Wednesday, 16 Sep 2026 | 09:02 PM

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ईरान पर सबसे बड़े हमले की तैयारी में अमेरिका:ट्रम्प बोले- फैसला लेना बाकी; ईरान ने कहा- इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी

ईरान पर सबसे बड़े हमले की तैयारी में अमेरिका:ट्रम्प बोले- फैसला लेना बाकी; ईरान ने कहा- इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कि अमेरिका ईरान पर सबसे बड़ा हमला करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा, “तैयारी पूरी है, अब सिर्फ फैसला लेना बाकी है।” ट्रम्प का यह भी कहना है कि ईरान ने अभी तक “पर्याप्त दर्द नहीं झेला है।” ट्रम्प के बयान के बाद ईरान ने भी तुरंत जवाब दिया। विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि अगर अमेरिका ने हमले जारी रखे तो उसे इसकी “और भारी कीमत” चुकानी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि युद्ध खत्म करने का रास्ता बातचीत है, नए हमले नहीं। इधर, ब्रिटेन ने भी अपनी सेना को अलर्ट पर रखा है। ब्रिटिश सरकार का कहना है कि जरूरत पड़ने पर उसकी सेना देश की सुरक्षा के लिए तैयार है। इससे पहले ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) ने चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका ने ब्रिटेन के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल किया तो उन्हें भी निशाना बनाया जा सकता है। पिछले 24 घंटे के 5 बड़े अपडेट्स… 1. सऊदी के दो जहाजों पर हमला: यमन के हूती विद्रोहियों ने रेड सी में सऊदी अरब के दो तेल टैंकर एन्सेलिया और लैला पर बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और ड्रोन से हमला किया। संगठन का कहना है कि दोनों जहाजों में आग लग गई। 2. हूती विद्रोहियों के डर से 10 जहाजों ने रास्ता बदला: बाब अल-मंदेब स्ट्रेट पार करने की कोशिश कर रहे कम से कम 10 जहाजों को अपना रास्ता बदलना पड़ा है। अब ये जहाज अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा सफर तय कर रहे हैं। 3. ब्रिटेन ने अमेरिका को सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की मंजूरी दी: ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री एंडी बर्नहैम ने ईरान के खिलाफ अमेरिका को ब्रिटिश सैन्य अड्डों के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी है। हिंद महासागर में डिएगो गार्सिया और ग्लॉस्टरशायर का फेयरफोर्ड एयरबेस अमेरिकी विमानों के इस्तेमाल के लिए उपलब्ध रहेंगे। 4. भारत की अब तक 26,000 उड़ानें रद्द: अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण 20 जुलाई तक भारतीय एयरलाइंस को करीब 26 हजार अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। इसके अलावा कई उड़ानों का रास्ता बदला गया और उनमें देरी भी हुई। 5. ट्रम्प का 95 अरब डॉलर का रक्षा बजट पास: ट्रम्प को ईरान युद्ध के बीच बड़ी राजनीतिक जीत मिली है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 95 अरब डॉलर का रक्षा बजट प्रस्ताव 216-214 वोटों से मंजूर कर दिया।अब इसे मंजूरी के लिए सीनेट में जाएगा। इससे ईरान युद्ध और अन्य राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरतों के लिए अतिरिक्त फंड मिलेगा। ईरान जंग से जुड़े अपडेट्स के लिए नीचे ब्लॉग से गुजर जाइए…

