम दोनों का रिश्ता मेरठ से था, इसलिए एक अपनापन हमेशा महसूस होता था। बाद में जब वे कुछ अप्रिय परिस्थितियों के कारण भोपाल आकर बस गए, तब भी मुलाकातों और मुशायरों का सिलसिला चलता रहा। मैंने उन्हें हमेशा एक बड़े आदमी और बड़े शायर की तरह देखा। वे जहां खड़े हो जाते थे, मुशायरा वहीं से बड़ा हो जाता था। बशीर बद्र भारतीय गजल के गौतम बुद्ध थे। जैसे भगवान बुद्ध ने कठिन आध्यात्म को पाली और प्राकृत जैसी लोकभाषाओं में उतारकर आम आदमी तक पहुंचाया, वैसे ही बशीर साहब ने बड़ी से बड़ी बात को इतनी सादगी से कहा कि वह सीधे लोगों के दिल में उतर गई। उनकी शायरी में कोई दिखावा नहीं था। चमत्कार पैदा करने की कोशिश नहीं थी, पर हर शेर खुद एक चमत्कार बन जाता था। संसद-विधानसभाओं में चले जाइए, अखबारों में देख लीजिए, सड़कों के नारों में सुन लीजिए- बशीर बद्र मौजूद मिलेंगे। उनका शेर भारत-पाक के रिश्तों की भाषा बना कुमार विश्वास ने कहा, ‘बशीर बद्र का शेर- दिल मिले या न मिले, हाथ मिलाते रहिए…भारत-पाक के रिश्तों की भाषा बन गया। दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्ष हाथ मिलाते थे, अगले दिन यही शेर अखबारों में छपा होता। यह शेर न जाने कितने मौकों पर कहा गया- उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो… न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए। मुझे याद है, मीना कुमारी जैसी बड़ी अदाकारा ने इसे अपनी डायरी में लिखा था। सोचिए, एक शेर किताबों से निकलकर जिंदगी का हिस्सा बन जाए, इससे बड़ी बात किसी शायर के लिए क्या होगी? बशीर साहब अच्छे शायर होने के साथ बहुत पढ़े-लिखे भी थे। उन्होंने पीएचडी की थी। उनमें एक प्रोफेसराना ठहराव था। बात करते थे तो लगता था जैसे कोई बहुत तहजीब वाला आदमी अपने इल्म को बहुत सलीके से आपके सामने रख रहा है। अपनी शायरी में हमेशा जिंदा रहेंगे बशीर बद्र कुमार विश्वास ने आगे बताया- मुझे भोपाल राजभवन का एक मुशायरा याद है। दो बड़े शायरों के बीच बहस बढ़ गई थी। माहौल खराब हो सकता था। लेकिन बशीर साहब ने जिस शालीनता से स्थिति संभाली, वह सिर्फ बड़े शायर का नहीं, बड़े इंसान का भी परिचय था। उनके आखिरी साल आसान नहीं थे। बीमारी तकलीफदेह थी। पर मैं यहां खास तौर पर डॉ. राहत बद्र का जिक्र करना चाहूंगा। जिस समर्पण और प्रेम से उन्होंने बशीर साहब की सेवा की, वह प्रेम की पराकाष्ठा है। आज के समय में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं। मुझे लगता है कि किसी शायर की असली मौत तब होती है जब उसके शेर लोगों की जिंदगी से चले जाएं। बशीर बद्र साहब के साथ ऐसा कभी नहीं होगा। वे अपने अशआर (कई सारे शेर) में हमेशा जिंदा रहेंगे। जब तक लोग मोहब्बत करेंगे, रिश्तों को बचाने की कोशिश करेंगे, टूटने के बाद भी मुस्कुराना सीखेंगे… तब तक बशीर बद्र जिंदा रहेंगे। अधूरी है तेरी रचना जरा तू पूरा करने दे… प्रसार भारती के चेयरमैन और मशहूर कवि प्रसून जोशी ने खास तौर पर लिखी कविता दैनिक भास्कर से साझा की है… अधूरी है तेरी रचना जरा तू पूरा करने दे यहां एक चोट रखने दे वहां एक घाव भरने दे यहीं काग़ज़ पे ये अल्फ़ाज़ सारे सूख जाएंगे ज़रा सा फैल जाने दे ज़रा बूंदें बिखरने दे अभी अंगूर में हूं और मुझे ख़ामोश रहना है सुराही में ज़रा शीशों में तू मुझको उतरने दे कहां बुझने का डर मुझको मैं कोई शमा थोड़े हूं ज़रा सी ज़ुल्फ़ हूं मुझको तू झोंकों से संवरने दे सुनी हैं धड़कनें उसकी कई चुपचाप कानों से यही उम्मीद है शायद मुझे बांहों में मरने दे सुने तू बैठ कर मुझको नहीं ऐसी तमन्ना है मैं हूं ट्रक पर लिखा एक शेर तू मुझको गुज़रने दे

ट्रम्प बोले- भारत मुझ पर 100% भरोसा कर सकता है:पीएम मोदी को पता है जरूरत पर कहां फोन करना हैं, मैं और अमेरिका हमेशा खड़े

