सैफ अली खान पर हमले के आरोपी ने जुर्म कबूला:शरीफुल इस्लाम ने कोर्ट से नरमी की अपील की, पेट में फंसा था चाकू का टुकड़ा

सैफ अली खान पर हमले के आरोपी मोहम्मद शरीफुल इस्लाम ने अपना अपराध स्वीकार करने की अर्जी दायर की है। उसने अदालत से नरमी बरतने की अपील भी की है। उसके वकील विपुल दुशिंग ने इसकी पुष्टि की है। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने अभियोजन पक्ष से जवाब दाखिल करने को कहा है और सुनवाई 11 सितंबर तक टाल दी है। 16 जनवरी 2025 की देर रात सैफ के घर में लूट की नीयत से घुसे शख्स ने उन पर हमला किया था। घटना के दो दिन बाद शरीफुल इस्लाम की गिरफ्तारी हुई थी, जो अब तक न्यायिक हिरासत में है। इस महीने की शुरुआत में एडिशनल सेशंस जज जीपी देशमुख ने शरीफुल इस्लाम पर आरोप तय किए थे। इसके साथ ही मामले में ट्रायल का रास्ता साफ हो गया। इस्लाम पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत घातक हथियार का इस्तेमाल करके लूटपाट, गंभीर चोट पहुंचाने और घर में जबरन घुसने के आरोप लगाए गए हैं। उस पर फॉरेनर्स एक्ट और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) नियमों की संबंधित धाराएं भी लगाई गई हैं। जांच में सामने आया था कि शरीफुल इस्लाम बांग्लादेशी है, जो फर्जी डॉक्यूमेंट्स की मदद से गैरकानूनी ढंग से भारत में रह रहा है। हमले के बाद बेटे ने पूछा था- क्या आप मरने वाले हैं हाल ही में मोजो स्टोरी को दिए इंटरव्यू में सैफ ने हमले पर बात करते हुए कहा था, ‘मैं बच्चों के कमरे में गया। वह शख्स बच्चे (जेह) को पकड़े हुए था। उसने बच्चे को हल्की चोट पहुंचाई थी और हमारी मेड को भी जख्मी कर दिया था। शायद अगर मैं पहले लाइट जला देता और उससे बात करने की कोशिश करता, तो स्थिति अलग हो सकती थी। लेकिन उस समय मैंने बिना सोचे-समझे उस पर हमला कर दिया और हमारी हाथापाई शुरू हो गई। इसके बाद वह चाकू लेकर बेकाबू हो गया। चारों तरफ खून और अफरा-तफरी मच गई।’ आगे सैफ ने कहा, ‘मैं वाकई तैमूर के साथ रहना चाहता था। मैंने उससे पूछा कि क्या तुम मेरे साथ हॉस्पिटल आओगे। उसने मुझे देखा और पूछा, ‘क्या आप मरने वाले हैं?’ मैंने कहा, ‘नहीं, मेरी पीठ में बहुत दर्द है, लेकिन मैं ठीक हो जाऊंगा’, उसने कहा, हां मैं चलूंगा।’ सैफ ने ये भी कहा कि उस शख्स ने उन्हें पूरी ताकत से चाकू मारा था। चाकू का 6 इंच का टुकड़ा उनकी पीठ में रह गया था। वो टुकड़ा रीड़ की हड्डी के पास लगा था। सैफ ने कहा, ‘मेरा एक पैर सुन्न हो रहा था, मैं पैरालाइज होने के बेहद करीब था।’ हमला करने वाले शख्स को माफ करना चाहते हैं सैफ इसी इंटरव्यू में सैफ ने कहा है कि वो हमला करने वाले शख्स को माफ करना चाहते हैं। सैफ ने कहा, “मैं उस आदमी को माफ भी करना चाहता था, क्योंकि मुझे लगता है कि उसने बहुत बड़ी गलती की। मुझे नहीं लगता कि वह झगड़ा करना चाहता था। मैं उसे खुशी-खुशी माफ कर देता, लेकिन जिस तरह से उसने मुझे मारने की कोशिश की, उसे भूल पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है। यह अमीर और गरीब का मामला है और इसी असमानता की वजह से ऐसा हुआ है।”
क्या RSS पर बैन लगाएंगे ट्रम्प:अमेरिका के धार्मिक कमीशन ने क्यों की ये सिफारिश; मोहन भागवत के अमेरिकी दौरे पर हंगामा बढ़ा

संघ प्रमुख मोहन भागवत अमेरिका के दौरे पर हैं। इस बीच वहां मांग उठ रही हैं- RSS पर बैन लगे। यह मांग अमेरिकी सरकार का धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF के चेयरमैन डॉ. आसिफ महमूद और कमिश्नर जीन मिल्स ने की है। मार्च में इसी आयोग ने अपनी सालाना रिपोर्ट में भी RSS पर प्रतिबंध की सिफारिश की थी। इस मांग का आधार क्या है, RSS पर क्या आरोप लगाए गए हैं और क्या ट्रम्प RSS पर बैन लगाएंगे; इसी पर आज का एक्सप्लेनर… सवाल-1: अमेरिका में RSS पर पाबंदी को लेकर कौन सवाल उठा रहा है? जवाब: मोहन भागवत 25 अगस्त से 19 दिन के विदेश दौरे पर हैं। पहला पड़ाव अमेरिका है, फिर कनाडा और ब्रिटेन। RSS पर प्रतिबंधों को लेकर तीन प्रमुख लोगों ने बयान दिए हैं- 19 अगस्त को USCIRF के कमिश्नर जीन मिल्स ने कहा, ‘RSS नेता भले ही भारतीय सरकार से जुड़े हों, लेकिन उन्हें अमेरिका में हाई-लेवल मीटिंग्स और डिप्लोमेसी में तरजीह नहीं दी जानी चाहिए। अमेरिकी सरकार को धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के दोषी पाए गए RSS सदस्यों पर बैन लगाना चाहिए।’ USCIRF के चेयरमैन डॉ. आसिफ महमूद ने भी कहा, ‘भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RSS के सदस्य हैं। ये एक ऐसा भारतीय संगठन है, जिससे जुड़े समूहों ने ईसाई और मुस्लिम समेत धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले किए हैं। अब RSS नेता मोहन भागवत अमेरिका आ रहे हैं।’ कमीशन की पूर्व चेयरपर्सन नादिन मेंजा ने भी अमेरिकी मैगजीन ‘प्रोविडेंस’ में लिखा, ‘भागवत जिस एकता और सद्भाव की बात करते हैं, वह संघ की जमीनी हरकतों से बिल्कुल अलग है। संघ के रवैये के लिए उसे बैन किया जाना चाहिए।’ सवाल-2: तो फिर इन बयानों का आधार क्या है और इसके पीछे की दलील क्या है? जवाब: RSS पर पाबंदी की बात मार्च 2026 से शुरू हुई। अमेरिका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने अपनी सालाना रिपोर्ट जारी की। इसमें भारत से जुड़े 2 पन्ने हैं। इनमें 23 घटनाओं का जिक्र है- इन 10 प्रमुख घटनाओं के अलावा 13 और घटनाओं का जिक्र है, जिसमें 28 में से 12 राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों, रेवरेंड फ्रैंकलिन ग्राहम का वीजा रद्द करने और गौ संरक्षण के नाम पर हत्या करने जैसी घटनाएं शामिल हैं। इन घटनाओं में USCIRF ने विश्व हिंदू परिषद (VHP), भारतीय जनता पार्टी (BJP) या उसकी सरकारों, हिंदू राष्ट्रवादी नेता और संगठन का जिक्र किया है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का सिर्फ एक जगह जिक्र है। वो भी Targeted Sanctions, यानी प्रतिबंध लगाने की सिफारिश के सेक्शन में। USCIRF का कहना है कि RSS की संपत्तियां जब्त कर लेनी चाहिए और उसके सदस्यों के अमेरिका आने पर रोक या वीजा रद्द कर देना चाहिए। सवाल-3: RSS पर बैन की मांग करने वाला ये USCIRF आखिर है क्या? जवाब: USCIRF की शुरुआत 3 दशक पहले हुई… आयोग बनने की कहानी आयोग का स्ट्रक्चर USCIRF में संसद के जरिए नियुक्त 9 कमिश्नर होते हैं, जो दोनों पार्टियों से होते हैं। एक कमिश्नर को चेयरमैन बनाया जाता है। फिलहाल पाकिस्तानी मूल के डॉ. आसिफ महमूद इसके चेयरमैन हैं। आयोग का काम आयोग की ताकत आयोग अपनी सालाना रिपोर्ट अमेरिकी विदेश मंत्रालय को सौंपता जरूर है, लेकिन खुद कोई कार्रवाई नहीं कर सकता, सिर्फ सिफारिशें देता है। सवाल-4: क्या वाकई अमेरिका में RSS पर बैन लग सकता है? जवाबः नहीं, फिलहाल ऐसा नहीं लगता। इसकी 4 बड़ी वजहें हैं… सवाल-5: पाबंदी की इस मांग पर भारत सरकार और RSS का क्या रुख है? जवाबः भारत के विदेश मंत्रालय ने USCIRF को पूर्वाग्रह से ग्रसित और जीरो भरोसे वाली संस्था बताया है। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने 21 अगस्त को कहा, ‘USCIRF सालों से भारत के खिलाफ भ्रामक, गलत और भड़काऊ बयान देती रही है। हमें ऐसी संस्थाओं को नजरअंदाज करना चाहिए, क्योंकि ये अपने छिपे हुए एजेंडे के तहत काम करती हैं और इनकी कोई विश्वसनीयता नहीं बची है।’ वहीं RSS ने फिलहाल इस पर कोई बात नहीं कही है। हालांकि 24 अगस्त को VHP के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने सोशल मीडिया ‘X’ पर लिखा, ‘USCIRF के मन में सनातन धर्म, हिंदू समाज और भारत के प्रति गहरी नफरत है। हाल में RSS के प्रति जो नफरत दिखाई है, वह हिंदूफोबिया से प्रेरित उसके जाने-पहचाने एजेंडे का एक हिस्सा है।’ मार्च में भारत के पूर्व जजों और अधिकारियों ने एक बयान जारी कर USCIRF रिपोर्ट को दिमागी तौर पर दिवालिया और स्वार्थी बताया था। 275 अफसरों ने इस बयान पर दस्तखत किए थे, जिसमें 25 रिटायर्ड जज, 10 राजदूतों समेत 119 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स और 131 आर्म्ड फोर्सेस के अधिकारी थे। सवाल-6: USCIRF पर क्यों उठ रहे हैं सवाल, पाकिस्तान से क्या है कनेक्शन? जवाबः USCIRF के मौजूदा चेयरमैन डॉ. आसिफ महमूद पाकिस्तानी मूल के अमेरिकी हैं। वे पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गुजरात जिले के खारियान गांव में जन्मे। उन्होंने कराची के सिंध मेडिकल कॉलेज से मेडिकल डिग्री ली, फिर 1990 के दशक के आखिर में अमेरिका चले गए। अमेरिका के कैलिफोर्निया में महमूद प्रैक्टिस करने लगे। बाद में अमेरिका की नागरिकता मिल गई। उन्होंने डेमोक्रेटिक पार्टी से राजनीति भी की है। 2008 से 2016 तक डेमोक्रेटिक नेशनल कन्वेंशन में डेलिगेट रहे। 2022 में कैलिफोर्निया से अमेरिकी कांग्रेस के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। फिर 2024 में डेमोक्रेटिक हाउस माइनॉरिटी लीडर हाकीम जेफ्रीज ने उन्हें USCIRF में नियुक्त हुए। जुलाई 2026 में चेयरमैन चुने गए। 2019 में जब भारत सरकार ने आर्टिकल 370 हटाया, तब महमूद ने जम्मू-कश्मीर में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच के लिए अमेरिकी संसदीय सुनवाई कराने के लिए लॉबिंग की थी। महमूद ने कहा था, ‘कश्मीरी अकेले नहीं हैं। हम तब तक उनके साथ खड़े रहेंगे, जब तक कि उन सभी के मानवाधिकार सुरक्षित नहीं हो जाते।’ महमूद पर सवाल उठते रहे हैं- ——————————– ये भी पढ़ें- ‘मोहन भागवत का कार्यक्रम सिर्फ हिंदुओं के लिए नहीं’: आयोजक बोले- 16 धर्मों के लोग आएंगे, विरोध करने वाले भी आएं HSS के ग्लोबल कोऑर्डिनेटर सौमित्र गोखले ने 2019 में अमेरिका के ह्यूस्टन में हाऊडी मोदी कार्यक्रम करवाया था, जिसमें 50 हजार लोग जमा हुए थे। इस बार चीफ गेस्ट RSS प्रमुख मोहन भागवत हैं। कई संगठन उनका विरोध कर रहे हैं। दैनिक भास्कर ने अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेंजमेंट एंड
पगड़ी पहने पंजाबी युवकों को होटल में नहीं मिली एंट्री:ऑस्ट्रिया में करवाया था बुक, बोले- पैसे भी रिफंड नहीं किए; प्रबंधन ने बताया ड्रेस कोड

पंजाब के सिख युवकों को ऑस्ट्रिया के साल्जबर्ग शहर में स्थित कूल मामा होटल ने एंट्री नहीं दी। मोहाली में ट्रेडिंग फर्म चलाने वाले सिख युवक जसप्रीत ने दावा किया कि होटल मैनेजमेंट ने कहा कि पगड़ी वाले यहां नहीं रह सकते। उन्होंने 27 अगस्त को होटल की ऑनलाइन बुकिंग कराई थी। जब निकालने का कारण पूछा तो बताया गया कि होटल का ड्रेस कोड है, यहां पगड़ी की इजाजत नहीं है। इनसे रिफंड मांगा तो पैसा रिफंड नहीं किया गया। जसप्रीत ने इसका वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया है। होटल मैनजमेंट ने कहा कि बुकिंग से पहले ही हमने अपनी वेबसाइट पर मेंशन किया है कि पगड़ी वालों के लिए होटल, रेस्टोरेंट और बार बुक नहीं होगा। 5 पॉइंट में जानें जसप्रीत ने क्या कहा.. होटल की वेबसाइट पर ड्रेस कोड का जिक्र कूल मामा होटल ने अपनी वेबसाइट पर स्काई रेस्तरां और ब्रेकफास्ट के लिए ड्रेस कोड और कुछ सख्त नियम बताए हैं। होटल प्रबंधन के मुताबिक, रेस्तरां के शांत और खास माहौल को बनाए रखने के लिए मेहमानों से शालीन और उपयुक्त पहनावा रखने की उम्मीद की जाती है।