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

सिनेमा में कई हीरो आए, कई सुपरस्टार बने, लेकिन एक अभिनेता ऐसा भी था जिसने पर्दे पर उपकार, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों के जरिए देशभक्ति को जिया। उनका नाम था मनोज कुमार। देशप्रम ही वो वजह था कि लोग उनका असली नाम भूलने लगे और उन्हें सिर्फ एक नाम से पुकारने लगे ‘भारत कुमार’। उनकी फिल्मों में दिखने वाला जज्बा, जुनून और दर्द सिर्फ अभिनय नहीं था। उन्होंने खुद 10 साल की उम्र में भारत-पाक के बंटवारे से उठी चीखें सुनी और कई जाने जाते देखीं। बीमार मां को दर्द से कराहते देखा और छोटे भाई को दम तोड़ते भी। सिर पर छत नहीं थी, भविष्य का कोई भरोसा नहीं था और उम्मीद भी टूटने लगी, लेकिन किसे पता था कि पाकिस्तान से भागा वो बच्चा, देशभक्ति की ऐसी मिसाल बनेगा कि हर कोई उन्हें असल नाम से ज्यादा भारत कुमार के नाम से पहचानेगा। आज मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार की बर्थ एनिवर्सरी है। अप्रैल 2025 में उनका निधन हो गया है, लेकिन अगर आज वो होते तो 88 साल के हो जाते। उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए, विभाजन के दर्द से निकलकर देश का हीरो बनने की कहानी- किस्सा- 1 दंगों में भाई की मौत हुई, यमुना में शव बहाया; इलाज न करने वाले डॉक्टर्स को लाठी से पीटा 24 जुलाई 1937 ब्रिटिश इंडिया के अबोटाबाद के पंजाबी हिंदू परिवार में हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी का जन्म हुआ, जो बाद में मनोज कुमार नाम से जाने गए। वो हिस्सा जहां उनका जन्म हुआ वो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा में आता है। मनोज कुमार महज 10 साल के थे, जब अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद बंटवारा शुरू हुआ। दंगे भड़के और जान बचाते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली के हडसन लाइन रिफ्यूजी कैंप में आकर रहने लगा। छोटा भाई कुक्कू महज 2 माह का था। पैदाइश से ही उसकी तबीयत खराब रहती थी और मां भी बीमार चल रही थी। दंगों के बीच डॉक्टर्स भी जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे, तभी भाई की सही इलाज न मिल पाने से मौत हो गई। बचपन का वो दर्द याद कर मनोज कुमार ने संसद टीवी के शो गुफ्तगू में कहा- वो रोता हुआ बचपन, जो लाहौर से बिछड़ गया, जो अबोटाबाद से बिछड़ गया। बहुत रोता हुआ बचपन था वो, आज भी सोचता हूं तो आंखे भले ही संभाल लूं, लेकिन दिल रोता है। दिल का रोना बहुत भयानक होता है। सबसे बड़ा मैं, मुझसे छोटी बहन ललिता। जब बंटवारा हुआ तो मां ने छोटे भाई को जन्म दिया। कुक्कू नाम था उसका, बीमार, मां भी बीमार। हम रिफ्यूजी कैंप में थे। मां को दिल्ली के तीस हजारी अस्पताल में रखा गया। जब सायरन बजता था, तो डॉक्टर-नर्स अंडरग्राउंड चले जाते थे। मां मेरी तड़प रही थी, भाई तड़प रहा था। मां चीख रही थी कि डॉक्टर को बुलाओ। वो सब अंडरग्राउंड थे। मां चीख मारी, मेरा भाई कुक्कू चला गया था। मैं गुस्से में था। मैं लाठी लेकर अंडरग्राउंड गया। डॉक्टर्स को भी मारा, नर्स को भी मारा। पिता जी आए, उन्होंने संभाला। दूसरे दिन उस 2 महीने के बच्चे को जमुना जी में बहा दिया, जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, वैसे-वैसे लगता था कि मैं डूब रहा हूं। फिर पिता जी ने रात को अपने सिर पर हाथ रखकर कसम खिलवाई कि जिंदगी में दंगा, मारपीट नहीं करना। आखिर में मनोज कुमार ने रुंहासी आवाज में कहा, जिसका बचपन मर गया, समझो वो आदमी ही मर गया। भाई की मौत के बाद भी मनोज कुमार, 2 महीने तक रिफ्यूजी कैंप में ही रहे और हालात बेहतर होने के बाद परिवार दिल्ली में ही बस गया। पिता स्टील की फैक्ट्री में काम करते थे, लेकिन साथ ही वो शायर थे। जब मनोज कुमार के पिता 5वीं में थे, तो लामा इकबाल ने उनकी नजम सुनकर उन्हें खिज्र का तकाजा दिया था। जब उनका कलाम छपा, तो महाराष्ट्र उर्दू एकेडमी से उन्हें सिमरन अवॉर्ड मिला। किस्सा- 2 दिलीप कुमार को फिल्मों में मरता देख मान लिया फरिश्ता, सोचा- मैं भी फरिश्ता बनूंगा दिल्ली में ही मनोज कुमार की पढ़ाई हुई। वह कम उम्र के थे, जब मामा उन्हें अक्सर फिल्में दिखाने ले जाते थे। तब दिलीप कुमार स्टार बन चुके थे, जिनकी फिल्में अक्सर सिनेमाघरों में लगती थीं। मनोज कुमार ने सबसे पहले दिलीप कुमार की 1947 में आई फिल्म जुगनू देखी, जिसमें उनके किरदार की मौत हो जाती है। तब तक मनोज कुमार नहीं जानते थे कि सिनेमा क्या होता है। कुछ समय बाद उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म शहीद (1948) देखी। उसमें भी दिलीप कुमार को मरता हुआ दिखाया गया। मनोज कुमार फिल्म देखकर घर लौटे, तो देर तक सोए ही नहीं। मन में बस एक ही ख्याल था कि जब वो शख्स एक साल पहले (फिल्म जुगनू में) मर चुके हैं, तो दोबारा (फिल्म शहीद में) कैसे मर सकते हैं। मां ने उन्हें जागते देखा, तो पूछ लिया- सोते क्यों नहीं हो? मनोज कुमार ने मासूम आवाज में कहा- बीजी (जैसा वो मां को पुकारते थे), आदमी कितनी बार मरता है? मां ने जवाब दिया- एक बार। मनोज कुमार ने फिर कहा- और जो 2-3 बार मरे? मां ने कहा- वो तो फरिश्ता ही होगा। उस दिन मनोज कुमार ने ठान लिया कि मैं भी बड़ा होकर फरिश्ता ही बनूंगा। किस्सा- 3 कजन का खत मिलने पर बॉम्बे पहुंचे, सेट पर सामान ढोने का काम मिला बढ़ती उम्र के साथ मनोज कुमार हीरो बनने का ख्याल पक्का करने लगे। उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। मनोज कुमार के कजन लेखराज भाकरी भी हिंदी सिनेमा से जुड़ चुके थे। एक दिन जब मनोज कुमार की लेखराज से मुलाकात हुई, तो उन्होंने मनोज को देखते ही कहा- तू तो हीरो लगता है। मनोज सुनकर खड़े हुए और झट से कहा- तो बना दीजिए। लेखराज ने जब फिल्में डायरेक्ट करना शुरू किया, तो उन्हें मनोज की कही वो बात याद रही। 1956 में उन्होंने मनोज के परिवार को खत लिखकर उन्हें बॉम्बे भेजने को कहा। माता-पिता की रजामंदी के बाद मनोज बॉम्बे पहुंचे और चाचा-चाची के घर में रहने लगे। लेखराज ने शुरुआत