ट्रम्प बोले- भारत मुझ पर 100% भरोसा कर सकता है:पीएम मोदी को पता है जरूरत पर कहां फोन करना हैं, मैं और अमेरिका हमेशा खड़े

डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुलकर तारीफ करते हुए कहा है कि भारत जब भी चाहे, अमेरिका और वह खुद उसके साथ खड़े रहेंगे। नई दिल्ली में रविवार को भारत मंडपम कन्वेंशन सेंटर में अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ को लेकर एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था। इस दौरान ट्रम्प ने अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर को फोनकर संबोधित किया। ट्रम्प ने कहा, “भारत मुझ पर 100 फीसदी भरोसा कर सकता है। अगर उन्हें कभी मदद की जरूरत पड़े, तो उन्हें पता है कि कहां फोन करना है। वे यहीं फोन करते हैं।” ट्रम्प ने खुद को पीएम मोदी का बहुत बड़ा फैन बताया। ट्रम्प ने मार्को रूबियो से कहा, “PM मोदी को मेरी तरफ से नमस्ते कहिए और उन्हें बताइए कि मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूं।” ट्रम्प ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भी जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा, “मार्को सबसे बेहतरीन हैं। वह अमेरिका के इतिहास के सबसे महान विदेश मंत्री के रूप में याद किए जाएंगे।” अमेरिकी राजदूत बोले- ट्रम्प हमेशा मोदी के बारे में पूछते हैं अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने कहा कि जब भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प उनसे बात करते हैं, तो सबसे पहले प्रधानमंत्री मोदी के बारे में पूछते हैं। उन्होंने कहा कि भारत-अमेरिका का रिश्ता नया नहीं, बल्कि मजबूत भरोसे पर टिका है। गोर ने कहा कि अमेरिका फर्स्ट का मतलब सिर्फ अमेरिका नहीं है। दोनों देश मिलकर ऐसे मौके तलाश रहे हैं, जिनसे दोनों को फायदा हो। उन्होंने बताया कि भारत में अमेरिकी दूतावास ने इस साल रिकॉर्ड 20.5 अरब डॉलर का निवेश अमेरिका में लाने में मदद की है। अमेरिकी विदेश मंत्री बोले- भारत-अमेरिका में ट्रेड डील जल्द मार्को रुबियो ने रविवार को कहा कि भारत और अमेरिका के रिश्तों की रफ्तार धीमी नहीं पड़ी है और दोनों देशों के बीच जल्द ही व्यापार समझौता होने की उम्मीद है। भारत दौरे के दूसरे दिन रूबियो ने विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बातचीत की। उन्होंने अब तक के अपने भारत दौरे को शानदार बताया। रुबियो का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब भारत और अमेरिका के बीच आर्थिक और कूटनीतिक तनाव बढ़ा हुआ है। इसकी बड़ी वजह राष्ट्रपति ट्रम्प की टैरिफ नीति है, जिसके तहत कई भारतीय उत्पादों पर शुल्क बढ़ाया गया है। जयंशकर बोले- आतंकवाद के खिलाफ नरमी नहीं बरती जाए कार्यक्रम में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि आज के समय में भारत और अमेरिका के रिश्ते बहुत महत्वपूर्ण हो गए हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने दोनों देशों की साझेदारी को और मजबूत करने की दिशा तय की है। इससे भारत और अमेरिका दोनों के लोगों को फायदा होगा और दुनिया में भी अच्छा मैसेज जाएगा। जयशंकर ने कहा कि भारत और अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ मिलकर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आतंकवाद को लेकर “जीरो टॉलरेंस” यानी बिल्कुल भी नरमी नहीं होनी चाहिए। इसी वजह से दोनों देशों के बीच आतंकवाद विरोधी सहयोग बहुत अहम है। उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय तेजी से बदल रही है और ऐसे दौर में भारत-अमेरिका रिश्ते और मजबूत होते जा रहे हैं। दोनों देश मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को