टॉक्सिक एक्ट्रेस रुक्मिणी के पिता को मिला था अशोक चक्र:कर्नल वसंत वेणुगोपाल उरी में आठ आतंकियों से लड़े थे, परिवार ने सेवा परंपरा जारी रखी

एक्ट्रेस रुक्मिणी वसंत इन दिनों यश की फिल्म ‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ को लेकर चर्चा में हैं। इस फिल्म से अलग रुक्मिणी की जिंदगी की कहानी भी प्रेरणादायक है। जब वह सिर्फ 10 साल की थीं, तब उनके पिता कर्नल वसंत वेणुगोपाल जम्मू-कश्मीर के उरी में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए थे। बताया जाता है कि ऑपरेशन में करीब 8 आतंकवादी शामिल थे। कर्नल वसंत ने आतंकियों का बहादुरी से मुकाबला किया और बाद में उन्हें देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी और बेटियों ने भी सैनिक परिवारों की मदद का काम आगे बढ़ाया। कौन थे कर्नल वसंत वेणुगोपाल? रुक्मिणी वसंत के पिता कर्नल वसंत वेणुगोपाल भारतीय सेना में अधिकारी थे। वह 9वीं बटालियन, मराठा लाइट इन्फैंट्री के कमांडिंग ऑफिसर थे। 31 जुलाई 2007 को वह जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे थे। आतंकियों का एक समूह लाइन ऑफ कंट्रोल के रास्ते भारत में घुसने की कोशिश कर रहा था। रुक्मिणी ने अपने इंटरव्यू में बताया था कि इस ऑपरेशन में करीब 8 आतंकवादी शामिल थे। सेना ने सभी आतंकियों को मार गिराया, लेकिन मुठभेड़ में कर्नल वसंत और उनके रेडियो ऑपरेटर की शहादत हो गई। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। रुक्मिणी के मुताबिक, कर्नल वसंत कर्नाटक से अशोक चक्र पाने वाले पहले सेना अधिकारी थे। बेटी के लिए पिता थे बेहद खास रुक्मिणी ने अपने पिता को याद करते हुए कई मौकों पर उनके बारे में बात की है। उन्होंने बताया कि पिता बेहद प्यार करने वाले इंसान थे, लेकिन एक सैनिक के तौर पर भी पूरी तरह समर्पित थे। कर्नल वसंत का मानना था कि एक अधिकारी को अपने जवानों का नेतृत्व सबसे आगे रहकर करना चाहिए। इसी सोच के साथ वह ऑपरेशन में भी अपनी टीम का नेतृत्व करते थे। रुक्मिणी उस समय महज 10 साल की थीं। इतनी कम उम्र में पिता को खोने का उनके जीवन पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने बताया है कि बचपन में हुई इस घटना की हर बात उन्हें याद नहीं है, लेकिन पिता की यादें आज भी उनके साथ हैं। पति की शहादत के बाद अकेले बेटियों को पाला कर्नल वसंत की शहादत के बाद उनकी पत्नी सुभाषिनी वसंत के सामने दो बेटियों की जिम्मेदारी आ गई। सुभाषिनी भरतनाट्यम डांसर हैं। पति की शहादत के करीब छह महीने बाद उन्होंने ‘वसंतरत्न फाउंडेशन फॉर आर्ट’ की शुरुआत की। इसका उद्देश्य शहीद सैनिकों के परिवारों और उनकी विधवाओं की मदद करना है। रुक्मिणी ने बताया था कि उनके पिता शहीद सैनिकों के परिवारों से लगातार मिलते थे। वह उनके घर जाते, परिवार के साथ समय बिताते और उनकी परेशानियों को समझने की कोशिश करते थे। कई बार सुभाषिनी भी उनके साथ जाती थीं। पिता की मौत के बाद सुभाषिनी ने इसी काम को आगे बढ़ाने का फैसला किया। अशोक चक्र के बाद मुआवजे के लिए भी करना पड़ा संघर्ष कर्नल वसंत की शहादत के बाद परिवार को एक और संघर्ष से गुजरना पड़ा। अशोक चक्र विजेता के परिवार को मुआवजे के तौर पर जमीन देने का प्रावधान था, लेकिन इसे हासिल करने के लिए सुभाषिनी को कई बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े। 1971 के कर्नाटक सरकार के आदेश के तहत अशोक चक्र प्राप्त करने वाले व्यक्ति के परिवार को 1.25 लाख रुपए या दो एकड़ सिंचित जमीन देने का प्रावधान था। कई साल बाद सुभाषिनी ने इस नियम पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बढ़ती महंगाई के दौर में यह राशि बेहद कम थी और नियम में बदलाव की जरूरत थी। 2016 में ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि अपने अधिकार के लिए सरकारी अधिकारियों के पास बार-बार जाना उनके लिए बेहद मुश्किल अनुभव था। पिता की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं रुक्मिणी कर्नल वसंत की शहादत के बाद उनके परिवार ने सैनिकों और उनके परिवारों की मदद का काम जारी रखा। वहीं रुक्मिणी ने एक्टिंग की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। आज वह कन्नड़ सिनेमा की चर्चित अभिनेत्रियों में शामिल हैं और यश की फिल्म ‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ में नजर आ रही हैं। रुक्मिणी की कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री के संघर्ष और सफलता की नहीं है। इसके पीछे एक शहीद पिता की विरासत, मां की जिम्मेदारी और सैनिक परिवारों की मदद करने की सोच भी है, जिसे उनका परिवार आज तक आगे बढ़ा रहा है।_ ________________________________ यह खबर भी पढ़ें.. बॉक्स ऑफिस कलेक्शन- टॉक्सिक की कमाई में 64% गिरावट:नेगेटिव रिव्यू का असर, पहले दिन से तीन गुना कम कमाई हुई, वर्ल्डवाइड कलेक्शन 137 करोड़ रुपए कन्नड़ स्टार यश की फिल्म टॉक्सिक पर नेगेटिव रिव्यू और रेटिंग का बुरा असर पड़ा है। पहले दिन दर्शक बड़ी संख्या में ये फिल्म देखने पहुंचे और भारत में फिल्म ने करीब 101 करोड़ रुपए का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन कर लिया। हालांकि खराब रिव्यू के चलते दूसरे दिन ही फिल्म की कमाई में 64% गिरावट आ गई। फिल्म ने पहले दिन के मुकाबले तीन गुना कम कमाई की है।पूरी खबर पढ़ें..