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

बंटवारे में मां की चीखें सुनीं, भाई को मरते देखा:नकल उतारने पर शाहरुख पर केस किया, सरकार ने बैन कीं मनोज कुमार की फिल्में

सिनेमा में कई हीरो आए, कई सुपरस्टार बने, लेकिन एक अभिनेता ऐसा भी था जिसने पर्दे पर उपकार, पूरब और पश्चिम, रोटी कपड़ा और मकान जैसी फिल्मों के जरिए देशभक्ति को जिया। उनका नाम था मनोज कुमार। देशप्रम ही वो वजह था कि लोग उनका असली नाम भूलने लगे और उन्हें सिर्फ एक नाम से पुकारने लगे ‘भारत कुमार’। उनकी फिल्मों में दिखने वाला जज्बा, जुनून और दर्द सिर्फ अभिनय नहीं था। उन्होंने खुद 10 साल की उम्र में भारत-पाक के बंटवारे से उठी चीखें सुनी और कई जाने जाते देखीं। बीमार मां को दर्द से कराहते देखा और छोटे भाई को दम तोड़ते भी। सिर पर छत नहीं थी, भविष्य का कोई भरोसा नहीं था और उम्मीद भी टूटने लगी, लेकिन किसे पता था कि पाकिस्तान से भागा वो बच्चा, देशभक्ति की ऐसी मिसाल बनेगा कि हर कोई उन्हें असल नाम से ज्यादा भारत कुमार के नाम से पहचानेगा। आज मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार की बर्थ एनिवर्सरी है। अप्रैल 2025 में उनका निधन हो गया है, लेकिन अगर आज वो होते तो 88 साल के हो जाते। उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जानिए, विभाजन के दर्द से निकलकर देश का हीरो बनने की कहानी- किस्सा- 1 दंगों में भाई की मौत हुई, यमुना में शव बहाया; इलाज न करने वाले डॉक्टर्स को लाठी से पीटा 24 जुलाई 1937 ब्रिटिश इंडिया के अबोटाबाद के पंजाबी हिंदू परिवार में हरिकृष्ण गिरी गोस्वामी का जन्म हुआ, जो बाद में मनोज कुमार नाम से जाने गए। वो हिस्सा जहां उनका जन्म हुआ वो बंटवारे के बाद पाकिस्तान के खैबर पखतूनख्वा में आता है। मनोज कुमार महज 10 साल के थे, जब अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद बंटवारा शुरू हुआ। दंगे भड़के और जान बचाते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली के हडसन लाइन रिफ्यूजी कैंप में आकर रहने लगा। छोटा भाई कुक्कू महज 2 माह का था। पैदाइश से ही उसकी तबीयत खराब रहती थी और मां भी बीमार चल रही थी। दंगों के बीच डॉक्टर्स भी जान बचाने की जद्दोजहद कर रहे थे, तभी भाई की सही इलाज न मिल पाने से मौत हो गई। बचपन का वो दर्द याद कर मनोज कुमार ने संसद टीवी के शो गुफ्तगू में कहा- वो रोता हुआ बचपन, जो लाहौर से बिछड़ गया, जो अबोटाबाद से बिछड़ गया। बहुत रोता हुआ बचपन था वो, आज भी सोचता हूं तो आंखे भले ही संभाल लूं, लेकिन दिल रोता है। दिल का रोना बहुत भयानक होता है। सबसे बड़ा मैं, मुझसे छोटी बहन ललिता। जब बंटवारा हुआ तो मां ने छोटे भाई को जन्म दिया। कुक्कू नाम था उसका, बीमार, मां भी बीमार। हम रिफ्यूजी कैंप में थे। मां को दिल्ली के तीस हजारी अस्पताल में रखा गया। जब सायरन बजता था, तो डॉक्टर-नर्स अंडरग्राउंड चले जाते थे। मां मेरी तड़प रही थी, भाई तड़प रहा था। मां चीख रही थी कि डॉक्टर को बुलाओ। वो सब अंडरग्राउंड थे। मां चीख मारी, मेरा भाई कुक्कू चला गया था। मैं गुस्से में था। मैं लाठी लेकर अंडरग्राउंड गया। डॉक्टर्स को भी मारा, नर्स को भी मारा। पिता जी आए, उन्होंने संभाला। दूसरे दिन उस 2 महीने के बच्चे को जमुना जी में बहा दिया, जैसे-जैसे वो नीचे जा रहा था, वैसे-वैसे लगता था कि मैं डूब रहा हूं। फिर पिता जी ने रात को अपने सिर पर हाथ रखकर कसम खिलवाई कि जिंदगी में दंगा, मारपीट नहीं करना। आखिर में मनोज कुमार ने रुंहासी आवाज में कहा, जिसका बचपन मर गया, समझो वो आदमी ही मर गया। भाई की मौत के बाद भी मनोज कुमार, 2 महीने तक रिफ्यूजी कैंप में ही रहे और हालात बेहतर होने के बाद परिवार दिल्ली में ही बस गया। पिता स्टील की फैक्ट्री में काम करते थे, लेकिन साथ ही वो शायर थे। जब मनोज कुमार के पिता 5वीं में थे, तो लामा इकबाल ने उनकी नजम सुनकर उन्हें खिज्र का तकाजा दिया था। जब उनका कलाम छपा, तो महाराष्ट्र उर्दू एकेडमी से उन्हें सिमरन अवॉर्ड मिला। किस्सा- 2 दिलीप कुमार को फिल्मों में मरता देख मान लिया फरिश्ता, सोचा- मैं भी फरिश्ता बनूंगा दिल्ली में ही मनोज कुमार की पढ़ाई हुई। वह कम उम्र के थे, जब मामा उन्हें अक्सर फिल्में दिखाने ले जाते थे। तब दिलीप कुमार स्टार बन चुके थे, जिनकी फिल्में अक्सर सिनेमाघरों में लगती थीं। मनोज कुमार ने सबसे पहले दिलीप कुमार की 1947 में आई फिल्म जुगनू देखी, जिसमें उनके किरदार की मौत हो जाती है। तब तक मनोज कुमार नहीं जानते थे कि सिनेमा क्या होता है। कुछ समय बाद उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म शहीद (1948) देखी। उसमें भी दिलीप कुमार को मरता हुआ दिखाया गया। मनोज कुमार फिल्म देखकर घर लौटे, तो देर तक सोए ही नहीं। मन में बस एक ही ख्याल था कि जब वो शख्स एक साल पहले (फिल्म जुगनू में) मर चुके हैं, तो दोबारा (फिल्म शहीद में) कैसे मर सकते हैं। मां ने उन्हें जागते देखा, तो पूछ लिया- सोते क्यों नहीं हो? मनोज कुमार ने मासूम आवाज में कहा- बीजी (जैसा वो मां को पुकारते थे), आदमी कितनी बार मरता है? मां ने जवाब दिया- एक बार। मनोज कुमार ने फिर कहा- और जो 2-3 बार मरे? मां ने कहा- वो तो फरिश्ता ही होगा। उस दिन मनोज कुमार ने ठान लिया कि मैं भी बड़ा होकर फरिश्ता ही बनूंगा। किस्सा- 3 कजन का खत मिलने पर बॉम्बे पहुंचे, सेट पर सामान ढोने का काम मिला बढ़ती उम्र के साथ मनोज कुमार हीरो बनने का ख्याल पक्का करने लगे। उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई पूरी की। मनोज कुमार के कजन लेखराज भाकरी भी हिंदी सिनेमा से जुड़ चुके थे। एक दिन जब मनोज कुमार की लेखराज से मुलाकात हुई, तो उन्होंने मनोज को देखते ही कहा- तू तो हीरो लगता है। मनोज सुनकर खड़े हुए और झट से कहा- तो बना दीजिए। लेखराज ने जब फिल्में डायरेक्ट करना शुरू किया, तो उन्हें मनोज की कही वो बात याद रही। 1956 में उन्होंने मनोज के परिवार को खत लिखकर उन्हें बॉम्बे भेजने को कहा। माता-पिता की रजामंदी के बाद मनोज बॉम्बे पहुंचे और चाचा-चाची के घर में रहने लगे। लेखराज ने शुरुआत