सुरक्षित बनाने और दुनिया को ज्यादा विकल्प देने की दिशा में काम कर रहे हैं। जयशंकर ने कहा कि भारत और अमेरिका दोनों लोकतांत्रिक देश हैं। दोनों की अर्थव्यवस्था खुली है और समाज भी खुले विचारों वाला है। यही समानताएं दोनों देशों को मजबूत रणनीतिक साझेदार बनाती हैं। उन्होंने कहा कि व्यापार, रक्षा, टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऊर्जा, अंतरिक्ष, शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति जैसे कई क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार बढ़ रहा है।

मेरा बंगाल, मेरी उम्मीद:इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा… ‘आमार सोनार बांग्ला’ सिर्फ नोस्टेल्जिया नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार

मेरा बंगाल, मेरी उम्मीद:इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा... ‘आमार सोनार बांग्ला’ सिर्फ नोस्टेल्जिया नहीं, एक सुनहरे भविष्य का हकदार

Hindi News National Harsh Goenka, Harsh Goenka’s Article, Standing At A Turning Point In History… ‘Amar Sonar Bangla’ Is Not Just Nostalgia, It Deserves A Golden Future. हर्ष गोयनका. कोलकाता35 मिनट पहले कॉपी लिंक आरपीजी इंटरप्राइजेज के चेयरमैन हर्ष गोयनका। – फाइल फोटो ‘समय बदलता है, जिंदगी कई मोड़ लेती है, लेकिन कुछ जगहें ऐसी हैं जो कभी साथ नहीं छोड़तीं। वे चुपचाप हमारी यादों, हमारी सोच और हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बनी रहती हैं। ऐसी जगह मेरे लिए बंगाल है। यह मेरी जन्मभूमि है और आज भी ऐसी जगह है जो मुझे सुकून देती है, चाहे मैं दुनिया में कहीं भी चला जाऊं। संकरी गलियां, पुराने औपनिवेशिक भवन, दोपहर की खामोशी को चीरती ट्राम की घंटियां, स्कूल के मैदानों में गूंजती दोस्तों की हंसी, ये सब मेरी पहचान का हिस्सा हैं। मेरा बचपन बंगाल की उसी लय में बीता। मैदान में क्रिकेट, चाय पर गरमागरम बहस या बस उन सड़कों पर चलना जो कहानियों से भरी लगती थीं। सेंट जेवियर्स कॉलेज की कैंटीन में मेरे विचारों की दुनिया बसती थी। हम बहस करते थे, सवाल पूछते थे, सपने देखते थे। वो स्वर्णिम काल जब बंगाल सबसे आगे था बंगाल कभी भी सिर्फ भौगोलिक क्षेत्र नहीं रहा है। एक समय था जब यह पूरे भारत की औद्योगिक धड़कन था। हुगली नदी के किनारे खड़े जूट के कारखाने, हावड़ा के इस्पात संयंत्र, बर्नपुर की कोयला खदानें, ये सब इस राज्य की महत्वाकांक्षा के जीवित प्रतीक थे। आजादी के बाद के दो दशकों में पश्चिम बंगाल भारत के औद्योगिक रूप से सबसे विकसित राज्यों में गिना जाता था। चितरंजन में रेलवे इंजन बनते थे, दुर्गापुर में इस्पात ढलता था। टाटा, बिड़ला, सिंघानिया, मार्टिन बर्न जैसे व्यापारिक घराने यहीं से पले-बढ़े थे। कोलकाता भारत का व्यापारिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक मुख्यालय था। देश के किसी भी कोने में जाइए, ‘बंगाली बाबू’ की बुद्धिमत्ता और ‘कोलकाता के व्यापारी’ का रुतबा, दोनों का सम्मान होता था। वाम मोर्चा का लंबा अध्याय और उद्योग का पलायन फिर 1977 में वाम मोर्चा सत्ता में आया। धीरे-धीरे एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित हुई जिसमें उद्योग को संदेह की नजर से देखा जाने लगा। तीन दशकों से ज्यादा चले इस शासन में श्रमिक आंदोलनों ने हिंसक रूप लिया, कारखानों में ‘काम बंद, हड़ताल जारी’ की संस्कृति जड़ें जमाने लगीं। उद्योगपतियों ने एक-एक करके कोलकाता छोड़ना शुरू किया। जो कारखाने कभी राज्य की शान थे, वे बंद होने लगे। निवेश मुंबई, दिल्ली और बाद में बेंगलुरु की ओर चला गया। वाम मोर्चे ने बौद्धिक गर्व तो बनाए रखा, लेकिन आर्थिक उद्यमिता को किनारे पर धकेल