टॉक्सिक एक्ट्रेस रुक्मिणी के पिता को मिला था अशोक चक्र:कर्नल वसंत वेणुगोपाल उरी में आठ आतंकियों से लड़े थे, परिवार ने सेवा परंपरा जारी रखी

एक्ट्रेस रुक्मिणी वसंत इन दिनों यश की फिल्म ‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ को लेकर चर्चा में हैं। इस फिल्म से अलग रुक्मिणी की जिंदगी की कहानी भी प्रेरणादायक है। जब वह सिर्फ 10 साल की थीं, तब उनके पिता कर्नल वसंत वेणुगोपाल जम्मू-कश्मीर के उरी में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान शहीद हो गए थे। बताया जाता है कि ऑपरेशन में करीब 8 आतंकवादी शामिल थे। कर्नल वसंत ने आतंकियों का बहादुरी से मुकाबला किया और बाद में उन्हें देश के सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी और बेटियों ने भी सैनिक परिवारों की मदद का काम आगे बढ़ाया। कौन थे कर्नल वसंत वेणुगोपाल? रुक्मिणी वसंत के पिता कर्नल वसंत वेणुगोपाल भारतीय सेना में अधिकारी थे। वह 9वीं बटालियन, मराठा लाइट इन्फैंट्री के कमांडिंग ऑफिसर थे। 31 जुलाई 2007 को वह जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे ऑपरेशन का नेतृत्व कर रहे थे। आतंकियों का एक समूह लाइन ऑफ कंट्रोल के रास्ते भारत में घुसने की कोशिश कर रहा था। रुक्मिणी ने अपने इंटरव्यू में बताया था कि इस ऑपरेशन में करीब 8 आतंकवादी शामिल थे। सेना ने सभी आतंकियों को मार गिराया, लेकिन मुठभेड़ में कर्नल वसंत और उनके रेडियो ऑपरेटर की शहादत हो गई। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया। रुक्मिणी के मुताबिक, कर्नल वसंत कर्नाटक से अशोक चक्र पाने वाले पहले सेना अधिकारी थे। बेटी के लिए पिता थे बेहद खास रुक्मिणी ने अपने पिता को याद करते हुए कई मौकों पर उनके बारे में बात की है। उन्होंने बताया कि पिता बेहद प्यार करने वाले इंसान थे, लेकिन एक सैनिक के तौर पर भी पूरी तरह समर्पित थे। कर्नल वसंत का मानना था कि एक अधिकारी को अपने जवानों का नेतृत्व सबसे आगे रहकर करना चाहिए। इसी सोच के साथ वह ऑपरेशन में भी अपनी टीम का नेतृत्व करते थे। रुक्मिणी उस समय महज 10 साल की थीं। इतनी कम उम्र में पिता को खोने का उनके जीवन पर गहरा असर पड़ा। उन्होंने बताया है कि बचपन में हुई इस घटना की हर बात उन्हें याद नहीं है, लेकिन पिता की यादें आज भी उनके साथ हैं। पति की शहादत के बाद अकेले बेटियों को पाला कर्नल वसंत की शहादत के बाद उनकी पत्नी सुभाषिनी वसंत के सामने दो बेटियों की जिम्मेदारी आ गई। सुभाषिनी भरतनाट्यम डांसर हैं। पति की शहादत के करीब छह महीने बाद उन्होंने ‘वसंतरत्न फाउंडेशन फॉर आर्ट’ की शुरुआत की। इसका उद्देश्य शहीद सैनिकों के परिवारों और उनकी विधवाओं की मदद करना है। रुक्मिणी ने बताया था कि उनके पिता शहीद सैनिकों के परिवारों से लगातार मिलते थे। वह उनके घर जाते, परिवार के साथ समय बिताते और उनकी परेशानियों को समझने की कोशिश करते थे। कई बार सुभाषिनी भी उनके साथ जाती थीं। पिता की मौत के बाद सुभाषिनी ने इसी काम को आगे बढ़ाने का फैसला किया। अशोक चक्र के बाद मुआवजे के लिए भी करना पड़ा संघर्ष कर्नल वसंत की शहादत के बाद परिवार को एक और संघर्ष से गुजरना पड़ा। अशोक चक्र विजेता के परिवार को मुआवजे के तौर पर जमीन देने का प्रावधान था, लेकिन इसे हासिल करने के लिए सुभाषिनी को कई बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े। 1971 के कर्नाटक सरकार के आदेश के तहत अशोक चक्र प्राप्त करने वाले व्यक्ति के परिवार को 1.25 लाख रुपए या दो एकड़ सिंचित जमीन देने का प्रावधान था। कई साल बाद सुभाषिनी ने इस नियम पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बढ़ती महंगाई के दौर में यह राशि बेहद कम थी और नियम में बदलाव की जरूरत थी। 2016 में ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि अपने अधिकार के लिए सरकारी अधिकारियों के पास बार-बार जाना उनके लिए बेहद मुश्किल अनुभव था। पिता की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं रुक्मिणी कर्नल वसंत की शहादत के बाद उनके परिवार ने सैनिकों और उनके परिवारों की मदद का काम जारी रखा। वहीं रुक्मिणी ने एक्टिंग की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। आज वह कन्नड़ सिनेमा की चर्चित अभिनेत्रियों में शामिल हैं और यश की फिल्म ‘टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स’ में नजर आ रही हैं। रुक्मिणी की कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री के संघर्ष और सफलता की नहीं है। इसके पीछे एक शहीद पिता की विरासत, मां की जिम्मेदारी और सैनिक परिवारों की मदद करने की सोच भी है, जिसे उनका परिवार आज तक आगे बढ़ा रहा है।_ ________________________________ यह खबर भी पढ़ें.. बॉक्स ऑफिस कलेक्शन- टॉक्सिक की कमाई में 64% गिरावट:नेगेटिव रिव्यू का असर, पहले दिन से तीन गुना कम कमाई हुई, वर्ल्डवाइड कलेक्शन 137 करोड़ रुपए कन्नड़ स्टार यश की फिल्म टॉक्सिक पर नेगेटिव रिव्यू और रेटिंग का बुरा असर पड़ा है। पहले दिन दर्शक बड़ी संख्या में ये फिल्म देखने पहुंचे और भारत में फिल्म ने करीब 101 करोड़ रुपए का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन कर लिया। हालांकि खराब रिव्यू के चलते दूसरे दिन ही फिल्म की कमाई में 64% गिरावट आ गई। फिल्म ने पहले दिन के मुकाबले तीन गुना कम कमाई की है।पूरी खबर पढ़ें..