हेयरफॉल: बालों की झड़ी से परेशान हैं तो मेथी में फैले ये 4 कपड़े, 2 सप्ताह में शानदार दिखते हैं

हेयरफॉल: बालों की झड़ी से परेशान हैं तो मेथी में फैले ये 4 कपड़े, 2 सप्ताह में शानदार दिखते हैं

इस भाग में भारी जिंदगी, प्रदूषण, तनाव और गलत भाषा का सबसे पहला असर हमारे बालों पर पड़ता है। बालों का स्टाइल एक ऐसी समस्या बन गई है, जिससे हर दूसरा व्यक्ति परेशान है। बाजार में कई तरह के हेयर केयर उत्पाद मौजूद हैं, लेकिन उनमें मौजूद केमिकल कई बार बालों को नुकसान पहुंचाते हैं। अगर आप भी बालों से परेशान हैं और कोई प्रभावशाली प्राकृतिक उपाय ढूंढ रहे हैं, तो मेथी दाना आपके लिए वरदान साबित हो सकता है। मेथी में प्रोटीन, निकोटिनिक एसिड और फोलिक एसिड प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो बालों के प्रोटीन को मजबूत बनाते हैं। नारियल तेल बाले को गहराई से पोषण आहार के लिए जाना जाता है। जब इसे मेथी के साथ शामिल किया जाता है, तो यह बालों के झड़ने की समस्या को जड़ से ख़त्म करने में मदद करता है। 2 लार्ज मेथी दाना और लें उसे नारियल तेल में कैनवास पेंटिंग गर्म कर लें। जब तेल गुनगुना हो जाए, तो इससे स्कैल्प की मालिश करें। इसे हर हफ्ते 2 बार खरीदें। डैंड्रफ और ड्राय स्कैल्प भी बाल स्कैल्प का एक बड़ा कारण होते हैं। दही में मौजूद लैक्टिक एसिड स्कैल्प को साफ और वर्गीकृत किया गया है। रातभर भीगे हुए मेथी दानों को पीसकर पेस्ट बना लें। अब इसमें 3-4 बड़े ताज़ा डेयरी रेवेअर शामिल हैं। इस पैक को बालों की जड़ों से सिरों तक और 30 मिनट बाद किसी भी फफूंदी से धो लें। एलोवेरा जेल बाल प्राकृतिक रूप से चमकदार और मजबूत बनते हैं। इसमें मौजूद एंजाइम एंजाइम को बढ़ावा दिया जाता है। मेथी के पेस्ट में 2 माइक्रो ताज़ा एलोवेरा जेल पकड़े। इस मिक्सचर को स्कैल्प पर अच्छी तरह से सजाया गया है। यह बालों के झड़ने को तुरंत नियंत्रित करने में मदद करता है और बालों को स्थापित करता है। प्याज के रस में प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा होती है, जो नए बाल ओबने और स्कैल्प के ब्लड सर्कोलन को बेहतर बनाने में सहायक होता है। मेथी के पाउडर या पेस्ट में 2 प्याज का रस मिला लें। इसे अपने नाम की मदद से स्कैल्प पर लगाएं। 20 से 25 मिनट बाद बालों को धो लें।