दिया। बंगाल में नया निवेश आना लगभग बंद हो गया। बंगाल के सर्वश्रेष्ठ दिमाग बाहर जाने लगे चाहे वो इंजीनियर, डॉक्टर, उद्यमी या कलाकार हों। यह उनकी पसंद नहीं, मजबूरी थी। तृणमूल का दौर- उम्मीदें, और फिर निराशा 2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के साथ तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। जनता को उम्मीद थी कि अब बदलाव आएगा। और कुछ हद तक आया भी। बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ, कनेक्टिविटी बढ़ी। लेकिन उद्योग के मोर्चे पर जो होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। बंगाल बिजनेस समिट जैसे आयोजन भव्य होते रहे। हजारों करोड़ के निवेश के वादे, विदेशी प्रतिनिधिमंडल, बड़े मंच और चमकदार घोषणाएं। लेकिन जमीन पर उतरता क्या था? बहुत कम। और इसका सबसे बड़ा कारण था- जमीन। सिंगूर और नंदीग्राम का जख्म अभी भरा नहीं था। टाटा का नैनो प्रोजेक्ट, जो बंगाल के औद्योगिक पुनर्जन्म का प्रतीक बन सकता था, राजनीतिक हिंसा और अनिश्चितता की भेंट चढ़ गया। यह सिर्फ एक कारखाने का जाना नहीं था, यह एक संदेश था जो पूरे देश के निवेशकों तक पहुंचा कि बंगाल में पूंजी सुरक्षित नहीं है। उसके बाद से हर बड़े निवेशक ने बंगाल की फाइल खोलने से पहले दो बार सोचा। तृणमूल के शासन में राजनीतिक हिंसा, प्रशासनिक पक्षपात और एकाधिकार की शिकायतें भी बढ़ती रहीं। उद्योग को यह भरोसा कभी नहीं मिला कि सरकार उनकी साझेदार है। बंगाल फिर अवसरों की दौड़ में पीछे रहा। अब एक नई सुबह- भाजपा की जीत और उम्मीद का उजाला और अब, ऐतिहासिक चुनाव परिणाम के बाद बंगाल में एक नई भावना जागी है। यह राजनीतिक बदलाव उस बंगाल की करवट है जो दशकों से सोया हुआ था। वो जानता था कि उसके भीतर कितनी ताकत है, लेकिन उसे मौका नहीं मिला। राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी की सरकार को लेकर भाजपा जिस ‘डबल इंजन’ की बात करती रही है, उसका असली असर अब दिखना चाहिए। यह पल उम्मीद भी लाता है और जिम्मेदारी भी, लेकिन उम्मीद से काम नहीं चलता। नारों से कारखाने नहीं खुलते। इस बार बंगाल को ठोस और साहसी फैसले चाहिए। सबसे पहले जमीन का सवाल हल करना होगा- पारदर्शी, विवाद-मुक्त और डिजिटल। सिंगूर का सबक याद रहे। कोई भी निवेशक वहां नहीं जाता जहां उसकी जमीन कल छिन सकती है। दूसरा, प्रशासनिक संस्कृति बदलनी होगी। नौकरशाही को ‘ना’ कहने की आदत से ‘हां, और कैसे?’ की आदत में लाना होगा। तीसरा, केमिकल्स, फार्मास्यूटिकल्स, लेदर, फूड प्रोसेसिंग व पोर्ट-आधारित लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में जहां बंगाल की स्वाभाविक ताकत है, वहां केंद्रित निवेश लाना होगा। और सबसे बड़ा काम, प्रवासी बंगालियों को वापस जोड़ना। मुंबई के बोर्डरूम से लेकर सिलिकॉन वैली के स्टार्टअप तक, बंगाली प्रतिभा हर जगह है। उन्हें बुलाइए, भरोसा दीजिए, और उनके लिए घर वापसी को सार्थक बनाइए। वो बंगाल जो मेरे भीतर बसा है मेरे मन में फिर वही बंगाल उभरता है जो जिज्ञासु, संवेदनशील और संभावनाओं से भरा हुआ था। वो कोलकाता जहां दोपहर की धूप में चाय की चुस्की के साथ दुनिया बदलने की बातें होती थीं। वो बंगाल जो टैगोर की कविता में था, विवेकानंद के संकल्प में था, बोस की प्रयोगशाला में था। वो बंगाल मरा नहीं है। वो इंतजार कर रहा था। बंगाल पहले भी मुश्किलों से उबर चुका है, विभाजन से, हिंसा से, निराशा से। उसने हर बार अपनी आत्मा बचाई है। और आज, शायद हम फिर उसी मोड़ पर खड़े हैं जहां से इतिहास मुड़ता है। भावना शुरुआत कर सकती है, लेकिन असली बदलाव के लिए उसे काम में बदलना होगा… और बदलना होगा बहस को निर्णय में, विचार को क्रियान्वयन में, और स्वप्न को वास्तविकता में। बंगाल