राखी पर रामदेव ने कंगना के लिए भेजी मिठाइयां-रुपए:बोले- विवाद खत्म करें; कंगना ने कहा था- बाबा मेरे बेडरूम में चमगादड़ बनकर लटका

रक्षाबंधन पर योग गुरु बाबा रामदेव ने अभिनेत्री और सांसद कंगना रनोट के लिए मिठाई और उपहार भेजा। उन्होंने एक सफेद लिफाफे में 500 रुपए के नोटों की गड्डी भी भेजी। इस दौरान रामदेव ने कहा कि रिश्तों में मिठास बनी रहनी चाहिए और पुराने गिले-शिकवे भुलाकर प्रेम के साथ आगे बढ़ना चाहिए। रामदेव ने कहा कि देश में किसी भी कारण से नफरत और एक-दूसरे के प्रति वैर-भाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों उनके और कंगना रनोट के बीच विवाद की चर्चा हुई थी, जिसे संवाद के जरिए खत्म किया जाना चाहिए। रामदेव ने यह भी कहा कि वे कंगना को फोन कर रक्षाबंधन की शुभकामनाएं देंगे। इसके बाद कंगना ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर रामदेव का वीडियो शेयर किया। उन्होंने लिखा- “त्योहार का दिन होता है सब भूल-चूक माफ करने के लिए। मेरे भाई बाबा रामदेव जी ने बहुत अच्छी बात कही कि विवाद नहीं, संवाद होना चाहिए। आज रक्षाबंधन के दिन मैं उनकी मिठाई और बड़े भाई का प्रेम, दोनों स्वीकार करती हूं। बहुत धन्यवाद। ईश्वर आपको लंबी आयु दे।” पहले जानिए विवाद कैसे शुरू हुआ कंगना रनोट ने जेन-जी प्रोटेस्टर्स को गटरछाप कहा था। टीवी 9 भारतवर्ष के साथ बातचीत में बाबा रामदेव ने कंगना के बयान पर कहा था, “उनका क्वालिफिकेशन क्या है? उनका बचपन कैसा रहा है? उनकी जवानी कैसी रही है? उनके पहले के कारनामे कैसे रहे हैं? मैं ऐसे लोगों के बारे में बात नहीं करना चाहता। ऐसे किसी भी देश के युवा को, जेन Z को गटर-पटर बोलना, ये बिगड़े हुए दिमाग की निशानी है। गलत बात है। इसके ऊपर जो है, उनके पार्टी के लोगों को संज्ञान लेना चाहिए।” रामदेव की इस टिप्पणी के बाद कंगना ने भी पलटवार किया था। उन्होंने कहा था कि बाबा रामदेव को उनकी जवानी और बेडरूम के बारे में डे-ड्रीम नहीं करना चाहिए। कंगना ने फिर उठाया पुराना विवाद विवाद शांत होने के बाद अब कंगना ने एक बार फिर बाबा रामदेव की टिप्पणी का जिक्र किया है। डीडी न्यूज को दिए इंटरव्यू में कंगना ने कहा कि बाबा रामदेव उनसे पहले से ही नाराज चल रहे हैं। कंगना ने कहा, “अभी उनसे पूछा गया कि कंगना ने प्रोटेस्टर्स को गटरछाप कहा है, तो उन्होंने कहा, उसका बचपन देखा है क्या था, उसकी जवानी देखी है क्या थी। क्या बाबा रामदेव मेरे बेडरूम में चमगादड़ बनकर लटका हुआ था, उसने देखा है क्या था। क्या देखा। मुझे समझ नहीं आ रहा, ऐसा क्या देखा। बताना चाहिए था न कि क्या देखा।” अब रक्षाबंधन पर रामदेव ने भेजा गिफ्ट पुराने विवाद के बीच रक्षाबंधन पर बाबा रामदेव ने अपने बयान में साफ कहा कि पुराने गिले-शिकवे भुलाकर रिश्तों में मिठास बनाए रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि विवाद को संवाद से खत्म किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने कंगना को फोन कर रक्षाबंधन की शुभकामनाएं देने की बात भी कही। हम इस खबर को अपडेट कर रहे हैं…
ट्रम्प ने लेक ओंटारियो का नाम बदलकर लेक अमेरिका किया:इसके बीच अमेरिका-कनाडा का बॉर्डर; PM कार्नी बोले- जो नाम पहले था वही रहेगा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार को लेक ओंटारियो का नाम बदलकर ‘लेक अमेरिका’ करने के आदेश पर साइन किए। आदेश के मुताबिक, 30 दिनों में यह प्रक्रिया पूरी होगी और इसके बाद अमेरिका के सरकारी नक्शों व रिकॉर्ड में नया नाम इस्तेमाल किया जाएगा। ट्रम्प ने इस फैसले की तुलना मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलकर ‘अमेरिका की खाड़ी’ करने से की। उन्होंने मजाक में कहा कि अब अमेरिका के पास एक खाड़ी और एक झील है, शायद आगे अटलांटिक या प्रशांत महासागर का नाम बदलने के बारे में भी सोचना पड़े। वहीं, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने लेक ओंटारियो का नाम बदलने के फैसले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा- हम जानते हैं अमेरिका नाम बदल रहा है, लेकिन कनाडाई भी जानते हैं कि हकीकत में इसका नाम लेक ओंटारियो ही है। पहले भी, अब भी और हमेशा। कनाडा इस झील को लेक ओंटारियो ही बुलाएगा। लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा के बीच स्थित पांच बड़ी झीलों में से एक है। इसके एक तरफ न्यूयॉर्क और दूसरी तरफ कनाडा का ओंटारियो प्रांत है। दोनों देशों की सीमा भी इसी झील से होकर गुजरती है। ट्रम्प ने कहा था- नाम बदलने पर विचार कर रहा ट्रम्प ने 25 अगस्त को पहली बार लेक ओंटारियो का नाम बदलने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि अमेरिका का कनाडा के साथ ज्यादा कारोबार होने की उम्मीद नहीं है, इसलिए झील का नाम बदलने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इसके दो दिन बाद उन्होंने इस फैसले को आधिकारिक बनाने के लिए आदेश पर साइन कर दिए। ट्रम्प ने अपने आदेश में कहा कि लेक ओंटारियो अमेरिका की अर्थव्यवस्था और विरासत का अहम हिस्सा है। यह व्यापार, जहाजरानी, रक्षा, कृषि और ऊर्जा के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि ग्रेट लेक्स के संरक्षण पर अमेरिका ने पिछले 10 साल में करीब 4 अरब डॉलर यानी 38 हजार करोड़ रुपए खर्च किए हैं। अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापार को लेकर तनाव नाम बदलने का फैसला अमेरिका और कनाडा के बीच बढ़ते व्यापारिक तनाव के बीच आया है। हाल ही में अमेरिका ने कनाडा के करीब 20 अरब डॉलर यानी लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपए के सामान पर 50% टैरिफ लगाने का फैसला किया है। इसके जवाब में कनाडा ने भी अमेरिकी सामान पर उतना ही टैरिफ लगाने का ऐलान किया। ट्रम्प ने कहा कि व्यापार के मामले में कनाडा से निपटना सबसे मुश्किल है। उन्होंने आरोप लगाया कि कनाडा अमेरिका के साथ ठीक व्यवहार नहीं करता और वह किसी भी हाल में यह स्वीकार नहीं कर सकते। लेक ओंटारियो के नाम पर पड़ा ओंटारियो प्रांत का नाम लेक ओंटारियो का नाम यूरोपीय लोगों के अमेरिका पहुंचने से भी पहले से चला आ रहा है। यह नाम ह्यूरॉन समुदाय की भाषा के एक शब्द से निकला है, जिसका अर्थ ‘चमकते पानी की झील’ बताया जाता है। बाद में कनाडा के ओंटारियो प्रांत का नाम भी इसी झील के नाम पर रखा गया। हालांकि, नाम बदलने को लेकर एक अहम बात है। दुनिया की अंतरराष्ट्रीय झीलों और जलक्षेत्रों के नाम तय करने वाली कोई एक वैश्विक संस्था नहीं है। अमेरिका अपने सरकारी दस्तावेजों और नक्शों में इसे ‘लेक अमेरिका’ कह सकता है, लेकिन कनाडा अपनी तरफ से पुराने नाम ‘लेक ओंटारियो’ का इस्तेमाल जारी रख सकता है। क्या अमेरिका अकेले नाम बदल सकता है? अमेरिकी सरकार अपने आधिकारिक दस्तावेजों, सरकारी नक्शों और रिकॉर्ड में किसी जगह के लिए नया नाम इस्तेमाल करने का फैसला कर सकती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे देश भी उस नाम को स्वीकार करने के लिए बाध्य होंगे। लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा दोनों से जुड़ी है। इसलिए अगर अमेरिकी सरकार अपने दस्तावेजों में इसे ‘लेक अमेरिका’ कहना शुरू भी कर दे, तो कनाडा अपने सरकारी रिकॉर्ड में ‘लेक ओंटारियो’ नाम जारी रख सकता है। दूसरे देश और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी अमेरिकी नाम को अपने आप अपनाने के लिए बाध्य नहीं होंगी। यानी नाम बदलने से झील का मालिकाना हक नहीं बदल जाएगा। ‘लेक अमेरिका’ नाम इस्तेमाल करने से झील का कनाडाई हिस्सा अमेरिकी क्षेत्र नहीं बन जाएगा। ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ का नाम बदल चुके हैं ट्रम्प ट्रम्प के लिए किसी जगह का नाम बदलना नया नहीं है। जनवरी 2025 में उन्होंने ‘गल्फ ऑफ मेक्सिको’ को अमेरिकी सरकारी इस्तेमाल के लिए ‘गल्फ ऑफ अमेरिका’ करने का आदेश दिया था। इसके बाद अमेरिकी एजेंसियों ने अपने रिकॉर्ड और नक्शों में नया नाम इस्तेमाल करना शुरू किया, लेकिन मेक्सिको ने इसे स्वीकार नहीं किया। तब मेक्सिको ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून का हवाला देते हुए कहा था कि अमेरिका अपने अधिकार क्षेत्र के आधार पर पूरे गल्फ का नाम अकेले नहीं बदल सकता। हालांकि, लेक ओंटारियो और गल्फ ऑफ मेक्सिको की कानूनी स्थिति अलग है। गल्फ समुद्री क्षेत्र है, जबकि लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा के बीच साझा झील है। अमेरिका-कनाडा के बीच विवाद की 5 बड़ी वजहें 1. टैरिफ की नई लड़ाई सबसे बड़ा विवाद टैरिफ को लेकर है। अमेरिका ने कनाडा के करीब 20 अरब डॉलर के सामान पर 50% तक अतिरिक्त शुल्क लगाया है। इसमें शराब, डेयरी, फर्नीचर, हॉकी उपकरण और कई दूसरे सामान शामिल हैं। बातचीत टूटने के बाद कनाडा ने भी डॉलर-फॉर-डॉलर जवाबी टैरिफ लगाने का फैसला किया है। 2. कनाडा को 51वां राज्य कहना ट्रम्प कई बार कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात कह चुके हैं। ट्रम्प का कहना है कि अमेरिका व्यापार के मामले में कनाडा को अरबों डॉलर का फायदा पहुंचाता है। यदि कनाडा अमेरिका का हिस्सा बन जाता है, तो यह व्यापारिक असमानता और टैरिफ से जुड़े विवाद अपने आप खत्म हो जाएंगे। 3. ट्रूडो को कनाडा का गवर्नर कहना ट्रम्प ने कई बार कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को तंजिया लहजे में ‘गवर्नर’ कहकर संबोधित किया था। कनाडाई नेताओं और जनता ने इसे अपनी संप्रभुता का अपमान माना। 4. सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और फेंटानिल तस्करी अमेरिका और कनाडा के बीच बढ़ती सीमा सुरक्षा चिंताएं भी बड़े विवाद का कारण बनी हैं। ट्रम्प प्रशासन का आरोप रहा है कि कनाडा की उत्तरी सीमा से अवैध प्रवासियों की घुसपैठ और खतरनाक नशीली दवाओं (विशेषकर फेंटानिल) की तस्करी अमेरिका में बढ़ रही है।