दांतों में सूजन और त्वचा पर खुजली हो सकती है किडनी रोग होने के लक्षण, भूलकर भी न करें

दांतों में सूजन और त्वचा पर खुजली हो सकती है किडनी रोग होने के लक्षण, भूलकर भी न करें

गुर्दा रोग: शरीर को स्वस्थ और डिटॉक्स रखने में हमारी किडनी की बेहद अहम भूमिका है। यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का काम करता है। हालाँकि, जब किडनी के कार्य करने की क्षमता प्रभावित होती है, तो शरीर कई तरह के प्रारंभिक संकेत देना शुरू कर देता है। बार-बार लोग इन योग्यताओं को सामान्य समझकर अंतिम कर देते हैं, जो आगे चलकर किडनी फेलियर या गंभीर किडनी रोग का कारण बन सकते हैं। अगर आपके दांतों या पंजों में किसी बाहरी चोट के कारण सूजन आ रही है, तो यह किडनी की बीमारी का बड़ा संकेत हो सकता है। किडनी जब ठीक से काम नहीं करती, तो शरीर से पसीना और अतिरिक्त पानी बाहर नहीं निकलता है। यह तरल पदार्थ स्टाइरीन और ऑर्थोडॉक्स ऑर्गेनाइजेशन में जमा होने लगता है, जिससे सूजन दिखाई देती है। त्वचा पर अधिक खुजली और रूखापन होना त्वचा में लगातार खुजली होना सिर्फ एलर्जी या त्वचा संक्रमण ही नहीं है, बल्कि किडनी की मांसपेशियों की ओर भी संकेत होता है। खून में टॉक्सिन्स का होना, पदार्थ का स्तर बढ़ना, त्वचा पर गंभीर खुजली, रूखापन और रैशेज शामिल हैं। बार-बार पेशाब आना या पेशाब में खून आना। खून में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी और विषाक्त पदार्थों के जमाव के कारण होते हैं। सुबह-सुबह नज़र के नीचे सूजन दिखाई देती है। यदि आपके शरीर में यह लक्षण 4-5 दिन से अधिक समय तक लगातार दिखाई देता है, तो बिना किसी देरी के डॉक्टर से संपर्क करें। आप तुरंत केएफटी (किडनी फंक्शन टेस्ट), यूरिन टेस्ट और ब्लड डॉक्युमेंट की जांच करें। पर्याप्त पानी पिएं, नमक का सेवन नियंत्रित करें, और डॉक्टर की सलाह के बिना पेनकिलर खाने से सलाह लें।

आशीष कुमार दश होंगे इंफोसिस के नए CEO:पहली तिमाही में मुनाफा 12.2% बढ़कर ₹7,769 करोड़ रहा, रेवेन्यू 14% उछलकर ₹48,211 करोड़ पहुंचा

आशीष कुमार दश होंगे इंफोसिस के नए CEO:पहली तिमाही में मुनाफा 12.2% बढ़कर ₹7,769 करोड़ रहा, रेवेन्यू 14% उछलकर ₹48,211 करोड़ पहुंचा

देश की दूसरी सबसे बड़ी IT सर्विसेज कंपनी इंफोसिस ने आशीष कुमार दश को अपना नया CEO नियुक्त किया है। 23 जुलाई 2026 को पहली तिमाही के नतीजों के साथ कंपनी ने इस लीडरशिप बदलाव का ऐलान किया। वे मौजूदा CEO और MD सलिल पारिख की जगह लेंगे। वे 1 अप्रैल 2027 से चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर और मैनेजिंग डायरेक्ट के रूप में पदभार संभालेंगे। उनका कार्यकाल 5 साल के लिए होगा, जो 31 मार्च 2032 तक चलेगा। कंपनी का मुनाफा 12.2% बढ़कर 7,769 करोड़ रुपए रहा जून तिमाही में कंपनी का कंसॉलिडेटेड नेट प्रॉफिट सालाना आधार पर 12.2% बढ़कर 7,769 करोड़ रुपए रहा, जो पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में 6,921 करोड़ रुपए था। पिछली तिमाही के 8,501 करोड़ रुपए के मुकाबले कंपनी के नेट प्रॉफिट में 8.6% की गिरावट आई है। रेवेन्यू 14% बढ़कर ₹48,211 करोड़ हुआ इंफोसिस का रेवेन्यू सालाना आधार पर 14% बढ़कर 48,211 करोड़ रुपए हो गया है। एक साल पहले की समान अवधि में कंपनी ने 42,279 करोड़ रुपए का रेवेन्यू हासिल किया था। तिमाहगी आधार (QoQ) पर देखें तो कंपनी के रेवेन्यू में 4% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। बीते वित्त वर्ष की चौथी तिमाही (मार्च तिमाही) में कंपनी का रेवेन्यू 46,402 करोड़ रुपए रहा था। सलिल पारेख बोले- 8 साल में कंपनी की कमाई दोगुनी अपना पद छोड़ रहे MD और CEO सलिल पारेख ने कहा कि पिछले आठ साल में इंफोसिस का नेतृत्व करना उनके लिए बहुत सम्मान की बात रही है। इस दौरान कंपनी का रेवेन्यू 10 अरब डॉलर से बढ़कर दोगुना यानी 20 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया है। सलिल पारेख ने आगे कहा कि हमने डिजिटल बदलावों के क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत की है और AI बदलाव के लिए एक अलग रणनीति तैयार की है। आशीष के साथ कई साल तक काम करने के कारण मैंने उनकी ईमानदारी, ग्राहकों के प्रति सोच और बदलाव के दौर में नेतृत्व करने की क्षमता को बहुत करीब से देखा है। उन्हें हमारे ग्राहकों, व्यापार और कर्मचारियों की गहरी समझ है। मुझे पूरा भरोसा है कि वे इंफोसिस को बदलाव के अगले चरण में सफलतापूर्वक ले जाएंगे। आशीष कुमार बोले- इंफोसिस नए दौर की शुरुआत मजबूती से कर रही नई जिम्मेदारी मिलने पर आशीष कुमार दश ने कहा कि तकनीक अब एक नए युग में प्रवेश कर रही है, जहां एआई व्यापार करने और वैल्यू बनाने के तरीकों को पूरी तरह बदल रहा है। इंफोसिस इस नए दौर की शुरुआत बहुत मजबूती के साथ कर रही है। हमारे पास स्पष्ट एआई रणनीति, बेहतरीन प्रतिभा, ग्राहकों के साथ गहरे संबंध और ऐसे मूल्य हैं जिन्होंने दुनिया भर में विश्वास जीता है। मेरा संकल्प इन ताकतों को और मजबूत करने, नए प्रयोगों को तेज करने, क्षमताओं को बढ़ाने और ग्राहकों को एआई-संचालित दुनिया में सफल बनाने का है।

नेपाली PM बालेन शाह ने अपना ही नियम क्यों तोड़ा:भारत और चीन के राजदूतों से मुलाकात करेंगे; 3 महीने में ही फैसले से पलटे

नेपाली PM बालेन शाह ने अपना ही नियम क्यों तोड़ा:भारत और चीन के राजदूतों से मुलाकात करेंगे; 3 महीने में ही फैसले से पलटे

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन शाह) पहली बार अपने बनाए नियम से हटकर विदेशी राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात करने जा रहे हैं। नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बालेन शाह भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीन के राजदूत झांग माओमिंग से अलग-अलग मुलाकात करेंगे। इसे नेपाल की उस नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत वह अपने दोनों सबसे बड़े पड़ोसियों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखना चाहता है। एक ही दिन दोनों देशों के राजदूतों के साथ मीटिंग बालेन शाह नहीं चाहते थे कि भारत या चीन में से किसी को यह लगे कि दूसरे देश को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। इसी वजह से उन्होंने दोनों देशों के राजदूतों से एक ही दिन अलग-अलग मुलाकात करने का फैसला किया है। दोनों बैठकें एक के बाद एक होंगी, ताकि दोनों देशों के साथ समान व्यवहार का मैसेज जाए। नेपाल सरकार ने पुष्टि की है कि भारत और चीन के राजदूतों के साथ अलग-अलग बैठकें इसी सप्ताह होंगी। हालांकि, दोनों बैठकों की सटीक तारीख अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। नेपाल का विदेश मंत्रालय इन बैठकों की अंतिम तैयारियों में जुटा है। बालेन शाह ने अपना रुख क्यों बदला? प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने यह परंपरा बनाई थी कि वह किसी विदेशी राजदूत से अकेले मुलाकात नहीं करेंगे। उनका मानना था कि कई शक्तिशाली देश सरकारी व्यवस्था को दरकिनार कर सीधे नेपाल के टॉप नेताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश करते रहे हैं। इसलिए उन्होंने विदेशी राजनयिकों से सिर्फ समूह (ग्रुप) में मुलाकात करने की नीति अपनाई। इस फैसले के चलते उन्होंने कई बड़े विदेशी प्रतिनिधियों से व्यक्तिगत मुलाकात करने से इनकार कर दिया। अब बालेन शाह मान रहे हैं कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए भारत और चीन के साथ सीधे संवाद बनाए रखना जरूरी हो चुका है। यह बदलाव ऐसे समय में आया है, जब उनकी सरकार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और शुरुआती नीतिगत फैसलों को लेकर लगातार आलोचना का सामना कर रही है। नेपाल की विदेश नीति में भारत-चीन की अहम भूमिका नेपाल लंबे समय से भारत और चीन के बीच संतुलन बनाकर विदेश नीति चलाता रहा है। भारत, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है और लाखों नेपाली नागरिक रोजगार, व्यापार और अन्य कारणों से भारत से जुड़े हुए हैं। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते भी काफी गहरे हैं। वहीं चीन ने पिछले एक दशक में नेपाल में बुनियादी ढांचा और कनेक्टिविटी परियोजनाओं के जरिए अपना प्रभाव लगातार बढ़ाया है। बीजिंग नेपाल के साथ अपने रणनीतिक संबंध मजबूत करना चाहता है, जबकि काठमांडू दोनों पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है। भारत से मुलाकात क्यों अहम है? भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रिश्ते बेहद मजबूत हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है और सुरक्षा तथा व्यापार के मामले में भी दोनों एक-दूसरे पर काफी निर्भर हैं। हालांकि समय-समय पर सीमा विवाद और राजनीतिक मतभेदों को लेकर दोनों देशों के रिश्तों में तनाव भी देखने को मिला है। इसके बावजूद नेपाल के लिए भारत के साथ स्थिर और मजबूत संबंध बनाए रखना उसकी विदेश नीति की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक माना जाता है। चीन भी क्यों है बराबर अहम? चीन ने हाल के वर्षों में नेपाल में सड़क, रेल, ऊर्जा और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। इसके जरिए वह नेपाल में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ा रहा है। ऐसे में भारत के साथ-साथ चीन के साथ भी अच्छे संबंध बनाए रखना नेपाल की विदेश नीति का अहम हिस्सा है। क्या बदल रही है बालेन शाह की राजनीति? बालेन शाह पहले काठमांडू के मेयर थे। उन्होंने पारंपरिक राजनीति से अलग छवि बनाकर लोकप्रियता हासिल की थी। विदेशी राजदूतों से अकेले मुलाकात नहीं करने का फैसला भी उसी सोच का हिस्सा था। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें व्यावहारिक कूटनीति की जरूरतों को भी ध्यान में रखना पड़ रहा है।