ट्रम्प ने लेक ओंटारियो का नाम बदलकर लेक अमेरिका किया:यह अमेरिका और कनाडा का बॉर्डर; दोनों देशों की पांच बड़ी झीलों में शामिल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार को लेक ओंटारियो का नाम बदलकर ‘लेक अमेरिका’ करने के आदेश पर हस्ताक्षर किए। यह बदलाव अमेरिका के सरकारी नक्शों और भौगोलिक नामों में लागू होगा। हालांकि, ट्रम्प कनाडा को इस नए नाम का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। ट्रम्प ने यह फैसला ऐसे समय लिया है, जब अमेरिका और कनाडा के बीच व्यापार को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। हाल ही में अमेरिका ने कनाडा से आने वाले करीब 20 अरब डॉलर के सामान पर 50% शुल्क लगाने का ऐलान किया था। ट्रम्प ने कनाडा को व्यापार के मामले में ‘सबसे मुश्किल’ देश बताते हुए कहा कि उसके रवैये को स्वीकार नहीं किया जा सकता। नाम बदलने का फैसला ट्रम्प के लिए नया नहीं है। पिछले साल उन्होंने मैक्सिको की खाड़ी का नाम बदलकर ‘अमेरिका की खाड़ी’ करने का आदेश दिया था। अब लेक ओंटारियो का नाम बदलने का फैसला भी कनाडा के साथ बढ़ते तनाव के बीच आया है। लेक ओंटारियो अमेरिका और कनाडा के बीच स्थित पांच बड़ी झीलों में से एक है। इसका एक हिस्सा अमेरिका के न्यूयॉर्क राज्य से और दूसरा हिस्सा कनाडा के ओंटारियो प्रांत से जुड़ा है। झील के एक तरफ न्यूयॉर्क है, जबकि दूसरी तरफ कनाडा का सबसे बड़ा शहर टोरंटो स्थित है। दोनों देशों की सीमा भी इस झील के बीच से गुजरती है। लेक ओंटारियो का नाम यूरोपीय लोगों के अमेरिका पहुंचने से भी पहले से चला आ रहा है। यह नाम ह्यूरॉन समुदाय की भाषा के एक शब्द से निकला है, जिसका अर्थ ‘चमकते पानी की झील’ बताया जाता है। बाद में कनाडा के ओंटारियो प्रांत का नाम भी इसी झील के नाम पर रखा गया। हालांकि, नाम बदलने को लेकर एक अहम बात है। दुनिया की अंतरराष्ट्रीय झीलों और जलक्षेत्रों के नाम तय करने वाली कोई एक वैश्विक संस्था नहीं है। अमेरिका अपने सरकारी दस्तावेजों और नक्शों में इसे ‘लेक अमेरिका’ कह सकता है, लेकिन कनाडा अपनी तरफ से पुराने नाम ‘लेक ओंटारियो’ का इस्तेमाल जारी रख सकता है।
कंगना ने फिर साधा रामदेव बाबा पर निशाना:कहा- मेरी जवानी की बात करते हैं, क्या मेरे बेडरूम में चमगादड़ बनकर लटके थे, जानिए क्या है विवाद

कंगना रनोट ने कुछ समय पहले Gen-Z को गटरछाप कहा था। इस पर रामदेव बाबा ने कहा “उनका क्वालिफिकेशन क्या है? उनका बचपन कैसा रहा है? उनकी जवानी कैसी रही है? उनके पहले के कारनामे कैसे रहे हैं? मैं ऐसे लोगों के बारे में बात नहीं करना चाहता।” कंगना ने इस पर कहा कि बाबा रामदेव मेरी जवानी और बेडरूम के बारे में डे-ड्रीम न करें। विवाद लगभग खत्म हो चुका था, लेकिन कंगना ने फिर एक बार इस विवाद पर बयान दिया है। कंगना रनोट ने डीडी न्यूज को दिए इंटरव्यू में कहा है, ‘बाबा रामदेव मुझसे पहले ही नाराज चल रहे हैं। अभी उनसे पूछा गया कि कंगना ने प्रोटेस्टर्स को गटरछाप कहा है, तो उन्होंने कहा, उसका बचपन देखा है क्या था, उसकी जवानी देखी है क्या थी। क्या बाबा रामदेव मेरे बेडरूम में चमगादड़ बनकर लटका हुआ था, उसने देखा है क्या था। क्या देखा। मुझे समझ नहीं आ रहा, ऐसा क्या देखा। बताना चाहिए था न कि क्या देखा।’ कंगना रनोट ने इन विवादों पर भी दिया रिएक्शन- कृति सेनन एड विवाद- कंगना रनोट लगातार कृति सेनन के उस रक्षाबंधन एड की आलोचना कर रही हैं, जिसमें उन्होंने रिवीलिंग कपड़े पहने थे। कंगना ने इस विवाद पर कहा है कि क्या इस तरह के कपड़े किसी मुस्लिम फेस्टिवल में पहने दिखाए जा सकते हैं। एक्ट्रेस ने कहा कि एक फेस्टिवल कल्चर रिप्रेसेंट करता है, जिसमें इस तरह के ब्रालेट नहीं पहने जा सकते। भड़काऊ बयान देने पर रिएक्शन- कंगना ने लगातार मुद्दों पर विवादित बयान देने पर भी रिएक्शन दिया है। कंगना ने कहा कि अगर कॉकरोच है, तो उसे चप्पल से ही मारा जाएगा। उसे हाथ से नहीं मारा जाता या उसे किस नहीं किया जा सकता। वहीं अगर तितली हो, तो लोग उसे पकड़ते हैं, तस्वीरें क्लिक करते हैं। उनका कहना है कि जिस तरह के लोग बयान देते हैं, उस पर वो वैसे ही जवाब देती हैं। कंगना बोलीं- मैं बीजेपी की पपेट नहीं- कंगना ने बयानों को पार्टी से जोड़े जाने पर कहा, जब बहुत ज्यादा शोर होता है, तो कहीं न कहीं आपको भी चिल्लाना पड़ता है। मैं कई बार तगड़े बयान दे देती हूं, पर मैं जानबूझकर ऐसा नहीं करना चाहती। तो इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि मैं कोई पपेट थोड़ी ना हूं। बीजेपी आज मेरे साथ है, कल हो या ना हो। दो साल से मैं पार्लियामेंट की मेंबर हूं। 