नेपाली PM बालेन शाह ने अपना ही नियम क्यों तोड़ा:भारत और चीन के राजदूतों से मुलाकात करेंगे; 3 महीने में ही फैसले से पलटे

नेपाली PM बालेन शाह ने अपना ही नियम क्यों तोड़ा:भारत और चीन के राजदूतों से मुलाकात करेंगे; 3 महीने में ही फैसले से पलटे

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह (बालेन शाह) पहली बार अपने बनाए नियम से हटकर विदेशी राजदूतों से अलग-अलग मुलाकात करने जा रहे हैं। नेपाली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बालेन शाह भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव और चीन के राजदूत झांग माओमिंग से अलग-अलग मुलाकात करेंगे। इसे नेपाल की उस नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके तहत वह अपने दोनों सबसे बड़े पड़ोसियों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखना चाहता है। एक ही दिन दोनों देशों के राजदूतों के साथ मीटिंग बालेन शाह नहीं चाहते थे कि भारत या चीन में से किसी को यह लगे कि दूसरे देश को ज्यादा महत्व दिया जा रहा है। इसी वजह से उन्होंने दोनों देशों के राजदूतों से एक ही दिन अलग-अलग मुलाकात करने का फैसला किया है। दोनों बैठकें एक के बाद एक होंगी, ताकि दोनों देशों के साथ समान व्यवहार का मैसेज जाए। नेपाल सरकार ने पुष्टि की है कि भारत और चीन के राजदूतों के साथ अलग-अलग बैठकें इसी सप्ताह होंगी। हालांकि, दोनों बैठकों की सटीक तारीख अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। नेपाल का विदेश मंत्रालय इन बैठकों की अंतिम तैयारियों में जुटा है। बालेन ने विदेशी नेताओं से दूरी क्यों बनाई थी? बालेन शाह को अपना फैसला क्यों बदलना पड़ा बालेन शाह जब काठमांडू के मेयर थे, तब उन्होंने खुद को पारंपरिक नेताओं से अलग दिखाया था। इसी सोच के तहत उन्होंने नियम बनाया था कि वह किसी विदेशी राजदूत से अकेले मुलाकात नहीं करेंगे। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद हालात बदल गए हैं। अब उन्हें समझ आ गया है कि सिर्फ अलग छवि बनाना काफी नहीं है। देश चलाने के लिए पड़ोसी देशों के साथ सीधे बातचीत भी जरूरी होती है। इसी वजह से उन्होंने पहली बार अपना पुराना नियम तोड़ा है। भारत और चीन, दोनों नेपाल के सबसे अहम पड़ोसी हैं। ऐसे में दोनों देशों के साथ सीधा संपर्क बनाए रखना उनकी सरकार की जरूरत बन गया है। नेपाल के लिए भारत और चीन दोनों क्यों जरूरी हैं? नेपाल की विदेश नीति हमेशा से भारत और चीन के बीच संतुलन बनाए रखने पर आधारित रही है। भारत, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है, जिससे लाखों नेपाली नागरिक काम, व्यापार और पढ़ाई के लिए आसानी से भारत आते-जाते हैं। दोनों देशों के रिश्ते सिर्फ पड़ोसी होने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और धार्मिक परंपराओं से भी जुड़े हैं। दूसरी ओर, चीन ने पिछले कुछ वर्षों में नेपाल में सड़क, रेल, ऊर्जा और दूसरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। इसलिए नेपाल के लिए चीन भी एक अहम आर्थिक और रणनीतिक साझेदार बन गया है। यही वजह है कि काठमांडू किसी एक देश के करीब दिखने के बजाय भारत और चीन, दोनों के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखने की कोशिश करता है।

हम लोग डरने वाले नहीं हैं:भाई पर कुल्हाड़ी से हुए जानलेवा हमले पर बोले पंकज त्रिपाठी, कहा- संसार में किसी के साथ गलत नहीं किया

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जून में पंकज त्रिपाठी के बड़े भाई विजेंद्र नाथ पर कुल्हाड़ी से हमला किया गया था। घटना के बाद वो गंभीर रूप से घायल हो गए थे। अब लंबे समय बाद पंकज त्रिपाठी ने इस हमले पर बात की है। उनका कहना है कि उनके परिवार ने कभी किसी के साथ गलत नहीं किया है, यही वजह है कि परिवार किसी से नहीं डरता। हाल ही में टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में एक्टर पंकज त्रिपाठी ने कहा है, ‘मेरा अपने परिवार से बहुत लगाव है, हम दिन में रोज एक बार बात जरूर करते हैं। इस घटना का मुझ पर असर जरूर पड़ा, लेकिन मुझे न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। हम लोग किसी से डरने वाले लोग नहीं हैं।’ आगे एक्टर ने कहा है, ‘हमने किसी के लिए संसार में गलत नहीं किया, तो डर किस बात का। वो एक अप्रिय घटना से ज्यादा कुछ नहीं है। जीवन में ये सब घटना चलती रहती है।’ जानिए क्या था हमले का पूरा विवाद? जून में बिहार के गोपालगंज में एक्टर पंकज त्रिपाठी के भाई विजेंद्र नाथ पर कुल्हाड़ी से हमला किया गया। घटना बरौली थाना क्षेत्र के बेलसंड गांव की है। विजेंद्र नाथ तिवारी देर शाम अपने घर के दरवाजे पर बैठे थे। इसी दौरान अचानक 2 लोगों ने विजेंद्र पर वार किया। हमले में वे लहूलुहान होकर वहीं गिर पड़े। विजेंद्र नाथ को तुरंत सदर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया। प्राथमिक इलाज के बाद डॉक्टरों ने हालत को देखते हुए उन्हें पटना AIIMS रेफर कर दिया। पुलिस जांच में सामने आया कि विजेंद्र का आरोपियों के साथ जमीनी विवाद था, जिसके चलते उन पर जानलेवा हमला किया गया था। दो आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। जल्द शुरू करेंगे यूट्यूब चैनल आखिरी बार इसी साल की फिल्म कृष्णा अवतारम में नजर आए पंकज त्रिपाठी जल्द ही अपना यूट्यूब चैनल शुरू करने वाले हैं। आने वाले दिनों में वो फिल्म मिर्जापुर में नजर आएंगे, जो 5 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। इसके अलावा वो फिल्म पारिवारिक मनुरंजन और ओह माय डॉग में नजर आएंगे। पंकज त्रिपाठी 12 साल बाद थिएटर में भी वापसी करने वाले हैं।

हम लोग डरने वाले नहीं हैं:भाई पर कुल्हाड़ी से हुए जानलेवा हमले पर बोले पंकज त्रिपाठी, कहा- संसार में किसी के साथ गलत नहीं किया

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जून में पंकज त्रिपाठी के बड़े भाई विजेंद्र नाथ पर कुल्हाड़ी से हमला किया गया था। घटना के बाद वो गंभीर रूप से घायल हो गए थे। अब लंबे समय बाद पंकज त्रिपाठी ने इस हमले पर बात की है। उनका कहना है कि उनके परिवार ने कभी किसी के साथ गलत नहीं किया है, यही वजह है कि परिवार किसी से नहीं डरता। हाल ही में टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में एक्टर पंकज त्रिपाठी ने कहा है, ‘मेरा अपने परिवार से बहुत लगाव है, हम दिन में रोज एक बार बात जरूर करते हैं। इस घटना का मुझ पर असर जरूर पड़ा, लेकिन मुझे न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है। हम लोग किसी से डरने वाले लोग नहीं हैं।’ आगे एक्टर ने कहा है, ‘हमने किसी के लिए संसार में गलत नहीं किया, तो डर किस बात का। वो एक अप्रिय घटना से ज्यादा कुछ नहीं है। जीवन में ये सब घटना चलती रहती है।’ जानिए क्या था हमले का पूरा विवाद? जून में बिहार के गोपालगंज में एक्टर पंकज त्रिपाठी के भाई विजेंद्र नाथ पर कुल्हाड़ी से हमला किया गया। घटना बरौली थाना क्षेत्र के बेलसंड गांव की है। विजेंद्र नाथ तिवारी देर शाम अपने घर के दरवाजे पर बैठे थे। इसी दौरान अचानक 2 लोगों ने विजेंद्र पर वार किया। हमले में वे लहूलुहान होकर वहीं गिर पड़े। विजेंद्र नाथ को तुरंत सदर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया। प्राथमिक इलाज के बाद डॉक्टरों ने हालत को देखते हुए उन्हें पटना AIIMS रेफर कर दिया। पुलिस जांच में सामने आया कि विजेंद्र का आरोपियों के साथ जमीनी विवाद था, जिसके चलते उन पर जानलेवा हमला किया गया था। दो आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। जल्द शुरू करेंगे यूट्यूब चैनल आखिरी बार इसी साल की फिल्म कृष्णा अवतारम में नजर आए पंकज त्रिपाठी जल्द ही अपना यूट्यूब चैनल शुरू करने वाले हैं। आने वाले दिनों में वो फिल्म मिर्जापुर में नजर आएंगे, जो 5 सितंबर को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है। इसके अलावा वो फिल्म पारिवारिक मनुरंजन और ओह माय डॉग में नजर आएंगे। पंकज त्रिपाठी 12 साल बाद थिएटर में भी वापसी करने वाले हैं।