20 साल से मैं कलाकार हूं। मेरा एक वजूद है। मैं अगर खड़ी हो जाऊं तो 20 प्रेस वाले आएंगे और मेरी बात सुनेंगे।’ क्या था कंगना रनोट और रामदेव बाबा का पूरा विवाद? कंगना रनोट ने जेन-जी प्रोटेस्टर्स को गटरछाप कहा था। टीवी 9 भारतवर्ष के साथ बातचीत में बाबा रामदेव ने कंगना के बयान पर कहा था, “उनका क्वालिफिकेशन क्या है? उनका बचपन कैसा रहा है? उनकी जवानी कैसी रही है? उनके पहले के कारनामे कैसे रहे हैं? मैं ऐसे लोगों के बारे में बात नहीं करना चाहता। ऐसे किसी भी देश के युवा को, जेन Z को गटर-पटर बोलना, ये बिगड़े हुए दिमाग की निशानी है। गलत बात है। इसके ऊपर जो है, उनके पार्टी के लोगों को संज्ञान लेना चाहिए।” इस पर कंगना ने सोशल मीडिया पर लिखा, “बाबा जी, मेरी जवानी या बेडरूम के बारे में डे-ड्रीम मत कीजिए। कोई सिर्फ अफवाहों और गॉसिप के आधार पर ही ऐसा सोच सकता है। कम से कम मुझे कभी सुप्रीम कोर्ट से झूठे या फर्जी मेडिकल दावों को लेकर फटकार नहीं लगी। इसलिए मुझे चरित्र का पाठ मत पढ़ाइए। आपका चरित्र जैसा भी है, मेरा उससे कहीं बेहतर है। यहां कोई फ्रॉड नहीं मिला है।”
हरियाणवी सिंगर मासूम शर्मा के नए सॉन्ग पर कंट्रोवर्सी:ऑफिशियल ट्रैक जारी, बाबाओं-डेरों पर निशाना; यूजर्स ने लिखा-रामपाल, राम रहीम सबको लपेटा

बदमाशी कल्चर वाले गानों के लिए कंट्रोवर्सी में रहे हरियाणवी सिंगर मासूम शर्मा ने फिर सुर्खियों में हैं। 26 अगस्त को मासूम ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर नए सॉन्ग ‘तत्वदर्शी’ का साढ़े 3 मिनट ऑफिशियल ट्रैक जारी किया। जिसमें पाखंडी बाबाओं और डेरों को निशाने पर लिया है। इस गाने के लिरिक्स हरियाणवी सिंगर-कलाकार हैरी लाठर ने लिखे हैं। हैरी लाठर पहले भी बाबाओं को लेकर गाने गा चुके हैं। उनका ‘सिरसा आले बाबा की चेली’ सॉन्ग पर खूब कंट्रोवर्सी खड़ी हुई थी। लाठर ने इस बार खुद गाने की बजाय दोस्त मासूम शर्मा के लिए लिरिक्स लिखे। दैनिक भास्कर से बातचीत में हैरी लाठर ने स्पष्ट किया कि गाना किसी एक बाबा को टारगेट करके नहीं लिखा गया। सॉन्ग का वीडियो भी आएगा। नए सॉन्ग का ट्रैक रिलीज होते ही सोशल मीडिया पर कमेंट्स वॉर शुरू हो गई। कुछ सिंगर को ट्रोल कर रहे हैं, तो कुछ पक्ष ले रहे हैं। एक यूजर ने लिखा- भाई ने रामपाल को भी लपेट दिया, अब मासूम शर्मा की खैर नहीं, रामपाल वाले दिन-रात इसी का नाम लिया करेंगे। दूसरे यूजर ने लिखा- दो-चार रुपए के लिए नाचने वाला मासूम बताएगा कि सही-गलत क्या है। बहादुरगढ़ के यूजर का कमेंट है-मासूम ने रामपाल, राहरहीम, आसाराम, हांसी वाले बाबा, धीरेंद्र शास्त्री से लेकर उस सरकारी शंकराचार्य को लपेट दिया। लिरिक्स के जरिए बड़े बाबाओं पर निशाना हैरी लाठर ने सॉन्ग को लेकर कही ये 2 बड़ी बात महापंचायत में नहीं पहुंचे थे मासूम शर्मा सोशल मीडिया पर अश्लील कंटेंट, गानों में गन कल्चर, नशे और स्टेज पर अश्लील डांस के खिलाफ महम चौबीसी के ऐतिहासिक चबूतरे पर 25 जुलाई महापंचायत हुई थी। इसमें कई हरियाणवी कलाकार, खाप प्रतिनिधि व सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर आए थे और ऐसे कंटेंट पर रोक लगाने का समर्थन किया था। इसमें सिंगर मासूम शर्मा बीमार होने की बात कहकर नहीं पहुंचे थे। हालांकि वीडियो जारी कर मुहिम का समर्थन किया था। इस महापंचायत को कुछ दिन बाद ही मासूम ने हिमाचल प्रदेश में हुए एक कार्यक्रम में अपना बैन सॉन्ग एक खटौला जेल के भीतर गाया था। गन कल्चर को बढ़ावा देने के आरोप में मासूम शर्मा के 19 गाने सरकार ने यू-ट्यूब से हटाए गए थे। सरकार ने कुल 67 गाने हटाए थे, जिनमें सबसे ज्यादा मासूम शर्मा के ही थे। ये खबर भी पढ़ें… सिरसा आला बाबा सॉन्ग पर कॉन्ट्रोवर्सी:हरियाणवी सिंगर हैरी लाठर बोले- किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं; मासूम शर्मा के करीबी हरियाणवी सिंगर हैरी लाठर का नया सॉन्ग सुर्खियों के साथ कॉन्ट्रोवर्सी में भी है। सिरसा आला बाबा टाइटल से जारी सॉन्ग लिरिक्स के कारण चर्चा में है। इसके बोल हैं- “सिरसा आला बाबा सै जो लारा लार चेलियां की।” सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद यूजर्स गाने को लेकर अलग-अलग कमेंट कर रहे हैं। पढ़िएं पूरी खबर






